पहले मेरी कामुकता क्षैतिज थी, अब वह ऊर्ध्वाधर है
सूज़न सॉन्टैग
24 जनवरी 2026
सूज़न सॉन्टैग की दिनांकित प्रविष्टियाँ जीवन का लेखा नहीं, एक सजग मन की अविराम पकड़ हैं—सूचियों, संकेतों, मनन के रूप में। बाहर जो व्यक्तित्व सुसंगत और स्थिर दीखता है, भीतर वह निरंतर स्वयं को गढ़ता है—एकाग्रता, संशोधन और अर्थ के उभार के उल्लास में। सांस्कृतिक विचार, यौनिक उत्साह और उग्र बौद्धिकता के संलयन के साथ ये पन्ने वर्ष 1958 के उत्तरार्द्ध से खुलने शुरू होते हैं, जब वह 26 की हो रही हैं, विवाह एक टूटन की कगार पर है और उसने ऑक्सफ़ोर्ड में बसने के ब-जाए पेरिस का रुख़ कर लिया है।
30 दिसंबर 1958
हैरिएट के साथ मेरा संबंध मुझे उलझन देता है। मैं चाहती हूँ कि यह सहज हो, बिना किसी पूर्व-योजना या आत्म-विश्लेषण के—लेकिन ‘अफ़ेयर’ आख़िर होता क्या है, इसे लेकर उसकी अपेक्षाओं की छाया मेरा संतुलन बिगाड़ देती है, मुझे असहज कर देती है। वह अपनी रोमांटिक असंतुष्टियों के साथ और मैं अपनी रोमांटिक ज़रूरतों और लालसाओं के साथ… एक अप्रत्याशित उपहार यह है कि वह सुंदर है। मुझे वह इस तरह याद रही थी कि वह सुंदर तो नहीं थी, बल्कि कुछ भद्दी और अनाकर्षक ही थी। वह वैसी बिल्कुल नहीं है। और शारीरिक सौंदर्य मेरे लिए अत्यंत—लगभग विकृत रूप से—महत्त्वपूर्ण है।
31 दिसंबर 1958
जर्नल (डायरी) को केवल निजी, गुप्त विचारों का दराज़ भर समझना सतही है—ऐसा जैसे वह कोई बहरा, गूँगा और अनपढ़ राज़दार हो। जर्नल में मैं सिर्फ़ स्वयं को अधिक खुलकर, किसी भी अन्य व्यक्ति के समक्ष खुल सकने से अधिक, व्यक्त ही नहीं करती; मैं स्वयं को गढ़ती हूँ।
जर्नल मेरे आत्मबोध का एक वाहन है। यह मुझे भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। इसलिए (अह!) यह केवल मेरे वास्तविक, दैनिक जीवन का रिकॉर्ड नहीं होता, बल्कि—कई मामलों में—उसका एक विकल्प भी बन जाता है। अक्सर किसी व्यक्ति के प्रति हमारे कृत्यों के अर्थ और जर्नल में उसके बारे में हम जो महसूस करते हैं, उनके बीच विरोधाभास होता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम जो करते हैं और हम स्वयं के समक्ष जो स्वीकार करते हैं, वही गहन होते हैं। स्वीकारोक्तियाँ—मैं सच्ची स्वीकारोक्तियों की बात कर रही हूँ—कभी-कभी कृत्यों से भी अधिक सतही हो सकती हैं। मैं अब उस बात के बारे में सोच रही हूँ जो मैंने आज अपने बारे में H. के जर्नल में पढ़ी (जब मैं उसके मेल चेक करने 122 Bd. St-G गई थी)—मेरे बारे में वह रूखा, अन्यायपूर्ण, निर्दय आकलन, जो इस निष्कर्ष पर समाप्त होता है कि उसे मैं वास्तव में पसंद नहीं हूँ, लेकिन उसके प्रति मेरा जुनून उसे स्वीकार्य और उपयुक्त लगता है। ईश्वर जानता है कि इससे पीड़ा होती है और मैं अपमानित और क्षुब्ध महसूस करती हूँ। हम शायद ही कभी जानते हैं कि लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं (या कहें कि सोचते हैं कि वे हमारे बारे में क्या सोचते हैं)… क्या मुझे ग्लानि है कि मैंने वह पढ़ा जिसे मेरे द्वारा पढ़े जाने की कोई मंशा रही नहीं होगी? नहीं। जर्नल या डायरी का एक मुख्य (सामाजिक) कार्य यही है कि उसे चुपके से दूसरे लोग पढ़ें—वे लोग (जैसे माता-पिता और प्रेमी) जिनके बारे में कोई व्यक्ति केवल जर्नल में ही निर्दय ईमानदारी से लिख पाता है। क्या H. कभी इसे पढ़ेगी?
