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शंखनाद : शेरू : हमारा पहला एंटी-हीरो

शेरू हमारे परिवार का, मेरे जानने में, पहला और आख़िरी पालतू कुत्ता था। बड़े भाई साहब उस समय 14-15 साल के रहे होंगे, जब वह उसके दूध-से सफ़ेद रंग और नई दुल्हन-सी अधखुली आँखों की मासूमियत पर फ़िदा हो गए। जब शेरू की माँ भोजन की तलाश में निकली, तो भाई साहब आजी के ‘हा-हा’ करने के बावजूद नवजात शेरू को उठा लाए। उठा लाना भी इतनी इकहरी क्रिया नहीं थी।

उस साल शेरू के साथ उसके चार और भाई-बहन पैदा हुए थे, जिसमें मोती और शेरू ही सर्वाइव कर सके थे। एक दबकर मर गया था और दो को शेरू की माँ की चौकसी के बावजूद सियार उठा ले गए थे। कूँ-कूँ करते ये पाँचों नवजात, रंग-बिरंगे बच्चे—गुलदस्ते की तरह लगते थे। उनकी आँखें खुलने से पहले ही बँटवारे के लिए कई-कई दौर की बैठकें और लड़ाइयाँ हुईं कि कौन किसको पालेगा।

जाने कौन-सा मनोविज्ञान काम करता था कि सारी लड़ाई पिल्लों को लेकर होती थी, पिल्लियों के ग्राहक नहीं होते थे। वे लगभग पूरी ज़िंदगी लावारिस काटती थीं। लिहाज़ा वे ज़्यादा स्ट्रीट-स्मार्ट, सजग, चपल, चतुर, स्वस्थ और दीर्घजीवी होती थीं। उन्हें मिनिमम भोजन के जुगाड़ में मैक्सिमम संघर्ष करना पड़ता था। ऊपर से गाँव में कुछ समुराई थे, जिनके होते अगर गाँव के कुत्ते लँगड़ाते और कराहते हुए नहीं चलते थे तो उन्हें अपनी जवानी अकारथ लगती थी। वे लगभग स्थायी रूप से चोटिल रहती थीं।

ऊपर से आस-पास के गाँवों के कुत्तों के साथ वही लड़ाइयाँ। वे अपने मेल काउंटरपार्ट्स के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ती थीं, फिर भी जीत में तारीफ़ के कुछ शब्दों के अलावा उनके हिस्से कुछ ख़ास नहीं आता था। वे इस इंतज़ार में भी नहीं होती थीं। युद्ध ख़त्म होते ही वे एक-दो के झुंड में निकल जाती थीं। युद्ध के बाद की पुचकार और सराहना, जब तक कि अद्वितीय पराक्रम न दर्शाया हो, उन्हें नसीब नहीं होती थी।

शेरू की बात पर आते हैं।

उस साल शेरू की माँ ने बिरजू बाबा के हथिया नक्षत्र में गिरे भुसौले में मिट्टी और लकड़ी के कोटर जैसी ख़ुफ़िया जगह में बच्चों को जन्म दिया था। अपनी तरफ़ से इतनी सावधानी बरतने के बावजूद पूरे गाँव को उसके सौरी घर यानी प्रसूति वार्ड का पता चल ही गया था। सर्दी में नाक सुड़कते, काँपते बच्चों के झुंड वहीं जमे रहते। शेरू की माँ सीधी थी, लिहाज़ा बच्चों को उठा लेने पर वह कातर और पनीली नज़रों से देखती रहती थी। कोई बड़ा बुज़ुर्ग जब बच्चों की फ़ौज को डपटता, तभी वे वहाँ से टलते थे।

कुल-मिलाकर शेरू के मालिकाना हक़ के लिए कई दौर की लड़ाई और शिखर वार्ताएँ हुईं, लेकिन भाई साहब ने शेरू को भविष्य में खिलाए जाने वाले मेनू, जो कभी खिलाया नहीं जाना था, को प्रस्तुत करके उधर विपक्षियों को चित किया और इधर शेरू को झटक लिया।

बड़े गाजे-बाजे के साथ—मतलब सच में नहीं—शेरू को विश्व विजेता ट्रॉफ़ी की तरह घर लाया गया। सूती बोरे से बरामदे के कोने में गड्ढा खोदकर उसका डनलप का बिस्तर लगाया गया। सुरक्षा की दृष्टि से ईंट की बाउंड्री बनाई गई। यह जानते हुए भी कि कुत्तों की फूलों में कोई दिलचस्पी नहीं होती, फिर भी चोरी के फूलों से उसका घर सजाया गया।

