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नयी चाल की हिन्दी

28, 29 और 30 जुलाई 2026 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में एक अलहदा संगोष्ठी हुई—‘नयी चाल की हिन्दी’। यह संगोष्ठी हिन्दी विभाग की जानी-पहचानी और अधिकांशतः उबाऊ संगोष्ठियों से अलग और काफ़ी बेहतर रही। मौक़ा था नामवर सिंह की जन्मशती का और स्थान था महामना सभागार, अंतर-सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। इस कार्यक्रम में मैंने कुछ सत्र सुने और कुछ बेतरतीब नोट्स लेने की भरसक कोशिश की। इसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं, पर यहाँ मैं अपने निकम्मेपन को छिपाते हुए कहूँगा कि व्याख्यान सुनने के लिए होते हैं; ज़्यादा ज़रूरी लगे तो रिकॉर्ड करने के लिए होते हैं, लिखने के लिए नहीं।

यहाँ मैं उन्हीं आधे-अधूरे पन्नों और स्मृति के सहारे अपना अनुभव रखने की कोशिश करूँगा। सबसे पहले कार्यक्रम के शीर्षक पर आता हूँ। ‘नयी चाल की हिन्दी’ को मैं पहले ‘नयी वाली हिन्दी’ समझ रहा था—मुसाफ़िरों के नए ठिकाने, यानी कैफ़े वाली हिन्दी, जिसमें लोग यह तक कह जाते हैं कि मुझे प्रेमचंद की कविताएँ बहुत पसंद हैं। 

बहरहाल! पहले दिन का सत्र न सुन पाने का दुख और दूसरे दिन के सत्रों की उत्सुकता के साथ मैं सभागार पहुँचा। दुख लिख रहा हूँ तो इसे वास्तविक दुख ही माना जाए, क्योंकि पहले दिन पुरुषोत्तम अग्रवाल बोल रहे थे और आज तक उन्हें सामने से न सुन पाने का दुख है।

दूसरे दिन, 29 जुलाई को पहला सत्र देवेंद्र शर्मा का था। उन्होंने ‘सांगीत’ शब्द में निहित अलग-अलग अर्थों—स्वाँग, भगत, नौटंकी, ख़याल आदि—के बारे में बताया और यह भी कि कैसे उत्तर भारत में ‘नौटंकी’ शब्द सभी प्रकार के सांगीतों के लिए रूढ़ हो गया। पूरे वक्तव्य में उन्होंने एक ज़रूरी वाक्य कहा—“19th सदी की शुरुआत में सबसे अधिक प्रकाशन सांगीत का हुआ।”

यह एक वाक्य शास्त्र बनाम लोक की बहस को और भी पेचीदा करता है। चूँकि उन्नीसवीं सदी में प्रकाशन समृद्धि और नगरीय सभ्यता का प्रतीक था, इसलिए सांगीत को ग्रामीण या पारंपरिक अर्थ में केवल ‘folk’ मान लेना अंतिम सत्य नहीं हो सकता। इसी बिंदु से हिन्दी साहित्य में होने वाले शोध पर भी कुछ कहने का मन होता है। आकृति मधवानी की किताब Everyday Reading: Middlebrow Magazines and Book Publishing in Post-Independence India इस बात पर केंद्रित है कि हिन्दीभाषी मध्यवर्ग अपने रोज़मर्रा के पाठन में अलग-अलग अभिरुचियों को कैसे शामिल कर रहा था। देवेन्द्र शर्मा भी अपने वक्तव्य में कुछ ऐसा ही संकेत कर रहे थे कि हिन्दी में प्रकाशन की शुरुआती अभिरुचि किस वर्ग, वर्ण और लिंग की तरफ उन्मुख थी। लेकिन आज हिन्दी विभागों में इन विषयों पर शोध क्यों नहीं कराए जा रहे?

