जेएनयू के आख़िरी रोज़ को आख़िरी रोज़-सा न बिताने की हर आख़िरी कोशिश
अमन त्रिपाठी
07 नवम्बर 2026
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का परिसर है, नीले आसमान के कैनवास में ऊबे इम्प्रेशनिस्ट आर्टिस्ट द्वारा उल्टे स्ट्रोक में खींची कुछ लाल-पीली रेखाओं के तले हाथ पकड़ साथ चलते प्रेमी जोड़ियों के प्रेम से प्रवाहित ऊष्मा और हवा में तैरते आज़ादी के अल्ट्रासोनिक नारों के बीच, माही छात्रावास के कमरा नंबर 17 में, किसी अज़ीज़ मित्र का गिफ़्ट किया हुआ स्पीकर दीवार से कोई डेढ़ मीटर दूर रखा होगा और उस पर लगभग फ़ुल वॉल्यूम में बज रहा था एक गीत : ‘अभी ना जाओ छोड़कर, ये दिल अभी भरा नहीं।’
शायद यह गीत किसी प्रेमी ने अपनी प्रेमिका के लिए लिखा होगा। जेएनयू छोड़ने को अब ज़्यादा दिन शेष नहीं हैं और जेएनयू उसी प्रेमिका जैसा लग रहा है, जिसे कॉलेज ख़त्म होने पर आख़िरी आलिंगन के साथ ट्रेन पर चढ़ा दिया गया था, और फिर ट्रेन के आँखों से ओझल होने तक, दोनों ने एक-दूसरे को पटरियों के क्षितिज तक देखते रहने की आख़िरी कोशिश की हो।
जिस जगह जीवन का बहुत लंबा समय तो नहीं, परंतु एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा गुज़ारा गया था, वह आने वाले एक-दो रोज़ में ख़त्म हो जाएगा। दोस्त विदा होंगे, प्रेम छूट चुका होगा, सारा व्यवहार महज़ फ़ोन तक सिमटकर रह जाएगा। कमरे की यथास्थिति भी कुछ हमारे जैसी ही होती रही, जैसे हम आए थे, वैसे ही आज भी वह कमरा अपने भीतर न जाने कितनी स्मृतियाँ समेटे खड़ा है, भूत की वर्तमान की और अब शायद भविष्य की।
आज भी मुझको वह दिन याद है, 15 फ़रवरी, आज से कुछ चार साल पहले। जीवन कुछ ऐसा नहीं था, न विचारों से, न शारीरिक गढ़न से। जेएनयू ने एक नवजात शिशु को किसी गर्भ की तरह पाला और बड़ा किया। विनोद कुमार शुक्ल के शब्दों में कहा जाए तो शायद ऐसा कहा जाएगा कि ज़िंदगी अगर पाँच साल की होती, तो ढाई साल जेएनयू में कट गए थे। और जीवन में अगर गंगा भर का अनुभव मिला, तो जेएनयू शायद भागीरथी की भूमिका में था।
ख़ैर, जेएनयू की बात आते ही पहले दिन से आख़िरी दिन तक का पूरा सफ़र आँखों के सामने न जाने क्यों किसी पुरानी फ़िल्म की रील की तरह चलने लगता है, कुछ दृश्य साफ़, कुछ धुँधले, कुछ ऐसे जिन्हें याद करने की कोशिश करो तो और धुँधला जाते हैं। परंतु बात तो हमें आख़िरी रोज़ की करनी थी और लेख की अपनी शब्द-सीमा वैसे तो है नहीं, परंतु स्मृतियों की अपनी एक अस्मिता होती है; हर बात को कह देना शायद उस एहसास के साथ न्याय करना नहीं होगा, जिसे हम संजोकर रखना चाहते हैं।
हाँ, तो फिर वापस लौटते हैं उसी कमरे में, कमरा नंबर 17 फिर आपको लेकर चलेंगे एक सफ़र में जो शुरू होता है मेरे अपने ताप्ती छात्रावास के कमरा नंबर 164 से।
माही 17, जो न तो मेरा हॉस्टल रहा है न जेएनयू में आए किसी नए विद्यार्थी के सपनों का, वह हॉस्टल किसी अज़ीज़ मित्र का घर रहा है। जो ताप्ती को अगर दिल्ली माना जाए और जेएनयू पश्चिम द्वार को शिमला मानकर उसकी ओर बढ़ा जाए तो माही शायद चंडीगढ़ जैसा आता है। लेकिन चंडीगढ़ से ठीक उलट, अनप्लांड। माही में कितने दोस्त रहते हैं और न जाने कितने जानने वाले और माही सिर्फ़ हॉस्टल नहीं कितनी नई पुरानी स्मृतियों का सदैव घर रहा है।