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लिखना। नैतिक उपदेश देने या लोगों के नैतिक मानदंड को उच्च करने के इरादे से लिखना उसे भ्रष्ट करता है।
मुझे लेखक बनने से—एक अच्छा लेखक—कोई चीज़ नहीं रोकती, सिवाय आलस्य के।
लेखन क्यों महत्त्वपूर्ण है? मुख्य रूप से अहं की पुष्टि के लिए, ऐसा मुझे लगता है। क्योंकि मैं वह व्यक्तित्व बनना चाहती हूँ, एक लेखक, और इसलिए नहीं कि मेरे पास कहने को कुछ अनिवार्य है। फिर भी, क्यों नहीं दोनों ही?थोड़ी-सी अहं-निर्मिति—जैसे कि यह जर्नल जो fait accompli प्रदान करता है—के साथ मैं उस आत्मविश्वास तक पहुँच जाऊँगी कि मैं (अहं) कुछ ऐसा कहने लायक़ हूँ, जिसे कहा जाना चाहिए।
मेरा ‘मैं’ कमज़ोर, सतर्क, अत्यधिक विवेकवान है। अच्छे लेखक उन्मत्त अहंकारी होते हैं, मूर्खता की हद तक। विवेकवान लोग, आलोचक, उन्हें सुधारते हैं—लेकिन उनका यह विवेक स्वयं उस प्रतिभा की रचनात्मक मूर्खता पर ही तो आश्रित होता है।
2 जनवरी 1959, सुबह 7:30
अभागे तुच्छ अहं, आज क्या हाल रहा तुम्हारा? अच्छा तो नहीं, मुझे भय है—चोटिल, पीड़ित, आहत। शर्म की गर्म लहरें और शेष सब। मुझे कभी यह भ्रम नहीं रहा था कि वह मुझसे प्रेम करती है, लेकिन यह तो लगता था कि वह मुझे पसंद करती है।
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आज रात (पिछली रात!) पॉल के घर I reely wuz speeking French. For owers ’n owers, उसके साथ और उसके बेहद प्यारे माता-पिता के साथ। कितना मज़ा आया!!
