एक एहसास है… बनारस
आस्था दीपाली
08 नवम्बर 2026
ऐसा बनारस… वैसा बनारस… आख़िर कैसा है बनारस? इसी जिज्ञासा ने मुझे बनारस की ओर खींच लिया। लंबे समय से मन में इस शहर को लेकर एक अनकही उत्सुकता थी। सोशल मीडिया पर दिखते रील्स, तस्वीरें और वीडियो में बनारस हमेशा किसी स्वप्न-सा सुंदर प्रतीत होता था। वहाँ के घाटों की भव्यता, गंगा की लहरें और तंग गलियों की जीवंतता मुझे बार-बार पुकारती थीं। मन में एक ही इच्छा बार-बार उठती, “एक बार तो बनारस जाना ही है।” किंतु मेरे लिए बनारस जाने का उद्देश्य केवल पर्यटन मात्र नहीं था, अपितु एक अनुभव था, एक खोज थी, एक आध्यात्मिक यात्रा थी। बनारस की छवि तो मेरे मन में कहीं न कहीं पहले ही आकार ले चुकी थी। ‘रांझणा’ और ‘मसान’ जैसी फ़िल्मों ने इस शहर के अलग-अलग रंगों से मेरा परिचय बहुत पहले करा दिया था। वहाँ की फ़िज़ाओं में कहीं प्रेम की मासूमियत है, तो कहीं जीवन और मृत्यु के बीच का गहरा दर्शन व्याप्त है। फ़िल्मी कहानियों एवं साहित्य में बसता बनारसी मिज़ाज मुझे हमेशा से आकर्षित करता रहा है। इन्हीं कल्पनाओं, जिज्ञासाओं और भावनाओं को साथ लिए मैं निकल पड़ी बनारस की ओर…
सरकारी नौकरी के दायित्वों और सीमित छुट्टियों के बीच कहीं घूमने का अवसर मिल जाना अपने-आप में किसी उपलब्धि से कम नहीं होता। समय की कमी, काम की प्राथमिकताएँ और अचानक बदलते हालात, इन सबके बीच यात्रा की योजना बनाना और उसे सफलतापूर्वक पूरा कर पाना एक छोटी-सी जीत जैसा लगता है।
हालाँकि, यह यात्रा केवल बनारस तक सीमित नहीं थी। इस यात्रा का एक विशेष कारण भी था; मेरी मम्मी को प्रयागराज में ‘गुफ़्तगू’ संस्था द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान अवार्ड से सम्मानित किया जाना। यह हमारे लिए गर्व और ख़ुशी का विषय था। इसी के साथ संयोग से रामनवमी की छुट्टी भी मिल गई, जिससे इस यात्रा की संभावना और प्रबल हो गई।
तभी मन में एक विचार सहज ही उभर आया, क्यों न इस अवसर को थोड़ा और ख़ास बनाया जाए? क्यों न प्रयागराज के साथ-साथ बनारस भी घूम लिया जाए? इस विचार ने जैसे पूरी यात्रा को एक नया आयाम दे दिया।
हालाँकि, इस पूरी योजना की नींव एक महीने पहले ही रखी जा चुकी थी। टिकटें बुक हो चुकी थीं, कार्यक्रम तय हो चुका था, लेकिन अपने पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए मैंने इस यात्रा के बारे में किसी को बताना उचित नहीं समझा। अक्सर ऐसा हुआ था कि अंतिम समय में किसी आपात स्थिति के कारण यात्रा रद्द करनी पड़ जाती थी। इसलिए इस बार मैंने तय किया कि जब तक यात्रा वास्तव में शुरू न हो जाए, तब तक इसे अपने तक ही सीमित रखा जाए।
मार्च महीने की शुरुआत में ही मुझे बिहार दिवस की तैयारियों के सिलसिले में पटना में प्रतिनियुक्त कर दिया गया था। काम का दबाव इतना था कि इस यात्रा के लिए अलग से कुछ सोचने या योजना बनाने का अवसर ही नहीं मिला। न ही यह तय कर पाई कि कहाँ जाना है और न यह कि क्या-क्या देखना है। फिर भी यह यात्रा मेरे लिए बेहद ख़ास थी, क्योंकि इस बार मैं और मम्मी बहुत दिनों बाद एक साथ कहीं घूमने जा रहे थे। पहले भी कहीं-कहीं जाना तो हुआ था, लेकिन अब वे यादें धुँधली हो चुकी हैं। इसलिए यह सफ़र एक साथ बिताए जाने वाले अनमोल समय के नए अनुभव की तरह था। संयोग भी कुछ ऐसा बना कि जिस दिन मैं पटना से वापस मुज़फ़्फ़रपुर पहुँची, उसी रात हमारी ट्रेन थी। सब कुछ इतनी तेज़ी से हुआ कि किसी चीज़ को व्यवस्थित करने का समय ही नहीं मिला। जल्दबाज़ी में होटल बुक करना पड़ा। ऊपर से ट्रेन की टाइमिंग भी ऐसी थी कि सुबह बनारस पहुँचने के बाद तुरंत किसी होटल में चेक-इन मिलना संभव नहीं था।
हम सुबह 4:39 बजे स्वतंत्रता सेनानी सुपरफ़ास्ट एक्सप्रेस से बनारस पहुँचे, जबकि होटल का चेक-इन दोपहर 12 बजे निर्धारित था। अब हमारे सामने सबसे बड़ी उलझन यही थी कि इन छह घंटों को कैसे बिताया जाए, कहाँ जाएँ और क्या करें? इस असमंजस में मैंने एक व्यावहारिक उपाय निकाला और कुछ घंटों के लिए एक होटल बुक कर लिया। बनारस पहुँचकर हम रामापुरा क्षेत्र के एक होटल में ठहरे, ताकि थोड़ी देर आराम किया जा सके। कितना अजीब लगता है न, जब आप किसी नई जगह पर जाएँ और हर छोटी-छोटी बात के लिए मोल-भाव करना पड़े। हर बार यह साबित करना पड़े कि आप अनजान नहीं हैं, “मैं पहले भी आ चुकी हूँ”, “इतना किराया नहीं होता” जैसी बातें कहकर ख़ुद को ठगा जाने से बचाना पड़े।
