दास्तान-ए-बीएचयू : चाँद तोहरे बाऊ क हव
प्रीति चौधरी
30 अक्तूबर 2026
रात गहरी है, देर तक जगने वाली लड़कियाँ भी सो चुकी हैं। छात्रावास के गलियारों में निस्तब्धता है और ऊपर दिखते आकाश से निरभ्र शांति झर रही है, पर यह शांति मेरी सीनियर के अशांत मन को सहला नहीं पा रही है। अपमान और दुख से विक्षुब्ध कभी वह अपने बालों को क्लचर में समेटती है, तो कभी बाल खोलकर तकिए में माथा धँसा देती है। मुझे समझ नहीं आता कि मैं ऐसा क्या करूँ कि उनके चेहरे की शिकन थोड़ी कम हो?
फ़्रेशर हूँ मैं। अँग्रेज़ी ऑनर्स की सीनियर के साथ रूम मिला है। वह अपने टेप रिकॉर्डर पर क्लास से लौटकर हर दिन गाने सुनती हैं, ज़्यादातर अँग्रेज़ी। वह पूर्वी भारत के एक बड़े शहर की हैं, पर बातें वह अक्सर अपने ननिहाल नरसिंहगढ़ की करती हैं और अपने ममेरे भाई की चिट्ठियों का बेसब्री से इंतज़ार करती हैं। उनकी मेज़ पर कैसेट्स बहुत क़रीने से रखे हैं—Scorpions, Pink Floyd, ABBA, Beatles और भी बहुत कुछ। उनकी सोहबत में अँग्रेज़ी गाने मुझे भी अच्छे लगे हैं। पहले लगता था कि अँग्रेज़ी गानों में लोग माइक पकड़कर सिर्फ़ चिल्लाते हैं, क्योंकि गाने का कोई शब्द पल्ले नहीं पड़ता था। दूरदर्शन के किसी नए साल के कार्यक्रम में या फिर ग्रैमी अवार्ड्स की ख़बर के तहत डॉली पार्टन के गाने ‘आई विल ऑलवेज़ लव यू’ के प्रसारण को देखते हुए गाने की गहराई शिद्दत से महसूस हुई थी, पर उसमें भी ‘ऑलवेज़ लव यू’ पंक्ति के अलावा ज़्यादा कुछ समझ में नहीं आया था। अब रूममेट की सोहबत में अँग्रेज़ी गाने भी ध्यान खींचकर भावप्रवण लगने लगे।
बात शुरू हुई थी कि अपनी सीनियर का मूड कैसे ठीक किया जाए, तो दीदी का मन बदलने की कोशिश में मैं उन्हीं की मेज़ से उठाकर बेन किंग के कैसेट से गाना बजा देती हूँ—‘स्टैंड बाई मी’। कुछ ही पलों में सीनियर ने ख़ुद से रिकॉर्डर का वॉल्यूम बढ़ा दिया। अब रात की निरभ्रता में हॉस्टल में एक आवाज़ गूँज रही है—इन द नाइट... लैंड इज़ डार्क, मून इज़ द ओनली लाइट वी सी... डार्लिंग, डार्लिंग, डार्लिंग, स्टैंड बाई मी। सीनियर के चेहरे पर धीरे-धीरे स्निग्धता अंकुरित हो रही है और वह शांत हो गई हैं। अगल-बग़ल के रूम में से कुछ लड़कियाँ जागकर हमारे रूम में आ गई हैं। किसी को नींद उचटने का दुख नहीं। गाने को सामूहिक रूप से सुना जा रहा है। यह सुनना एक लड़की के जीवन में हुए बुरे अनुभव को भुलाने की सामूहिक कोशिश है, साथ ही एक सांद्र-सी पुकार वाले गाने और उसकी स्वर लहरी में भीगने का सुख भी। सच में, किसको ऐसे साथी का इंतज़ार नहीं होता? सघन से सघन अंधकार में राह बनाने वाला साथ। अहा, कितनी सुंदर चीज़ है साथ!
