ज्ञानरंजन के मनोहर का ‘बहिर्गमन’ उर्फ़ ‘पिता’ को रुमाल की ज़रुरत है...
अजय कुमार यादव
23 जनवरी 2026
नौ दशक का एक सुदीर्घ और शानदार जीवन जीकर ज्ञानरंजन हमें छोड़ कर चले गए। वह मनोहर की तरह प्रस्थान करते हुए रुमाल हिला रहे हैं। अपना रुमाल उमस में सोये उस ‘पिता’ को देना चाहते हैं, जो खटिया के दाएँ पाटी पर सो गए हैं। ज़ाहिर तौर पर उस रुमाल की सबसे ज़्यादा ज़रुरत पिता को ही है, जो उस भीषण गर्मी में खाट की बाधी से अपना पीठ खुजा रहे हैं... मैं उनकी कहानियों को पढ़ते हुए सोच रहा हूँ कि उस नौजवान आदमी के अंत का दुख कैसे मनाऊँ... उसके अंत का तो समारोह होना चाहिए। लेकिन समारोह करवाने के लिए तो किसी कुंदन सरकार की ज़रुरत होगी और मैं किसी कुंदन सरकार को नहीं जानता हूँ, न मैं किसी का ‘घंटा’ हूँ...
जून 2009 की गर्मियों के उमस भरे दिन थे। जेएनयू में एम.फिल. में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर चुका था। एक दिन हमारे शिक्षक प्रोफ़ेसर रामबक्ष विभाग से निकलते हुए मिल गए। मैंने पूछा—सर कुछ समझ नहीं आ रहा है, किस विषय पर शोध प्रस्ताव तैयार करूँ। उन्होंने छूटते ही कहा ज्ञानरंजन की कहानियों को पढ़ो और उस पर शोध प्रस्ताव बनाओ। मैं भागते हुए जेएनयू केंद्रीय पुस्तकालय गया और वहाँ पंचम तल पर ज्ञानरंजन की कहानियों की किताब खोजने लगा। बड़ी मशक़्क़त के बाद ‘सपना नहीं’ संग्रह खोज पाया। किताब को उलट-पुलट कर देखने लगा तो फ़्लैप पर लिखा था—“ऐसे लेखक विरले ही होते हैं जिनकी रचनाएँ अपनी विधा को भी बदलती हों और उस विधा के इतिहास को भी।” इस वाक्य ने उनकी कहानियों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। सबसे पहले ‘पिता’ कहानी ही पढ़ी। मैं देर तक सोचता रहा कि ज्ञानरंजन तो मेरे पिता की बात कर रहे हैं। मेरे पिता को भी जीवन की अनिवार्य सुविधाओं से चिढ़ है। पंखा होते हुए पंखे में नहीं सोना, बेसिन होते हुए उसमें हाथ नहीं धोना—यह सब मेरे पिता की ज़रूरी आदतों में शुमार है। जब तक चप्पल पूरी तरह घिस न जाए, उसे बार-बार मोची के पास ले जाना। रवींद्र कालिया ‘ग़ालिब छुटी शराब’ में लिखते हैं कि मेरा क्या, सन् साठ के बाद की पीढ़ी का चप्पल में अटूट विश्वास था। ज्ञानरंजन तो चप्पल पहने रोहतांग पास हो आए थे और मैं चप्पल पहने ही अपने साप्ताहिक के लिए कई मुख्यमंत्रियों का इंटरव्यू ले आता था। ख़ैर...उसके बाद ज्ञानरंजन की सभी कहनियाँ पढ़ गया। जेएनयू में शोध के लिए प्रवेश भी मिल गया।
जैनेंद्र ने कलकत्ता में एक कथा-समारोह में कहा था—“कहानी की भाषा जीने की भाषा है, जानने की भाषा नहीं।” नई कहानी यानी कि कमलेश्वर की पीढ़ी ने इसे जानने की भाषा बनाया और सन् साठ के बाद के कहानीकारों ने कहानी को जिया और भोगा। साठोत्तरी सीढ़ी के रचनाकारों में काशीनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, दूधनाथ सिंह और ज्ञानरंजन ने उस बदलते हुए यथार्थ को बड़े ही निर्मम तरीक़े से पेश किया। ज्ञानरंजन इस रूप में विशिष्ट हैं कि उन्होंने उस मध्यवर्गीय तंत्र को भी समझने की कोशिश की। ज्ञानरंजन ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने सचमुच कहानी को जिया और भोगा।
