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कहानी : खिल्ली विनाशालय

मेरे देश का नाम है—घरघराहट!

मेरा प्यारू देश है दुनिया का सबसे न्यारू देश और मेरे देश से बाहर जो भी हैं वे सब साले हैं झरझरालू देश। मेरा अपना पर्सनल नाम सुकुमार समस्या कुमार है। मेरे पैदा होने के बाद से ही कुछ न कुछ समस्या मेरे साथ बनी रही। पर मैं बहुत ख़ुश रहता हूँ, क्योंकि मेरा देश घरघराहट है और मेरे दिल में अपने देश की फुसफुसाहट है।

आज जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, उस कहानी से आप पाठकगणों को तीन सीख मिलेंगी। आपमें से ज़्यादातर वे लोग होंगे जो कि समझदार होंगे और वे उन तीनों सीखों को ग्रहण करेंगे और आगे बढ़ेंगे। लेकिन कुछ भड़वे, जो कि टेढ़े स्वभाव के एड़े होंगे, वे इन तीन सीखों पर ध्यान न देकर कहानी के दौरान, कहानी कहने के क्रम में आईं आलतू-फ़ालतू बातों पर ध्यान देंगे। ऐसे चूतियों से मैं क्या ही कहूँ। दे आर गॉन केस। फिर भी, सुधीजनो, आप कहानी सुनिए...

लेकिन कहानी सुनाने से पहले कहानी की सेटिंग थोड़ा बता दूँ। दरअस्ल, यह कहानी शुरू होती है खिल्ली विनाशालय में। जैसा कि हम जानते हैं कि सभी देशों में विनाशालय होते हैं। मेरे प्यारू देश घरघराहट की राजधानी खिल्ली में भी एक खिल्ली विनाशालय है, जहाँ मैं और मेरे जैसे और बहुत से दिलचस्प युवजन सड़ने जाया करते हैं। निश्चित तौर पर आपके देश में भी ऐसा ज़रूर होता होगा। आज के आधुनिक समाज में युवाओं का सड़ना बहुत ज़रूरी है। हमारे देश में तो टीवी पर एडवर्टिज़मेंट भी आता है—सड़ेगा घरघराहट, तभी तो बढ़ेगा घरघराहट।

इस कहानी को सुनाने के मेरे पास तीन कारण हैं। पहला कारण प्रेम है। दूसरा कारण क्रोध है और तीसरा कारण है सड़ने के प्रति मेरा मोह।

कहानी कहने के क्रम में ऐसा अक्सर हो सकता है कि पाठक को लगे कि इन बातों का कोई मुकम्मल सेंस नहीं बन पा रहा। ऐसे में मेरा अपने पाठकों से निवेदन है कि कुछ भी न समझ आने की स्थिति में आप सबसे पहले मेरी कहानी को सड़ने के दृष्टिकोण से देखें। अगर बात तब भी अनसुलझी रह जाए, तो क्रोध की भावना से उस बात को देखें। क्रोध से, हालाँकि, अधिकतर बातें समझ आ जाएँगी। लेकिन फिर भी अगर कुछ कसर रह जाए, तो आप मेरी कहानी को प्रेम की नज़र से देखें। प्रेम ऐसी चीज़ है कि उसके लेंस से देखने पर सब समझ आ ही जाता है और अगर न भी आए तो भी, कहानी तो प्रेम से ही पढ़नी चाहिए।

आइए शुरू करते हैं प्रेम से।

उस दिन दिन बहुत ही ख़ूबसूरत था, जब मैंने उसे पहली बार देखा था।

अब मैं बताने जा रहा हूँ वह कैसी दिखती थी... सुनिए : जैसे नहाते वक़्त आँख में पानी चला जाए और रगड़-रगड़ के आँख खोलने पर भी आँख न खुले, फिर अचानक से खुल भी जाए और पानी बाल्टी में गिर रहा हो, गर्मी का मौसम हो, ठंडा-ठंडा पानी हो, ईश ईश—ईश ईश... वाह, क्या ठंड है...

