जीते चले जाने को पीछे मुड़कर देखना
रवीन्द्र आरोही
16 जून 2026
पेड़ों को अपने पुराने वसंत और पतझड़ याद नहीं रहते। हम अपने मौसम जीने से ज़्यादा याद रखते हैं। मौसम बाहर से ज़्यादा भीतर बीतते हैं। पतझड़ एक लेखक का आदिम आवास है। जहाँ निर्विकार रूप से पत्ते झड़ रहे हों, वह शिव का स्थान है। गाँव-घर से निर्वासित किसी पीपल के नीचे शिव का चौरा, वह पार्वती को कथा सुना रहे हैं। कथा की भूमि निर्जन होती है। निर्जन या कहें बंजर भूमि पर चमत्कार की तरह एक कोंपल फूटती है। जगह ख़ाली लगे, पेड़ों से लेकर आसमान तक। भरे हुए में लिखना नहीं हो।
कई विधाएँ हैं। लेखन के अनगिन क्षेत्र। कहानी, गल्प एक अलग दुनिया। यहाँ सरोकार हमेशा बदलते हैं। एक जगह पहुँचकर लेखक प्लॉट की टोह में निकलता है। वह अपने भीतर दृश्यों को संजोता है। अलग-अलग पात्रों से मिलता है। किताबों में किरदारों को ढूँढ़ता है। वह एक ऐसी ज़िंदगी की तलाश में भटकता है जो माया और यथार्थ की सीमा पर बनी हो। वह सुबह के कुहरे में टहलने निकले और चाय पीते हुए एक कहानी शुरू कर दे। नाश्ते के बाद जब लिखने बैठे तो दुनिया की महान् कोई रचना उसकी क़लम की नोक पर बैठ जाए और वह इस स्वप्न के साथ दुपहर की नींद सोए। शाम जब उठे, तो वे लोग जो लोग की श्रेणी में नहीं आते, उसके दोस्तों में शामिल हों, जिनकी एक-एक पंक्ति पर कभी वह मरा जाता था, वे उससे राह चलते किसी पहाड़ी मोड़ पर टकराएँ।
लेखक उस दौर को याद नहीं करता जिसमें वह एक कहानी को मुकम्मिल बनाने के लिए जेब में बॉलपेन से लाइनदार कॉपी पर लिखी कहानी लिए कितने-कितने दर भटका है। हर कोई उस पर क़लम चला दिया करता था, जिसे वह देखता रहा। उसे याद नहीं कि वह शीर्षक कौन-सा था, जो बहुत रुमानीयत में लिखा गया था और किसी ने एक झटके में वह काट दिया हो और कहा हो—ये ठीक नहीं है; और उसके दफ़्तर के आगे घंटों सिर झुकाए आप शीर्षक सोचते रहे हों या कहानी का दूसरा, तीसरा अंत।
वे पोस्टकार्ड के लगभग समाप्ति के दिन थे। जब मैसेज का दाम एक रुपया लगता था। किसी दूर-दराज़ के साथी को बताना कि फ़लाँ पत्रिका में कहानी सिलेक्ट हुई है और रिप्लाई आना कि ‘हम इंतज़ार करेंगे’, कहीं से फ़ॉर्मल नहीं हुआ था। दुनियाभर की न जाने कितनी परीक्षाएँ उन कहानियों के नीचे दफ़्न हो गईं।
वह समूचे समय को एक साथ जीना था।
वो घुमक्कड़ी, वो जश्न, वो नशा, वो आवारगी—एक कलाकार, एक लेखक की ज़िंदगी में दुबारा नहीं लौटता। लेखक बहुत जल्द एलिट हो जाता है। वह हर दूसरे को शक की नज़र से देखता है, वह ख़ुद को बहुत रूपों में देखने का आदी हो जाता है। वह हमेशा अवसर खोजता है।
टैगोर जैसे चंद लेखकों ने आजीवन उस भाव-भूमि को बनाए रखा, जहाँ मूल प्रकृति नष्ट नहीं होती। टैगोर ने अपनी प्रतिभा को माँजते हुए उस फ़िल्ड को हमेशा ख़ाली रखा, जहाँ रचनाएँ अपनी वर्जिश करती हैं और कोमल घास पर चितान लेट जाती हैं। चेखव उसी श्रेणी में आते हैं जो तमाम परिपक्वता के बावजूद अपने प्रथम को सीने से लगाए रखते हैं—चाहे वह पहली रचना हो, पहला जीवन हो, पहला प्रेम हो, पहला मन हो या कुछ भी जो पहला हो।
