एक थकी हुई तितली
ईशा सिंह
10 जून 2026
मैंने इतने क़रीब से कभी मोर नहीं देखा था। यहाँ शुरुआत कुछ और कहकर भी हो सकती है, लेकिन मोर ही क्यों, यह नहीं मालूम। शायद उस दुपहर का सबसे गहरा रंग, मुझे उस मोर में दिखाई दिया था। मोर अपनी गहरे नीले रंग की गर्दन को 360 डिग्री में घुमा रहा था। वह अपनी गर्दन हर दिशा में घुमाकर जैसे मेरे सामने इठला रहा था। वही गहरा नीला रंग, जो मुझे इन दिनों बेहद पसंद आ रहा है। क्या उस मोर को पता था कि वह हज़ारों क़ैदियों के बीच में है?
उसका गहरा नीला रंग! उसका मोर होना मेरे लिए इतना सुंदर नहीं था, जितना उसका गहरा नीला रंग। यह ब्लू का कौन-सा शेड है? मैं सोचने लगी। अरे नहीं! मैं तो सेंट्रल जेल आई हूँ, मुझे तो अभी रेपिस्ट का इंटरव्यू करना है और कहाँ मैं मोर और उसके नीले रंग के बारे में सोचने लगी।
उस दिन मौसम वैसा ही था, जैसा सर्दियों के दिनों में होता है। बहुत ट्रैफ़िक के बीच भी वह एक शांत दुपहर थी। ठीक वैसी ही शांत दुपहर, जो चेक-उपन्यासों में मिलती है। वर्षों पुरानी दीवार, मिटे हुए-से अक्षर, ज़ंग लगे दरवाज़े और चारों तरफ़ छह-सात कुत्ते, जो धूप के अपने-अपने टुकड़ों पर बैठ गए थे।
सामने एक वर्षों पुरानी इमारत थी। दीवार का पीला रंग और उस पर बनी सुंदर आकृतियाँ बता रही थी कि यह इमारत जयपुर में है। अगर उस पर केंद्रीय कारागृह, जयपुर न लिखा होता; तो वह इमारत ठीक वैसी ही दिखती, जैसी जयपुर की तंग गलियों की वे इमारतें, जिन पर पर्यटकों की कभी नज़र नहीं पड़ती।
पीले रंग की दीवार और नीले रंग का दरवाज़ा... उसे किवाड़ कहना ही ठीक रहेगा। वैसा ही किवाड़, जैसा राजस्थान की पुरानी इमारतों का होता है। बाहर गहरे नीले रंग का मोर था, उसके कुछ क़दम आगे जेल का दरवाज़ा हल्के नीले रंग का था। मोर वाला नीला नहीं, आसमान वाला नीला। जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे उस दुपहर के रंग फीके होते जा रहे थे।
मैं धीमे-धीमे क़दमों से आगे बढ़ रही थी। मुझे अपने ही क़दमों की आहट सुनाई नहीं दे रही थी या शायद मैं सुनना नहीं चाहती थी। उस विशाल किवाड़ में एक तरफ़ छोटा दरवाज़ा भी था। वह दरवाज़ा ठीक वैसा ही था, जैसा हिंदी फ़िल्मों में सेंट्रल जेल के दरवाज़े दिखाए जाते हैं। मैंने सोचा शायद हिंदी फ़िल्में इतनी भी हक़ीक़त से दूर नहीं। उस छोटे दरवाज़े से एक पुलिसकर्मी बाहर की तरफ़ आया और हमें अंदर ले गया। हम झुककर उस दरवाज़े से अंदर दाख़िल हुए। दरवाज़े पर एक बड़ा-सा ताला लगा था, जिसकी चाबी सिर्फ़ एक महिला पुलिसकर्मी के पास थी और जो हर एक शख़्स के आने के बाद फिर से ताला लगा देती है। उस ताले के परे एक अलग दुनिया थी, जिसका कोई रंग नहीं था। ब्लैक एंड व्हाइट नहीं, वह एक रंगहीन दुनिया थी—जिसे देखने, परखने और समझने हम वहाँ मौजूद थे।
पाँच-छह जेलकर्मी आने वाले लोगों के सामान की निगरानी कर रहे थे। लोगों के चेहरों के हाव-भाव अजीब ढंग से सामान्य लग रहे थे, जैसे वह जेल में नहीं, किसी अन्य सरकारी दफ़्तर में आएँ हों। क्या वे सामान्य बनने की कोशिश कर रहे थे? मैंने चारों तरफ़ देखा और पाया कि हम सेंट्रल जेल के अंदर आ चुके हैं। मैंने इससे पहले जेल कभी देखी नहीं थी। पत्रकारिता आपको कहाँ-कहाँ नहीं ले जाती, मैं सोचने लगी।
हम दाएँ मुड़े, जहाँ जेलर का ऑफ़िस था। वह जेलर जैसा ही लग रहा था, लेकिन हिंदी फ़िल्मों के जेलर से बेहद अलग। बातचीत शुरू हुई, जिसमें नया कुछ नहीं था। ख़ामोशी को भरने वाली एक बातचीत। हमने अपना परिचय दिया और जेलर ने अपनी बात शुरू की। बातचीत को लगभग एक घंटा हो गया, इस बीच जेलर ने बीस बार वह बटन दबाया, जिससे बाहर खड़ा पुलिसकर्मी तुरंत अंदर आ जाता था। वह पुलिसकर्मी दो घंटे में लगभग बीस बार अंदर आया, लेकिन उसके चेहरे के भाव हर बार एक जैसे ही थे।
“अरे! इन लोगों को चाय-पानी नहीं पिलाओगे?”
