हिंदियाँ : भाषाई विविधता का आयोजन
हिन्दवी डेस्क
06 मई 2026
हिंदी-साहित्य के संवर्धन में सक्रिय ‘रेख़्ता फ़ाउंडेशन’ के उपक्रम ‘हिन्दवी’ ने बीते शनिवार की शाम एक विशेष साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘हिंदियाँ’ का आयोजन किया। यह कार्यक्रम थिएटर, इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में संपन्न हुआ। ‘हिन्दवी’ के इस विशेष संस्करण के गत आयोजनों—‘छंद-छंद पर कुमकुम’ और ‘अनंता : हिंदी साहित्य की उपेक्षिताएँ’—के बाद, यह कार्यक्रम भाषाई विविधता, भाषा-परंपरा और साहित्य-संस्कृति में उनके योगदान पर आधारित रहा। कार्यक्रम में वक्ता के रूप में रविकांत, अमरेन्द्र अवधिया और काव्यपाठ हेतु अवधी के कवि रामशंकर वर्मा और भोजपुरी के कवि प्रकाश उदय उपस्थित थे। कार्यक्रम का सुमधुर और सुव्यवस्थित संचालन चंद्र प्रभा ने किया।
पहले सत्र ‘साहित्य-सिनेमा में लोक-भाषा-विस्तार’ विषय पर बातचीत करते हुए रविकांत ने ‘हिंदियाँ’ के बारे कहा कि हिंदी को बनाने में बहुत-सी भाषाओं का योगदान है। हम नहीं चाहते कि हम भाषाओं को बाँटें और उन पर लड़ें। आगे इसी बातचीत में अमरेन्द्र अवधिया ने ‘हिंदियाँ’ शब्द के प्रयोग और उसमें समाहित अन्य भाषाओं की परंपरा और उनके अद्यतन स्वरुप पर सुचिंतित ढंग से अपनी बात रखते हुए कहा, “हिंदियाँ कहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते बाक़ी जो आप बोलियाँ, उप-बोलियाँ इत्यादि कहते हैं—जिनकी सत्ता भी भाषा की ही सत्ता है—वह भी उसी तरीक़े से उस हिंदियाँ में रहे, जैसे हिंदी स्वयं है, जोकि खड़ी बोली का आधार लेकर है।”
बातचीत के इस सत्र में वक्ताओं ने लोक-भाषाएँ के महत्त्व और हिंदी-सिनेमा में क्षेत्रीय बोलियों और लोक-भाषाओं के प्रयोग को रेखांकित किया। भोजपुरी के पहले फ़िल्मी गीतकार मोती बीए का ज़िक्र करते हुए, रविकांत ने लोक-भाषा के विस्तार को सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व के एक आवश्यक माध्यम के रूप में बताया।
कार्यक्रम का दूसरा सत्र काव्यपाठ का रहा, जिसमें अवधी की कविताओं का पाठ रामशंकर वर्मा ने किया। उन्होंने अपने अवधी गीत, ‘चलो हम अईस बनाई समाज’, ‘ससुर के नाती चूप्पे बैठो’ आदि कविताओं के माध्यम से अवधी समाज के चिंतन, समकालीन परिवेश और परंपरा को अभिव्यक्त किया तथा नवगीत का सस्वर पाठ भी किया। भोजपुरी के सुपरिचित कवि प्रकाश उदय ने कविता पाठ से पहले ‘हिंदियाँ’ शब्द-प्रयोग पर एक अर्थगौरवपूर्ण ढंग से बात रखी। कहना न होगा कि कार्यक्रम से पूर्व, ‘हिंदियाँ’ शब्द-प्रयोग सोशल मिडिया के दैनिक विमर्श में विवाद और बहस का विषय रहा। इस विषय पर बात करते हुए प्रकाश उदय ने साहित्येतिहास सम्मत बात रखी। उनका वक्तव्य कुछ इस तरह था, “जब हम हिंदी कहते हैं, तो एक सवाल यह होना चाहिए कि कौन वाली हिंदी? एक हिंदी विशेषण के रूप में चलती रही है, फिर संज्ञा के रूप में। फिर एक समय आया कि जो भी हिंद का वह हिंदी—तलवार हिंद का, अचार हिंद का। फिर हुआ हिंदी के लोग यानी ज़बान-ए-हिंद।’’
प्रकाश उदय ने आगे अपने वक्तव्य में ‘हिंदियाँ’ शब्द को एक भाषा परिवार का समूह बताते हुए; बिहारी, पहाड़ी, राजस्थानी, पूर्वी हिंदी, पश्चिमी हिंदी आदि को हिंदी परिवार की सारी भाषाओं के रूप में देखने की बात कही। उन्होंने इस विषय में कहा, “हमारी समस्या यह है कि उस परिवार में खड़ी बोली ख़ुद शामिल हैं, जिसको हम खड़ी बोली हिंदी न कहकर, सीधे-सीधे हिंदी कहते है। हमारे पास छोटा एच ‘h’ और बड़ा एच ‘H’ नहीं है कि हम फ़र्क़ कर सकें।
उन्होंने ‘आहो-आहो...’, ‘फुल गोभी, कहो का हाल चाल’, आदि कविताओं का सस्वर पाठ भी किया। प्रकाश उदय की कविताएँ लोकजीवन की लय है—यह उन कविताओं के श्रोताओं की उपस्थिति और उनकी ग्राह्यता बता रही थी। कविता किसी भाषाई अवरोध को नहीं मानती, वह सुधी पाठकों और श्रोताओं तक पहुँच ही जाती है—विविध भाषाओं के श्रोताओं की उपस्थिति यह सिद्ध कर रही थी।
कविताओं का पाठ जहाँ भाषाई-विविधता और प्रासंगिकता को दर्ज कर रह था, वहीं वह जीवन के विविध प्रसंगों में श्रोताओं को उपस्थित कर रहा था। एक सुंदर साँझ में लोक की अभिव्यक्ति और उसकी वर्तमान रचनात्मकता से श्रोता परिचित हुए।
भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति संकल्पित ‘हिन्दवी’ का यह आयोजन अपने पूर्ववर्ती आयोजनों—कविता की छंद-परंपरा और स्त्री-लेखन—के पश्चात अब भाषाई विविधता के महत्त्व को रेखांकित करने की दिशा में एक नया और विचारोत्तेजक प्रयास रहा। भाषिक बहुलता का यह उत्सव विविध भाषाओं, बोलियों और समाज की संस्कृति तथा परंपरा से श्रोताओं को रससिक्त करने का माध्यम बना।
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