गगन गिल से संवाद : स्त्री होने से कोई स्त्री लेखक थोड़े ही हो जाता है
हिन्दवी डेस्क
20 अगस्त 2026
गगन गिल हिंदी कविता का वह स्वर हैं, जिन्हें किसी एक वाद या विमर्श के दायरे में रखकर समझना संभव नहीं। अपनी ही सीमाओं को लगातार लाँघती उनकी कविता प्रचलित आलोचनात्मक मानकों से बाहर जाकर अपने लिए अर्थ और मूल्य की नई ज़मीन बनाती है। उनकी काव्य-दृष्टि कविता के किसी एक रूप या अनुभव तक सीमित नहीं, बल्कि उसके सार्वभौम मानवीय रूप की तलाश करती है। ऐसे में गगन गिल से स्त्री-कविता पर बातचीत केवल स्त्री-लेखन के प्रश्नों तक सीमित नहीं रहती; बल्कि कविता, स्त्री-अनुभूति और मनुष्य की व्यापक नियति के बीच नए संबंध खोलती है। प्रस्तुत है रेखा सेठी के साथ उनकी बातचीत, जो स्त्री-लेखन और गगन गिल के रचना-संसार के कुछ अनदेखे-अनचीन्हे पृष्ठों को सामने लाती है :
रेखा सेठी : स्त्री-लेखन को लेकर मन में कई सवाल हैं। आपने अपनी कविता को भिन्न धरातल पर अवस्थित किया है, आपके निकट स्त्री-कविता का आशय क्या है?
गगन गिल : अगर हमें स्त्री-कविता या स्त्री-लेखन पर बात करनी हो और हम विश्व के स्त्री रचनाकारों को लें तो पता नहीं आपने यह नोटिस किया या नहीं, जितनी भी बेहतरीन स्त्री रचनाकार हैं उनकी भाषा बेहद प्रिसाइज़ है। उसमें विवरण का विस्तार नहीं है। स्त्री किसी और इयत्ता को संबोधित कर रही है—अपने आपसे संवाद करते हुए। ज़्यादातर स्त्री-लेखन एक मोनोलॉग के रूप में निकला है, जबकि पुरुषों का लेखन समाज से संवाद करते हुए आकार ग्रहण करता है। उदाहरण के लिए एक ही विषय-वस्तु पर दो बड़े लेखकों का लेखन देखिए... जिस तरह टोनी मॉरिसन अश्वेत या पारिवारिक समस्या को लिखेंगी, उस तरह राल्फ़ एलिसन नहीं।
मेरी चिंता यह है कि एक एजेंडे के तहत जो कविता लिखी जाती है, वह अपने से बात करना छोड़ देती है। कविता में समूह से तभी बात हो सकती है, जब आपने स्वयं को भी उसमें कहीं बैठा लिया हो। मुझे इस स्थिति से ही निराशा होती है कि साहित्य का सामाजिक अभिप्राय किसी आत्मीय चीज़ को छूने की बजाय किसी स्थूल प्रत्यय में घटा दिया जाए।
बेशक एक रचना पाठक और समाज के लिए ही लिखी जाती है, लेकिन वह किसी पाठक या समाज को संबोधित करके नहीं लिखा जा सकती। अगर वह उस तरह से लिखी जाती है तो वह साहित्य नहीं, रिपोर्ताज है। उदाहरण के लिए आप फ़िल्म माध्यम को लें। सार्वजनिक माध्यम होने के बावजूद उसका अपना एकांत है। सिनेमा हॉल के अँधेरे में बैठे सब दर्शक उस फ़िल्म को देखते हैं, अपने-अपने अकेलेपन में। यही साहित्य में होता है, नाटक देखते हुए होता है। वहाँ एकालाप न हो, वार्तालाप हो, यह तो हो सकता है; लेकिन भाषण नहीं हो सकता। जो लोग टेक्स्ट के भीतर हैं, रचनाकार उनसे तो बात कर सकता है; लेकिन जो लोग पन्ने से चिपके हैं, टेक्स्ट को पढ़ रहे हैं, उनसे उसी समय में वार्तालाप कैसे संभव है, वह भी किसी कलात्मक कारण से नहीं, बल्कि कोई इतर साध्य साधने के लिए? जब तक कि रचनाकार अतियथार्थ में जानबूझकर न जाना चाहता हो, जैसे साल्वाडोर डाली के चित्र में घड़ी पिघल जाती है या एक चरित्र कैनवस में से निकलकर बाहर चला जाता है, हालाँकि होता वह भी कैनवस पर ही है या जैसे उदय प्रकाश की कहानी ‘मोहनदास’ में कथानक एक तरफ़ चलता रहता है और टिप्पणी के तौर पर विश्व के समाचार बीच-बीच में पैबंद की तरह।
