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सरसरी : ‘हिंदी का उत्सव’ और अंधकार

विवादों, विनोदों, गर्वोक्तियों, सूक्तियों और सहकारिताओं से फ़ेसबुक ऊब चुका था। आम का टिकोरा वैशाख तक बीनने के बाद आलोचकों ने दीर्घ प्रवास ले लिया था और बक़ौल अष्टभुजा शुक्ल कविजन फिर से अमराई ढूँढ़ने में ख़ुद को ख़र्चने लगे थे। वे सब अस्सी के दशक में सरक रहे थे, मसलन कवि-लेखक-संपादक और फ़ेसबुक-स्टार चंचल चौरसिया भी। ऐसे में रामू और मोहन [1964 की मशहूर ‘दोस्ती’, लोकेल : मुंबई तत्कालीन बंबई] ने यह तय पाया कि वे भी सेवेंटीज़ से ऊब चुके हैं, इसलिए उन्होंने तेज़-तेज़ चलना शुरू किया। हालाँकि उनमें से एक चलते हुए देख नहीं सकता था और दूसरा देखते हुए चल नहीं सकता था। फिर भी इस चाल में इतनी जल्दी थी कि वह दिल्ली पहुँचने के बजाय जयपुर पहुँच गए। कई महीने जयपुर रहने के बाद, वे वहाँ भी ऊबने लगे और फिर इस ऊबने से भी ऊबने लगे। 

रामू यानी रामनाथ गुप्ता मुझसे सोमवार की साँझ नोएडा के एक सेक्टर में मिल रहा था। मैं उससे जीवन और दैनिकता के बारे में तमाम बातें सुनने की उम्मीद लगाए था और वह ऊब से भी ऊबे हुए एक व्यक्ति की तरह मुझसे विरक्ति की भाषा में बहुत कुछ कहना चाह रहा था। उसने बताया, “हालात अब ऐसे हैं कि बग़ैर शराब पिए किसी हिंदीवाले को झेला नहीं जा सकता, बल्कि वह अगर शराब पी ले तो उसे झेलना और मुश्किल हो उठता है। और बंधु! हिंदी की दुनिया अब महज़ चार-पाँच प्राणियों की दुनिया रह गई है : मॉडरेटर, मैनिपुलेटर, एंकर, इन्फ़्लुएंसर और लॉन्गडैशर्स... इसमें जेनुइन लेखक-पाठक का कुछ अता-पता नहीं! हिंदी का राइटर अब रीडर को यूजरोचित नज़र से देखता है।”

रामू एक बिल्कुल नए कवि की तरह अपनी दंग आँखों से ‘हिंदी का उत्सव’ देख-सुनकर लौट रहा  था। मैंने उससे पूछा, “जयपुर में क्या माहौल रहा?” 

रामू ने कहना शुरू किया, “बंधु! माहौल का क्या है? माहौल तो बना ही रहता है। ख़ासकर फ़ेसबुक पर माहौल तो ख़ाँस-खँखार कर भी बनाया जा सकता है। एक आलोचनाहीन आलोचक के ‘आलोचना’ का संपादक होते ही उसके द्वारा ख़राब कविता की पेशकश से हर हफ़्ते माहौल बनाने की कोशिश ही तो रहती है। यह अलग बात है कि माहौल बन नहीं पाता। स्थितियाँ अब ऐसी हैं कि नमकपारे में सिहलाहट है, लकठे में ज़्यादा गुड़ और आलू कवियों के पास ज़्यादा कविताएँ। संगठनों में स्वार्थपरताएँ हैं, मुल्क में उत्सवधर्मिता है या ज्ञानेंद्रपति के शब्दों में कहें तो उपद्रवधर्मिता... बहुत और बहुत और और बहुत...”

“दरअस्ल यह बौद्धिकता का पैम्पर्ड छिदोहरा काल है।” यह कहते हुए रामू आगे बहुत कुछ कहने की इच्छा से भरा हुआ था। उसने कहा, “बंधु! मैं अब वह बतलाता हूँ, जो मैंने उत्सव से गुज़रते हुए मोहन के कान में कहा था।”


दोस्तो! इससे पहले कि आप इस सरसरी में अंत तक जाने की सोचें, मैं आपको रामू की कही हुई बात बतलाता हूँ :


