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प्रोटेस्ट में पहली बार, तजुर्बे बेशुमार

11 अक्टूबर 2026, रविवार 

दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस की लाइब्रेरी में बैठा हूँ। दिल्ली में आज सीजेपी का तमाम युवा संगठनों के साथ प्रोटेस्ट है। कई साथियों की तरह बनारस से भी एक साथी का फ़ोन आ चुका है, “कैसी स्थिति है, गुरु?”

कुछ ही देर में ख़बर मिलती है कि बीजेपी दफ़्तर से जंतर-मंतर की ओर बढ़ते हुए हमारी एक साथी भी डिटेन कर ली गई हैं। ऐसी परिस्थिति में, जब दिल्ली आज पूरी तरह चाक-चौबंद है, मन बना कि किताबों की ज़मीन छोड़कर आंदोलन की ज़मीन पर उतरा जाए।

दिल्ली की सड़कें आज सुनसान थीं। उनसे होते हुए मैं कनॉट प्लेस पहुँचा। एच ब्लॉक से कुछ दूर लगभग दो सौ युवाओं को इकट्ठा देखकर ख़ुशी हुई। पचास-साठ मीडियाकर्मी और यूट्यूबर चहलक़दमी कर रहे थे। कंधों पर कैमरे थे, हाथों में माइक और नज़रें किसी ऐसे चेहरे को खोज रही थीं... जो कुछ बोल दे। मैं सोच ही रहा था कि अगर मीडियावालों ने धर लिया तो क्या बोलूँगा कि तभी किसी की कनपटी पर... पड़ाक! पड़ाक! पड़ाक!

“कॉकरोच साला! पुलिस को गाली देगा!”

मामला गड़बड़ लगा। अच्छा हुआ कि आते ही मीडिया से कुछ नहीं बोला। मैं जिन्हें सीजेपी के जेन-ज़ी समझ रहा था, दरअस्ल, वह समूह बीजेपी के जेन-ज़ी का था। क्या ही बताऊँ, धोखा अकेले मुझे नहीं हुआ था। कांग्रेस के सेवादल वाले भी धोखा खा गए। वे पानी की बोतलों के बंडल-के-बंडल विद्यार्थी परिषद को पिला गए और उधर, तीन सौ मीटर आगे, आंदोलनधर्मी जेन-ज़ी के गले सूखते रह गए। सेवा अंधी होती है, यह सुना था। आज देखा कि वह पार्टी भी नहीं पहचानती।

दिल्ली का मीडिया भी मुस्तैद था। पीटीआई की लग्ज़री गाड़ी थी, बीबीसी के देसी-विदेशी संवाददाता थे, एएनआई और लल्लनटॉप भी थे। सब एक निश्चित दूरी से लाइव प्रसारण कर रहे थे। दूरी इतनी थी कि लोकतंत्र फ़्रेम में आ जाए, पर लाठी कैमरे तक न पहुँचे।

सीपी सर्किल से जंतर-मंतर की ओर जाने वाला मुख्य मार्ग भारी पुलिस बल और बैरिकेडों से लैस था। धीरे-धीरे साँझ होने लगी थी। पुलिस बल बहुत चौकन्ना था। लेकिन उसी मोड़ पर ‘शांतिदूत’ कबूतर दाना चुग रहे थे। चुगते-चुगते वे अचानक फड़फड़ाकर उड़ पड़ते। हर बार जवान पीछे मुड़कर देखने लगते। इस तरह ‘शांतिदूत’ बार-बार जवानों की ‘शांति भंग’ कर रहे थे।

तभी दिल्ली पुलिस की न्यायिक अभिरक्षा वाहिनी जेन-ज़ी को लादे हुए निकली। मोड़ पर वह जैसे ही धीमी हुई, जेन-ज़ी पुलिस बल को चकमा देकर कूद पड़े, तेज़ दौड़ लगाई और सटक गए। और तो और, पुलिस ने चहेटा तो प्रोटेस्ट के ‘बापू’ ने भी अपनी लाठी-वाठी फेंक दी। कछनी सँभाले बापू ने बस एक नज़र पीछे देखा। फिर ऐसी सरपट दौड़ लगाई, जैसे सेना की भर्ती हो रही हो... और छू-मंतर हो गए।

इस तरह वह जगह लीलाभूमि भी थी। आज का गांधी पूरी तैयारी के साथ आया था। उसका आप्तवाक्य था—“बल को छल से परास्त करना है, आँसुओं के जल से नहीं।”

जैसे-जैसे साँझ गहराई, पुलिस की मुस्तैदी बढ़ती गई। डेढ़ घंटे तक मैं लीलाभूमि पर टहलता रहा, लेकिन पुलिस के संज्ञान में नहीं आया। फिर दो-चार फ़ोटो खींचे और प्रोटेस्ट की तस्वीर स्टेटस पर लगाने की सोची ही थी कि ‘धर’ लिया गया।

