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पत्र : दिल्ली के लिए : तुम पहले जैसी हो जाओ

प्यारी दिल्ली,

कैसी हो?

माफ़ करना महीनों बाद तुम्हें ख़त लिख रहा हूँ। आजकल ना चाहते हुए भी तुम्हारा नाम ज़बान पर आ जाता है। देश में क्या हो रहा है, यह तुमसे छिपा नहीं है; फिर भी संक्षेप में अगर तुम्हें बताऊँ तो कहना ग़लत ना होगा कि देश जल रहा है और केंद्र में होने के कारण सबसे ज़्यादा तपन तुम्हें महसूस हो रही होगी। हालात बहुत ख़राब हैं। मुझे मालूम है तुम यह सोच रही हो कि “मैंने इससे भी बदतर हालात देखे हैं”। तुम्हारे जितनी सहनशीलता और साहस मुझमें नहीं है, जिसका नतीजा है कि मैं डर गया हूँ और इसी डर के मारे तुम्हें यह ख़त लिख रहा हूँ।

देश में लगभग हर जगह आंदोलन चल रहे हैं। जनता अपने द्वारा चुनी गए सरकार और शासन व्यवस्था से इतनी नाराज़ है कि क्या बताऊँ! ऐसे में हमेशा की तरह तुम आकर्षण का केंद्र बनी हुई हो। तुम्हारे ही जंतर-मंतर पर न जाने कितने आंदोलन हुए जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। तुम इन सबकी इकलौती गवाह हो। इन दिनों बात कुछ बदल गई है। सरकार आंदोलनों से नहीं डरती, जो पहले हुआ करता था। सरकार डरती है जवाब देने से, सच्चाई को सुनने से, अपने ख़िलाफ़ उठ रही आवाज़ों से और सबसे ज़्यादा डर उसे इस बात का है कि अब लोगों ने डरना कम कर दिया है।

तुमने तो अब तक की सभी सरकारों और उनके शासन के तरीक़ों को देखा है। ख़ुद ही बताओ, कभी ऐसा हुआ कि निर्दोष जनता जो अपने मौलिक अधिकारों की माँग के लिए पुलिस की बर्बरता का शिकार हुई, बिना वर्दी के लोगों ने आंदोलन करने वालों को पीटा या औरतों के कपड़े फाड़े और उनका मज़ाक़ बनाया? तुम्हारी धरती की इतनी बुरी हालत कब हुई, यह बताना तुम्हारे लिए भी मुश्किल होगा। महाभारत के युद्ध में निहत्थों पर वार नहीं किया गया था, भले ही वो विपक्ष के हों, यहाँ तो विपक्ष का मामला ही नहीं है। विपक्ष और पक्ष तो सत्ता भोगने वालों के लिए है। जनता तो सरकार की है और सरकार जनता की, फिर ऐसा क्यों है कि बिना किसी गुनाह के गुनहगार करार दिया जा रहा है।

दिल्ली! वैसे तो देश का हर आदमी तुम्हें जानता है, तुम्हें देखने के सपने देखता है। तुम्हारी तरफ़ आने वाली सड़क उसे स्वर्ग का मार्ग प्रतीत होती है, लेकिन अब वह बात नहीं रही। मेरी माँ, जो मेरे तुम्हारे पास आने पर गर्व से फूले न समाती थी, हर रोज़ मुझे दो बार फ़ोन करके समझाती है—“जंतर-मंतर मत जाना।” भीतर से कुढ़ती भी है कि क्यों उसने मुझे तुम्हारे पास जाने दिया। उस नादान को डर है कि मैं भी किसी दिन पुलिस की बर्बरता का शिकार बन जाऊँगा। वह इसलिए ज़्यादा डरती है कि उसे पता है उसके पास इतने पैसे और पहुँच वाले लोग नहीं हैं जो मुझे पुलिस के हिरासत से छुड़ाने में मदद करेंगे। मेरी माँ की तरह और कितनी ही माँएँ हैं जो धीरे-धीरे तुमसे नफ़रत करने लगी हैं। दोष उनका नहीं है और ना ही तुम दोषी हो।

ख़ैर, जो भी हो तुम्हारे चाहने वालों की कमी ना पहले थी, ना बाद में होगी। लेकिन प्रेम की डोर में पड़ने वाली गाँठ कभी ख़त्म नहीं होती। मैं जानता हूँ तुम्हारा कलेजा दर्द के मारे फटा जा रहा है और तुम इतनी शक्तिशाली होकर भी कुछ न कर पाने के दुःख से बेचैन हो। धीरज मत खोना। तुमसे जितना प्यार मैं करता हूँ, काश दुनिया भी उतनी ही प्यारी होती।

दिल्ली! मैं चाहता हूँ तुम पहले जैसी हो जाओ। देखो, अक्टूबर में खिलने वाला हरसिंगार भी अपने यौवन पर इतरा रहा है। मुझसे अब रहा नहीं जाता। तुम भी इतराओ, तुम्हें एक बार जी भर कर देखना चाहता हूँ। तुम्हारे बेहद क़रीब रहना चाहता हूँ, करोड़ों एकड़ में फैली ज़मीन पर ओस की एक बूँद की तरह।

सदा तुम्हारा
आदित्य

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