यात्रा जहाँ एक ओर नए अनुभवों से भर देती है, वहीं ऐसे क्षण आपको थोड़ा असहज भी कर देते हैं। एक तरफ़ मन उस जगह को महसूस करना चाहता है, और दूसरी तरफ़ हर क़दम पर सतर्क रहना पड़ता है। फिर भी, शायद यही यात्राओं का एक यथार्थ है, जो हमें न सिर्फ़ नए शहरों से, बल्कि लोगों और परिस्थितियों से भी रूबरू कराता है।
हमारा मन तो था कि सीधे मंदिर जाकर दर्शन कर लिए जाएँ, बनारस की उस अलसुबह को महसूस किया जाए, लेकिन समय की बाध्यता ने हमें रोक लिया। मंदिर जाने और वापस आने में ही इतना समय लग जाता कि अगले होटल में समय पर पहुँचना मुश्किल हो सकता था।
अंततः हमने यही सोचा कि यात्रा की शुरुआत भागदौड़ से नहीं, बल्कि थोड़े ठहराव से की जाए। थोड़ा विश्राम करने के बाद अब हमें अपने दूसरे होटल के लिए निकलना था। इसलिए हमने एक रिक्शा किया। हमें विशेश्वरगंज पहुँचना था, जो काल भैरव मंदिर के पास ही स्थित है। इस होटल को चुनने का उद्देश्य भी यही था कि चाहे सुबह मंदिर के लिए जल्दी निकलना हो या देर रात लौटना, आवागमन में कोई कठिनाई न हो। हम विशेश्वरगंज तो पहुँच गए, लेकिन जिस रिक्शे से हम आ रहे थे, वह हमें न जाने किन-किन संकरी गलियों में घुमाने लगा। गलियाँ इतनी तंग और उलझी हुई थीं कि गूगल मैप्स भी जैसे वहाँ आकर जवाब दे चुका था। एक अजीब-सी उलझन और असमंजस की स्थिति बन गई थी। हमने रिक्शावाले की होटल वाले से फ़ोन पर बात भी कराई, लेकिन उन गलियों का जाल ऐसा था कि दिशा समझना आसान नहीं था। उसी दौरान जब हमने देखा कि आस-पास दूसरे समुदाय की बस्ती है, तो मन में थोड़ी घबराहट भी होने लगी। मम्मी भी चिंतित होकर कहने लगीं, “कैसी जगह होटल बुक कर ली है!” लेकिन उस समय मैंने ख़ुद को शांत रखा और मम्मी को भरोसा दिलाया कि सब ठीक है, होटल सही जगह पर ही है, बस रास्ता थोड़ा उलझ गया है। आख़िरकार, हमने होटल वाले भैया को दोबारा कॉल किया और उन्हें बुलाया। तब जाकर यह समझ आया कि हमें दाईं ओर मुड़ना था, जबकि रिक्शावाले ने हमें बाईं ओर ले लिया था। जैसे ही हम सही रास्ते पर पहुँचे और होटल के पास एक छोटा-सा हनुमान मंदिर दिखा, मन को एक अजीब-सी शांति और सुरक्षा का एहसास हुआ। उस क्षण लगा कि अब हम सही जगह पहुँच गए हैं और सारी थकान व चिंता जैसे धीरे-धीरे कम होने लगी।
होटल पहुँचने के बाद इस यात्रा ने एक अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। बनारस के सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं संपादक मधुकर मिश्र से मम्मी की बातचीत हुई। बातचीत के क्रम में उन्होंने बड़े स्नेह और आदर के साथ मम्मी को अपने घर आयोजित काव्य-गोष्ठी में आमंत्रित किया। मम्मी ने भी उसी आत्मीयता के साथ उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। किंतु यह निर्णय मेरे लिए उतना सही नहीं था। मेरे मन में बनारस को लेकर कई छोटे-बड़े सपने और योजनाएँ संजोई हुई थीं। शाम के समय गंगा में नौका-विहार करना, दशाश्वमेध घाट की भव्य आरती को अपनी आँखों से देखना और बनारस की उन संकरी, जीवंत गलियों में यूँ ही भटकते हुए इस शहर को महसूस करना। मुझे लगा जैसे ये सभी इच्छाएँ अब पीछे छूट जाएँगी। उधर, मिश्र जी ने अपने कवि-मित्रों को हमें लेने के लिए भेज भी दिया था। अब परिस्थिति ऐसी बन गई थी कि वहाँ न जाना असंभव-सा हो गया। सच तो यह है कि मुझे काव्य-गोष्ठियों में विशेष रुचि नहीं रही है, फिर भी परिस्थितियों के आगे मुझे जाना ही पड़ा। मन में हल्की-सी खिन्नता और असंतोष था, जो अनायास ही मम्मी के सामने भी ग़ुस्से के साथ व्यक्त होता रहा और कुछ नाराज़गी भरे शब्द भी निकल पड़े।
फिर मुझे उस समय यह एहसास हुआ कि जिस एक दिन में बनारस को जी भरकर देखने और घूमने की योजना बनाई थी, वह अब संभव होती नज़र नहीं आ रही थी। मन में एक हल्की-सी कसक रह रही थी कि इतनी दूर आकर अगर बनारस को ठीक से महसूस ही न कर पाऊँ, तो इस यात्रा का क्या अर्थ? मैंने सोचा कि क्यों न इस यात्रा को एक दिन और रुककर बनारस को सही मायनों में देखा और जिया जाए। और फिर, उसी क्षण मैंने तय कर लिया कि हम एक दिन और रुकेंगे।
