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कहानी : बावर की वनकन्या

प्रणाम दीदी कैसी हो आप? आज बहुत दिनों बाद फ़ोन आया आपका। सब ख़ैरियत से तो है!

तू जानती ही है सुधा तेरे जीजाजी के गुज़र जाने के बाद ज़िंदगी काली चाय-सी हो गई है। अब जीवन में ना कोई स्वाद है और ना ही कोई मनपसंद रंग। मेरी एक भी संतान होती तो सहारा हो जाता। क्या करूँ भगवान ने दुख का जीवन मेरे ही हिस्से लिखना था, ख़ाली पेंशन का ही गुज़ारा है।

और बता सब ठीक हैं?

हाँ दीदी सभी ठीक हैं। बड़ी इस बरस बारह पास हो जाएगी। मयंक दसवीं के बाद आजकल श्रीनगर से पॉलीटेक्निक कर रहा है। काजल का अगले बरस दसवीं बोर्ड का एग्जाम है। छोटा वाला तो दुकान पर ही हुआ, सुबह जाकर शाम को ही लौटता है।

सभी बच्चे लगे हुए हैं फिर। भाई कैसा है?

वो भी घर पर ही हैं। जितनी भी खेती-बाड़ी बची है, उसी में व्यस्त रहते हैं।

क्या करें खेती-बाड़ी अब ख़त्म ही समझो। अगर पानी की समस्या नहीं होती तो खेत साल भर भरे-पके रहते और आपके लिए कुछ न कुछ पहले की तरह भेज पाती।

पहले जब मैं छोटे के नामकरण पर आई थी, तब तो ख़ूब पानी था! सभी लोग मिलकर करो कुछ। और लोगों को भी तो होती होगी पानी की दिक़्क़त?

लोगों का क्या कहूँ दीदी, पानी की लाइन ठीक करने को कहा जाय तो कोई राज़ी नहीं होता, इसी की जगह मंदिर बनवाना होता तो सभी लगते। हम ग़रीब कहाँ से सरकारी पानी की लाइनों का बिल भर पाएँगे।

ये बात तो सही कहीं तूने, सुधा। समस्या हो तो उसका समाधान भी तो खोजना ही पड़ता है। मुझे तो लगता है कि सभी को मिल-जुलकर, इस पर काम करना चाहिए। तभी पहले की तरह बरकत आएगी।

अच्छा सुन एक बात और मैं कह रही थी कुछ दिनों के लिए यहाँ बड़ी को भेज देती। मेरा स्वास्थ्य भी ख़राब चल रहा है। उसके आने से थोड़ा आसानी हो जाएगी और मन भी लगा रहेगा। इसी बीच उसका कहीं ट्यूशन भी लगवा दूँगी।

ठीक है दीदी। उनसे पूछूँगी। वो माने तो, फिर वो ही आएँगे इसको छोड़ने। प्रणाम!

हफ़्ते भर बाद बड़ी, अपने पिता के साथ देहरादून उसकी बुआ के घर पहुँचती है। दो-चार दिन में ही अब बुआ का स्वास्थ्य भी सँभलने लगा है। उसी दौरान एक दिन बुआ उसके पिता से कहती है, अब तो बड़ी की उम्र भी हो गई है, शादी का कुछ सोचा है कि नहीं।

मैं क्या कहूँ दीदी इस साल बारहवीं हो जाय तो, कहीं सही-सा रिश्ता देखकर, एक-दो साल में करवा देंगें। हम तो ग़रीब घर से हुए, चाय-बिस्कुट की दुकान और खेती-बाड़ी से तो बस जीवन चलने वाला हुआ।

हाय तू चिंता क्यों करता है तेरी दीदी है तो।

चिंता की बात तो है दीदी, भाई साहब के गुज़र जाने के बाद, बड़ी ही उनकी आख़िरी निशानी है।

किसे आख़िरी निशानी कह रहा तू, इसके पैदा होते ही हमारा भाई मर गया। ये तो जन्म से ही परिवार में अपशगुन लेकर आई।