उस दिन वह नीले रंग का एक कुर्ता पहनकर आई थी। कुर्ते पर एक अजीब-सा प्रिंट बना था, जैसे पेड़ के बीचोंबीच का घुमाव होता है, चक्करदार, पहेली-नुमा, ऐसी ही प्रिंट पूरे कुर्ते पर बनी हुई थी। जींस काले रंग की थी—खुरदुरी-सी। हाथों में गोल-गोल, मोटे-मोटे, लाल रंग के बैंगल्स थे। सूखा हुआ शरीर था, जैसे बहुत दिनों से कुछ खाया न हो। मैंने उसे देखा और देखने भर से हलक़ तक में इतनी करुणा उभर आई कि देखते ही मन किया कि पहले इसे छह रोटी और पालक वाली दाल खिलाता हूँ, फिर बात करूँगा।

ख़ैर, यह पहला दृश्य है, जो कि मुझे याद है। इसके बाद हमारी दोस्ती हो गई... और मुझे उससे प्रेम हो गया।

अब एक दूसरी बात बताने जा रहा हूँ। लेकिन यह बात बहुत सीरियस है, इसलिए ध्यान से सुनिएगा। इस दिन पहली बार मेरी मुलाक़ात श्री श्री १००८ भयंकर पांडे सुरसुरी से हुई। यही हैं मेरे गुरुजी। कुछ ही दिनों पहले गुरुजी की लदोन्नति खिल्ली विनाशालय में हुई थी, इससे पहले वह बधारस चिंदू विनाशालय में सहायक सड़ीक्षक थे। मेरा समर्पण देखकर एक दिन गुरुजी ने मुझे पर्सनली भरी क्लास बताया, “देखो बेटा, समाज में एक सिस्टम का होना बहुत ज़रूरी है और सिस्टम बनता है संस्कारों से। खिल्ली विनाशालय में सड़ने आए आप युवजन ही इस देश का भविष्य हैं। देश का भविष्य अगर बचाना है और फिर अगर बेचना है तो हमें आपको सड़ना होगा और ख़ूब सड़कर अपने देश के सिस्टम की रक्षा करनी होगी। मगर सिस्टम को बचाने से पहले हमें वो बचाना होगा।”

फिर गुरुजी ने पूछा था, “बताओ, क्या?”

सबने मिलकर कहा था, “संस्कार!”

मैं गुरुजी का शिष्य बन गया था और उनके आलिंगन में उनसे चिपका रहता। उनके कहने पर मैं उनके संगठन से भी जुड़ चुका था। संगठन का नाम था लेथन। लेथन का उद्देश्य एक ऐसा समाज बनाना था, जहाँ सभी संस्कारपूर्ण आचरण करें, सिस्टम सुचारू रूप से अपना काम करे, देश ख़ुशहाली की ओर अग्रसर हो और देश के भीतर जो देशविरोधी कीड़े-मकोड़े हों या गोजर-बिच्छू हों, उनको डंडा मार-मार के उनका सफ़ाया किया जाए।

मैं लेथन के आदर्शों से और अपने गुरुजी के प्रेम से अभिभूत था। दिन-रात उन्हीं के साथ रहता था। वह कभी-कभी मुझसे कहते, “बेटा समस्या कुमार, कोई पद तो सुनाओ।”

मैं सुनाता :

“साधु हैं आप, संत हैं, चमत्कार कीजिए
हम युवजनों को आप ही तैयार कीजिए
इस देश और समाज के कल्याण के लिए
मेरे गुरुजी मेरी गाँ** फाड़ दीजिए।”

वह बहुत ख़ुश होते और मेरी गति निराली करके सो जाते।

अब सुनाता हूँ तीसरी बात :

