नई पदचापों की पहचान : ‘तीन कवि तीन किताबें’
ममता जयंत
22 अप्रैल 2026
11 अप्रैल को दिल्ली के सुरजीत भवन में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी ‘तीन कवि तीन किताबें’ केवल एक सामान्य पुस्तक-परिचर्चा नहीं थी, बल्कि समकालीन हिंदी कविता की नई आवाज़ों, उनके सरोकारों और समय की बेचैनियों को समझने का एक गंभीर अवसर थी। इस आयोजन में दिल्ली और आस-पास के अनेक साहित्यकारों, आलोचकों और कवियों ने भाग लेकर कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की। संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखिक और साहित्य अकादेमी सम्मान से सम्मानित ममता कालिया ने की। मुख्य वक्ताओं में कवि सविता सिंह, आलोचक आशुतोष, पत्रकार-साहित्यकार प्रियदर्शन और चिंतक-साहित्यकार अनीता भारती शामिल रहीं। संचालन कवि अनुपम सिंह ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत श्रीलाल बौद्ध ने अतिथियों के स्वागत और परिचय से की।
आयोजन का विषय कवियों और उनकी कृतियों पर केंद्रित था, इसलिए कविता का होना स्वाभाविक था। लेकिन आयोजन केवल कविता-पाठ तक सीमित नहीं रहा; यहाँ आलोचना, संवाद, वैचारिक बहस और सामाजिक सरोकारों की उपस्थिति भी दिखाई दी।
इस संगोष्ठी के केंद्र में तीन नई पीढ़ी के कवि थे—आलोक मिश्र, जावेद आलम और अशोक कुमार।
आलोक मिश्र की काव्य-कृति ‘पोटली के दाने’ प्रेम, मनुष्यता और जीवन के छोटे-बड़े अनुभवों के रंगों से भरी हुई है। उनकी कविताओं में प्रेम केवल रोमानी अनुभव नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदना और मानवीय रिश्तों का विस्तार है। शिक्षक होने के कारण बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ भी उनकी कविताओं में दिखाई देती है।
दूसरे कवि जावेद आलम का संग्रह ‘सलीब पर नागरिकता’ हमारे समय के सबसे कठिन प्रश्नों—नागरिकता, अल्पसंख्यकों की स्थिति, अन्याय और प्रतिरोध को केंद्र में रखता है। उनकी कविताएँ समय की तल्ख़ सच्चाइयों को दर्ज करती हैं। उनमें हल्का आक्रोश है, जो आज के सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ को देखते हुए आवश्यक और न्यायसंगत प्रतीत होता है। अनीता भारती ने इसे दलित चिंता और अल्पसंख्यक पीड़ा के साझा धरातल पर देखा। उन्होंने कहा कि आज व्यक्ति अपने कर्म से नहीं, बल्कि नाम, धर्म और जाति से पहचाना जा रहा है—यही त्रासदी जावेद आलम की कविताओं का मूल स्वर है।
तीसरे कवि अशोक कुमार की कविताएँ पहाड़, विस्थापन, स्मृति और रिक्तियों की कविताएँ हैं। उनके संग्रह में पहाड़ केवल भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि संवेदना, संघर्ष और अस्तित्व का प्रतीक बनकर उपस्थित है। अनीता भारती ने उनकी कविताओं को कथाकार संजीव की कहानी ‘आरोहण’ से जोड़ते हुए कहा कि अशोक की कविताएँ पहाड़ों की पीड़ा के साथ-साथ पूरे देश की आवाज़ बन जाती हैं। विशेष रूप से ‘पहाड़ की औरतें’ जैसी कविताएँ स्त्री, श्रम और संघर्ष की गहरी तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।
प्रियदर्शन ने तीनों कवियों की भाषा और शिल्प पर बात करते हुए कहा कि भले ही उनकी भाषाएँ अलग हों, लेकिन उनके सरोकार एक हैं। उन्होंने जावेद आलम की कविताओं में अल्पसंख्यक आवाज़ की तीव्र उपस्थिति को रेखांकित किया। उनकी कविता ‘अनागरिकता’ की पंक्ति—‘मिट्टी से मिट्टी को अलग कैसे करोगे सरकार?’—को उन्होंने पूरे संग्रह का सार बताया। यह पंक्ति केवल कविता नहीं, व्यवस्था पर तीखा प्रश्न है।