आज जब अकादमिया में हर तरफ़ अंतर-अनुशासनात्मक ज्ञान के महत्त्व की चर्चा है, तब भी हिन्दी विभागों के शोध में दो कथाकारों या दो कवियों का ग़ैरज़रूरी तुलनात्मक अध्ययन हो रहा है या लेखकों की अलग-अलग तरह की चेतना खोजी जा रही है—क्लीशे! 

हिन्दी विभाग में आज तक अधिकांश विश्वविद्यालयों में eco-feminism या eco-criticism का एक पेपर तक एमए की कक्षाओं में नहीं पढ़ाया जा रहा, जबकि साहित्यिक आलोचना की दुनिया में ये शब्द और ऐसे कई दूसरे शब्द बहुत पहले आ चुके हैं। इन ज्ञान-गंभीर बातों के अतिरिक्त देवेंद्र शर्मा ने सुल्ताना डाकू नौटंकी के एक अंश की प्रस्तुति भी की। व्याख्यान के भीतर इस तरह प्रदर्शन का आ जाना, इस कार्यक्रम की उन चीज़ों में से था जो इसे सामान्य विभागीय संगोष्ठी से अलग करती थीं।

इसके बाद आभा गुप्ता ठाकुर जी का व्याख्यान था। उन्होंने हिन्दी नाटकों के संदर्भ में लोकप्रिय साहित्य की बात की। यहाँ मामला सांगीत से हटकर संगीत पर आ गया, जिसे उन्होंने लोक साहित्य और लोकप्रिय साहित्य के बीच उभयनिष्ठ बिंदु माना। उन्होंने संगीत को मनोरंजन से जोड़ते हुए बताया कि कैसे उपनिवेश की संस्कृति ने भारत के प्राचीन नगरों से बिल्कुल अलग तरह का शहरीकरण किया, जहाँ मनोरंजन एक व्यवसाय का माध्यम बन गया—राज्य संरक्षण की पुरानी परंपराओं के बिल्कुल विपरीत। इस बात की पुष्टि उन्होंने एक दिलचस्प उदाहरण से की—“वीर अभिमन्यु लिखने वाले नाटककार को सन् 1913 में 300 रुपए मिले थे।” अंत में उन्होंने लगभग सूक्तिवाक्य की तरह कहा—“जो मनोरंजन शैली अपने दर्शक खो देती है, वह कला बन जाती है।” 

हिन्दी विभाग के कार्यक्रमों में समय की कमी पड़ जाना एक भीषण समस्या है और यह समस्या यहाँ भी रही। हालाँकि इस सत्र में समस्या वक्ताओं के ज़्यादा समय लेने से नहीं, बल्कि विद्वानों की सभा और हम जैसे आकुल विद्यार्थियों की गुज़ारिश पर देवेंद्र जी की प्रस्तुति को थोड़ा और खींच देने से हुई।

अगला वक्तव्य अमितेश कुमार का था, जो हम जैसे छात्रों के बीच बिना भाव-भंगिमा और नांदीपाठ के बात को रखने और समय बचाने के लिए विख्यात (?) हैं। उनका विषय था—‘हिन्दी में लोकप्रिय साहित्य के विभिन्न रूप, पाठक और बाज़ार।’ भारी-भरकम दिखाई देने वाले इस विषय में उन्होंने बताया कि हिन्दी का लोकप्रिय साहित्य, मुख्यतः लुगदी उपन्यास, जिसकी पूर्वपीठिका देवकीनंदन खत्री और गोपालराम गहमरी ने तैयार की थी, बाज़ार की माँग और आपूर्ति के झूले में कैसे अटक गया और उस माँग को पूरा करने के लिए भाड़े के लेखक यानी ghost writers जुटाए जाने लगे। बाज़ार बढ़ाने के लिए पॉकेट बुक्स के प्रकाशक कॉमिक्स प्रकाशन की तरफ़ आए और उन्होंने डॉ. नागराज, डोगा जैसे कॉमिक सुपरहीरो रचे।