प्रेम और गुरु-कृपा के अलावा भी एक तीसरी चीज़ खिल्ली विनाशालय आने के बाद मेरे जीवन में आई। मैं बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रहा हूँ बताते हुए, लेकिन सच यह है कि खिल्ली विनाशालय की हवा में कुछ जादू है। मैं जिसने बचपन से स्व से बाहर कभी मैथुन तक का मोह नहीं पाला, अचानक से सड़ने के मोह में विह्वल हो उठा। मुझे अन्य युवजनों से सड़ने की बातें करने में आनंद की प्राप्ति होने लगी। हर वक़्त दिल में बस यही एक आकांक्षा उमड़ती-घुमड़ती रहती कि चलो, थोड़ा और सड़ लेते हैं। कोई भी दोस्त-यार जहाँ दिखता, मन करने लगता कि आओ न, कुछ सड़ने की बातें करते हैं। लोग मुझसे दूर भी भागते, लेकिन मैं पागल सड़ने में उलझा रहता।

अब इन तीनों अलग-अलग बातों को मिला देता हूँ और तब शायद आपको पता चलेगा मेरे साथ उन दिनों हुआ क्या और मैंने उन दिनों क्या गुल खिलाए।

खिल्ली विनाशालय एक बहुत ही सुंदर विनाशालय है। देश के कोने-कोने से युवजन अपने विनाश को सुनिश्चित करने तथा ढंग से सड़ने हेतु यहाँ आया करते हैं।

मैं भी नया-नया आया था। आह! वह प्रथम दिन, पहली ही कक्षा में मेरी भेंट हुई मेरे पूज्य गुरुजी श्री श्री १००८ भयंकर पांडे सुरसुरी जी से। गुरुजी बहुत ही सुदर्शन दिखते थे। जंगली मूँछों से सजा वह चौड़ा मुख, भयंकर हसीन आँखें, नशीली मुस्कान और बातों में आवेग ऐसा कि ज्ञान की भी फट के चार हो जाए, अगर गुरुजी एक बार को अज्ञान का पक्ष ले लें तो।

वह डेस्क पर पालथी मारकर बैठे थे और सारी कक्षा उन्हें निर्बाधित सम्मोहन के साथ सुन रही थी। मैं भी सुन रहा था। वह कह रहे थे : “ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।” अर्थात् वह चाहें तो अपने ज्ञान से सब कुछ भस्म कर दें।

लेकिन... आगे उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐसा करेंगे नहीं, क्योंकि ऐसा करने भर से समाज और देश में संस्कार की रक्षा नहीं हो पाएगी।

इसके बाद उन्होंने बहुत-सी बातें कहीं। अंतिम निष्कर्ष यह था कि देश और समाज के संस्कार की रक्षा का सारा दारोमदार हम युवजनों पर है। मैंने गुरुजी की बात अपनी गाँ** बाँध ली और मदमस्त हो आगे बढ़ा।

इसी दौरान नीले कुर्ते वाली के प्रति मेरा आकर्षण भी बढ़ता गया। मैं उसे देखता और मेरे होश उड़ जाते। वह इतनी भरपूर लगती थी कि मेरे अंदर का ख़ालीपन साँय-साँय करने लगता था।

एक दिन हिम्मत बाँधकर मैंने उससे बात की और उस लड़की ने मेरी हिम्मत तोड़ दी। उसने बताया वह किसी दूसरे लड़के से पटी हुई है। लेकिन उसने यह भी कहा कि वह मेरी दोस्त ज़रूर बन सकती है, क्योंकि उसे मेरी संस्कृतनिष्ठ भाषा बहुत क्यूट लगी।

मैं और वह शामों में मिलने लगे। हमारे विचार एक-दूसरे से बिल्कुल भी मेल नहीं खाते थे। मैं संस्कार के लिए जान (गाँ**) दे देने वालों में से था और वह मुझ जैसों को दुश्चरित्र समझने वालों में थी। लेकिन मुझे और उसे दोनों को ही कविताओं का बहुत शौक़ था। मैं उसे हिंदी कविता के नाम पर ‘राम की शक्तिपूजा’ सुनाता था और सीता जैसा पवित्र बनने की सलाह देता था और वह नासमझ मुझसे जॉन कीट्स की कविता का अटपटा भावार्थ कहती कि “सौंदर्य एक कभी न ख़त्म होने वाली, कभी न अपवित्र होने वाली, वह अविरल धारा है, जो समस्त संसार की प्यास बुझाती है।”

