Font by Mehr Nastaliq Web

‘कोर्ट मार्शल’ की सवर्ण सीमा : जब दलित बोलने लगे तो नाटक ख़त्म हो जाता है

चंडीगढ़ आने के कुछ साल बाद मेरी माँ की क़रीबी दोस्त वहाँ अपने ननिहाल आईं तो मुझे भी अपनी मौसी के घर ले गईं। बुज़ुर्ग मौसी ने बड़े स्टाइल से दोपहर का भोजन कराया। कई स्वादिष्ट सब्ज़ियाँ और अचार थे। नौकर गरमागरम रोटियाँ परोस रहा था। खाने की मेज़ पर हर परिवार के प्रिय विषय ‘कुँवारों की शादी’ पर बात होने लगी। अचानक मौसी ने मुझसे पूछा, “कास्ट क्या है, तुम्हारी?” मैं जवाब देने के लिए मुँह खोल पाती उससे पहले ही माँ की क़रीबी सहेली ने सकपकाकर अपनी मौसी से अँग्रेज़ी में कहा, “आई डोंट बिलीव इन कास्ट। हाउ डज़ कास्ट मैटर? हम ऐसे परिवार में शादी नहीं करेंगे, जो ऐसा सोचता हो। ये सब बकवास है।”

मौसी पत्थर की मूर्ति की तरह अपनी भांजी को देखती रह गईं। उन्होंने शक भरी नज़रें मुझ पर डाली, शायद मेरी अनकही या अनबताई जाति का हिसाब लगाने के लिए।

माँ की उस सहेली के लिए मेरे मन में सम्मान है जो अपनी बुज़ुर्ग मौसी की तरफ़ से शर्मिंदा महसूस कर रही थीं और जिन्होंने इस तरह उनको और कुछ भी बोलने से रोक दिया भले ही परंपरा में इसे उनकी बदतमीज़ी समझा जाता। इसके बावजूद उन्होंने मुझसे सीधे पूछे गए सवाल का जवाब देने का मेरा अधिकार और अवसर छीन लिया। यह मुझे अखरा। वह बिना मेरे मनोनयन के मेरी चयनित प्रतिनिधि बन गईं, मानो मैं किसी भी चुनौती का सामना करने में और एक सीधे सवाल का सीधा जवाब देने में अक्षम हूँ। मेरी तरफ़ से और मेरी जाति से उत्पन्न उनकी शर्मिंदगी मुझे शर्मिंदा करती है, जो समाज के सवर्ण लोगों द्वारा बनाई जाति-व्यवस्था में उनकी अपनी प्रगतिशील समूह की सदस्यता की सीमा को दर्शाती है।

मैं उनको यह सब नहीं बता पाई, क्योंकि मैं जानती हूँ उनका इरादा नेक था और वह वास्तव में मुझे पसंद करती हैं। यही अपनों द्वारा दर्शायी ‘नेक इरादे’ वाली भावना मुझे परेशान करती है। दलितों की रूढ़ भाषा में कहूँ तो इससे मुझे चिढ़ है।

स्वदेश दीपक का नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ पढ़ते हुए यही दृश्य मेरे मन मैं कौंधता, मुझे बींधता रहा। संगीत नाटक अकादमी से सम्मानित हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक-नाटककार स्वदेश दीपक के नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ का कई बार मंचन हो चुका है। रंजीत कपूर के निर्देशन में श्रीराम सेंटर, नई दिल्ली में जनवरी 1991 के बाद अरविंद गौड़ के निर्देशन में ‘अस्मिता थिएटर ग्रुप’ ने भारत भर में इस नाटक का 450 से भी अधिक बार मंचन किया। सौरभ श्रीवास्तव ने 2020 में इस पर आधारित फ़िल्म भी बनाई है, जिसे Zee 5 ने 6 मई 2020 को रिलीज़ किया। लेखक स्वदेश दीपक के कथनानुसार ‘कोर्ट मार्शल’ एक भयानक और क्रूर नाटक है। निर्देशक रंजीत कपूर के मुताबिक़ यह नाटक रेलेवेंट और चैलेंज देने वाला है।