शाम होते-होते हम काव्य-गोष्ठी के लिए भुलनपुर के पास पहुँच गए। विशेश्वरगंज से भुलनपुर तक आने में लगभग 30-35 मिनट का समय लगा। इस दौरान हम मार्च महीने में चिलचिलाती धूप में मानो पूरे बनारस शहर को पार करते हुए वहाँ पहुँचे। गलियाँ, भीड़, मंदिरों की घंटियाँ और शहर की अपनी एक अलग ही लय थी, जिसे हम महसूस कर पा रहे थे। वहाँ पहुँचने पर वातावरण पूरी तरह साहित्यिक और आत्मीय था। मम्मी का बड़े आदर और सम्मान के साथ स्वागत किया गया। उनके बनारस आगमन के उपलक्ष्य में कविताम्बरा संस्थान द्वारा एक सुंदर काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया था। अनेक साहित्यकारों ने अपनी-अपनी प्रतिनिधि रचनाएँ प्रस्तुत कीं। विशेष रूप से रामनवमी के अवसर पर केंद्रित कविताओं ने पूरे वातावरण को एक सांस्कृतिक और भावनात्मक ऊष्मा से भर दिया। किंतु सच कहूँ, तो मेरा मन उस समय भी कहीं और अटका हुआ था। मेरे मन-मस्तिष्क में बार-बार बनारस के घाटों का दृश्य घूम रहा था। वो गंगा की लहरें, दीपों की रोशनी और आरती का अद्भुत दृश्य…। मैं बस यही सोच रही थी कि कब हम वहाँ पहुँचेंगे और उस अनुभव को अपनी आँखों से देख पाएँगे। इसी बीच समय का ध्यान आया। शाम के 5:30 बज चुके थे। अब घाट तक पहुँचना आवश्यक था, नहीं तो आरती छूट सकती थी।
जो सज्जन हमें काव्य-गोष्ठी तक लेकर आए थे, उन्होंने बिना किसी संकोच के हमें वापस घाट तक छोड़ने की ज़िम्मेदारी भी अपने ऊपर ले ली। वह उम्र में युवा नहीं थे, फिर भी उनके उत्साह और सहयोग में कोई कमी नहीं थी। उनकी इस सहज तत्परता ने मुझे भीतर तक छू लिया। घाट तक पहुँचने में लगभग एक घंटा लग गया, लेकिन इस पूरे सफ़र में बनारस का जो आतिथ्य और अपनापन देखने को मिला, उसने मुझे सचमुच अचंभित कर दिया। यहाँ सिर्फ़ शहर नहीं, बल्कि लोगों के दिल भी उतने ही विशाल और उदार हैं।
दशाश्वमेध घाट पहुँचते ही हमें इस बात का गहरा एहसास हुआ कि यदि हमें समय पर बाइक से न पहुँचाया गया होता, तो शायद आरती देख पाना संभव ही नहीं हो पाता। शाम का समय, भीड़ का उमड़ता सैलाब और चौक से घाट तक की दूरी अधिक थी, जिसे पैदल चलकर समय से पहुँचना संभव नहीं था। इन सबके बीच सही समय पर घाट तक पहुँच पाना किसी संयोग से कम नहीं था। उस क्षण लगा कि यात्रा में कई बार मंज़िल तक पहुँचने के लिए केवल योजना ही नहीं, अपितु लोगों का सहयोग और समय का साथ भी उतना ही आवश्यक होता है। हम भीड़ के बीच खड़े थे और सामने गंगा-आरती आरंभ होने ही वाली थी। मन में बस एक ही भावना थी, “चलो! सही समय पर पहुँच तो गए…” घाट पर पहुँचते ही मानो मानव-समुद्र आँखों के सामने उमड़ पड़ा। हर एक सीढ़ी पर लोग, नावों पर लोग, किनारों पर लोग, जिधर नज़र घुमाओ लोग ही लोग। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा बनारस उसी क्षण वहाँ सिमट आया हो। आरती आरंभ होने ही वाली थी। हमने भी किसी तरह एक चौकी पर थोड़ी-सी जगह देखी और बैठ गए। उस अपार भीड़ के बीच वह छोटा-सा स्थान जैसे विशेष रूप से हमारे लिए ही बचा रह गया था। संयोग से वह जगह आरती होने वाले स्थान के ठीक पीछे थी, जहाँ से हर एक क्रिया स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उस क्षण ऐसा लगा मानो गंगा मैया ने सचमुच हमें अपनी गोद में बिठा लिया हो। हमें वहाँ आरती के दीपों को भी जलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
साँझ के धुँधले दृश्य में दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियाँ सुनहरी रोशनी से नहाने लगती हैं। उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि गंगा आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है। ऐसा लगता है मानो आत्मा और ब्रह्मांड के बीच आध्यात्मिक संवाद किया जा रहा हो। सभी लोग भजन सुनते ही मंत्रमुग्ध हो गए और तालियों की थाप से वातावरण और भी संगीतमय बन गया था। घाट पर खड़े पुजारियों के हाथों में उठते विशाल दीप-स्तंभ अग्नि-सूर्य के प्रतीक लग रहे थे। वे गोल-गोल घूमते हुए ऐसे दिखाई दे रहे थे मानो पूरा ब्रह्मांड अपनी धुरी पर घूम रहा हो। जब धुएँ की लहरियाँ आकाश