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शनिवारेर चिट्ठी : ए बछरेर एटाइ शेष चिठि, मंजरी!

अह, शनिवार-शनिवार तुम्हें चिट्ठी भेजने का यह हाल का सिलसिला अब यहीं शेष हुआ चाहता है, मंज! यह चीज़ों को उसकी सुंदरता में रखने और सुंदरता में ही विश्राम सौंप देने की युक्ति न हुई तो और क्या, कहो! अधिक घिसने से बातें भी घिस जाती हैं।

एक सुंदर समाप्ति के लिए संयोगों की कैसी संगति बनी है। मैं तुमसे दूर रहता हूँ तो तुम्हें चिट्ठी से हफ़्ते की ख़बर लिखता हूँ। लेकिन इस बार तो हम पूरे हफ़्ते साथ रहने वाले हैं। इसे समाप्ति के नए आरंभ का संकेत ही हुआ समझो! दूसरा संयोग कि हम आश्विन में प्रवेश कर रहे इसी एक दिन और वैशाख से शुरू हुआ मेरा यह चिठी-बेपार भाद्रपद की समाप्ति के साथ छह मास पूरे कर रहा। कैसा संयोग कि इस शेष चिट्ठी के साथ स्तंभ के 25 अंक भी पूरे हो रहे। 25 तो पूरी रजत उपलब्धि ही मानी जाएगी।

इस साल की इस आख़िरी चिट्ठी में इतर नया कुछ कहने के बदले कहूँ कि अच्छा रहा गद्य और संवाद और प्रेम और कार्य का यह साथ। इतनी बातें सोचीं और कहीं। हम साथ हैं अभी तो क्या हम साथ लौटें और चुनें उन चिट्ठियों में सिले कुछ पके-पुराने वाक्य और ले चलें उसे अपने साथ पहाड़ की अपनी इस नई यात्रा पर!

कल से रवैया फिर फ़र्क़ होगा। यों भी लौटना बार-बार लौटता भी तो रहता है मेरी अभिव्यक्ति में... और मेरे पास कवि-मन। मुझे बार-बार पढ़ा जाए। गोष्ठियों में ही नहीं, संगिनी द्वारा घर के निज एकांत से लेकर पहाड़ के प्रांतर में भी। क्या मैंने यह दावा नहीं कर रखा तुम्हारे ही समक्ष कि मैं आशाओं से नहीं पुनरावृत्तियों से बना मनुष्य हूँ, कहो तो...


— शुक्रगुज़ार हूँ कि तुमने मेरे जीने की मेरी ज़रूरी चीज़ें साथ कर दी हैं। सिरदर्द की कुछ गोलियाँ, इड़ा-पिंगला संतुलन हेतु कर्पूर-सुगंधि, थकते कंधों के लिए ठंडा तेल कि पैरों से अधिक थकते हैं कंधे मेरे। मेरे शब्द मीठे बने रहें तो अधरों के लिए नमी और जिह्वा के लिए शहद।

— मेरे पास एक पीठ की याद उसके चेहरे से है। बीस साल पहले की उस बस में मैं हूँ और वह है। मेरी आँखों में आँसू हैं और उसकी आँखों में आँसू हैं। मैंने देखा है और उसने देखा है। मैंने फिर देखा है और उसने फिर देखा है। मैं देखता रहा हूँ और वह देखती रही है... वह अब जा रही है और अब मैं देख रहा हूँ। अब मैं देख रहा हूँ और उसकी पीठ जा रही है।

— गली पानी माफ़िक़ तुरंत सड़क पर उतर आती है। इस गली को संकोचवती नहीं कहा जा सकता। मोड़ पर निगहबानी बाबासाहेब की है और सड़क का नाम सद्भावना है। यह एक जवान सड़क है। इसने कच्ची उम्र में ही कई धोखे खाए हैं। इसका दुःख इसके चेहरे पर दीखता है।

— वह पीली-सफ़ेद जगह है, जहाँ मैं बैठने लगा हूँ और कविताएँ पढ़ता हूँ। मैंने इतने दिनों से ख़ुद को कविताएँ पढ़ते देखा है कि अब मुझे ‘अ पोएम रीडर’ पुकारने लगा हूँ। कविताएँ पढ़ता हुआ नहीं, कविताओं में एक बहाना ढूँढ़ता हुआ। एक ‘एग्ज़िस्टेंशियल एक्सक्यूज़’। एक त्रासदी जो शब्दों के बीच फँसी रह जाती है।

