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क्या हम परिवार को देश की तरह देख सकते हैं?

हमारे सामने एक विकट प्रश्न खड़ा हो गया है। क्या हमारे परिवार ख़त्म हो जाएंगे? इस मामले में नहीं कि हमारे परिवार के लोग एक-दूसरे से दूर रहने लगे हैं, दूर नौकरियाँ करने लगे हैं और कभी-कभी ही मिल पाते हैं। बल्कि इस मामले में कि क्या हमारे हृदय में भावनाओं का सोता सूख गया है, परिवार के लिए और वही ट्यूनीशिया में किसी जंगल में मरे एक जानवर के लिए जागृत हो जाता है? जानवर से प्रेम होना अपनी जगह उचित है, लेकिन अपने परिवार के लिए एक बूँद आँसू न गिरना, या परिवार के नाम पर क्रोध आना, यह कुछ तो गड़बड़ दिखा रहा है। जब भी इस बात का ज़िक्र होता है कि परिवार अब ख़त्म हो रहे हैं, परिवार की अवधारणा बदल रही है, तो बहुत से लोग ख़ूब ख़ुश होते हैं। वो मानते हैं कि हाँ, परिवार अब ख़त्म हो रहे हैं। बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि परिवारों को ख़त्म हो ही जाना चाहिए। बहुत से लोग परिवारों को ही सारे दुखों और अपराधों का जनक मानते हैं। पर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो अपने जीवन की हर सफलता का श्रेय परिवार को देते हैं। वो कहते हैं कि उनकी मुश्किल घड़ी में भी उनका परिवार उनके साथ रहा। तो क्या वाक़ई हम परिवार को ख़त्म होते देखना चाहते हैं या फिर हम यह चाहते हैं कि हम भी कह सकें कि हमारा परिवार हमारे साथ था और है?

क्या हम परिवार को देश की तरह देख सकते हैं और ख़ुद को इसके प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, रक्षामंत्री इत्यादि की तरह? या सस्ते में घर की महिला को गृहमंत्री कहकर निपटारा कर लेंगे?

परिवार क्या होता है? क्या परिवार वह होता है जो टॉल्सटॉय ने कहा था कि हर परिवार दुखी होता है और अपने तरीक़े से होता है। या फिर गॉडफादर का परिवार जिसमें माइकल कोर्लियोन अपने परिवार को एक रखने की कोशिश करता है। फिर पीकी ब्लाइंडर्स के टॉमी शेल्बी का परिवार जो उसे धोखा देते रहता है लेकिन वो परिवार को नहीं छोड़ता। परिवार वह क़ब्रिस्तान होता है जिसमें बच्चे क्रिकेट खेलते हैं। इसमें तमाम राज़ दबे होते हैं, पर यहीं पर लोगों को आनंद भी आता है। वहाँ अपने भी होते हैं और एक्सटेंडेड फ़ैमिली के लोग भी। वहाँ पर जगह होती भी है और नहीं भी। अकेलापन भी मिलता है और साथ भी। मुहब्बत भी आती है और डर भी लगता है। क़ब्रिस्तान में जा-जा कर आप अपना जीवन भी बिता सकते हैं, लेकिन अगर किसी गड़े मुर्दे ने आँख खोल दी तो आपका जीवन नर्क भी हो सकता है। क़ब्रिस्तान में जाकर आप गड़े मुर्दे उखाड़ोगे तो भी तकलीफ़ होगी। इसीलिए परिवारों में इतिहास के ऊपर सुंदर मज़ार और मक़बरे बनाने की परंपरा होती है। हमेशा यशोगान होता है। लेकिन इतिहास किसी को चैन से जीने नहीं देता। परिवार का इतिहास भी इस मामले में ऐसा ही होता है। सारे चमत्कारों, षड्यंत्रों, धोखा, प्रेम, बदला, घृणा, अतिशय प्रेम, अपनों की क़ुर्बानी, दूसरों की क़ुर्बानी, झूठ, परम सत्य, मौक़े पर भाग जाना, मौक़े पर खड़ा रहना—सबसे भरा होता है।

पिछले सौ सालों में दुनिया में औद्योगीकरण बढ़ा और लोगों को अकेले रहने का मौक़ा मिला। जीवन अपने तरीक़े से जीने का मौक़ा मिला। बड़ी-बड़ी नौकरियाँ, बड़े-बड़े ऑफ़िस, बड़ी-बड़ी तनख़्वाहें, घूमने की जगहें, पार्टी करने की जगहें, सारे सुख-चैन, आरामतलब की ज़िंदगी—फिर बीपी, शुगर, गर्दन में दर्द, पीठ में दर्द, डिप्रेशन—सब कुछ मिला। लेकिन अंततः कंपनियों ने भी कहना शुरू कर दिया कि हम पाँच हज़ार करोड़ रुपये की पूँजी वाला एक बड़ा परिवार हैं। जब परिवार ही बनाना था तो हम एक परिवार छोड़कर क्यों भागें? आख़िर पाँच हज़ारी परिवार में भी वही डायनेमिक्स है, जो पाँच हज़ार करोड़ वाले परिवार में है। पहले में तो इमोशन भी है, दूसरे में तो क़तई इमोशन नहीं है। हमारे परिवारों में कभी पिंक स्लिप नहीं मिलती। हाँ, स्लिप ज़रूर होती है। आपने ग़लती की और आपका कैच पकड़ लिया जाएगा, फिर ज़ोरदार स्लेजिंग होगी। अगर इस स्लेजिंग से डील करना सीख गए, फिर तो आप टेस्ट मैच खेलेंगे। कभी-कभी ट्वेंटी-ट्वेंटी भी। कभी-कभी मैच फ़िक्स भी कर लेंगे। कभी अंपायर भी साथ दे देगा। कभी कोई बॉलर हल्की गेंद डाल देगा। कभी मांकड़िंग हो जाएगा आपके साथ। कभी मीटिंग में ज़ोरदार बहस, लड़ाई होगी, कैप्टेंसी को लेकर मनमुटाव होगा। पर फिर ड्रेसिंग रूम में शैंपेन खोलने का भी मौक़ा आएगा। किसी के कंधे पर सिर रखकर रोने को भी मिलेगा।