लेखक जब आयु में थोड़ा बड़ा होता है, तब वह लेखक होने के इर्द-गिर्द कुछ होने लगता है। अचानक वह पाता है कि पेट बड़ा होने लगा है, बीमारियाँ होने लगी हैं और वह तुकबंदी में बोलने लगा है। वह उदास होना भूल गया है क्योंकि उसने अपनी स्मृतियों को गदला कर रखा है। वह हर याद जो उसके आज में फ़िट नहीं बैठ रही, उसे काटकर फेंक देना चाहता है। जबकि एक लेखक का अतीत उस तोते की तरह होता है जिसमें राजा की जान बसती है। जैसे-जैसे तोते को मरोड़ा जाता है, वैसे-वैसे राजा की गरदन कसती जाती है। एक लेखक जैसे ही अपने आस-पास को, अपने अतीत को करेक्ट करने लगता है, उसकी चालाकी में उसकी लेखक की मृत्यु शुरू हो जाती है। लिखने के लिए देखना या जीना इसी तरह की चालाकी है।
समय एक पवित्र चीज़ है।
वर्षों पहले अख़बार के तीसरे चौथे पन्ने की एक ख़बर याद आती है। नार्वे की या दक्षिण अमेरिका की एक लेखिका की स्टोरी बनी थी। स्टोरी कुछ ऐसी थी कि लेखिका के टीन एज़ का लगभग साढ़े तीन साल उसके मुताबिक़ ठीक नहीं बीते थे। उसमें वह नशे के जद में आ गई थी और अपनी मर्ज़ी से उन साढ़े तीन सालों में सात अलग-अलग लोगों से शारीरिक संबंध बनाए थे। जब वह एक मुक़ाम पर पहुँची तो उसने उन साढ़े तीन सालों को ख़ुद के जीवन से काट दिया, जबकि उसकी शुरूआती रचनाओं में उस ज़िंदगी के फ़लसफ़े आते हैं और चूँकि वह कोई चोरी की ज़िंदगी नहीं थी, उसकी मर्ज़ी से जी गई ज़िंदगी थी—इसलिए वह समय उसकी शुरूआती रचनाओं में चमक के साथ उभरते हैं। पर बाद में वह उस समय से परहेज़ करने लगी और अपनी आत्मकथा में उस साढ़े तीन साल को किसी और देश में कोई कोर्स करते हुए दिखाया।
वह एक पवित्र समय, जो उसके द्वारा चयनीत था; जिसमें उसने सबसे खुलकर ज़िंदगी जी थी, वह उसने मिटा दिया। पर इस मिटाने का गिल्ट उसके अंदर हमेशा बना रहा और पंद्रह साल तक वह कुछ नहीं लिख पाई। और एक-दो नहीं, आधे दर्जन मानसिक बीमारियों का शिकार हुई। जब वह बिस्तर पर पड़ गई, तब उसके पास उस साढ़े तीन साल के अतीत के अलावा और कुछ नहीं बचा था और उसने उसी बिस्तर पर, उस साढ़े तीन वर्षों को ढाई सौ पन्नों में लिखा। उस किताब को उसके देश में उस साल का श्रेष्ठ पुस्तक का सम्मान मिला और फिर उसके बाद वह अठारह वर्ष तक पूर्ण स्वस्थ होकर ज़िंदा रही और लिखती-पढ़ती रही।
यह समय का प्रभाव कहें या बदले युग का प्रभाव कि हमारा अतीत वर्तमान और भविष्य कई-कई खाँचों में बँट गया है। यह आधुनिक युग की तकनीकी सफलता है कि वह कितने खाँचे पैदा कर सकता है। हर चीज़ के लिए अलग-अलग बँटा हुआ समय। इससे काम करने में सुविधा होती है। लेखक, कलाकार, संन्यासी हमेशा से समाज में इसीलिए मिसफ़िट रहे हैं क्योंकि इनका समय निरंतरता में रहता है। वे एक साथ तीनों कालों को जीते हैं। हमारे पूर्वजों का जीवन इतना सपाट था कि उनके वर्तमान से अतीत और अतीत से भविष्य के बीच कोई मोटी मेढ़ नहीं थी। कबीर का समय आकाश जैसा था। तुलसी, मीरा, रैदास, सूर के यहाँ समय का कितना फैलाव है। यहाँ अतीत कोई बीता हुआ समय नहीं है। समय की रेंज देखें कि जिस रचना का रचनाकाल द्वापर या त्रेता है, उसकी संकल्पना का भविष्य कलियुग है।
जबकि हम अपना भविष्य एक पार्टी से निकलकर दूसरी पार्टी में खोजते हैं और रचना का भविष्य दूसरे तीसरे संस्करण तक। जीने की यह उच्छृंखलता जीवन से बेहतर पाठ के हट जाने से पैदा होता है।
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बेला पॉपुलर
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