दरअस्ल, कला में यथार्थ की समस्या सौंदर्यशास्त्र की है, हमने उसे विचारधारा की समस्या बना दिया है।
मुझे स्त्री-लेखन की सबसे बड़ी समस्या यह लगती है कि हम लिखित संरचना की बजाय जब एक अदृश्य संसार को संबोधन करने लगते हैं, तो वहाँ एकदम अजनबी स्वर आ जाता है, जिसे संगीत में राग का वर्जित स्वर कहते हैं। मुझे ऐसे लेखन के सौंदर्यशास्त्र से भी परेशानी है, उसकी ईमानदारी के दावे से भी।
मैं एक एकडेमिक से, सार्वजनिक हस्ती से, राजनीतिज्ञ से, सामाजिक कार्यकर्ता से यह मानकर चल सकती हूँ कि वे उन्हें संबोधित करें जो पन्ने के बाहर हैं, लेकिन साहित्य ऐसा करे, यह मुझे समझ में नहीं आता। पाठक के नाते मुझे रचना को संबोधित होना है और रचना को मुझे। कई बार रचनाकार अपनी रचना को स्वतंत्र ही नहीं होने देता। रचना एक दिशा में जा रही है, रचनाकार उसे रोककर उसकी पीठ पर एक गठरी अपने इस या उस सरोकार की रख देता है, भले उस सरोकार का रचना की दुनिया से कोई संबंध हो, न हो।
एक बार संपूर्ण होने के बाद रचना की स्पेस अपने में संपूर्ण और अक्षुण्ण है। उसका अपना मूल्यबोध है। क्या इतनी सी बात हम समझते हैं? यदि रचनाकार उसे ऐसा नहीं करने देता, उस पर अपनी प्रतिबद्धता का बोझा लादता चला जाता है, तो रचना के प्यूरिटी ऑफ़ रियलाइज़ेशन में गंभीर गड़बड़ है।
रेखा सेठी : क्या यह आवश्यक है कि स्त्री-कविता की अपनी अलग पहचान हो?
गगन गिल : मैं स्त्री-कविता जैसे किसी अभिधान को स्वीकार नहीं करती। साहित्य में विमर्श के खाँचों में मेरा कोई विश्वास नहीं। मेरे अध्ययन की दुनिया बिल्कुल अलग है, मेरी रुचि कहीं और है। मैं टैगोर को दस बार भी पढ़ूँ, हर बार लगता है कि यह वाक्य तो मैंने पहले नहीं पढ़ा था! किताब पढ़ी थी, तब यह वाक्य कहाँ था?
मुझे टैगोर से रोशनी मिलती है और बुद्ध से। मेरे मन के संसार में ये दो ऐतिहासिक उपस्थितियाँ बहुत बरसों से जीवंत हैं। लेकिन अपना कोई व्यक्तिगत आइकॉन मुझे मानना हो, तो वह टैगोर हैं। इतना बड़ा ह्यूमनाइज्ड माइंड है वहाँ। बुद्ध ने दुःख का कारण समझ लिया था और त्रिकालदर्शी हो गए थे। वह वहाँ ऊपर, हम यहाँ नीचे। गुरुदेव के साथ ऐसा नहीं लगता, उन्हें हम अपनी बात बता सकते हैं। जो लोग समझते हैं, उन्होंने मानव-हृदय के रहस्य को समझ लिया, वे अभिनंदन-योग्य हैं। मैंने बहुत बार कोशिश की, सिर्फ़ टुकड़ा-टुकड़ा समझ में आया। जब कोई मेरी कविताओं को लेकर कहता है, इनमें विराग है, तो मुझे हैरानी होती है। मुझे तो लगता है, उनमें राग ही राग है। जो व्यक्ति विराग में चला जाएगा वह कविता कैसे करेगा?
मेरा जुड़ाव इस बात से क्यों नहीं होना चाहिए कि मेरा चेतन-अवचेतन का बोध, मेरा भारतीय होना क्या केवल एक संयोग है? याकि मेरे पुराने संस्कार कहीं से चले आ रहे हैं? क्या मैं इस सबकी संश्लिष्टता के प्रति सजग हूँ?
