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अनफ़्रेम्ड : भारतीय सिनेमा में कॉमरेड, आंदोलन और लाल सलाम

जब कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ता है, उसे बड़ी हिम्मत से काम लेना होता है; हो सकता है उसे बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़े, उस वक़्त जो हौसला बढ़ाता है और मंज़िल पाने में मदद करे, उस इंसान को कहते हैं—कॉमरेड!

— तेलुगु फ़िल्म ‘डियर कॉमरेड’ से (2020)

नायिका लिली (रश्मिका मंडाना) अपने स्टूडेंड यूनियन वाले दोस्त बॉबी (विजय देवरकोंडा) के दादा जी से जब कॉमरेड का मतलब पूछती है, तो उसे यही जवाब मिलता है। सन् 2022 में आई ‘डियर कॉमरेड’ एक प्रेम कहानी है। वाम राजनीति यहाँ पर बस एक रोमांटिक अवधारणा है, ताकि नायक के नायकत्व को स्थापित किया जा सके। मगर यही साधारणपन, यही एकरैखिकता ही इस फ़िल्म को याद रह जाने वाला बना देती है। यह फ़िल्म बहुत हल्के-फुल्के पॉपुलर नैरेटिव का इस्तेमाल करते हुए, सीधे वाम राजनीति पर बात करने वाली फ़िल्मों से ज़्यादा गहराई से अपनी बात कह जाती है। यह एक विकल्प देती है कि जहाँ ग़लत लगे प्रतिरोध का रास्ता चुना जाना चाहिए। विजय देवरकोंडा के लिए यह बहुत हद तक दूसरी ‘अर्जुन रेड्डी’ है, यानी एक ग़ुस्सैल मगर ईमानदार इंसान की कहानी। वह अपने दादा के विचारों से प्रभावित है, जो एक लेफ़्टिस्ट लीडर थे। फ़िल्म अंत तक आते-जाते काफ़ी उतार-चढ़ाव से गुज़रती है; कुछ उलझ भी जाती है, मगर अपनी बात किसी न किसी तरीक़े से कह देती है।

इस फ़िल्म से एक दिलचस्प सवाल उठता है कि लोकप्रिय सिनेमा में लेफ़्ट कितना रहा है। एक विचारधारा के तौर पर नहीं, बल्कि सीधे अपने विषय के रूप में। जहाँ पर सीधे भारतीय वाम राजनीति, विचारधारा, ट्रेड यूनियन या फिर आंदोलन की बात कही गई हो। ज़ाहिर है कि तेलुगु, मलयालम और बंगाल का सिनेमा इसमें सबसे ज़्यादा उभरकर आता है। दक्षिण के सिनेमा में अक्सर नायकों की लड़ाई निजी नहीं होती, बल्कि वे किसी बड़े सामाजिक मुद्दे या अपनी कम्युनिटी के लिए लड़ते हुए दिखाए जाते हैं। इस नैरेटिव और तनाव को रचने के लिए वाम का लाल रंग सबसे मुफ़ीद साबित होता है। दिलचस्प है कि भारत में दक्षिणपंथ के उभार के बाद भी ऐसी बहुत-सी फ़िल्में बनीं, जहाँ आप वामपंथी राजनीति और उसके रुझान को लोकप्रिय सिनेमा का हिस्सा बनते देखते हैं। ‘डियर कॉमरेड’ उनमें से एक है।

2021 में आई ‘श्याम सिंह रॉय’ को भी बिना हिचकिचाहट इसी तरह की फ़िल्मों में शामिल किया जा सकता है। प्लॉट में दो-तीन बड़ी ख़ामियों के बावजूद फिल्म के निर्देशक राहुल सांकृत्यायन इसे एक विजुअल अनुभव में बदल देते हैं। पुनर्जन्म पर आधारित कहानी 50 साल पहले के बंगाल में पहुँच जाती है। पुनर्जन्म की कथा होने के बावजूद यह फिल्म अपना स्टैंड प्रोग्रेसिव रखती है और देवदासी-प्रथा, धर्म की आड़ में शोषण और जातीय असमानता पर सीधे-सीधे बिना किसी लाग-लपेट के बात करती है। नायक वामपंथी है। वह ख़ुद को नास्तिक कहता है। स्पष्ट समाजिक बुराइयों से लड़ता है। यह भी एक प्रेम-कहानी है, मगर इस प्रेम-कहानी का चरम एक बड़े सोशल मूवमेंट में नज़र आता है; जिसका नेतृत्व श्याम सिंह रॉय करता है, मगर कहीं न कहीं प्रेरणा रोज़ी (साई पल्लवी) होती है। यहाँ पर नायक एक एक्टिविस्ट और सोशल रिफ़ॉर्मर के रूप में नज़र आता है, जो देवदासी प्रथा के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करता है। नक्सलबाड़ी पर लिखी उसकी लाल कवर वाली किताब बार-बार दिखाई जाती है।

