कहानी : तय
आनंद बहादुर
06 अगस्त 2026
‘तय’—हिंदी कहानी की स्थापित व्याख्या से परे जाती है। ‘तय’ के बारे में तय नहीं है कि यह एक परीकथा है या फ़ैंटेसी। इसमें अंतश्चेतना के प्रवाह की तकनीक का सूक्ष्म प्रयोग हुआ है। कहानी में नायक और नायिका के बीच जो घटता है, वह फ़ैंटेसी है कि किसी उच्चतर कोटि की वास्तविकता? पाठक चाहे तो याद रख सकता है कि कथावाचक ने कहीं भी यह संकेत नहीं दिया है कि वह टेलिपैथी जैसी किसी चीज़ से रूबरू है। उसके लिए वह सब कुछ सहज, स्वाभाविक ढंग से घट रहा है। वह अपनी स्थिति को उसी सहजता से स्वीकार करता है, जिस सहजता से काफ़्का की कहानी में ग्रिगुआ सम्सा स्वीकार कर लेता है कि वह एक बहुत बड़े गुबरैले में बदल गया है। तो चलिए पढ़ते हैं यह कहानी, जो अनेक स्तरों पर चौंकाती है, लेकिन अपनी विश्वसनीयता कभी नहीं खोती।
हमने बोलने पर जाने कितने खरबों शब्द ख़र्च कर दिए थे, जिनका नतीजा कुछ नहीं निकला था। अंत में जाकर हमारी आँख खुली कि हमें बोलना नहीं चाहिए। मगर फिर एक-दूसरे से जुड़ें कैसे? इसका समाधान अपने आप निकला। बहुत दिन तक नहीं बोलने के बाद एक दिन उसने मुझे फ़ोन किया। मैंने तुरंत उठाया, मगर उधर से कोई आवाज़ नहीं आई। वह प्रतीक्षा कर रही थी कि पहले मैं कुछ कहूँ। मगर मैंने भी कुछ नहीं कहा, मगर फ़ोन काटा नहीं। उसने भी उस तरफ़ से कुछ नहीं कहा। मगर हैरत, उसने भी फ़ोन नहीं काटा। वह भी उस ओर फ़ोन को कान में सटाए बैठी रही। हम दोनों देर तक एक-दूसरे की ख़ामोशी को सुनते रहे।
उसके बाद यह तय हो गया कि अब हम एक-दूसरे से बात नहीं करेंगे। कि हम एक-दूसरे को फ़ोन करेंगे, मगर एक शब्द भी नहीं बोलेंगे। हम सिर्फ़ सुनेंगे। उस ख़ामोशी को, जो हमारे बीच मौजूद होगी। वह क्या बोलती है, समझने की कोशिश करेंगे। हम अपने-अपने मन में सोचेंगे कि सामने वाले ने क्या कहा, और फिर मन-ही-मन उसका जवाब देंगे। फिर उस जवाब पर सामने वाले ने क्या कहा, इसे सोचेंगे। हम जो कुछ भी सोचेंगे, उसे ही सत्य मानेंगे, जिस तरह तब मानते, जब आमने-सामने एक-दूसरे से बात करते थे। तब यह शक करने की गुंजाइश नहीं होती थी कि सामने वाले ने वह नहीं कहा, जो हमने सुना। मगर तब यह शक हमेशा मौजूद रहता था कि कहीं वह झूठ का सहारा तो नहीं ले रहा या रही? मगर अब इसमें से झूठ कपूर की तरह उड़ गया है। अब सब कुछ सच की बाँहों में है।
सच बात तो यह है कि इस बात का फ़ैसला भी हमने ख़ामोशी में ही लिया। न उसने कुछ प्रस्तावित किया, न मैंने ही कोई मुहर लगाई या ठप्पा। बस, अपने आप एक रोज़ फ़ैसला हो गया। हम दोनों बिना बोले ही इस बात को समझ गए। उसने उस दिन अचानक कॉल किया और कुछ नहीं बोली। इधर जाने कैसे मैंने भी कॉल उठाने की पारंपरिक रस्म नहीं निभाई। मैंने बस कॉल उठाया और देर तक सुनता रहा। पहले ही एकाध पल में मैं समझ गया था कि फ़ोन के उस ओर वही है, कोई और नहीं, जो उसके फ़ोन का ग़लत इस्तेमाल करना चाहता है। और मैं सुनता रहा। मन लगाकर, देर तक।