— असंगतियों में भी एक प्रकार की संगति खोज लेने की आदत। मूलतः कवि ही होने की उसकी यक़ीन-बयानी। ऊब में या निराशा में नहीं, अनुभव में वैयक्तिक कृतज्ञता खो देने की संस्वीकृति। यारबाशी और दोषसिद्ध निर्दोषता। समय, स्मृति और अस्मिता के उसके अँधेरे और रोशनी में शफ़्फ़ाफ़ चमकने-चमकाने की उसकी ज़िद।

— दूसरे आदमी ने एक भद्दी-सी गाली बकी थी। पहले आदमी ने पहली औरत की कार के बोनेट को ग़ुस्से से थपथपाया था। मैं इस गाली को जानता था। इस गाली से पहली बार इसी शहर में मिला था। यह इस शहर की सबसे अच्छी गाली थी और हर घर-नुक्कड़-चौराहे-सड़क पर औरतों के आगे-आगे या उनके पीछे, आवारा फिरती हुई, पाई जाती थी। यह इस शहर की भाषा के रोज़मर्रा का नमक थी।

— तीसरे कमरे को सदफ़ का कमरा क्यों न कहूँ! उसे सदफ़ की यौन-क्रियाओं का कमरा कहूँ। उसे सदफ़ का ही कमरा क्यों कहूँ, शिशिर उपाध्याय के छल-प्रयोगों का कमरा क्यों न कहूँ। सदफ़ को जब भी देखा, परदे में देखा। उसके क़िस्से सुने, खुली-ज़ुबाँ सुने। उसके क़िस्से बनाए हमने। कामनिवृत्त मित्र दंपत्ति को की ख़बर कि उनके शीश ऊपर का संग-ए-मरमर फ़र्श मरमरी सदफ़ के श्वेत उच्छ्वासों से दैनिक रूप से बुहारा जाता है।

— ऊपर के उस कमरे में रहते मैंने चुराए बरखा के वे आधुनिक कपड़े और घूमा क़स्बे में महाशहर से लौटे रूप-रंगत में बदले धुरबा की तरह। वहीं से छुपकर देखा निर्झरा को सप्राण हर बारिश में उसे उसके पानी पारदर्शी हुए वस्त्रों में नग्नता के दूर पार तक। ज़ीने पर वहीं लगाए सावेरी के दरवाज़े पर कान और सुना उसे गुनगुनाते हुए शोक का अभिनव सिनेमाई गीत।

— वे कमरे एक दूसरे के पड़ोसी थे। पहला कमरा प्रेम का कमरा था, दूसरा अनागत आत्मीयता का। वे दो दूर के शहर थे। एक शहर अनुराग का, दूसरा अनंत ग़लतियों का। एक हत्या इस घर में हुई थी, दूसरी हत्या उस घर में। इस शहर में मेरी हत्या हुई थी, उस शहर में मैंने हत्या की थी।

— छवि-क्षण—मैंने यह शब्द बनाया और इसने मुझे बनाया। जैसे ही उँगली शटर को छूती है, समय अपनी चाल भूल जाता है और एक खाई खुल पड़ती है। न यह पूरा समकाल है, न पूरी स्मृति। मैं वहाँ खड़ा भर नहीं हूँ, घटित हो रहा हूँ।

— मैं क्षण को पकड़ना नहीं चाहता, उसके भीतर रुकना चाहता हूँ। वह वाक्य बनना चाहता हूँ जो अपने अर्थ से पहले कुछ देर रुकता है। फ़्रेम मेरे लिए सीमा नहीं, एक व्यवस्थित चुप्पी हो। रोशनी बस चीज़ों को उजागर न करे, बाहर के अँधेरे को साथ लेकर आए।

— वह चली गई, पर ऐसे नहीं गई... जैसा जाने के लिए फिर लौटी। उसने लौटकर कहा कि वह जा रही है। वह रोग से मर रही थी, मंज! मैंने उसके मरने से पूर्व उसका मृत-मुख देखा। उसकी हँसी में भी मृत्यु का आगत था। वह दो दृश्यों के बीच से रोशनी की तरह ग़ायब हो रही थी। मैं मानना चाहता था कि यह उसका एक प्रपंच होगा और वह लौट आएगी एक किसी बेला में। मैंने उसका शव-मुख तो देखा था नहीं, फिल भला क्यों नहीं करता उसके फिर लौट आने की कल्पना! मैंने सुना भर था और सुना सब सच तो नहीं होता।