लुगदी उपन्यास की बहस में अमितेश ने एक महत्त्वपूर्ण बात जोड़ी कि इन्हीं उपन्यासों ने हिन्दी के अधिकांश पाठकों में पढ़ने की अभिवृत्ति विकसित की। उनके शब्दों में, “अगर ‘चंद्रकांता’ और ‘चंद्रकांता संतति’ जैसे उपन्यास न लिखे गए होते, जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें पढ़ने के लिए लोगों ने हिन्दी सीखी, तब प्रेमचंद साहित्यिक कसौटियों पर खरा साहित्य न लिख पाते।”

इसके बाद रविकांत का व्याख्यान था, जो इस समय CSDS में कार्यरत हैं। उनका विषय था—‘फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी : हिंग्लिशतानी।’ सिनेमा के बारे में उन्होंने कहा कि सिनेमा एक ढंग का आर्काइव है, किसी भी वस्तु के बदलते स्वरूप को पढ़ने-समझने का। इसी कथन को वह हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाए जाने के संबंध में चल रही बहस और उसके इतिहास को फ़िल्मों के हवाले से समझने के लिए इस्तेमाल करते हैं। नेहरूवादी परिवार को केंद्र में रखकर बनी फ़िल्म ‘तीन बत्ती चार रास्ता’ (1953), जिसका निर्देशन व्ही. शांताराम ने किया था के एक दृश्य के माध्यम से उन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि नेहरू के विचार में सभी भाषाओं के प्रति सम्मान का भाव होते हुए भी व्यावहारिकता में हिन्दी की तरफ़ झुकाव था। इसके बाद उन्होंने सत्तर के दशक की ‘साधु और शैतान’  की बात की, जिसमें भाषा एक कॉस्मोपॉलिटन ढंग से अपनाई जा रही थी। अंत में ‘ऐ दिल है मुश्किल’  (2016) के चर्चित ‘द ब्रेकअप सॉन्ग...’ के हवाले से हिन्दी के लोकप्रिय प्रयोग को समझाया।

रविकांत हर बार कुछ अलग और आसानी से समझ में आने वाला कंटेंट दे जाते हैं। इस बारे में जब मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा—“ease of representation एक तरह का भ्रम है, जो सघन तैयारी के बलबूते दिखाई पड़ता है।” उनकी बात सुनते हुए लगा कि सचमुच वह अपनी बात केवल कहते नहीं, दृश्य उदाहरणों से सिद्ध भी करते हैं—वह भी बेहद आसान शिल्प में।

यहीं पर दूसरे दिन का पहला सत्र समाप्त हुआ और हम चाय के लिए बाहर आए। उत्सुकतावश मैंने अपने उन दोस्तों से जो BHU में पढ़ रहे थे, विभाग के अन्य शिक्षकों के बारे में पूछा कि वे यहाँ क्यों नहीं दिखाई दे रहे। उनका जवाब सुनकर यही लगा कि हर जगह के हिन्दी विभाग लॉबी की बनावट में, अपने संरचनात्मक रूप में एक जैसे हैं। केवल चेहरे बदले हुए होते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में कुछ प्रोफ़ेसर इस प्रकार के होते हैं कि चाहकर भी अपनी कुर्सी से नहीं हिलते, चाहे कितना ही उबाऊ वक्ता क्यों न बोल रहा हो। वहीं दूसरी जमात ऐसे लोगों की होती है जो कार्यक्रम में वक्ताओं का सत्र कभी नहीं सुनेंगे, भले शाम को या अगली सुबह उन्हीं विशिष्ट वक्ताओं के साथ बाँध या पुल के किनारे फ़ोटो खिंचाते मिल जाएँ। यह चयनात्मक पद्धति विद्यार्थियों को इलाहाबाद में उतना प्रभावित करती नहीं दिखाई देती, जितना बनारस में। विश्वविद्यालयों के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि अधिकांश हिन्दी विभागों की स्वच्छंदता पश्चिमोन्मुखता के अनुक्रमानुपाती होती है—बनारस से दिल्ली की दिशा में।