जाने कितनी बातें इसी बीच उसने मुझसे कीं। इतनी सारी बातें कि हैरत होती, अगर वह ये सारी बातें बोलकर करती। बल्कि ऐसा करना संभव ही नहीं होता। और मैं हर बात को कितना साफ़-साफ़ सुनता-समझता गया। अपनी तरफ़ से जो भी कहना था, वह सब मैंने कहा। उधर से वाक़ई वह वे सारी बातें उतनी ही साफ़-साफ़ सुन रही थी।
बहुत देर तक बात करने के बाद हमने तय किया कि आज बहुत बात हो गई है और फ़ोन काट दिया जाना चाहिए। यह बात उसने मुझसे कही। मैंने पूरी तरह साफ़-साफ़ यह बात सुनी और फ़ोन काट दिया। इससे वह बहुत संतुष्ट हुई और उसकी ख़ुशी फ़ोन कटने के बाद भी उस ओर से मेरी तरफ़ आ रही थी।
वह दिन अपार ख़ुशियों का था। अनेक अच्छी-अच्छी बातें उस दिन घटती रहीं। मैं बेहद शानदार मूड में रहा, जैसा कभी नहीं हुआ था। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि मुझे पता चल रहा था कि वहाँ वह भी बहुत ख़ुश थी। वह बहुत से लोगों से मिल रही थी। बोल वह बहुत कम रही थी, मगर अपनी बातें सबको बेहतर तरीक़े से समझा पा रही थी।
अगली बार मैंने ही उसको फ़ोन किया। मैं इतना व्यग्र था कि मुझसे वह एक दिन मुश्किल से काटे नहीं कट रहा था। ख़ैर, जैसे-तैसे करके मैंने वह दिन गुज़ारा और रात काटी। फिर अगले रोज़ मुझे ख़ुद ही पता चल गया कि वह मेरे फ़ोन का इंतज़ार कर रही है, और वह इस समय बिल्कुल खाली है। मैंने उसे फ़ोन किया।
उसने तुरंत उठाया। इतनी जल्द तो वह तब भी नहीं उठाती थी, जब हम एक-दूसरे से बोलकर बातचीत करते थे। मानो उसको पता हो कि मैं इधर नंबर डायल कर रहा हूँ।
कुछ दिनों तक ऐसा ही होता रहा। जल्दी-जल्दी फ़ोन करना। जैसे नए-नए प्रेम में होता है। तुरंत-तुरंत देखने की चाहत। मगर फिर गाड़ी एक लय पकड़ लेती है। धीरे-धीरे बात करने का (यदि उसे ‘बात’ करना कहा जा सके) सिलसिला एक तयशुदा गति में आने लगा था। यह नतीजा था इस बात का कि हम अब एक-दूसरे को बहुत आसानी से समझ पा रहे थे। इसमें एक तरह की चैन की स्थिति बन रही थी। कुछ नहीं कह पाने का, बात अधूरी छूट जाने का भय कम होता चला गया।
अक्सर ऐसा होता कि बात करते हुए मुझे उसकी अकल्पनीय सुंदरता का पता चलने लगता। सुंदरता, जो जिस्म और रूह को एक करती चलती है। वह भी अपनी ओर से यही सब कुछ कहती रहती। वह बताती रहती कि मैंने कौन-से रंग के कपड़े पहन रखे हैं, और जब मैं हैरत से अपने कपड़ों को देखता, तो पाता कि उसकी बात सौ प्रतिशत सही है। यहाँ तक कि ख़ुद मुझे, जब तक वह बताती नहीं, पता नहीं रहता कि मैंने कौन-से रंग के कपड़े पहन रखे हैं। धीरे-धीरे मुझे यह भी पता चलने लगा कि मुझे किस रंग के और कौन-से कपड़े पहनने चाहिए। उसकी सलाह कितनी सटीक होती थी, इसका पता मुझे अन्य लोगों के कॉम्प्लीमेंट्स से चलने लगा। अक्सर कोई न कोई कह उठता कि आजकल मैं बेहतर कपड़े पहनने लगा हूँ, कि मेरा टेस्ट बेहतर होता जा रहा है।