19 फ़रवरी 1959
कल (देर दुपहर) मैं पेरिस की अपनी पहली कॉकटेल पार्टी में गई—ज्याँ वाल के घर—एलन ब्लूम की ख़राब संगत में। वाल [एक दार्शनिक] पूरी तरह मेरी अपेक्षाओं पर खरे उतरे—एक नन्हा दुबला चिड़िया-सा बूढ़ा आदमी, बिखरे सफ़ेद बाल और चौड़ा पतला मुँह; काफ़ी सुंदर, जैसे ज्याँ-लुई बारो (अभिनेता) 65 की उम्र में दिखेंगे, लेकिन बेहद असावधान और अस्त-व्यस्त। ढीला काला सूट, जिसके पीछले भाग में तीन बड़े छेद थे, जिनसे उनका (सफ़ेद) अंडरवियर दिख रहा था; और वह सीधे सोरबोन में क्लॉदेल पर दिए गए देर-दुपहर के व्याख्यान से यहाँ पहुँचे थे। उनके साथ उनकी लंबी, सुंदर, ट्यूनीशियाई पत्नी (गोल चेहरा और पीछे कसकर बंधे हुए काले बाल), उनसे आधी उम्र की, मेरे अनुमान से 35-40 की, और तीन या चार छोटे बच्चे। वहाँ जॉर्जियो दे सांतिलाना [विज्ञान-इतिहासकार] भी थे; दो जापानी कलाकार; फर की टोपियाँ पहने दुबली बूढ़ी महिलाएँ; Preuves (पत्रिका) से आया एक आदमी; बाल्थस की पेंटिंग्स से सीधे निकल कर आए हुए-से मध्यम क़द के बच्चे, मार्डी ग्रा की पोशाकों में; एक आदमी जो ज्याँ-पॉल सार्त्र जैसा दिखता था, बस उनसे भी बदसूरत, लँगड़ाता हुआ—और वह सचमुच ज्याँ-पॉल सार्त्र ही थे; और बहुत-से अन्य लोग, जिनके नाम मेरे लिए कोई अर्थ नहीं रखते थे। मैंने वाल से, दे सांतिलाना से और ब्लूम से (क्योंकि उससे बच नहीं सकती थी) बातें की। अपार्टमेंट—यह रू पेलतिये में है—अद्भुत है : दीवारें बच्चों और कलाकार मित्रों द्वारा बनाई गई रेखाओं, स्केचों और चित्रों से भरी हुई; गहरे नक़्क़ाशीदार उत्तर-अफ़्रीकी फ़र्नीचर, दस हज़ार किताबें, भारी टेबल क्लॉथ, फूल, पेंटिंग्स, खिलौने, फल—एक तरह की सुंदर अव्यवस्था, जैसा मुझे लगा।
12 मार्च 1959, अपराह्न 4:15
मैं बहुत बुरी हालत में हूँ। यहाँ आकर लिखने लगी हूँ; धीरे-धीरे लिखती हूँ और अपनी लिखावट को देखती हूँ, जो ठीक-ठाक लग रही है। मार्टी ग्रीनबर्ग (Commentary के संपादक) के साथ दो पैग वोदका मार्टिनी। सिर भारी लग रहा है। सिगरेट कड़वी लग रही है। टोनी और एक भावहीन चेहरे वाला आदमी (माइक हैरिंगटन) स्टैनफोर्ड–बिने परीक्षणों के बारे में बात कर रहे हैं। क्लाइस्ट अद्भुत है। नीत्शे, नीत्शे।
अक्टूबर 1959 के किसी दिन
I’m not pious, but co-pious.
(यह एक शब्द-खेल है। सॉन्टैग ने ‘co-pious’ कहकर copious को तोड़ा है—वह धर्मनिष्ठ नहीं, बल्कि अतिरेक में जीने वाली स्त्री है।)
19 नवंबर 1959
ऑर्गैज़्म के आगत ने मेरी ज़िंदगी बदल दी है। मैं मुक्त हुई हूँ, लेकिन इसे इसी तरह कहना ठीक नहीं होगा। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि इसने मुझे सीमित किया है, इसने कई संभावनाओं के द्वार बंद कर दिए हैं, विकल्पों को स्पष्ट और तीक्ष्ण बना दिया है। अब मैं असीम नहीं रही, जो शून्यता थी।
कामुकता ही प्रतिमान है। पहले मेरी कामुकता क्षैतिज थी, एक अनंत रेखा, जिसे अनंत रूप से विभाजित किया जा सकता था। अब वह ऊर्ध्वाधर है; या तो ऊपर और पार या कुछ भी नहीं।
…
