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धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : हिंदी में निर्लज्जता की परंपरा

गताध्याय से आगे...

पाँच 

दोस्ती के बारे में कई ज्योतिषियों ने दो बातें बताईं। पहली बात यह कि इस कलिकाल में सच्ची मित्रता के अकाल का योग है, हज़ार वाट का बल्ब लेकर ढूँढ़ते रह जाओगे; एक वाट का भी मित्र नहीं पाओगे, जबकि मतलब के यार हज़ार मिलेंगे। दूसरी बात यह कि हमारे साथ ग्रहों का ऐसा योग है कि हम एक-दूसरे के लिए मित्र नहीं, उससे बढ़कर हैं। एक ऐसे समय में जब मित्रता एक गाली है, मित्र की कसौटी पर हमें बिल्कुल न कसा जाए, हम एक-दूसरे की आत्मा से नाभिनालबद्ध किसी उच्चतर संबंध में बँधे हैं। वाक़ई हमने अक्सर महसूस भी किया है। एक को दुख हो, तो चारो एक साथ दुखी हो जाते थे। उदय, मैं, झंकार, बीदास। एक ख़ुश हो, तो बाक़ी तीनों के चेहरे भी साथ में खिल जाते थे। एक प्रेम में होता था, तो बाक़ी तीनों के गाल भी एक साथ लाल हो जाते थे। एक ग़ुस्सा होता था, तो बाक़ी तीनों की मुट्ठियाँ भी एक साथ तन जाती थी। उदय को लेकर मैं और झंकार थोड़ा अधिक चिंतित रहने लगे थे। गाँव के पास महादेवा बाज़ार क़स्बे के पीसीओ से झंकार अक्सर फ़ोन पर उदय को और मुझे फ़ोन करता था। महीने में एक बार उदय से मिलने आ जाता था। एक बार आने-जाने में पचास-साठ रुपये ख़र्च कर देता था। असल में गाँव पर उसका कोई दोस्त नहीं रह गया था। जो दोस्त थे, अब दुश्मन हो चुके थे। चाहते थे कि जल्दी से खेती-बारी उन्हें बेचकर सपरिवार दुनिया-जहान में कहीं उच्छिन्न हो जाए। झंकार अपने अनुभव से दोस्ती पर लंबा-चौड़ा भाषण दे सकता था। निबंध लिख सकता है। उसके मतानुसार दो बाते हो सकती थीं। नंबर एक, ग़रीब दोस्त है, तो दोस्तों से उधार माँगे, उनकी चाकरी करे या पैसे लेकर न लौटा पाए तो गालियाँ खाए, बेइज़्ज़त हो। दोस्त की बीवियाँ, उसकी बीवी का मज़ाक उड़ाएँ, नीचा दिखाएँ। नंबर दो, सम्पन्न दोस्त उसकी ज़मीन को हड़पना चाहे। हालाँकि एक तीसरी बात भी उसने बाद में जोड़ी, किसी को भी दोस्त बना लेना, पेड़ से दोस्ती कर लेना, साइकिल से दोस्ती कर लेना, पत्थर से दोस्ती कर लेना, लेकिन सतनरयना जैसे किसी मुतफ़न्नी वकील को दोस्त मत बनाना। इस स्थापना में ज़माने के अनुभव की जगह उसका निजी अनुभव अधिक था। जब उसके पट्टीदारों से बँटवारे का विवाद हुआ तो, उसके सतनरयना नाम के वकील दोस्त ने गुप्त रूप से फ़र्ज़ी वसीयत बनवाकर पट्टीदारों से सालों मुक़दमा लड़वाया। गाँव में झंकार बिल्कुल अकेला हो गया था। क़स्बे के स्कूल में सुबह आठ बजे से शाम के पाँच बजे तक खटता था और पाता था आठ हज़ार रुपये। इन्हीं आठ हज़ार रुपयों और खेती-किसानी से उसका घर चलता था। बेटे को बीए कराया, बीटीसी कराया और अब एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ाता था। हालाँकि उसका मैथ बहुत अच्छा था और उदय चाहता था कि मैथ से एमएससी करे या कॉम्पिटिशन की तैयारी ज़रूर करे। एसएससी की तो करे ही करे। मैथ अच्छा है, कहीं अच्छी जगह हो जाएगा। कई बार हम चाहते हैं कुछ और होता है कुछ। झंकार ने बेटे के कहने पर अब स्कूल की नौकरी छोड़ दी है। स्कूल का मैनेजर अक्सर अपमानित करता रहता था। असल में झंकार के पास अच्छी डिग्री नहीं थी, ज्ञान भले ही उसके पास स्कूल के सभी अध्यापकों से अधिक था। झंकार बीए के बाद आगे पढ़ नहीं पाया था, हिंदी साहित्य में उसके बहुत अच्छे नंबर थे। कविता लिखता था। भले, ज़माने की गर्दिश में उसकी कविता बाद में खो गई हो, लेकिन उसका झंकार उपनाम अब भी उसके साथ है। यही अब उसके असली नाम की जगह चलता है। कविता से लगाव उसे अब भी उतना ही है। उदय की कविताओं का प्रशंसक है। उदय से कविता पर बात करना उसे अच्छा लगता है। बुरा उसे तब लगा था, जब उदय ने भी कविता लिखना छोड़ दिया था। जीवन में ऐसी मुश्किल दुश्मन के साथ भी न आए कि उसे कविता को तज देना पड़े। मैंने दोनों से लिखते रहने के लिए कहा था, लेकिन कभी-कभी दुख कविता से भी बड़ा हो जाता है। अच्छी बात यह कि झंकार का साहित्य-विवेक कभी कमज़ोर नहीं हुआ था। उदय नौकरी में आने के कई साल बाद फिर कविता से जुड़ पाया। जुड़ा तो पहले जैसी कविताओं से नहीं, जिन कविताओं से जुड़ा, उनमें आग थी, साहित्य की सत्ता के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त ग़ुस्सा था। प्रतिरोध था। उदय को जीवन में जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा, झंकार उसका साक्षी ही नहीं, उसके दुख का साथी रहा है। अब भी उदय के संघर्ष में उसके साथ होता है। हिंदी के राक्षसों का अंत वह भी चाहता है। लेकिन कभी-कभी उसे समझाता भी है कि ज़़रूरी से ज़रूरी लड़ाई में भी अगली लड़ाई के लिए ख़ुद को बचाए रखना ज़रूरी होता है। गहरे तनाव के बीच उदय तीन बार स्कूटर-दुर्घटना में बचा है। एक बार इनकम-टैक्स दफ़्तर की ओर के यूनिवर्सिटी जा रहा था, बिजली के एक खंभे पर स्कूटर समेत फाट पड़ा था, दूसरी बार यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरी के पास मोड़ पर सामने से कोई कुत्ता आकर स्कूटर से भिड़ गया था, तीसरी बार यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर कॉलोनी में एक साँड ने स्कूटर को धक्का मार दिया था, तीनों बार हेलमेट की वजह से उसकी जान बची। उसके बाद जो किया, उसकी पत्नी ने किया। मारुति एट हंड्रेड तुरत लोन पर लिया। कार चलाने में भी उदय कभी-कभी कुछ सोचता रहता था, जाना होता है कहीं और, चल देता था किसी और रास्ते पर। फिर याद आने पर मुड़कर वापस आता था। 

झंकार, उदय के तनाव को जानता था, इसीलिए उसे समझाता भी था। कभी-कभी उदय से बहुत गूढ़ बातें करने लगता था कि जीवन में सिर्फ़ साहित्य और राजनीति ही नहीं है, दूसरी चीज़ें भी हैं। घर-परिवार, रिश्ते-नाते, पास-पड़ोस, खेल, संगीत, प्रकृति, पशु-पक्षी, सब जीवन के अंग हैं। साहित्य से बाहर भी रहा करो, उदय। बुरे लेखकों को ही नहीं, अच्छे किसानों, मज़दूरों, पड़ोसियों और सफ़र में मिलने वाले लोगों से भी बात करो। अस्सी साल की उस बूढ़ी स्त्री से हाल-चाल पूछो, जो कड़ाके की ठंड और बारिश में, तुम्हारे दरवाज़े पर साग-भाजी बेचने आती है। संसार में सिर्फ़ बुरे लेखक ही नहीं रहते हैं, अधिकांश हिस्सा साधारण संवेदनशील और ईमानदार मनुष्यों का है। उदय उतनी ही गंभीरता से कहता है, यार मैं यह सब नहीं जानता, नहीं करता तो, हौदा और बल्ली जैसे हरामज़ादों ने मुझे डिप्रेशन का मरीज़ बना दिया होता। झंकार, जिस वक़्त साहित्य के परिसर में होता हूँ या लिखने की मेज़ पर होता हूँ, साहित्य की बात सोचता हूँ। घर और मुहल्ले में साहित्य-साहित्य नहीं करता। मुहल्ले में तो कोई जानता भी नहीं कि लेखक हूँ। जो भी हो, तुमने अच्छी बात की है। कई लेखक हैं, टीवी पर क्रिकेट का मैच देखते हैं, हॉकी देखते हैं, मुझे भी देखना चाहिए। साहित्य और समाचार चैनल के बीच हरदम डोलते नहीं रहना चाहिए। बाहर भी निकलना चाहिए। झंकार कहता, अरे भाई उदै, तुमने इन बल्लियों और हौदाओं को देखकर हिंदी-आलोचना को ‘अलेखक’ जैसा पद दिया है। सचमुच के अलेखकों के पास जाओ, जो साहित्य के साधारण पाठक हैं या जो पाठक भी नहीं हैं, सिर्फ़ भले आदमी है। कुछ दिन के लिए मेरे गाँव आ जाया करो। क्यों संटी! मैं भी कहता कि कुछ दिनों के लिए लंबी छुट्टी ले लो। चलो एक महीना बाहर घूम आएँ। जाड़े में चलो दक्षिण भारत चलते हैं, तुम्हारा प्रिय विद्यार्थी सर्वश्रेष्ठ पुलिस का बहुत बड़ा अफ़सर है, एक हफ़्ता उधर रह लेंगे। तुम्हें कहता भी है कि सर कभी आइए! तुम्हारी बेटी की नौकरी हैदराबाद में लग गई है, वहीं चलो। निकलो यहाँ से। फिर तर-ओ-ताज़ा होकर लौट आना। उदय हाथ उठाकर कहता, बस करो भाई, क्लास है! 

