पोस्ट-रेज़र सिविलाइज़ेशन : ‘ज़िलेट-मैन’ से ‘उस्तरा बियर्ड-मैन’
दीप्ति कुशवाह
28 नवम्बर 2025
ग़ौर कीजिए, जिन चेहरों पर अब तक चमकदार क्रीम का वादा था, वहीं अब ब्लैक सीरम की विज्ञापन-मुस्कान है। कभी शेविंग-किट का ‘ज़िलेट-मैन’ था, अब है ‘उस्तरा बियर्ड-मैन’। यह बदलाव सिर्फ़ फ़ैशन नहीं, फ़ेस की फिलॉसफ़ी है।
जूते, जींस, मोबाइल, बाइक... और अब दाढ़ी। युवा-स्टाइल की आधुनिक पंचलाइन में यह पाँचवाँ शब्द है और शायद सबसे मुखर। कभी यह आलस्य और लापरवाही की निशानी थी, अब स्टेटमेंट है—एटीट्यूड का, आइडेंटिटी का और कभी-कभी रेज़िस्टेंस का भी। आज का लड़का दाढ़ी रखता नहीं, उसे जीता है। वह कहता है, “मैं अपने समय का आदमी हूँ, अपने ढंग से।” युवा लाइफ़स्टाइल में फ़ैशन का काँटा अब दाढ़ी पर आकर टिकता है। पापा लोगों के टीन के मग और छोटे आइनों का युग बीत चुका है। अब यूथ शेविंग-रूटीन नहीं, इमेज-रूटीन फ़ॉलो करता है।
दाढ़ीदार लड़कों को कभी ‘ग़ैर-ज़िम्मेदार’ माना जाता और घरवालों से मिलवाने में झिझक होती थी। वे अब ‘मैच्योर’, ‘रियल’ और ‘ग्राउंडेड’ कहे जा रहे हैं।
बाज़ार ने इस मेटामॉर्फोसिस को सबसे पहले भाँपा। नाई की दुकान से लेकर ऑनलाइन कार्ट तक, हर जगह दाढ़ी की खेती लहलहा रही है। बियर्ड ऑयल, बियर्ड वैक्स, बियर्ड सीरम, बियर्ड कंडीशनर... चेहरे के इस छोटे-से भूखंड पर जितनी निवेश-संभावनाएँ हैं, उतनी शायद किसी स्टार्टअप के पिच-डेक में भी नहीं। आँकड़े कहते हैं कि पिछले पाँच वर्षों में दाढ़ी ट्रांसप्लांट कराने वालों की संख्या में पाँच गुना वृद्धि हुई है। ज़िलेट, उस्तरा, बियर्डो, बियर्ड क्लब, द मैन कंपनी, बायोएटम्स जैसी कंपनियाँ ‘रेज़र’ बेचने के बाद अब ‘रेज़र से मुक्ति’ बेच रही हैं। यह विडंबना ही आधुनिक अर्थव्यवस्था का सबसे चतुर चेहरा है, जहाँ ‘नो-शेव’ भी प्रोडक्ट है और ‘क्लीनशेव’ भी। और दोनों पर ऑफ़र चल रहा है।
दाढ़ी और युवा मानसिकता का यह नया गठबंधन दिलचस्प है। फ़िल्मों में अब नायक परिपूर्ण नहीं। वह जटिल है, चालाक है, अपूर्ण है और शायद इसी अपूर्णता में उसकी मानवता है। वही मनोविज्ञान अब युवाओं की आत्म-छवि में उतर आया है। साफ़-सुथरे लुक से अधिक आकर्षक है, थोड़ी बिखरी हुई ईमानदारी। दाढ़ी एक छोटे से विद्रोह की तरह है, डेली रूटीन के अनुशासन से असहमति का प्रतीक। जैसे कहना—“मैं पूरी तरह परफ़ेक्ट नहीं, पर रियल हूँ।”
