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रागदर्पण : मैं ढूँढ़ती हूँ शहतूत का वह दरख़्त

स्कूल ने रुक्का भेजा—‘अबकी सालाना जलसे में आपको सम्मानित करते हमें गर्व होगा।’ जहाँ जीवन का सबसे बेफ़्रिक समय जिया, शऊर-सलीक़ा सीखा, बात व्यवहार करना आया, सदा के संगी मिले; जहाँ पढ़कर आज लिख सकने क़ाबिल हुई, अरसे बाद वहाँ जाने को लेकर मन हुलस उठा। सारी रात सोचती रही कैसा लगेगा वहाँ जाकर! औरत बन चुकी लड़कियाँ एक-दूजे को देखकर विस्मय से भर जाती होंगी! स्कूल का समूचा नक़्श और भूगोल बदल चुका होगा! कोई मिलेगा जो मुझे उन दिनों की मिनहनी-सी साँवली लड़की के रूप में जानता होगा!

फाटक के भीतर क़दम रखते एक बेचैनी-सी तारी रहती है। पीली चाहरदीवारी के पार यादों में बसी वह कुशादा इमारत जाने क्यों घुटी-घुटी सी लगती है। बहुत मुमकिन है कि वह उतनी ही खुली हो, लेकिन मैंने उसे जिस तरह देखना चाहा—वह वैसी नहीं रही है तो इसी घुटन में स्कूल की इमारत भी मुझे वैसी ही लगी हो। फाटक की सीध में कोई पचास क़दमों के फ़ासले पर प्रिंसिपल रूम उसी जगह खड़ा है, लेकिन उसकी ओलती पर इतराती मधुमालती और बोगनबेलिया नदारद हैं। मैं दायीं तरफ़ शहतूत के उस दरख़्त को ढूँढ़ती हूँ, जो कितनी ही चिड़ियाँ और गिलहरियों की पनाहगाह था। एक के पीछे एक कई गिलहरियाँ एक-दूसरे से होड़ करती कैसे सर्र से गुज़र जाती थीं। उन्हें देखते रहना मेरा रोज़ का शग़ल था। तब यही संसार था।

शहतूतों के मौसम में लड़कियों की उँगलियाँ, ज़बान और होंठ लाल रहा करते थे। दरख़्त की एक डाल से पीतल का बड़ा घंटा लटकता था। जिस पर लकड़ी के हथौड़े से हुई चोट से टन-टन की आवाज़ के साथ, नीली क़मीज़ और सफ़ेद सलवार-दुपट्टे वाली लड़कियाँ एक-दूसरे को धक्का देती—अपनी व्यग्र त्वरा में फाटक की ओर दौड़ पड़ती थीं।

गाढ़े लाल शीरीं शहतूतों वाला वह दरख़्त वहाँ नहीं है। पीतल का घंटा भी कहीं नहीं दिखता। मैं सोचती हूँ अब स्कूल से छूटने को कौन-सी आवाज़ होती होगी कि लड़कियाँ बेताब दौड़ पड़ती होंगी। साइकिल स्टैंड की जगह बदल चुकी है। हॉल के बाहर की सीढ़ियाँ, जहाँ गप्प-चौकड़ी जमा करती थी—वह जगह अब समतल है। उस समय मोबाइल और इंटरनेट की मसरूफ़ियत नहीं थी तो लड़कियाँ भी लड़कों-सी यारबाश थीं। ख़ाली घंटा होते ही मुनासिब जगह देख मुँह जोड़ लेतीं। दिन भर ख़त्म न होने वाली तवील बक-बक। चंद घंटों में बीते कई बरस जी लेने के लोभ में, मेरी आँखें बस यहाँ-वहाँ डोलती रहीं।

स्कूल में हरियाली अब नहीं के बराबर है। यकायक कैंटीन की याद आती है। मैं उस तरफ़ को भागती हूँ। कैंटीन हमारे समय जैसा गुलज़ार नहीं। बिना रंग-रोगन की एक उजाड़ कोठरी-सा लगता है। छोटे क़द की एक औरत चुप्पाई-सी कोने में खड़ी धूप सेंक रही है। उसे ज्यों ही ‘मौसी’ पुकारती हूँ तो मुझे पहचानने को वह बेनूर आँखों से हैरानकुन होकर ताकने लगती है। मेरे माथे पर उन दिनों की तरह काली बिंदी है। मुझे लगता है अब मौसी कहेगी काली बिंदी किस्मत काली कर देती है। मगर मौसी कुछ नहीं कहती। मैं मौसी के गाल छूती हूँ। सूखी वीरान आँखों में दरिया उतर आता है। कैंटीनवाली मौसी भरी आँखों से बताती है कि बड़ी तंगहाली है। चाटवाले मामा गुज़र चुके हैं। क्या कहना चाहिए मुझे नहीं सूझता। चाटवाले मामा की कच्ची इमलियाँ याद आती हैं। जाने किस नादानी में पति-पत्नी को, लड़कियाँ मामा-मौसी बुलाया करती थीं।

कार्यक्रम के बाद नए-पुराने सब लोग प्रार्थना मैदान में एकजुट होते हैं। कच्चा मैदान ऊँचे भराव के बाद अब सीमेंट का एक बुलंद चबूतरा-सा लग रहा है। बारिशों के दिनों में अब वहाँ कीच नहीं होती होगी। तो क्या लड़कियों को ‘जय वीणा वादिनी कल्याणी…’ के आलाप से अब किसी रोज़ छुट्टी न मिलती होगी? मैदान में खुली नरम धूप है। बदलते मौसम की हवा चेहरे और बालों को छू रही है। सब निर्द्वंद्व और निस्संकोच एक-दूसरे से गले मिल रहे हैं—होंठों पर मुस्कुराहटें, छुअन में ख़ुलूस की नरमी, आलिंगन में सहज गुनगुनापन और ज़बान में शहद है। ऐसे में परिचित-अपरिचित का भाव कहीं तिरोहित हो जाता है। किंतु मैं अपनी प्रकृति से उलट एक वीतरागी-सा व्यवहार करती हूँ। समय के साथ कितना कुछ छूट चुका है। छूट जाना कितना दिल-दोज़ है। मगर छोड़ देने भर से कहाँ कुछ छूटता है। टुकड़ा-टुकड़ा होकर मन वहीं रमा रहता है। कुछ बातें भुलाए नहीं भूलती। कुछ लोग छोड़े नहीं छूटते। अचानक किसी बात की याद बढ़ई के रंदे की तरह मन की कोमल परतों को छीलती जाती है। हर दुख का उत्स कोई गहरी चाह है। भीतर के गह्वर में विछोह की कोई उदास धुन लगातार बजती है। यादें आदमख़ोर दीमक है। प्यार एक जानलेवा ज़हर का नाम है।

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