परिवार के ऊपर ढेर सारी फ़िल्में बनी हैं और ढेर सारी किताबें लिखी गई हैं। यह सब देखकर और पढ़कर लगता है कि परिवार सिर्फ़ दुख देने के लिए बना है। जब इतना दुख है तो हम परिवार में क्यों रहना चाहते हैं? हम उनसे क्यों जुड़े रहना चाहते हैं? आज के समाज में हमारे पास सोशल मीडिया है, दोस्त-मित्र हैं, करियर हैं। और सबसे बढ़कर, हमारे पास चिंताएँ हैं जो हमें चैन से जीने नहीं देतीं और चैन से मरने भी नहीं देतीं। ऐसे में हम परिवार के बिना भी रह सकते हैं। पर हमें उनकी ज़रूरत क्यों पड़ती है? हमें ऐसा क्यों लगता है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा नाराज़ हम उन्हीं से हैं?

अपने जीवन में एक पॉइंट पर हम उन लोगों को क़त्ल करना चाहते हैं जिन्होंने हमें सताया है। बहुत बार ये लोग वो होते हैं जिन्हें हम अपने परिवारों में देखते हैं। परिवार इन्हीं लोगों के साथ भी रिश्ता बनाकर रखना सिखाता है। जो चीज़ें हमारे कॉर्पोरेट में काम आती हैं, राजनीति में काम आती हैं, हमारे जीवन में काम आती हैं, वो हम परिवारों से ही सीखते हैं। कई बार बड़ी पक्की ट्रेनिंग हो जाती है, तो कई बार बहुत ही घटिया। पर हम जब चाहें सुधार सकते हैं।

हम अपने जीवन में सबसे आसान रास्ता चुनना चाहते हैं। कि हम तो ऐसे ही हैं, बाक़ी आप जानो। यह रास्ता तब बड़ा मुफ़ीद होता है जब हमारे पास काम होता है, पैसा होता है और हम सुरक्षित होते हैं। लेकिन जब यह समीकरण गड़बड़ होता है तब हमें दुनिया के हिसाब से बदलना पड़ता है।

परिवार में हम सीखते हैं कि सब कुछ गड़बड़ होने के बाद भी अपने हृदय को सही जगह कैसे रखें। बिना घबराए, बिना दिल पर लिए, कैसे मैनेज करें रिश्ते। क्योंकि जीवन तो इतना ही है। पैदा होंगे, पढ़ेंगे-लिखेंगे, खेलेंगे। नौकरी करेंगे, व्यापार करेंगे, इंस्टा सेलिब्रिटी बनेंगे। पैसे कमाएँगे। घर-गाड़ी सब लेंगे। प्यार-मुहब्बत करेंगे। शादी करेंगे। बच्चे करेंगे। बीच-बीच में अन्य चीज़ें भी होंगी। अफ़ेयर, डिवोर्स, पैसे कम होना, पैसे ज़्यादा होना, दिल टूटना, दिल जुड़ना। और फिर एक दिल का रुकना। इतना ही है जीवन। इसी में हम चाहे जो मैनेज कर लें, जिस चीज़ को वैल्यू दें।

अगर हम अपने दिल को सबसे पहले वैल्यू दें और उसे इस क़दर मज़बूत बनाएँ कि वो एक बालक की तरह दुनिया को देखता रहे और ख़ुश होता रहे इसकी ख़ूबसूरती पर, दुखी होता रहे इसकी विकृति पर, तो हम मैनेज कर ले जाएँगे।

आज के दौर में जब हमें पता चलता है कि हमारा घूमना-फिरना, पहाड़ों में ख़ुद को खोजना, तकनीक में ख़ुद को खोजना, एक कमरे में रहना, मिनिमल लाइफ़ जीना, अध्यात्म की तरफ़ जाना, अपने पैशन को फ़ॉलो करना—यह सब एक बड़े व्यापार का भी हिस्सा है, तब हम ठगा हुआ महसूस करते हैं। जब आपको पता चलता है कि फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर आपको वही दिखा रहे हैं जो वो दिखाना चाहते हैं और आपको महसूस करा देते हैं कि आप वही देखना चाहते हैं, तब आपको अहसास होता है कि हम तो एक बहुत बड़े खेल के अदने से खिलाड़ी हैं। सबसे बड़ा खिलाड़ी है रिश्ता। 

फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर भी हमारे साथ रिश्ते ही बना रहे हैं और हमें अनजान लोगों से रिश्ता बनाने को कह रहे हैं। तो हमारा परिवार कहीं जा नहीं रहा। बस उसका कॉन्सेप्ट बदल रहा है।

हम राजनीति में देखते हैं कि लोग अपना भरा-पूरा करियर छोड़कर परिवारों में आ जाते हैं, विरासत संभालने। देखने में यह लगता है कि इसकी क्या ज़रूरत है, पर परिवार का आकर्षण उन्हें खींच लाता है। आप उनसे दूर भागते तो हैं, पर आप उनके साथ रहना भी चाहते हैं। आप उनसे नफ़रत भी करते हैं, तो आप उनसे प्यार भी करते हैं।

प्रकाश झा की फ़िल्म अपहरण के एक मार्मिक दृश्य में पढ़ाकू लड़के से गैंगस्टर बने अजय देवगन अंत में अपने पिता के पास आते हैं, उसी पिता के पास जिसके आदर्शों से वो नफ़रत करते थे। जो चीज़ें उन्हें खींचकर अपने पास ले गई थीं, वही चीज़ें अब उनकी जान की दुश्मन बनी हुई थीं। पिता रात को उनको एक चादर ओढ़ा देते हैं। दोनों को पता है कि अब बेटे का जीवन बचा नहीं है। पर उतना-सा ही वक़्त अजय को संतुष्टि दे देता है।

द गॉडफ़ादर फ़िल्म में परिवार की डायनेमिक्स दिखाया गया है। अपने परिवार को बचाने के लिए माइकल कोर्लियोन अपने जीवन का सब कुछ बदल देता है।

