रील रसाचार्य : कॉर्पोरेट मज़दूरों की दीपावली उर्फ़ इसको भी पंक्ति को दे दो
रचित
08 नवम्बर 2026
कॉर्पोरेट मज़दूर इस सप्ताह रील्स में नज़र आए, कहीं ₹ 300 के बोनस के लिए ₹ 3000 का कुर्ता पहनकर ऑफ़िस पार्टी में जाने के अफ़सोस के साथ। कहीं बोनस से ख़ुश होकर नोट गिनते हुए। कहीं बोनस न मिलने पर ऑफ़िस की कुर्सियाँ और मेज़ें उठा ले जाने के ख़याली पुलाव को मैनेजर की परमिशन के बाद एक बनाई गई रील में... वहीं HR की बनवाई रीलें भी दिखीं जहाँ टीम की सारी महिलाएँ अपने मैनेजर के सम्मान में अज़ीम-ओ-शान शहंशाह पर प्रशस्ति रच रही थीं। बाक़ी एथनिक कपड़ों में फ़्लोर पर रैम्प वॉक तो एक घिसा हुआ टेम्प्लेट है ही।
कॉर्पोरेट एम्प्लॉई अपने लिए कॉर्पोरेट मज़दूर शब्द का इस्तेमाल करते हैं। दरअस्ल, कॉर्पोरेट एम्प्लॉइज़ ऐसे लोगों का समूह होता है जिनका पैशन कुछ और था, जिन्होंने अपने लेवल पर अपनी परिस्थितियों से पार पाने की कोशिश भी की; लेकिन वह काफ़ी नहीं थी और अंततः सर्वाइवल इंस्टिंक्ट से पराजित हुए, ये कलावंत और ख़याली सरकारी कर्मचारी अब कॉर्पोरेट संस्थानों में कीबोर्ड बजा रहे हैं। एक दिन इस सबको छोड़ देंगे, यह संकल्प ही अब उनका आख़िरी सहारा है, जिसे वे अक्सर दुहराते हुए दिनोंदिन और गहरे धँसते जा रहे हैं। ख़ुद को कॉर्पोरेट मज़दूर कहकर अपना मज़ाक़ उड़ाते हुए अपनी इस खीझ को भी दर्ज करते दिखते हैं।
अब ये लोग ज़िंदगी के उस मुक़ाम पर हैं, जहाँ एक सपने की आँच में अपने हाथ जलाए बैठे हैं और अब इन जले हुए हाथों से जीवन का हवन और नहीं किया जा सकता। 18-18 घंटे की पीठ तोड़ पढ़ाई के बाद भी इनका सपना इनसे दूर ही रह गया। थक-हारकर ये लोग मुखर्जी नगर या गांधी विहार (जिनके अलग-अलग शहरों में अलग-अलग नाम हैं) से नोएडा-गुरुग्राम-बेंगलुरु का रुख़ करते हैं और किसी MNC की अँग्रेज़ी अल्फ़ाबेट वाली किसी पोज़ीशन पर ख़ुद को बैठा पाते हैं। यह पोज़ीशन abcdefghijklmnopqrstuvwxyz का कोई भी कॉम्बिनेशन हो सकता है। इन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता। इन्हें पता है इस देश में चार ही कॉम्बिनेशन काम के हैं : MP, MLA, DM, SDM, बाक़ी सब “फ़लाँ कंपनी में काम कर रहे हैं...”