और ये साथ क्या ऐसे ही मिल जाता है? देखा जाए तो सचमुच का साथ मिलना किसी वरदान या अलौकिक घटना से कम नहीं। किसी खेत, मेड़ या क्यारी से बात हो, तो पता चलेगा कि उनके लिए किसान और माली के साथ का मतलब क्या होता है। साथ जो सींच दे, निखार दे, अपनी छुवन से जीवन-संघर्ष के ताप को सहने लायक़ बना दे। कई बार पूरी ज़िंदगी एक छत के नीचे गुज़ार देने के बाद भी कुछ लोग साथ के सुख से वंचित रहते हैं और कई बार निपट अकेले में भी एक साथ होता है। किसी मीठी-सी स्मृति का साथ या फिर अपना साथ। हममें से कितने ख़ुद को बचाए रखने का जतन कर पाते हैं? मैं बहुत क़रीबी लोगों को अपने को खोते देख रही हूँ। किसी भले इंसान और डूबकर चाहने वाले का साथ मिल जाने पर भी इस नियामत को सँजोए रखना शायद सबके वश की बात नहीं।
जो साथ खोता है, वो ख़ुद को भी खोता है। मैं बेन किंग को नहीं जानती, पर उसकी आवाज़ को जानती हूँ। जानती हूँ कि ये आस जगा सकती है एक विश्वास और उम्मीद से भरी प्रतीक्षा की। ऐसे गाने सुनने वाली लड़की के जीवन का पहला ही प्रेम प्रस्ताव न सिर्फ़ बेस्वाद हो, बल्कि वह प्रतिशोध और नीचा दिखाने के भाव में बदलकर पूरे छात्रावास के सामने डाकिये के हाथ से आए, तो ये दुखी करने वाली बात तो थी ही। मैं आपको बताना भूल गई कि सीनियर संताप में क्यों थी। दरअस्ल, वो सीनियर दीदी जब बीएचयू गेट से बाहर लंका जातीं, तो एक छात्र नेता टाइप लड़का उनका पीछा करता। पीछा करते-करते एक दिन वह खेमचंद की दुकान में आर्चीज़ के कार्ड के सहारे उनसे प्रेम निवेदन कर बैठा। सीनियर करियर बनाने आई थी। हम सबकी प्राथमिकता पढ़ाई थी। ज़ाहिर है, ऐसे झमेलों के लिए हमारे पास समय नहीं था। सीनियर दीदी के ना कहने से आहत होकर लड़के ने डाक के माध्यम से उनको सैनिटरी नैपकिन और कंडोम भेजे थे। तब इसका बहुत मतलब समझ में नहीं आया था, पर ये ज़रूर लगा कि यह एक घटिया लड़के का घटिया अंदाज़ है। इस तरह के कुत्सित कार्य और कुंठा से हम सबका वास्ता पहली और आख़िरी बार हुआ था। सीनियर इस घटियापन से आहत थी, क्रोध से रो रही थी और बेन किंग की आवाज़ ने उसके चेहरे पर हँसी लौटा दी थी।
काश, उस मूर्ख और अहंकारी छात्र नेता को पता होता कि किसी के साथ की आकांक्षा भर से उसे नहीं पाया जा सकता। साथ पाने और देने की अर्हता अर्जित करनी पड़ती है। वैसे भी भरोसा जीतना एक बात है और लंबे समय तक उसे मुकम्मल किए रहना दूसरी बात। युवाओं में इस भरोसे की ही आकांक्षा में फ़्रेशर्स और फ़ेयरवेल में सबसे ज़्यादा गाया जाने वाला गीत था—‘जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए, तुम देना मेरा साथ, वो हमनवाज़।’ यही तो है ‘स्टैंड बाई मी’। दुनिया की हर भाषा में ऐसे साथ की चाहत वाले हज़ारों गीत रचे गए हैं और आगे भी रचे जाएँगे।
क्या बिन कुछ कहे या बिना कोई रिश्ता पनपे भी साथ का एहसास हो सकता है? शायद हाँ, और ऐसे साथ सबसे सुंदर हो सकते हैं। कई बार दो-चार मिनट का साथ भी ख़ुशी से भर देने वाला साबित हो सकता है।
कई बार ऐसा भी होता है कि लंबे साथ की संभावना भी किसी नन्हे-से परिचय और पल भर के सान्निध्य से उपज जाती है। महाप्राण निराला के शब्दों में, ‘नयनों का—नयनों से गोपन—प्रिय संभाषण, पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान—पतन।’ यह एक पल में प्रीति की प्रतीति और साथ की आकांक्षा थी, जिसे अशोक वाटिका में राम और सीता ने महसूस किया था।