कोरोना लॉकडाउन के दौरान दो वेब सीरीज़ आईं—पंचायत और गुल्लक। दोनों ही परिवारों की कहानियों पर आधारित थीं। इनसे पहले लगभग पंद्रह साल से टीवी पर तारक मेहता का उलटा चश्मा आ रहा है। अपनी सारी कमियों-ख़ूबियों के बावजूद वह इसी बात से लोगों के दिल में जगह बनाए हुए है कि वह परिवार का एक मॉडल प्रस्तुत करता है। जो कि देखने में सुंदर है, हमें पता है कि इसमें परिवार के उन राज़ों को नहीं दिखाया गया है जो हम आम तौर पर फ़ेस करते हैं। एक लंबे समय तक चलने वाले पुलिस ड्रामा एफआईआर में भी तीन अलग-अलग लोग थाने में हैं, पर उनका स्ट्रक्चर एक परिवार का है। यहाँ तक कि एक कॉन्स्टेबल गोपी चंद्रमुखी मैडम को मॉम ही कहता है।

बहुत सारी फ़िल्में जो हिट होती हैं, वो परिवारों पर ही बनी होती हैं। किसी में परिवार बहुत सुंदर होते हैं, किसी में बहुत ख़राब। बहुत सारी फ़िल्मों में तो परिवार पर हुए अत्याचार का बदला ही दिखाया जाता है। केजीएफ, पुष्पा, आरआरआर से लेकर हम साथ-साथ हैं, हम आपके हैं कौन, कभी ख़ुशी कभी ग़म, कुछ कुछ होता है—सब परिवारों की ही कहानियाँ हैं। जो हीरो हार्ड फ़ेस लेकर रहता है, उसका बैकग्राउंड यह होता है कि उसने अपने परिवार को खो दिया है। हमारी दो सबसे बड़ी गाथाएँ रामायण और महाभारत परिवारों की ही कहानियाँ हैं। हमारे सबसे फ़ेमस हिंदी उपन्यासों में परिवार ही हैं। यहाँ तक कि हास्य-व्यंग्य से भरपूर रागदरबारी में भी सबसे अच्छे सीन परिवारों के ही हैं।

भावनात्मक रूप से हर इंसान एक ही जैसा होता है। यहाँ पर पूरी डेमोक्रेसी है और पूरी बराबरी है। कोई भी इंसान अलग इमोशन प्रोड्यूस नहीं कर सकता। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, नफ़रत, प्रेम, चिढ़, चापलूसी, झूठ, सत्य—यह हर स्तर पर मौजूद है। जीवन में जो चीज़ें हमें अलग करती हैं वो हैं काम करने की स्किल और हमारी मटीरियल सक्सेस। हम किसी काम में बहुत निपुण हो जाते हैं तो हमें समाज में अलग इज़्ज़त मिलती है। ज़्यादा पैसा कमा लेते हैं तो एक अलग तरह की इज़्ज़त मिलती है। पर भावनात्मक रूप से हम एक जैसे ही होते हैं।

इंदिरा गांधी के बारे में लिखा गया है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी इंदिरा अपने बचपन में अपनी बुआ द्वारा किए गए अपमान को भूल नहीं पाई थीं और अपने तरीक़े से बदला भी निकाला। वही इंदिरा अपने बेटों और उनकी वधुओं को लेकर परिवार की पॉलिटिक्स भी करती रहीं। देश की पॉलिटिक्स से ज़्यादा असर परिवार की पॉलिटिक्स का पड़ा। ठीक उसी तरीक़े से पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह के जीवन में हुआ। वी. पी. ने राजनीति में शह-मात खेलते हुए पीएम की कुर्सी भी पा ली, छोड़ भी दिया। देश की राजनीति बदल दी। पर अंत में उनके बेटे की पत्नी के साथ हुए विवाद को वो संभाल नहीं पाए। वहाँ पर राजनीति के कौशल काम नहीं आए।

प्लेटो ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पर समाज के मूल में इमोशन ही तो है। मनुष्य एक इमोशनल प्राणी है। इमोशन के लिए ही मनुष्य क्या-क्या नहीं कर देता है। अपनी पब्लिक लाइफ़ में मनुष्य अपने इमोशन्स को मैनेज करता है और अपनी छवि के हिसाब से काम करता है। लेकिन पारिवारिक जीवन में मनुष्य अपने इमोशन्स को बहने देता है और वहाँ पर उसकी कोई छवि नहीं होती, वही छवि होती है जो लोगों ने अपने-अपने तरीक़े से अपने मन में बना रखी है।

परिवार के लोग आपकी कला की, आपके अचीवमेंट्स की या आपके पैसे की इज़्ज़त नहीं करते। वो आपकी इज़्ज़त करते हैं। परिवार इसी के लिए बना है। इसका मतलब यह नहीं है कि वो आपकी कला, आपके अचीवमेंट्स या पैसे से प्रभावित नहीं होते। होते हैं लेकिन इज़्ज़त तो आपकी ही करते हैं।

कई ऐसे परिवार होते हैं जिनमें प्यार भरपूर मात्रा में मिलता है। पैसे की कमी नहीं होती, जीवन बढ़िया चलता है। लोग एक-दूसरे को सपोर्ट करते हैं, वैसे परिवारों में लोगों का नज़रिया अलग होता है। वह दुनिया को अलग तरीक़े से देखते हैं। वो दुनिया में सही चीज़ें तलाश लेते हैं। ख़राब चीज़ों से बचते हैं और फँस जाते हैं तो परिवार की मदद से निकल आते हैं।

लेकिन जो परिवार सिर्फ़ जी रहे हों, किसी तरह गुज़ारा कर रहे हों, चाहे वो पैसे के हिसाब से हो चाहे वो इमोशन्स के हिसाब से हो, उनका दुनिया देखने का नज़रिया और हो जाता है। अपने बुरे अनुभवों के आधार पर वो सही चीज़ें तलाश पाने में अक्षम रहते हैं और अपने आप नकारात्मक चीज़ें उनकी तरफ़ आकृष्ट हो जाती हैं।

फिर इन दो तरह के परिवारों के लोग आपस में मिलते हैं तो आकर्षण भी हो जाता है लेकिन फिर विकर्षण भी पैदा होता है। यहाँ पर यह समझना आवश्यक होता है कि एक बार एक-दूसरे को समझ लेने से यह विसंगति भी दूर हो सकती है। जीवन का नज़रिया बदल सकता है, लेकिन तभी जब कोई इसे बदलना चाहे।