दुनिया का हर ट्रेंड एक वाक्य कहता है। दाढ़ी का है—“मैं तय करूँगा कि मैं कैसा दिखूँ।” क्लीनशेव्ड चेहरा अब ‘कॉर्पोरेट चेहरा’ लगने लगा है। और दाढ़ी वाला? थोड़ा अनौपचारिक, थोड़ा बेपरवाह पर असरदार। जैसे कॉफ़ी विद कैफ़ीन नहीं, कॉन्फ़िडेंस।
पीछे पलटें तो दाढ़ी की कहानी समाज के चेहरे पर हर युग में लिखी गई है। कभी यह बुद्धिमत्ता और आध्यात्मिकता का प्रतीक रही, कभी फक्कड़पन और विद्रोह का। कबीर, सुकरात, वेदव्यास, गुरुनानक, टैगोर, ग़ालिब, अज्ञेय... इन सबके चेहरों पर बालों की यह परत मानो विचार की परत बनकर उगी थी। कभी यह ज्ञान का प्रतीक थी, फिर संन्यास का, फिर अस्वीकार का। अब यह ‘रीब्रांडेड रिबेल’ का प्रतीक है—जिसमें बुद्ध और बैंड दोनों साथ रहते हैं।
एक समय था जब किसी की दाढ़ी कटवाना अपमान था और दाढ़ी की कसम खाना सम्मान। आज यह ‘कसम’ फिर लौट आई है, बस रूप बदलकर, अब यह सेल्फ़ी-फ़िल्टर में है।
पर बिचारी दाढ़ी, फिर भी कुछ हद तक बदनसीब रही है। स्त्रियों की केशराशि पर अनगिन कविताएँ लिखी गईं, किंतु चेहरे के बालों के हिस्से में कविता कम आई। शायद चेहरे पर बालों का आच्छादन भावनाओं की भाषा को थोड़ा धुँधला कर देता है।
बाज़ार की आँख से देखें तो यह दाढ़ी नहीं, एक नया उपभोक्ता-चरित्र है। यू-ट्यूब पर हज़ारों ट्यूटोरियल्स बताते हैं कि दाढ़ी कैसे उगाई जाए, सँवारी जाए, रंगी जाए और फिर उस पर लाइक्स कैसे उगाए जाएँ। सैलून अब छोटे मंदिर हैं, जहाँ दाढ़ी की पूजा होती है; कभी ट्रिमर से, कभी कैमरे से। बुद्धू-बक्से पर भी दढ़ियल यंगस्टर्स छाए हुए हैं।
विज्ञान दाढ़ी की व्याख्या, मर्दानगी की निशानी कह कर नहीं करता, बल्कि हारमोन से यूँ जोड़ता है—टेस्टोस्टेरोन चेहरे पर बाल बढ़ाता है और सिर पर घटाता है। यानी दाढ़ी जितनी घनी, खोपड़ी उतनी खाली... विज्ञान भी कभी-कभी साला कविता जैसा हो जाता है।
फ़िल्मी दुनिया में क़रीनेदार दाढ़ी वाला हीरो अब ‘हॉट’ है, ‘क्यूट’ नहीं। आमिर की ‘गोटी’ की दीवानगी ‘क्वासी गोटी’ तक और बढ़ी। ‘देव डी’ में अभय देओल को देखकर कैंपसों में ‘स्क्र्फी’ की बहार आई। विराट की ‘फ़ुल बियर्ड’ और विकी कौशल की ‘स्टबल’ तक... हर चेहरे की घनी परछाईं एक नई पीढ़ी की पहचान बन गई है। केजीएफ़ वाले यश की ‘रॉ बियर्ड’ आध्यात्मिक जिद जैसी लगती है, रणवीर सिंह की ‘चिनस्ट्रैप’ अपने ढंग की आधुनिक अनुशासन-भंग... रेबेलियन अगेन्स्ट ऑर्डर। आम युवाओं की ‘मीडियम स्टबल’ शहर की थकान और फ़ैशन के बीच का तिरछा समझौता। चिक-चाकलेट युग ख़त्म हो चुका है; अब रोमांस भी थोड़ा रफ़ होना चाहता है।
एक होता है नो शेव नोवेम्बर
