शनिवारेर चिट्ठी : ये जो देस है तेरा
शायक आलोक
15 अगस्त 2026
जन
क्या तुम विस्मय करोगी अगर कहूँ कि 15 अगस्त के दिन-विशेष के बारे में सोचूँ तो उल्लास से मेरे लौटने की अकेली मुकम्मल जगह मेरे बचपन में मिलती है! माँ सामने आती हैं। उन्होंने सुफ़ेद-सी सूती साड़ी पहनी है और आँचल कुछ रंगीन है। मैं फ़र्श पर पालथी मारे बैठा हूँ और साड़ी की चुन्नटें बनाने में उनकी मदद कर रहा हूँ। साड़ी की किनारी लाल है। माँ कितनी सुंदर लग रही हैं। मैं उनकी सहायिका हूँ और ज़रा-सी उनकी सहेली। मेरे जन्म के आरंभिक कुछ वर्ष उन्होंने मुझे फ्रॉक भी तो पहनाई। सहायिका और सहेली की यह भूमिका मैंने वर्षों निभाई। लेकिन मेरे कपड़ों में कुछ ख़ास नहीं है। वही बोरिंग यूनिफ़ॉर्म! नीली पैंट—सुफ़ेद क़मीज़। उल्लास झंडारोहण का है। वे तिरंगे में पंखुड़ियाँ रख देते हैं, फिर उसे ऊपर चढ़ाते हैं। रस्सी खींचते ही पंखुड़ियाँ नीचे गिरेंगी और ठीक इसी क्षण हम राष्ट्रगान शुरू करेंगे। जन-गण-मन सुनते-गाते मेरी आँखें भीग जाती हैं। कैच देम यंग! लोकतंत्र ने मेरी अच्छी ट्रेनिंग शुरू की थी। मेरी आँखें जब तक भीगती रहेगी, मेरे सवाल दबे रहेंगे। रघुवीर सहाय तो बाद में आएँगे जो हरचरना के हवाले अधिनायकों के बारे में मेरे अंदर संदेह के बीज बोएँगे। मैं कथित देशभक्त होऊँगा तो भले कवि पर ही हमला बोल दूँगा। कहूँगा कि कवि के पास फ़ैक्ट्स की कमी है। जन-गण-मन राष्ट्रगान है, कवि ने कविता में इसे राष्ट्रगीत कह दिया है। उल्लास है कि स्कूल में जलेबियाँ मिली हैं और माँ स्कूल से लौटेंगी तो बूँदिया और शेव लिए आएँगी। टीवी पर चल रही है देशभक्ति वाली फ़िल्म—‘क्रांति’—‘ज़िंदगी की न टूटे लड़ी...’ हेमा मालिनी के हाथ पीछे बँधे हैं और वह पेट के बल आगे खिसक रही हैं। मेरे पिता हेमा मालिनी को पसंद करते थे। उसी दिन किसी पड़ोसिन से हमारा झगड़ा हुआ तो पिता ने तंज़ किया, “आप बड़ी हेमामालिन हैं कि आपकी अदाओं पर मुहल्ला क़ुर्बान हुआ फिरे!” पड़ोसिन तब दाँत माँज रही थीं। उन्होंने हथेली का मंजन पिता की ओर उछाल दिया।
मन
देश से प्रेम करना सबसे पाठ्य-पुस्तकें सिखाती हैं। देश एक इतिहास है और वह भूगोल है। उसकी एक संस्कृति है। वह दुनिया की सबसे महान् जगह है और हमारा सौभाग्य है कि हम इस देश में पैदा हुए हैं। हमने विश्व को रोशनी दी। ज़ीरो और दशमलव हमारा आविष्कार है। हमारे ही ऊपर हिमालय का ताज है और एक महासागर हमारे ही पैर पखारता है। हमसे पहले आ चुकी और गर्व से भरी पीढ़ियाँ हमारे देशप्रेम को और बढ़ाती हैं। खगोल-ज्योतिष सब हमने दिए। विमान हमारा आविष्कार है, प्लास्टिक सर्जरी हमने दी। इसके बाद देश से प्रेम की दूसरे चरण की ट्रेनिंग फ़िल्में देती हैं। वे देश को देखना सिखाती हैं। फ़िल्मों का देश चलता था, रोता था, मरता था, प्रतीक्षा करता था, गाने गाता था। वह किसी सैनिक की देह में सीमा पर खड़ा हो सकता था और किसी माँ के चेहरे पर घर लौट आने की एक आशा की तरह ठहर सकता था। परदे पर वे दृश्य तैरते तो मेरे भीतर कुछ बदल जाता। उस परिवर्तन में कोई विचार नहीं था, बस एक भावना थी। फ़िल्में हमें उन भावनाओं की स्मृतियों से भर देती हैं जिन्हें हमने स्वयं नहीं जिया, स्वयं नहीं परखा। शहीदों को देखकर देश से प्रेम करना आसान था। त्याग को देखकर। प्रतिरोध और प्रतिशोध को देखकर। शत्रु से घृणा करना आसान था...