पर भूतकाल में क्या हुआ, इस पर तो हमारा वश नहीं है। हमारा वश इस पर है कि हम आगे क्या कर सकते हैं। हमारा बचपन अगर ख़राब गुज़रा, तो हम उसे बदल नहीं सकते। लेकिन हम अपने मन में उसकी कहानी ज़रूर बदल सकते हैं। कहानी यूँ कि हम अपनी नई कहानी में विक्टिम बनकर नहीं रहेंगे कि हमारे साथ यह हुआ, वह हुआ। बल्कि हम इसे इस तरीक़े से देखेंगे कि हम हीरो थे इस कहानी के और हमने ये सारी चीज़ें फ़ेस कीं। और अब हम उससे बाहर हैं।

दुनिया की किसी कहानी में हीरो के साथ यही तो होता है। रामायण में श्री राम के साथ यही तो हुआ था। राजघराने में जन्मे उनका जीवन अच्छा चल रहा था। बढ़िया शिक्षा मिल रही थी। राजगद्दी मिलने वाली थी। लेकिन परिवार की राजनीति में अचानक उनको वन जाना पड़ गया। पत्नी के साथ। भाई भी गया। यह पूरे परिवार के ऊपर आघात था। पर यह हुआ। इसके बाद भी उनके जीवन में दुख कम नहीं हुए। पत्नी का अपहरण हो गया। पत्नी को वापस लाने के लिए सेना बनानी पड़ी, जबकि सेना में लड़ने लायक लोग नहीं थे। फिर सेना बनी तो समंदर पार करने की झंझट आ गई। फिर समंदर पार हुआ। फिर युद्ध हुआ। उसमें भी रावण को मार पाना असंभव हो रहा था। फिर उसका भी हल निकला। वापस आए तो पत्नी पर आक्षेप लगा और उनको एक बार फिर वन जाना पड़ा।

अगर सीता की कहानी लिखें तो उस कहानी में हीरो वो हैं और उनके साथ भी यही चीज़ें होती हैं। मतलब परिवार की वजह से दुख तो होता ही है। क्योंकि स्थितियों पर आपका नियंत्रण नहीं होता। लेकिन हम उसका सामना कर सकते हैं।

जैसा कि श्रीकृष्ण के जीवन में हुआ था। उनका बचपन तो और बुरा गुज़रा था। पैदा होते ही मरने का ख़तरा था। पानी में तैरकर पिता ने किसी तरह किसी और के घर में पहुँचाया। यहाँ से तो जीवन शुरू हुआ। फिर किसी और के घर में रहना। फिर वो घर भी छोड़ देना। युद्ध करना और पिता का राज्य हासिल करना। उसके बाद दोस्ती में कुरुक्षेत्र का होना। तमाम चीज़ें उनके जीवन में आती रहीं। लेकिन कृष्ण ने अपना गेम सेट कर रखा था—वो टेंशन नहीं लेते थे। ऐसा लगता था कि उन पर किसी चीज़ का प्रभाव नहीं पड़ता था। ऐसा हो ही नहीं सकता। प्रभाव पड़ता था लेकिन वो उसे मैनेज करना जानते थे। अपने ऊपर इमोशनल दबाव नहीं बनाते थे। फिर भी आप देखेंगे कि कृष्ण ने किसी को निराश नहीं किया है। परिवार की वजह से अपना सुख कम नहीं किया, अपने जीवन में मज़े कम नहीं किए। वृहद परिवार लेकर, बल्कि दूसरों का भी परिवार साथ में लेकर कृष्ण ने अपने जीवन में सिर्फ़ आनंद ही किया। यह एक नज़रिया हो सकता है। लेकिन दूसरा नज़रिया यह भी है कि कृष्ण के जीवन में दुख भी लगातार आते रहे। वो तो उनका अपना नैरेटिव था कि हमें उनका दुख दिखता ही नहीं है।

हम दोनों ही चीज़ें चुन सकते हैं—परिवार को साथ लेकर चलना और परिवार को हमेशा के लिए त्यागकर चलना। पर दोनों ही स्थितियों में हमें लोगों से ही डील करना है। हमारा जीवन ऐसा नहीं हो सकता कि हम लगातार ऑनलाइन ज़िंदगी जी रहे हैं। हो सकता है कि भविष्य में सब कुछ ऑनलाइन उपलब्ध हो। डॉक्टर ऑनलाइन देखें और ऑनलाइन ही उपचार कर दें, ऑपरेशन कर दें। सब कुछ घर पर डिलीवर हो जाए। हमें बाहर जाने की ज़रूरत भी न पड़े। हम सिर्फ़ अपने कमरे में रहें, वॉक करें और फ़िट रहें। हमें किसी इंसान की ज़रूरत ही न पड़े।

तब यह भी हो सकता है कि जो लोग इन सुविधाओं को बना रहे हैं, इनका उत्पादन कर रहे हैं, वो भी यही काम करने लगें और फिर हर चीज़ का उत्पादन रुक जाए। क्योंकि जो भी काम हम करते हैं, उसका एक बड़ा अंश दूसरों के लिए होता है। जब तक हमारे दिल में दूसरों के लिए कोई भी इमोशन रहेगा—प्यार या नफ़रत—कुछ भी—तब तक हमें लोगों की ज़रूरत रहेगी है। अगर हम जीना चाहते हैं तो वह दूसरे लोगों के बिना पूरा नहीं होगा।

और इसीलिए परिवार की धारणा सामने आती है। परिवार हमारे समाज की एक इकाई है। जैसे व्यक्ति भी एक इकाई है। छोटी यूनिट, बड़ी यूनिट। जब तक हम समाज में हैं, हम परिवार से बाहर नहीं जा सकते। पर क्या यह परिवार सिर्फ़ माँ-बाप और भाई-बहन तक ही सीमित है? नहीं। इसमें वो लोग भी आते हैं, जिन्हें हम अपने परिवार में शामिल करते हैं।