क्लास में आज उसे गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ पर बोलना है। संग्रह की पहली कहानी है, उस पर बात करने से पहले बच्चों से कहानी के बारे में कुछ प्रश्न करके जानना चाहता था कि बच्चों की जानकारी कहाँ तक है, लेकिन क़स्बों और छोटे क़स्बों के डिग्री कॉलेज से पढ़कर आए बच्चे बहुत निराश करते हैं। इससे पहले कि उन्हें कहानी के विकास के बारे में बताए, पहले यह बताता है कि कहानी क्या है, कथ्य और शिल्प किसे कहते हैं। बच्चों से पूछता है, कभी शहर के मेन मार्केट में सड़क की पटरी पर ऊन की दुकानों को देखा है, रंग-बिरंगे ऊन याद करो। लड़कियो, तुम्हें स्वेटर बुनना आता है? कभी अम्मा या दीदी को बुनते देखा है? उदय मेज़ पर हाथ के सहारे झुककर बच्चों को पढ़ा रहा था, पीछे ब्लैक-बोर्ड महाराज थे और सामने लड़के और लड़कियों से भरी हुई कक्षा। सच क्लास तो इन्हीं बच्चों से होती है, ये आ जाएँ तो क्लास है, न आएँ तो हिंदी के श्मशान का सन्नाटा।

कक्षा में अब लड़कों की संख्या लड़कियों से कम होती है, उदय सोचता है कि उसके समय में पूरी क्लास में सिर्फ़ चार लड़कियाँ होती थीं। यह बहुत अच्छी बात है कि आज दो-तिहाई लड़कियाँ पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हैं। उदय का मन करता कि इनके माता-पिता की प्रशंसा करे, लेकिन पहले बच्चों को कहानी में कंटेंट और फ़ॉर्म समझाना शुरू करता है। कहता है कि इस मेज़ ऊन के रंग-बिरंगे गोले प्रचुर मात्रा में, मेरे सिर की सीध तक रख दिए जाएँ, तो उससे मुझे या तुम सबको ठंड लगनी बंद हो जाएगी या नहीं? बच्चे नहीं कहते हैं। उदय हाथ ऊपर उठाकर उँगलियों से बुनने की मुद्रा बनाकर कहता है कि जब उँगलियों के बीच सलाई फँसाकर इन ऊन से स्वेटर बुनेंगे और उस स्वेटर को हम पहनेंगे, तब ठंड भागेगी और हमें गर्मी मिलेगी। तो यह जो ऊन के गोले से सलाइयों के सहारे जो बुनने का काम है, इसे शिल्प कहते हैं, फ़ॉर्म कहते हैं और यह जो अपने भीतर गर्मी छिपाए रहने वाला ऊन हमारे सामने है, कथ्य है, कंटेंट है। जो कहा जा रहा है, कथ्य है और जिस तरह कह रहे हैं, शिल्प। लड़के और लड़कियों से पूछता है कि बात समझ में आई? उनके हाँ कहने पर आगे बढ़ता है।

बच्चों यह कथ्य और शिल्प, दोनों जिस धरती पर अपना काम करते हैं, जिस पुल से गुज़रते हैं, जिस आसमान के नीचे होते हैं, इनकी नसों में जो लहू दौड़ता है, वह भाषा है। कथाभाषा किसी कहानी या उपन्यास का प्रवेश-द्वार है, उसका मुखड़ा है, जो सुंदर होने पर, प्रिय होने पर, हमें अपनी ओर खींचता है। जितनी अच्छी कथा-भाषा होगी, कृति उतनी अधिक पठनीय होगी। भाषा और कथा-भाषा में क्या अंतर है, अख़बार की भाषा और कथा-भाषा में क्या अंतर है, यह समझना एक उन्नत पाठक के लिए, साहित्य के एक उच्चतर कक्षा के विद्यार्थी के लिए बहुत ज़रूरी है। इस पर अगली क्लास में बात करेंगे। एक लड़की रोकती है, सर कविता में भी कंटेंट और फ़ॉर्म ऐसे ही समझेंगे? उदय ने उस लड़की को ग़ौर से देखा और हाँ कहकर बाहर निकल आया।  

बरामदे में हिंदी विभाग के नायाब ऊदबिलाव सफ़ेद प्लास्टिक से बुनी हुई कुर्सियों पर बैठे हुए थे। कुर्सियों की सफ़ेद प्लास्टिक की सफ़ेदी को बैठ-बैठ कर चाट गए थे। छात्र इन्हें, बल्ली, हौदा, कीट, पतंग वग़ैरा नाम से जानते थे। जबकि इनके शरीर में बटन लगा हुआ था। ये जब चाहते थे, ऊदबिलाव, बागड़बिल्ला, घोड़ा, गधा, साँप-बिच्छू में से जिसका बटन दबाते थे, तुरत हो जाते थे। कभी- कभी तो क्लासरूम में गलती से कोई बटन दब जाता और पढ़ाते-पढ़ाते गधा बनकर ढेंचू-ढेंचू करने लगते थे। असल में इनमें दो बातें विशेष रूप में थीं, एक तो इन्होंने ऊटपटाँग हरकत में पीएचडी की डिग्री हासिल की थी, तो दूसरे जंकामंका सर के निर्देशन में ‘हिंदी में निर्लज्जता की परंपरा’ पर पोस्ट डॉक्टरेट कर रखा था। 

ये इतने सुंदर बेशर्म थे कि बेशर्मी इन्हें देखकर ख़ुद शर्मसार हो जाती थी। मैडम मल्लिका को पचासों बार लजाते देखा गया था। मैडम मल्लिका लजाती अच्छा थीं, पता नहीं लजाते समय आधा मुस्का क्यों देती थीं। जिससे अर्द्धस्मित मल्लिका का सौंदर्य द्विगुणित हो जाता था। इस समय भी हिंदी विभाग के बरामदे में यह खेला चल रहा था। पाठक अभी इतनी जल्दी अपनी कल्पना के घोड़े को बरामदे से मल्लिका या बल्ली के कमरे के अंदर न ले जाएँ। सब्र करें। फिर कभी स्थिति की गंभीरता की कल्पना कर लीजिएगा। बरामदे मे एक ओर हिंदी के ये ऊदबिलाव बैठकर साहित्यिक पत्रिका ‘पवित्र गोबर’ का सामूहिक रूप से पारायण कर ही रहे थे कि उन्हीं के बीच से धड़धड़ता हुआ उदय अपने कमरे में चला गया। वह फ़ैन चलाकर, कुर्सी पर बैठा ही था कि कानों में प्रोफ़ेसर कीट की तेज़ आवाज़ आई। अस्ल में प्रोफ़ेसर कीट की देह में देह नाम की कोई चीज़ थी ही नहीं, जो थी आवाज़ ही आवाज़ थी। एक साथ दस मुँह से और पचास कानों से बात कर सकते थे। कोई भी छात्र उनसे शोधकार्य के सिलसिले में कौन-सी किताब उपयोगी है और कहाँ मिलेगी, कब छपी है, मूल्य कितना है, किस विषय पर किसका लेख छपा है, किस पत्रिका के किस अंक में छपा है, खड़े-खड़े जान सकता था। उनकी बड़ाई में कहना चाहिए कि जब हिंदी विभाग में कम्प्यूटर नहीं आया था, उस समय भी वह हिंदी विभाग के कम्प्यूटर थे और उनकी टर्र-टर्र करती आवाज़ से लगता था कि हिंदी विभाग खुला हुआ है। इसी खुले हुए विभाग के खुले हुए प्रतिनिधि प्रोफ़ेसर कीट ‘पवित्र गोबर’ में कमलकांत त्रिपाठी के लेख ‘संस्कृतिपुरुष हँसमुख वाजपेयी’ की बड़ाई करते हुए उसके अंतिम हिस्से का पाठ ऐसे कर रहे थे, जैसे चिंघाड़ रहे हों—“हँसमुख वाजपेयी हिंदी के संस्कृतिपुरुष ही नहीं, कवितापुरुष, आलोचनापुरुष और सभी लेखकों-लेखिकाओं के सामूहिक रूप से पुरुष थे। हिंदी जगत को बड़ी-बड़ी संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, फ़ाउंडेशनों की भेंट उन्हें रवींद्रनाथ ठाकुर के समकक्ष खड़ा करती है। यों कह सकते हैं कि उन्होंने हिंदी में एक नहीं अनेक शांतिनिकेतन बनाए हैं। उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल से आगे का काम किया है, हिंदी आलोचना में संगीत, कला आदि क्षेत्रों के लिए खिड़कियाँ खोली थीं। हँसमुख वाजपेयी ने पहली बार आलोचना को नए क्षेत्रों ले जाने का काम किया है। हिंदी साहित्य हँसमुख वाजपेयी का ऋणी है कि जब एक ओर ख़तरनाक गैस-रिसाव से नागरिकों के शवों से उनका शहर पटा हुआ था, चीख़-पुकार और आँसुओं की बाढ़ आई हुई थी, दूसरी ओर वह हिंदी कविता में पहली बार प्रसव-पीड़ा से गुज़र रहे थे। उन्होने अपनी कोख से ‘विश्वकविता’ नाम के जिस बच्चे को जन्म दिया था, हालाँकि उसे जॉन्डिस हो गया था, साँस लेने की परेशानी के साथ ख़ून की कमी भी हो गई थी। दो दिनों के भीतर ही हँसमुख वाजपेयी का विश्व-कविता-संसार उजड़ गया था। उन्होंने दुर्भाग्यवश बंदरिया के बच्चे की तरह आजीवन विश्वकविता नाम के मृत बच्चे को अपने सीने से चिपकाए भी रखा। हिंदी कविता में बाक़ायदा एक चिपको आंदोलन भी खड़ा किया। दिल्ली और देश में आज कौन है, जो उनसे चिपका नहीं है। किसी भी लेखक चाहे लेखिका को देख लीजिए, सबके लिए हँसमुख वाजपेयी, एक पावर हाउस हैं, चरम साहित्यिक उत्तेजना का स्तंभ हैं, कारूँ का ख़ज़ाना हैं, प्राणनाथ वग़ैरा तो हैं ही और जाने क्या-क्या हैं! कह सकते हैं कि हँसमुख जी का धरती पर प्रादुर्भाव नहीं हुआ होता, तो असंख्य लेखक अनाथ रहते, जिस दिन जाएँगे, आज की तमाम लेखिकाएँ भरी जवानी विधवा हो जाएँगी। साहित्य की अवैध संतानें कहेंगी, साहित्य का यह महाबली, साहित्य का यह गर्वीला गजराज मदमाता चला जा रहा है। हिंदी साहित्य उसके पीछे-पीछे चला जा रहा है। अवैध संतानें संस्कृतिपुरुष के विरोधियों को कुत्ता से कम नहीं कहेंगी, यह भी कहेंगी कि कुत्ते कहाँ नहीं होते हैं, हाथी चला जाता है, कुत्ते भौंकते रहते हैं, भौंकते रहते हैं। हँसमुख वाजपेयी हिंदी के आकाशपुरुष हैं, उनके विरुद्ध दुष्प्रचार किया जाता है कि उनका विश्वकविता नाम का बच्चा जी गया होता, तो हिंदी कविता की संततियाँ मर गई होतीं। सच तो यह कि हँसमुख वाजपेयी के रहने से आज हिंदी कविता ज़िंदा है। उसका हँसमुख चेहरा हमारे सामने है, हिंदी कविता का एक-एक पुष्प खिला हुआ है, हर कवि और कवयित्री का संपूर्ण व्यक्तित्व खिला हुआ है।” 