राउंड द क्लॉक उसे ज़ेड कैटेगरी की सुरक्षा प्रदान की गई, जिसके तहत भाई-बहनों में कोई-न-कोई उसकी सुरक्षा में मुस्तैद रहता। रात में भाई साहब ख़ुद सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सँभालते थे। वह सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा भी करते थे और ग़ाफ़िल पाए जाने पर संबंधित कमांडोज़ की पिटाई भी कर देते थे। हम छोटे भाई-बहनों के दुर्दिन और शेरू के ठाट का अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि हम शेरू के ऐशो-आराम और सेवादारी से ईर्ष्या करने लगे थे।

धीरे-धीरे शेरू बड़ा हो रहा था। लगातार खाते-पीते रहने के कारण वह अपने हमउम्र कुत्तों से बहुत ज़्यादा स्वस्थ, मोटा और प्रभावी दिखता था। शेरू का आचार-व्यवहार इतना गरिमामय था कि उसके आगे लगता था कि हम ख़ुद कुत्ते हो गए हों। बचपन से ही जोखिम न उठाने के कारण भारी-भरकम शरीर और भव्य लुक के चलते उसकी बड़ी इज़्ज़त थी। पर वह कुत्ता होने के बावजूद यह समझता था कि उसे दूसरों की उम्मीद पर खरा उतरने के लिए अपना चूतड़ नहीं नुचवाना था।

अपने भारी-भरकम व्यक्तित्व के बनिस्बत वह भीषण डरपोक था। उसकी कायरतापूर्ण हरकतों के चलते और उसके सम्मान की रक्षा के लिए उसकी लड़ाई हमें लड़नी पड़ती थी। जिसे भाई साहब एसेट्स समझकर लाए थे, वह लायबिलिटी साबित हो रहा था। शेरू के चलते हमारे परिवार की बहुत रुसवाई और जगहँसाई हुई।

भाई साहब शेरू से इतने निराश हुए कि उन्होंने शेरू में रुचि लेना छोड़ दिया था। वह शेरू के व्यवहार से निराश ही नहीं, बल्कि भीतर से टूट चुके थे। इसे ज़ाहिर करने के लिए उस पर एकाध बार लाठी भी छोड़ दी थी। भाई साहब शेरू के पतन से दुखी थे और शेरू भी भाई साहब के पतन पर चकित था।

इधर हाल-फ़िलहाल में कुत्तों के व्यवहार में एक अजीब परिवर्तन दिखता है। वे अब झुंड बनाकर डिप्लोमेटिक यात्राओं पर आस-पास के गाँवों को जाने लगे हैं, जहाँ सामान्य गुर्राहट के अलावा उन्हें ख़ास प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ता। उनके बीच कॉमन मिनिमम समझदारी आ गई है। वे अब शायद इस बात पर सहमत हो गए हैं कि गाँव, घर और दौलत सब मनुष्यों के हैं। हम क्यों कुत्तों की तरह आपस में लड़ें?

यह भी लगता है कि कुत्तों ने जिस काम को छोड़ दिया है, मनुष्य ने अपना लिया है, बल्कि उस पर गर्व करता है। पर उन दिनों यह उदार नीति न थी। कुत्तों की सीमाएँ फ़ेरोमोन से सीमांकित होती थीं, जिसे लाँघने वाले को उचित प्रतिकार का सामना करना पड़ता था। ये सीमाएँ कार्तिक के महीने में टूटती थीं, जिसके लिए उन्हें कई बार मर्मांतक घाव मिलता था या जान की क़ीमत देनी होती थी।

उन दिनों कार्तिक के रूमानी अपवाद को छोड़ दिया जाए, जब कुत्ते मानवीय हस्तक्षेप से परे अपनी जैविक पहल पर लड़ते थे, बाक़ी महीनों के लिए कुत्तों के सप्ताह में दो युद्ध निर्धारित होते थे। सप्ताह के किसी एक नियत दिन मिश्र गंजा के कुत्तों के साथ डीह के पीपल के नीचे और किसी और दिन नगरा दूबे के कुत्तों के साथ झगरू के बेढ़ा के झुरमुट के बीच लड़ाइयाँ होती थीं।

