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वासुदेव शरण अग्रवाल : विंध्य से लेकर हिमालय तक का जनपद हमें पुकार रहा है

कपिला वात्स्यायन ने कहा था कि शब्द उनकी लाठी थे। वह उसका एक सिरा पकड़कर ही भारतीय ज्ञान-परंपरा की गहराइयों में प्रवेश कर गए। आज वासुदेव शरण अग्रवाल की जन्मतिथि है। उनकी स्मृति स्वतः इतिहास का तोरण-द्वार है।

भूमि, जन और संस्कृति वासुदेव शरण अग्रवाल की ज्ञान-साधना के बिंदुपथ थे। भारतीय कला का उत्स खोजने वह समाज के आख़िरी पायदान पर बसे जन-स्रोतों तक गए। उन्होंने कुम्हारों, किसानों, बढ़इयों और लोक-जीवन से भारतीय पुरातत्त्व के अध्ययन के लिए शब्दार्थ बटोरे। ‘पद्मावत’  की संजीवन व्याख्या करते हुए जायसी-कालीन भारत की पुनर्रचना करते हैं। ‘पद्मावत’  का सटीक पाठानुशीलन करते हुए वह अवध जनपद की ठेठ से ठेठ शब्द-परंपरा का निर्वाह करते हैं। वह इतिहास-लेखन की यांत्रिक शैली से मुक्त थे। वह वेदों में गए तो वेदमय हो गए। जनपदों में गए तो लोकमय हो गए।

वासुदेव शरण अग्रवाल वेद, पुराण व पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’  की व्याख्याएँ करते हुए भारतीय कला और समाज को समझने का एक विशिष्ट अनुशासन तैयार कर रहे थे। कला को सोचने-समझने की औपनिवेशिक दृष्टि से वह बहुत आगे पहुँच गए थे।


साहित्येतिहास में हजारी प्रसाद द्विवेदी इतिहास-चिंतन की जिस स्वाभाविक धारा को लेकर बढ़े थे, वह प्राचीनता को चिंतन की उसी स्वाभाविक धारा की ओर ले जाती है, जिसकी तह में वासुदेव शरण अग्रवाल खड़े थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ भ्रमण करते हुए वासुदेव शरण अग्रवाल ने भारतीय लोकधर्म में यक्ष्ममह, नागमह आदि मान्यताओं को पुनर्जीवित कर दिया था। वह बनारस में बसे कर्मनवीर, बुल्लाबीर, भोजूवीर जैसे अरथानों (यह शब्द ‘स्थान’ शब्द का ही रूपांतरण है) को काशी के लोकधर्म में यक्ष जातियों की उपस्थिति से दर्ज कर चुके थे।

वासुदेव शरण अग्रवाल के यहाँ कला, दर्शन, भाषाशास्त्र, मुद्राशास्त्र, पाठालोचन व इतिहास के वे सभी अनुशासन आपस में घुल-मिल गए थे। वह मथुरा संग्रहालय के क्यूरेटर बने। गुप्तकाल की शालभंजिका की मूर्तियों की व्याख्या करते हुए वह कालिदास के छंदों में रससिक्त हो चुके थे।

संग्रहालय उनके इतिहास-दर्शन में किसी मंदिर की भाँति प्रकट हुए। उन्होंने स्वयं भारत के विविध संग्रहालयों का संचालन किया। औपनिवेशिक भारत, जो धीरे-धीरे उपनिवेशवाद से मुक्ति की दिशा में अग्रसर हो रहा था, उसमें वासुदेव शरण अग्रवाल ने नई पीढ़ी के लोगों को संग्रहालयों के औचित्य से जोड़ा। वह राजा-महाराजाओं और विकृत अवस्था में पड़ी इतिहास की सामग्री को ढूँढ़-ढूँढ़कर संग्रहालय की ओर ला रहे थे। रायकृष्णदास ने लिखा है कि, “जहाँ किसी महत्त्वपूर्ण वस्तु का पता लगा, किसी विक्रेता के पास हो, किसी छोटे संग्रहालय में हो, किसी राज-रियासत में हो, वासुदेव जी वहाँ पहुँच जाते और वह वस्तु प्राप्त करके ही चैन लेते। इस प्रकार उन्होंने मानो छू-मंतर में राष्ट्रीय संग्रहालय का निर्माण कर डाला। और ऐसा निर्माण किया कि वह नित्य विकासशील है।”