अगला सत्र तुषार श्रीवास्तव जैसे युवा स्कॉलर का था जो सुधीर चंद्र, अरुण कमल और बद्री नारायण जैसे वरिष्ठ विद्वानों के साथ अपनी बात रखने वाले थे। सबसे पहला वक्तव्य तुषार का था। उन्होंने सज्जाद ज़हीर को उद्धृत करते हुए छायावाद, प्रगतिशील आंदोलन और प्रयोगवादी शिल्प के ऐतिहासिक आधार पर बात की, जिसे उन्होंने ‘ऐतिहासिक दर्पण’ का नाम दिया। वह अपनी बातचीत में उस नए और उत्साही बालक जैसे लग रहे थे, जिसने पिछले कुछ दिनों से शशि थरूर को फ़ॉलो करना शुरू किया है और बात-बात में floccinaucinihilipilification या lethologica जैसे शब्द इस्तेमाल करना चाहता है—बशर्ते उनकी भाषा घोर फ़ारसीनिष्ठ हिन्दुस्तानी हो।

तुषार के बाद सुधीर चंद्र थे। उन्होंने भारतेंदु युग के संदर्भ में 1857 का प्रभाव, भारतेंदु युग की औपनिवेशिक मानसिकता और बाइनरी सोच की समीक्षा पर बात की। प्रो. चंद्र ने कहा कि 1857 की क्रांति के बाद की पीढ़ी, यानी भारतेंदु युग, एक विशिष्ट जटिलता और पराजय की पीड़ा के साथ पैदा हुई थी। यह पीढ़ी इस अर्थ में ‘अभागी’ थी कि आम तौर पर हर पीढ़ी अपने और आने वाली पीढ़ी के लिए काम करती है, लेकिन इस पीढ़ी को भली-भाँति ज्ञात था कि जो संघर्ष या कार्य वे कर रहे हैं, उसका सुखद फल उन्हें जीते-जी हासिल नहीं होगा। स्वराज के अहिंसात्मक मार्ग के पक्ष में उन्होंने तर्क दिया कि 1857 का क्रूरतापूर्वक दमन इस बात को प्रमाणित करता था कि हिंसा के दम पर आज़ादी संभव नहीं है। इसके बाद उन्होंने बाइनरी सोच को प्रश्नांकित करते हुए अविशुद्धता पर ज़ोर दिया। उनका कहना था कि अगर हमारी राष्ट्रवादी वैचारिकी गांधी-नेहरू को नायक के रूप में देखती है, तो इसी आधार पर जिन्ना को भी गौरवान्वित करना होगा। हमें हर बात को बाइनरी में देखना बंद करना होगा, खासकर उत्तर-उपनिवेश काल में निर्मित कोटियों को उपनिवेशकालीन व्यक्तित्वों पर थोपना सही नहीं है।

इसके बाद वह भारतेंदु को अपना विषय बनाते हैं और रामविलास शर्मा की उस टिप्पणी पर प्रतिरोध व्यक्त करते हैं, जिसमें उन्होंने भारतेंदु की राजभक्ति को ‘चंद्रमा पर कलंक के समान त्याज्य’ कहा था। प्रो. चंद्रा ने भारतेंदु के काव्य और विचारों में विद्यमान राजभक्ति को उस दौर की जटिल ऐतिहासिक विवशता के रूप में देखने का आग्रह किया, न कि एकतरफ़ा दोष के रूप में।

अगले वक्ता प्रो. नीरज खरे थे। उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य और आधुनिकता पर बात की और मुख्य रूप से शिवपूजन सहाय की कम चर्चित, लेकिन प्रभावी कहानी ‘कहानी का प्लॉट’ के सहारे आधुनिकता को समझाया।