एक सर्वथा खलिहर दुपहर में रामू ने सोचा वह जयपुर में ही है और इस दुपहर ही जयपुर में हिंदी का एक उत्सव होने के लिए विवश है। इस दुपहर में ही भोपाल-दिल्ली की एयर इंडिया की फ़्लाइट-संख्या 1886 को तकनीकी ख़राबी की आशंका के चलते जयपुर एयरपोर्ट पर इमरजेंसी लैंडिंग के लिए विवश होना पड़ा। इस विवशता का विस्तार एक और विवशता के रूप में हुआ और इस फ़्लाइट को अंततः रद्द करना पड़ा। इस दुपहर में ही जयपुर के दो वकीलों को विवश होकर यह बयान देना पड़ा कि नॉन-स्टॉप बस को बार-बार रोकना ग़लत है और इसी दुपहर में जयपुर की ख़ुशहाल बेकरी के पास एक विवश दंपति से डेढ़ दर्जन लोगों ने मारपीट कर ली। बेरोज़गारी के बढ़ते आँकड़ों से विवश होकर इसी दुपहर माध्यमिक शिक्षा विभाग [जयपुर] ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भर्ती के ख़ाली पदों का आँकड़ा ग़लती से हटा दिया। इस घटाना-घटना के बाद अब 1,03,589 पद ख़ाली होने को विवश हैं। इस दुपहर ही विवश पुलिस को करधनी हत्याकांड के आरोपी को गिरफ़्तार करना पड़ा, जब वह हत्या करके नहाने और पिता को चाय पिलाने के बाद खाटू श्यामजी और रींगस के आस-पास विवश होकर छिपता फिर रहा था। इस दुपहर में ही उदय प्रकाश जयपुर से 944 किलोमीटर दूर अनूपपुर या 322 किलोमीटर दूर जज कॉलोनी, वैशाली, ग़ाज़ियाबाद में विवश होकर किसी एक को पहले बताई जा चुकी बात किसी दूसरे को दुबारा बता रहे थे।  

इन सारी विवशताओं के बीच विवश रामू ने मोहन के सामने उत्सवालू होने का प्रस्ताव रखा। चूँकि मोहन कुछ भी देखने में अक्षम था, रामू के साथ हो लेने के सिवा उसके पास कोई विकल्प न था। वह रामू के साथ हो लिया।

बिरला ऑडिटोरियम की भव्यता में पहुँचने के बाद मोहन ने रामू से कहा कि ये क्या जगह है दोस्त! ये कौन-सा... 

रामू अपनी हैरान आँखों से बराबर इस जगह को देख रहा था। उसे लगा इस जगह में तो मौसी के चॉल जैसी सैकड़ों चॉल आ सकती हैं। उसे महसूस हुआ कि यहाँ अब सब कुछ नया या नए जैसा है। बल्ब, पंखे, झरने, बाल और पैंट की मोहरी के साथ-साथ तमाम चीज़ें नई से पुरानी और पुरानी से नई हो रही हैं। उत्पादन-प्रकिया ज़रूरत के मुताबिक़ कभी नॉस्टेल्जिक तो कभी अत्याधुनिक मूल्यों से गुज़र रही है... और यक़ीन जानिए दिमाग़ यह सब सोचते हुए बेहद ऊब रहा है। वह सब कुछ से ऊब रहा है। वह मंजनों के पारंपरिक स्वाद, टूथपेस्ट में नमक की जगह अब चारकोल को महत्त्व देने लगा है। शहर के साथ नौकरी, जवानी के साथ आदर्श, शाइरी के साथ तख़ल्लुस बदल रहे हैं... और भी बहुत कुछ है जो बदल रहा है। विचारधारा रोड-साइड की तरह बदल रही है : कभी दाएँ, कभी बाएँ, कभी बीच में और कभी गड्ढे में...

मोहन रामू का कंधा पकड़ प्रवेश के लिए आगे बढ़ने लगा। प्रवेश-द्वार पर मालूम हुआ कि इस उत्सव में 299 रुपये की टिकट पर ही प्रवेश संभव है। इधर-उधर बग़लें झाँकने के बाद रामू को अपने दोस्त के मार्फ़त मुफ़्त की टिकट मिल गई। किताबों के भकभकाते ढेर में कुछ लेखकों के नाम अपराध-कथाओं के शीर्षकों की तरह थे। इन किताबों के भीतर क्या जाता रामू, हारकर सभागार के भीतर चला!

मोहन ने अंदर घुसते ही रामू के कंधे को ज़ोर से दबाते हुए पूछा, “यहाँ बैठने को जगह तो मिल जाएगी न?”

रामू ने कहा, “अरे! यहाँ तो सब ख़ाली है, कुछ ही लोग तो बैठे हैं। यहाँ तो बारी-बारी से हम सारी सीटों पर उठ-बैठ सकते हैं। यह कैसा आयोजन हुआ भला!”