— परिचय से आदिम कोई स्थिति जो स्मृति में नहीं, अनुभूति में बची रहती है। फिर उसकी ऑटो जाती रही और किंकर्तव्यविमूढ़ मेरी साइकिल खड़ी रही। होश के द्वार खुले तो भागी उसी दिशा में। निर्णय लिया था मेरी आँखों ने। सड़क पर भीड़ थी, आवाज़ें और धूल।

— वह एक साधारण दुपहर थी। अब तक हमें अवकाश नहीं मिला था कि हम कभी साथ बैठते और हमारे साथ का कोई रंग चुनते। हमारे साथ के रंग में मुलाक़ात के पहले दिन के धूसर रंग थे, बाद के दिनों की देह की उज्जर-ललाई। अलग-अलग दिनों के स्त्री-पुरुष कपड़ों के श्याम, बैंगनी, लाल और फ़िरोज़ी। सायास उसने नीली क़मीज़ चुनी।

— सुबह हुई तो वह वहाँ नहीं था। मेरे जूते भी वहाँ नहीं थे। वहाँ उसके जूते थे। मुझे धक्का लगा कि उसने मेरे जूते ले लिए। मैंने तो सोचा था कि वह बस उन जूतों को पहनकर देखना चाहता है। चश्मे, हेयर-बैंड, घड़ी, बैगी पाजामे—जैसे मैं तुम्हारी कितनी ही चीज़ों को बस पहनकर देखता हूँ, उन्हें ले नहीं लेता।

— एक सुबह बस्ते से पैसे ग़ायब हो गए। ज़्यादा नहीं थे, लेकिन इतने थे कि इस शहर में जीने-मरने का साहस बना रहता। बस्ते को कई बार उलट-पलटकर देखा। कपड़ों की तहें खोलीं। हर जेब टटोली। कहीं तो होंगे। कहीं दब गए होंगे। तीसरे दिन तक समझ गया था कि वे नहीं लौटने के लिए कहीं चले गए हैं। कितनी ही चीज़ें कभी नहीं लौटने के लिए कितनी ही जगहों पर चली जाती हैं।

— वह किसी सीधी बहती हुई नदी की तरह नहीं। वह लौटता हुआ और मुड़ता हुआ। समय अपनी ही दिशा पर संदेह करता हुआ। समय बंद वृत्त है और ‘इन्वर्ज़न’ समय की स्मृति के विखंडन के रूप में। भविष्य और अतीत एक-दूसरे में उलझ जाएँ तो मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा कहाँ बचती है। एक दूसरी जगह समय भारी है। गुरुत्वाकर्षण से दमित। क्रूर और उदास।

— मनुष्य अपने घर के बारे में सबसे कम तब सोचता है, जब वह अपने घर का निवासी होता है। तब घर की उपस्थिति इतनी स्वाभाविक होती है कि वह लगभग अदृश्य हो जाता है।

— किराये का घर हमें आश्रय देता है, लेकिन इतिहास नहीं देता। अपने घर की इच्छा दरअस्ल इतिहास की इच्छा है।

— चाय की पतीली चूल्हे पर चढ़ी है। मसालों के डिब्बे अभी अख़बार में लिपटे हुए हैं। उनमें पैर लगा है और हल्दी की पीली गंध हवा में फैल गई है। यह घर अब अपने घर-सा गमक उठा है।

— तीन घंटे की एक बस-यात्रा किसी मनुष्य को क्या दे सकती है? वह कवि है तो अधैर्य। वह प्रेम में है तो प्रत्याशा। वह पुरानी होती स्त्री है तो पीठ की पीड़ा और वह ऊब रहा आदमी है तो... तो बहुत सारे शहर। मैं कह सकूँगा तो कहूँगा अपने मनुष्य की कथा।

— क्या किताबों की अपनी यात्राएँ होती हैं? मुझे कानपुर में छपी एक दुर्लभ किताब सरदार शहर (बीकानेर) की एक पब्लिक लाइब्रेरी में मिली। इन दिनों जब दिल्ली में छपी किताबें नोएडा तक में भी इस तरह नहीं पहुँच पातीं, तब एक सुदूर शहर की लाइब्रेरी में इस किताब से मिलना सुयोग ही कहा जाएगा।

