हम नहीं है आजकल अपने
hum nahin hai ajkal apne
हम नहीं हैं आजकल अपने।
चेतना के भ्रम हुए सपने॥
बिक गए सब धूप के कतरे।
घुप अँधेरे सब जगह उतरे॥
नाम तक गिरवी रखे हमने।
हम नहीं हैं आज कल अपने॥
शब्द अपने अर्थ खो बैठे।
भावना से हाथ धो बैठे॥
मतलबी मेले लगे सजने।
हम नहीं हैं आजकल अपने॥
कौन-सा पथ कौन मंजिल का।
क्या पता क्या हाल है दिल का?
ज़िंदगी नामा लगे लिखने।
हम नहीं हैं आजकल अपने॥
चल रहे हैं सब प्रदर्शन की डगर।
बस नुमाइश हो गई कच्ची उमर॥
काग़ज़ी रचना लगे रचने।
हम नहीं है आजकल अपने॥
- रचनाकार : श्यामबिहारी श्रीवास्तव
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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