की ओर उठ रही थीं, तब ऐसा लग रहा था जैसे मनुष्य की प्रार्थनाएँ आकार लेकर ईश्वर तक पहुँच रही हों। आरती में बजती घंटियों और शंखों की ध्वनि केवल ध्वनि नहीं रहती, अपितु नाद उत्पन्न करती है और वह समय की नदी में बहती हुई उस प्राचीन सभ्यता का संगीत बन जाती है, जिसने सदियों से काशी को जीवित रखा हुआ है। गंगा यहाँ केवल नदी नहीं है, बल्कि वह माँ का प्रतीक है, जो सबको अपने आँचल में समेट लेने वाली, सबके पाप और पीड़ा को चुपचाप अपने भीतर बहा ले जाने वाली है। उसकी लहरें जीवन की निरंतरता का बिंब हैं; जो बताती हैं कि जीवन भी जल की तरह कभी नहीं ठहरता। आरती की लौ जब जल पर प्रतिबिंबित होती है, तब ऐसा लगता है मानो धरती पर छोटे-छोटे तारों ने जन्म ले लिया हो। गंगा आरती की हर लौ यह कहती प्रतीत होती है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटी-सी रोशनी भी उसे चुनौती देने के लिए पर्याप्त होती है।
किंतु इसी बीच एक और दृश्य भीतर कहीं चुभ गया। जितनी श्रद्धा और एकाग्रता की अपेक्षा उस क्षण से थी, उतनी दिखाई नहीं दे रही थी। अधिकांश लोग आरती में डूबने के बजाय अपने मोबाइल में उसे क़ैद करने में अधिक व्यस्त थे। जिधर देखो, उधर ही फ़ोन उठे हुए, मानो आस्था की जगह “कंटेंट” का सैलाब उमड़ आया हो। उस दृश्य ने मुझे भीतर तक विचलित किया। लगा जैसे आरती की आत्मा कहीं खोती जा रही है। उसकी भक्ति, उसकी निष्ठा और उसकी मौन गरिमा… सब कुछ धीरे-धीरे दृश्यात्मक प्रदर्शन में बदलता जा रहा है।
इसी बीच पंडितों द्वारा चंदा माँगने की आवाज़ें भी सुनाई देने लगीं और घाट के सामने नावों की लंबी क़तारें खड़ी थीं, जो पूरे दृश्य को एक घेरे में बाँधे हुए थीं। उस क्षण मुझे केवल मनुष्य दिखाई दे रहे थे, अपने-अपने उपकरणों, अपनी व्यस्तताओं और अपनी यांत्रिकता में उलझे हुए। आस्था और अनुभूति के बीच कहीं एक दूरी-सी बन गई थी, जिसे महसूस करना मेरे लिए उतना ही गहरा और विचारोत्तेजक अनुभव था जितना कि स्वयं आरती को देखना। हद तो तब हो गई जब आरती अपने चरम पर थी और लोग बीच में ही उठकर जाने लगे। जैसे ही उनका ‘कंटेंट’ बन गया, वे अपनी जगह छोड़कर लौटने लगे। मानो उस पूरे अनुभव का उद्देश्य केवल कुछ तस्वीरें और वीडियो तक ही सीमित हो। यह दृश्य भीतर तक विचलित कर गया। जहाँ एक ओर आरती अपने पूर्ण भाव और लय में चल रही थी, वहीं दूसरी ओर लोगों की यह अधीरता उस पूरे वातावरण की गरिमा को तोड़ती हुई प्रतीत हो रही थी। उस क्षण मन में यही विचार आया कि क्या हम सच में उस पल को जी रहे हैं या सिर्फ़ उसे क़ैद करके आगे बढ़ जाना ही अब हमारी आदत बन गई है?
ख़ैर… आरती समाप्त होने के पश्चात् हम सीढ़ियों से ऊपर आए और काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ चले। घाट से वापस जाते समय हमें सड़क के दोनों किनारों पर बाज़ार दिखा और उसके बीच तंग गलियों का जाल भी… उसी भीड़ भरे रास्तों से गुज़रते हुए थोड़ी दूर आगे एक कैफ़े दिखा, सो हमने वहीं कुछ देर ठहरने का निश्चय किया। दोपहर में डोमिनोज़ का पित्ज़ा खाया था और अब रात के लगभग आठ बज रहे थे, सो भूख लगना लाज़िमी था। हम कैफ़े में बैठकर आलू पराठा और प्याज़ पराठा खा ही रहे थे कि अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। यह बदलाव इतना अचानक था कि मैं कुछ क्षणों के लिए ठिठक-सी गई। सुबह तक धूप जहाँ इतनी तेज़ थी कि मानो त्वचा झुलस जाए, वहीं अब यह हल्की ठंडक लिए बारिश। उस क्षण बनारस और भी सुंदर और भी जीवंत लगने लगा था। किंतु बारिश ने हमारी गति को रोक दिया। हम कुछ देर वहीं बैठे रहे, बारिश थमने का इंतज़ार करते हुए। जब वर्षा रुक गई, तब हम पुनः मंदिर की ओर बढ़े।