— सामान्य समझ तो यही कहती आई है कि आत्म-साक्षात्कार उधर जाता है और आत्म-विनाश इधर। एक तरफ़ बनना, दूसरी तरफ़ बिगड़ना। लेकिन कुछ लोग होते हैं—या कहूँ कुछ बेचैन आत्माएँ—जिनमें सच की खुजली इतनी गहरी, इतनी बेरहम हो जाती है कि वह जीते रहने की साधारण, देहगत समझ से ही उलझ पड़ती है। मैककैन्डलेस शायद ऐसा ही एक आदमी था। अपने ही पीछे पड़ा हुआ और अपने ही आगे भागता हुआ।

— आरंभ में वह अपनी मोटरसाइकिल से सुदूर यात्राएँ करती कोई भी स्त्री दिखाई देती है, लेकिन धीरे-धीरे वाहन, दूरी और भूगोल की चकित कर देने वाली विशालता अप्रासंगिक होने लगती है। जो शेष रह जाता है, वह है एक सजग दृष्टि। देखने की, ग्रहण करने की और अपने को संसार के सम्मुख खुला छोड़ देने की दृष्टि।

— मैं बस में बैठा हूँ। मैं बस में बैठा हूँ कि खिड़की से बाहर की सड़क पर चल रहा हूँ। खिड़की से बाहर की सड़क पर चल रहा हूँ कि मन किसी अन्य सड़क पर आगे निकल पड़ा है। मन की गति तेज़ है और मैं लड़खड़ा गया हूँ। मैं लड़खड़ा गया हूँ कि मैं डर गया हूँ। मैं डर गया हूँ कि बस अपने पहियों पर नहीं, मेरे पैरों पर भागी जा रही है।

— यह सप्ताह अनुवाद का सप्ताह था। अभी यह बात जब तुम्हें लिख रहा हूँ तो लगता है कि मैंने इस सप्ताह के बारे में सबसे कम महत्त्वपूर्ण बात पहले ही वाक्य में कह दी है। यह श्लील नहीं है। यह ग्लानि, बेतरतीबी, विस्मृति, बद-चाहतों या मुझे गर्त में खींचने को आतुर सतत प्रयत्नशील अति-सोच का सप्ताह भी था। यह रसोई पकाने और जीभ को बाज़ार से खींचकर घर की चहारदीवारी में लाने का सप्ताह था।

— रात नहीं थी तो दुपहर थी। वहाँ एक स्त्री थी। वह मीडियोकर सिगरेट-बाज़ थी। कला को उसकी बदतरी में बरतती हुई। मेरी कुछ मित्र-कवयित्रियों जैसी। मैं कभी भी धूम्रपान करता हूँ तो धुएँ को पर्याप्त भीतर उतरने देना चाहता हूँ। नासिका-मुख के सब कपाट बंद। बाहर निकल सकने की उसकी तड़प को बढ़ाता हुआ। अपनी किसी ऊब के उसकी अनुचरी बन सकने तक के समय की प्रतीक्षा करता हुआ। दरमियान जीभ दाँतों को और मुँह के ऊपरी आकाश को छूती रहती है।

 

— मैं सोचता था कि शब्द अनुभव को बचाते हैं। अब संदेह होता है कि वे उसे बदल देते हैं। जब मैं किसी दुःख के बारे में लिखता हूँ तो वह वही दुःख नहीं रहता जो लिखने से पहले था। वह दुःख की अदायगी है। एक संरचना। एक वस्तु, कमोबेश!

— मुझे कुछ और सोचकर देखना चाहिए कविता नहीं सोच सकने के इस तत्क्षण में। मुझे कभी-कभी लगता है कि अकेलापन लोगों की अनुपस्थिति नहीं, अपने प्रति अत्यधिक उपस्थिति है। जब हम अकेले होते हैं, तब हमारे पास स्वयं से बचने के साधन कम हो जाते हैं।

— समाप्तियाँ अक्सर पीछे मुड़कर देखने पर ही दिखाई देती हैं। लेकिन इस क्षण, जब मैं अंतिम पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, मुझे कविता के बारे में कोई निश्चित बात नहीं मालूम। इतना भर जानता हूँ कि कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर नहीं, केवल संगति संभव है।