नाट्य निर्देशक नीलम मानसिंह चौधरी का कहना है कि यह नाटक नस्लवाद, अन्याय और इंसानियत के मुद्दे उठाता है, जो कि भारतीय समाज की असली तस्वीर है, इसके जाति आधारित सामंतवाद से रूबरू कराता है। उनके अनुसार यह नाटक उनसे बात करता है। इस नाटक की ज़बान साफ़ और सीधी है, जो उन्हें डरावनी लगती है। ऐसा उन्होंने नाटक की प्रशंसा में कहा है। जैसा कि वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कोर्ट मार्शल के द्वितीय संस्करण (2024) के ‘कोर्ट मार्शल की प्रशंसा’ शीर्षक अध्याय में लिखा गया है।

‘पीपली लाइव’ के सह-निर्देशक और चर्चित पुस्तक ‘तिहाड़ के खिलाड़ी—एक जेल संस्मरण’ के लेखक महमूद फ़ारूकी ने 28 अक्टूबर 2016 को तिहाड़ जेल में आयोजित दीवाली मेला समारोह के दौरान ‘कोर्ट मार्शल’ का मंचन किया। इस प्रस्तुति की विशेषता यह थी कि नाटक में अभिनय तिहाड़ जेल के बंदियों ने किया था। लगभग 500 बंदियों ने इस नाट्य प्रस्तुति को देखा। बंदियों द्वारा प्रस्तुत इस प्रभावशाली मंचन को दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से भी ख़ूब सराहना और प्रशंसा मिली। यह आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि इसने जेल की चहारदीवारी के भीतर कला, रंगमंच और मानवीय संवेदनाओं की संभावनाओं को भी रेखांकित किया। सब प्रशंसकों के अनुसार ‘कोर्ट मार्शल’ जैसे गंभीर और सामाजिक सरोकारों से जुड़े नाटक का बंदियों द्वारा मंचन इस बात का महत्त्वपूर्ण उदाहरण था कि रंगमंच किस प्रकार कारागार जैसे कठोर वातावरण में भी आत्माभिव्यक्ति, आत्ममंथन और सामाजिक चेतना का माध्यम बन सकता है।

इन सब कारणों से मैंने हाल ही में हिंदी-जगत के इस अत्यंत लोकप्रिय नाटक को कई बार पढ़ा और बेचैन रही। रंग-समीक्षक अजित राय ने इस नाटक की प्रशंसा करते हुए कहा है कि यह नाटक सिर्फ़ एक नाटक भर नहीं है, यह भारतीय समाज की जलती हुई सच्चाई है। वह यह भी कहते हैं कि भारतीय सेना इकलौता सरकारी संस्थान है, जहाँ जाति आधारित आरक्षण की अनुमति नहीं है, ‘कोर्ट मार्शल’ प्राकृतिक और क़ानूनी न्याय के मेल को पेश करता है; जो न सिर्फ़ भारतीय सेना, बल्कि पूरे भारतीय समाज की सच्चाई है और वह यह है कि अपनी सभी योगताओं के बावजूद, एक व्यक्ति को प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, क्योंकि उसकी निचली-जाति का मूल न सिर्फ़ एक सामाजिक हिंसा है, बल्कि इंसानियत के ख़िलाफ़ अपराध भी है। यह ‘कोर्ट मार्शल की प्रशंसा’ में लिखा गया है।

यह एक दलित सैनिक रामचंदर के लगातार जाति के आधार पर उत्पीड़न और उसे बर्दाश्त न कर पाने के कारण एक सैनिक अधिकारी की हत्या की कहानी कहता है। उसी रामचंदर पर मुक़दमा चलाने के लिए कोर्ट मार्शल बैठा है।