इसके साथ ही मुझे भी पता चलने लगा कि उसने कैसा मेकअप कर रखा है, कैसे कपड़े पहन रखे हैं, उसकी ईयररिंग कैसी है, आज उसने किस रंग की नेलपॉलिश लगाई है, आदि। ओह! एक स्त्री के पास कितना कुछ अधिक होता है अपने आप को एक्सप्रेस करने का, पुरुषों की तुलना में! पहले मैं इन बातों को लगभग नज़रअंदाज़ कर देता था, या कहें कि वे मुझे दिखती ही नहीं थीं। जबकि वे एक स्त्री के जीवन का इतना ज़रूरी हिस्सा होती हैं।
मुझे अब लगने लगा कि जब तक आप एक स्त्री को ख़ामोश होकर नहीं देखें, तब तक आपको उसके व्यक्तित्व के सबसे ज़रूरी आयाम पता नहीं चलते। हम पुरुष दरअस्ल अपनी स्त्रियों को देखकर भी नहीं देख रहे होते हैं। अब जब मैं उसके साथ एक ख़ामोश बातचीत में था, तो नतीजा यह निकला कि अब मैं जिस किसी भी स्त्री को देखता, ख़ामोश होकर रह जाता। पता नहीं उस बात में ऐसा क्या था कि लगा, उनमें से ज़्यादातर स्त्रियाँ इसको अंदर-ही-अंदर पसंद कर रही हैं। वे अपनी ओर से यह सब बताती तो नहीं थीं, मगर जिस अंदाज़ में वे भी तुलनात्मक रूप से ख़ामोश होतीं और जिस तरह से मेरी ओर देखतीं, उससे यही संदेश आ रहा होता। उनमें से बहुत-सी स्त्रियाँ ऐसी थीं, जिनके बारे में मेरा अच्छा इम्प्रेशन नहीं था, मगर अब ऐसा लग रहा था कि मुझे अपनी वह सारी पुरानी सोच बदलनी पड़ेगी।
इसके साथ ही, एक बेवफ़ाई जैसी चीज़ का जन्म मेरे मन में हुआ। मैं समझने लगा कि वह, जो मेरी सब कुछ बनी जा रही थी, उसमें ऐसी कोई ख़ास बात नहीं थी। उसकी जिस अदा पर मैं रीझा हुआ था, यानी बिना बोले बात करने और समझने की, वह हर स्त्री की अदा हो सकती है। किसी भी स्त्री में वह सिफ़त पैदा की जा सकती है। बस, हम उसे उस तरह से बरत सकें। यह हमारे ही बरतने की सीमा है, जो हमें रोकती है।
फिर इसके साथ ही, पुरुषों के बारे में भी मेरा मन खुलने लगा। वहाँ भी एक अँधेरा था, जिसमें रोशनी आने लगी।
मगर अब उसके ख़ामोश साथ की बात, वह तो अब और भी बहाव में थी! हम अपनी गुफ़्तगू में अंदर और अंदर, बहुत गहरे धँसते चले जा रहे थे। पता नहीं कि हम कहाँ, किन अतल गहराइयों में खो जाने वाले थे।
इसी बीच एक बार उसने मुझे उसी ख़ामोशियत में कहा—फ़ोन रख दो और तब बात करो। यह एक नई स्थिति थी। अब तक हम रिंग करते और फ़ोन कान में सटा लिया करते थे। फिर बिना बोले एक-दूसरे को सुनते रहते; अब वह कह रही थी कि हमें फ़ोन की ज़रूरत भी नहीं थी। हम उसके बिना भी एक-दूसरे से बात कर सकते थे।