अब प्रश्न उठता है कि परिवार में अगर ढेर सारे बाहरी लोग भी आते हैं तो परिवार का मतलब क्या हुआ? हम परिवार का मतलब तो यही समझते थे कि माँ-बाप और भाई-बहन, जिनके बीच असीमित धैर्य है, आपसी ज़िम्मेदारियाँ हैं, प्यार है और एक-दूसरे का सपोर्ट है। इसमें कोई कंडीशन नहीं है और कोई छुपाव-दुराव नहीं है।

यहीं पर सारी समस्याओं का जन्म होता है। परिवार को इस हिसाब से सोचते ही हम उनकी व्यक्तिगत इच्छाओं को मारना शुरू कर देते हैं। और उनको इसी धारणा के अंतर्गत दबाने का प्रयास करने लगते हैं। जबकि बाहरी व्यक्ति को परिवार में शामिल करते ही हम उसकी बाउंड्रीज़ का सम्मान करना सीख जाते हैं। हमें पता है कि हमारा दोस्त क्या काम करेगा और क्या नहीं करेगा। लेकिन यही धारणा हम अपने परिवार पर लागू नहीं करते।

हम अपने दोस्त पर नहीं चिल्लाते लेकिन परिवार पर चिल्लाते हैं। हम उनको टेकन फ़ॉर ग्रांटेड लेकर चलते हैं। कि चाहे जो हो, मैं चाहे जैसा व्यवहार करूँ, ये लोग मेरे साथ ही रहेंगे। फिर वो हमारे सारे डरों, असुरक्षाओं और नेगेटिव थॉट्स को झेलते रहते हैं। हमारी सारी मानसिक बीमारियों का पहला शिकार हमारा परिवार होता है, जिसको हम कभी स्वीकार नहीं करते।

हम परिवार को सिर्फ़ ज़मीन-जायदाद से ही जोड़ते हैं और या तो उनकी छवि देवताओं वाली पेश करते हैं या फिर दानवों वाली। कोई था जिसने आपकी सारी ज़रूरतों को समझा और कोई था जिसने आपकी किसी ज़रूरत को नहीं समझा। और हम यहाँ पर एक बड़ी ग़लती करते हैं। हम किसी को इंसान नहीं समझते। और एक बहुत पुरानी, बहुत क्लिशे लाइन भूल जाते हैं—मनुष्य ग़लतियों का पुतला है। मनुष्य ग़लतियाँ करता है और सीखता है। हम जब उनसे लड़ते हैं तो उन्हें न सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।

परिवार को ज़मीन-जायदाद तक सीमित करने का घाटा यह होता है कि हम जीवन की ढेर सारी चीज़ों को मिस कर देते हैं। ज़मीन-जायदाद तो सिर्फ़ शुक्राणु और अंडाणु की अवधारणा तक सीमित हैं। लेकिन परिवार तो इमोशन है। और यह सच बात है कि परिवार में आप नहीं बता सकते कि निषेचन किसका किससे हुआ। यह सुनने में ख़राब लग सकता है पर यह जीवन का एक सच है। लेकिन अगर हम किसी की जेनेटिक लीनिएज नहीं जानते तो उसे अपने ही शुक्राणु-अंडाणु का हिस्सा मानकर चलते हैं। अगर जान जाते हैं तो उस ज़मीन-जायदाद से बेदख़ल करने का प्रयास करते हैं। ज़मीन-जायदाद का मसला अलग है। हम यहाँ बात कर रहे हैं इमोशन की, जो कि परिवार का आधार है।

और इमोशन के आधार पर परिवार का विश्लेषण करें तो हम इसमें बाहरी व्यक्तियों को भी शामिल कर सकते हैं और बाहरी व्यक्तियों को शामिल करते ही हमारी बहुत-सी समस्याओं का समाधान हो जाता है।

अगर हम अपने बेटे की गर्लफ़्रेंड या अपनी बेटी के बॉयफ़्रेंड को अपने परिवार में शामिल कर लें तो हमारे लिए आसानी हो जाएगी। कई लोगों को यह बात नागवार गुज़र सकती है। लेकिन इससे कई लोगों का जीवन आसानी से कट सकता है, बहुत-सी समस्याएँ आ भी जाएँ तो हम उन्हें झेल लेंगे।

सोचिए कि आपकी बेटी का बॉयफ़्रेंड है या आपके बेटे की गर्लफ़्रेंड है और पूरे शहर को पता है, सिर्फ़ आपको नहीं पता है। ऐसा तो नहीं है कि वो ऐसी जगह मिलते होंगे जहाँ कोई नहीं जाता होगा। कहीं-न-कहीं तो लोग देख ही लेते हैं। इससे बेहतर है कि सबसे पहले आप जानें और उसे स्वीकार कर लें।

अब पहली टेंशन से आप बचे। दूसरी टेंशन है कि आपके बच्चे ने सेक्स किया या नहीं। तो आपकी टेंशन दूर किए देते हैं। आपका बच्चा तो पहली अपॉर्च्युनिटी मिलते ही सेक्स करेगा। वो आपकी टेंशन का इंतज़ार नहीं करेगा। उसे अपने सेक्स की ज़्यादा टेंशन है। आपको भी पता होगा, पूरी दुनिया को पता होगा कि पंद्रह-सोलह साल की उम्र में सेक्स को लेकर सबसे ज़्यादा चुल्ल मचती है (अगर चलताऊ शब्दों में कहें तो), जो कि बिल्कुल प्राकृतिक है। आप नाराज़ हों, दुखी हों या कुछ भी हों, बच्चा तो करेगा। यहाँ तक कि प्रलय आ जाए, तूफ़ान आ जाए, तो भी कुछ बच्चे सेक्स करके ही मरेंगे। वो वर्जिन नहीं मरना चाहते। आप भी अपनी यौवनावस्था में करना चाहते होंगे।

काशीनाथ सिंह की किताब रेहन पर रग्घू में रग्घू अपने यौवन को याद कर रहे हैं और वही चीज़ें याद कर रहे हैं कि कैसे एक औरत के पीछे वो पागल थे।