प्रोफ़ेसर कीट ने लेख के इस अंतिम हिस्से को समाप्त किया तो सबसे पहले ताली मैडम मल्लिका मणि मंजुला और प्रोफ़ेसर पतंग ने बजाई, उसके बाद पूरा बरामदा तालियों की आवाज़ से हिलने लगा। दीवारों और छत में हल्का-सा कंपन प्रोफ़ेसर पतंग ने भी महसूस किया। कक्षाओं से बाहर निकलकर छात्र और छात्राएँ देखने लगे, हुआ क्या है! प्रोफ़ेसर पतंग, बरामदे में पतंग की तरह छात्रों और छात्राओं के ऊपर मँडराते हुए हँस-हँसकर उन्हें कक्षाओं में भेज रहे थे। यह हिंदी विभाग का सौभाग्य था कि प्रोफ़ेसर कीट और पतंग जैसे प्रोफ़ेसर उसके पास थे। वे द्विस्तरीय आचार्य थे। वे जंकामंका गैंग के लिए भोंपू का भी काम करते थे और भेस बदलकर गैंग के लिए जासूसी का काम भी करते थे। बस उदय के सामने फँस जाते थे, हज़ार भेस बदलने के बाद भी उदय उन्हें पकड़ लेता था, इसलिए उन लोगों ने उदय के सामने भेस बदलना बंद कर दिया था। बस उसके पास बैठकर उसकी प्रशंसा करके उससे भेद लेने की कोशिश करते थे, लेकिन उदय के मुख से भेद नहीं, जंकामंका गैंग को लेकर गालियाँ निकलती थीं। उदय ने इधर जंकामंका को हिंदी की जमोगा माई कहना शुरू कर दिया था। घड़ी ने जैसे ही दो बजाए, उदय कमरे को बंद करके निकलने लगा। प्रोफ़ेसर पतंग ने ही रोकना चाहा, उदय जी, चाय बन रही है, पीकर जाइएगा। बल्ली ने भी रोकना चाहा, रुकिए सुकुल जी, चाय पीकर जाइएगा। मैडम मल्लिका ने भी मुखड़ा घुमाकर उदय की ओर देखा और कहा, डाक् साहब, चाय तो पीते जाइए, बस तैयार है। उदय ने बल्ली को देखा और कहा, मेरे हिस्से की भी तुम्हीं पी लेना। मल्लिका जी, मेरे हिस्से की चाय भी बल्ली जी को पिला दीजिएगा और बाहर निकल गया।

आज की तरह, उन दिनों भी विश्वविद्यालयों को लोकतंत्र की पाठशाला कहा जाता था, बल्कि तब और ज़्यादा कहा जाता था।। ठीक ही कहा जाता था, विश्वविद्यालयों से असंख्य राजनेता, विद्वान्, न्यायाधीश, वकील, लेखक, वैज्ञानिक, विचारक, भारतीय और प्रांतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, पत्रकार निकलते थे। विश्वविद्यालयों ने लोकतंत्र को मज़बूत करने और लोकतंत्र की संस्कृति को जनसंस्कृति बनाने का भी काम किया था।

विश्वविद्यालयों ने छात्रसंघ और विश्वविद्यालय शिक्षक संघ जैसी संस्थाओं के ज़रिये भी अपनी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का परिचय दिया था। विश्वविद्यालय में समाजविज्ञान के कई विभाग थे, जहाँ विचारधाराओं की विधिवत् पढ़ाई होती थी। उसके आचार्य ज्ञान का विशाल भंडार अपने पास रखने के बावजूद विचारधारा का धंधा नहीं कर पाते थे। तो ये काम हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर करते थे... वे पढ़ाते थे साहित्य और धंधा करते थे विचारधारा का। साहित्य के साथ-साथ मार्क्सवाद, समाजवाद वग़ैरा को बेचा करते थे। कहना चाहिए कि एक पर एक फ़्री दे रहे थे। कविता, कहानी और आलोचना के साथ, मार्क्सवाद, समाजवाद वग़़ैरा फ्री। वास्तव में ये इतने दबंग थे कि समाजविज्ञान के अहाते से ज़बरदस्ती विचारधारा की बकरियों को अपने हाते में हाँक ले गए थे। बेचारी बकरियाँ मैं-मैं करती हुईं इनके पीछे-पीछे चली गई थीं। क्या विश्वविद्यालय और क्या शहर और देश, हिंदी के प्रोफ़ेसर, विचारधारा को बेचकर अपना धंधा तो कर ही रहे थे, लेड़ियाँ तक बेचकर खा जा रहे थे। इस अंचल में साहित्य की किसी भी विधा की कोई पूछ नहीं थी, बस इस शहर के फिसड्डी लेखक कविता-कहानी किया करते थे। वे भी और अन्य जन भी मार्क्सवाद और समाजवाद को ही साहित्य समझते थे, बल्कि कहना चाहिए कि मार्क्सवाद और समाजवाद को हिंदी साहित्य की माँ समझते थे। इधर हिंदी विभाग वालों ने स्त्रीविमर्श और दलितविमर्श को नई माँ का दर्जा दे रखा था। नए-नए सौदागरों की वजह से साहित्य का मुख, विचारधारा के बादलों में छिप गया था। विचारधारा की हैसियत साहित्य के सहायक के रूप में नहीं, माई-बाप के रूप में हो गई थी। विचार को अपदस्थ कर विचारधारा की तानाशाही स्थापित कर दी गई थी। वे विचार को सहज गति से रचना और आलोचना की नसों में तप्त लहू की तरह दौड़ने ही नहीं देना चाहते थे, वे चाहते हैं कि रचना और आलोचना की नसों में घोड़े वाले बडे-बड़े इंजेक्शनों में विचारधारा भरकर लगा दी जाए। उन्हें जल्दी थी; उन्हें न एलोपैथिक टेबलेट पर भरोसा था, न आयुर्वेदिक गोली पर। हर संगोष्ठी में, हर लेख में, रिसर्च पेपर में विचारधारा का इंजेक्शन-इंजेक्शन बड़बड़ाते रहते थे।