और फिर क्रिकेट! क्रिकेट ने जैसे देश को मेरे भीतर सबसे अधिक निजी बना दिया। एक मैदान पर कुछ लोग खेल रहे होते और दूर किसी कमरे में बैठा मैं उनके साथ अपनी एक अदृश्य उपस्थिति महसूस करता। वे बल्लेबाज़ी करते तो मेरा धैर्य उनके साथ चलता। वे हारते तो एक ऐसी निराशा होती जिसका मेरे जीवन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। फिर भी वह मेरी होती। यह ‘हम’ कहाँ से आता था? मनुष्य को अपने अकेलेपन से बचने के लिए कभी-कभी एक बहुत बड़े समूह की कल्पना करनी पड़ती है, जिसमें उसका होना प्रमाणित हो सके। क्रिकेट ने मुझे वह समूह दिया। उस समय देश कोई इतिहास नहीं था, कोई संविधान नहीं था, कोई भूगोल नहीं था। देश ज़रिया था कि किस जीत या हार से हमें अपने मन का हाल कैसा रखना है।
गण
तुम जानती हो और तुम इस बात पर हँसी हो कि 15 अगस्त और 26 जनवरी के दो दिनों की मेरी अपनी एक छोटी-सी रस्म रही थी। मैंने इसे तय नहीं किया था। यह धीरे-धीरे बन गई थी, किसी आदत की तरह। पूर्वसंध्या पर मैं देशभक्ति के गीत सुनता। वे रातें कुछ देर के लिए दूसरी रातों से अलग हो जातीं। ‘ये जो देस है तेरा...’ और ‘भारत हमको जान से प्यारा है...’ वही कमरा, वही खिड़की, वही अकेलापन—लेकिन मेरी निजी ज़िंदगी के बाहर भी कोई बहुत बड़ी चीज़, जिससे मेरा एक रिश्ता था। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के संभाषण। साल-दर-साल, जैसे कोई बहुत पुरानी घड़ी साल में दो बार ठीक उसी समय बजती हो और हमें याद दिलाती हो कि हम कहीं के हैं और हमारी कोई जगह है, हमारी एक अस्मिता है... और फिर जैसे कोई भ्रम टूटता है। जैसे मैं देश के जितने क़रीब होता गया, वह उतना बेगाना होता गया।
अधिनायक
मैं कहता हूँ कि मुझे याद ही नहीं कि सरकार द्वारा मुझे आख़िरी बार नागरिक कब समझा गया था और कब मेरी सामान्य आवश्यकताओं पर उसने आत्मीयता या सहानुभूति से विचार किया था। मैंने ख़ुद को हमेशा उपभोक्ता ही पाया। शिक्षा, न्याय, अवसर—सब उपभोक्ता वस्तुएँ थीं जो मुझे उतनी ही मिलीं जितनी मेरे पिता की क्रय क्षमता थी। बाद में मैंने अपनी क्रय क्षमता से सामान ख़रीदे। सामान—जूते, कपड़े, मोबाइल फ़ोन। सरकार ने ही मुझसे कहा कि तुम्हारी हैसियत मिलान और पेरिस की नहीं है रे उपभोक्ता, तू शंघाई से काम चला। सरकार ही फिर मेरे उपभोक्ता में एक राष्ट्रवादी की माँग करने लगी। मैंने कहा कि तलाश लो, देख लो कहीं किसी एक ऊतक की कुछ कोशिकाओं में पड़ा हो वह राष्ट्रवादी तो निकाल लो!