हमने काफ़्का के बारे में पढ़ा कि वो अपने पापा को चिट्ठियाँ लिखा करता था जिसमें वो उनसे बहुत नाराज़ था। उनके नार्सिसिज़्म से नाराज़ था। मैक्स वेबर के बारे में पढ़ा है कि वो अपने पापा से इतना नाराज़ था कि रिश्ते ख़राब हो गए थे और एक बार ग़ुस्से में उसने उनको इतना सुना दिया कि दुख से उनकी मौत हो गई। बाद में वेबर जीवन भर दुखी रहा। महात्मा गांधी और उनके बेटे से अनबन और दुख के बारे में हम जानते ही हैं। बहुत बार ऐसा लगता है कि हमारे जीवन में दुखों का कारण ही परिवार है। यह सच भी है क्योंकि परिवार ही हमें पैदा करता है, पालता-पोसता है तो जो दुख पैदा होते हैं, उनकी वजह से ही होते हैं। वो पैदा नहीं करते तो हमारे जीवन में दुख आता नहीं। पर पैदा कर देते हैं और दुख आ जाता है। तो हमें यही सीखना है। पैदा हुए हैं तो दुख को मैनेज करना है।

हम जीवन को लगातार वैसे ही जीना चाहते हैं जैसे कि हमारे जीवन में कोई दुख कभी आया ही नहीं है। हम मानना नहीं चाहते हैं कि हमारे साथ कोई हादसा हुआ है। हम अपनी आत्मा के उन रहस्यमयी छिद्रों, गुफाओं में नहीं जाना चाहते जो मौजूद हैं। जिनका अस्तित्व है और जहाँ पर हमारी ही कोई शक्ति है, जो हमें वहीं से संचालित कर रही है। घोर ग़ुस्से में, उफ़नती भावनाओं में फिर हमारा कंट्रोल हमारे ऊपर से छूट जाता है और हम वही कर बैठते हैं जो हमारी वो छुपी हुई शक्ति हमसे कराना चाहती है। फिर वो चाहे सही हो या ग़लत, हो जाता है। हम फिर भावनाओं के सागर में गोते लगाने लगते हैं और फिर यह एक लूप बन जाता है जिसमें हम फँसे रहते हैं।

इसलिए हम हर संभव यह प्रयास करते हैं कि वह स्थिति हमारे सामने न आए। हम अपनी आत्मा की उन गुफाओं का साक्षात्कार न करें। पर यह भी सच है कि जब तक हम उन गुफाओं का साक्षात्कार नहीं करेंगे, हम ख़ुद पर नियंत्रण नहीं कर पाएँगे, ख़ुद के जीवन को सुंदर नहीं बना पाएँगे। यह जीवन बाहरी आवरण में सुंदर नज़र आएगा, लेकिन अंदर से यह खोखला होता रहेगा।
ठीक यही चीज़ परिवार के साथ भी होती है। हम परिवार में छिपी दरारों को नहीं देख पाते। वो दरारें जो किसी गुफा में खुलती हैं जहाँ पर हमारे परिवार के रहस्य दफ़न होते हैं। या यूँ कहें कि क़ैद होते हैं जिनको हम अपनी मेमरी में भी नहीं लाना चाहते। लेकिन जब तक हम उन्हें फ़ेस नहीं करेंगे, हम अपने दुख से बाहर नहीं पाएँगे।

फिर हम जीवन में आगे बढ़ते हैं। तो हम देखते हैं, सुनते हैं, पढ़ते हैं और समझते हैं कि हमारे परिवार ने हमें किस तरह बंधक बनाया हुआ था। और फिर हम उससे मुक्त होने का प्रयास करते हैं। हम जीवन में जितनी नई चीज़ें पढ़ते हैं, उनके आधार पर हम अपने परिवार को जज करते हैं। हम हर नई चीज़ अपने परिवार में ही लागू करना चाहते हैं। हमारी बड़ी इच्छा होती है कि जो भी हमने सोचा, वो हमारे परिवार में परिपाटी बनकर चले। क्योंकि वहाँ पर हमारा अधिकार होता है, हमें यक़ीन होता है कि लोग हमारी बात मान लेंगे। इन तमाम लड़ाई-झगड़ों के बावजूद। और यह सिर्फ़ हाई एजुकेशन प्राप्त लोगों के साथ ही नहीं है, जो भी व्यक्ति बाहर होकर आता है, नए अनुभवों से गुज़रता है, वो अपने परिवार में उन अनुभवों को लागू करना चाहता है।

जैसे कि पहले आर्मी में काम करने वाले जवान छुट्टियों में घर आकर सबसे पहले घर के बच्चों को वही रुटीन फ़ॉलो कराना चाहते थे जो आर्मी में उन्हें ख़ुद करना पड़ता है। बिना यह सोचे कि बच्चे क्या चाहते हैं, उनका आदेश बच्चों पर लाद दिया जाता। उसी तरह बड़े विश्वविद्यालयों से पढ़े लोग अपने घर की तरफ़ देखते हैं तो उन्हें स्वाभाविक रूप से ग़ुस्सा आ जाता है और वह तत्काल प्रभाव से अपने घर के सारे रीति-रिवाज़ों को बदलना चाहते हैं। चाहे वो पर्व-त्योहार का मसला हो, जाति-धर्म-लिंग की बात हो, वह अति आधुनिक विचारधारा को घर में लागू करना चाहते हैं।

पर बिना यह समझे कि परिवार उसके लिए तैयार है या नहीं। जैसे कि किसी देश में जब पहली बार डेमोक्रेसी लागू की जाती है तो पहले यह देखा जाता है कि यह देश इन नए विचारों के लिए तैयार है कि नहीं। जब भारत में डेमोक्रेसी लागू की गई तब पाया गया कि अंग्रेज़ी राज के डेढ़ सौ सालों में भारतीय जनता ने डेमोक्रेटिक रूप से लड़ना, चुनाव करना और अपनी हिस्सेदारी जताना सीखा था—अपने तरीक़े से। तब जाकर यह डेमोक्रेसी लागू हो पाई और चली भी। जिन देशों में जनता तैयार नहीं थी, वहाँ पर डेमोक्रेसी का प्रयोग असफल हुआ।