हिंदी के कुएँ में ही विचारधारा की भाँग पडी हुई थी। इनका स्वार्थ मूर्खता से सधता था तो ये मूर्खता भी बड़े चाव से करते थे। उल्टा-पुल्टा हो-होकर करते थे। इन दिनों साहित्य ही नहीं, बल्ली सर जैसे लोगों ने लोकतंत्र की भी ऐसी-तैसी करने का काम अपने हाथ में ले रखा था। पाजामा समाजवाद का पहनते थे और चर्र-चर्र धोती लोकत्रंत्र की फाड़ते थे। गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय, इन दिनों अपने लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता के लिए नहीं, उसकी हत्या के लिए अधिक जाना जा रहा था, एक ओर शिक्षक संघ का चुनाव पाँच साल से नहीं हुआ था और उसका अवैध अध्यक्ष बल्ली दनदनाता हुआ विश्वविद्यालय की सभी समितियों और आयोजनों में विश्वविद्यालय के अवैध शिक्षक संघ का प्रतिनिधित्व करता फिर रहा था, अपने हिसाब से समितियों का गठन कराता था और फिर उन्हें अपने हिसाब से चलाता था। विश्वविद्यालय में बल्ली अवैध शक्ति-केंद्र बन गया था। बल्ली हिंदी साहित्य का प्रोफ़ेसर था और वाइस चांसलर उसकी साहित्यिक प्रतिभा से नहीं, उसके चांसलर को संबोधित ज्ञापन-लेखन, प्रतिवेदन-लेखन वग़ैरा से प्रभावित रहते थे। हिंदी या किसी भी अनुशासन की इससे बड़ी तौहीन और क्या होगी कि कोई वाइस चांसलर, किसी प्रोफ़ेसर को उसके अपने अनुशासन में, योगदान की वजह से न जाने। असल में बल्ली ने कमाऊ-खाऊ संस्कृति को बढ़ावा देने का काम किया था। वाइस चांसलर जितना चाहे खाए, बस उसे भी खाने-पीने का पर्याप्त अवसर दे। टीचर्स एसोसिएशन के अवैध अध्यक्ष के रूप में सम्मान दे, मंचों पर बैठाए। बल्ली का यह धंधा अकेले नहीं चल सकता था। उसका अपना गैंग था। उसके ज़िले के सभी प्रोफ़ेसर उसके साथ होते थे, दूसरे ज़िले के प्रोफ़ेसर भी पीछे-पीछे चलते क्या, दौड़ते थे। बल्ली ऊपरी कमाई करता भी था और अपने गैंग के प्रोफ़ेसरों को भी कुछ करा देता था। सच तो यह कि बल्ली विश्वविद्यालय में ऊपरी कमाई की मशीन था। महिला प्रोफ़ेसर उसके दंद-फंद की वजह से किसी न किसी काम से उसके पास पहुँच जाती थीं। ज़ाहिर है, उनके हृदय में उसके प्रति सम्मान या प्रीति नहीं भय होता था। इस भय से पूरा विश्वविद्यालय त्रस्त था। दूसरी ओर तीन साल से छात्रसंघ स्थगित था, हॉस्टल और मेस की फ़ीस अंधाधुंध बढ़ाई जा रही थी। छात्रों की समस्याओं पर एकतरफ़ा निर्णय लिए जा रहे थे। कह सकते हैं कि गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय में लोकतंत्र इन दिनों ख़तरे में था और उदय तीन साल से ज़बरदस्त ढंग से विश्वविद्यालय में लोकतंत्र बचाओ आंदोलन चला रहा था, क्लास ख़त्म करके दूसरे विभागों में लोकतंत्र के हिमायती प्रोफ़ेसरों से मिलता था, बात करता था, हर विभाग में लोकतंत्र-समर्थक आचार्यों के कुछ समूह बन गए थे। आज भी क्लास से निकलकर सीधे डिफ़ेंस स्टडीज डिपार्टमेंट में आया था। फिजिक्स के प्रोफ़ेसर त्रिपाठी और मेडवेल हिस्ट्री के प्रोफे़सर चंद्रमोहन को साथ लेकर, जूलोजी, बॉटनी, केमिस्ट्री और साइंस फैकल्टी के अन्य विभागों के प्रोफ़ेसरों के पास हो आया था। उनसे फ़ोन पर बराबर बात करता था। विश्वविद्यालय के ज़्यादातर प्रोफ़ेसर बल्ली के आतंक के ख़िलाफ़ तो थे, लेकिन डरते थे, इसजिए बल्ली के आतंक के ख़िलाफ़ मुँह नहीं खोलते थे। कम थे, जो बल्ली से नहीं डरते थे और मुखर थे।     

समाजविज्ञान के कुछ पाठ्यक्रमों में आतंकवाद के अध्याय हों तो हों, हिंदी के पाठ्यक्रमों में ऐसा कुछ नहीं था। शुरुआती कविता में स्त्रियों के लिए कुछ युद्ध-वुद्ध होंगे। आधुनिककाल में स्वाधीनता-संग्राम मिल जाएगा, लेकिन हिंदी के आचार्यों के जीवन में कभी स्वाधीनता-संग्राम नाम की कोई चीज़ न थी और न निकट भविष्य में उसके आने की कोई संभावना थी। हिंदी की दुनिया में हैरत-अंगेज़ बात यह हुई कि गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आतंकवाद दीवार फाँदकर आ गया था, लेकिन हिंदी विभाग में इससे बड़ी अनहोनी की बात यह थी कि यह पहला ऐसा विचार था, जिसे पाठ्यक्रम में नहीं, आचार्यों ने सीधे अपने जीवन में शामिल कर लिया था। न कोई बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़ की बैठक, न फ़ैकल्टी और एकेडमिक काउंसिल से पास कराने का कोई झंझट, जो कुछ था, डायरेक्ट था। यह कोई मामूली आतंकवाद नहीं था। बल्ली का उन्नत क़िस्म का आतंकवाद था जिसमें बंदूक़ की कोई भूमिका नहीं थी, सिर्फ़ आतंकवादी का होना ही पर्याप्त था। हिंदी विभाग में बिना बंदूक़ के सिर्फ़ बल्ली के आँखें तरेर लेने से पैदा होने वाले आतंक से कौन नहीं थर-थर काँपता था? प्रोफ़ेसर तो प्रोफ़ेसर, कुर्सी, मेज़, ब्लैक बोर्ड, पानी की टोंटी, चाय की केतली, मुँडेर पर बैठी हुई चिड़िया, लॉन की घास, गुलाब का फूल... सब काँपते थे। और तो और बल्ली के गुरु तक उससे काँपते थे, उसकी नकारात्मक शक्तियों से जागते तो जागते, स्वप्न में भी भयभीत रहते थे; बताइए भला ये उस हिंदी के आचार्य थे, जिसने आज़ादी की लड़ाई में हिंदी को स्वतंत्रता और निडरता का वाहक बनाया, स्वाधीनता-संघर्ष का परचम लहराया, आज़ादी के बाद आचार्य नाम की संस्था आज किस तरह भय और स्वार्थ के दलदल में बदल गई, क्षरण किस हद तक हुआ, अनुभव कीजिए कि जिन गुरुओं ने अपने सभी शिष्यों को हजारीप्रसाद द्विवेदी की किताब के हवाले से शिक्षा दी कि सत्य के लिए किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं... उन गुरुओं ने भी अपने बल्ली जैसे शिष्य के सम्मुख हाथ बाँधकर अपने-अपने शीश और मेरुदंड झुका दिए। बल्ली के इस आतंकवादी जीवन की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती थी कि अपने गुरुओं के सिर पर बैठकर हिंदी का पहला आतंकवादी बना था। याद रखना होगा कि इन सभी गुरुओं ने आगे चलकर स्वेच्छापूर्वक जंकामंका गैंग के स्लीपर सेल के रूप में काम किया। भले, पुलिस के रजिस्टर में गैंग का नाम जंकामंका गैंग था और जंकामंका शास्त्री ने एक मच्छर भी मारने का काम न किया हो, सिर्फ़ हाथी के बाहरी दाँत की तरह देश में उन्हें उस गैंग का सरग़ना माना जाता था, लेकिन इस अंचल में सबको पता था कि गैंग को सचमुच का गैंग बनाने और दहशत फैलाने में मुख्य रूप से बल्ली का ही हाथ था और जंकामंका गैंग इस तरह बल्ली के हाथ में था।

अस्ल में जंकामंका सर ने शुरू में अपनी पत्रिका ‘पवित्र गोबर’ से एक अहिंसक और गांधीवादी क़िस्म का कुछ लोगों का समूह बनाया था। धीरे-धीरे छोटे-मोटे साहित्यिक अपराध करना शुरू किया था। फिर किसी लेखक को उखाड़ने-पछाड़ने के काम में लग गए थे। आँख मूँदकर मार्क्सवाद-विरोध और अज्ञेय समेत सभी ग़ैर-मार्क्सवादी लेखकों को तरज़ीह उनकी ‘पवित्र गोबर’ पत्रिका का एजेंडा था। फिर हुआ यह कि जंकामंका सर के पट्टशिष्य बल्ली सर ने धीरे-धीरे जंकामंका सर के बनाए समूह को हाईजैक करके हिंदी के आतंकवादी गैंग में बदल दिया और ऐसा कुछ हो रहा है, जंकामंका सर को इसकी भनक तक नहीं लगी, जब हो गया तो उन्हें ग़ुस्सा-फुस्सा नहीं, बहुत मज़ा आया। बेइंतहा ख़ुशी हुई। उन्हें अपने गुरुओं को गुरु बनाने का भी बहुत अफ़सोस हुआ। उनके ज्ञान की सीमा थी, वे कुछ नया नहीं कर सकते थे। नया तो उनके पट्टशिष्य बल्ली ने किया। वाह, क्या काम किया है, सोचते थे। बल्ली ने अपनी बल्ली से हिंदी के आकाश में छेद कर दिया है। प्रभाव को आतंक में कैसे बदला जा सकता है, यह पाठ जंकामंका सर ने अपने शिष्य बल्ली से जीवन में पहली बार पढ़ा। कभी-कभी सोचते और असीम सर से कहते कि उनके गुरु वास्तव में बहुत कम जानते थे और आज उनका पट्टशिष्य बल्ली हिंदी की दुनियादारी को कितना अधिक जानता है। यह सोच-सोचकर कई-कई घंटे तक जंकामंका सर मुस्कुराते रहते। क्या यूनिवर्सिटी क्या शहर, सब उनकी इज़्ज़त पहले से ज़्यादा करने लगे थे, अचानक उनका पैर छूने वालों की बाढ़ आ गई थी। कभी-कभी पहले पैर छूने की होड़ में शहर के लेखक एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़ते थे। रेलवे में क्लर्क डी.के. सिन्हा तो मार्क्सवाद का झंडा हाथ में लिए कूदकर सबसे पहले जंकामंका सर का पैर छूता था। यह सब जंकामंका सर का प्रताप नहीं, बल्ली का ख़ौफ़ था। कई उम्रदराज़ लेखक उम्र में छोटा होने के बावजूद बल्ली सर को झुक कर नमस्कार करते थे। सच तो यह कि विश्वविद्यालय और शहर की हिंदी की अपने समय की सभी तोपों ने अपना सिर झुका दिया था। मुँह बंद कर लिया था। ऐसे समय में जब आज़ादी का पाठ पढ़ाने वाली हिंदी आतंक के साये में जी रही थी, उदय ने हिंदी के इस आतंकवाद के ख़िलाफ़, अपने हाथ को आज़ाद हाथ, अपने मुँह को आज़ाद मुँह और क़लम को आज़ाद क़लम घोषित कर दिया था। उदय ने तय कर लिया था कि हिंदी के इस पहले आतंकवादी गिरोह के आतंक को ख़त्म नहीं किया, तो उसका हिंदी की दुनिया में जीना व्यर्थ है। हिंदी को आज़ाद नहीं करा सकता, तो हिंदी के बेटे के रूप में उसके जीने का कोई मतलब नहीं। उसे बल्ली से तनिक भी डर इसलिए नहीं लगता था कि हिंदी का कोई फिसड्डी उसे कभी डरा नहीं सकता था। वह अच्छा लिख सकता था, अच्छा बोल सकता था, लेखक के रूप में एक निडर जीवन जी सकता था, फिर साहित्य के लिए, साहित्य के सत्य के लिए, हिंदी के स्वाभिमान के लिए, किसी से क्यों डरता! कभी नहीं डरा। अकेले लड़ता रहा, लड़ता रहा। कभी थका नहीं, कभी रुका नहीं। उसे अकेले होने का तनिक भी दुख नहीं था, दुख कभी हुआ तो सिर्फ़ इस बात का कि अकेले ऊदल की तरह बेख़ौफ़ लड़ रहा है और इन ऊदबिलावों में किसी में भी इतना दम नहीं है कि उसका आल्हा बन सकें। बड़े अफ़सोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि ज्ञान और आचरण की इस सबसे बड़ी पाठशाला में तेजस्वी आचार्य नहीं, ऊदबिलाव भरे हुए थे।