इसके बाद बद्री नारायण आए। उन्होंने पहले अपने निर्धारित विषय—‘आधुनिकता और औपनिवेशिकता’—के बारे में शिकायती ढंग से कहा कि यह विषय इतना व्यापक है कि एक पूरा व्याख्यान इसी पर होना चाहिए। फिर उन्होंने बातों को संक्षिप्त रखते हुए पश्चिम और उपनिवेश के बारे में कहा—“अनेक प्रकार के पश्चिम हैं, जिनमें हमारा सामना एक क्रूर ढंग के पश्चिम से हुआ।” उन्होंने आगे बताया कि उपनिवेशवाद एक epistemic violence से स्थापित हुआ है—गायत्री स्पीवाक द्वारा प्रतिपादित शब्द। भारत सहित अधिकांश देशों का उपनिवेश भौतिकता से ज़्यादा विचार के क़ब्ज़े से उत्पन्न हुआ। आधुनिकता के बारे में उनका प्रश्न था कि यदि self-review आधुनिकता का लक्षण है तो क्या अँग्रेज़ों के पहले भारत आधुनिक नहीं था? अपनी इस प्रश्नवाचक बात को सिद्ध करते हुए उन्होंने भक्तिकालीन कवियों का उदाहरण दिया और इसी संदर्भ में ‘देशज आधुनिकता’ तथा ‘आधुनिकता के देशज’ के विमर्श को परिकल्पित करने की बात की। अंत में उनका आग्रह था कि वेस्ट और आधुनिकता को अलग-अलग रूप में समझा जाए और साथ ही हमें अपने शब्द-निर्माण पर भी ध्यान देना होगा।

बद्री नारायण अगले सत्र में भी वक्ता थे, हालाँकि वह सत्र अपने संचालन के कारण स्मृति में दर्ज है। बात यह है कि हममें से अधिकांश लोग below the belt जाकर किसी की आलोचना करने में विश्वास रखते हैं और उसके पीछे एक शुद्धतावादी अहंकार काम कर रहा होता है।
अगर वैचारिक और साहित्यिक आलोचना में यह शामिल होने लगे कि फ़लाँ आदमी कैसे जीवन जीता है, कब उठता है, कब चाय पीता है तो समझना चाहिए कि आलोचक ने ठीक से तैयारी नहीं की है।

इसके बाद कवि अरुण कमल अपनी बात रखने आए। उन्होंने आधुनिकता का संबंध विचार-परिवर्तन से जोड़ा और रवींद्रनाथ टैगोर के लेख के हवाले से कहा कि कैलेंडर से आधुनिकता तय नहीं होती। जैसे नदी की धारा में जो घुमाव आता है वही परिवर्तन-बिंदु है, वैसे ही हमारे विचारों में परिवर्तन आधुनिकता का प्रस्थान-बिंदु होता है। 

अरुण कमल ने भाषा के विकास पर बात की और बाहरी कारकों के प्रभाव को भी शामिल किया। हिन्दी को लेकर चलने वाली बहसों में उन्होंने एक दिलचस्प वाक्य जोड़ा—“Hindi was made victim and also the culprit at the same time.”

यह सत्र समाप्त हुआ और हम लोग दोपहर का भोजन लेने सभागार से बाहर आ गए। वक्ताओं को छोड़कर बाक़ी लोगों में उन्हीं के लिए भोजन की व्यवस्था थी जो टोकनधारी थे और टोकन के लिए पंजीकरण आवश्यक था। लेकिन I know a guy, who knows a guy की तकनीक पर टोकन की व्यवस्था हो जा रही थी और हिन्दी विभाग के चिर-परिचित दृश्य के अनुरूप सभागार में होने वाली संख्या के लगभग दोगुने लाभार्थी खाने के स्टॉल पर दिखाई दे रहे थे।

खाने के बाद हममें से अधिकांश अपने-अपने काम के लिए अभीष्ट स्थानों पर चले गए। कुछ हम जैसे लोग जो अभी भी दुपहर की नींद को छोड़ना अपराध नहीं मानते थे, फिर से सभागार में उपस्थित होने लगे।