इतिहास को जानने के सभी स्रोतों को परखने के बावजूद उन्होंने शब्द-परंपरा का साथ कभी नहीं छोड़ा। वह आजीवन पाणिनि से लेकर ‘पद्मावत’ जैसे ग्रंथों में रमे रहे और अपनी पसंदीदा पंक्ति—‘जे ते आवे ते परिया परिया मोती लावे’—की तर्ज़ पर कोटि-कोटि शब्द-परंपराओं का अन्वेषण, अनुशीलन और परिमार्जन करते रहे।

‘पद्मावत’ पर उनकी संजीवनी व्याख्या पढ़ते हुए कोई भी अभिभूत हो सकता है। आम्रफल के डंठल (सिरे) से एक चिपचिपा रस स्रावित होता है। उसे अवध जनपद में ‘चोंप’ या कहीं-कहीं ‘चोपी’ कहे जाने का प्रचलन है। दूसरा शब्द है ‘चतुरसम’, जिसका अर्थ है—केसर, कस्तूरी, कपूर और चंदन की सुगंध। कर्मकांड में पहले यह टर्म बहुत प्रयोग होता था। वासुदेव शरण अग्रवाल ने जायसी के ‘पद्मावत’ का संजीवन भाष्य लिखते हुए अवधी भाषा के इन शब्दों को उसके अर्थ के संदर्भ में पुनः प्राप्त किया था। भारतीय मेधा के लिए यह एक विराट आश्चर्य है कि ब्रज क्षेत्र में पैदा होने वाले एक ज्ञान-साधक ने किस तरह अवध जनपद के हृदय में बैठकर ‘पद्मावत’ की संजीवनी व्याख्या प्रस्तुत की। उदाहरण के लिए ए. जी. शिरेफ़ के पाठ में ‘चोप’ का अर्थ सुगंधित पवन था—

चंदन चोप पवन अस पीउ।
भइउ चित्र सम कस भा जीऊ।।

अपनी सूक्ष्मदर्शी इतिहास-दृष्टि से (जिसे ऐतिहासिक अर्थों में वे जनपदीय अध्ययन की आँख कहा करते थे) वासुदेव शरण अग्रवाल ने ‘चित्रसम’ शब्द का शुद्ध पाठ ‘चतुरसम’ रखते हुए ‘चोप’ शब्द के उपयुक्त अर्थ को खोज निकाला। कालांतर में ‘पद्मावत’ के पाठालोचकों ने अपने संस्करण में इस नए पाठ को जगह दी। प्रो. अग्रवाल को इस महान् कार्य के लिए हिंदी का दूसरा साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला।

उन्होंने अनेक ग्रंथों का भाष्य किया था। ‘कीर्तिलता’ पर उनका भाष्य जब प्रकाशित हुआ था, तो पुरानी सभी ऊलजुलूल टीकाओं का सच सामने आ गया। एक वाक़या है कि ‘कीर्तिलता’ के पुराने पाठों में ‘आड़ी दीनि निहारि दबलि दाढ़ी थुकबाहइ’ का अर्थ ‘आड़ी नज़र से देखकर दौड़कर दाढ़ी में थुकवाता है’ किया जा रहा था।

उस समय के युवा विद्वान नर्मदेश्वर चतुर्वेदी वासुदेव शरण अग्रवाल के पास गए। उन्होंने एक जगह कहा है कि वह तो शब्दों की सात पीढ़ियों की नब्ज़ पहचानने वाले विद्वान थे। पुस्तक हाथ में लेते ही ‘थुकबाहइ’ में ‘थुक’ और ‘बाहइ’ के बीच वासुदेव शरण अग्रवाल ने एक लकीर खींचकर कहा—“अब अर्थ करो।”

नर्मदेश्वर चतुर्वेदी ने तुरंत अर्थ ग्रहण कर लिया—‘तुर्क की दाढ़ी से थूक बह रहा है।’ यह वासुदेव शरण अग्रवाल की प्रखर प्रज्ञा थी, जो शब्द की आत्मा को आत्मसात कर लेती थी।

उनके शिष्य आनंद कृष्ण ने हिंदुस्तानी पत्रिका के 2004 अंक में उन्हें याद करते हुए लिखा है कि, “जनपदीय प्रेम ने उन्हें जनपदीय संस्कृति की ओर आकृष्ट किया। पहले तो वह अपने घर ही में सुन पड़ने वाले शब्दों, मुहावरों या अन्य परंपराओं का संग्रह करते रहे। फिर उन्होंने स्वयं तथा अपने सहयोगियों के द्वारा इस आंदोलन को विस्तृत किया। एक बार उन्होंने लिखा था—‘हिमालय से विंध्य तक का जनपद हमें पुकार रहा है।’ जहाँ उन्हें काम का कोई शब्द मिला, उन्होंने नोट किया।”

उनकी स्मृति को नमन!

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