कोयना और शिप्रा छात्रावास के सामने, चिड़ियाघर की किसी दीवार की तरह, अपनी ख़ुद की दुकान सजाए, हज़ारों प्रेमियों को मैगी और डाइल्यूटेड चाय के साथ भविष्य के सपने देते वे छोटे-छोटे ठिकाने; माही लॉन के पत्थरों पर बैठे और अपनी प्रेमिकाओं का इंतज़ार करते, खड़ी बाइकों पर आधा वज़न डाले वो आशिक़, जिनकी श्रेणियों में कभी हम भी शामिल रहे होंगे। माही के एक-दो कमरे, उसकी मंदाकिनी-जितनी छतें, और हर छत पर हर सप्ताह जन्म लेती नई स्मृतियाँ, मानो समय वहाँ ठहरकर अपनी डायरी के कुछ पन्ने चीर कर रख देता हो और कहता हो, ‘ले, लिख अब हर रोज़ इसी के क़िस्से’। माही ने उन तमाम अनुभवों को भी घर दिया, जो शायद अनुभव की दृष्टि से पहले थे, जिन्हें शायद शब्द देना संभव न हो लेकिन अगर यह लेख व्हाट्सऐप की चैट पर लिखा जाता, तो शायद अंत में आँख मारने वाले इमोजी का प्रयोग अवश्य करता।
आख़िरी कुछ दिनों के कुछ दिन माही में ही काटे गए थे। सुबह दोपहर और शाम घड़ी की परवाह किए बग़ैर हर एक पल में कमरे को धुआँ करते स्मृतियाँ संजो लेने की हर एक सार्थक कोशिश की गई।
माही के बाद एक हॉस्टल आता है, लोहित, अपनी भीड़ के लिए विख्यात और, अतिशयोक्ति की जाए तो, जेएनयू की रातों का लॉस एंजिल्स, या दक्षिण कोरिया का “ईथेवॉन”, आधी रात में भीड़ से लबालब, चमकती लाइट से चौंधियाता हुआ। लाइब्रेरी से लौटे यात्री और दिल्ली को प्रदूषण-मुक्त करने की कोशिश में धुआँ अपने भीतर खींचते जेएनयू के पर्यावरणविदों की भूख को शांत करती राजू भैया की प्रेमपूर्वक दी हुई गेंद की शक्ल में थाई करी के साथ परोसी कोई विशिष्ट साउथ एशियन फ़्यूज़न रूपी लिट्टी, और चाय। और हम, माही से निकले यात्रियों को नींद की गोली की मानिंद, शुरू के दिनों से आख़िरी तक परोसी जाती वह चाय, जिसका स्वाद तीन बार कुल्ला करने के बाद भी बना रहता था, महज़ चाय नहीं, एक बहाना थी, तमाम बातों के एक साथ होने का, दोस्तों के एक साथ होने का। उस चाय के साथ बतियाते, शेर सुनते-सुनाते कब भोर हो जाती, पता ही नहीं चलता था। और हम हर सुबह एक ख़याल लिए उठते थे :
“यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है”
लोहित सिर्फ़ आख़िरी दिनों का साथी नहीं रहा है। हम यहाँ कुछ रोज़ पहले भी आते रहे हैं, जब न लिट्टी चाहिए होती थी, न चाय; बस एक फ़ुल प्लेट मैगी के लिए, जो शायद दोस्तों के साथ नहीं, प्रेमिका के साथ ही अच्छी लग सकती थी। उसके नर्म हाथों से खाते हुए, या अपने हाथों से उसे खिलाते हुए, ऐसा लगता था जैसे किसी की उलझी लटों को सुलझाकर उन्हें और सुंदर किया जा रहा हो। यहाँ बात शेरों और ग़ज़लों की नहीं होती थी, बल्कि उस विधा की होती थी, उस म्यूज़ को देखते हुए होती थी जिसके लिए ग़ज़ल लिखी जाती रही है। और हमेशा मैं कवि केदार की एक पंक्ति, उसका हाथ अपने हाथ में लिए, दोहराता रहा हूँ : दुनिया को [तुम्हारे] हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए...