इसी तरह परिवार का कॉन्सेप्ट भी काम करता है। परिवार में भी कोई नया आईडिया एकदम से लागू नहीं किया जा सकता। यहाँ भी अगर डेमोक्रेसी लागू करनी है तो सबसे पहले व्यक्ति को ख़ुद फ़ुल डेमोक्रेट बनना होगा, अर्थात ढेर सारा धैर्य ख़ुद में पैदा करना होगा। बिना इस धैर्य के हम कहाँ तक सफल हो पाएँगे? फिर तो हम अपने परिवार की दरारों को न तो देख पाएँगे और न ही समझ पाएँगे। ज़रा-सी समस्या में हम परिवार से भागना शुरू कर देंगे। लेकिन यह हमारा पीछा नहीं छोड़ता।

“परिवार के साथ हमारी नाराज़गी इस बात की होती है कि परिवार हमें ख़ुद से नफ़रत करना सिखाता है, हमें ख़ुद को नापसंद करना सिखाता है। जो परिवार हमें ख़ुद से प्रेम करना सिखाता है, वह परिवार बहुत ख़ुश रहता है।”

जब हम वर्कप्लेस पर जाते हैं तो हमारे पास ऐसे ही परिवारों के लोग होते हैं। जो प्रीटेंड तो करते हैं बिल्कुल बदले हुए इंसानों के रूप में लेकिन ज्योंही कॉन्फ़्लिक्ट होता है, परिवार की पॉलिटिक्स वहाँ भी सामने आ जाती है। वर्कप्लेस पर ऐसा कुछ नहीं होता जो एक परिवार में नहीं होता है। लोग अपने को बचाने के लिए झूठ बोलते हैं, कमज़ोर को दबाते हैं और अपने को ऊँचा दिखाने के लिए नीचता की हरकतें करते हैं।

इस प्रकार न तो हम परिवार के साथ ख़ुश रहते हैं और न ही वर्कप्लेस पर ख़ुश रहते हैं। हम सारी ख़ुशी उन चीज़ों में खोजते हैं जो हमें परिवार और वर्कप्लेस से दूर ले जाती हैं। इसमें सबसे आसान चीज़ होती है—नशे की वस्तुएँ। सिगरेट, ख़ैनी, तम्बाकू, गाँजा, शराब, ड्रग्स—ये सारी चीज़ें तुरंत अवेलेबल होती हैं। फिर इसके बाद आती हैं भावनात्मक चीज़ें। हम छुपाकर रिश्ते बना लेते हैं। कोई पुरुष किसी स्त्री से, और कोई स्त्री किसी पुरुष से—ये छुपे हुए रिश्ते हमारे परिवार और वर्कप्लेस के ख़िलाफ़ रिबेलियन यानी विद्रोह का काम करते हैं। हमें एक भयानक संतुष्टि मिलती है। इस प्रकार धीरे-धीरे हम अपने लिए एक लूप बनाते हैं जिसमें हर कोई फँस जाता है। ज़रूरी नहीं है कि हर व्यक्ति जीवन में यही मॉडल फ़ॉलो करता है, पर जिनके लिए ये मॉडल या इससे मिलता-जुलता एक अलग मॉडल है, उनके लिए ये बातें हैं।

हम हमेशा बात करते हैं स्वतंत्र रहने की, आज़ादी से अपना जीवन जीने की। और इसमें हमें पहली बाधा के रूप में नज़र आता है—परिवार। पर ऐसा नहीं है कि परिवार से मुक्त होते ही हम आज़ादी का जीवन जीने लगते हैं। हम एक परिवार से मुक्त तो हो जाते हैं लेकिन अपने जीवन में जितने लोगों से मिलते हैं, वो इन्हीं परिवारों से ही आए होते हैं, वही यादें, वही तड़प, वही ग़ुस्सा लिए हुए। इसलिए हम कहीं भी जाते हैं, हमें लोग वैसे ही मिलते हैं, अनुभव वही होते हैं। बस तरीक़ा बदल जाता है।

तो हम इसमें आज़ादी किस चीज़ की चाहते हैं? हम आज़ादी चाहते हैं इमोशन की। हम अपने इमोशन को महसूस करना चाहते हैं, उसे स्वीकार करना चाहते हैं, हम यह भी चाहते हैं कि हमारे अपने लोग भी उसे स्वीकार करें, उसे झुठलाएँ नहीं, उसे सम्मान दें। अगर हमें परिवार में यह आज़ादी मिल जाए और हमारे परिवार के हर व्यक्ति को यह आज़ादी मिल जाए तो क्या हम परिवार से भागेंगे, क्या उससे नफ़रत करेंगे? क्या हमारा जीवन आसान नहीं हो जाएगा इसके बाद?

कोरोना के वक़्त हमने परिवारों की ज़रूरत को सबसे ज़्यादा महसूस किया। यह दो साल हमारे लिए आँखें खोलने वाले हैं। लोगों को अचानक अहसास हुआ कि सारी अचीवमेंट, सारी धन-संपत्ति, सारे कॉन्टैक्ट्स—सबका जीवन में कोई महत्व नहीं है। जीवन ख़त्म, ये सब कुछ ख़त्म। अंत में आपको अपना परिवार ही याद आता है। आप उनके साथ ही वक़्त बिताना चाहते हो। आप उन्हीं से लड़ना चाहते हो, उन्हीं से प्यार करना चाहते हो।

अंशु 2011 में अमेरिका चला गया और चार-पाँच साल में उसने तेज़ी से प्रगति की और बहुत पैसे कमाने लगा। वह जो काम करना चाहता था, वो कर पा रहा था। लेकिन जब 2016 में वह भारत वापस लौटा तो उसने पाया कि उसके माँ-बाप बूढ़े हो गए हैं। अमेरिका वापस जाकर उसे अहसास हुआ कि उसके माँ-बाप के पास अब वक़्त बहुत कम बचा है। उसने अनुमान लगाना शुरू किया तो पाया कि वह तो 2005 से अपने घर से बाहर है और मुश्किल से आठ या दस बार अपने माँ-बाप से मिल पाया है—पिछले दस वर्षों में। आने वाले कुछ वर्षों में चार या पाँच बार और मिल पाएगा। इसके बाद उसके माँ-बाप ही नहीं रहेंगे। अंशु के इस ख़याल ने उसका दिल तोड़ दिया। वह अपने माँ-बाप की मृत्यु से निकटता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। फिर उनसे तुरंत एक निर्णय लिया। वह नौकरी छोड़कर अपने गाँव तो नहीं आ सकता था लेकिन अब वो रोज़ाना वीडियो कॉल कर अपने माँ-बाप से बात करने लगा। अंशु का यह कहना था कि कम-से-कम अपने माँ-बाप को बूढ़ा होते हुए तो वो देख सकता है। जैसे वो उसे बड़ा होते हुए देख रहे थे।