इस सबके बावजूद यह ‘जय भीम’ जैसी कोई यथार्थवादी या सामाजिक बदलाव की फ़िल्म नहीं है। यह एक मधुर प्रेम-कहानी है जो भाषा की बाध्यता के बावजूद गुनगुनाने लायक़ गीतों, नवरात्रि में आग की रोशनी में होने वाले अद्भुत नृत्य, चाँदनी रात में नौका विहार के दृश्य और कोलकाता के बैकड्रॉप की वजह से यादगार हो जाती है। इस फ़िल्म में नवरात्रि के दौरान की हर रात, दुर्गा के अलग रूप और उसके समानांतर परिपक्व होती प्रेम-कहानी का भी सुंदर नाटकीय चित्रण है। नानी ने इस नायक को अपनी बॉडी-लैंग्वेज से जीवंतता दी है। बिना ज़्यादा मैनरिज़्म का सहारा लिए वह दोनों ही रोल में बिल्कुल अलग शख़्सियत दिखते हैं। साई पल्लवी का अभिनय सुंदर है, ख़ासतौर पर नृत्य में दुर्गा-रूप और प्रेम में डूबी स्त्री का कंट्रास्ट अद्भुत है।

इसके ही आस-पास आई एक और तेलुगु फ़िल्म ‘विराट पर्वम’ का भी ज़िक्र किया जाना चाहिए जो नक्सलवाद की पृष्ठभूमि पर है। ‘विराट पर्वम’ तितली के पंखों जैसे नाज़ुक सपनों के झुलस जाने की कथा है। इसीलिए बहुत ही ख़ूबसूरत और काव्यात्मक दृश्यों से रची गई, मगर सपाट कथानक वाली यह फ़िल्म ख़त्म होने पर मन में बहुत से सवाल छोड़ जाती है। प्रेम और क्रांति दोनों ही जीवन के सबसे सुंदर पक्ष हैं। जैसे एक-दूसरे के पूरक हों। एक लड़की जो प्रेम भी करती है और क्रांति का स्वप्न भी देखती है। यथार्थ के धरातल पर दोनों ही चकनाचूर हो जाते हैं। इस तरह से यह फ़िल्म एक बहुत ही साधारण-सी लड़की वेनेला (साई पल्लवी) के जीवन की त्रासद कथा बन जाती है। 

‘विराट पर्वम’ एक प्रेम-कहानी है, जो 1990 में तेलंगाना क्षेत्र में नक्सलवाद के बैकड्रॉप में बुनी गई है। अंदाज़ ठेठ तेलुगु सिनेमा वाला है। नायिका साई पल्लवी एक नक्सलवादी लीडर कामरेड रावण (राणा दग्गुबाती) की कविताएँ पढ़कर उससे प्रेम करने लगती हैं। प्रशंसक से प्रेमिका या प्रेमी बनने की कहानियाँ लंबे समय से साहित्य और सिनेमा में जगह पाती रही हैं।

एक साथ काव्यात्मक और यथार्थवादी फ़िल्मांकन और फ़िल्म का मार्मिक अंत कुछ देर के लिए ही एक अलग दुनिया में ले जाता है। वेनेला का भोलापन और स्वप्नदर्शिता याद आती है। हिंसा मनुष्य के इतिहास का अहम हिस्सा रही है। बूटों तले फूलों का रौंदा जाना हमें ऐतिहासिक नियति लगती है। साइकिल के करियर पर कविताओं की किताबें, सुबह की रोशनी में दीवार पर हँसिया-हथौड़ा की आकृति बनाना या ख़ुद को कृष्ण की मीरा समझना। वह एक जगह कहती है, “मैं लाल रंग में डूबी तितली हूँ!” फ़िल्म के एक एनिमेटेड विजुअल में लाल रंग की तितली हँसिए-हथौड़े के निशान पर मँडराती दिखती है। सत्ता के अंकुश और सशस्त्र क्रांतियों के बीच बहुत बारीक-सी रेखा है। क्रांति के लिए उठी बंदूक़ को भी इतना संवेदनशील होना पड़ेगा कि झुलसे जाने के भय बिना उस पर एक तितली भी आकर बैठ सके।