ये लड़ाइयाँ सालों-साल चलती रही थीं, जिसमें कुत्ते और मानव पार्टिसिपेंट बदलते रहते थे। लड़ाई के क्रम में पहले दोनों तरफ़ से गालियों की हल्की से भारी बारिश होती थी। फिर अपने-अपने ग्लैडीएटर के साथ हम युद्ध के मैदान में उतरते थे। अंत तक कुछ ही ग्लैडीएटर मैदान में टिकते थे, लिहाज़ा अधूरी लड़ाई हमें लड़नी पड़ती थी।

इसी लड़ाई के दौरान कोई घायल वीर चेहरे, सिर या कनपटी पर बहते ख़ून को पोंछते हुए कहता—“असली मर्द हो तो अगले मंगर को मिलो, फिर हम बताते हैं।” इस प्रकार लड़ाई का अगला मोर्चा तय हो जाता था।

ऐसी पहली ही लड़ाई में शेरू, जिसके मैदान में आने से पहले भाई साहब ने काफ़ी हवा बाँध रखी थी, मरने-मारने के बजाय उल्टी दिशा में भाग खड़ा हुआ। भाई साहब इस प्रकरण से इतने बदनाम हो गए कि उन्होंने इस तरह के साप्ताहिक आयोजनों में असमय जाना ही छोड़ दिया। शेरू की रातिब भी लगभग कम हो गई थी। अब अलाव के पास या धूप में बैठकर खा रहे बच्चों और बूढ़ों को निरापद समझकर उनके हाथ से रोटियाँ छीनने लगा था। इस बात के अफ़सोस का कोई चिह्न उसके चेहरे पर न था।

मैंने अपनी समूची ज़िंदगी में इतना डरपोक कुत्ता, क्या कोई जीव, नहीं देखा। जहाँ बाहर आहट होने पर दूसरे कुत्ते भौंकते हुए बाहर निकलते थे, वह कूँ-कूँ के माध्यम से ‘जान बची तो लाखों पाए’ का जाप करता हुआ घर की तरफ़, बल्कि आँगन में, भागता था। उसने कुत्ते के अपने समूचे जीवन में बहादुरी का कोई कारनामा नहीं किया था, जबकि उसकी आधी हैसियत के कुत्ते बहादुरी के नित नए-नए कारनामे लिख रहे थे।

वह इस क़दर डरपोक और कायर था कि कार्तिक के ब्रीडिंग सीज़न में भी ब्रह्मचर्य का कड़ाई से पालन करता था। उन दिनों अगर पास से कोई मादा गुज़रती तो वह हसरत से अपनी जीभ से अपने होंठ चाटता था। ज़ाहिर-सी बात है, वह आशिक़ी की आत्महंता दुनिया में भी अपनी कायरता के चलते संत होने के लिए अभिशप्त था।

उसकी जो चीज़ मुझे ख़ासतौर से दिलतोड़ू लगती थी, वह यह थी कि घर से बाहर निकलते ही वह अपनी पूँछ गिराकर अपनी ग़ुलामी का जयघोष करता चलता था। वह इतना आलसी था कि कुछेक मौक़ों को छोड़ दिया जाए तो वह भौंकता भी नहीं था। उसके भौंकवाने के लिए हमें उसे अच्छा-ख़ासा प्रोत्साहन देना पड़ता था और इस क्रम में उससे ज़्यादा हमें भौंकना पड़ता था।

सावधान शेरू सतत अपनी सजगता के चलते काफ़ी लंबी उम्र पाया, इतनी कि उसके बाद तक की तीन पीढ़ियाँ मर-खप गई थीं। वह काफ़ी बूढ़ा होकर मरा। उसने हमारी उपेक्षा का कभी बुरा नहीं माना। वह क़तई स्वामिभक्ति वग़ैरह से ग्रस्त नहीं रहा। उसकी कायरता ने परिवार पर ऐसा असर किया कि फिर तब से हमारे परिवार में कभी कुत्ता नहीं पाला गया।

शेरू हमारी कच्ची उम्र का पहला एंटी-हीरो था, जिससे हमें बहुत निराशा हुई थी। निराश शेरू भी रहा ही होगा। हम उसे हीरोइज़्म के अपने चौखटे में फ़िट करना चाह रहे थे।

वैसे राज़ की बात यह है कि शेरू की सोहबत का असर हो या कुछ और, डरपोक मैं भी शेरू से कम नहीं हूँ। इसलिए आशिक़ी की डिजिटल पुलिया पर अपने ही होंठ चाटता बैठा मिलता हूँ।

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