‘कोर्ट मार्शल’ की कहानी सेना के एक जवान रामचंदर के इर्द-गिर्द घूमती है। रामचंदर पर अपने वरिष्ठ अधिकारी कैप्टन बी.डी. कपूर को घायल करने और दूसरे अधिकारी की हत्या करने का आरोप है। इसके लिए उसका कोर्ट मार्शल किया जाता है। मुक़दमे की कार्यवाही के दौरान शुरू में ऐसा लगता है कि रामचंदर ने गंभीर अपराध किया है और उसे सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन जैसे-जैसे पूछताछ आगे बढ़ती है, साफ़ होने लगता है कि वरिष्ठ अधिकारी रामचंदर को जाति के आधार पर अपमानित और प्रताड़ित किया करते थे। उसके साथ लगातार भेदभाव होता था और उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर उसे नीचा दिखाया जाता था। कैप्टन बी.डी. कपूर के व्यवहार से यह स्पष्ट होता है कि सेना जैसी अनुशासित संस्था के भीतर भी समाज में मौजूद जातिगत पूर्वग्रह समाप्त नहीं हुए हैं। मुक़दमे में बचाव पक्ष के वकील कैप्टन बिकाश राय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वह केवल यह नहीं देखते कि रामचंदर ने हत्या की या नहीं, बल्कि यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि उसे उस स्थिति तक पहुँचाने वाली परिस्थितियाँ क्या थीं। धीरे-धीरे अदालत के सामने अपराध के पीछे छिपा सामाजिक अन्याय सामने आता है। बचाव पक्ष की जो दलील उसे बचा सकती थी, रामचंदर उसे ठुकरा देता है... वह सिर नीचा किए अपराध क़ुबूलता है और अंततः उसे फाँसी की सज़ा होती है।

‘कोर्ट मार्शल’ में स्वदेश दीपक ने सेना के इस रूप का प्रभावशाली चित्रण किया है और सेना के नियमों और कामों का वर्णन भी सशक्त है। नाटक जटिल है, इसमें व्यवस्था के कई पहलू मिश्रित हैं। यह कोर्ट मार्शल के सभी नियम भी बताता है और उसमें फ़ैसलों के घिनौने कारणों का रहस्योद्घाटन भी करता है।

इस नाटक के किरदारों में सिर्फ़ रामचंदर ही दलित है, बाक़ी सब सवर्ण हैं। रामचंदर का वकील भी सवर्ण है। वह एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति है। रामचंदर के साथ जिन्होंने दुर्व्यवहार किया, उन लोगों से उसे इस हद तक नफ़रत है कि वह अभियोग पक्ष के वकील से हाथ मिलाने तक से इनकार कर देता है जो कि पेशेवरों के बीच सामान्य शिष्टाचार होता है।

फिर भी यह नाटक पढ़ने के बाद मुझे बुज़ुर्ग मौसी के घर पर हुई घटना बरबस क्यों याद आती रही?

नाटक में बहुत कुछ होने के बावजूद ऐसा क्यूँ लगता रहा कि लेखक अपनी सवर्ण मानसिकता की सीमा को लाँघ नहीं पाया है। बेहतरीन साहित्य रचने वाले भी अपनी संवेदना की सीमाओं के चलते रचना-प्रक्रिया में वंचितों और दलितों के साथ अनजाने में ही कैसा अन्याय कर जाते हैं, ‘कोर्ट मार्शल’ नाटक इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। नाटक के शुरू में ही यह सीमा प्रकट होने लगती है।

“प्रकाश-वृत्त रामचंदर पर। उसकी गर्दन झुककर नीचे ठोड़ी, लगभग छाती को छूती हुई। उसकी आँखें नीची, क्योंकि वह जानता है कि कोर्ट-कमरे में बैठे सब लोगों की आँखें उस पर जमी हुई हैं।”

नाटक के प्रारंभ में नाटक का केंद्रीय पात्र रामचंदर क्यों गर्दन झुकाकर और नज़रें नीची करके बैठा है! उसे ख़ुद को ही अपराधी महसूस कराने की मुद्रा में क्यों बिठाया गया है? एक तो पूरे नाटक में उसे कुछ नहीं बोलना है। अगर उसने असहनशील उत्पीड़न का बदला लिया है और यह कथित ‘अपराध’ उसे स्वीकार है तो कम से कम वह नज़र उठाकर उनको चुनौती तो दे सकता है जो उस पर मुक़दमा चला रहे हैं या वह नज़रें झुकाकर विद्रूप मुस्कान के साथ ख़ुद को उस व्यवस्था के हवाले कर सकता है, जिसने उसे हत्या करने पर मजबूर कर दिया। नाटककार इस हत्या को भी हत्यारे की चेतना के आलोक में देख नहीं पा रहा।