लोकतंत्र में नागरिक तभी तक अदृश्य रहता है, जब तक वह सचमुच कुछ करने की न सोचे। भारी पुलिस बल के बीच से, बैरिकेड के पार, मुझे न्यायिक अभिरक्षा वाहिनी (बस) के पास हाज़िर किया गया। वहाँ डिटेंशन की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी हो रही थी। पहले चरण में दो जवान नीचे खड़े होकर जेन-ज़ी की पीठ सहलाते। दूसरे चरण में बस में बैठे जवानों के दो-चार धौल पड़ते। तीसरा चरण जवान के बूट-प्रहार से संपन्न होता और जेन-ज़ी वाहिनी के भीतर पहुँच जाते।

जब हाथ और लात के प्रहार थमे, तब पुलिस बल ने वाहिनी की बैरक में पानी की बोतलें बाँटी। हिंदी पढ़ने-लिखने और हिंदीभाषी होने के नाते यह मुहावरा बहुत सुना था, पर समझ में आज आया। इसी को कहते होंगे : ‘पानी पिला-पिलाकर मारना...’

इस तरह पहली बार भीतर से देखा कि ‘न्यायिक अभिरक्षा वाहिनी’ कैसी होती है। उसमें छह सीटों वाली सिटकनी-बंद बैरक थी और उसके बाहर एक लंबा गलियारा, जिसमें युवा भूसे की तरह भरे हुए थे। साँस लेना दूभर जान पड़ रहा था।

आख़िर में तीन औरतों को भरा गया। उनमें एक मुस्लिम महिला थीं। वह बोलीं, “मुझको छोड़ दो। मैं सदर बाज़ार आई थी, नेताओं को देखने इधर चली आई। मेरे छोटे-छोटे मासूम बच्चे हैं, मेरी राह देख रहे होंगे।”

पुलिस के जवान कुछ नहीं सुन रहे थे। वे ऊपर बताए गए तीनों चरण पूरे करने में लगे थे। यह सब देखकर मुस्लिम महिला ने कहा, “चिंता ना करो, मौला इंसाफ़ करेगा।”

जवान ने डपटा, “चुप बैठती है कि अभी इंसाफ़ करूँ...”

ऊपरवाले का इंसाफ़ देर से आता है, नीचेवाले का तुरंत।

उसी बैरक में एक आधुनिक युवती भी थीं। उनकी दो माँगें थीं। पहली, एसी चलवाया जाए। दूसरी, सिगरेट पीने की सुविधा दी जाए।

गेट बंद हुआ और वाहिनी चल पड़ी। क्रांतिवीरों ने खिड़कियों की जालियाँ और बैरक की सलाख़ें पीट-पीटकर जयघोष किया। रूपक बाँधकर कहूँ, तो वह जयघोष कुछ ऐसा था : “चलत बिमान कोलाहल होई। जय ‘जय भीम’ कहहिं सब कोई॥”

लात-घूँसे भूलकर, क्रांति की सारी योजनाएँ भूलकर, जेन-ज़ी की सिगरेट सुलग उठी और बैरक में धुआँ-धुआँ पसर गया। एसी की माँग अधूरी रही, लेकिन सिगरेट की माँग पूरी हो गई। क्रांति ने अपनी प्राथमिकता तय कर ली थी। उसके बाद कॉमरेडों ने फ़ोन निकाले और उनकी क्रांतियाँ रील्स में दर्ज हो गईं।

एक आख़िरी मोड़ अभी बाक़ी था।

वाहिनी सायरन बजाती हुई दिल्ली की ख़ाली सड़कों पर साँय-साँय भागी जा रही थी। तक़रीबन तीन-चार किलोमीटर बाद जेन-ज़ी ने वाहिनी का गेट खोल लिया। किसी मोड़ पर न चाहते हुए भी वाहिनी को ब्रेक लगाना पड़ा। धीमी गति के उन दस सेकंडों में कॉमरेड चकमा देकर कूद गए। बचे हुए आधे लोगों को ऐसा ही दस सेकंड का मौक़ा एक किलोमीटर बाद मिला और धौला कुआँ के पास शेष जेन-ज़ी भी कूद गए। मैं भी कूद गया। तब थोड़ा चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह वाला फ़ील आया। काकोरी कांड में वे भी अँग्रेज़ों को ऐसे ही चकमा देकर भाग निकले होंगे! सब साथियों ने एक-दूसरे को नई उमंग से देखा और हाथ मिलाए। ‘वंदे मातरम्’ और ‘इंक़लाब’ के नारे बुलंद हुए।

जेन-ज़ी की यह गुरिल्ला नीति अच्छी लगी। उस दिन समझ आया कि इस देश में क्रांति अब बस से उतरकर नहीं, बस से कूदकर आती है।

मैंने पीछे मुड़कर देखा तो दिल्ली पुलिस की अभिरक्षा वाहिनी ख़ाली-ख़ाली चली जा रही थी... हम एक ऐसे समय में हैं, जब असहमति को अपराध और प्रश्न को अवज्ञा मान लिया गया है। ऐसे में आंदोलन सिर्फ़ विरोध नहीं, लोकतंत्र की स्मृति को बचाए रखने का एक नागरिक अनुष्ठान है। शायद आंदोलन हमें यही सिखाता है कि अकेले होते हुए भी हम अकेले नहीं हैं और यह कि उम्मीद भी, अंततः, एक तरह का प्रतिरोध है।

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