मुझे प्यास नहीं थी, लेकिन मैंने सोचा जेल का पानी पीकर तो देखते हैं। स्वाद तो पानी का ही था, लेकिन फिर भी कुछ अलग-सा था। फिर कुछ देर बाद चाय भी आ गई। चाय का भी मन नहीं था, मैंने फिर सोचा कि जेल की चाय भी पीकर देखते हैं। बिना कोई जुर्म किए, जेल में जेलर के कमरे में बैठकर जेल की चाय पीने का एक अलग अनुभव हो रहा था।
मैंने देखा ऑफ़िस में ठीक जेलर के सामने बाबा की वेशभूषा में एक आदमी भी बैठा था। वह गूँगा था, उसके हाथ में बच्चों वाली स्लेट थी, जिस पर वह अपनी बात लिखता और मिटाता। उसने लिखा, “आप कब डीआईजी बनोगे?” और मिटा दिया। वापस वही लिखा और जेलर को दिखाया। जेलर मुस्कुराया और कहने लगा, “यह तो भगवान की मर्ज़ी है, जब बनना होगा तब बन जाएँगे। बाद में यह मालूम हुआ, वह बाबा बलात्कार के आरोप में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहा है। क्या रेपिस्ट आम लोग जैसे ही दिखते हैं, मैं सोचने लगी।
बातचीत चलती रही और इस बीच मैंने कमरे का नक़्शा अपने ज़ेहन में बना लिया था। जेलर अपने चौबीस साल के अनुभव के बारे में बता रहा था। इस बीच सामने दीवार पर मुझे एक छोटी तितली दिखाई दी। जेल में तितली? मैंने उत्सुकता से देखा, वह जेलर के ठीक पीछे वाली दीवार से बार-बार टकरा रही थी। क्या वह ऐसा जानबूझकर कर रही होगी? एक उदासीन तितली, जिसे जेल की दीवारों और क़ैदियों ने रंगहीन बना दिया था। शायद उसका रंग उस मोर ने ले लिया हो।
मैं सोचने लगी, क्या ज़रूरी था? उस जेलर का चौबीस साल का अनुभव या जेलर के ऑफ़िस में अचानक एक छोटी तितली का आ जाना। क्या उस तितली को सिर्फ़ मैंने देखा था या सिर्फ़ वह मुझे दिखी थी। वह बेचैन थी, लेकिन तितली थी।
जेलर ने फिर वह बटन दबाया। तुरत एक पुलिसकर्मी आरोपियों की लिस्ट लेकर आ गया। जेलर ने कहा—“बंदियों को बुलाओ।” मैं दरवाज़े के पास बैठी थी। दो परदों के बीच की दो इंच की जगह से मुझे पाँच-छह चेहरे दिखाई दिए। पता चला वे आरोपी हैं। मैंने तुरत मुँह फेर लिया। मैंने देखा मेरे हाथ काँप रहे हैं। उन्हें अंदर बुलाया गया। क्या आरोपियों को इतने ही सामान्य ढंग से बुलाया जाता है। छह आरोपी साधारण सर्दी के कपड़े पहने अंदर आए और जिस सोफ़े पर मैं बैठी थी, उसके पास वे बारी-बारी से खड़े हो गए। मैं उनके पैर देखने लगी लेकिन मुझे उनके अतीत के धब्बे कहीं दिखाई नहीं दिए। क्या जेल में अतीत के धब्बे धुल जाते हैं?
अचानक मुझे वो कमरा बहुत छोटा लगने लगा। मुझे तितली कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। मैंने देखा कमरे के रंग धीरे-धीरे फ़ीके हो रहे हैं। मुझे अचानक घर के पानी की प्यास लगी। मैंने महसूस किया मेरे हाथ अभी भी काँप रहे हैं।
मैंने हिम्मत जुटाई और ऊपर देखा। छह चेहरे जिन्हें पढ़ना बहुत मुश्किल था। मैं फिर अपने हाथ देखने लगी। जेलर उनसे पूछताछ करने लगा।
“अरे! तेरा पॉक्सो वाला केस था क्या?”