हर कोई गूगल का सीईओ ही नहीं बन सकता। बहुत से लोग नौकरियाँ करते हैं और एक मॉडरेट इनकम में गुज़ारा करते हैं। ऐसे में वो अगर अपने करियर के लिए बाहर घंटे-पंद्रह घंटे काम करते भी हैं तो क्या हासिल कर लेंगे? एक फ़्लैट के बजाय दो फ़्लैट ख़रीद लेंगे। आप इससे ज़्यादा नहीं ख़रीद पाएँगे। हम सामान्य स्थितियों की बात कर रहे हैं। कुछ व्यक्ति सामान्य से ज़्यादा हासिल करते हैं और उनकी संख्या कम है। जब आप एक सामान्य स्थिति से ऊपर पहुँच जाते हैं तब आप परिवार को मैनेज कर सकते हैं क्योंकि आपके पास आने-जाने की सुविधा रहती है। आपको यह डर नहीं होता कि आप माँ-बाप के पास जाएँगे तो आपका काम ख़राब होगा। बीच के स्तर और निचले स्तर पर यह समस्या ज़्यादा है। ऐसा माहौल होता है कि आप नहीं रहेंगे तो कोई काम ही नहीं हो पाएगा। तो कोरोना काल में लोगों ने यही महसूस किया कि वो नहीं भी रहेंगे तब भी काम हो जाएगा इसलिए उस वक़्त में अपने परिवार का साथ मिस करना, उनके साथ वक़्त न बिताना बेवक़ूफ़ी है।

अब उद्देश्य यह है कि परिवारों को कैसे आगे बढ़ना चाहिए, कैसे इवॉल्व करना चाहिए और कैसे बदलते समय में परिवार ख़ुद को बनाए रख सकते हैं। अगर ऐसा नहीं करेंगे, तो परिवार बिखर जाएंगे। क्योंकि आने वाले वक़्त में मेटावर्स, थ्री डी, फ़ाइव डी या इसी तरह की बिल्कुल व्यक्तिगत अनुभव वाली ज़िंदगी हो जाएगी। लोग ख़ुद में जीने लगेंगे, बिल्कुल अकेले। लोगों की अपनी डिमांड पर फ़िल्में बनेंगी, मैच होंगे और बिल्कुल व्यक्तिगत एक्सपीरियंस होगा। ऐसा लगेगा कि लोगों को किसी की ज़रूरत ही नहीं है। कुछ समय तक तो यह अच्छा लगता है। पर मनुष्य है तो सामाजिक प्राणी, इमोशनल प्राणी। फिर धीरे-धीरे ऐसे में लोगों को अकेलापन भी सालने लगेगा और मानसिक बीमारियाँ बढ़ेंगी। इमोशनल समस्याओं को सहने की क्षमता कम हो जाएगी। लेकिन आस-पास लोग नहीं होंगे क्योंकि आस-पास के लोग भी इसी अनुभव से गुज़र रहे होंगे। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है या ये कोई गल्प नहीं है। संयुक्त परिवार से न्यूक्लियर परिवार और धीरे-धीरे उसमें भी हर किसी का फ़ोन में रहना इसी बात को दर्शाता है। आज चाहे डाइनिंग टेबल हो या फिर ड्रॉइंग रूम हो या फिर चौपाल हो—सारे लोग फ़ोन में लगे रहते हैं। यही आदत विकसित होते-होते बिल्कुल अकेलेपन में पहुँच जाएगी। इसमें परिवार की ज़रूरत होगी।

“परिवार में ही हम यह भी सीखते हैं कि तरह-तरह के लोगों का सामना कैसे करना है क्योंकि ठीक ऐसे ही लोग हमें बाक़ी दुनिया में भी मिलते हैं। तो परिवार में दुनिया में रहने की ट्रेनिंग देता है। अगर यह ट्रेनिंग प्रेम से समर्थित है तो फिर धरती पर ही जन्नत है।”

तो हमें अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण हिस्से को सुधारना है, अगर हम ख़ुश रहना चाहते हैं तो। इसके लिए ज़रूरी है कि हम परिवार की संरचना और उसकी दरारों को पहले जानें और फिर समझें। किसी डेमोक्रेसी की तरह परिवार के सारे डार्क हिस्सों को समझना ज़रूरी है। बहुत सारे काग़ज़ात कॉन्फ़िडेंशियल होंगे जो तीस साल या चालीस साल बीतने के बाद ही सार्वजनिक किए जा सकेंगे। इसके साथ ही लड़ाई चलती रहेगी सच जानने की। लेकिन अगर इसे चलाना है तो इसके सारे श्वेत-श्याम-धूसर रंगों को समझना ही होगा।

परिवार हमारी सबसे बड़ी ताक़त बन सकता है और सबसे बड़ी कमज़ोरी भी। पुराने ज़माने में राजा-महाराजा तमाम सुख-सुविधाओं, तमाम दिक़्क़तों, तमाम युद्धों के बावजूद कभी परिवार को छोड़ते नहीं थे। उनके परिवार में एक से बढ़कर एक षड्यंत्र होते थे, पर इसके बावजूद वो उनको साथ रखते थे। क्योंकि परिवार ही आपको राजा बनाता है। अंत में जाकर कॉर्पोरेट भी तो यह कहना शुरू कर देता है कि हम सभी एक परिवार हैं। तो फिर हम अपने परिवार को क्यों छोड़ें? आख़िर, इससे तो इमोशनल बॉन्ड भी है, कॉर्पोरेट के साथ तो दस रुपये एफ़िडेविट वाला बॉन्ड है।

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