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अछि विडम्बना प्रवासी

achhi viDambna pravasi

मार्कण्डेय प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

अछि विडम्बना प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    अपन मनुजता अपने हाथेँ—

    मनुज आइ अपहरैए!

    एही कारण जीवन भरि जीवित रहि-रहिकऽ मरैए!!

    डाकू रत्नाकर सक्रिय अछि,

    वाल्मीकि नहि भेटै छथि,

    पता चलैए किछु नहि जे नारदो आइ की करैए!

    कतहु राम, लछुमन, भरतक—

    अवशेषो शेष झलकै अछि,

    उजड़ि रहल अछि आइ अयोध्या, मुदा लंका जरैए!

    धह-धह धधकैए नैतिकता,

    सामाजिकता धधरै अछि,

    सगरो द्वेष-दुष्टता-दूषित धुआँ उठैए-पसरैए!

    सेवा, त्याग, दया, ममता,

    करुणा, संकोच बिलायल अछि,

    अछि विवेकमे घुन लागल, मन-प्राण चूल्हि-सन पजरैए!

    भारतमे नहि भारतीयता,

    मिथिलामे नहि मैथिलपन,

    अपन माथपर अपने लाठी हुमचि-हुमचिकऽ बजरैए!

    अपने घरमे आब प्रवासक—

    अछि विडम्बना प्रवासी,

    अपने दाँत अपन अधरक मुद्रित किताबकेँ कुतरैए!

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 78)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

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