सबको मालूम है, हिंदी विभाग तो हिंदी विभाग, शहर के सभी लेखक जंकामंका गैंग से हद से ज़्यादा डरते थे। फिर भी ये छिपाते थे कि डरते हैं। कोई कहता नहीं था, लेकिन उनकी पतलूनें ग़ौर से देखने पर लगता था कि यह पानी का छींटा नहीं है, सूसू है, ऐसे सूसूवादी लेखकों के सिर पर दुनिया की सबसे बड़ी विचारधारा का गट्ठर था। ये लेखक तीनों लेखक संगठन के बाक़ायदा मेंबर थे। यह बताना मुश्किल है कि जसम वाले अधिक डरते थे या जलेस वाले या प्रलेस वाले, यह मानने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था कि सब एक जैसा डरते थे। तीनों मार्क्सवादी लेखक संगठनों के सिर पर प्रचुर मात्रा में सूसू करने के लिए अकेले जंकामंका गैंग काफ़ी था। वैसे इन संगठनों का दोष उतना बड़ा नहीं था, जितना उसमें भरे हुए चुग़द लेखकों का था। जब लेखक ख़ुद आला दर्जे का चुग़द होगा, तो दुनिया तो दुनिया, ब्रह्मांड की बड़ी से बडी विचारधारा उसे बहादुर लेखक नहीं बना सकती है।

विचारधारा-विचारधारा, सद्दाम-सद्दाम, फ़िलिस्तीन-फ़िलिस्तीन चिल्लाने वाली ‘अहर्निश’ नाम की संस्था के संयोजक डी.के. सिन्हा तो विचारधारा ज़िंदाबाद और फ़िलिस्तीन ज़िंदाबाद कहने के बाद खुल्लम-खुल्ला जंकामंका गैंग ज़िंदाबाद, बल्ली सर ज़िंदाबाद का नारा लगाने लगा था। हद है, इस शहर में विचारधारा की धज्जियाँ जंकामंका सर और बल्ली ने उतनी नहीं उड़ाई हैं, जितनी इन तीनों लेखक संगठनों के चुग़द लेखकों ने। ऐसे शहर में और ऐसे विश्वविद्यालय में और हिंदी की ऐसी दुनिया में उदय को अकेले हिंदी का झंडा उठाना था, फहराना था और आज़ादी का तराना गाना था। 

बल्ली सर नए कुलपति के आते ही उसके स्वागत का ऐसा भाव-विभोर दृश्य उपस्थित करते थे, कि नए-नए कुलपति की आँखें चौंधियाँ जाती थीं, गेंदे के ताज़ा फूलों की मालाएँ उसके गले और गालों को ढाँप लेती थीं। पंखुड़ियाँ उसके होंठों को चूमने लगती थीं। बुके देती हुई मल्लिका मणि मंजुला मैडम, फिजिक्स की चंदा मैडम, केमिस्ट्री की राधा मैडम, अँग्रेज़ी की विभा मैडम, होम साइंस की श्वेता मैडम की ख़ुशबू उनके नथुनों से होती हुई आत्मा में उतर जाती थी। फूलों की माला और सुंदरता का रेला, बल्ली सर का आज़माया हुआ नुस्ख़ा एक सेकेंड में कुलपति को अपनी गिरफ़्त में ले लेता था। कुलपति ख़ुद को विश्वविद्यालय के इंद्र-उंद्र के रूप में नहीं, डायरेक्ट ईश्वर के रूप में देखने लगता था, उसके कानों में तारीफ़ों के लंबे-लंबे पुल शब्दों का रूप धरकर प्रवेश कर जाते थे और देर रात तक, बल्कि सोने के पहले तक बजते रहते थे। सीना फूलकर कुप्पा हो जाता था। उसे कुलपति होने का सचमुच का अनुभव होने लगता था। कुलपति, बल्ली सर के प्रति कृतज्ञ हो जाता था। बल्ली सर के आतंकवादी होने के बारे में सुनी हुई सारी बातें उसे मिथ्या लगने लगती थीं, लेकिन दुर्भाग्यवश इस बार ऐसा नहीं हुआ। लंबी धज और गौरवर्ण के सुदर्शन वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार गले में बल्ली सर के हाथों से पहला और सबसे ख़ास माला पहन ही रहे थे कि मक्षिकापात हो गया। उदय सर सामने पहली पंक्ति में ही बैठे थे, उन्होंने खड़े होकर तेज़ आवाज़ में कहा, लोकतंत्र के हत्यारे से माला मत पहनें। यह शिक्षक संघ अवैध है। पहले इसका चुनाव कराएँ, स्वागत उसके बाद हो। बल्ली सर के गैंग के कुछ प्रोफ़ेसर खड़े होकर उदय सर का विरोध करने लगे, तो साइंस फ़ैकल्टी के कुछ साथी उदय सर के पक्ष में खड़े हो गए, दोनों तरफ़ से स्वागत में विघ्न पड़ चुका था। शोर-शराबे के बीच बल्ली सर ने आव देखा न ताव झट से कुलपति के गले में माला डाल दिया और फूलों के माले से कुलपति का मुख ढक गया। आँखों के सामने सुंदरता का रेला आ गया। सुगंध से दिमाग़ सुन्न हो गया। जैसे-तैसे कार्यक्रम संपन्न होने के बाद कुलपति साइंस फ़ैकल्टी के लेक्चर थिएटर से बाहर निकले तो उदय सर और उनके साथियों ने कुलपति को घेर लिया, एक स्वर में कहने लगे कि सर टीचर्स एसोसिएशन का चुनाव बहुत ज़रूरी है, पाँच साल से नहीं हुआ है... कुलपति ने जाते-जाते कहा कि कराएँगे ज़रूर कराएँगे। ऑफ़िस में मिलिए... तब तक पीछे थोड़ी दूर पर खड़े बल्ली सर ने जैसे ही अपने कानों से सुना, तुरत बोल पड़े कि देखता हूँ कुलपति शिक्षक संध का चुनाव कैसे कराते हैं... सुना तो कुलपति ने भी लेकिन बिना कुछ कहे गाड़ी में बैठे और प्रशासनिक भवन के लिए रवाना हो गए। बल्ली सर ग़ुस्से में थर-थर काँप रहे थे। माथे पर पसीने की बूँदें आ गई थीं। हौदा सर रूमाल से बल्ली सर का माथा पोंछने लगे थे। प्रोफ़ेसर साथी, प्रोफ़ेसर हाथी वग़ैरा बीसियों शिक्षक बल्ली सर को घेरकर खड़े हो गए थे। असल में बल्ली और उदय के बीच शिक्षक संघ को लेकर विवाद बढ़ने चले जाने की वजह पिछले वाइस चांसलर के कार्यकाल में वाइस चांसलर और चांसलर को गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय शिक्षक संघ में अविलंब चुनाव कराने के लिए दिए पत्र और ज्ञापन थे। पिछले पत्र को भी अन्य पत्रों और ज्ञापन की तरह अख़बारों ने चार कॉलम में प्रमुखता से छापा था। एक अख़बार ने शीर्षक दिया था—‘कुलपति जी आप बहुत दयालु हैं, लोकतंत्र बख़्श दीजिए...’ दूसरे ने शीर्षक दिया—‘नन्ही-सी जान ले जीजिए, लोकतंत्र लौटा दीजिए...’ तीसरे ने शीर्षक दिया था—‘मेरी जान ले लीजिए, लोकतंत्र को ज़िंदा कर दीजिए...’ तीन अख़बारों ने जहाँ चार कॉलम में उदय के पत्र को प्रमुखता से छापा था, वहीं एक अख़बार ने दो कॉलम में—‘कुलपति जी, लोकतंत्र की रक्षा कीजिए...’ शीर्षक देकर छापा था। प्रायः जंकामंका गैंग सुबह अख़बार देखते ही उदय को पहले पचास गालियाँ देते थे, फिर पाख़ाना करने जाते थे, कुछ तो कमोड पर पाख़ाना करते हुए भी गालियाँ देते रहते थे। काँख-काँखकर गालियाँ देने वाले बल्ली और हौदा का वश चलता तो, उदय के मुँह पर ही पाख़ाना कर देते। दरअस्ल, बल्ली की जान टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पद में थी। उसकी सारी शक्तियाँ, ऐयाशियाँ और ख़ासतौर से ऊपरी कमाई विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के ज़रिये थीं। वह मरते दम तक संघ की कमान अपने हाथ में रखना चाहता था। उदय के ज़बरदस्त विरोध से उसे समस्या थी, कुलपति आर.आर. पाठक को उसकी टीम ने अपने वश में कर रखा था। सुबह कुलपति के उठते ही, पैर नीचे रखने से पहले हौदा कुलपति की चप्पल उनके पैर में डाल देते थे। कुलपति का हाथ पकड़कर कमोड तक ले जाते थे, कलपति के कहने पर कि अच्छा जाओ, बाहर निकलकर डाइनिंग एरिया में बैठ जाते थे। कुलपति जी के बुलाने पर अपना पैंट-शर्ट झट से उतारकर, उनका तौलिया लेकर बाथरूम में घुस जाते थे। शॉवर के नीचे कुलपति जी खड़े हो जाते थे, शॉवर खोलते भी हौदा ही थे और ग्लिसरीनयुक्त साबुन कुलपति जी की पूरी देह में लगाते भी वही थे और नहाने के बाद जाँघिए का नाड़ा भी खोलते वही थे और तौलिये से पूरा शरीर पोंछने के बाद बनारसी लुंगी भी पहनाते वही थे। कुलपति जब तर-ओ-ताज़ा होकर बाहर निकलते तो हौदा सर याद दिलाते कि सर आपकी बहू ने आज ढोकला भेजा है, लगवाऊँ? कुलपति मुंडी हिलाकर कहते कि “हाँ-हाँ क्यों नहीं... नाश्ता करने के बाद कुलपति इससे पहले की अपने आवास में बने कैंप ऑफ़िस में अपने कक्ष में बैठकर अख़बार देखते, बल्ली वहाँ उनकी प्रतीक्षा करता हुआ मिलता था। उसे देखते ही कुलपति खिल-खिलाकर पूछते, “क्या है बल्ली सर कैसे हैं, आज अख़बार में क्या छपा है?” बल्ली मुँह बनाकर कहता, “उदय ने हद कर दिया है सर, आपको लोकतंत्र का क़ साई कह रहा है।” कुलपति पूछते, “कहाँ, कैसे?” बल्ली मेज़ पर पड़े अख़बार का पृष्ठ तीन खोलकर आगे कर देता। कुलपति अख़बार पढ़ते जाते और बल्ली को देखते जाते। हौदा भी आकर बल्ली के बग़ल में बैठ गया। कुलपति ने पूछा, “क्या करना है, चुनाव कराना है?” हौदा मुंडी चार बार हिलाकर कहता, “नहीं-नहीं सर, किसी ऐरे-ग़ैरे के कहने पर आप ऐसा क्यों करेंगे, आप यूनिवर्सिटी के बादशाह हैं, ख़ुदा हैं, साल-दो साल बाद जब आपका मन करेगा तब चुनाव कराइएगा, वैसे भी चुनाव कराने की क्या ज़रूरत है, हम लोगों में क्या कमी है!” कुलपति पूछते कि फिर क्या किया जाए? बल्ली मुंडी टेढ़ी करके कहता, “सर लीगल एडवाइजर को बुलाइए और उदय को एक कारण बताओ नोटिस भेजकर सख़्त कार्रवाई कीजिए। कहता है कि लोकतंत्र का टेंटुआ आपके हाथ में है, आपको लोकतंत्र का हत्यारा कहता है।” कुलपति चौंक कर पूछते हैं, “अरे, ऐसा कहता है क्या!” हौदा सिर और हौदा एक साथ हिलाकर कहता, “जी, जी सर!” कुलपति डपटकर कहते हैं, “स्टेनो और लीगल एडवाइजर को बुलाओ।” 