और इस एक बात पर ठहाके मारकर वह चारों ओर देख लेती रही है कि इन स्मृतियों का साक्षी कोई और तो नहीं है।
लेकिन अगर देखा जाए, तो इस मैगी के सफ़र की शुरुआत सीधे लोहित पर नहीं होती और न ही माही लॉन से। इसकी शुरुआत तो होती है, ताप्ती छात्रावास के कमरा नंबर 164 से, जो न जाने कितनी सच्ची-झूठी कहानियों का सदैव केंद्र रहा है।
जेएनयू को अगर दिल्ली माना जाए और टी-पॉइंट को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, तो ताप्ती हज़रत निज़ामुद्दीन-सा आता था, जहाँ से चंद्रभागा, माही, ताप्ती, लोहित, शिप्रा और कोयना की अधिकतर सवारी गुज़रती थी। हमारी वास्तविक और स्मृतियों की न जाने कितनी यात्राएँ यहीं से शुरू होती थीं और कितनी यात्राएँ यहीं आकर ठहर जाती थीं। हम भी इसी रास्ते से गुज़रते थे और इसी के किसी एक मोड़ पर हमारा आशियाना था, हमारे अपने यादों की कमरा संख्या 164...
पारसी लोक-कथाओं में ज़िक्र आता है संग-ए-सबूर का, जो माना जाता है कि एक ऐसा पत्थर है जो सारे राज़ अपने भीतर छिपाए रखता है। दुनिया भर के ग़म सुनता है, सारी ख़ुशियाँ अपने भीतर समेटता है और तब तक चुप रहता है, जब तक कि बर्दाश्त की सीमा समाप्त न हो जाए। और जब उसके भीतर और कुछ छिपाने की जगह नहीं बचती, तो वह फट जाता है, चूर हो जाता है।
मेरा कमरा भी वही संग-ए-सबूर था। उसने मेरे सारे दुख देखे थे, मेरे हर एक सुखों का साथी रहा था। अपने आग़ोश में लिए उसने हमारे प्रेम को देखा था, हमारी बातें सुनी थीं, हमारी हँसी, हमारी ख़ामोशियाँ, हमारी बेचैनियाँ और हमारे साथ घटती हर छोटी-बड़ी स्थिति का वह साक्षी रहा था। उसने कभी कोई सवाल नहीं किया, किसी राज़ को बाहर नहीं जाने दिया और अंत तक हमारे साथ खड़ा रहा अपनी बाहें फैलाए हुए। और मैं भी हर रोज़ उसी उत्सुकता से उसके पास जाता रहा, पहले रोज़ से लेकर जेएनयू के अंतिम रोज़ तक ठीक उसी बछड़े की मानिंद, जो हर रोज़ दूध दुहने से पहले अपनी माँ के पास पहुँच जाता है, इस एक बात से आश्वस्त कि दुनिया में सबसे सुरक्षित जगह वही है। माँ उसे अपनी जीभ से चाटती है, उसके माथे को पुचकारती है और अपनी पूँछ से झाड़ मारती है, मानो दुनिया भर की नज़रों से उसे बचा रही हो। यह कमरा भी ठीक वैसा ही था। वह मुझे पुचकारता था, अपने भीतर समेट लेता था और हर बार ऐसा लगता था जैसे दुनिया की तमाम नज़रों, तमाम बेचैनियों और तमाम शोर से मुझे अपनी चाहरदीवारी के भीतर बचा लेगा।
लेकिन अब आख़िरी दिन नज़दीक है और ऐसा महसूस हो रहा है कि वह संग-ए-सबूर शायद अब बिखर जाना चाहता है, लेकिन नहीं अभी नहीं...