आज इतना लिखना इसलिए हो गया कि ‘स्टैंड बाई मी’ गाना एक लंबे अरसे बाद ‘हार्ट ऑफ़ द बीस्ट’ मूवी देखते हुए फिर से याद आ गया। यह गाना मूवी के आख़िर में बजता है और साथ-साथ घर तक चला आता है। ‘हार्ट ऑफ़ द बीस्ट’ एक सैन्य अफ़सर और सेना द्वारा प्रशिक्षित उसके प्रिय कुत्ते ओडिन के आपसी रिश्ते की कहानी है। ये कहानी भरोसे, प्रेम और आपसदारी की है। वैसे भी ब्रैड पिट की मूवी भला कैसे छोड़ी जा सकती है? ‘इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ के बाद ब्रैड पिट को इस नई भूमिका में देखा और सोचा कि अभिनेता वही, जो अपने पात्र में डूब जाए; लगे कि वह यही है, न कि ब्रैड पिट।
हर रोल में पंकज त्रिपाठी के पंकज त्रिपाठी लगने से क्या अभिनय का आकर्षण बना रह सकता है? मेरे जैसे दर्शक की बात भी कुछ कम नहीं—गए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास। एक गाना क्या बजा, हम बीएचयू ही पहुँच गए। कुछ दृश्य, ध्वनियाँ, गंध और छवि हमारी स्मृतियों को कसकर बाँधे रहती हैं। ज़रा-सी दरक आई नहीं कि यादों का सैलाब आ जाता है।
दो
ओल्ड हॉस्टल के बाहर गोलंबर है। गोलंबर के एक तरफ़ की सड़क ज्योति कुंज को जाती है, तो दूसरी तरफ़ की डायमंड जुबली हॉस्टल। ज्योति कुंज की तरफ़ जाती सड़क पर एमबीबीएस कर रही लड़कियों के छात्रावास की खिड़कियाँ खुलती हैं। सीपीएमटी और पीएमटी की नाकामी से थक बीएससी और बीए कर रही लड़कियों को ये खिड़कियाँ ज़्यादा रास नहीं आतीं। हर शाम को लड़कियों का जमावड़ा गोलंबर और उसके फव्वारे के इर्द-गिर्द हो जाता है। यहीं पर बहुतों को अपनी कॉल लगने का इंतज़ार रहता है, तो कुछ को दूसरों की कॉल पर पैनी निगाह रखने का काम फ़ेवरिट टाइम पास है।
कॉल बोलें तो पर्ची पर लिखा हुआ नाम, जिसे छात्रावास में कार्यरत स्त्री, जिन्हें हम मौसी जी बोला करते, हॉस्टल के अंदर आकर ज़ोर से पुकारा करतीं। मोबाइल स्क्रीन के अभाव में सबकी दिलचस्पी वास्तविक दृश्यों में हुआ करती थी। महिला महाविद्यालय में जाते ही सबका परिचय पीएमटी यानी पिया मिलन ट्री से अपने आप हो जाता था। पीएमटी शायद रस्किन बॉन्ड के ‘बनयान ट्री’ की तरह ही बरगद का विशालकाय वृक्ष था, जिसके नीचे शाम को जोड़े बैठे मिलते थे। हमारा पाँच-छह सहेलियों का समूह था, जो एक ख़ास जोड़े को चूमा-चाटी करते देख गाने लगता था—‘आग भड़की है सरेशाम कि जलता है बदन।’ पहले हम लोग छिपकर गाते थे, पर बाद के दिनों में बरज़ोरी कर सामने से गाने लगे।
वह जोड़ा शरीफ़ था, हमें नादान समझकर माफ़ करता रहा।
तीन
ओल्ड हॉस्टल की मैट्रन थीं रानी मैडम। एक स्नेहिल और नेकदिल पंजाबी स्त्री, जिनका फ़्लैट हॉस्टल के पहले तल पर था और हमारा रूम ठीक उनके बग़ल में। याद आता है कि हमारे रूम ठीक-ठाक बड़े थे, जिनमें चार तख़्त और चार-चार अदद मेज़-कुर्सियों के बाद भी नीचे दरी पर महफ़िल जमाने की पूरी जगह बनती थी। संडे को दिव्य नूडल्स और आलू की रसेदार तरकारी भी इसी जगह पर हीटर पर बना करती। रानी मैडम के पास अक्सर छात्रावास के चौकीदार का आना-जाना होता था, जो एक गोरा-चिट्टा नौजवान था। उसका नाम मेरी दोस्त सोनी सिंह ने गबरू जवान रखा था और उसका वही नाम चल निकला था। आज याद करने पर भी उसका असली नाम याद नहीं आ रहा। यह गबरू जवान हर सुबह रानी मैडम के घर का दूध भी बाल्टे में लाता था। उसके बाल्टे की आवाज़ से ही हमें उसके आने की ख़बर मिल जाया करती थी। एकाध बंगाली लड़कियाँ उसको बांग्ला में छेड़तीं, पर वह नज़रें झुकाए, चेहरा लाल किए चुपचाप निकल जाता।
एक दिन गबरू जवान शायद हड़बड़ी में था। उसने रानी मैडम की कुंडी एक से ज़्यादा बार खटका दी, तो अंदर से मैडम की झल्लाती हुई आवाज़ आई, “नहाने दोगे कि नंगी ही चली आऊँ!” आवाज़ की झल्लाहट लड़कियों के लिए चटपटी ख़बर बन गई और शाम तक उसका प्रसारण चारों दिशाओं में हो गया। अब कुंडी के पहले ही खटके पर अज्ञात दिशाओं से आवाज़ें आने लगतीं कि “नहाने दोगे कि नंगी ही चली आऊँ!”