हमें यह याद रखना चाहिए कि स्त्री लेखकों की इस समय सातवीं-आठवीं पीढ़ी चल रही है, अगर हम महादेवी जी और आज़ादी के समय से इसे गिनना शुरू करें। आज लगभग सभी महिला लेखक सुशिक्षित व आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं। लेकिन इस सबके रहते क्या उन्होंने विषय और शिल्प में कोई नए रास्ते खोजे? नए जोखिम उठाए? क्या अधिकांश स्त्री-लेखन को सिर्फ़ इसी सीमा के चलते रद्द नहीं कर देना चाहिए?
रेखा सेठी : क्या आपको ऐसा लगता है कि ‘स्त्री-विमर्श’ स्त्री-कविता की संभावनाएँ तलाशने की अपेक्षा उसके लिए एक सीमा बन गया है; क्योंकि यह जिस तरह कविता को एक विशेष दृष्टिबोध से देखने का आग्रह करता है, उससे कविता के अन्य पक्ष चर्चा के केंद्र में आ ही नहीं पाते?
गगन गिल : स्त्री-लेखन और स्त्री-विमर्श दो अलग-अलग विषय हैं। हम क्यूँ करें स्त्री-विमर्श? स्त्री-विमर्श हमारा काम थोड़े ही है! यह राजनीतिक एजेंडा है, सामाजिक एजेंडा है। एक्टिविस्ट लोगों का काम है, मानुषी वाले इसे उठाएँ, राष्ट्रीय महिला आयोग वाले उठाएँ, वह एक अलग चीज़ है। हो सकता है, कभी हमारी अस्मिता पर चोट हो, तो हमें ‘ठोस और व्यावहारिक’ स्त्री-विमर्श करना पड़े, लेकिन साहित्यकार के नाते हमारी चुनौती है, आसमान के नीचे अपने निपट अकेले होने को समझ सकना। उसे भाषा में पकड़ सकना।
आप कृष्णा सोबती का कृतित्व देखिए, उनकी हर किताब, अपनी संरचना में, विषय में, एक-दूसरे से कितना भिन्न है। उन्होंने जो भी लिखा उसमें वह आतंरिकता में से निकली ‘ऐ लड़की’ हो या किसी समय विशेष में से निकली ‘दिलो दानिश’—पूरी तैयारी से लिखा। उनका लेखन हमारे समग्र स्त्री-लेखन का आदर्श प्रतिमान होना चाहिए। अव्वल दर्जे की मनीषा ही मानस के नए मानचित्र खोज सकती है।
कृष्णा जी की रुचि जानी-पहचानी चीज़ के इर्द-गिर्द नहीं घूमती, एक बार ‘मित्रो मरजानी’ लिख दी तो फिर ‘ज़िंदगीनामा’ जैसा एपिक ही लिखेंगी और ‘ज़िंदगीनामा’ जैसे बड़े फ़लक को साधने के बाद ‘ए लड़की’ के आतंरिक मोनोलॉग में जाएँगी। भाषा के संसार में यह बहुत बड़ी यात्रा है। जब वह कहती हैं कि ‘मैं स्त्री लेखक नहीं हूँ’, मुझे बहुत अच्छा लगता है। स्त्री होने से कोई स्त्री लेखक थोड़े ही हो जाता है! और यदि आप लोगों की ज़िद हो कि हमारी भाषा में कुछ तो स्त्री लेखक होंगे, तो मैं कहूँगी, यदि कृष्णा सोबती, महादेवी, मृदुला गर्ग स्त्री लेखक हैं, तो दूसरे कोई नहीं। और अगर दूसरे स्त्री लेखक हैं तो ये सब लोग नहीं।
महादेवी जी ने कब कहा था कि उन्हें स्त्री लेखक के तौर पर पढ़ा जाए? हमने उन्हें इस साँचे में बैठाया है। क्या आपको मालूम है, उनकी जीवनी में एक प्रसंग आता है। जिन दिनों महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान कवि-सम्मेलनों में जाती थीं, उस समय का। एक बार की घटना है। महादेवी जी कविता पढ़ने के लिए उठने लगीं तो किसी साथी कवि ने फ़ब्ती कसी, मेरी गोद में आकर बैठ जाओ। ताज्जुब की बात कि मुझे इस समय उस कवि का नाम तक याद नहीं, इतना अज्ञातकुलशील था वह! इस घटना से महादेवी इतनी आहत हुईं कि सुभद्रा कुमारी चौहान से कह दिया कि आज के बाद वह किसी सम्मलेन में कविता पढ़ने नहीं जाएँगी। कितने लोगों को यह बात पता होगी?
लेखक स्त्री नहीं होती, हम उसे स्त्री बनाते हैं—अपने शोहदेपन से। जब उसकी तेजस्विता का, उसकी बुद्धिमत्ता का सामना नहीं कर पाते... तब।
यह है स्त्री-विमर्श का मुद्दा। क्या स्त्री-विमर्श में इसकी बात होती है?