ग्यारह बजते-बजते हिंदी विभाग युवा बच्चों की चह-चह से भर उठता था, लॉन के फूल महकने लगते थे, लड़कों के बाज़ुओं की मछलियाँ लड़कियों के रंग-बिरंगे दुपट्टे देखकर फड़कने लगती थीं, लड़कियों की आँखों में लाल डोरे तैरने लगते थे और इन निर्मल युवामन के बीच विभाग की सारी बदबू, नीचताएँ और साज़िशें छिप जाती थीं। विभाग विद्या का मंदिर बन जाता था। मंदिर की घंटियाँ बजने लगती थीं। विभाग के बरामदे में अकेले बैठकर उदय को लगता कि विद्या की पवित्रता आचार्यों के आचरण में नहीं, इन निष्कलुष बच्चों के जीवन में है। प्रेम भी इनके जीवन में एक पवित्र घटना की तरह आता है। देखना, बोलना और किताबों की अदला-बदली के बीच इनका प्रेम डोलता रहता है। उदय बीते दिन की दुश्चिंताओं और तनाव से मुक्त होकर एक उम्मीद से इन बच्चों को देखता रहता था। कोई लड़का आता, पैर छूता, तो उसे लगता, उसका बेटा विद्या के मंदिर में घंटियाँ बजाने और ललाट पर तिलक और माथे पर रूमाल रखने के बाद उसके पैर छू रहा है, लड़कियाँ सिर पर दुपट्टा रखकर पैर छू रही हैं, तो लगता है, मंदिर से निकलकर उसकी बेटियाँ पैर छू रही हैं। उदय का हृदय आशीष से भर उठता था। वह आशीषवर्षा करने लगता था। अभी उदय सर विद्या के पवित्रलोक में विचरण कर ही रहे थे कि विभाग के चपरासी राधेश्याम ने ‘अर्जेंट है’ कहकर लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाया। उदय ने लिफ़ाफ़े को लेकर वहीं चर्र से फाड़ा और पढ़ना शुरू किया : महोदय, आप द्वारा कुलपति जी को प्रेषित उपर्युक्त पत्र के संदर्भ में कुलपति जी के आदेशानुसार आपको सूचित करना है कि 1-पत्र में आपने जिस भाषा का प्रयोग किया है, वह आपत्तिजनक है। भाषा एवं साहित्य के शिक्षक द्वारा मिथ्या आरोप लगाने वाली ऐसी भाषा का व्यवहार सर्वथा अनुचित है। आपने कुलपति जी से जानना चाहा है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद पद छोड़ेंगे या नहीं, आपको इस तरह के अमर्यादित और काल्पनिक प्रश्न पूछने का कोई अधिकार नहीं है। 2-आपके पत्र से ऐसा से घ्वनित होता है कि लोकतंत्र को कुलपति जी ने यत्नपूर्वक रोक रखा है। 3-शिक्षक संघ के बाइलाज के अनुसार चुनाव के लिए बैठक बुलाने का अधिकार अध्यक्ष का है। 4-कुलपति जी को दिया गया पत्र समाचार पत्रों में प्रकाशन के लिए दिया जाना, आचार-संहिता के प्रतिकूल है। क्यों न उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में अग्रेतर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। एक सप्ताह में स्पष्ट करें। आज्ञा से सचिव, कुलपति।

उदय को समझते देर नहीं लगी कि यह लीगल एडवाइजर की भाषा नहीं है। यत्नपूर्वक, मिथ्या, अमर्यादित, तथ्यों के आलोक में वग़ैरा बल्ली का मुहावरा है। इन पदों का प्रयोग प्रायः बोलने और पत्रकों को लिखने में करता है। ग़ुस्से से उसके शरीर में जगह-जगह आग लग गई थी। बल्ली ख़ुद तो कभी कुछ कर नहीं पाता है, सोचता है, कुलपति द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी से उदय डर जाएगा। शिक्षक संघ में चुनाव के लिए आवाज़ उठाना बंद कर देगा। उदय बरामदे से अपने कमरे में आकर मेज़ की दराज़ से लेटरपैड निकालता है और तुरत जवाब लिखना शुरू कर देता है : महोदय, शिक्षक संघ के बारे में लिखे गए अपने उपर्युक्त पत्र की प्रकृति के संबंध में विनम्र निवेदन है कि 1-उपर्युक्त पत्र शिक्षक संघ की साधारणसभा के सदस्य के रूप में शिक्षक संघ के संरक्षक को लिखा गया है, न कि प्रोफ़ेसर के रूप में माननीय कुलपति को। 2-कार्यकाल के बाद कुलपति जी के पद छोड़ने का संदर्भ इस आशय से दृष्टांत के रूप में है कि जैसे सभी कुलपति महोदय कार्यकाल समाप्त होने के बाद पद छोड़ देते हैं, शिक्षक संघ के अध्यक्ष को भी कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद मर्यादित ढंग से पद छोड़ देना चाहिए। 3-ध्यान आकृष्ट करना है कि अपने उपर्युक्त पत्र मे एकाधिक बार आदरणीय संरक्षक महोदय तथा संरक्षक महोदय के लिए बहुत दयालु पद का भी प्रयोग किया गया है। भाषा और साहित्य की परंपरा में बहुत दयालु पद भगवान् के लिए प्रयुक्त होता हैं। आदर सहित, भवदीय-उदय शंकर शुक्ल। जवाब दो मिनट में तैयार। दराज़ से लिफ़ाफ़ा निकालकर उसमें पत्र रखा। गोंद से चिपकाया। ऊपर पता लिखा और विभागीय डाक से सचिव, कुलपति के पास भेजकर, बरामदे में आकर उसी कुर्सी पर बैठ गया, जहाँ पहले बैठा था। बच्चों के संसार में फिर खो गया, जैसे अभी-अभी कुछ बहुत अप्रिय हुआ ही नहीं। सामने  एक तितली, कभी इस फूल पर उड़कर बैठ रही थी, तो कभी दूसरे फूल पर। कुछ और तितलियाँ आ गई थीं। रंग-बिरंगी तितलियों और फूलों ने पूरे लॉन को छाप लिया था। तितलियाँ ऊपर आसमान की ओर जाना चाह रही थीं, फूल उनकी बाँहें पकड़ लेना चाह रहे थे, लेकिन उदय सर सामने बैठे थे। विभाग उदय सर को कुछ भी समझे, लेकिन विभाग की तितलियों और फूलों के लिए उदय सर अलग मायने रखते थे। वे उनमें वह देखते थे, जो बल्ली सर और हौदा सर वग़ैरा में नहीं देखते थे। वे हमेशा अनुभव करते थे कि उदय सर जितना उन्हें पढ़ाते हैं, उससे अधिक उन्हें प्यार करते हैं, उनके भविष्य की चिंता करते हैं। उदय सर उनकी निराशा, उनके भय को हर लेते थे, उन्हें उड़ने के लिए पंख देते थे, उनके सामने आकाश उठाकर रख देते थे, लो उड़ो, ऊपर और ऊपर... वे उदय सर में अपने पिता को देखते थे। विद्या के इस मंदिर में उदय सर उनके लिए हिंदी भाषा और साहित्य के पुजारी थे। देवता थे। उदय सर की कविताएँ और उदय सर का गद्य, दोनों उन्हें प्रिय था। उदय सर की कविताएँ जिन पत्रिकाओं में छपतीं, वे उन्हें ज़रूर ख़रीदना चाहते थे। कई बार एक ही पत्रिका का एक ही अंक कई बच्चे लेकर क्लास में चले आते थे। उदय उन्हें समझाता, पैसे इस तरह मत ख़र्च करो, अलग-अलग पत्रिकाएँ लेकर आओ, एक स्टडी सर्किल बनाओ, मिल-बाँटकर पढ़ो, एक-दूसरे से संवाद करो। साहित्यविमुख समाज में साहित्य का अग्रदूत बनो। 