ज्ञानरंजन साठोत्तरी पीढ़ी के बहुचर्चित हस्ताक्षर हैं। अपने लगभग दस वर्षों के लेखन में ज्ञानरंजन ने कहानी को अनुभवों के नए पक्षों से जोड़ने का प्रयास किया और पूरी कहानी विधा को वैयक्तिक व सामाजिक अहसासों के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया। दस वर्षों की उनकी कहानियाँ लगातार संवेदना व अहसास के स्तर पर सामाजिक तथ्यों को क़रीब से व गहराई से जाँचने का प्रयास हैं। इससे पहले नई कहानी आंदोलन जिसमें कि आज़ादी से पहले की प्रगतिशीलता की धारा और व्यक्तिवादिता की धारा नए संदर्भों में आपस में घुलमिल गई थीं। आज़ादी के बाद जिस नए भारत की आकांक्षा थी, उसका स्वरूप जनता के लिए अस्पष्ट और धुँधला रह गया। इसी कारण पुराने के भीतर नए को समाहित कर लेने की चाह पैदा हुई और एक सुविधाजनक सामंजस्य स्थापित हुआ। साहित्य में खुले राजनीतिक यथार्थ की जगह घर-परिवार और प्रेम-संबंधों ने ले ली। इसलिए नई कहानी में घर बनाने की या घर टूटने की या सुधर जाने की पीड़ा भरी प्रतीक्षा है।
साठ के शुरूआती वर्षों में जो कहानियाँ लिखी गईं, उनमें न हिंदुस्तान था, न परिवार, न खेत, न कर, न महँगाई थी। गाँव-घर को तो कहानीकारों ने छोड़ ही दिया था, अब शहर की ज़िंदगी भी उनके लिए रहस्यमय लगने लगी थी। इन कहानियों में न तो मध्य-निम्न मध्यवर्ग का घिसटता–हाँफ़ता परिवार दिखाई देता था, न फ़ुटपाथों, झुग्गियों, प्लेटफ़ार्मों, अस्पतालों, दफ़्तरों में अपनी मौत से ज़िंदगी चुराने वाले वर्ग-उपवर्ग दिखते थे। इन कहानियों में मूल रूप से एक युवक होता था, जो ज़रूरी तौर पर प्रेम करने लगता था और एक या अधिक लड़कियाँ उसी लड़के को प्यार करने लगतीं; फिर अपनी शुद्धतावादी और नैतिकतावादी दृष्टि के कारण ये कहानियाँ वर्जना और विलास के दो छोरों पर झूलने लगतीं।
सातवें दशक में बाद की कहानियों में यह स्थिति नहीं रही। इन कहानियों का मूल स्वर निषेध और विरोध का है, जो कि कथा के स्वीकृत आधारों का निषेध तथा किसी प्रकार के मूल्य-स्थापन का विरोध करता है। इसी के साथ-साथ वह जीवन में किसी प्रकार के नैतिक और मूल्यपरक हस्तक्षेप का विरोध करता है। ज्ञानरंजन की कहानियाँ ‘वर्जना और विलास’ के द्वंद्व से परे तमाम प्रेम प्रसंगों से भिन्न कहानियाँ हैं। ज्ञान की कहानियों में भी लड़की एक चीज़ है, एक कमोडिटी है, लेकिन वह इसके प्रति सचेत भी हैं और प्रेमिका के साथ उसकी व्यंग्यपूर्ण सहानुभूति भी है। अपने मध्यवर्गीय टुच्चेपन का अहसास उनकी कहानी के नायक को हमेशा रहता है। अपने इस संस्कार के प्रति गहरा व्यंग्य भी उसके मन में है।