जय हे
सत्ता जहाँ स्वयं यह तय करने लगे कि देश से प्रेम करने का सही ढंग क्या है, वहाँ मुझे सबसे पहले अपने ही प्रेम पर संदेह के लिए बाध्य किया जा रहा है। देश को कोई सरकार अपने नाम पर तो दर्ज नहीं कर सकती। नागरिकता के भीतर बसे हुए लगाव, स्मृतियाँ और दुख किसी आदेश से प्रमाणित नहीं किए जा सकते। धीरे-धीरे मेरे सामने कैसा अजीब समय खुलना शुरू हुआ कि वहाँ सत्ता केवल शासन नहीं करती, वह अर्थों की स्वामिनी भी बनना चाहती है। वह तय करने लगती है कि राष्ट्र क्या है, कौन राष्ट्रवादी है, किन आचरणों को राष्ट्रवादी व्यवहार समझा जाएगा... और इसे तय करने में यह धूर्तता कि पहले यह तय कर लिया जाए कि राष्ट्रविरोधी कौन है! पाकिस्तान की जीत पर पटाखे फोड़ने वाले ‘पेंचर’ लगाने वाले बच्चे से लेकर आढ़त से आवारा साँड़ को खदेड़ने वाले सब्जी वाले तक कोई भी राष्ट्रविरोधी सिद्ध किया जा सकता है। तानाशाही दरवाज़ा तोड़कर ही भीतर नहीं आती, वह शब्दों के मायने बदलते हुए भी आती है। पहले असहमति को संदेह कहा जाता है, फिर संदेह को अविश्वास, अविश्वास को राष्ट्रविरोध और अंततः राष्ट्रविरोध को अपराध के बराबर रख दिया जाता है। इसके बाद नागरिक को अपने विचार से अधिक अपने प्रमाणपत्र की चिंता होने लगती है। मुझे सत्ता के इस अधिकार और दावे पर आपत्ति है। मुझे क्षोभ है कि धारा विशेष से प्रभावित हमारा पूरा तंत्र—सेना, नौकरशाही, पुलिस, न्यायपालिका—सत्ता के ऐसे नैरेटिव की ही पुष्टि करने लगता है। वे निष्ठाओं की जाँच इस तरह करना चाहते हैं कि जैसे देश कोई परीक्षा-कक्ष हो, हम भिन्न आवाज़ें परीक्षार्थी और सरकार परीक्षक।
भारत भाग्य विधाता
प्रिय मंज, तो मैं कहना चाहता हूँ कि आज़ादी शब्द को मैंने बरसों एक तारीख़ में क़ैद पाया। मैं निरा मूर्ख था मंज! पंद्रह अगस्त—झंडा, रस्सी, पंखुड़ियाँ, जलेबी... मेरी अस्ल आज़ादी किन प्रतीकों में स्थगित रही थी! हमें दिवस की उत्सवधर्मिता में नहीं, अर्थ में खोना चाहिए। वह अर्थ धीरे-धीरे खुलता है—बरसों की ठोकरों में, शक में, उन सवालों में जिन्हें पूछते हुए डर लगता रहा हो। किसी असंतुष्ट, किसी असहमत, किसी प्रतिरोधी, किसी कवि ने जो बीज बोए थे, उन्हें अब जाकर पहचानता हूँ। जिस दिन मैंने पहली बार सवाल करने की हिम्मत जुटाई, उस दिन लगा कि आज़ादी कोई घटना नहीं, एक अभ्यास है, एक लगातार जारी रहने वाली कोशिश। वह हर बार तब पैदा होती है, जब कोई शख़्स अपने डर के बावजूद बोलता है। सत्ता चाहेगी कि आज़ादी भी उसकी अपनी परिभाषा में क़ैद रहे। उसके अपने गढ़े मानकों पर कसी हुई। लेकिन जिस आज़ादी में असहमति और असंतोष की जगह न हो, वह ग़ुलामी ही है। कोई सरकार, कोई विचारधारा, कोई तंत्र तय नहीं कर सकता कि देश के साथ मेरा कैसा संबंध हो। संविधान द्वारा निर्धारित नैतिक दायरे में हम स्वतंत्र नागरिक हैं। बतौर नागरिक हम संविधान के शब्दों के दायरे में भी संशोधन की माँग करने का अधिकार रखते हैं। हम अपनी नागरिक प्रस्तावना रच सकते हैं। हम... हम भारत के लोग...
मैं अभी पूर्व-दृश्य के उसी क्षण में लौट गया हूँ—माँ की साड़ी, फ़र्श पर बैठा मैं और उसकी चुन्नटें बनाती हुई छोटी-छोटी उँगलियाँ। स्कूल-झंडा-राष्ट्रगान-जलेबी... आँखों में नमी अब एक इतर बोध से आती है—इस सचेतनता से कि आज़ादी माँ के आँचल की तरह कोई विरासत नहीं, जिसे बस ओढ़ लिया जाए। वह उस चुन्नट की तरह है जिसे हर बार अपने हाथों से बनाना पड़ता है, हर पंद्रह अगस्त को नए सिरे से। आज़ादी हमारी पीढ़ियों को मिल गई कोई वस्तु नहीं है, वह जारी घटना है, जिसे हर साल, हर पीढ़ी को फिर से माँगना पड़ता है, फिर से हासिल करना पड़ता है—रस्सी खींचकर नहीं, सवाल पूछकर; बस झंडे के नीचे खड़े होकर नहीं, अपनी आशंकाओं और आकांक्षाओं और असहमतियों और असंतोष पर मुखर होकर।
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