मुझे इस बात पर तुरंत यक़ीन हो आया। हाँ, सही ही तो है, मैंने सोचा। फ़ोन की आख़िर क्या बिसात? तो फिर मैंने फ़ोन काटकर अपना सेल नीचे रख दिया। मैंने साफ़ सुना, उसने भी अपना फ़ोन सामने की टेबल पर रख दिया है। हालाँकि उसने भी अपना फ़ोन काटा होगा, मगर मैंने उसके नीचे रखे जाने की साफ़ ‘ठक’ सुनी। और अब हम एक-दूसरे के आमने-सामने थे। एक दूसरे ही तरीके से। बिल्कुल आमने-सामने, एकदम क़रीब, इतने कि एक-दूसरे को छू सकते थे। चाहते तो लिपट भी सकते थे। एक-दूसरे में समा जा सकते थे। और अब हम एक-दूसरे को बिल्कुल साफ़-साफ़ सुन रहे थे। बिल्कुल अपने अंदर।
वह पहला दिन था, जब हमने उस तरह से बात की थी। अब हमें बात के लिए मोबाइल फ़ोन की क़तई कोई ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वह एक तरह का सम्मन हुआ करता था, जो दोनों के मन में गूँजने लगता और हम अपना-अपना काम छोड़-छाड़कर अपने एकांत में बैठ जाया करते, मानो दो तपस्वी हों। प्रेम-तपस्या में लीन प्रेम-तपस्वी।
उसके बाद एक बहुत बड़ा बदलाव मैंने महसूस किया अपने अंदर। मन बिल्कुल शांत रहता। जैसा किसी संत या तपस्वी का होता है। पहले रात दिन पाने-खोने का भय सताता रहता था। अब मुझे लगता कि वह मेरी अपनी है एकदम अपनी। वह कहीं जा नहीं सकती। किसी और की हो नहीं सकती। कभी खो नहीं सकती। पहले जब हम फोन के माउथपीस पर बोलकर बात किया करते थे, तो हमारी मुख्य चिंता इस बात की रहती थी कि हमारा मिलन कैसे हो। कि हम कहाँ जाएंगे। हम दुनिया के रंग, जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी मेरा तुम्हारा, पसंद-नापसंद के मकड़जाले को तोड़कर कैसे मिल सकेंगे। कैसे एक हो सकेंगे। इस चिंता में अक्सर हमारी आपस में तू-तू-मैं-मैं होने लगती थी। हम अपनी गलती को एक-दूसरे पर लादने लगते थे। एक दूसरे पर आरोपों की बौछारें करने लगे थे। धीरे-धीरे मुझे तो लगने लगा था कि हमारा रिश्ता बहुत जल्द टूट जाने वाला है।
और अब! जब हमारे बीच कुछ नहीं था। कोई शक-सुबहा नहीं। कोई अगर-मगर नहीं। कोई भ्रम, कोई भुलावा नहीं। अब मुझे लगता, वह सदैव मेरे पास है; उसे मुझसे कोई छीन नहीं सकता। उधर उन मौन आत्मिक वार्तालापों में वह भी यही भरोसा जताती थी।
और अब न जाने कैसे ऐसा हुआ कि अब प्रकृति स्वयं हमारे मिलन को सफल बनाना चाहने लगी। वह तरह-तरह से हमें नज़दीक लाने लगी। अनेक अवसर आने लगे, जो हमें एक-दूसरे के रूबरू होने का मौक़ा दे रहे थे। मैं किसी कार्यक्रम में कहीं जाऊँ, तो लगे वह दूर से मेरी तरफ़ आ रही है। मैं बिल्कुल डर जाऊँ।
इतने दिनों की ख़ामोशी के बाद अगर हम आमने-सामने होते, तो एक-दूसरे से क्या बोलते? कैसे अभिवादन करते? वही सड़ा-सा ‘हाय, कैसे हो?’, ‘हाय, कैसी हो!’ या और कुछ। और फिर यह जो जन्नत हमने रच रखी है, इसका क्या होता? यह बची रहती, या पहले शब्द के साथ ही एक उजाड़ वीराने में बदल जाती? दोज़ख़ से कहीं पीड़ादायक?