आप बताएँ, कोई समझदार स्त्री स्वयं को स्त्री क्यों कहेगी? जिसे उसको छोटा करना है, जिसे उसको कमतर ठहराने को और कुछ नहीं सूझता तो गोद में बैठाना है, वह कहेगा। क्या कोई आदमी अपने को आदमी कहता है? हम किन लोगों को आदमी कहते हैं? जिन्हें कहते हैं, सिर्फ़ तब, जब वह आदमी होने लायक़ काम नहीं करते। तब हम कहते हैं, आदमी बनो!
रेखा सेठी : स्त्री-मुद्दों से अपनी दूरी रखते हुए भी आपकी कविताओं में विशेषत: ‘एक दिन लौटेगी लड़की’ संकलन में ऐसी बहुत सी कविताएँ हैं, जिनमें स्त्री के स्त्रीकरण की प्रक्रिया दिखाई पड़ती है। जैसे एक कविता में लड़की के ज़बान न होने का संदर्भ है। ऐसी रचनाओं में पारिवारिक हिंसा से उपजी पीड़ा का एहसास होता है। ये सामजिक संदर्भ आपकी कविता का अनुभव किस रूप में बनते हैं?
गगन गिल : लेकिन ऐसे काव्यानुभव तो और रचनाकारों की कविताओं में भी हैं। मैं एक लड़की थी, स्त्री हूँ, तो ज़ाहिर है, जो भी अनुभव मुझे होंगे, इसी अस्मिता में होंगे। मैं चाह कर भी घोड़े की तरह या बिल्ली की तरह नहीं लिख पाऊँगी, हालाँकि इस नज़रिए से लिखने के सुंदर उदाहरण हैं हमारे सामने, अगर आपने तुर्की कहानियाँ या सुनीति नामजोशी को पढ़ा हो तो! मुद्दा यह है, क्या हम रचना और रचनाकार की अस्मिता में जो महीन-सा अंतर है, उस पर ध्यान दे रहे हैं? क्या मेरी कविता वहाँ जा पा रही है, जहाँ शायद मैं नहीं जा पाऊँगी, इस पर आपको ग़ौर करना होगा।
रेखा सेठी : आपकी दृष्टि में क्या समाज का कोई जेंडर्ड स्ट्रक्चर है?
गगन गिल : हाँ, बिल्कुल है; लेकिन लेखन का नहीं है। लेखन अगर जेंडर को ट्रांसेंड नहीं करता, उससे आगे नहीं जाता, तो वह मानवीय अनुभव संप्रेषित नहीं कर सकता। अगर उसे बड़ा मानवीय अनुभव संप्रेषित करना है तो जेंडर को ट्रांसेंड करना ही होगा। एक बच्चे की कहानी लिखने के लिए मुझे बच्चा बनने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि विडंबना यह है कि कोई बच्चा अपनी कहानी ख़ुद लिख नहीं सकता!
टैगोर की एक कहानी है—‘पोस्टमास्टर’। उसमें एक छोटी बच्ची है जो अपने मालिक की बहुत सेवा करती है, उसे दिल से प्रेम करती है, उसके प्रति पूर्णतः समर्पित है। कुछ दिनों बाद जब मालिक का तबादला हो जाता है तो वह कुछ पैसे उसे पुरस्कार में देना चाहता है। बच्ची को इस बात से कितना दुःख पहुँचता है, जैसे उन पैसों से मालिक ने उसका प्रेम छोटा कर दिया; इसे टैगोर जिस तरह अभिव्यक्त करते हैं, वह सीखने लायक़ है। कहानी पढ़ते हुए आप साफ़ देख सकते हैं, यह कहानी टैगोर ने स्वयं को पोस्टमास्टर से जोड़कर लिखी है, स्वयं को धिक्कारते हुए, आत्मभर्त्सना करते हुए। यह है एक लेखक का मानवीय बड़प्पन! कहानी पढ़ते समय आपसे कभी यह ग़लती नहीं होगी कि टैगोर ने वह कहानी बच्ची की तरफ़ से लिखी है। वह कहानी इसी तरह लिखी जा सकती थी, इसी आत्म-ताड़ना में से। क्या कोई पुरुष इस तरह स्त्री विषय पर लिख सकता है, स्वयं के कमीनेपन को प्रश्नांकित करके? यह समाज स्त्रियों को प्रताड़ित करता हुआ समाज है। लेखकों के दोमुँहे चेहरे समय-समय पर उजागर होते रहते हैं। क्या किसी पुरुष ने आत्म-धिक्कार की कथा लिखी है, जो वह अपने घर में करता है, बाहर करता है, उसकी? हिंदी साहित्य का एक भी उदाहरण बताइए! क्या ऐसे लोगों के बीच हमें स्त्री कहलाकर जाना है?