यही वह सत्र था जहाँ बद्री नारायण से उपयुक्त व्यवहार नहीं किया गया और उनके द्वारा पिछले वक्तव्य में प्रयोग न किए गए शब्द ‘भारतीयता’ को लेकर संचालक द्वारा उसका अन्यथा अर्थ ग्रहण किया गया। इस सत्र में विद्योतमा ने अवधी लोक साहित्य में राम की उपस्थिति पर अपना व्याख्यान दिया। इस व्याख्यान की भाव-भंगिमा व्यासपीठ से प्राप्त होने वाले प्रवचन जैसी थी और उसकी समयावधि भी। निर्धारित समय से अधिक देर तक चले इस व्याख्यान ने श्रोताओं को थोड़ी राहत दी, लेकिन आने वाले वक्ताओं के लिए मुश्किल कर दी कि वे अपनी बात कम समय में कैसे रखें। 

इस सत्र के बाद चाय के लिए हम बाहर आए, जहाँ सबकी ज़ुबान पर ‘भारतीयता’ शब्द और बद्री नारायण थे।

चाय के बाद अंतिम सत्र शुरू हुआ। वक्ता थे—सलिल मिश्र, तिमसाल मसूद, राजीव रंजन गिरि और इसाबेल। अगर मैं क्रम ठीक से याद कर पा रहा हूँ तो सलिल मिश्र ने सत्र की शुरुआत की। इसके बाद इसाबेल हुयाकूज़ अलोंसों ने अपने विषय Ameen Sayani, Radio Ceylon and the Ideology of Hindustani के हवाले से रेडियो हिस्ट्री पर बात की और बताया कि यह किसी भी प्रकार से इतिहास से भिन्न नहीं है। उन्होंने अपने पर्चे का आधार यह बनाया कि आज़ादी से कुछ दशक पूर्व और उसके बाद तक हिन्दुस्तानी भाषा रेडियो पर सबसे अधिक सुनी जाने वाली भाषाओं में थी। मशहूर रेडियो संचालक अमीन सयानी के कार्यक्रम ‘बिनाका गीतमाला’ के हवाले से उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में रेडियो की सक्रियता की बात की। एस. कुमार का फ़िल्मी मुक़दमा और उसके छोटे अंश की प्रस्तुति इस व्याख्यान का स्मृति में दर्ज हो जाने वाला हिस्सा रहा। 

अगले वक्ता राजीव रंजन गिरि थे। उनका विषय था—‘19वीं सदी में कविता की भाषा का प्रश्न : संदर्भ—ब्रजभाषा बनाम खड़ी बोली।’ उन्होंने कहानी के माध्यम से अपनी बात शुरू की। कहानी शुरू होती है 1887 में, जब अयोध्याप्रसाद खत्री यह महसूस कर रहे थे कि बिहार में, जो उस समय बंगाल प्रांत का हिस्सा था, गद्य और पद्य की भाषा अलग-अलग थी—क्रमशः खड़ी बोली और ब्रज। उन्होंने इस संबंध में उस समय के वरिष्ठ साहित्यकारों से बात की और अंततः स्वयं ही ‘खड़ी बोली का पद्य’ नाम से एक किताब छपवाई और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों को भेजी। राजीव रंजन गिरि बताते हैं कि जो लोग उस संग्रह में शामिल थे, उन्होंने ख़ुद कविता में खड़ी बोली का विरोध किया। इसके प्रमाण के लिए उन्होंने कई पत्रिकाओं के संदर्भ सामने रखे। भारतेंदु खड़ी बोली से किस प्रकार राब्ता रखते हैं, इसे परखने के लिए उन्होंने ‘भारत दुर्दशा’ नाटक की ओर इशारा किया, जिसमें भारत-दुर्दैव खड़ी बोली में कविता करता है।