इसके नेपथ्य में साहिर की वो पंक्तियाँ याद आती हैं : कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले...
ख़ैर, आगे बढ़ना होगा, बढ़ते रहना होगा। किसी दूसरी दिशा में ताप्ती से थोड़ा आगे, संग-ए-सबूर के ज़िक्र से दूर। चलेंगे वही पगडंडी पकड़कर, ताप्ती के द्वार से दायीं ओर, जहाँ आख़िरी दिनों में जाना शायद कुछ कम हो गया हो, परंतु उसकी स्मृतियाँ सदैव बरकरार रही हैं। वही पगडंडी, जिस पर उसके क़दमों से नापें तो अठारह क़दम दूर, दो राहें फूटती हैं और बनती हैं अनंत संभावनाएँ।
उन्हीं दो राहों में एक राह है माही की, दूसरी कोयना की। कोयना, जिसके द्वार पर शायद राष्ट्रपति भवन जितनी सुरक्षा हो सकती थी, मगर वह आज़ाद है, खुला है। कोयना जेएनयू का एंटीलिया है, कितने डिलापिडेटेड को-एड और स्त्री हॉस्टलों में अकेला, हलवाई की दुकान पर रखी काजू कतली-सा चमकता। और आगे वह कोयना का गेट जहाँ सब बाट जोहते थे या गुज़रते थे, वहीं कुछ देर रुकने और बैठने के सपनों में खोए हुए।
जेएनयू में लगभग सभी को मिलता था प्रेम और कुछ को कोयना का प्रेम। उन कुछ में हम भी शामिल थे, किसी स्याह रात में भटकते मुसाफ़िर को मिले सराय की तरह, मंत्रमुग्ध।
लेकिन सुख की स्मृतियाँ भले ही कितनी प्रगाढ़ हों आख़िरी दिनों के अपने दुख थे, पहला दुख सब कुछ दूर हो जाने का दुख और दूसरा कोयना से दूर होने का दुख, सब दुख के अपने दुख थे, न कोई किसी से कम न कोई किसी से अधिक।
आख़िरी दिनों ऐसा लग रहा था जैसे सिर्फ़ वास्तविकता नहीं स्मृतियाँ भी धूमिल हो उठी हैं लेकिन मार्सेल प्रूस्त ने अपने ख़तों में लिखा था : हम यह मानने लगते हैं कि जीवन सुंदर नहीं है, क्योंकि हमें उसका स्मरण नहीं रहता। लेकिन यदि अचानक किसी बहुत पुराने, लंबे समय से भुला दिए गए गंध की हल्की-सी अनुभूति हमारे भीतर उतर जाए, तो हम एकाएक उसी स्मृति के नशे में डूब जाते हैं। इसी तरह हम सोचते हैं कि हम अपने मृत प्रियजनों से अब प्रेम नहीं करते, क्योंकि हमें उनकी स्मृति नहीं रहती; लेकिन यदि संयोगवश हमें उनका कोई पुराना दस्ताना मिल जाए, तो हमारी आँखों से आँसू फूट पड़ते हैं।
ठीक वैसे ही कोयना के गेट पर खड़े होकर या अंदर दरवाज़ों के सामने से गुज़रते हुए वैसा ही महसूस होता है, जैसा प्रूस्त ने बताया है, स्मृतियाँ रिवाइंड होने लगती हैं, नोलन की फ़िल्म ‘मेमेंटो’ की तरह, जहाँ बीती हुई चीज़ें टुकड़ों-टुकड़ों में फिर सामने आती हैं। वही अनुभूति होती रही है, जैसी कभी पहले होती थी और वही मधुमालती के पहले रोज़ खिले फूलों के अचानक गुलाबी और फिर लाल हो जाने की तरह, शरमाकर मुस्कुराते हुए, मन में एक टीस लिए गुज़र जाता हूँ, दूर किसी दूसरी दिशा की ओर।
माही को ओर...