हिंदी विभाग का बरामदा, अपना कमरा और कैफ़ेटेरिया का कोना, उदय की प्रिय जगहें थीं। कैफ़ेटेरिया में दूसरे विभागों के प्रोफ़ेसर भी आ जाते थे। स्टूडेंट तो आते ही आते थे। कभी-कभी बीए के लड़के विभाग में आकर कुछ समझने और पूछने में संकोच करते थे, उदय सर को अकेले बैठा पाकर वहीं पूछने लगते थे। बीए सेकेंड इयर के एक छात्र ने पूछा कि सर ‘लाल पान की बेगम’ का क्या मतलब है, हौदा सर ने कलास में बताया कि ताश के एक पत्ते को लाल पान की बेगम कहते है। नाटक कंपनियों में काम करने वाली लड़कियाँ दिन भर ताश का खेल खेलती रहती हैं। इसलिए सभी नाचने वाली लड़कियों को लाल पान की बेगम कहते हैं? उदय सर ने पहले उस विद्यार्थी को सामने की कुर्सी पर बैठाया। उसके लिए भी चाय मँगवाई। चाय पीते हुए पहले तो उदय सर ने उस बच्चे का नाम और पता पूछा, माता-पिता के बारे में पूछा, यह जानकर उसे अच्छा लगा कि महदेवा के पास का रहने वाला है, झंकार के गाँव से सटे खजुरिया का लड़का है। उदय ने चाय की प्याली, प्लेट में रखते हुए कहा, देखो बेटा हौदा सर ने क्लास में क्या पढ़ाया है क्या नहीं उसे छोड़ो! मेरे एक आलोचक मित्र हैं, उन्होंने एक दिन फ़ोन पर मुझसे कहा कि रेणु की कहानी ‘लाल पान की बेगम’ का शीर्षक कुछ अबूझ है, तो मैंने मित्र से फ़ोन पर ही शीर्षक खोलते हुए कहा, “लाल पान की बेगम, वह कलाकार या नाटक कंपनी की नायिका है। बहुत सुंदर और नृत्य में प्रवीण है। जिसका मुखमंडल ख़ासतौर से होंठ काफ़ी लाल हैं। रूप की रानी है। कह सकते हैं कि रंगीन युग की मधुबाला या अमुक हीरोइन हैं, जिसकी कला देखने के लिए बिरजू की माँ तमाम तैयारी के बाद बैलगाड़ी से जा रही होती है। गाँव की एक नई बहू को भी बैठा लेती है। बिरजू की माँ, नई बहू की गौने की साड़ी की गंध और उसकी खसखसाहट की ध्वनि के संगीत में डूबकर, कुछ गाड़ी और बहुत कुछ मन की गाड़ी के हिचकोले में नीम बेसुध हो जाती है और इस स्थिति में आत्ममुग्ध बिरजू की माँ ख़ुद को लाल पान की बेगम समझने लगती है। उस क्षण मुझे लगा था, प्रेम की पसरी हुई चाँदनी में, बिरजू की माँ की बैलगाड़ी से, दूसरे गाँव नाच देखने नहीं, सौंदर्य और प्रेम के चाँद पर जा रही हो। कोई लाल पान की बेगम को सिर्फ़ ताश का एक पत्ता समझ लेगा, तो फणीश्वरनाथ रेणु सिर पर हाथ रखकर बैठ जाएँगे। शायद लोक, लोकप्रिय तारिकाओं के कुछ नाम अपनी सुविधा, पसंद या मुहावरे वग़ैरा के बीच से रख लेता है। रेणु ने उसे या लोकाधारित अपनी कल्पना से नाटक कंपनी की नायिका का और कहानी का नाम लाल पान की बेगम रख दिया होगा। आख़िर, दर्शकों के हृदय पर राज करने वाली नायिका रानी के रूप में नहीं जानी जाएगी तो फूलमती के रूप में तो जानी नहीं जाएगी। लाल पान की बेगम है। पान के रंग जैसी होंठलाली उसके होठों को लाल करके उसके सौंदर्य को न जाने कितने गुना बढ़ा देगी। शीर्षक की खोज में भटकने से अच्छा है, कहानी की असल नायिका बिरजू की माँ में उतर आई नाटक कंपनी की उस अपूर्व सुंदरी को निहारें। काफ़ी पहले पढ़ी हुई कहानी है। यादगार कहानी है। तुम्हें कोई बात समझ में न आए तो विभाग में आकर पूछ सकते हो। उदय सर की छात्र-वत्सलता और हौदा सर के रूखेपन, दोनों को विद्यार्थी जानते थे, इसलिए उदय सर से घुल-मिल जाते थे और हौदा सर से दूरी का अनुभव करते थे, कहना चाहिए कि डरते थे। हौदा सर अपनी तमाम नीचताओं के साथ ज़ीरो नंबर देने के लिए मशहूर थे। मूल्यांकन भवन की बड़ी-सी मेज़ पर उत्तर-पुस्तिकाओं को जाँचने के दौरान, पन्नों पर क्रास बनाते और ज़ीरो नंबर देते समय उनकी विश्वविजयी मुस्कान देखने के क़ाबिल होती थी, लेकिन उस समय स्मार्टफ़ोन नहीं आया था। आया होता, तो एकेडमिक दुनिया के सबसे ज़ालिम मुदर्रिश के रूप में उनकी तस्वीरे छपतीं। उदय को हौदा की इस मूर्खता और क्रूरता पर बहुत ग़ुस्सा आता था। सोचने की बात है कि बीस नंबर के सवाल में एक-दो नंबर आख़िर कब देने के लिए होते हैं, फिर एक-दो की जगह ज़ीरो क्यों, विद्यार्थी तो दो नंबर पाकर भी फेल हो जाएगा, फिर ज़ीरो क्यों? हौदा सर की इस उपलब्धि से उनके गैंग के प्रोफ़ेसर कीट और प्रोफ़ेसर पतंग, प्रोफ़ेसर मल्लिका, प्रोफ़ेसर साथी, प्रोफ़ेसर हाथी वग़ैरा भी काफ़ी प्रभावित थे। ये ज़ालिम आचार्य ज़ीरो नंबर देते समय अपने विद्यार्थियों के कपड़े उतारकर उनके चूतड़ पर बेंत की छड़ी से मारने और सार्वजनिक रूप से लज्जित करने के सुख का अनुभव करते थे। जबकि इन आचार्यों ने जीवन में कभी कोई ढंग का लेख नहीं लिखा था, इनका आलोचना में कोई काम जैसा काम नहीं था। मार्क्सवादी प्रोफ़ेसर साथी और प्रोफ़ेसर हाथी, मार्क्सवाद के चालीस प्रतिशत अनुयायी थे और साठ प्रतिशत प्रोफ़ेसर हौदा सर के हाफ़पैंटवाद के। प्रोफ़ेसर हौदा कितने बड़े हाफ़पैंटवादी थे, इसका अनुभव उनकी इस हरकत से कर सकते हैं कि पैंट के नीचे जाँघिया या कच्छा वग़ैरा नहीं, डायरेक्ट हाफ़पैंट पहनकर आते थे। ज़रूरत पड़ने पर झट से फ़ुल पैंट उतारकर फेंक देते थे। हौदा सर की माया बड़ी विचित्र थी। कहने को ब्राह्मण कुल के दीपक थे, लेकिन विद्या और शील के जन्मजात शत्रु थे। पिता तीक्ष्णकंटक बाबा के नित्यसाष्टांगप्रणामकर्ता भक्त थे। बाबा की चरणरज के लिए अन्य भक्तों से मारपीट कर लेते थे। बाबा बुलाकर डाँटते थे, कहते थे कि देख बच्चा मैं तुझे बहुत प्रेम करता हूँ, चरणरज के लिए मारामारी क्यों करता है, बोल और क्या चाहिए? “महाराज जी, मेरा बड़ा बेटा पढ़ने में कमज़ोर है। आपका चरणरज रोज़ ले जाकर उसे पानी में घोलकर पिलाता हूँ।” बाबा ने कहा कि स्कूल का नाम बता... “जी-जी, गुरुकुल विद्यापीठ में।” ठीक है बच्चा जा, अब वह कमज़ोर नहीं रहेगा। देखते-देखते हौदा सर हर कक्षा में पास होते गए। एक दिन गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की शोभा बन गए। मूल नाम में हृदय लगा हुआ था, लेकिन कई बार डाक्टर उनका दिल ही नहीं खोज पाते थे। दिल की धड़कन नापने के लिए उनके चेहरे पर आते-जाते रंग देखते थे। सो गाँव में जहाँ उनकी ख्याति हृदयहीन युवक के रूप में हुई, वहीं विश्वविद्यालय में उनके बाह्य आकार के आधार पर हौदा सर के रूप में। किसी के कुछ भी बुरा कहने से हौदा सर के हृदय या हौदे पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उनके बारे कही गई अच्छी बातें उनकी प्रगति का आधार थीं। कुलपति उन्हें अच्छा कहते थे, जंकामंका सर अच्छा कहते थे, बल्ली सर अच्छा कहते थे। विद्यार्थी उनके ज़ीरो नंबर देने की बुरी आदत से डरकर उनके मुँह पर अच्छा-अच्छा कहते थे और पीठ पीछे माँ-बहन की गाली देते थे। जो भी हो हौदा सर ने उदय की देखा-देखी डायरी लिखना शुरू कर दिया था। शुरू में पॉकेट में छोटी डायरी रखते थे, बाद में बड़ी डायरी पर पता नहीं क्या अंट-शंट लिखते रहते थे। कोई-कोई कहता कि हौदा सर की डायरी, उनकी अनंत ईर्ष्याओं का पिटारा है जिसमें उदय को संबोधित हज़ारो गालियाँ हैं। अस्ल में हौदा सर कविता-कहानी और आलोचना वग़ैरा लिख नहीं सकते थे, गालियाँ दे सकते थे, लिख सकते थे। हौदा सर की ईर्ष्या-कथा कम दिलचस्प नहीं है। उदय को कभी संस्मरणों की किताब लिखने का समय मिला, तो बल्ली और हौदा के ईर्ष्या-प्रसंगों पर विस्तार से लिखेगा। हौदा सर की पॉकेट डायरी सब देखते थे, लेकिन बड़ी डायरी को छिपाकर रखते थे। वह भी ऐसी-वैसी जगह नहीं छिपाते थे, बल्कि ऐसी जगह छिपाते थे कि जहाँ यूनिवर्सिटी का कोई परिंदा पर न मार सके। यूनिवर्सिटी के पीछे काफ़ी दूरी पर ताल के किनारे बरगद का एक अकेला भुतहा पेड़ था। उसी में किसी ऐसी जगह छिपाकर बंदा रखता था कि कभी-कभी ख़ुद भी नहीं ढूँढ़ पाता था। ऐसी परिस्थिति में उसके पास बहुत आसान विकल्प था। आँख मूँदकर हनुमान चालीसा का पाठ करने लगता था और ऊपर मुँह करके पलक खोलते ही डायरी आप से आप दिख जाती थी। हौदा सर की आधा दिलचस्प और आधा बकवास डायरी कहाँ किसी दूसरे आदमी को मयस्सर हुई। यह तो हौदा के दोस्त सुग्रीव की मुर्रा भैंस की क़िस्मत अच्छी थी कि वह गाँव के पास ताल के जिस किनारे पर घास चर रही थी, चरते-चरते वहीं पास में बरगद के अकेला भुतहा पेड़ के नीचे आ गई और पेड़ पर से अचानक कोई काले रंग का कंधे पर टाँगने वाला झोला भद से गिरा और भैंस की सींग में फँसकर उसकी पीठ पर लटक गया। भैंस पहले से ही सुग्रीव की प्रताड़ना से क्षुब्ध थी, लेकिन उससे अधिक अपने मालिक के दोस्त की फ़्री में दूध पीने की आदत से नाराज़ थी। हौदा सर जब भी गाँव जाते, गैलन में उसका दूध भर लाते थे। हौदा सर अपने मित्र और गाँव के प्रधान सुग्रीव यादव की तरक़्क़ी से भी जलते थे। सुग्रीव चार भाई थे। दूसरे नंबर का राजेंद्र झोलाछाप पत्रकार हो गया था। तीसरे नंबर का रामप्रसाद तीक्ष्णकंटक बाबा की कृपा से रोडवेज में कंडक्टर हो गया था और चौथा कपिलदेव भी तीक्ष्णकंटक बाबा की कृपा से गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय में शारीरिक शिक्षा का लेक्चरर हो गया था। गाँव में सबसे बड़ा मकान सुग्रीव के परिवार का था। ट्रैक्टर तो था ही, कम्बाइन मशीन भी सुग्रीव ने ख़रीद लिया था। चूँकि हौदा सर बहुत लालची और कंजूस टाइप के व्यक्ति थे और अपने से किसी भी संपन्न और प्रतिभाशाली व्यक्ति से चुपचाप जलने लगते थे। पता नहीं कहाँ से उनमें जलने की आदत इस हद तक आ गई थी कि आदमी तो आदमी सुग्रीव की भैंस तक से जलते थे। ऐसा आदमी पूरी दुनिया में एक ही होगा जो आदमी तो आदमी, मनुष्येतर प्राणियों से भी जले। हौदा सर चाहते तो थे कि पूरी दुनिया उनके हिसाब से और उनके पीछे-पीछे चले, जबकि वह ख़ुद बल्ली सर के पीछे-पीछे चलते थे। हालाँकि वे मन ही मन जलते तो बल्ली सर से भी थे कि वाइस चांसलर सब काम उनसे पूछकर क्यों करते हैं, लेकिन विश्वविद्यालय में हिंदी के मगरमच्छ से बैर करके वह रह नहीं सकते थे, इसलिए बल्ली सर की अधीनता में वाइस चांसलर को साधने में लगे रहते थे। वह आगे चलकर सफल भी हुए, लेकिल जलने की आदत गई नहीं। हौदा सर अमरीका के राष्ट्रपति से लेकर अपने ग्राम प्रधान तक से एक जैसा जलते थे। जलने के तौर-तरीक़े भी अलग-अलग थे। मसलन, अमरीका के राष्ट्रपति से जलना होता था तो उठाते थे एक तरफ़ का चूतड़ और पीछे से दागते थे धाँय से। अपने ग्राम प्रधान से जलना होता था तो थूकते थे पिच्च से। बीच में कोई ऐसा आदमी आ जाता था जो अधिक प्रतिभाशाली हो तो पहले थूकते थे पिच्च से और उसके बाद दागते थे धाँय से। जो भी हो, सुग्रीव की भैंस से जलने का तरीक़ा काफ़ी अलग था, दौड़कर उसके नाद में मुँह गड़ा देते थे और हबर-हबर उसका भूसा खाने लगते थे और जब भैंस के खाने के बर्तन से मुँह निकालते तो बहुत सारा भूसा उनके होंठों, गालों, नाक, कान और बालों में लगा रहता था। सूट-बूट में बिना सींग की पीएचडी, डीलिट् भैंस लगते थे। ऐसी आलिम-फ़ाज़िल भैंस की पीठ पर सवार होकर बल्ली विश्वविद्यालय की सैर करता था। अपनी महिला मित्रों से मिलने, इकोनॉमिक्स, मैथ, पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट चला जाता था। 