मंदिर के पास पहुँचकर हमने अपना सामान और मोबाइल सरकारी लॉकर में जमा किया और फिर भीतर प्रवेश किया। हम जब भीतर मंदिर के प्रांगण में पहुँचे, तो लगा जैसे यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण पड़ाव अब सफल हो जाएगा। काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में गंगा तट के निकट स्थित भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसे ‘मुक्तिधाम’ के रूप में विशेष मान्यता प्राप्त है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महादेव ने माता सती की इच्छा पर ब्रह्मांड से परे एक दिव्य स्थल ‘आनंद कानन’ की रचना की, जो आगे चलकर काशी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी स्थान पर उन्होंने स्वयं को विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित किया, जो शिव-पार्वती के निवास का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने भी इसी भूमि पर तपस्या की थी और उनके तप से मणिकर्णिका कुंड का निर्माण हुआ, जिसे मोक्ष का द्वार माना जाता है। वहीं एक अन्य कथा के अनुसार, जब काशी में अकाल पड़ा, तब भगवान शिव ने माता पार्वती से अन्न की याचना की और तभी से वे अन्नपूर्णा देवी के रूप में पूजित होने लगीं। इतिहास भी इस मंदिर की तरह ही उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। मुग़ल काल में 1669 में औरंगज़ेब ने मंदिर को ध्वस्त कर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण कराया। उस समय पुजारियों ने शिवलिंग को सुरक्षित रखने के लिए उसे ज्ञानवापी कुएँ में छिपा दिया था। बाद में 18वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने 1780 में वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण कराया, जिससे यह पुनः अपनी आस्था के केंद्र के रूप में स्थापित हुआ। काशी विश्वनाथ की विशेषता केवल इसके इतिहास या पौराणिकता में ही नहीं, बल्कि इसकी आध्यात्मिक अनुभूति में भी निहित है। यह मंदिर गंगा के अत्यंत निकट स्थित है, जहाँ स्नान और दर्शन का विशेष महत्त्व माना जाता है। यहाँ दिन भर विभिन्न आरतियाँ और पूजा-विधियाँ चलती रहती हैं, जिनकी परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि काशी शिव की नगरी है, जो प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होती, क्योंकि यह उनके त्रिशूल की नोक पर स्थित है। साथ ही यह भी विश्वास है कि यहाँ मृत्यु होने पर आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है और स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र प्रदान करते हैं। जब हमने मंदिर में प्रवेश किया, तो इन सभी कथाओं और मान्यताओं का भाव जैसे उस वातावरण में जीवित महसूस हो रहा था।
रात के लगभग नौ बज रहे थे, इसलिए भीड़ अपेक्षाकृत कम थी। हमें कहीं अधिक देर तक पंक्ति में नहीं रुकना पड़ा। बिना किसी भागदौड़ के, हमने लगभग आधे घंटे के भीतर भगवान के दर्शन किए। उस क्षण की शांति और संतोष ने दिन भर की सारी थकान को जैसे पल भर में मिटा दिया। और ऐसा लगा मानो काशी विश्वनाथ जी ने स्वयं हमें बुलाकर दर्शन दिया और हम कृतार्थ हुए। सारा मंदिर परिसर मानो आध्यात्मिक आभा से आच्छादित था। हम मंदिर के गर्भगृह के समीप खड़े थे, जहाँ शिवलिंग पर अभिषेक हो रहा था। वह दृश्य आज भी किसी जीवंत चित्र-सा आँखों के सामने उभरते रहता है। दूध की श्वेत धाराएँ जब शिवलिंग पर गिरतीं, तो ऐसा प्रतीत होता मानो चंद्रमा की शीतल चाँदनी स्वयं शिव को स्नान करा रही हो। गंगाजल की बूँदें हिमालय की निर्झरिणी बनकर उनके चरणों में बह रही हों। फूलों की पंखुड़ियाँ; लाल, पीली, सफ़ेद, ऐसे बिखर रही थीं, मानो भक्ति के रंग स्वयं शिव के चरणों में समर्पित हो रहे हों। बेलपत्रों की हरियाली शिवलिंग पर ऐसे सजी थी, जैसे प्रकृति स्वयं उन्हें अपना हृदय अर्पित कर रही हो। घंटियों की मधुर ध्वनि और मंत्रोच्चार का कंपन पूरे वातावरण में लहरों की तरह फैल रहा था। ये ध्वनियाँ गंगा की तरंग बनकर भीतर तक उतर रही हों। उस क्षण लगा जैसे समय ठहर गया हो, हम वहाँ खड़े थे, पर भीतर ही भीतर ख़ुद को तृप्त महसूस कर रहे थे। इसके उपरांत नंदी के कान में अपने और परिवार के स्वास्थ्य की कामना करते हुए हम माता अन्नपूर्णा के भी दर्शन किए।