उसकी ये बातें सुनकर मुझे उस पर बड़ी दया आती। फिर मैं उसके सूखे शरीर की ओर देख लेता और मन ही मन सोचता कि चलो, इसे छह रोटी और पालक वाली दाल खिला दूँ।

यह सब कुछ हो ही रहा था कि मेरे गुरुजी ने समाज और देश में संस्कार की प्रतिष्ठा के हेतु मुझे और मेरे जैसे कइयों की एक इकाई को एक महत्त्वपूर्ण देशभक्त कार्य सौंपा। इस कार्य ने मुझे बताया कि क्रोध के क्या परिणाम होते हैं। कार्य था एक दूसरे सड़ीक्षक के मुँह पर कालिख पोतने का, क्योंकि उस हरामज़ादे ने हमारी घरघराहट माँ के विरुद्ध अपशब्द कहे थे।

मैंने और मेरे सड़ू साथियों ने पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार दिन के उजले उजाले में विनाशालय के अथॉरिटी कक्ष के बाहर, उसके चेहरे पर पाप से भी गाढ़ी और चरित्र से भी लिसलिसी कालिख पोत दी। कालिख पुते चेहरे में वह कालिया दिखा। हम ख़ुश थे। हमने नारे लगाए :

घरघराहट माता की जय!
घरघराहट माता की जय!
घरघराहट माता की जय!

यह सब कुछ हो ही रहा था और इसके साथ-साथ ही सड़ने के प्रति मेरा मोह भी लगातार बढ़ता जा रहा था। यही वे दिन थे, जब मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि मुझे भी मेरे गुरुजी श्री श्री १००८ भयंकर पांडे सुरसुरी जी जैसा सड़ीक्षक बनना था। लेकिन गुरुजी ने कहा था, “बनना कुछ नहीं होता, होना सब कुछ होता है। मेरे बच्चे, जब तुम मेरे जैसे हो जाओगे, तब तुम मेरे जैसे बन भी जाओगे।”

मुझे समझ आया, होने का पहला चरण है कि मेरे पास भी उनके जैसी धाराप्रवाह संस्कृतनिष्ठ, संस्कारशील भाषा होनी चाहिए। दूसरा चरण है, मेरे पास भी उनके जैसा, हुबहू, ज्ञान होना चाहिए—ऐसा ज्ञान, जिस ज्ञान से सारा कर्म भस्म हो जाए। और तीसरा चरण है कि मेरे पास भी उनकी तरह खिल्ली विनाशालय में नौकरी होनी चाहिए, और वह नौकरी केवल गुरु-कृपा से ही प्राप्त हो सकती है। मन ही मन इन तीनों चरणों की पूर्ति की कल्पना से मैं ख़ुश हुआ, ख़ासकर तीसरे चरण की पूर्ति की कल्पना से और अधिक। मेरे पृष्ठभाग में एक मस्त गुदगुदी-सी हुई।

इन्हीं दिनों मैंने अपना ज़्यादातर समय लाइब्रेरी में देना शुरू कर दिया। मैं रोज़ सवेरे-सवेरे लाइब्रेरी पहुँच जाता, ख़ूब सड़ता, फिर क्लास जाकर गुरुजी का प्रवचन सुनता, रात में रोज़ उनके आलिंगन-पाश में बँधने के लिए आधा-एक घंटा उनके घर ज़रूर जाता। फिर वहाँ से निकलता और लँगड़ाते हुए अपने कमरे पर पहुँचकर विश्राम करता।