एक बार तो बल्ली सर चाँदनी रात में उसी भैंस की पीठ पर बैठकर हिंदी की अपनी मैडम मल्लिका मणि मंजुला के घर के पिछवाड़े पहुँच गए थे और भैंस के कहते ही, मत चूको चौहान, भैंस की पीठ पर खड़े होकर मैडम के आँगन में झाँककर दीवार फाँद गए थे। अस्ल में हुआ यह था कि बल्ली और भैंस, दोनों ने ज़बरदस्त ह्विस्की पी रखी थी और ग़लती से मैडम मल्लिका मणि मंजुला के घर का पिछवाड़ा समझने में भूल हो गई थी और बल्ली सर ने आव देखा न ताव मैडम के बग़ल वाले घर में कूद गए थे। संयोग अच्छा था कि डॉक्टर चौधरी के घर पर उस रात कोई नहीं था और बल्ली सर पीने के झोंक में आँगन में जिस अंडरवियर को मैडम मल्लिका मणि मंजुला का अंडर गारमेंट समझकर कूदे थे, वह अंडरवियर डॉक्टर चौधरी का था। बल्ली सर ने उसे छूकर भी देखा और जब वह अंडरवियर छूने के बाद भी मैडम मल्लिका मणि मंजुला के अंडर गारमेंट में नहीं बदला, तो अपना-सा मुँह लेकर लौट आए थे, लेकिन लौटने से पहले खिड़की से कमरों में भी झाँक कर देखा था। डाक्टर चौधरी असल में रँडुआ थे, उनके धर में कोई ज़नाना चीज़ मिली ही नहीं। ड्राइंगरूम में जो फ़ोटो दिखी भी वह मैडम के पति की नहीं मिलिट्री से रिटायर चौधरी की ज़बरदस्त मूँछों वाली थी। बल्ली नशे के झाड़ पर चढ़े-चढ़े समझ गए थे कि उनसे कोई ऐतिहासिक भूल हुई है। ग़ुस्से में जब बाउंड्री फाँदकर वापस भैंस की पीठ पर बैठे तो सारा ग़ुस्सा भैंस पर निकाला, “अरे राँड, हौदा जैसा पिछवाड़ा लेकर भी तू मैडम मल्लिका मणि मंजुला का पिछवाड़ा नहीं पहचान पाई, चल आज तुझे बताता हूँ।” इसके बाद बल्ली ने क्या किया, उसका वर्णन कर पाना मेरे लिए संभव नहीं है। संक्षेप में और सूत्र रूप में बस इतना बता सकता हूँ कि उस रात भैंस और बल्ली सर अपने-अपने घर न जाकर विश्वविद्यालय के गेस्टहाउस में डबल बेड पर एक साथ सोए। लिखने में कोई भूल-चूक न हो जाए, इसलिए किसी अनाड़ी लेखक को कुछ प्रसंगों को छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए। बड़े सुकुल जी की तरह आलोचक होने का सवाल ही नहीं पैदा होता है, अलबत्ता छोटे सुकल की तरह कोई छोटा-मोटा आलोचक भी होता तो हिंदी साहित्य का इतिहास या संवेदनात्मक इतिहास वग़ैरा नहीं, डायरेक्ट हिंदी साहित्य का कथात्मक इतिहास लिखता। ख़ैर, जो हुआ नहीं उसका कोई दुख नहीं और जो है उसका भी कोई अफ़सोस नहीं!

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जारी...

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