आलोक मिश्र पर बोलते हुए प्रियदर्शन ने कहा कि उनकी प्रेम कविताएँ पारंपरिक प्रेम कविता से आगे जाती हैं। वह प्रेम के विविध रूपों को सामने लाती हैं। ‘बहिर्गमन’, ‘मेरी बेटियाँ’ और ‘अपने लिखने पर शक’ जैसी कविताओं में संवेदना और वैचारिक गहराई दिखाई देती है। उन्होंने यह भी कहा कि आलोक की कविताएँ प्रेम को सामाजिक यथार्थ से अलग नहीं करतीं।
अशोक कुमार को प्रियदर्शन ने ‘नई तरह का कवि’ कहा। उनकी कविताओं में आया भय, संघर्ष और वामपंथी चेतना आज के समय में प्रासंगिक है। ‘डर’ और ‘डरा हुआ आदमी’ जैसी कविताएँ व्यक्ति और समाज के भीतर फैलते असुरक्षा-बोध को सामने लाती हैं।
आलोचक आशुतोष ने कहा कि आज के कवियों की तुलना पुराने कवियों से करना उचित नहीं है, क्योंकि समय बदल चुका है। उन्होंने कहा कि आज कविता में भीड़ केवल दर्शक नहीं, बल्कि कविता का हिस्सा बन चुकी है। आज का दौर महाकवियों का नहीं, बल्कि अनेक छोटे-बड़े संघर्षों का दौर है। इस समय सैकड़ों कवि और कविताएँ मिलकर हमारे समय का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उनके अनुसार आलोक, अशोक और जावेद अपने समय के प्रतिनिधि कवि हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जावेद की कविताओं में नए बिंब हैं, जो समय की नई सच्चाइयों को सामने लाते हैं। अशोक कुमार की ‘डरा हुआ आदमी’ और आलोक मिश्र की ‘मैं चाहता हूँ कि तुम पहचानो मुझे/ भीड़ में किसी मुसलमान की तरह’ जैसी पंक्तियाँ वर्तमान समाज के भय, भेदभाव और पहचान के संकट को उजागर करती हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इन कविताओं में गांधी की उपस्थिति है, तो वह इसलिए स्वाभाविक है क्योंकि आज के समय में सावरकर और गोडसे का महिमामंडन बढ़ रहा है।
कार्यक्रम की अंतिम वक्ता सविता सिंह ने तीनों कवियों की प्रशंसा करते हुए भी आलोचना को आवश्यक माना। उन्होंने कहा कि केवल नारा कविता नहीं होता; कविता को अपनी विशिष्ट भाषा और गहराई चाहिए। उन्होंने जावेद आलम की कविताओं में घबराहट और भय को पहचाना, लेकिन साथ ही कहा कि कविता को आश्वस्त भी करना चाहिए। आलोक मिश्र और अशोक कुमार की कविताओं में स्त्री की उपस्थिति पर उन्होंने स्त्रीवादी दृष्टि से सवाल उठाए और कहा कि केवल स्त्रियों को कविता में जगह देने से मुक्ति संभव नहीं; वास्तविक परिवर्तन के लिए गहरी सामाजिक लड़ाई ज़रूरी है।
अध्यक्षीय वक्तव्य में ममता कालिया ने इस संगोष्ठी को अत्यंत सफल और जीवंत बताया। उन्होंने कहा कि अक्सर साहित्यिक गोष्ठियाँ बोझिल हो जाती हैं, लेकिन इस कार्यक्रम में संवाद, ऊर्जा और उल्लास था। उन्होंने कहा कि अब कविता केवल कवि तक सीमित नहीं रह गई; उसमें संप्रेषण और सादगी है, इसलिए वह आम जन तक पहुँच रही है। उन्होंने विशेष रूप से जावेद आलम की कविताओं के जोखिमपूर्ण प्रश्नों की सराहना की और कहा कि जोखिम उठाने का नाम ही कविता है।
ममता कालिया ने यह भी कहा कि कविता हर दशक में अपना नया मुहावरा खोजती है। यह कहना ग़लत है कि कविता किसी एक युग या कवि के साथ समाप्त हो गई। आज भी नए कवि अपने समय की भाषा और स्वर गढ़ रहे हैं। आलोक, अशोक और जावेद उसी नई पदचाप के कवि हैं।
अंत में अर्चना लार्क, रचित और गिरिजेश यादव द्वारा तीनों कवियों की कविताओं का प्रभावशाली काव्य-पाठ हुआ, जिसने पूरे सभागार को गहरी संवेदना से भर दिया। धन्यवाद ज्ञापन स्मिता सिन्हा ने किया। यह संगोष्ठी केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि समय की नई पदचापों को पहचानने और उन्हें सुनने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर थी। यह सचमुच एक यादगार दिन था, जो स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहेगा।
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