इस पूरी दिनचर्या में लाइब्रेरी में एक अलग ही समाँ बँध जाता। मुझे महसूस होने लगा था कि किताबों में एक ऐसी अकथनीय ऊष्मा है, जिसके स्पर्श से मेरे शरीर के रोम-रोम में अद्भुत रोमांच-सा उठने लगता है। मैं यथार्थ और कल्पना, दोनों से एक साथ ही कुछ इस तरह रूबरू होने लगता हूँ कि मेरे जिस्म और आत्मा में लेखकों, कवियों, वैज्ञानिकों का अनजाना-अनछुआ प्रवेश होने लगता है। शुरू के कुछ दिनों तक तो मुझे यह प्रवेश अच्छा लगता है, लेकिन मैंने ध्यान दिया तो समझ आया कि इन किताबों की वजह से मैं अपने गुरुजी के सड़ी-धाँचों से दूर और उन कवियों, लेखकों और वैज्ञानिकों जैसा अधिक होता जा रहा हूँ। उसके बाद मैं ख़ुद पर क़ाबू लाकर कुछ दिन लाइब्रेरी आना छोड़ देता हूँ और क्लास से पहले रूम पर ही रुककर हस्तमैथुन करना शुरू कर देता हूँ। यह सिलसिला यूँ ही सर्कुलर दिशा में चलता जाता है। दिन बीतते जाते हैं।

गुरु कौन है?

गुरु वह है, जो सब कुछ जानता है!

गुरु जान गए कि उनके सड़ार्थीगण आजकल बहुत ज़्यादा हस्तमैथुन कर रहे हैं और कारण है खिल्ली विनाशालय की लाइब्रेरी।

यही वह दिन था, जब उन्होंने हमें हमारा दूसरा महत्त्वपूर्ण देशभक्त कार्य सौंपा। कार्य था कि खिल्ली विनाशालय की लाइब्रेरी में ऐसी आग लगाओ कि कर्म की गठरी ज्ञान की आग में जलकर भस्म हो जाए। इस दिन मैंने जाना कि सड़ने के मोह के क्या परिणाम होते हैं!

मैं मन ही मन दुखी था। मेरे मन में उन कवियों, लेखकों और वैज्ञानिकों के प्रति और ख़ासकर उनके लिखे उन शब्दों के प्रति, जिनसे मेरे रोम-रोम में रोमांच उठा था, दया और मोह का भाव आ रहा था। लेकिन फिर अगले ही क्षण मुझे याद आया मेरा हस्तमैथुन करना। वह दुर्दांत गिल्ट मुझसे झेला न गया और मैंने भर-भर के किरोसिन झटका। लाइब्रेरी धू-धू हो गई।

फिर से नारे लगे :

घरघराहट माता की जय!
घरघराहट माता की जय!
घरघराहट माता की जय!

अगले दिन शाम हुई। मैं विनाशालय के पार्क में टहल रहा था। नीले कुर्ते वाली सामने से आती हुई दिखी। बहुत ही ठंडक-सी थी उसकी चाल में। उसकी तासीर नदियों और पेड़ों जैसी थी। मैंने उसे आते देखा और देखता ही रहा। मगर यह क्या—मैं ग़ौर करता हूँ तो दिखाई पड़ता है, उसके साथ एक लड़का भी था। मुझे उस लड़के से बहुत चिढ़ हुई। अपनी प्रेमिका पर भी थोड़ी घिन आई। इतने में वह मेरे पास आ गई और बोलने लगी, “तुम लोगों ने ठीक नहीं किया। यह सब सही नहीं हो रहा। तुम अच्छे लड़के हो, ग़लत लोगों का साथ छोड़ दो।”

मेरा सिर फटने लगा। मैं वहाँ से भाग गया।

इन्हीं दिनों गुरुजी का प्यार मेरे प्रति लगातार बढ़ता जा रहा था। मेरा एमए समाप्त हो गया था और गुरुजी की कृपा में मेरा प्रवेश खिल्ली विनाशालय में छोद के लिए हो गया था। मैं शुरू में इस प्रवेश की महिमा को ढंग से समझ नहीं पाया, मगर फिर गुरुजी ने समझाया, “बेटा, अब तुम मामूली सड़ार्थी नहीं रहे, अब तुम छोदार्थी हो। इस महान् देश और समाज के सिस्टम और संस्कार की रक्षा के लिए छोद करना तुम्हारा कर्त्तव्य है। गुरुजी की वाणी में वह शीतलता थी कि क्या कहूँ! मैं डूब गया और डेढ़-दो घंटे बाद बाहर निकला। थोड़ा लँगड़ाते हुए, थोड़ा मुस्कुराते हुए।