तो मैं क्या करूँ कि तुरंत पलट जाऊँ। पलटते ही मेरे मन में उसकी आवाज़ आने लगती—बिल्कुल सही किया। मैं भी पलटने ही वाली थी।
कभी सोचूँ कि वह महज़ वहम था। मगर वहम जैसा तो हमारा सारा अस्तित्व ही हो चला था। वहम, जो ज़िंदा हो गया था।
मगर प्रकृति जो थी कि वह भी अपनी बात पर अड़ी हुई थी। अवसर पर अवसर आने लगे। मुझसे बात करने वाले ज़्यादातर लोगों के ज़िक्र में वह आने लगी। उसकी ख़ूबियाँ गिनाई जाने लगीं। कुछ इस अंदाज़ में कि जैसे कहीं हमारे जान-पहचान की किसी स्त्री की चर्चा हो रही हो, तो कुछ देर बाद ज़रूर कोई न कोई उस स्त्री की उससे तुलना कर देता या कर देती। इस तरह की तुलना में हमेशा उसे बेहतर साबित किया जाता। हद तो तब हुई, जब घर के एक बुज़ुर्ग ने ऐसी ही एक तुलना के बीच मेरी ओर ताकते हुए कहा, “वह जिसके घर जाएगी, उसके जीवन को स्वर्ग बना देगी।”
अब क्या हुआ कि हम दोनों अपने-अपने घरों में एक निविड़ एकांत में बैठे एक ख़ामोश आलाप में उस स्वर्ग की कल्पना करते रहते। उस स्वर्ग में सबसे बड़ी कमी इस बात की होती कि उसमें हम दोनों एक-दूसरे से बातें कर रहे होते। एक ऐसी चीज़, जिसे हम दोनों ने जीवन से निकाल दिया था, विदा कर दिया था, शायद हमेशा के लिए? उस स्वर्ग में जैसे ही हम बात करना शुरू करेंगे कि वह ख़ामोश स्वर्ग एक कोलाहलनुमा नर्क में बदल जाएगा, जो किसी भी शादीशुदा जोड़े के जीवन का हिस्सा होता है। अस्सी प्रतिशत नर्क और बीस प्रतिशत स्वर्ग। वह जीवन तो मैं किसी भी स्त्री के साथ जी सकता हूँ, मैं सोचने लगता। उधर से वह भी हाँ में हाँ मिलाती जाती। “नहीं, अब हम ऐसे स्वर्ग के योग्य नहीं रह गए,” वह बोलती, और वह ख़याल मेरे मन की ख़लाओं में गूँजा करता। जबकि यह सच है कि जब पहले-पहल हम दोनों मिले होंगे, तो हमने अपने लिए एक ऐसे ही स्वर्ग की कल्पना की रही होगी।
इसी से यह बात छनकर निकली कि हमें हर हाल में शादी नहीं करनी चाहिए। चाहे सारी प्रकृति हमारे मिलन के पक्ष में ही क्यों न आ खड़ी हुई हो। और सचमुच प्रकृति हमें मिलाने पर तुल गई लगती थी। वह अब हमारे घर के सभी लोगों को बहुत पसंद आने लगी थी, जबकि पहले उन्हीं लोगों ने हमारी राह में काँटे बोने का काम किया था। उसके घर में भी कुछ ऐसा ही माहौल बन रहा था।
मैं एक जगह और वह कहीं दूर दूसरी जगह, बैठे एक ख़ामोश मैसेंजर से एक-दूसरे को ये सारी सूचनाएँ पहुँचाते रहते। उसके घर में स्थिति मेरे घर से अधिक विकट थी। उसकी शादी तय होने लगी थी। एक लड़के को वह बहुत पसंद आ गई थी और उसका परिवार बिना दान-दहेज उसे अपनी बहू बनाकर ले जाने के लिए प्रकट हो गया था। उसके घर के लोग कह रहे थे कि वह या तो मेरे संग अपना मामला फ़ाइनल करे या उनकी पसंद के लड़के से शादी कर ले। मैं अजीब धर्मसंकट में था। एक तरफ़ तो मैं उससे शादी करके उस स्वर्ग को छिन्न-भिन्न नहीं करना चाहता था, जो हम दोनों ने अपने एकांत में रचा था। मगर यदि हम शादी नहीं करते, तो उसके घर के लोग उसकी शादी अपनी पसंद के लड़के के साथ कर देने वाले थे।