— उन मौगों का अपराध स्त्रैण होना नहीं था। उनकी ख़ता थी उस स्तर के साहचर्य और देखभाल को सार्वजनिक कर देना। मेरे समय को हिंसा से कम, कोमलता से अधिक असुविधा होती रही है।

— कुछ घंटे मैंने कुछ शब्दों को बदलने में बिताए। मालूम पड़ा कि कठिनाई शब्द में नहीं थी—वह मेरे भीतर थी। मैं अपनी भाषा से पूछ रहा था कि क्या उसमें इस तरह के प्रेमों के लिए पर्याप्त जगह है जिन्‍हें उसने इतने संकोच से देखा है। भाषा की बड़ी परीक्षा उसके शब्द-खोज में नहीं, उसकी आतिथ्य-क्षमता में होती है।

— संज्ञाएँ प्रायः उदार होती हैं। वे चीज़ों के नाम रख देती हैं। सर्वनाम संबंधों के भीतर रहते हैं। वे किसी मनुष्य का नाम नहीं बताते, केवल यह बताते हैं कि हम उसे किस दूरी से देख रहे हैं। कभी लगता था कि सर्वनाम भाषा का एक छोटा अवयव है। अब लगता है कि सबसे भारी वही है।

— मुझे लगता रहा है कि दाँतों की सफ़ाई अपने मुँह के भीतर के इतिहास को सार्वजनिक सेवा में सौंप देने जैसा होता है। और मैं आतंकित था इसलिए। सहज होने की कोशिश करते हुए कह पड़ा, “दाँत साफ़ हों तो आदमी कम-पसंद लोगों की ओर भी बेशी मुस्कुरा सकता है।” वह हँसी। कहूँ, उसने हँसने का निर्णय लिया—यह पहले से तय नहीं था। “और मुँह अधिक खोलकर कविताएँ पढ़ी जा सकती हैं।”

— मैंने अपने समय का कोई भी हिस्सा इन लोगों को क्यों दिया और अब ग्लानि यह कि मेरे भीतर ही कुछ है जो समय-समय पर इन औसतताओं और इनकी भीड़ को पकड़ लेता है कि शायद आत्ममुग्ध घृणा का कोई काँटा जो मछली के काँटे से भी गहरा धँसता है कि प्रेम से निकल आना भले आसान होता हो घृणा से नहीं क्योंकि घृणा बार-बार अपना औचित्य सिद्ध करती रहती है कि देखो मैंने कहा था न वे ऐसे ही हैं और मैं हर बार उसे सही साबित करने पहुँच जाता हूँ जैसे मुझे अपनी ही क्षुब्धता से प्रेम हो गया हो और...

— मैं नवीं मंज़िल से नीचे आया तो रास्ता कुछ देर के लिए तो सरल लगा, फिर अपनी सरलता खो बैठा। एक ओर पार्क था, दूसरी ओर पार्किंग—दोनों ही दिशाएँ अपने-अपने ढंग से सही थीं और यही समस्या थी। मैंने सोचा कि बाहर का रास्ता प्रकट दिशा में होगा, लेकिन उधर की इमारतें सहमत नहीं थीं।

— घर अभी ख़ाली है। लेकिन यह वैसा ख़ाली नहीं है जो किसी कमी-सा लगे। मैं खड़ा हूँ और सोच रहा हूँ कि ‘नया’ कोई वस्तु नहीं है, एक अनुमति है। यह घर मुझे आने दे रहा है और खिड़कियों से रोशनी आ रही है। हमने एक दरवाज़े पर साथ हाथ रखा है। यह छोटी-सी क्रिया है, लेकिन इसमें एक हल्का-सा समापन है और एक नया आरंभ।

— क्या कहोगी जो कहूँ कि मुझे असुंदरता कुछ असहज करती है। यह राय मैंने किसी एक अनुभव के बिना पर तय की। मैंने उन्हें सुंदर स्त्रियाँ और कुछ कम सुंदर स्त्रियाँ कह साहचर्य निभाया। वह एक भली स्त्री थी। उसमें भली स्त्रियों के सब गुण थे। वह मेरे प्रति उदार रही थी। मैं अराजक था और उसमें शिशु सँभालने वाली माताओं जैसा संयम था।