वह इस सेटअप में अकेला था। उसने पटना में यूपीएससी की तैयारी की थी। उसका भाई सरकारी नौकरी में था। वह एक एग्ज़ाम देने पहली बार दिल्ली आया था। भाई के जिस दोस्त के यहाँ वह रुका था, वह दोस्त भी पहली बार ऐसे ही दिल्ली आया था और आजकल गुरुग्राम की साइबर सिटी की किसी MNC में काम कर रहा था। उसे 7 साल हो गए थे। 4 नौकरियाँ, 3 रूममेट और 5 मकान बदलने के बाद अब वह एक फ़ुल फ़र्निश्ड 1 BHK में रह रहा था, जिसमें एक ओपन बालकनी भी थी। EMI पर कार ले ली थी। उसे बस एक ही अफ़सोस था कि काश उसने तैयारी में 4 साल न बर्बाद किए होते, तो आज वह शायद अपने 2 BHK में होता और मम्मी-पापा भी उसके साथ रहते।
शुक्रवार की शाम को जब वह एग्ज़ाम देकर भाई के दोस्त के फ़्लैट पर लौटा तो फ़ाइव-डे-वर्किंग वालों के ढाई दिनी साप्ताहिक त्योहार की शुरुआत हो चुकी थी। माहौल सेट था। उस दिन उसने देखी वह दुनिया जो न UPSC के सिलेबस में थी, न किसी टॉपर के इंटरव्यू में। लड़के-लड़कियों का वह उन्मुक्त व्यवहार जो क़स्बाइयों पर कल्चरल शॉक की तरह गिरता है। उसने देखा कि लड़कियाँ भी उन जोक्स पर हँस सकती हैं, जिन्हें वह बस अपने दोस्तों में सुनाया करता था। उसने देखा कि प्रेम का प्रस्ताव रखना कोई जान जोखिम में डालने वाला अमल नहीं है। उसे लगा वह इस तरह के सेटअप में फिट हो सकता है और शायद ख़ुश भी रह सकता है। उसने साइबर हब देखा, उसने देखा चीज़ें उतनी भी महँगी नहीं हैं। उसे यह सब देखकर अपने बोरिंग रोड का जीवन याद आया जो इसके नाम जैसा ही था। उसे अपने पिछले 3 एग्ज़ाम का हाल भी याद आया। उसने तय किया भाड़ में जाए UPSC... पैसा ही तो कमाना है? पेपर लीक और भ्रष्टाचार से भरी सरकारी नौकरी की इस बहुत लंबी लाइन में, जहाँ से वह 3 बार धक्का मारकर निकाला जा चुका है, फिर उसी लाइन में सबसे पीछे लगने का कोई तर्क उसे नहीं दिखा। उसे हैरत हुई कि आख़िर इतने कमज़ोर तर्क पर वह इतने साल कैसे डटा रहा। अब वह वापस पटना नहीं जाएगा।
आज इस घटना के 5 साल बाद वह नोएडा की एक एमएनसी के क्यूबिकल में बैठा उस दिन को याद कर रहा है जब भाई के दोस्त ने अपनी कंपनी में उसका इंटरव्यू करवाया था। उसे वे दिन याद आए जब वह समाजवाद, क्रांति, पूँजीवाद, श्रम और अपने यूपीएससी के सिलेबस की कविताएँ पढ़ता था :
“किंतु हम हैं द्वीप हम धारा नहीं है।”
“हेलो मिस्टर अभिनव।”
एचआर नीति अरोड़ा की पॉलिश्ड आवाज़ ने उसका ध्यान तोड़ा। वह एचआर रूम में है जहाँ लगभग कोर्ट मार्शल जैसी स्थिति है। उसे याद आया, उसने ऑफ़िस में क्रांति जैसा कुछ करने का प्रयास किया था। इससे पहले वह सविनय अवज्ञा का प्रयास कर चुका था, जिसे उसके अलावा किसी ने नोटिस तक नहीं किया था। उसे लगा लोगों को फ़र्क़ पड़ेगा, लेकिन सिर्फ़ इतना फ़र्क़ पड़ा कि उसे 2 महीने रोज़ जल्दी उठकर अपने लिए खाना बनाकर पैक करना पड़ा। ऑफ़िस का खाना ख़राब का ख़राब बना रहा। उसे अपनी ग़लती समझ आई कि सविनय अवज्ञा से पहले उसे अपनी पार्टी मज़बूत करनी चाहिए थी। अकेले सविनय अवज्ञा कारगर तभी हो सकती है जब उसे मीडिया सहयोग मिले या फिर आंदोलन करने वाला कोई बड़ा आदमी हो। वह गांधी नहीं था, मंडेला नहीं था, वह तो अन्ना हजारे भी नहीं था।
ख़ैर, इस घटना के बाद उसने सविनय अवज्ञा को हमेशा के लिए ड्रॉप कर दिया और क्रांति का छोटा-मोटा कॉर्पोरेटेड संस्करण तैयार करने की योजना में लग गया। उसी योजना का परिणाम था कि आज वह एचआर रूम में बैठा है और यह संभवतः उसका आख़िरी दिन है, हालाँकि उसे इस बात की ख़ुशी ज़रूर है कि उसकी सविनय अवज्ञा की तरह उसकी क्रांति को कम से कम नोटिस तो किया गया।
“मिस्टर अभिनव! यह किसका आइडिया था?”
“मुझे नहीं पता नीति।”
“ओके, लेकिन तुम्हारी रो की 12 कुर्सियों को डिस्मैंटल किया गया है। तुम्हारी ही टीम की कुर्सियाँ हैं, तुम्हीं लोग वहाँ होते हो और तो कोई जाता नहीं वहाँ।”
“मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता, आप हाउस कीपिंग से पूछिए।”
“हाउस कीपिंग से पूछा है और उनकी सारी एक्टिविटीज़ का सीसीटीवी देखा है, वे उस दिन उधर नहीं गए।”
“तो आपको लगता है यह मैंने किया है? 12 कुर्सियों को डिस्मैंटल करने की फ़ुर्सत है यहाँ मेरे या मेरी टीम में किसी के भी पास?”