ऑर्गैज़्म ध्यान को संकेंद्रित करता है। मेरे अंदर लिखने की तीव्र कामना उत्पन्न होती है। ऑर्गैज़्म का आना मुक्ति नहीं है, बल्कि उससे भी अधिक—मेरे अहं का जन्म है। जब तक मैं अपना अहं नहीं खोज लेती, मैं लिख नहीं सकती। मैं केवल उसी तरह की लेखक हो सकती हूँ जो स्वयं को अनावृत करे… लिखना ख़ुद को ख़र्च करना है, ख़ुद को दाँव पर लगाना है। लेकिन अब तक मुझे अपने ही नाम की ध्वनि भी पसंद नहीं थी। लिखने के लिए मुझे अपने नाम से प्रेम करना होगा। लेखक स्वयं से प्रेम करता है… और उसी मुलाक़ात और उसी हिंसा से अपनी किताबें रचता है।
20 नवंबर 1959, सुबह 3 बजे
मैंने कभी किसी से उतनी चाह नहीं रखी, जितनी I (rene Fornés) से रखती हूँ। मैं उससे मिलने वाले हर व्यक्ति से ईर्ष्या करती हूँ, जब-जब वह मुझसे दूर जाती है हर पल मुझे पीड़ा होती है। लेकिन तब नहीं, जब मैं उसे छोड़कर जाती हूँ और जानती हूँ कि वह यहीं है। मेरा प्रेम उसे पूरी तरह अपने में समा लेना चाहता है, उसे खा जाना चाहता है। मेरा प्रेम स्वार्थी है।
…
आज रात वह अपने कार्यस्थल से सीधे इनेज़ से मिलने सैन रेमो चली गई। वहाँ ऐन मॉरिसेट [पत्रकार और नाटककार] भी थीं। बाद में वे सीडर बार गए। वह 12 बजे घर लौटी जब मैं सो रही थी… वह बिस्तर पर आई, शाम की बातचीत के बारे में बताया, 2 बजे लाइट बुझाने को कहा और सो गई। मैं जड़ हो गई थी—मूक, आँसुओं से भरी हुई। मैं सिगरेट पीती रही, वह सोती रही।
24 दिसंबर 1959
लिखने की मेरी इच्छा मेरी समलैंगिकता से जुड़ी है। मुझे पहचान एक हथियार की तरह चाहिए—उस हथियार के मुक़ाबले में जो समाज मेरे ख़िलाफ़ रखता है।
यह मेरी समलैंगिकता को उचित नहीं ठहराता। लेकिन यह मुझे—मुझे ऐसा लगता है—एक लाइसेंस देता।
अब मुझे यह एहसास होने लगा है कि ‘क्वियर’ होने को लेकर मैं कितना अपराधबोध महसूस करती हूँ। जब H. के साथ थी, मुझे लगा था कि यह बात मुझे परेशान नहीं करती, लेकिन मैं स्वयं से झूठ बोल रही थी। मैंने दूसरों (जैसे एनेट मिशेलसन) को यह मानने दिया कि यह H. है जो मेरा गुनाह है और उसके अतिरिक्त मैं कहीं क्वियर नहीं होती या कम से कम प्रकटतः यही नहीं होती।
क्वियर होना मुझे अधिक असुरक्षित महसूस कराता है।
28 दिसंबर 1959
अब तक मुझे लगता रहा था कि जिन लोगों को मैं गहराई से जान सकती हूँ या सच में प्रेम कर सकती हूँ, वे मेरे ही अभागे स्व का प्रतिरूप या संस्करण होते हैं। (मेरी बौद्धिक और यौन भावनाएँ हमेशा अनाचार-सदृश रही हैं।) अब मैं ऐसे व्यक्ति को जानती और प्रेम करती हूँ जो मेरे जैसा नहीं है—उदाहरण के लिए, वह यहूदी नहीं है, न्यूयॉर्क-टाइप बुद्धिजीवी नहीं है—और इसके बावजूद अंतरंगता में कोई कमी नहीं है। मैं हमेशा I. के परायापन-बोध से अवगत रहती हूँ, एक साझा पृष्ठभूमि के अभाव से—और इसे मैं एक व्यापक मुक्तिकारी अनुभव की तरह महसूस करती हूँ।
1960, तिथिरहित मुख-पृष्ठ
Cogito ergo est
फ़रवरी 1961
मैंने कितनी बार लोगों से कहा है कि पर्ल काज़िन डिलन थॉमस की एक प्रमुख प्रेमिका रही थी? कि नॉर्मन मेलर उन्मुक्त यौन क्रीड़ाएँ करता है? कि मैथीसन क्वियर था? सब कुछ सार्वजनिक रूप से ज्ञात है, लेकिन मैं कौन होती हूँ दूसरों की यौन आदतों का ढिंढोरा पीटने वाली?