“नहीं साहब, मैं तो मर्डर वाला हूँ।”
“ओ हेमराज! तू भी मर्डर वाला है क्या?”
“जी सर।”
जेलर ने फिर बटन दबाया, वही पुलिसकर्मी।
“अरे यार, ये तो ग़लत क़ैदियों को ले आए। पॉक्सो वालों को बुलाओ न।”
क्या जेल में इसे सामान्य बातचीत कहते हैं।
एक नई लिस्ट लाने से पहले हमें मिठाई खिलाई गई। हमारे सामने प्लेट पर काजू कतली और हलवा रखा गया। मैंने काजू कतली का एक टुकड़ा खाया, मीठे का स्वाद अचानक जाने लगा। मैंने फिर दरवाज़े की ओर देखा। परदों के बीच उस दो इंच की जगह में मुझे छह अन्य चेहरे दिखे। वे आपस में हँसी-मज़ाक़ कर रहे थे। अचानक मेरी नज़र उनसे मिली, मैंने तुरत अपनी नज़र घुमा ली।
वे ठीक वैसे ही खड़े थे, जैसे पहले मर्डर के आरोपी खड़े थे। सभी हाथ बाँधे और गर्दन झुकाए खड़े थे। सभी के हाव-भाव एक से, खड़े होने का तरीक़ा एक-सा, कद भी एक-सा। मैं उनके पैर देखने लगी, मैं उनमें कुछ असामान्य ढूँढ़ रही थी। मैं सोफ़े और गेट के बीच की दूरी को कोसने लगी। जेलर उनसे पूछताछ करने लगा।
“हाँ भई विकास! तुम पर कौन-सा केस है?”
“सर, पॉक्सो।”
“कहाँ तक पढ़े हो?”
“बीटेक। एमटेक। बीएससी नर्सिंग। सर, मैं एडवोकेट था... मतलब हूँ। केमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक। मैं तो सर पाँचवीं ही पढ़ा हूँ बस।”
मैं इन सभी आरोपियों की एजुकेशनल क्वालिफ़िकेशन अपनी डायरी में लिखने लगी। जेलर उन्हें समझाने लगा कि अख़बार से कुछ पत्रकार आए हैं, वे पॉक्सो के आरोपियों की मानसिकता जानना चाहते हैं, ताकि आगे इस तरह का क्राइम न हो। सभी आरोपियों ने सिर हिलाते हुए कहा, “जी सर बिल्कुल।”
हम पास ही एक दूसरे कमरे में गए, जहाँ एक अन्य पुलिसकर्मी बैठा था। टीवी पर जेल की सीसीटीवी फ़ुटेज चल रही थी। मैंने फ़ुटेज को क़रीब से देखा, वह मुंबई के किसी चॉल का दृश्य लग रहा था। हम सभी बैठ गए। हमारे सामने एक ख़ाली कुर्सी रखी गई, जिस पर बारी-बारी से सात पॉक्सो के आरोपी बैठे।
सभी आरोपी आते गए और हमें इस तरह नमस्ते कर रहे थे, जैसे हम उनका जॉब-इंटरव्यू लेने आए हैं। सभी अपनी कहानी इस तरह बता रहे थे, जैसे अभी कुछ ही देर पहले रटी हो। सभी आरोपियों को साल, नंबर और उम्र सही याद थे।
“सज़ा क्या मिली है?”
“बीस साल।”
“तुम्हें जेल में कितना वक़्त हो गया?”
“सर, 29 महीने हो गए।”
“तुमने कितनी सज़ा काट ली?”
“जी तीन साल तीन महीने।”
“और सज़ा कितनी मिली है?”
“सर, आजीवन।”
क्या जेल के अंदर जीवन का इस तरह हिसाब लगाया जाता है। आरोपियों की शक्ल क्या इतनी ही आम होती है?
मैंने खिड़की से बाहर देखा तो हरा रंग दिखाई दिया। सवाल-जवाब का सिलसिला लगभग दो घंटे चला। हम जेलर के ऑफ़िस में लौटे। मुझे तितली दिखाई नहीं दी। क्या वह बाहर चली गई थी या किसी कोने में बैठ गई थी। उस महिला जेलकर्मी ने अपनी जेब से एक बार फिर चाबी निकाली और ताला खोला। मैं सोचने लगी क्या वह महिला जेलकर्मी अपने घर में ताला लगाती होगी। मैं जेल के बाहर आ चुकी थी। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। कुत्ते धूप के टुकड़े खा चुके थे। आसमान में डूबते सूरज का रंग दिखाई देने लगा था। उसके बाद वह मोर कहीं दिखाई नहीं दिया।
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बेला पॉपुलर
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