तिमसाल मसूद दिन के आख़िरी वक्ता थे। उन्होंने ‘उर्दू मर्सियों में हिन्दी का किरदार’ विषय पर अपना पर्चा सामने रखा। उन्हें मैंने तफ़सील से सुना था, लेकिन ठीक से याद न कर पाने के कारण बहुत कुछ बता नहीं पा रहा हूँ। खड़ी बोली और ब्रजभाषा के मुहाने पर आकर दूसरा दिन समाप्त हुआ।

तीसरा दिन मेरे लिए हड़बड़ी का दिन था। 30 जुलाई को सावन का पहला दिन था और अगर आप बनारस से परिचित हैं और अल्पकालिक आगंतुक हैं तो आप जल्द से जल्द शहर से बाहर निकलने की इच्छा लिए प्रयासरत रहते हैं।

इस जल्दबाज़ी के कारण मैं अगले दिन कुछ ही वक्ताओं को सुन पाया—उदयन वाजपेयी, जोआन्ना, हरीश त्रिवेदी, रमण सिन्हा और शशिभूषण उपाध्याय। उदयन जी को सुनते हुए कुछ बातें सिर के ऊपर से गईं और मैं धीरे-धीरे हीनताबोध से ग्रस्त होता गया कि मैं केवल गोविंद पांडेय और सरस्वती पांडेय का वस्तुनिष्ठ साहित्य इतिहास नहीं याद कर पा रहा हूँ और ये उत्साही इंसान जापानी कविताओं के अनुवाद से लेकर हिन्दी-अँग्रेज़ी साहित्य तक के पाठक हैं और पेशे से डॉक्टर हैं। इस हीनताबोध को अगले स्तर पर ले जाने का काम जोआन्ना ने किया, जिन्होंने भारतीय साहित्यिक और दार्शनिक ग्रंथों की कूट भाषा—The Secret Language of Indian Literary and Philosophical Texts: Rasa-Dhwani in a Cognitive Framework—पर अपना पेपर पढ़ा।

अगला सत्र मेरे लिए आश्वासन का कारण रहा, जब मेरा हीनताबोध कुछ कम हुआ। हरीश त्रिवेदी ने अपने विषय ‘साहित्य बनाम इतिहास’ पर बहुत अधिक ज़ोर न देते हुए कुछ और ही कहा। उस समय मुझे लगा कि तीसरे दिन ही सही, अब जाकर विषय से भटकने वाली हिन्दी विभाग की सर्वस्वीकृत वाइब आना शुरू हुई है। हालाँकि मेरे इस लगने को रमण सिन्हा ने सिरे से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने अपने विषय ‘हिन्दी साहित्येतिहास का इतिहास’ पर शानदार पर्चा पढ़ा। केवल अपना पर्चा पढ़ा और समय पर अपनी बात समाप्त की। मंच को प्रणाम, धन्यवाद जैसी ग़ैरज़रूरी औपचारिकताओं में नहीं पड़े। इस पर्चे में उन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास-ग्रंथों की निर्माण-प्रक्रिया और उनके सामने मौजूद चुनौतियों पर बात की।
लेकिन तीसरे दिन मुझे सबसे प्रभावी वक्ता शशिभूषण उपाध्याय लगे। उन्होंने ‘दलित आत्मकथाओं में श्रम का महत्व’ विषय पर व्याख्यान दिया। इतिहास की वाचिक परंपरा के हवाले से शशि श्रम की शुरुआत Adam और Eve से मानते हैं। वह यह स्थापना देते हैं कि सोलहवीं सदी के धार्मिक विद्रोह ने श्रम की अवधारणा को परिवर्तित किया, जहाँ श्रम का अर्थ नकारात्मक से सकारात्मक—work is worship—हो गया। इससे एक तरफ़ श्रम को समाज में स्थान मिला, लेकिन दूसरी तरफ़ पूँजीवाद को भी मदद मिली।

भारत के संदर्भ में वह श्रम की यात्रा को पदसोपानिक क्रम में बाँटते हैं—वैदिक काल, उत्तर वैदिक काल, गुप्तकाल, भक्ति आंदोलन और श्रम की निकृष्टता का विरोध, और फिर अँग्रेज़ों का आगमन।

इस व्याख्यान के बाद भोजन सत्र हुआ और हम महामना आर्काइव, जो कार्यक्रम-स्थल से सटा हुआ था, को देखते हुए वापस लौट आए।

तो फिर ‘नयी चाल’ क्या थी?