जैसा कि बताया था, जेएनयू के आख़िरी रोज़ को आख़िरी रोज़-सा न बिताने की हर आख़िरी कोशिश में माही की कितनी अधिक भूमिका रही है, अन्य (कावेरी, चंद्रभागा, झेलम इत्यादि) हॉस्टलों से कहीं अधिक।
माही 17 दोबारा चलते हैं फूटी दो राहों में एक राह पकड़कर चीज़ों पर ग़ौर करते हुए : कमरे में फ़ोन पर दोस्त किसी दोस्त को सांत्वना दे रहा है और मैं उसकी बातें सुनते-सुनते जेएनयू में बिताए हर वक़्त की जूठी स्मृतियों में फिर से लौट रहा हूँ। शायद यही मेरी आदत रही है, जो बीतता गया, उसे शब्दों में कहीं रोक लेने की, उसको नया एक रूप देने की। जेएनयू के आख़िरी रोज़ को भी किसी कविता में ढाल देना चाहता था लेकिन अब इसे एक लेख में उतार देना चाहता हूँ किसी दरबारी इतिहासकार की तरह, ऐतिहासिक घटनाओं को दरकिनार कर अपने राज्य की प्रशंसा में रत।
आने वाले एक दिन में सब भूत-सा हो जाएगा। सब तो नहीं, कुछ शायद। कुछ चीज़ें स्मृति में इतनी गहरी उतर जाती हैं कि समय उन्हें मिटाता नहीं, बस उनका रूप बदल देता है। सोचता हूँ कभी रोऊँगा, जी भरकर, अकेले या दोस्तों के बीच, उन तमाम चीज़ों को याद करके जो इस लंबे सफ़र में कहीं पीछे छूट गईं और उन मिली हुई चीज़ों को भी याद करके जो शायद उम्मीद से कहीं परे थीं।
अभी मगर कुछ लोग हैं जिन्होंने मुझे सँभाल रखा है। जैसे किसी ढलती हुई शाम को आख़िरी रोशनी थामे रखती है, और नए घोंसले को किसी पेड़ की शाख़। जिस दिन ये लोग दूर होंगे, शायद मैं बहुत फूटकर रोऊँगा, प्रसूति के रोज़ दर्द में कराहती किसी माँ की तरह।
एक दिन में वाई-फ़ाई चला जाएगा, कितने जानने वाले दूर चले जाएँगे, मेरे नाम की मेस नहीं होगी और वो तमाम चीज़ें जो कहीं दूर जा चुकी होंगी वास्तविकता से, स्वप्न से और स्मृतियों से।
आने वाले दिनों में सुबहें होंगी, शामें होंगी, लोग होंगे, सब कुछ होगा, शायद कहीं अधिक उजाला, चंदा की कहीं अधिक चाँदनी, अमलतास की और तीखी गंध, सड़कों की और अधिक गति, नई प्रेमिका का और सघन प्रेम, अन्य जगहों की अपनी मनमोहक तृष्णाएँ, नई महक, शायद सब कुछ होगा, कहीं अधिक।
लेकिन जेएनयू जैसा कुछ नहीं होगा।
शायद सब कुछ के परे निकलकर, बाल्यावस्था से प्रौढ़ जीवन के किसी सफ़र में, मैं फिर शायद कहीं पर डूब जाऊँगा।
डूब जाऊँगा मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह :
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़
परित्यक्त सूनी बावड़ी के भीतर
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