इसके बाद प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचा। गुरुजी ने हम लेथन के छोदार्थियों को हमारा तीसरा अत्यंत महत्त्वपूर्ण देशभक्त कार्य सौंपा। इससे मुझे पता चला कि प्रेम के क्या परिणाम होते हैं।

गुरुजी ने आज बताया कि आजकल बहुत-सी लड़कियाँ वैवाहिक जीवन में बँधने से पहले ही अपने प्रेमी के साथ शहर में कमरे लेकर रहती हैं और सेक्स करती हैं। यह सुनते ही मेरे मन में बहुत घृणा उपजी।

उन्होंने आगे बताया कि यही समाज की सबसे मूल और सबसे गहरी बुराई है, क्योंकि :;

“अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥”

मुझे कुछ समझ नहीं आया, मगर मेरी घृणा अब तीव्र क्रोध में रूपांतरित हो गई।

इसके बाद गुरुजी ने कहा, “ज्ञान की यही सीमा है, जाओ कर्म में प्रवृत्त हो!”

रात हुई। अंधकार बढ़ा। हम लेथन के साथी नक़ाबपोशों की तरह एक निवासी इमारत के नीचे इकट्ठे हुए। रात बहुत हो चुकी थी। ज़माना सो रहा था। हम अपना लक्ष्य देख रहे थे। गली के कुत्ते हमारा मुँह देख रहे थे। कुत्तों ने भौंका भी नहीं, शायद वे भी हमारी शुचिता से परिचित थे।

हमने दरवाज़ा खटखटाया। एक लड़का बाहर आया। हमने उसका मुँह दबोच लिया। हम कमरे में घुसे। एक लड़की वहीं अंदर खड़ी थी, घबराई हुई, चीख़ती हुई। मैंने ध्यान से देखा। मैं चौंक गया। यह तो नीले कुर्ते वाली मेरी दोस्त है। लेकिन वह इस मादर** लड़के के साथ रह रही है, यह देखकर मेरे मन में बहुत ग़ुस्सा आया। मैंने खींचकर उसको एक तमाचा मारा। वह भन्ना गई।

सारे साथियों ने उस लड़के को कुर्सी से बाँध दिया और वे उस लड़की को सबक़ (छोद) सिखाना चाहते थे। मैं इसके पक्ष में नहीं था। हमारा काम सिर्फ़ डर पैदा करना था, जो कि हो चुका था। मैंने उनसे कहा, “अब हमें चलना चाहिए।” उन्हें मेरी बात पसंद नहीं आई। वे देश के बारे में सोच रहे थे। उनमें से एक ने मेरे बार-बार के प्रतिरोध से दुखी और क्रोधित होकर मेरे सिर पर डंडा मार दिया और मैं वहीं गिर गया और अचेत पड़ा रहा।

इसके बाद जितना मुझे याद है, वहाँ पर घरघराहट माता की जय के नारे लगते रहे। और मेरे मन में यही एक बात बार-बार गूँज रही थी कि सौंदर्य एक कभी न ख़त्म होने वाली, कभी न अपवित्र होने वाली, वह अविरल धारा है, जो समस्त संसार की प्यास बुझाती है।

इसके बाद मैं अपने रूम आ गया। घरर-घरर करके मेरा पेट बहुत ढीला हुआ। मैं सो गया।

आज इस घटना को बीते दस साल हो चुके हैं और अब मैं खिल्ली विनाशालय में एसोसिएट सड़ीक्षक के पद पर नियुक्त हूँ। यह सब कुछ हो पाया सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे गुरुजी के मार्गदर्शन और घरघराहट माता के प्रति मेरे निर्बाध प्रेम के कारण।

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