चार
पापा ओल्ड हॉस्टल के बाहर छोड़कर चले गए। बड़े उत्साह से बीए ऑनर्स पॉलिटिकल साइंस में प्रवेश लिया था। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को देख पाँव ज़मीन पर पड़ने को तैयार नहीं थे। दुनिया फ़तह कर लेने का इरादा था। अपना स्कर्ट-टॉप पहनकर निकली ही थी कि पता चला छात्रावास में एक महीने का रैगिंग पीरियड है और उस दौरान सलवार-कुर्ता और दुपट्टा पहनना है, वो भी तीन अलग रंगों का। मेरे लिए यह ख़ासा मुश्किल भरा काम हो गया, क्योंकि मेरे पास एक भी सलवार सूट नहीं था। ऐसे में रूम की सीनियर ने ही अपने सूटों की मैचिंग बिगाड़कर मुझे रैगिंग पीरियड की पोशाक मुहैया कराई।
लाइब्रेरी और कैंपस घूमने का सारा उत्साह काफ़ूर हो गया और तरबियत ऐसी हो गई कि यथासंभव अपने रूम से बाहर ही न निकलो, क्योंकि कहीं भी कोई सीनियर दिख जाए, तो नब्बे डिग्री के कोण पर झुककर बोलना था, “बीएचयू की हसीन वादियों में बीएचयू की हसीन शहजादियों को बांदी का सलाम क़ुबूल हो।” और बामुलाहिज़ा, यह क़ुबूल हो, क़ुबूल तब तक बोलते रहना था, जब तक कि सीनियर ‘क़ुबूल है’ न बोल दे। कई बार कुछ सीनियर्स मज़े लेने के लिए ‘क़ुबूल है’ बोलती ही न थीं।
ख़ैर, इसी दौरान सीनियर्स से अच्छा परिचय हो जाता था। यह रैगिंग मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में होने वाली ख़तरनाक रैगिंग से बहुत अलग थी, पर कुछ छात्राओं के लिए इसको भी झेल पाना मुश्किल होता था। पर जो लड़की हिम्मत दिखा देती, वह सीनियर्स की दुलारी भी हो जाती।
रैगिंग की एक रात दस-बारह सीनियर्स के हुजूम ने जूनियर्स को घेर रखा था। सुवर्णा बैनर्जी ने ख़ुद को दिखाकर कहा कि मेरे चेहरे की तारीफ़ करो। चेहरे में बताने के लिए बहुत कुछ था, पर जूनियर ने शुरुआत उनकी भौंह से की और कहा कि “समझ नहीं आता कि आपकी भौंहें ज़्यादा कँटीली हैं या लिंबाराम का धनुष।” बताते चलें कि लिंबाराम उन दिनों तीरंदाज़ी में अपना नाम कर रहे थे। सीनियर यह तुलना सुनकर गदगद हो गईं और जूनियर को रैगिंग से हमेशा के लिए फ़ुर्सत तो मिली ही, उनसे दोस्ती की सौग़ात भी बोनस में हासिल हुई।
पर सारी रैगिंग इतनी मीठी नहीं होती। कई बार कुछ लड़कियों को इससे भयंकर मानसिक यंत्रणा भी होती। ग़नीमत है कि अब विश्वविद्यालय परिसरों में किसी भी तरह की रैगिंग प्रतिबंधित है और इसे दंडनीय अपराध माना गया है।
पाँच
स्वतंत्रता भवन यानी बीएचयू का ऐतिहासिक सभागार। यह सभागार युवा महोत्सव के दौरान खचाखच भरा हुआ था। प्रस्तुतियों के दौरान बीच में जब अनवरत तालियाँ और सीटियाँ बजने लगतीं, तो मान लिया जाता कि दर्शकों को प्रस्तुति पसंद नहीं आ रही। कवि सम्मेलन के दौरान एक छात्रा की कविता की पंक्ति थी, “वो देखो चला जा रहा है, वो देखो चला जा रहा है।” सारे लड़के खड़े हो गए और एक लड़के को यूँ ही पकड़कर समवेत स्वर में जवाबी कविता करने लगे, “नहीं जाने देंगे, नहीं जाने देंगे।”
ऐसे ही गायन के कार्यक्रम में किसी लड़के ने ख़ूब भावविभोर होकर आँधी फ़िल्म का गाना शुरू किया, “तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं, शिकवा नहीं।” इसी में आगे एक पंक्ति आई, “तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं...” श्रोताओं के बीच से एक सज्जन उठ खड़े हुए और बुलंद आवाज़ में कहा, “काहे चाँद तोहरे बाऊ क हव जे ना डूबी?” उसके बाद स्वतंत्रता भवन में जो ठहाके लगे, उसमें गायन संध्या पूरी तरह डूब गई।
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जारी...
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