हमारी करुणा, संवेदना किस तरफ़ है, लेखन में इसका पता ज़रूर चलना चाहिए, लेकिन कलात्मक रूप में ही। आप संवेदना पहले से तय थोड़े ही कर सकते हैं। अगर आपकी पक्षधरता पहले से तय है, अपना फ़ैसला आप पहले से कर चुके हैं, तो रचना बिना पैरों से चले, आपकी गोद में चढ़े हुए, रास्ता पार कर गई है। अब वह अपने पैरों का क्या करे? कहाँ चले?
रचना मानवीय संवेदना बदलने की पूरी प्रक्रिया है। स्त्री-विमर्श करते हुए क्या हम एक सरलीकृत ख़ाका ही सही, बनाकर कभी जाँचते हैं कि शुरूआत में संवेदना यह थी, फिर इस-इस बिंदु से बदलती हुई यहाँ तक गई? स्त्री-विमर्श के नाम पर आप केवल उन रचनाओं की गिनती तो नहीं करते रह सकते जो पुरुषों को मज़ा चखाने के लिए लिखी गईं।
रेखा सेठी : आपने अभी कृष्णा जी की बात कही थी, अपने समकालीन रचनाकारों में और कौन-कौन आपको प्रभावित करते हैं ?
गगन गिल : अमृता भारती, श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल, अरुण कमल—इन सबकी कविताएँ मुझे अच्छी लगती हैं। इन सबमें कलात्मक रूप में अरुण कमल सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। मैंने सिर्फ़ अरुण कमल के यहाँ देखा है, वह इतने गहरे प्रतिबद्ध हैं कि उनकी कविताओं में अलग से प्रतिबद्धता को आप पकड़ नहीं सकते। एक गहरा मानवीय सरोकार है वहाँ। मैं उन्हें जितनी बार भी पढ़ती हूँ, हर बार एक नई चीज़ मुझे मिलती है।
रेखा सेठी : आपकी कविता या संवेदना का केंद्र क्या है, क्या जैसा कहा गया कि ‘दुःख और आकांक्षा’ आपकी कविता से अभिन्न हैं...
गगन गिल : हम दुःख की बात करते हैं, आकांक्षा की बात करते हैं, प्रेम की बात करते हैं; यह एक कविता में कैसे आ रहे हैं, इनके पीछे सिर्फ यही प्रत्यय हैं या कि एक लेखक की कोई और बौद्धिक तैयारी भी चल रही है; यह आप जैसे एकडेमिक को देखना चाहिए। मुझे यह कहते हुए थोड़ा संकोच होता है कि अगर मेरी सब किताबें एक दूसरे से अलग हैं, विषय में भी और वस्तु में भी, तो उनके पीछे कोई बौद्धिक तैयारी रही होगी। आप उसे क्यों नहीं देख पाते? मेरा लेखन कभी स्फुट नहीं रहा। ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुझे झटका लगा और मैं लिखने बैठ गई। मेरी हर पुस्तक एक विषय-वस्तु पर केंद्रित है। क्या आपने इस प्रयास को देखा?
मेरी बौद्धविषयक कविताओं के अंत:स्थल में बौद्ध-वाङ्मय की गूँज आप इसलिए नहीं पकड़ पाते, क्योंकि आप उससे परिचित नहीं हैं। आप बार-बार उनका सरलीकरण निराशा और दुःख जैसे प्रत्ययों में करते हैं। लेकिन वही कविताएँ जब बौद्ध-वाङ्मय का कोई जानकार पाठक यहाँ या विदेश में पढ़ता है, तो वे उनके सामने अलग तरह से खुलती हैं। वह तुरंत उन कविताओं का सब-टेक्स्ट पकड़ लेता है।
मेरे अध्ययन, अनुभव और भाषा का क्षेत्र एक है; मेरे भाषातीत संसार का दूसरा। दोनों मेरे मन का हिस्सा हैं। ज़रूरी नहीं, मेरे अवचेतन का सब अनुभव भाषा में बदलता हो। हर कविता संसार में अलग-अलग जगह से प्रवेश करती है। मेरी कविता का जन्म किस अँधेरे में होता है, इसको पकड़ने की कुछ तैयारी तो मेरे आलोचक पाठक को भी करनी होगी। आप कहते हैं, यहाँ दुःख और विषाद है... तो साहित्य सुख के विषय में थोड़े ही समझाएगा। सुख के बारे में समझना ही क्या है? जो भी हमें समझना है, जीवन के दुःख के बारे में ही समझना है। सुख इसीलिए चला जाता है, क्योंकि उसे समझना नहीं होता। जिस चीज़ को हमें समझना होता है, जिससे पार पाना होता है, वह टिकी रहती है। कोई भी रचनाकार अपनी प्रक्रिया में कहाँ आ-जा रहा है, इसके थोड़े-बहुत संकेत ही वह लेखन में छोड़ता है, सब नहीं बताता। सब बताने लगेगा तो किसी गैलरी को संबोधित कर रहा होगा। अगर कोई शोधार्थी, एकेडेमिक या आलोचक पुस्तक में छोड़े गए सूत्रों के बावजूद उन्हें नहीं पकड़ रहा, वहाँ सुख-दुःख की रूढ़ भाषा ही पढ़ रहा है, तब लेखक भी क्या बताए!