रात के लगभग दस बजने को थे। अब केवल काल भैरव मंदिर के दर्शन शेष थे। हम कुछ दूर पैदल चले, फिर एक रिक्शा लिया, जिसने हमें मंदिर के पास उतार दिया। हल्की-हल्की बारिश की फुहारें अब भी पड़ रही थीं। मंदिर परिसर में पहुँचकर हम दर्शन के लिए पंक्ति में लग गए। सौभाग्य से भीड़ अधिक नहीं थी, इसलिए बिना अधिक प्रतीक्षा के हमें सहज ही दर्शन का अवसर मिल गया। काल भैरव के दर्शन के बिना काशी-यात्रा को पूर्ण नहीं माना जाता। उन्हें ‘काशी का कोतवाल’ या ‘क्षेत्रपाल’ कहा जाता है। वे भगवान शिव के रुद्रावतार हैं; रक्षक भी और दंडदाता भी। पौराणिक कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी को अपने पाँच मुखों का अहंकार हो गया, तब शिव ने अपने रौद्र स्वरूप काल भैरव को उत्पन्न किया। भैरव ने ब्रह्मा के उस अहंकारी पाँचवें सिर को काट दिया। किंतु इस कर्म के कारण उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगा, जो केवल काशी में प्रवेश करने पर ही समाप्त हुआ। इसी कारण काशी में काल भैरव को विशेष स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि शिव ने उन्हें इस नगरी की सुरक्षा और न्याय का दायित्व सौंपा अर्थात् काशी में प्रवेश करने वाले हर जीव पर उनकी दृष्टि रहती है। कहा जाता है कि बिना उनकी आज्ञा के कोई यहाँ टिक नहीं सकता। मृत्यु के पश्चात् भी, यमराज से पहले काल भैरव ही काशीवासियों के कर्मों का लेखा-जोखा करते हैं। मंदिर में एक विशिष्ट परंपरा भी प्रचलित है। भक्तों को पापों से मुक्ति के प्रतीक रूप में भैरव के सोटे (छड़ी) से हल्के से स्पर्श कराया जाता है। उस वातावरण में किया गया दर्शन मन को एक विशेष आनंद दे गया। एक बात ने मुझे वहाँ थोड़ा असहज भी किया। मंदिर के प्रांगण में कुछ पुजारी और पुजारिन लोग श्रद्धालुओं को आवाज़ देकर, रोककर काला धागा बाँध रहे थे और उसके बाद उसके बदले पैसे की अपेक्षा कर रहे थे। आस्था के ऐसे स्थान पर यह व्यवहार थोड़ा अटपटा लगा। जहाँ मन श्रद्धा और शांति की अनुभूति करना चाहता है, वहाँ इस प्रकार की बाध्यता एक अलग ही द्वंद्व पैदा कर देती है। लगा जैसे भक्ति और व्यावहारिकता के बीच एक महीन रेखा है, जो कभी-कभी धुँधली पड़ जाती है। फिर भी, शायद यह भी उस जगह का एक यथार्थ ही है जहाँ आस्था के साथ-साथ जीवन की अपनी आवश्यकताएँ भी समानांतर चलती रहती हैं।
होटल पास ही था, इसलिए लौटते समय हमने पैदल ही चलना उचित समझा। रास्ते में मम्मी ने थोड़ी-सी नमकीन भी ख़रीद ली, जैसे इस छोटे-से सफ़र में स्वाद का एक और रंग जुड़ गया हो।
इस प्रकार दिन भर की सारी भागदौड़, अनुभवों और भावनाओं के बीच हम वापस होटल पहुँचे; थके हुए, लेकिन भीतर से पूर्णतः संतुष्ट।
रात में ही हमने तय किया कि अगली सुबह जल्दी उठकर गंगा में नाव की सवारी करेंगे, कुछ तस्वीरें लेंगे और फिर 11 बजे तक होटल लौटकर कमरा ख़ाली कर देंगे। दरअस्ल, बनारस में रुकने का निर्णय अचानक लिया गया था, इसलिए होटल की व्यवस्था भी जल्दबाज़ी में करनी पड़ी थी, जो अपने आप में एक चुनौती बन गई थी। होटल का चेक-आउट समय 11 बजे निर्धारित था और हमें उससे पहले हर हाल में वापस पहुँचना था। थकान के कारण सुबह उठने में थोड़ी देर हो गई। फिर भी हम सात बजे तक होटल से निकलकर अस्सी घाट पहुँच गए।
घाट पर पहुँचते ही नाव वालों ने हमें चारों ओर से घेर लिया; हर कोई अपनी नाव की सवारी कराने को तत्पर। उसी बीच वहाँ खिचड़ी भी वितरित हो रही थी, शायद कोई लंगर लगा था। मम्मी ने खिचड़ी खाई और हम दोनों अस्सी घाट की उन गेरुए रंग की सीढ़ियों पर आकर बैठ गए, जिन पर सफ़ेद रंग से सुंदर डिज़ाइन बनाए गए थे। कुछ देर बैठने के बाद हमारा ध्यान एक कलाकार की ओर गया, जो घाट के दृश्य को अपनी कूची से काग़ज़ पर उतार रहा था। उसकी पेंटिंग इतनी जीवंत और आकर्षक थी कि मैं कुछ क्षणों के लिए मंत्रमुग्ध होकर उसे ही देखती रह गई। मन में एक इच्छा भी जागी, काश! मेरे पास भी पेंटिंग शीट और वॉटरकलर होते, तो मैं भी इस दृश्य को अपने तरीक़े से क़ैद करती। उसी के पास एक गायक भी अपनी मधुर आवाज़ से वहाँ उपस्थित लोगों को मोह रहा था। उस सुबह अस्सी घाट पर बैठकर मुझे लगा कि बनारस केवल देखा नहीं जाता, उसे महसूस किया जाता है, उसके रंग, उसकी ध्वनियाँ और उसकी गंगा की लयबद्ध लहरें धीरे-धीरे भीतर उतरती चली जाती हैं।