— झरना आषाढ़ में जाना चाहती थी तो मैंने मनुहार किया कि वह आश्विन में जाए। आषाढ़ किसी और स्मृति के सुख-दुःख को जीने का आकुल मास है। मैं आषाढ़ को आरिनी के सुख-दुःख में जीना चाहता था। एक पारदर्शी नरमाहट है आरिनी के नाम में। उसकी स्मृति में एक गरमाहट।

— या इस तरह कि वह बोल रही है और मैं सुन रहा हूँ और वहाँ कोंकण के पहाड़ हैं और वे इतने ऊँचे नहीं और वे मुझे कोयले के पहाड़ से लगते हैं और उनमें नीलापन है और पार समंदर है, समंदर जो मेरी कल्पना में सफ़ेद समंदर है और इधर विरल जंगल है, कम ऊँचे पेड़, उनके सफ़ेद तने और कोई रास्ता नहीं है और भूमि साफ़ है और मैं आगे जा रहा हूँ और वहाँ वह घर है और वह कमरा और वह बिस्तर और वहाँ दिन है और वह बिस्तर में है और वह अपने शोक की एक कथा कह रही है और यहाँ रात है और मैं दिल्ली में हूँ और मैं उस कथा को सुन रहा हूँ।

— लेकिन वह मुझे याद नहीं आती। यह लिखते हुए मैं आईने से दूर बैठा हूँ वगरना नज़र नहीं मिलती। मुझे उसके लिए कोई टीस नहीं होती। मेरे पास उसके जाने के किसी निश्चित ऋतु की याद नहीं है। कोई गीत उसे वापस नहीं लाता। कोई गंध उसका नाम नहीं बनती। मेरी स्मृति में उसके लिए कोई फूलगाछ तक नहीं।

— बदतर यादें न होतीं तो सुख भर रो लेने के लिए बेहतर स्मृतियाँ किस घर से आतीं। मेरा इस बात पर रोने का मन होता है कि मैं एक ऊँचाई से उन्हें बुरा और स्वयं को भला कह रहा हूँ। मैं कितना बुरा आदमी हूँ!

— मेरी आँखों में हवा और पानी का ओझल था। उसे देखा तो वह अब वहाँ नहीं थी। वह बारह वर्ष पीछे लौट गई थी। उसने अब भी वही यूनिफ़ॉर्म पहन रखी थी। उसने टूटकर प्रेम किया था। वह आवेग में रोई थी, फिर सुख में। वह अब दुःख में रो रही थी, जब मैं उठा और उसके लिए पानी ले आया। वह जा रही थी तो मैं उसका पीछा कर रहा था। वह दस बरस पुरानी गली में मुड़ गई।

— मैककार्टनी की आवाज़ में अभिव्यक्त दिनचर्या—उठना, कंघी करना, बस पकड़ना—वह आंतरिक यांत्रिक निरंतरता है जो हर त्रासदी के बावजूद नहीं रुकती। और फिर वह अराजक आरोह। निचले सुर से उच्चतम सुर तक जाने का वह क्रेशेंदो, मानो दोनों शोर एक साथ, बिना किसी सुलह के, टकरा जाते हैं। अंत में फिर वह सुदीर्घ और गूँजता हुआ पियानो-कॉर्ड। वह क्षण जब यह सारा शोर कुछ पलों के लिए थम जाता है और मैं एक नए शोर के आगमन की तैयारी में जुट जाता हूँ।

— बे-तरतीब बारिश हो रही है। मतलब मैं कुछ बे-तरतीब वाक्य संभव करना चाहता हूँ। मसलन बारिश हो रही है। मतलब तुम्हारी याद आ रही है। मतलब बादल अपनी काली देह में बंद समुद्रों की अधूरी स्मृतियाँ लेकर भटक रहे हैं। मतलब पेड़ ऐसे सिसक रहे हैं, जैसे पत्तियाँ अपनी पुरानी चिट्ठियाँ पढ़ रही हों। खिड़की पर ठहरी बूँदें घर और आकाश के बीच भूले हुए संवाद रटकर याद कर रही हैं।