यह तो रही कार्यक्रम की सरसरी रिपोर्ट...

लेकिन मैंने इस रिपोर्ट को लिखने की कोशिश इसलिए की, क्योंकि मैंने पहली बार हिन्दी विभाग के बैनर तले एक ऐसे कार्यक्रम में शिरकत की जो अपने प्रयास में कॉस्मोपॉलिटन था, जो वास्तव में हिन्दी को विविधता की भाषा और विविधता से अवगत कराने वाली भाषा की तरह देख रहा था। वरना मैं तो विभागीय कार्यक्रमों में ऐसे अनुभवों का आदी रहा हूँ जहाँ अंतिम वक्ता पहले तीन, या कम-से-कम दो वक्ताओं की बात काटने पर आमादा रहता है और फिर कुछ ब्रह्मवाक्य, जैसे : “मुझे कल शाम ही यह किताब मिली।” “इसका कवर पेज बहुत सुंदर/ख़राब है।” अरे, किताब पर भी कुछ बोल दे भाई! या—“बाहर चाय आपका इंतज़ार कर रही है।” वग़ैरा-वग़ैरा! तो अंत में केवल यही कि अगर कार्यक्रम होने हैं तो ऐसे कार्यक्रम होने चाहिए। बाक़ी हिन्दी के आधे कार्यक्रम तो इसी तर्ज़ पर होते हैं—तुम हमें बुलाओ, हम तुमको... आप हिन्दी विभागों के आमंत्रित वक्ताओं की सूची देखकर संयोजकों का सटीक अनुमान लगा सकते हैं या संयोजक का पता करके आमंत्रित वक्ता का अनुमान। इस कार्यक्रम के लिए एक औपचारिक धन्यवाद संयोजक प्रो. राजकुमार को बनता है, जिनकी परिकल्पना इतनी वृहद थी। ऐसा ही एक समृद्ध सेमिनार उन्होंने ‘उदीयमान’ शीर्षक से इसी साल फ़रवरी में आयोजित किया था, लेकिन उस पर हिन्दी विभाग की मुहर नहीं लगी थी। वह अंतर-अनुशासनात्मक केंद्र का मामला था। वैसे हिन्दी विभागों के प्रचलन के विपरीत हिन्दी भाषा और साहित्य को ज्ञान के इतने अनुशासनों के बीच रखकर मूल्यांकन करने पर आधारित संगोष्ठी कराने के लिए उनकी निंदा भी की जा सकती है—और हो भी रही है। आख़िर क्या ज़रूरत थी हिन्दी में ऐसा समृद्ध सेमिनार कराने की? क्या पिष्टपेषण से युक्त एक प्रयोजनमूलक सेमिनार से काम नहीं चल सकता था? शायद ‘नयी चाल की हिन्दी’ का असली अर्थ यहीं समझ में आता है—हिन्दी को एक ही कमरे में, एक ही तरह के लोगों के बीच, एक ही तरह के सवालों के साथ बार-बार दोहराने के बजाय उसे दूसरी भाषाओं, दूसरे अनुशासनों, लोकप्रिय संस्कृति, बाज़ार, सिनेमा, रेडियो, लोक, इतिहास और आधुनिकता के बीच रखकर देखने की कोशिश।

और अगर हिन्दी विभाग को सचमुच नयी चाल चलनी है, तो शुरुआत शायद यहीं से हो सकती है—एक ही जगह गोल-गोल घूमते रहने के बजाय थोड़ा बाहर निकलकर।

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