मैंने ख़ुद को इसके लिए कितनी बार धिक्कारा है, जो मेरे नाम उछालने की आदत से बस थोड़ा-सा कम आपत्तिजनक है (पिछले साल Commentary में काम करते हुए मैंने कितनी बार ऐलन गिन्सबर्ग का ज़िक्र किया?) और लोगों की आलोचना करने की मेरी आदत से भी जब दूसरे लोग इसे उकसाते हैं… मैंने हमेशा लोगों को एक-दूसरे के सामने धोखा दिया है। कोई आश्चर्य नहीं कि ‘मित्र’ शब्द के इस्तेमाल में मैं इतनी उच्च नैतिक और कठोर रही हूँ!
8 मार्च 1961 की दुपहर
वाया बेंज़ेड्रिन, आइरीन का लगातार भीतर तक रिसता हुआ प्रभाव; डॉ. पुरुषोत्तम [हिंदू विद्वान] पिछले हफ़्ते; आज सुबह स्पिनोज़ा की एथिक्स पर व्याख्यान; कांट पर सुदीर्घ मनन, जो अक्टूबर में शुरू हुआ; और ‘दि ट्रुथ दैट’ और ‘दि ट्रुथ अबाउट’ के अंतर पर बीते कल का चिंतन।
कोई स्थिरता नहीं है। ठहरना सत्य से गिरना है; जैसे ही कोई थामकर रखने की कोशिश करता है, आंतरिक जीवन मद्धिम पड़ने लगता है, झिलमिलाने लगता है, बुझने लगता है… यह वैसा ही है जैसे इस साँस से अगली साँस का काम लेना चाहें, या आज के खाने से अगले बुधवार की ज़रूरत पूरी करना चाहें… सत्य समय के तीर पर सवार होकर चलता है।
8 अगस्त 1961, सोमवार की सुबह
मुझे I. की लिखने में मदद करनी चाहिए। और अगर मैं भी लिखने लगूँ तो बस बैठे रहने और उसे घूरते रहने और उससे फिर से मुझसे प्रेम करने की भीख माँगते रहने की निरर्थकता समाप्त हो जाएगी।
…
तब प्रेम करना दुख देता है। यह ऐसा है जैसे तुम स्वयं को उधेड़े जाने के लिए सौंप दो और यह जानते हुए कि किसी भी क्षण वह दूसरा व्यक्ति तुम्हारी खाल लेकर बस चला जा सकता है।
14 अगस्त 1961
मुझे थके होने पर
प्रेम करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
मुझे हमेशा पता होना चाहिए
कि मैं थकी हुई हूँ। लेकिन मुझे पता नहीं होता।
मैं स्वयं से झूठ बोलती हूँ।
मैं अपनी सच्ची भावनाओं को नहीं जानती।
(फिर भी?!)