— मेरी देह में ऐसे अँधेरे का वास रहा है, जहाँ कोई नैतिकता प्रवेश नहीं करती। बस स्वीकृतियाँ रहीं वहाँ और संस्वीकृतियाँ। संस्वीकृतियाँ कभी अश्लील नहीं होती। उसे अश्लील हमारी हिचकियाँ बनाती हैं। त्वचा पर ठहरा हुआ एक क्षण कितनी ही बार वर्ष भर के संवाद से अधिक सत्य बोल देता है। मैंने कपड़े इसलिए नहीं पहन रखे कि देह छिप जाए, इसलिए कि मेरी इच्छा को अवकाश मिल सके।

— मैं तुम्हें छूने की नहीं, छुअन में सतत बने रहने की इच्छा करता हूँ। सुबह के तुम्हारे किसी एक संवाद ने मेरे पूरे दिन को तुम्हारी उपस्थिति से घेरे रखा। तुम्हारे पास होकर मेरे भीतर जो नीरव ठहरता है, वही मेरी सच्ची इच्छा है। तुम्हारी अनुपस्थिति मुझे बताती है कि तुम्हारी उपस्थिति मेरी ज़रूरत है।

— बारिश-घर में खिड़की आज भीतरी प्रवेश का दरवाज़ा है। यह क्षण जितना ठंडा है, तुम्हारा ख़याल उतना ही उष्ण। तुम दूर हो, फिर यह रात तुम्हारी उपस्थिति से कैसे भरी है! तुम उस दूर दीखते क्षितिज पर ज़रूर रहती हो, नहीं मालूम... लेकिन है वह कौन-सी दिशा? मानचित्र देखूँगा और रेखा खींचूँगा कि तुम किस दिशा में रहती हो।

— देह भी तो स्मृति रखती है। वह उन स्पर्शों को भूलती नहीं जिनमें केवल आकर्षण नहीं, भरोसा भी रहा हो।

— ...और एक नौका है। तिरती नहीं, टँगी हुई पानी पर। इस दृश्य में गति की परिभाषा स्थगित रखी गई है। यह दृश्य एक प्रयोग है। यहाँ अर्थ लगातार बनता और टूटता रहता है। हर अभीष्ट अपने होने और न होने के द्वंद्व में है।

— क्या घर मनुष्य का सबसे सुंदर भ्रम है : वह पृथ्वी पर कहीं भी जन्म ले सकता है, किसी भी शहर में रह सकता है, असंख्य कमरों से गुज़र सकता है; फिर भी उसके भीतर जीवन भर एक अदृश्य दिशा बनी रहती है—लौटने की दिशा। यह विचित्र है, क्योंकि मनुष्य वास्तव में कभी लौट नहीं पाता।

— मुझे अपने बचपन पर विश्वास नहीं है। जानता हूँ कि यह वाक्य लिखते हुए दोषपूर्ण अर्थ-आरोपण का जोखिम उठा रहा हूँ। मेरा आशय यह नहीं कि बचपन नहीं था। मेरा आशय यह है कि जिस बचपन को मैं याद करता हूँ, वह उतना ही निर्मित है जितनी कोई कविता। स्मृति और कल्पना के बीच की सीमा शायद उतनी स्पष्ट नहीं जितनी हम मानते हैं।

— मैंने घर की भीतरी दीवारों के लिए कुछ रंगों से मुलाक़ात की। टोप—जैसे कमरे की दीवारों पर कोई दुपहर थक कर बैठ गई हो और अब उसके कमज़ोर घुटने उठ नहीं पा रहे हों। वह न पूरी तरह भूरा है, न ग्रे—बस दोनों के बीच एक ऐसा मौन जो किसी निर्णय तक नहीं पहुँचता, पहुँचने की इच्छा भी नहीं रखता। ग्रेज—जैसे दो पुराने रंगों ने एक लंबी बहस के बाद हाथ मिला लिया हो और अब उस समझौते में एक तरह की आधुनिक शांति बस गई हो, जिसमें न उत्साह है न असहमति, बस रहने की सुविधा है। 

— इस अर्थ में कैसा सुख है कि इस दुनिया को मेरी आवश्यकता नहीं है। हम अपने महत्त्व के भ्रम से कितने थके हुए रहते हैं। हम क्यों चाहते हैं कि हमारा जीवन किसी कथा का केंद्र हो! जीवन तो परिधियों में भी घटता है।

चिट्ठियों में, 
फिर अभी के लिए विदा!

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शनिवारेर चिट्ठी की सारी चिट्ठियाँ यहाँ पढ़िए : शनिवारेर चिट्ठी

 

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