उसके बाद तो वह बिल्कुल ही खो जाती। ऐसा तो हो नहीं सकता था कि वह किसी अन्य की पत्नी बन जाती और मेरे साथ गुपचुप का वह खेल बदस्तूर खेलती रहती; ख़ासकर तब, जब उसका शरीर किसी और का हो जाता। मैं इस बात की कल्पना करके ही सिहर उठता था कि उसका जिस्म किसी और का हो गया है और वे हर रात यौन-क्रिया कर रहे हैं। यह बात उस तक अपने आप पहुँच जा रही थी, क्योंकि वह मेरी सोच से हर समय जुड़ी हुई थी। इस बात पर वह कुछ नाराज़-सी हो रही थी, क्योंकि उसे लग रहा था कि मैं उतनी दूर से उसका जिस्म देखने लगा हूँ।
और इसमें कुछ सच्चाई भी थी। क्योंकि पहले जो मैं उसे हमेशा कपड़ों में देखा करता था, अब शादी की बातबीच में आ जाने और उसके किसी अन्य के साथ रति-क्रिया में होने के ख़याल के आ जाने से, पहली बार मैं उसे उसके जिस्म में देख रहा था। उसी तरह, जैसे वह ख़ुद अपने जिस्म को देख सकती होगी। मानो उसका जिस्म केवल उसका न होकर मेरा भी हो।
मेरी ओर से ऐसा भले हो, मगर वह मेरे जिस्म को उस तरह नहीं देख पा रही थी। इसका कारण उसका नारी-मन था, जो ऐसी बातों में उतना इन्वॉल्व नहीं हो पा रहा था। मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाए, तो यह हमेशा पुरुष रहा है, जो स्त्री-देह को देखने का लोभी रहा है। स्त्री को पुरुष-शरीर उस प्रकार नहीं लुभा पाता। उसकी रुचि संबंधों में, प्राप्ति में अधिक होती है, और यह प्राप्ति भावनात्मक और आत्मिक क़िस्म की होती है। मुझे पता है, आजकल स्त्रियाँ सेक्स को लेकर ज़्यादा खुलकर सोचने लगी हैं। मगर फिर भी, हज़ारों सालों से एक वर्जनात्मक वातावरण में जीने का असर यही है कि ऐसी चीज़ों—जैसे एक नग्न पुरुष-देह—के बारे में वे वोयेरिज़्म की दोषी नहीं कही जा सकती हैं।
जब उसने पाया कि मेरी गतिविधि ऐसी दिशा में मुड़ गई है, जिसको लेकर वह सहज नहीं है, तो एक प्रतिरोध उसके अंदर पनपा। वह चाहने लगी कि मैं अपनी कल्पना पर लगाम लगाऊँ। मगर वह मेरी कल्पना नहीं थी। वह एक सहज-स्वाभाविक पुरुषीय प्रतिक्रिया थी, जिस पर स्वयं पुरुषों का नियंत्रण नहीं होता। किसी पुरुष को अगर कहा जाए कि अमुक स्त्री की ओर मत देखो, तो वह चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाएगा। बल्कि वर्जना उसे और वही काम करने को बाध्य करने लगेगी। वह और देखने लगेगा। किसी स्त्री की दिशा में ताकना छोड़ने के लिए, पुरुष को पुरुष होना छोड़ना पड़ेगा। उसे अपना सेक्स परिवर्तित करवा लेना पड़ेगा। हालाँकि, मुझे शक है कि वह तब भी स्त्री की ओर देखने की अपनी आदत को नहीं छोड़ पाएगा।
मैं लगातार मूक संवादों के ज़रिए ये सारी बातें उसे बताता था। वह मनोवैज्ञानिक कारणों को समझती, मगर फिर भी अपने को असहज होने से रोक नहीं पाती थी। क्योंकि वह भी तो आख़िर, स्त्री होने के चलते ही वैसी थी।