आपको पता तो है भाई साहब कितना शराब पीते थे, फिर भी आप ऐसी बात करती हो।

शराब कौन नहीं पीता आजकल, उसकी उम्र ही क्या थी। मैं तो कहती हूँ कि अब बड़ी ही तुम्हारे परिवार को ग़रीबी के नरक से बाहर निकाल सकती है। मेरे पास कुछ रिश्ते आए हैं, बंबई से लेकर दिल्ली तक के अमीर लोगों के। जिनको शादी के लिए बड़ी जैसी ही कुंवारी लड़की चाहिए। देखना तू ये मुई बड़े घर जाएगी तो इसका जीवन सँवर जाएगा, ठाठ करेगी ये ठाठ। महासू की कृपा रही तो साल भर में तू नाना भी बन जाएगा।

दीदी कैसी बात करती हो अभी उसकी उम्र तो देखो।

उम्र देख कर ही तो कह रही हूँ। तुझे पता तो है आजकल का ज़माना। सही उम्र में उसके हाथ पीले नहीं किए तो कल को आकर मुझसे मत कहना की बिटिया हाथ से निकल गई।

बात तो आप ठीक कह रही हो दीदी। इसकी माँ से भी तो पूछना पड़ेगा।

मैं कर लूँगी सुधा से बात। तू हामी तो भर। तभी मैं आगे बात बढ़ाऊँ!

ठीक है दीदी, जैसा आपको उचित लगे, फ़ोन पर बता देना। इतने दिन से सुधा भी अकेली है, अब घर लौटता हूँ।

पहली बार बड़ी शहर की तरफ़ आई थी। जब हम छोटे गाँव क़स्बों से महानगरों में क़दम रखते हैं तो जीवन के अनगिनत कपाट हमारे सामने खुलने लगते हैं। शहर की चकाचौंध हमारी आँखों को सुरम्याली लगती है। यहाँ की भाग-दौड़, ना-ना प्रकार का भोजन, कपड़े, घर, दुकानें इत्यादि, भौतिक चीज़ों और सुविधाओं को इकट्ठा करने की होड़ एवम् लालसा हमारे भीतर बसने और पनपने लगती है। तब कहीं गाँव का रहवास हमें इस चमक के पीछे धुँधला-सा लगने लगता है। जब बड़ी पाँच साल की थी, तब बुआ से पहली बार छोटे के नामकरण पर मिली थी। तब बुआ कहती थी कि बेटा आना हमारे घर कुछ दिन रहकर जाएगी। बड़ी के मन में भी यह बात थी कि बुआ के वहाँ ज़रूर जाऊँगी।

बड़ी देहरादून आकर ख़ुश थी। उसने पहली बार इतनी बड़ी सड़कें, बिल्डिंग्स, शोरूम्स, रेस्तराँ, कॉलेज और शहरी जीवन को देखने की कोशिश की। इसी चमक-धमक में दो-तीन महीने कब गुज़र गए उसे पता भी नहीं चला।

एक अलमस्त शाम बुआ ने बड़ी से पूछ ही लिया— कैसा लग रहा है तुझे शहर में? घर की ज़्यादा याद तो नहीं आ रही।

आँख से ढुलकते आँसू को पोंछते हुए बड़ी ने बुआ को गले लगा लिया।

घर की याद तो आती है बुआ। ये शहर दिखने में तो बड़े रंगीन हैं, पर ढलते शाम के साथ घर का चूल्हा ही याद आता है।

हाय, सयानों जैसे बातें करने लगी है। कितनी बड़ी हो गई है रे तू अब। बहुत ख़ुश था तेरा पिता उस दिन जब उसने पहली बार, तुझे अपनी गोदी में उठाया था। उसकी ख़ुशी देखकर ही मैंने तेरा नाम ख़ुशी रखा था। पर वह अभागा तुझे अपनी आँखों के सामने बड़ा होते नहीं देख पाया।

बुआ, अभागन तो मैं हूँ। चाचा कहते हैं जैसे ही मेरी आँखें खुली, वे चल बसे थे। समाज ने पिता के रूप में चाचा के भरोसे छोड़ दिया था मुझे और माँ को।