मोहन ने कहा, “लेकिन ख़ाली सीटें असफलता का मानक नहीं हो सकतीं रामू, मैंने प्राय: पाया है कि ख़ाली सीटें तो रज़ा फ़ाउंडेशन के कार्यक्रम में भी होती हैं!”   

मैंने महानाटकों को बहुत बार महज़ एक दर्शक के लिए मंचित होते देखा है। एक वास्तविक कलाकार प्रत्येक प्रदर्शन को कला नहीं कला का पूर्वाभ्यास ही तो मानता है। 

इस दृश्य के बीचोबीच की एक सीट जो मंच से बिल्कुल सीध में थी, रामू ने वहाँ मोहन को बिठा दिया। उसने अपनी बैसाखी सीट के सहारे टिका दी। ‘हिंदी का उत्सव’ शुरू होने को व्यग्र था। उत्सव क्या था, दुनिया के किसी कोने से उठाकर जबरिया लेखक बना दिए गए लोगों का एक पैनल था : लिखने के महत्त्व पर बात करने को उद्यत-विवश-उद्धत होता हुआ, लिखने के सवाल को लिखने के संकट की तरह बताता-बरतता हुआ; उन कुछ विकल मस्तिष्कों की सामूहिक चुल्ल थी जिनके पास किताबें तो हो गई थीं, लेकिन उनसे लेखन नहीं हो पाया था। इस अभाव में सुख बस इतना था कि लेखक होने की इच्छा उनके उस अंग में अब भी गुदगुदी पैदा करती थी, जहाँ मनुष्य के कभी पूँछ हुआ करती थी।  

दरअस्ल, यह फ़ेसबुकोत्तर लिखाई का साझा संलाप था, जिसे वे बड़ी बेहयाई से व्याख्यायित कर रहे थे। सारी दुपहरी इन अनर्गलताओं में बीत रही थी। अचानक से श्रोताओं की उपस्थिति बढ़ने लगी और वक्ताओं का अहमक़ाना आत्मविश्वास भी। 

रामू ने मोहन से कहा, “भीड़ अब बढ़ने को बेताब है।”

मोहन ने कहा, “इन हिंदीउत्सवप्रेमियों को भीड़ कहना क्या सही होगा? ये तो सुधी श्रोता हैं, अपना वक़्त निकालकर इस आयोजन में आए हुए जान पड़ते हैं?” 

रामू ने कहा, “जिस तरह के सेशन अब तक हुए हैं, उनमें आए लोग श्रोता नहीं; भीड़ ही प्रतीत पड़ते हैं और ऐसा मैं नहीं समझ रहा, इस कार्यक्रम के आयोजक और वक्ता समझ रहे हैं; क्योंकि उन्होंने अभी तक सिर्फ़ बोला है, कहा नहीं...”

मोहन उत्सुक हुआ। उसने टटोलते हुए रामू का हाथ पकड़ा और कहा, “रामू, इस सत्र को सुनकर तुम्हें क्या लगता है? हिंदी की एक सुविधासंपन्न पीढ़ी के सहारे हिंदी-साहित्य की दिशा-दशा कैसी है?”

“हिंदी साहित्य फ़िलहाल वैसे ही चल रहा है जैसे मैं... काश! इसे मैं वैसे ही देख सकता जैसे तुम...”

रामू ‘हिंदी साहित्य की सेवा’ सरीखे चलताऊ सेंटेंसों की धूर्तता से सुपरिचित था। उसके नज़दीक बैठे हुए सोशल मीडिया के एक पेज-एडमिन ने उससे  पूछा, “आप लोग कहाँ से आए हैं?” 

रामू ने कहा, “धरती पर दूब की ऊब जितनी पुरानी है, लगभग उतने ही प्राचीन हम लोग सत्तर के दशक से सीधे इस दृश्य में दाख़िल हुए हैं। लेकिन ज़रा ये तो बताइए कि ये लोग कौन हैं, जो रील के ज़माने में टिकट लेकर साहित्य का उत्सव देखने-सुनने आए हैं? क्या ये सचमुच साहित्य को इतनी श्रद्धा से देखते हैं?”

उसने कहा, “सुनने तो कोई नहीं आया, हम तो सौरभ द्विवेदी को देखने आए हैं। ख़ुद मुझे अपनी रीच के लिए रील चाहिए थी, तो इसके लोभ में आ गया। हालाँकि पिछले सेशंस में रील जैसा कुछ मामला बना नहीं!”