इसलिए उसने हारकर एक कदम उठाया। एक दिन उसने मुझे अचानक कॉल कर लिया। नहीं, अचानक नहीं, क्योंकि हम जिस आंतरिक जुड़ाव में जी रहे थे, उसमें अचानक की कोई संभावना ज़िंदा नहीं थी। मैं हैरत में नहीं था। मैं जान गया था कि वह ऐसा ही करने वाली है। वह भी जान गई थी कि मैं उसके फ़ोन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
मेरा फ़ोन कहीं पर रखा-रखा गुम-सा हो गया था। दरअस्ल अब मैं फ़ोन का बहुत कम इस्तेमाल कर रहा था, इसलिए उसे कहीं भी रखकर भूल जाया करता था। जैसे ही मुझे पता चला कि वह अपना फ़ोन लाने गई है, मैं भी अपना फ़ोन खोजने लगा, मगर वह मिल नहीं रहा था। उसके फ़ोन की घंटी की आवाज़ ने ही मुझे बताया कि वह कहाँ रखा हुआ था।
उसे पता चल गया था कि मैं अपना फ़ोन ढूँढ़ रहा हूँ, इसलिए उसने देर तक रिंग होते रहने दिया। आख़िर मेरा फ़ोन मिल गया और मैंने उसे उठाकर कान से सटा लिया। अब हम दोनों कान से फ़ोन सटाए देर तक बैठे हुए थे।
यह उन पिछले दिनों जैसा ही था, जब हम फ़ोन को कान पर सटाए-सटाए एक-दूसरे को सुनते रहते थे। मगर लगता था कि कहीं कुछ छूट गया था इसी बीच। आप किसी भी क्रिया के ज़रिए अतीत को नहीं पकड़ सकते। अगर सब कुछ एक जैसा हो भी जाए, तो बीच का गुज़रा हुआ वक़्त उसमें एक इतिहास जोड़ देता है। एक इतिहास यहाँ भी था। पहले एक चढ़ाई चढ़ने का आभास था। इस बार लगा, किसी ढलान से उतरे हैं। मान लीजिए आप किसी पहाड़ की चोटी पर चढ़ते समय किसी एक राहतनुमा चट्टान पर सुस्ताने बैठे हों। और फिर शिखर पर चढ़ लेने के बाद वापस उतरते हुए फिर उसी चट्टान पर सुस्ताने के लिए बैठ गए हों। चट्टान भी वही है, आप भी वही हैं, मंज़र भी वही है। थकन भी, मान लीजिए, लगभग वैसी ही है, और राहत भी। मगर एक इतिहास आपके और चट्टान के साथ जुड़ गया है, जो अब कहीं नहीं जाएगा। और हो सकता है, पहाड़ की चोटी पर आपके साथ जो वाक़या घटा हो, उसने कोई और त्रासद आयाम भी जोड़ दिया हो, जिसका पता चट्टान को न चल पाए। और ऐसा भी तो हो सकता है कि आप चोटी तक पहुँचे ही न हों और बीच में ही हारकर लौट पड़े हों। तो फिर तो मामला और विकट हो जाएगा। चट्टान इसे कैसे समझ पाएगा?
हम दोनों के बीच ऐसा ही कुछ घट रहा था। हम अपनी मंज़िल तक पहुँच भी नहीं पाए और अब उसी रास्ते वापस लौट रहे थे, जिससे ऊपर गए थे। इतनी ढेर सारी उम्मीदें लेकर।
जैसे ही फ़ोन हमारे बीच लौटा, हमारे बीच की वह मानसिक उपस्थिति न जाने पिघलकर कहाँ हवा हो गई। अब जब हममें से कोई एकांत में बैठता, तो दूसरा क़तई पास नहीं फटकता। हम एक बार फिर अपने-अपने फ़ोन के सहारे थे। मानो फ़ोन, फ़ोन न होकर एक नाव हो, जो हमें खेकर कहीं ले जा रही हो; मगर नाव भी हमें कहीं ले नहीं जा रही थी। नदी में बहुत बड़े-बड़े पत्थर थे और उसका बहाव भी बहुत तेज़ हो गया था। साथ ही कई जगहों पर लील जाने को आतुर भँवर बन जा रहे थे। हमारे पास टोटके के लिए नदी में डालने को सिक्के भी नहीं थे।