रुवासी क्यों होती है मेरी बच्ची। जो नियति को मंज़ूर था उसे तो कोई नहीं बदल सकता ना। तू तो सबकी प्यारी ख़ुशी है, तू देखना मैं तेरे लिए सुंदर राजकुमार-सा दूल्हा खोजकर लाऊँगी। महल-सा घर होगा, गाड़ी होगी, नौकर-चाकर तेरे आस-पास घुमा करेंगे।

सोलह-सत्रह की ही तो वह उम्र होती है, जब बाल मन यौवनावस्था की दहलीज़ पर खड़ा होता है। मन तब न जाने कितने रेशमी ख़्वाब बुनने लगता है। बुआ की बातों का ख़ुशी पर इतना असर तो ज़रूर हुआ कि अब वह अक्सर अपने सपनों के साथी का अँधला-सा चित्र बुनने लगी थी।

सही मौक़ा देखकर बुआ ने सुधा को फ़ोन कर, ख़ुशी के लिए एक रिश्ता बताया और कहा—नरेश जब ख़ुशी को लेकर यहाँ आया था, तब मैंने रिश्ते के बारे उससे बात की थी। तुम्हारी क्या राय है इसमें?

घर की अभिभावक के तौर पर बुआ का मान रखने के लिए नरेश और सुधा ने बेमन से ख़ुशी के रिश्ते के लिए हामी भर ली।

समय को गुज़रने में कहाँ देर लगती है। कल तक जो ख़ुशी घर की देहली में बैठकर अपने होने वाले साथी को ख़्वाबों में देखा करती थी। अब जब हक़ीक़त से सामना हुआ तो वह अवाक् रह गई। उसने देखा कि जिस युवक की फ़ोटो उसकी बुआ ने रिश्ते के समय दिखाई थी, वह उसका पति नहीं था। वह तो उसके पति की पहली पत्नी का लड़का सोनू था। एकाएक ख़ुशी के सपनों का शीशमहल ऐसा बिखरा कि जहाँ एक ओर उन इच्छाओं को समेटने में हाथों के लहूलुहान होने का डर था, वहीं दूसरी ओर सपनों के उन टुकड़ों को जोड़ने का धैर्य भी उसके भीतर ख़त्म होता जा रहा था।

मेरठ के एक आलीशान घर के कमरे में क़ैद ख़ुशी, जब कभी खिड़की से बाहर झाँककर शहर की चकाचौंध को देखती तो वह अपनी बुआ से कहीं उस बात को हमेशा याद करती। और हुआ भी ठीक वैसा ही, यह चमक-धमक उसकी ख़ुशियों को ज़रा भी रोशन नहीं कर पाईं। उसके सुख-दुख में साथ देने का सपना दिखाकर जिस इंसान के सहारे उसको, उसके गाँव से मीलों दूर भेजा गया था, वह तो हैवान निकला। एक बार को ख़ुशी, नियति को अपना भी लेती परंतु दुख में साथ देना तो दूर, वह अधेड़ पति उसे रोज़ मारता-पीटता रहा। कई दिन ऐसे भी आए जब उसने ख़ुशी के माथे पर पिस्तौल तानकर उसका शोषण किया। यह वही दिन थे जब उसे अपने प्रिय दाड़िम और बेडू के रूख को छोड़कर, शहर के नीम को चखना पड़ रहा था।

ऐसा भी नहीं था कि ख़ुशी ने कभी उस हैवान की ज़्यादतियों का प्रतिकार ना किया हो। लेकिन पति की उस धमकी से ख़ुशी पहली बार रिश्तों के चेहरों के पीछे छुपे ख़तरनाक इरादों से रूबरू हुई। उसे पता चला कि इस व्यापारी पति से ब्याह करवाने के बदले उसकी बुआ ने डेढ़ लाख रुपये लिए थे। धमकी यह थी कि अगर ख़ुशी अपने पति की बातों के अनुकूल व्यवहार ना करेगी तो, उस पर लगाए पैसे वसूलने के लिए वह उसे देह व्यापार में धकेल देगा।