रेखा सेठी : आपकी कविता बार-बार बुद्ध की अंतरंगता से सप्राण होती है, आप इसे कैसे परिभाषित करेंगी?
गगन गिल : मेरी जो दूसरी किताब है—‘अँधेरे में बुद्ध’—उसमें बीच-बीच में कुछ उद्धरण आते हैं। वे ऊपर से नहीं चिपकाए गए, उस पाठ का ही हिस्सा हैं। वह उस सारे अंतर दृश्य का हिस्सा हैं, जिसे मैं अपनी कविताओं के माध्यम से समझना चाहती हूँ। इन दो बातों में बहुत फ़र्क़ है—मैं कोई चीज़ समझने के लिए लिख रही हूँ या समझाने के लिए। मेरी कोई भी किताब कुछ बताने या समझाने के लिए नहीं लिखी गई। सब पुस्तकें मुझे ही थोड़ा-सा बेहतर बनाने का, शिक्षित करने का उपक्रम हैं। मैं किसी चीज़ को जिस तरह समझ पा रही हूँ, उसे ही औरों के साथ बाँटना चाहती हूँ। इस दृष्टि से शायद मैं अपनी समकालीनों से कुछ अलग हूँ। जो मुझे समझ में नहीं आ रहा, जब तक उसे पूरी तरह से खोलकर न देख लूँ, एक-एक पुर्ज़ा निकालकर, तब तक मैं दूसरे विषय तक नहीं जा पाती। लेकिन मेरे लेखन का विषय सिर्फ़ आत्मकथात्मक अनुभव से नहीं आता। लेखक हूँ तो ज़ाहिर है; उसकी जड़ें मेरे जीवन में ही कहीं हैं, लेकिन सिर्फ़ लिखने से हमने किसी बड़े रहस्य को पकड़ लिया, ऐसा होता नहीं है। लिखना काफ़ी कुछ सुरंग खोदने जैसा है। हमें पता नहीं होता, हम बाहर किधर से निकालेंगे। अब कोई कहे कि अपने लेखन में आप बिंदु से बिंदु मिलाकर दिखाइए, तो ऐसा होता नहीं।
रेखा सेठी : क्या आपकी कविता को ‘एकांत में बसी लहू-लुहान मानवीय अस्मिता की कविता’ कहा जा सकता है?