हाँ, एक अंतर आया—उसे अब पता नहीं चल रहा था कि उसके जिस्म की क्या छवि मेरे मन में अभी भी बन-बिगड़ रही थी। मेरे मन में अभी भी जिस्म की वही तस्वीर थी, जो मुझे पागल बना रही थी, मगर यह बात अब उसे विचलित नहीं कर रही थी। इससे उसे राहत मिली थी। मेरे मन के पर्दे पर उस जिस्म की छवि अभी भी तैर रही थी, मेरी याद में वह अभी भी बसी हुई थी। मेरी साँसों में उस जिस्म की महक थी—ऐसे जैसे हमने अभी-अभी सहवास किया हो। इसलिए इधर से मेरी ख़ामोशी एक कामांध पुरुष का संदेश लेकर जा रही थी और उसकी ख़ामोशी एक दिव्य आत्मा का संदेश लेकर वापस लौट रही थी। हम एक-दूसरे को सुन नहीं पा रहे थे। मैं कुछ कह रहा था और वह कुछ सुन रही थी। वह कुछ कह रही थी और मैं कोई बिल्कुल दूसरी बात सुन रहा था।
उसके ऊपर अब परिवार का दबाव बढ़ने लगा था कि मुझ जैसे ख़ब्ती का साथ छोड़कर उनकी पसंद के लड़के से शादी कर ले। वह लड़का, जो उस पर जी-जान से फ़िदा था, उसके परिवार के लोग उसके घरवालों के पीछे हाथ धोकर पड़ गए थे। लग रहा था कि वह हाथ से निकल ही जाएगी। इधर मेरे घर के लोग भी अब न जाने कैसे अपनी वे सारी पुरानी तरफ़दारी भूलकर उसका मज़ाक़ उड़ाने लगे थे, जो उनकी निगाह में एक शापित आत्मा थी, जो मुझे बर्बाद करने पर तुली हुई थी।
अंत में हारकर एक दिन मैंने कुछ कहा। उस समय मेरे कान से मोबाइल फ़ोन सटा हुआ था, और नियम से मुझे कुछ बोलना नहीं था। मगर मैंने नियम की परवाह न करते हुए उससे कुछ पूछ लिया।
ऐसा लगा जैसे कहीं कोई शॉर्ट-सर्किट हुआ। इतनी ज़ोर से बिजली तड़कने की आवाज़ आई कि फ़ोन मेरे हाथ से गिर पड़ा और टूट गया। मुझे बाद में पता चलने वाला था कि बिल्कुल यही उसके साथ भी घटा था। उसका फ़ोन भी टूट गया था। दोनों फ़ोन इस बुरी तरह टूटे थे कि उनको सुधारना असंभव था। हारकर हम दोनों को नए फ़ोन ख़रीदने पड़े।
उन नए फ़ोनों में कोई ख़ास बात नहीं थी। उनके अंदर कोई टेलिपैथी नहीं थी। ऐसा लगा कि टेलिपैथी की वह शक्ति हम दोनों के अंदर नहीं, बल्कि हमारे उन फ़ोनों के अंदर रही होगी। क्योंकि अब हम दोनों बहुत सामान्य से चाहनेवालों में बदलकर रह गए थे। ऐसे लोग, जो एक-दूसरे को घंटों मैसेज करते रहते हों, मौक़ा मिलते ही देर तक चैट करते हों, बातें करते हों, बातों के बीच मिलने के अवसर का जुगाड़ करते हों, बातों के बीच शिकवा-शिकायत ले आते हों, कभी-कभी ज़ोर से झगड़ पड़ते हों। कभी-कभी इतनी ज़ोर से कि हफ़्तों तक एक-दूसरे से बातचीत बंद हो जाती हो।
जब हम ऐसे हो ही गए, तो हमने तय किया कि हमें शादी कर लेनी चाहिए। हमारे लिए यह राहत की बात थी कि अब हमारे पास विवाह का ऑप्शन था, जो मानो अभी तक खोया हुआ-सा था। जिसमें एक स्त्री को, एक पुरुष को, एक-दूसरे को, शारीरिक रूप से पाया जा सकता था।
जब हमने शादी करनी चाही, तो हम दोनों के घरवालों ने बीच में ज़बरदस्त अड़ंगेबाज़ी की। उनसे लड़-भिड़कर ही हम बहुत मुश्किल से शादी कर पाए। यानी यहाँ भी मामला बिल्कुल सामान्य रहा। एक असामान्य अफ़साने की इस तरह बेहद रटी-रटाई, लीक वाली इंतिहा हुई।
जब पहली रात मैंने उस शरीर को देखा, तो वह बिल्कुल वही शरीर था, जो मुझे एकांत के उन पलों में दिखा करता था।
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