ख़ैर! बहुप्रतीक्षित सत्र की शुरुआत हुई। सौरभ द्विवेदी मंच पर नुमूदार हुए। अपनी तरह का एक फ़िनोमिना बन चुके सौरभ द्विवेदी इस उत्सव में हैं, सो उन्हें देखने के लिए बौराई जनता ने ख़ूब-शोर-शराबा काटा और ‘लाल फूल नीला फूल...’ से सभागार गुँजा दिया। जैसा कि अब चिरई-चुनगुन भी ये जानते हैं कि सौरभ अतिव्याख्याओं में चले जाते हैं, सो वैसा तो नहीं; लेकिन कुछ-कुछ वैसा ही बोलते हुए उन्होंने कुछ कवियों-लेखकों के नाम बताए और यह भी कि साहित्य आख़िर कहते किसे हैं? लिखना अगर ज़रूरी है तो कैसे लिखा जाए। SD की रिकमेंडेशनता और अत्योक्तियों से भरी रील की दुनिया के दर्शक उन्हें सामने पाकर प्रफुल्लित हो उठे। कमतर से भी कमतर; बल्कि कमतरतर तक पहुँचने की चाह मात्र लिए साहिब-ए-किताब हुओं के बीच सौरभ ने अपना सौरभ लुटा दिया। आख़िर उनकी भी क्या विवशता रही होगी!

इस उत्सव का आख़िरी सत्र कुछ सांगीतिक था। ऊबे-डूबे होने के बाद संगीत की साँझ उपलब्ध हो जाए तो रसिक मन को और क्या चाहिए भला! जयपुर में सौरभ के बाद अब रस ही रस लुटने लगा था। 

मोहन ने रामू का हाथ पकड़ा और दोनों बाहर आ गए। मोहन ने रामू से पूछा, “क्यों रे! तुझे क्या लगा, सौरभ की बात कहाँ तक सही है?”

रामू ने कहा, “देखो मोहन, तुलसी ने तो कह ही दिया है : ‘संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने...’ कूड़ा-करकट नहीं एकत्र करना है। ख़ैर! अब काग़ज़ पर लिख देने भर से कोई ख़ुश है तो उसे ख़ुश रहने दिया जाए, क्यों बाधा पैदा करना!” 

मोहन सीरियस होना चाहता था, “मतलब पुस्तकों से अंधकार पैदा करना और इस प्रकार के उत्सवों का आयोजन करना, अब यही मानक है हिंदी में?”

रामू ने कहा, “देखो, अपने फ़ुलटाइम में कुछ भी हो रहे लोग, अब पार्टटाइम में लेखक-कवि हो गए हैं या हुआ चाहते हैं। दरअस्ल, ये वही नवातुर-नवछेड़ी लड़बहेर हैं जिन्हें उस सियार की तरह एक ख़रबूज़ा मिल गया है जिसकी कहानी मैं बाद में बताऊँगा। मोहन! इन कवियों-लेखकों के ‘विमर्श’ सुनकर मेरा माथा हिल गया है। भाषा का अपव्यय करने वाले इन मूर्खों को सुनना भी अत्यंत त्रास देने वाला है। आचार्य राजशेखर ने तो कहा भी है :


वरमकविर्न पुनः कुकविः स्यात्।

कुकविता हि सोच्छ्वासं मरणम्।।


मैंने रामू से कहना चाहा कि वक़्त अब ऐसा है कि सारी कमतरताएँ इस क़दर प्रतिबद्ध हो उठी हैं कि वे ही वैशिष्ट्य-निर्माण का स्वाँग भरेंगी! 

मैं इससे पहले कुछ कहता कि रामू ने मुझसे कहा, “बंधु! वे वक़्त के सही पारखी हैं और ज़ाहिर है कि उनकी इस उद्घोषणा से कोई अनजान नहीं है। उनकी नज़र में हर आदमी हिंदी का लेखक-कवि है, जो एक जोड़ी किताब शीघ्र-सद्य प्रकाशित करा सकता है।”

मैंने पूछा, “तुम अकेले आए? और मोहन?”

रामू अब हताश-निराश दीख रहा था। उसने बताया, “मोहन को आयोजनाकांक्षी हुए उस पंक्ति-प्रकाशक ने प्रूफ़रीडर की नौकरी पेश की है। मोहन अब उसके दफ़्तर जाएगा और कुछ भी प्रूफ़ न करने की शपथ लेगा।”

मैंने पूछना चाहा कि वह तो... 

रामू ने बीच में ही रोककर मुझसे कहा, “उहूँ... उहूँ... मैं समझ रहा हूँ तुम्हारी बात, मेरे जवाब में ही तुम्हारे इस संदेह का समाधान है। बहरहाल, मैं चलता हूँ। इस आने-जाने का वेतन नहीं मिलता मुझे बंधु! मैं तो एक खलिहर दुपहरी को रससिक्त बनाने गया था, लेकिन अफ़सोस! वह दिन बादलों में खो गया...”

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