आज़ादी के बाद औद्योगीकरण और मशीनीकरण ने आकर पुराने पारिवारिक ढाँचे को तोड़ दिया, जिससे सामाजिक संबंधों की आत्मीयता नष्ट हो गई। ‘नई कहानी’ में आत्मीयता के इस बिखराव का दर्द देखा जा सकता है। आगे चलकर इस बिखराव को सघन रूप में ज्ञानरंजन की कहानियों में पहचाना जा सकता है। औद्योगिक कारणों से विकसित जो सामाजिक संबंध हैं, उसके कारण अव्यवस्थित मानसिकता और परायापन का बोध है। इस व्यवस्था में मानवीय संवेदनाएँ किस प्रकार अमानवीकरण की प्रक्रिया से ग्रस्त हैं—इसके बहुत से उदाहरण इनकी कहानियों में ढूँढ़े जा सकते हैं। ज्ञानरंजन ने ‘यात्रा’ कहानी में दिखाया है कि किस प्रकार मनुष्य अपने प्रिय जन की मृत्यु पर भी बिना दुखी हुए मानवीय भावनाओं से मुक्त ‘जीभ और जाँघ’ की तात्कालिक ज़रूरतों को चिंता में मग्न रह सकता है। ज्ञानरंजन की कहानियाँ तथाकथित प्रगतिशीलों और नितांत वैयक्तिक आग्रहों वाले रचनाकारों की कहानियों से भिन्न होने के कारण सन् 60 के बाद के मध्यवर्गीय पारिवारिक जीवन का चित्र विचित्र बेचैनी के साथ प्रस्तुत करती हैं।
ज्ञानरंजन की कहानियों में जो मध्यवर्ग आया है, वह मूलतः क़स्बाई मध्यवर्ग है। यह मध्यवर्ग इनकी कहानियों में अपनी समस्त अच्छाइयों और बुराइयों के साथ चित्रित हुआ है। ज्ञानरंजन की प्रारंभिक कहानियाँ मध्यवर्गीय परिवारों के बिखराव की समस्या पर केंद्रित हैं तो अंतिम दौर की कहानियों में छद्म बुद्धिजीवियों पर आक्षेप है। उनके दोहरे चरित्र को खोला गया है। बीच के दौर की कहानियाँ इनसे अलग प्रेम की समस्याओं को लेकर चलने का प्रयास करती हैं। ज्ञानरंजन की कहानियाँ समाज में ‘एडजस्ट’ न हो पाने और अपनी अस्मिता की संगत सार्थकता न खोज पाने की मनःस्थिति की कहानियाँ हैं। इनका लेखन विरोध और विद्रोह के बजाय स्थितियों के स्वीकार का लेखन है। पुराने के प्रति श्रद्धापूर्ण समझौते के साथ ही ‘नए’ के फिसलन पर चुटकी है।
ज्ञानरंजन की सबसे बड़ी सीमा भी यही है कि वह अपने क़स्बाई मध्यवर्गीय दायरे से बाहर नहीं निकल पाते। इनकी शुरुआती कहानियों ‘अमरूद का पेड़’ और ‘पिता’ में जो थोड़ा बहुत आलोचनात्मक स्वर है, वह भी अंत तक जाते-जाते स्वीकार का लेखन बन जाता है। इसके अलावा ज्ञानरंजन जिस दौर में लिख रहे थे, उस दौर में भारत के राजनीतिक पहलू पर एक नई घटना दिखाई पड़ती है। वह घटना है—कांग्रेस की राजनीति और ढुलमुल मार्क्सवादी राजनीति के ख़िलाफ़ व्यापक जनउभार। आज़ाद भारत में पहली बार यह जन-उभार चिह्नित किया गया। ज्ञानरंजन ने अपनी अधिकांश कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन-स्थितियों का वर्णन किया है, परंतु वह उन पात्रों को शामिल नहीं करते जो उस दौर के तमाम किस्म के शोषण और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ देश की मूलभूत शक्तियों के साथ संघर्ष कर रहे थे। ज्ञानरंजन की कहानियों पर विचार करते समय इस प्रश्नों पर विचार होना चाहिए। हालाँकि ज्ञानरंजन के बारे में यह बात निर्विवाद कही जा सकती है कि उनकी कहानियों के बाद हिंदी कहानी वैसी नहीं रही जैसी कि उनसे पहले थी।
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