‘नो शेव नोवेम्बर’, जहाँ दाढ़ी सिर्फ़ फैशन नहीं, कैंसर-जागरूकता का प्रतीक बन जाती है। मैथ्यू हिल फाउंडेशन द्वारा 2009 में शुरू किया गया यह अभियान अब ग्लोबल फ़ेस्टिवल है। शिकागो, अमेरिका में मैथ्यू की मृत्यु कैंसर से 2007 में हुई। कीमोथेरेपी के कारण उनके पूरे बाल झड़ गए थे। लाखों पुरुष इस महीने रेज़र को विराम देकर दाढ़ी के बहाने संवेदना दर्शाते हैं।
सोशल मीडिया पर इसे ऐसी चर्चा मिली कि लोग चाहें कारण जानें, न जानें, नवंबर में शेव नहीं करते। बाद में दाढ़ी के साथ मूँछों को भी जोड़ कर इसे ‘नो शेव मोवेंबर’ कहा जाने लगा। अब स्त्रियाँ भी वैक्सिंग-थ्रेडिंग से पैसे बचाकर अभियान में शामिल होती हैं।
भारत में भी यह हर साल इंस्टाग्राम-हैशटैग का मौसम बन चुका है—#NoShaveNovember, #Movember, #BeardWithCause
इस एक महीने में बाल सौंदर्य नहीं, सरोकार बनते हैं। दाढ़ी यहाँ फ़ैशन नहीं, फिलान्थ्रॉपी है। चेहरे पर उगी एक ज़िम्मेदारी।
कुछ दिलचस्प दाढ़ी-तथ्य :
• ताश के पत्तों में हर बादशाह दाढ़ी वाला है, सिवाय दिल के राजा के।
• रूस के ज़ार पीटर ने दाढ़ी पर टैक्स लगाया था 1698।
• दाढ़ी के अध्ययन का नाम है—Pogonology जो सुनने में किसी यूनिवर्सिटी से ज़्यादा किसी स्पा जैसा लगता है।
• वैज्ञानिकों के अनुसार, दाढ़ी सूरज की 95% तक हानिकारक किरणों को रोक सकती है; यानी यह स्किन का सनस्क्रीन भी है और विचारों का स्क्रीन भी।
• इंस्टाग्राम पर #BeardGoals टैग के साथ 3 करोड़ से ज़्यादा पोस्ट हैं। दाढ़ी अब धर्म नहीं, डिजिटल ट्रेंड है।
• वर्ल्ड बियर्ड एंड मस्टैश असोसिएशन हर दो साल में ‘वर्ल्ड बियर्ड एंड मस्टैश चैंपियनशिप’ आयोजित करता है। दाढी-मूँछ की ओलंपिक।
तो इस तरह, जिस समय ने हमें क्लीनशेव्ड चेहरे पर सभ्यता की मुहर दी थी, अब वह ‘पोस्ट-रेज़र’ चरण में प्रवेश कर चुका है। अब आदर्श आदमी वह नहीं जो हर सुबह नियमपूर्वक शेव करता है, बल्कि वह है जो हर सुबह अपने भीतर के किसी ‘रेज़र’ से मुक्त हो जाता है... कभी नियमों से, कभी छवियों से।
बियर्ड अब फ़ैशन नहीं, एक विचार है। यह केवल चेहरे पर नहीं, मानसिकता पर उगती है।
यह उन चेहरों की कहानी है जो रफ़ रिफ्लेक्शन में पहचान बनाते हैं। आज की दाढ़ी में आध्यात्मिकता और स्टाइल, विरक्ति और वैभव, मौन और म्यूज़िक—सब साथ हैं। यही ‘पोस्ट-रेज़र सिविलाइज़ेशन’ है, जिसमें आदमी ध्यानस्थ भी है और इंस्टाग्राम पर सक्रिय भी।
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