गगन गिल : मेरी इतनी सारी अस्मिताएँ हैं—मैं एक बेहद हाई-प्रोफ़ाइल नौकरी, देश-विदेश घूमकर, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में साल भर फ़ैलो रहकर... यह सब छोड़कर अपने चुने हुए एकांत में रहती हूँ, तो कुछ तो समझने कि कोशिश कर रही हूँ। यह जो हमारा बाहरी समाज है, इसके जो दंद-फंद हैं, वह कहीं तो मेरी दुनिया को डिस्टर्ब करते होंगे कि मैं उस शतरंज से बाहर आ गई। आज मुझे किसी को कुछ सिद्ध नहीं करना। जो भी चीज़ें मैंने छोड़ी हैं, उन्हें आज चाहूँ, तो शायद फिर से पकड़ सकती हूँ। ऐसा तो नहीं होगा कि मुझे धन या यश अच्छा नहीं लगता होगा, लेकिन कुछ और रहा होगा; ज़्यादा गहरा और ज़रूरी, अर्जेंट, जो मुझे अपनी ओर खींच ले गया।
अब अगर मैं ‘अँधेरे में बुद्ध’ लिखती हूँ तो आप मुझे बौद्ध कह देते हैं, ‘एक दिन लौटेगी लड़की’ लिखती हूँ तो महादेवी के बहुत दिनों बाद आई एक स्त्री कवि कह देते हैं। अगर ‘यह आकांक्षा समय नहीं’ लिखती हूँ तो आप कहते हैं, दुःख बहुत है इसमें। ‘यह आकांक्षा समय नहीं’ एक ठेठ बुद्धिस्ट एक्सरसाइज़ है। इसमें बुद्ध के उद्धरण आते हैं तो मीरा के भी।
महात्मा बुद्ध का एक शिष्य था, उनकी सभा में बार-बार विज्ञान के सवाल पूछकर व्यवधान डालता था—सूर्य के कितने ग्रह हैं, उपग्रह हैं, आदि। अंतत: एक दिन बुद्ध ने कहा, मेरी जिज्ञासा का विषय यह नहीं कि सूर्य के कितने ग्रह हैं, सौरमंडल का रहस्य क्या है, लेकिन मैंने जान लिया है, मनुष्य के दुःख का स्रोत कहाँ है, तुम्हें समझना है तो इसी पर ध्यान दो।
क्या एक कवि को स्वयं यह समझाना पड़ेगा कि ‘यह आकांक्षा समय नहीं’—‘अँधेरे में बुद्ध’ का ही अगला प्रयास है? बुद्ध का यह आर्य-वचन कि आकांक्षा ही दुःख का कारण है, मैं इस वचन को अपने रक्त-मांस में समझना चाहती थी—क्या मैं आकांक्षा को छोड़ सकती हूँ?
मुझे लगता है, मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि मुझे अपने जैसे समाज में ऊँची शिक्षा और अच्छे अवसर मिले। तब मेरा सामाजिक प्रतिदान क्या हो? यह दो ही तरह से हो सकता था, एक मैं बाहरी दुनिया में भाग लूँ, साहित्यिक संपादन-कार्य जो मैं बख़ूबी कर लेती हूँ, उसी में उत्कृष्ट कार्य करूँ। दूसरा यह कि मैं अपना सामना करूँ। तो मैंने अध्यवसायी का जीवन चुना, अध्यापक या ज्ञानी का नहीं। मेरी जिज्ञासा सिर्फ़ कविता और यात्राओं में नहीं; इतिहास, धर्म और दर्शन में, फ़िल्मों और आलोचकीय दृष्टि में भी भरपूर है। इनमें से एक भी चीज़ ऐसी नहीं, जिसके लिए मुझे लगे कि अगर मैं उसकी अध्यवसायी के बजाय ज्ञानी होती तो बेहतर होती। इसके बावजूद यदि कोई पुस्तक तैयार हो जाती है, तो मुझे हैरानी ही होती है!
रेखा सेठी : ‘थपक थपक दिल थपक थपक’ भाषा और संवेदना की दृष्टि से बिल्कुल भिन्न धरातल पर है...
गगन गिल : ‘थपक थपक दिल थपक थपक’ की रचना कुछ यूँ हुई कि एक बार किसी ने मुझसे पूछा कि क्या हिंदी में वैसी कविता नहीं होती, जैसी पंजाबी में होती है, जो छंदमुक्त होकर भी लयात्मक हो, तो मेरे मन में उस की प्रतिक्रिया के तौर पर ऐसी कुछ रचना करने की इच्छा जगी। आप जानती हैं, मेरी मातृभाषा पंजाबी है। मैं देखना चाहती थी कि हिंदी भाषा को भी रबड़ की तरह मरोड़ सकते हैं या नहीं। मैं भाषा का ‘मन’ समझाना चाहती थी, उसका अवचेतन। आप देखेंगे, छंदबद्ध कविता स्थूल भी हो सकती है, गूढ़ भी। वह चेतन में से निकल रही है कि अवचेतन से, महज़ इतने भेद से उसका रास्ता अलग हो जाता है, जो वह भाषा में खोजती है।
रेखा सेठी : कविता भाषा की संभावनाओं को कैसे खोलती है?