इस फ़िल्म की कमज़ोरी है कि नक्सलवाद विचार नहीं एक पैकेज की तरह सिनेमा के पर्दे आता है। बंदूक़ें, वर्दी, जंगल, लाल झंडे और कुछ किताबें। रावण (राणा दग्गुबाती) की माँ को सुनाई गई कविता, पुलिस वाले को न मारने पर उठी बहस और वेनेला और रावण के बीच गहराते प्रेम के दौरान कॉन्फ़्लिक्ट की अपार संभावनाएँ पैदा होती हैं, मगर निर्देशक लेखक उन सभी संभावनाओं को छोड़ता हुआ आगे बढ़ता जाता है। हालाँकि कहीं पढ़ा था कि इस फ़िल्म की पटकथा निर्देशक वेणु की वारांगल स्थित बचपन की स्मृतियों पर आधारित है तो शायद ड्रामेटिक होने के बावजूद कहानी हक़ीक़त के क़रीब होगी। कुल-मिलाकर ‘विराट पर्वम’ कुचल गए सपनों की कथा है और इस दृष्टि से एक सराहनीय प्रयास भी है। एक बार इस फ़िल्म को देखा जाना चाहिए।

‘विराट पर्वम’ में आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है, ‘श्याम सिंह रॉय’ में सामाजिक सुधार के लिए कम्युनिस्ट नायक का संघर्ष है और ‘डियर कॉमरेड’ में राजनीतिक पहचान मुख्यतः नायक के व्यक्तित्व का हिस्सा है। उदाहरण बस इतने ही नहीं हैं। मलयालम सिनेमा में इसकी शुरुआत 1970 से हो गई थी। फ़िल्म ‘निंगल्ने कम्युनिस्टक्की’ यानी ‘तुमने मुझे कम्युनिस्ट बना दिया’ इसी नाम के एक लोकप्रिय नाटक पर आधारित थी। तकषी शिवशंकर पिल्ले की रचना पर आधारित ‘अनुभवंगल पालीचकल’ भी 1971 में आई थी। केरल में कम्युनिस्ट राजनीति और संगठित श्रमिक आंदोलन का सामाजिक जीवन में गहरा प्रभाव रहा है। इसलिए मलयालम सिनेमा में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता, यूनियन, किसान-मज़दूर संघर्ष और आंदोलन के भीतर वैचारिक संकट जैसे विषय बहुत साफ़ तौर पर नज़र आते हैं। 

इसी तरह से सन् 1946 में दो ऐसी फिल्में आईं जिसमें ट्रेड यूनियन या सीधे राजनीति तो नहीं थी, मगर अपने दौर के लिहाज़ से दोनों ही फ़िल्में बहुत रेडिकल थीं। इसमें पहली थी ख़्वाजा अहमद अब्बास की ‘धरती के लाल’ और दूसरी थी चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’। आगे चलकर ‘नया दौर’, ‘नमक हराम’, ‘मज़दूर’ और ‘क़ुली’ जैसी फ़िल्मों में भी कामगारों और फ़ैक्टरी-मज़दूरों की समस्याएँ देखने को मिलती हैं। इसमें ‘क़ुली’ काफ़ी उल्लेखनीय है, जिसमें रेलवे स्टेशन पर काम करने वाला क़ुली इक़बाल (अमिताभ बच्चन) शोषण और अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ता है तथा साथी श्रमिकों को एकजुट करता है। एक पूरी तरह से मनोरंजन आधारित व्यावसायिक फ़िल्म होने के बावजूद इसमें मज़दूरों की गरिमा और सामूहिक प्रतिरोध को दिखाया है। इसका निर्माण उस समय हुआ, जब मुंबई में कपड़ा मिलों का बड़ा संघर्ष चल रहा था। 