कंक्रीट के उस जंगल में जीते-जी वह मरती जा रही थी। उस वीराने में उसका दुख बाँटने वाला था ही कौन! अपनी बंद खिड़की से अस्ताचल को निहारते हुए, वह अपने गाँव को ढूँढ़ती तो उसे माँ की याद आती। याद आते उसे, तमसा के किनारे पगडंडियों से घर की तरफ़ लौटती भेड़ें, जिनको वह अपनी व्यथा के गीत सुनाना चाहती थी, परंतु वह वास्तव में अभी अकेली थी। कई दिनों तक ना खाना खाती और बस बीमार ही रहती। जब से वह ब्याह कर इस घर में आई थी तब से, पिछले मंगसिर (मार्गशीर्ष) के बाद, अब का आषाढ़ भी बीत गया। इस बीच उसको देखने-सुनने वाला कोई न था।

एक दिन जब सोनू दिल्ली से डिग्री लेकर पिता के हाल जानने घर आया। तब उसने देखा कि यहाँ की तो काया पलटी हुई है। हमारे घर में तो एक लड़की क़ैद है। जिसके साथ पशुवत् व्यवहार हो रहा है। इस तरह का माहौल देखकर सोनू का दिल दहल उठा। पिछली बार जब ख़ुशी हफ़्ते भर बीमार रही थी, तब सोनू ने ही डॉक्टर बुलवाकर उसका इलाज करवाया और उसका ख़याल रखा। तब पहली बार सोनू ने बिलखती ख़ुशी की दुखद कहानी को जानना चाहा।

उसने पूछा—इतनी कम उम्र में तुमने यहाँ क्यों शादी की? पिछली बार जब तुम बेहोशी की हालत में थी तब तुम अपनी बुआ के लिए कुछ बड़बड़ा रही थी। क्या यह शादी तुम्हारी मर्ज़ी से नहीं हुई थी?

शादी तो मेरी ही मर्ज़ी से हुई थी, पर जिस युवक से मेरी शादी तय हुई, वह तुम थे! तुम्हारी ही तस्वीर देखकर मैंने हामी भरी थी।

हैं…! मुझे तो घर आए हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ है। पिताजी ने तो फ़ोन पर बस इतना ही कहा था कि मैंने दूसरी शादी कर ली है। जब में घर आया, तब तुम्हारी हालत देखकर मुझे अपने पिता के कृत्य पर अत्यंत क्रोध आया। मुझे ग्लानि हुई कि मेरे पिता के भीतर यह हैवानियत कैसे पनपी! मैंने उनसे इस बारे पूछा भी, पर उनकी ओर से कोई उचित जवाब नहीं मिला। तुम्हें पता है उन्होंने मेरे माथे पर भी पिस्तौल तानी। मैं क्या करता? तुम्हारी जिस तरह की हालत हो रखी थी, मैं तब कुछ समझ नहीं पाया। मुझे लगा की कुछ ना कुछ गड़बड़ ज़रूर है, पर मैं किससे पूछता? तुम इस अवस्था में भी नहीं थी कि कुछ कह या सुन पाती।

मेरे साथ कोई गड़बड़ थोड़ी हुई है, मेरे साथ तो धोखा हुआ है। मुझे मेरी ही बुआ ने चंद रुपयों के लिए तुम्हारे पिता को सौंप दिया। मैं तो ख़ुद को ख़ुशनसीब मान रही थी कि तुम मेरे साथी होओगे। मुझे क्या पता था कि मेरी बुआ, मेरी आत्मा तुम्हारे पिता के हाथ बेच डालेगी!

आजकल ज़िंदगी की यही तो समस्या है, हम जिसके साथ जी रहे हैं, हम जिसे अपना सब कुछ मानते हैं उसके चेहरे पर इतने नक़ाब होते हैं कि हम उसे पहचान नहीं पाते। आज का छल आधुनिकता का छल है, यह हमें भीतर से नोचता हुआ। धीरे-धीरे हमारे स्नायुतंत्र में अपनी आधुनिक सभ्यता की गंध ठूँसता रहता है।

चाहे जो भी हो मैं इस असभ्यता के नरक से निकलने में तुम्हारी मदद करूँगा। तुम रोओ मत, थोड़ी-सी हिम्मत जुटाओ। तुम क्यों भूल रही हो तुम्हारे लोक चरवाहे महासू की कृपा तुम पर है।

