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रागदर्पण : कंधे आख़िर किसलिए होते हैं

उसका संग छूटते ही मेरे चौखूँट एक अजब निस्संगता आकर बैठ जाती थी कि फिर कई घंटों तक किसी की भी मौजूदगी मुझे उकताऊ और नागवार लगती। उसके साथ कोई आशनाई न थी; मगर हो सकने का भारी इमकान था, अगर मैं अपनी सन्नद्धता से फिर सकती।

उसे याद करते हुए टुकड़े-टुकड़े दृश्यों और संवादों की एक तवील ज़ंजीर-सी बनती जाती है, फिर भी कोई बात सिलसिलेवार याद नहीं पड़ती। जाने क्यों बातों के मौसम याद रहते हैं... और याद रहता है जादुई उँगलियों वाला सारंगी बजाता बूढ़ा औलिया जिसने सिर पर हाथ धरकर कहा था, “सात्विक जोड़ है।” सुनकर मैं झेंप गई थी, जबकि वह हँस पड़ा था, “बाबा की आँखों में जाले पड़े हैं। ठीक से तुम्हारा रंग नहीं देखा।”

वह बरसातों का घमस भरा दिन था। अब्रदार आसमान था। घुन्ने बादल चुटफुट-सा बरसकर छितरा गए थे।

एक दूसरे मौसम में कोई कविता लिखी थी। अपनी कच्ची समझ से पहली पक्की कविता। हाथ में वही पुरज़ा दबा था। होलिका-दहन की साँझ थी। गुलाबी बयार झोटे पिलखन के पत्तों को छेड़ रही थी। छत पर ख़ूब चाँदना था।

“सुनाओ क्या लिखा है!”

मैं अपनी रौ में पढ़ने लगी थी। तनिक-सा दमकश होकर उसने पूछा, “कहीं जाना है तुम्हें?” सवाल के अटपटेपन से हैरान होकर मैंने न में गर्दन हिलाई।

“तो हमेशा रेल की तरह धड़धड़ाई क्यों रहती हो? ज़रा आहिस्ता फिर से सुनाओ।”

अबकी मैंने एक-एक शब्द ठहरकर पढ़ा कि उस नुक़्ताचीं की सूखी टिप्पणी से बच जाऊँ।

“कोरी भावुकता है... बताओ तुम प्यार के बारे में क्या जानती हो?”

मैं तन्ना गई थी।

“मैं कुछ नहीं जानती।”

उसने नीम निगाह से मेरी बुझी हुई सूरत को देखा और कहा, “तो अच्छे से जान लो फिर लिखना। इसे मैं रखे लेता हूँ।”

उसने कत्थई कमीज़ की जेब में उस कच्चे पुरज़े को सरका लिया।

“आँखें बहुत अच्छी हैं तुम्हारी।”

मैं अवसन्न थी। उसने साँस फूँककर अपना चश्मा साफ़ किया और फिर बोला, “रात को आसमान की रौशनी में जो पढ़ पाती हो।”

शदीद सर्दियों की एक शाम याद आती है। वो हमेशा की तरह किताब में मुँह गड़ाए था। उसके पहली शाम उसने कोई चुभती हुई बात कही थी। जो अगले रोज़ तक भीतर धँसी थी। उसी की किरकन थी जो बातों में निकल रही थी।

“तुम बहाना करते हो... वो दिखाते हो जो तुम नहीं हो।”

वो वैसे ही मुस्कराया जैसा मेरे चिढ़ जाने पर अमूमन मुस्कराता था।

“क्या दिखाता हूँ?”

“दूसरों से जुदा और महान्।”

“तो क्या हुआ? दिखाते-दिखाते शायद एक दिन हो जाऊँ।”

“तुम असहनीय हो।” मैंने तेज़ आवाज़ में कहा था।

“तो यहाँ क्यों रुकी हो। दरवाज़ा उधर है।”

ज़्यादातर हमारी बातें बहस या झड़प पर पहुँचकर ख़त्म होतीं और फिर हार कर मैं ही उकताई-सी खड़ी हो जाती, यह सोचकर कि यह हमारा आख़िरी संवाद है। लेकिन कोई डोर थी जो ढीली तो पड़ती थी, मगर टूटती न थी। उसकी बेलाग तार्किकता के आगे मैं ख़ुद को हमेशा दीन-हीन पाती थी... और ग़ालिबन वही दीन-हीन बनी रहती अगर फ़रवरी की वो शाम हमारे बीच नहीं होती।

एक समारोह में जाने को मैं अपनी पूरी धज में थी। हम शाम को लगभग रोज़ ही मिलते थे। वो मेरे लिए कोई किताब लेकर आया था। मैं बाहर निकल रही थी।

“कैसी दिख रही हूँ?” मैंने आदतन पूछा था।

मुझे उम्मीद थी वो कहेगा कि ताम्बई रंग तुम पर नहीं जँचता। लेकिन उस वक़्त उसे क्या हुआ था! वो अधखुले फाटक के बीच अड़ गया... 

“सुनो तुम यूँ सज-धज कर जब कहीं निकलती हो तो मैं बहुत इन्फ़िरियर फ़ील करता हूँ। तुम्हें न जाने कौन-कौन देखता होगा!”

उसकी आवाज़ कातर हो चली थी। उसने उस शाम कितना कुछ कहा था। मैं उलझी हुई थी। मैं उसके तंज़, मज़ाक़ और उपहास झेल सकती थी; लेकिन इस दीनता को नहीं। मैं उसे वैसे ही मग़रूर और बेफ़िक्र देखना चाहती थी। उस शाम मैं उसके एक नए रूप से मिली थी। उससे अलहदा एक और वो।

उसने मुझे सिखाया कि प्रेम का अस्ल मतलब है, जिससे प्रेम करो उसे उसके मन का करने की आज़ादी देना।

“तुम वही करो जो तुम चाहती हो। बस मुझे डर है कि तुम निभा पाओगी! तुम कुछ भी इसलिए मत सहना कि अब कोई विकल्प नहीं रहा।”

उसने ठीक कहा था कि महान् बनने का अभिनय करते-करते किसी दिन हम सच ही महान् हो जाते हैं।

फिर भी अक्सर किसी के चौड़े चकाट कंधों को देखकर कुछ याद आ जाता है। मैं सोचने लगती हूँ : कंधे आख़िर किसलिए होते हैं।

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