यहाँ अब हम वापस मलयालम सिनेमा की तरफ़ लौटते हैं। 2017 एक ऐसा साल है, जब देश भर में दक्षिणपंथ के उभार के बाद कम्युनिज़्म की थीम पर ‘ओरु मैक्सिकन अपरथा’, ‘सखावु’, ‘कॉमरेड इन अमेरिका’ जैसी फ़िल्में आती हैं। ‘ओरु मैक्सिकन अपरथा’ कम्युनिस्ट छात्र राजनीति पर बनी सबसे स्पष्ट मुख्यधारा फ़िल्मों में से एक मानी जा सकती है। यहाँ वामपंथी छात्र संगठन और कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन के बीच प्रतिस्पर्धा दिखाई गई है। यहाँ कम्युनिस्ट छात्र संगठन की राजनीतिक पहचान, संगठनात्मक शक्ति और कैंपस में विचारधारात्मक संघर्ष दिखाया गया है। वहीं ‘सखावु’ का अर्थ भी ‘कॉमरेड’ है। निविन पॉली की दोहरी भूमिका में एक युवा छात्र कार्यकर्ता और एक प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट नेता के बीच का अंतर ही इस फ़िल्म का आधार है। नेता चाय बागान के शोषित मज़दूरों को एकजुट करता है, युवा कार्यकर्ता उसके जीवन और विचारों से राजनीतिक प्रतिबद्धता का अर्थ समझता है। यह फ़िल्म बताती है कि कम्युनिस्ट होना केवल पार्टी का सदस्य होना नहीं, बल्कि श्रमिकों के साथ खड़ा होना और निजी हित से आगे सामूहिक हित को रखना ज़्यादा अहम है। दुलकर सलमान की ‘कॉमरेड इन अमेरिका’ का नायक एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता है। राजनीतिक पहचान और व्यक्तिगत प्रेम-कथा इसके कथानक में साथ-साथ चलते हैं। इसे भी केरल के उस लोकप्रिय सिनेमाई माहौल में रखा जा सकता है, जिसमें ‘कॉमरेड’ की छवि व्यावसायिक फ़िल्मों में भी दिखाई देती है। इसका ज़ोर ट्रेड यूनियन या कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास पर नहीं, बल्कि एक राजनीतिक पहचान वाले नायक की निजी यात्रा पर है।

इन फ़िल्मों पर चर्चा करते हुए हम कह सकते हैं कि राजनीतिक फ़िल्म को गोविंद निहलानी की आरंभिक फ़िल्मों ‘आक्रोश’ और ‘अर्धसत्य’ की तरह वैचारिक रूप से हतप्रभ करना चाहिए न कि भावनात्मक रूप से। बंगाल में ऐसा हुआ, सत्तर के दशक में मृणाल सेन का महत्त्वपूर्ण काम सामने आता है। उन्होंने साल-दर-साल तीन फ़िल्मों का निर्माण किया जो वामपंथी चेतना से लैस थीं—‘कलकत्ता 71’ (1972), ‘पदातिक’ (1973) और ‘कोरस’ (1974)। मगर मृणाल सेन या हिंदी में बना चालीस के दशक या फिर सत्तर के दशक का सिनेमा फिर भी प्रयोगात्मक था। अहम बात यह है कि दक्षिण के सिनेमा ने एक लोकप्रिय विधा के रूप में राजनीतिक गतिविधियों को दर्ज करना नहीं छोड़ा है। इससे ठीक पहले आई फ़िल्म ‘जय भीम’ में लेफ़्ट की पॉलिटिक्स या उसकी पक्षधरता को बहुत साफ़ तरीक़े से दर्शाया गया था। यह इसलिए अहम है, क्योंकि बीते सात सालों में एक वैचारिक धड़े ने ‘वामपंथ’ जैसे शब्द को गाली में बदलने कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसे में एक लोकप्रिय सिनेमा का नायक अगर लेफ़्टिस्ट है तो यह साहसिक भी है और ज़रूरत भी। मूल्य वही हैं जिनके लिए भारतीय सिनेमा के पूरे इतिहास में नायक लड़ते नज़र आते हैं—असमानता और धर्मांधता का विरोध और शोषित और वंचित के साथ खड़े होने का साहस।

जब चंदन के तस्कर को नायक बनाया जा रहा हो तो लोकप्रिय धारा में सोशल कमिटमेंट को नायकत्व में परिभाषित करना ज़रूरी है और ये फ़िल्में काफ़ी हद तक यह काम करती है। एक ऐसा नायक जिसका सोशल कमिटमेंट है, ऐसे किरदार जो बीते पंद्रह सालों में सिनेमा में दिख रहे शहरी अभिजात्य व्यक्तिवाद से हटकर समाज में नायक बनने का हौसला रखते हों, जिनके लिए प्रेम दैहिक आकर्षण से परे एक साहचर्य है और उस साहचर्य के अपने सामाजिक सरोकार हैं। जब सिनेमा प्रत्यक्ष-परोक्ष में धार्मिक कट्टरता और एक समुदाय के प्रति सांकेतिक (या बहुत बार तो खुलकर) वैमनस्य दिखाया जाने लगे, तो धर्मांधता के विरुद्ध नास्तिक नायकों को खड़े दिखाना भी साहस है।

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