जब हम अपनी संपन्नताओं से निकलकर विभिन्न रिक्तिकाओं में प्रवेश करते है तो जीवन का हर मोड़, एक नए संगम को टटोलने की कोशिश करता हुआ पिछले भूमंडलीय आवरण को तोड़ने का प्रयास करता है। तभी एकाएक कहीं उन्हीं रिक्तिकाओं में नए को जीने के लिए ठहरने लगता है, वहीं-कहीं हम एक यात्रा में होते हैं। जीवन की यह यात्राएँ जटिल और स्वयं में उलझी हुई होती हैं। इसमें संघर्ष, रोमांच और धैर्य के साथ हमें नए अनुभवों से गुज़रते हुए ज़िंदगी में आगे बढ़ना ही होता है।

फिर वह दिन आ ही गया। सोनू के पिता को किसी काम से बनारस जाना था। यही आख़िरी मौक़ा था। ख़ुशी भी यह जानती थी कि पहाड़ पर अगर किसी ख़ूँख़ार भालू को मारकर गिराना है तो ढलान की तरफ़ भागना होता है। यहाँ तो समतल ही समतल है, यहाँ भालू को मार गिराने का तरीक़ा भी समतल ही होगा। इस दमघोटु पर्यावास से अपने खुले रहवास में जाने के लिए कौन ही होगा जो पूर्ण रूप से प्रयास नहीं करेगा। बस की टिकट और कुछ रास्ते के ख़र्च की व्यवस्था कर सोनू ने उसे, उस बंद कोठरी से आख़िरकार बाहर निकलवा ही दिया।

देहरादून से जब से गाड़ी मसूरी को पार करती हुई, तमसा की घाटी बावर की तरफ़ बड़ी, तब ख़ुशी के दिल की तेज़ धड़कनों को राहत मिलने लगी। कितने ही लोग अपने जीवन का बसंत देख पाते हैं, बावर की इस वनकन्या ख़ुशी ने ऐसा बसंत पहली बार देखा। उसके घाटी में प्रवेश करते ही पहाड़ों से पानी फूटने लगा, प्यौली के फूल पहली बार इतने चटक रंग में खिले थे कि इतने बरस से इसी पल के लिए रुकें हों। बुरांश और काफल के कौर उसे देखकर ही फूट पड़े थे। अपने पहाड़, अपने जंगल और भेड़ों के गले की घंटियों को सुनकर उसकी साँस में साँस आई। गाड़ी से उतर कर गोधूली में जब उसने पुल पार किया। तब अपने घर की पगडंडी को देखकर ज़ोर-ज़ोर से चीख़ने लगी। उसके कंठ की चीख़ उसकी माँ के कानों में पड़ी। सुधा उठकर चूल्हे से दौड़ती हुई आँगन की तरफ़ पहुँची। शादी के बाद जिस बेटी की आवाज़ को सुनने के लिए उसके कान तरस गए थे। यह चीख़ सुनकर एक बार तो सुधा को लगा कि कहीं यह वो ही डरवाना सपना तो नहीं जिसे देख-देख कर उसे नींद में भी चैन नहीं पड़ता था। यह चीख़ ठीक उसी सपने की चीख़ की तरह थी जिसे वह पिछले साल भर से सुन रही थी। सुधा ने कितनी ही बार इस सपने का ज़िक्र नरेश से किया। नरेश यह कहकर हौसला देता कि मेरी उसकी बुआ से पिछले हफ़्ते ही बात हुई है, तू क्यों चिंता करती है। उसकी गृहस्थी बसी हुई है, उसके पास वक़्त ही कहाँ होता होगा जो हमें फ़ोन करेगी।

सुधा अपनी धोती सँभालती हुई, खेतों को लाँघती-फाँदती दौड़कर ख़ुशी को बाहों में भर कर सबला के हाल पूछने लगी। हाल पूछते, गले लगते दोनों के गालों पर ओंस के फूल खिल उठे। हाय! कितना अलौकिक होता है ब्याही बेटी का माँ से मिलन।

पिता भी दौड़कर ख़ुशी के पास पहुँचे, एकाएक अवाक् और नि:शब्द। ख़ुशी पिता के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। आप मेरा हाल जानने क्यों नहीं आए? निशब्द काँपता हुआ नरेश उसे गले ना लगा सका, उसके हाथ शून्य में कहीं ठिठक गए।

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