इसी बीच मुझे बिस्मिल्ला ख़ाँ से जुड़ी कई बातें याद आने लगीं। बनारस से उनका कितना गहरा और आत्मीय संबंध था। बिहार के डुमराँव में जन्म लेने के बाद वे बचपन में ही बनारस आ गए और यही शहर उनकी पहचान बन गया। काशी विश्वनाथ मंदिर की दिशा में खुलने वाली खिड़की के पास बैठकर वे भोर में शहनाई बजाते, मानो बाबा भोलेनाथ को जगाते हों। गंगा, घाट और मंदिरों की आध्यात्मिकता ने उनके संगीत को एक अद्वितीय गहराई दी। वे स्वयं कहा करते थे कि दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएँ, उन्हें हर जगह बनारस ही दिखाई देता है। जब वे घाटों के समीप बैठते होंगे, तब उन्हें गंगा की लहरें एक विशाल वीणा की तरह प्रतीत होती होंगी। गंगा की लहरों से उत्पन्न नाद से प्रेरणा लेकर उन्होंने कई राग-रागिनियाँ रचीं। उनके लिए संगीत एक साधना थी और गंगा मैया उस साधना की गुरु। जब वे घाट पर बैठते होंगे, तो सामने बहती धारा भीतर के प्रवाह को जगाती होगी। हर उठती लहर एक नया भाव लेकर आती होगी और उनकी शहनाई उसे रंगों में बदल देती होगी। उनकी शहनाई की धुन कभी हल्के सुनहरे होते होंगे, जैसे सुबह की पहली किरण, कभी गहरे नीले, जैसे साँझ का ठहराव, और कभी लालिमा लिए हुए, जैसे आरती की लौ। बिस्मिल्ला ख़ाँ का जीवन यह बताता है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग किसी एक धर्म से नहीं गुज़रता। वह मार्ग अनुभव से गुज़रता है, और संगीत उस अनुभव का सबसे सरल और गहरा माध्यम बन सकता है।
कुछ देर तक अपने भीतर उतरते विचारों के साथ बैठने के बाद हम घाटों पर घूमने लगे। तभी हमारी नज़र रीवा घाट पर पड़ी, जहाँ एक पुराना-सा किलेनुमा शेड था। वह जगह जैसे नृत्य करने के लिए बिल्कुल उपयुक्त लग रही थी। मैंने बिना देर किए वहीं ‘रांझणा’ फ़िल्म के ‘नैनों के घाट लेजा… नैनों की नैया’ पर नृत्य रिकॉर्ड किया और कुछ तस्वीरें भी ले लीं। इसी बीच, शायद मेरे नृत्य ने किसी और का भी ध्यान खींच लिया। एक फ़ोटोग्राफ़र अपने क्लाइंट के साथ वहाँ आ पहुँचा। अब उसे भी उसी स्थान पर फ़ोटोशूट करना था, जहाँ मैं अभी नृत्य कर रही थी। मैं जल्दी से अपना नृत्य रिकॉर्ड करके वहाँ से हटने ही वाली थी कि उसने बताया कि वह स्ट्रीट फ़ोटोग्राफ़र है और अनजान लोगों के सहज पलों को क़ैद करता है। उसने कहा कि उसने मेरा नृत्य भी रिकॉर्ड किया है और अपना इंस्टाग्राम आईडी देते हुए मुझसे उसे फ़ॉलो करने और मैसेज करने को कहा, ताकि वह वीडियो मुझे भेज सके। और मेरी स्वीकृति भी ली कि क्या मैं आपकी वीडियो पोस्ट कर सकता हूँ! मैंने भी हामी भर दी। हालाँकि घर लौटने के बाद इस पूरे प्रसंग का एक अलग ही रूप सामने आया। जब मैंने उसे संदेश भेजा, तो उसने वह वीडियो और तस्वीरें भेजने के लिए कुछ पैसे माँगे। तब समझ में आया कि वह भी अपने काम को एक व्यवसाय की तरह ही देख रहा था। इस बात से मुझे विशेष आपत्ति तो नहीं हुई, लेकिन मन ही मन सोचा; मैं कोई इंस्टाग्राम इन्फ़्लुएंसर तो हूँ नहीं, फिर इन वीडियो और तस्वीरों का कर भी क्या लूँगी! और शायद यही सोचकर मैंने उस बात को वहीं छोड़ देना उचित समझा।
अब हमारी बारी थी नाव की सवारी करने की और गंगा की कलकल ध्वनि में मंत्रमुग्ध होने की। हम नाव में बैठे; हालाँकि सुबह के साढ़े नौ ही बज रहे थे, लेकिन चिलचिलाती धूप थी। हम नाव के खुलने की प्रतीक्षा करने लगे। वाराणसी के 84 से अधिक घाट, अस्सी घाट से लेकर आदि नमो घाट तक, क्रमबद्ध रूप में हम देखते रहे। अस्सी घाट काशी का आरंभिक छोर और ‘सुबह-ए-बनारस’ के लिए प्रसिद्ध है, गंगा महल घाट शाही स्थापत्य का उदाहरण है, रीवा घाट शांत वातावरण के लिए जाना जाता है, तुलसी घाट गोस्वामी तुलसीदास से जुड़ा है, भदैनी घाट, जानकी घाट, माता आनंदमयी घाट, वच्चराजा घाट, जैन घाट, निषादराज घाट और प्रभु घाट स्थानीय आस्था और परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंचकोटा घाट तीर्थ मार्ग से संबंधित है, चेत सिंह घाट ऐतिहासिक किले के कारण प्रसिद्ध है, निरंजनी घाट और महानिर्वाणी घाट अखाड़ा परंपरा से जुड़े हैं, शिवाला घाट काशी नरेश की विरासत को दर्शाता है, गुलारिया घाट और दांडी घाट साधु-संतों के निवास स्थल हैं, हनुमान घाट और प्राचीन हनुमान घाट भक्ति के केंद्र हैं, कर्नाटक घाट दक्षिण भारतीय प्रभाव को दिखाता है, हरिश्चंद्र घाट दाह संस्कार के लिए प्रसिद्ध है, लाली घाट और विजयनगरम घाट क्षेत्रीय पहचान रखते हैं, केदार घाट शिव उपासना का प्रमुख केंद्र है, चौकी घाट, क्षेमेश्वर/सोमेश्वर घाट, मानसरोवर घाट और नारद घाट पौराणिक महत्त्व रखते