“मैं सीधे मुद्दे पर आती हूँ। मैंने तुम्हारी पूरी टीम को फ़ोन किया कल ऑफ़िस के बाद। हाउस कीपिंग स्टाफ़ में एक बंदे ने तुम्हें स्पून ले जाते देखा।”
“स्पून...”
“हाँ, स्पून और उसने बताया कि तुमने उससे बोनस के बारे में पूछा, तुमने स्पून उठाते हुए कहा—ले के रहेंगे : बोनस।”
“लेकिन वो तो मज़ाक़...”
“मज़ाक़ नहीं अभिनव, तुम्हें पता है तुमने कितने रूल ब्रेक किए हैं यहाँ। बोनस के बारे में पूछना और स्टील के चम्मच को फ़्लोर पर ले जाना स्ट्रिक्टली प्रोहिबिटेड है।”
अभिनव के पास इसका कोई जवाब नहीं था, वह इस तरह के सवालों की तैयारी करके नहीं आया था।
“लुक अभिनव, यू आर ए हार्डवर्किंग इंडिविजुअल, वी वैल्यू यू बिकॉज़ ऑफ़ योर वर्क, लेकिन दिस इज़ नॉट एक्सेप्टेबल ऐट ऑल। हमें पता है कि तुमने शायद प्रैंक के लिए किया होगा, उसी चम्मच से 12 कुर्सियों के स्क्रू लूज़ किए होंगे। तुम्हारे एक दोस्त ने बताया है कि तुमने आईटीआई किया है, तुम्हें यह सब आता है।”
अभिनव चुप रह गया।
“वेल, एक बात हो गई, लेकिन तुम्हें यहाँ किसी और काम से बुलाया है। एक गुड न्यूज़।”
“गुड न्यूज़, समझा नहीं?”
“यू नो प्रवीण प्रियदर्शी?”
“प्रवीण प्रियदर्शी, हाँ, पीपी सर, बिज़नेस ऑपरेशन मैनेजर।”
“हाँ वही, तुम उनसे मिले हो।”
“हाँ, हाय हेलो है, इस ऑफ़िस में मेरा जॉब इंटरव्यू उन्होंने ही लिया था।”
“ओह अच्छा, तुम्हें पता होगा कि लास्ट वीक ऑफ़िस में ही उन्हें नर्वस ब्रेकडाउन हुआ और अब ऑफ़िस की तरफ़ से ही उन्हें हॉस्पिटलाइज़ किया गया है।”
“लेकिन वो तो ज़ूम कॉल पर थे कल।”
“हाँ, वो वहीं से अपनी रिस्पॉन्सिबिलिटीज़ को मैनेज कर रहे हैं। ही इज़ सच ए ब्रेव मैन एंड ए ट्रू टीम लीडर।”
“जी।”
“ख़ैर, लेकिन तुम्हारे लिए देयर इज़ एन अपॉर्च्युनिटी।”
“ओह... के...”
“पीपी की जगह तुम उनकी टीम लीड करोगे एंड इट्स नॉट ए टेम्परेरी अरेंजमेंट। हम तुम्हें इसी फ़रवरी में प्रमोट करने वाले थे, लेकिन पीपी की कंडीशन को देखते हुए अब हमें उसका रिप्लेसमेंट चाहिए।”
अभिनव सोच में पड़ गया, क्रांति का ऐसा पूँजीवादी इनाम उसने सोचा नहीं था।
“ख़ैर. अभिनव, इस मंडे को हम पेपर्स साइन करेंगे और हाँ, वो प्रैंक्स करना अब बंद कर दो, अब तुम BOM हो अभिनव।”
“जी...” कहकर केबिन से बाहर आते अभिनव के लिए जैसे सब बदल गया था। वार्निंग लेटर की जगह ऑफ़र लेटर, क्या बात है!!!
उसने सबको मन ही मन माफ़ कर दिया, हाउस कीपिंग वाले को, अपनी चुग़ली करने वाले दोस्त को, ख़ुद को और उसने माफ़ी माँग ली क्रांति से गांधी से मंडेला से...
अब वह जमकर काम करेगा। पीपी का केबिन उसका होगा, जहाँ वह अपनी माँ की फ़ोटो रखेगा और मोनालिसा की छोटी-सी पेंटिंग... और अब वह क्रांति कभी नहीं करेगा। इससे अच्छा कविता की रील बनाएगा, बल्कि आज ही से शुरू करेगा। आज का दिन अच्छा है नई शुरुआत के लिए। वह अपनी पसंदीदा कविता गुनगुनाता हुआ सिगरेट पीने चला गया...
यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता पर
इसको भी पंक्ति को दे दो
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