3 दिसंबर 1961
भावनाओं के ‘मृत ठिकानों’ के प्रति सजग होना—कुछ भी महसूस किए बिना बोलना।
(यह कुछ भी जाने बिना बोलने के मेरे पुराने आत्म-विकर्षण से बिल्कुल अलग है)
लेखक को चार व्यक्ति होना चाहिए :
1) विक्षिप्त, जुनूनी
2) मूर्ख
3) शिल्पी
4) आलोचक
1 सामग्री देता है
2 उसे बाहर आने देता है
3 स्वाद है
4 प्रज्ञा है
एक महान् लेखक में ये चारों होते हैं—लेकिन केवल 1) और 2) के साथ भी आप एक अच्छे लेखक हो सकते हैं; वे ही सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
9 दिसंबर 1961
वृद्ध होने का भय इस बात की स्वीकृति से जन्म लेता है कि हम इस समय वह जीवन नहीं जी रहे, जो हम जीना चाहते हैं। यह वर्तमान के दुरुपयोग की अनुभूति के समान है।
तिथिरहित प्रविष्टि
मैरी मैकार्थी की मुस्कान—सफ़ेद बाल—लो-फ़ैशन लाल-नीला प्रिंट सूट। क्लबवुमन गॉसिप। शी इज़ द ग्रुप। वह अपने पति के प्रति सदाशय है।
…
मैं लिखता हूँ ताकि स्वयं को परिभाषित कर सकूँ—आत्म-सृजन का एक कृत्य—‘होने’ की प्रक्रिया का अंग—स्वयं से संवाद में, उन जीवित एवं मृत लेखकों से संवाद में जिनकी मैं प्रशंसा करता हूँ, और आदर्श पाठकों से संवाद में। क्योंकि इससे मुझे आनंद मिलता है (एक “गतिविधि” के रूप में)।
मुझे निश्चित रूप से नहीं ज्ञात कि मेरे कार्य का उद्देश्य क्या है।
व्यक्तिगत मुक्ति —रिल्के की “Letters to a Young Poet” से
8 नवंबर 1965
ग्रेटा गार्बो के “प्राइवेट पोटैटो पैच” के लगभग दो-तिहाई हिस्से से गुज़रते मैं गार्बो बनना चाहती थी (मैंने उसे पढ़ा-परखा; मैं उसे आत्मसात करना चाहती थी, उसके हाव-भाव सीखना चाहती थी, जैसा वह महसूस करती थी वैसा महसूस करना चाहती थी)—फिर, अंत की ओर, मैं उसकी चाह करने लगी, उसके बारे में कामुक रूप से सोचने लगी, उसे अपने अधिकार में लेने की इच्छा करने लगी। देखने के अंत के निकट तक पहुँचते प्रशंसा के स्थान पर मेरी लालसा आ गई। क्या यह मेरी समलैंगिकता का अनुक्रम है?
1 जून 1966
मेरी सबसे प्रबल और सबसे अधिक प्रयुक्त भावनाओं में से एक है : अवमानना।
दूसरों के प्रति अवमानना, स्वयं के प्रति अवमानना।
…
मैं उन लोगों के प्रति धैर्यहीन (और तिरस्कारपूर्ण) हूँ जो स्वयं की रक्षा करना नहीं जानते, अपने लिए खड़े होना नहीं जानते।
मेरा मन = किंग कॉन्ग। आक्रामक, लोगों को चीर-फाड़ देने तो आतुर। मैं उसे प्रायः बंद करके रखती हूँ—और अपने नाख़ून कुतरती रहती हूँ।
वर्ष 1966 के उत्तरार्द्ध के किसी दिन
आज रात जो [चाइक़िन] ने मुझसे पूछा कि जब मैं किसी लिखी जा रही चीज़ में—मान लो तीन-चौथाई भाग तक पहुँचकर—यह पाती हूँ कि यह औसत या घटिया है तो मुझे कैसा लगता है। मैंने जवाब दिया कि मुझे अच्छा लगता है और मैं अंत तक बढ़ती जाती हूँ। मैं अपने भीतर की औसतता को बाहर निकाल रही होती हूँ (मेरे लेखन की मेरी मल-संबंधी छवि)। वह वहाँ है।
मैं उससे छुटकारा पाना चाहती हूँ। मैं उसे केवल इच्छा के एक कृत्य से नकार नहीं सकती। (या नकार सकती हूँ?) मैं केवल उसे उसकी आवाज़ सौंप सकती हूँ, उसे ‘बाहर’ निकाल सकती हूँ। फिर मैं कुछ और कर सकती हूँ।
कम-से-कम यह निश्चित है कि उस पुनरावृत्ति की ज़रूरत फिर मुझे नहीं पड़ेगी।
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रीबॉर्न: जर्नल्स एंड नोटबुक्स, 1947–1963 से चयनित एक अंश | अनुवाद : शायक आलोक
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