गगन गिल : भाषा हमारे अनुभव का बहुत स्थूल रूप है। सबसे सुंदर अनुभव वही है जो हम कह न पाएँ। अकथनीय को कहने की प्रक्रिया में ही हमें अपना लेखक होना समझ में आता है। एक लेखक की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भाषा का कम से कम इस्तेमाल कैसे करे। जैसे एक कलाकार के लिए कि कम से कम कितने रंगों में, रेखाओं में वह अपनी बात कह सकता है।
क्या एक टेक्स्ट इतना सुगठित हो सकता है कि उसमें से एक शब्द निकलते ही वह भुरभुरा कर गिर जाए? कविता में भाषा को उड़ान भरनी चाहिए। यथार्थ से टकराते ही एक टप्पा आना चाहिए, वरना जीवन के यथार्थ और कविता के यथार्थ में हम अंतर कैसे करेंगे? अब भाषा टप्पा कैसे खाए, इसका कोई फ़ॉर्मूला नहीं है। इसे हम सबको अपनी-अपनी तरह से पकड़ना होगा।
मैं अपने को उन लेखकों में नहीं मानती, जो जब अपने लिखे हुए को रिवाइज़ करते हैं, तो वह बेहतर हो जाता है। मेरे लिए सही समय पर, चाहे मैं कविता लिख रही हूँ या गद्य, पहली पंक्ति लपक लेना बहुत महत्त्वपूर्ण है। आगे जाकर क्या होने वाला है, उसकी कुंजी इसी पहले वाक्य में छिपी है। मैं दूसरे या तीसरे ड्राफ़्ट वाली लेखक हूँ, बहुत सारे ड्राफ़्ट्स की नहीं। मेरी सबसे बड़ी मुश्किल तो यह है कि विवादी स्वर तुरंत कान में गूँजने लगता है। अगर इतने वर्ष लिखने के बाद भी इतना कम आपको दिखाने के लिए है, तो उसका कारण यही है, मैं पहला वाक्य लपकने में देर कर देती हूँ।
रेखा सेठी : भाषा कविता की संभावनाएँ कैसे खोलती है?
गगन गिल : दरअस्ल, भाषा को कविता की नहीं; बल्कि कविता को भाषा की संभावनाएँ खोलनी चाहिए! उसे भपा कर विशुद्ध आंतरिक अनुभव तक ले आना चाहिए। कविता में कवि को कोई दृश्य नहीं बुनना, किसी चरित्र का वर्णन नहीं करना कि किस उम्र और पृष्ठभूमि का है। उसे कवि के सीने की अँधेरी सीढ़ियाँ उतरनी हैं। एक अच्छी कविता कवि की तंद्रा में से जन्म लेकर किसी दूसरी तंद्रा—अपने पाठक के मन की तंद्रा—में जानी चाहिए। मेरे अनुभव में एक सफल कविता वह होगी, जो मेरे लिए यथार्थ इतना असहनीय और अकल्पनीय कर दे कि मुझे कुर्सी से उठकर लेट जाना पड़े। साहित्य का काम यही होना चाहिए कि वह कुछ समय के लिए यथार्थ को हमारे लिए धुँधला कर दे। ऐसा नहीं होगा, तो हम कभी वह सत्त्व, वह सार नहीं पकड़ पाएँगे, जिनसे यह जीवन बनता है।
रेखा सेठी : इन दिनों आप नया क्या लिख रही हैं?
गगन गिल : दो-तीन अलग-अलग तरह की चीज़ें लगभग अस्सी प्रतिशत बनी-अधबनी पड़ी हैं—कविताएँ और गद्य दोनों में। मुझे बार-बार उनसे अलग होना पड़ता है, दूरी बनानी पड़ती है, ताकि देख पाऊँ, भाषा वहाँ क्या खेल कर रही है। मेरे लिए लिखना एक शिल्प बनाने की तरह है, जिसमें बार-बार पत्थर में छिपा कोई अदृश्य अंश ढूँढ़ना पड़ता है। लिखना मेरे लिए कभी भी आसान नहीं रहा। जिन दिनों लिख रही होती हूँ, सिर भन्नाया रहता है, साँस ऊँची-नीची चलती है। मुझे उन लोगों से ईर्ष्या होती है, उम्र के साथ-साथ जिनके लिए लिखना आसान हो जाता है। दुनिया में इतने सारे काम हैं, सुबह से शाम तक लोग काम करते हैं। मुझे सिर्फ़ यही काम आता है। इसमें भी ज़्यादातर मैं भिखारी की तरह बैठी रहती हूँ, कटोरे में सिक्का गिरने के इंतिज़ार में। मेरे लिए ऐसे दिन बहुत कम होते हैं, जब उन सिक्कों की कोई हैसियत बने।
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‘माटी’ पत्रिका के गगन गिल पर एकाग्र विशेषांक से साभार प्रस्तुत।
समादृत कवि-गद्यकार गगन गिल इस बार के ‘हिन्दवी उत्सव’ में काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित हैं। ‘हिन्दवी उत्सव’ से जुड़ी जानकारियों के लिए यहाँ देखिए : हिन्दवी उत्सव-2026
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