हैं, राजा घाट (अमृत राव पेशवा द्वारा पुनर्निर्मित) मराठा इतिहास से जुड़ा है, खोरी घाट, पांडे घाट और सर्वेश्वर घाट स्थानीय धार्मिक जीवन का हिस्सा हैं, दिगपतिया घाट, चौसट्ठी घाट (64 योगिनी मंदिर के कारण प्रसिद्ध), राणा महल घाट, दरभंगा घाट और मुंशी घाट भव्य स्थापत्य के लिए जाने जाते हैं, अहिल्याबाई घाट मराठा रानी द्वारा निर्मित है, शीतला घाट देवी उपासना का केंद्र है और दशाश्वमेध घाट विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती के लिए जाना जाता है। इसके आगे प्रयाग घाट संगम का प्रतीक है, राजेंद्र प्रसाद घाट आधुनिक संरचना है, मान मंदिर घाट ज्योतिष वेधशाला के लिए प्रसिद्ध है, त्रिपुरा भैरवी घाट शक्ति साधना का केंद्र है, मीरा घाट ऐतिहासिक महत्त्व रखता है, यज्ञेश्वर/नया घाट पुनर्निर्मित स्थल है, नेपाली घाट और ललिता घाट अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं, बौंली/उमरावगिरि/अमरोहा घाट, जलसेन घाट और क्षीरिकी घाट शांत स्थानीय स्थल हैं, मणिकर्णिका घाट काशी का प्रमुख श्मशान घाट है जहाँ मोक्ष की मान्यता जुड़ी है, बाजीराव घाट मराठा प्रभाव दर्शाता है, सिंधिया घाट अपने झुके हुए मंदिर के लिए प्रसिद्ध है, संकठा घाट संकट निवारण से जुड़ा है, भोंसले घाट मराठा स्थापत्य का उदाहरण है, नया घाट ऐतिहासिक पुनर्नामकरण का उदाहरण है, अग्निश्वर घाट धार्मिक महत्त्व रखता है, मेहता घाट आधुनिक विकास का प्रतीक है, राम घाट, जतारा घाट और ग्वालियर घाट राजसी संरचनाओं से जुड़े हैं, मंगला गौरी घाट देवी उपासना का केंद्र है, वेणिमाधव (बिंदु माधव) घाट वैष्णव परंपरा का प्रमुख स्थल है, पंचगंगा घाट पाँच नदियों के प्रतीकात्मक संगम के लिए प्रसिद्ध है, दुर्गा घाट और ब्रह्मा घाट धार्मिक श्रद्धा के केंद्र हैं, बूंदी परकोटा घाट क़िलेनुमा संरचना दर्शाता है, आदि शीतला घाट विस्तारित भाग है, लाल घाट और हनुमानगढ़ घाट स्थानीय महत्त्व रखते हैं, गया घाट पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है, बद्री नारायण घाट विष्णु उपासना से जुड़ा है, त्रिलोचन घाट प्राचीन शिव मंदिर के लिए विख्यात है, गोला घाट ऐतिहासिक रूप से व्यापार और नौका गतिविधियों का केंद्र रहा है, नंदेश्वर (नंदू) घाट, सक्का घाट और तेलिया नाला घाट स्थानीय जीवन का हिस्सा हैं, नया/फूटा घाट पुनर्निर्माण का उदाहरण है, प्रह्लाद घाट भक्त प्रह्लाद की कथा से जुड़ा है, राजा घाट (भैंसासुर/मालवीय ब्रिज क्षेत्र) काशी का उत्तरी छोर है और अंततः आदि केशव घाट वह पवित्र स्थान है जहाँ गंगा और वरुणा का संगम होकर काशी की आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण होती है। इसके अतिरिक्त संत रविदास घाट, निषाद घाट, रानी घाट, श्री पंच अग्नि अखाड़ा घाट, तथागत (बुद्ध) घाट और आधुनिक नमो घाट भी इस परंपरा को और समृद्ध बनाते हैं।
इन सभी घाटों पर लोग ख़ुशी-ख़ुशी अपनी तस्वीर ले रहे थे। लड़कियाँ कॉटन की साड़ियाँ या टॉप और लॉन्ग स्कर्ट पहनकर हर एस्थेटिक जगह पर फ़ोटो खिंचवा रही थीं। अगर मुझे भी इस यात्रा की प्लानिंग के लिए समय मिल पाता, तो मैं भी इसी तरह साड़ी और स्कर्ट में फ़ोटोशूट ज़रूर करती, लेकिन मनमुताबिक़ परिधान न होने के कारण मैंने उस पल को ही जीना बेहतर समझा और जो हुआ सो ठीक ही हुआ। इसी बहाने मुझे वो सब महसूस करने का अवसर मिला, जो शायद तस्वीर और वीडियो बनाने के चक्कर में नहीं मिल पाता। जब हम नमो घाट से वापस लौट रहे थे, तो नाव वाले भैया बोल रहे थे, “अरे! वो रील घाट पर उतारो सवारी।” वह था बूंदी परकोटा घाट। मुझे आश्चर्य हुआ कि अब घाटों के नाम भी बदल रहे हैं। हम भी वहीं उतरे, क्योंकि हमें होटल जाना था। घुमावदार गलियों और भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते घरों और उनके किवाड़ समृद्ध सभ्यता को दर्शा रहे थे। मैं भी चलते-चलते यही अनुभव कर रही थी। ख़ैर! लोग कहते हैं कि “हम बनारस से वापस आ जाते हैं, पर बनारस हमारे भीतर से नहीं जाता।” आज इतने दिनों के बाद भी बनारस की याद अभी भी ताज़ा है और ऐसा लग रहा है मानो एक दिल का टुकड़ा वहीं बनारस के घाट के पास रह गया है।
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