मैंने इस नाटक का मंचन नहीं देखा है, पर किताब के मुताबिक़ लेखक स्वदेश दीपक की सहमति से नाटक के निर्देशक कह रहे हैं कि “रोकर बदल दो इस हत्या को सामाजिक वध में।”

पहली बात, क्या यह सामाजिक वध है या एक राजनीतिक बयान? मान लेते हैं कि सामाजिक वध ही है तो भी ऐसा करने वाले कभी नज़र झुकाया नहीं करते। ख़ासकर लेखक अगर कहे रहे हैं कि इसको सामाजिक वध का रूप दो तो रामचंदर दलित का, उस जाति समूह का और उस प्रताड़ित वर्ग का प्रतिनिधि बन गया है। उसने एक प्रतिनिधि के तौर पर हत्या की है और ऐसा प्रतिनिधि जब भी इस तरह का काम करेगा तो गर्दन उठाकर और नज़र मिलाकर करेगा। वह प्रतिनिधि के रूप में व्यवस्था से ऊपर उठ गया है। उसकी पहुँच से बाहर निकल गया है, व्यवस्था उसके प्राण हर सकती है, उसकी चेतना को विचलित नहीं कर सकती। वह क्रिया में समान हो गया है।

रामचंदर ने व्यवस्था की परवाह नहीं की, जबकि वह भी सेना में है और उसे भी पता है इस क्रिया/हत्या का नतीजा क्या होगा। उस नतीजे की परवाह न करते हुए भी उसने हत्या की। उसने तो अपने बचाव-पक्ष के वकील के इस तर्क को भी ठुकरा दिया कि गार्ड ड्यूटी पर उसके ‘थम,कौन है!’ का जवाब न देकर हंताओं ने उसे हत्या का हक़ दे दिया था। इसका परिणाम जो भी होगा वह उसे भुगतने को तैयार है। तो ऐसे में वह नज़र झुकाकर क्यों बैठा है? वह शर्मिंदा तो नहीं है? उसके पास और कोई रास्ता नहीं छोड़ा उन लोगों ने जो न सिर्फ़ उसको, बल्कि उसकी माँ के बारे में भी असहनीय अपमानजनक बातें कहते रहे। उसके अंदर इसी जाति-व्यवस्था ने क्रोध का यह उबलता लावा भर दिया, यह तो नाटक प्रभावकारिता से बता रहा है तो फिर नाटककार उसकी नज़र क्यों झुकवा रहा है? नाटक के किरदार बताते हैं कि उसे ‘चिट्टा चमार, चूहड़ा, भंगी, ओये हरिजन, ओये चूहड़े दे पुत्तर’ कहा जाता था और यह भी कहा गया कि उसकी माँ जाने कितनों के साथ संबंध में रही।

“बिकाश राय : (चीख़कर) क्या गाली दी थी? बोलो रामचंदर, बोलो। तुमने सच बोलने की शपथ ली है।

रामचंदर : (चीख़ते हए) चिट्टे चूहड़े! हराम की सट्ट! तेरी माँ ज़रूर किसी कपूर या वर्मा के साथ सोई होगी!”

यही नहीं रामचंदर को और उसके पुरखों को सबके सामने अपमानित भी किया।

“बलवान सिंह : सर! एक दिन अति हो गई।

बिकाश राय : कौन-सी अति हो गई!

बलवान सिंह : एक दिन कैप्टन साहब के घर कुछ मेहमान आए हुए थे। ड्रॉइंगरुम में ही एक छोटी बच्ची ने पॉटी कर दी। कैप्टन साहब ने रामचंदर को पॉटी साफ़ करने के लिए कहा। उसने इनकार कर दिया।

बिकाश राय : देसी भाषा में बताएँ। पॉटी-मतलब?

बलवान सिंह : (ग़ुस्सैल आवाज़ में) टट्टी! रामचंदर ने साहब की बच्ची की टट्टी उठाने से इनकार कर दिया। कैप्टन कपूर ने सब मेहमानों के सामने उसे कहा—जात का चूहड़ा और टट्टी उठाने में शर्म आती है! तुम्हारे पुरखे पुश्तों से हम लोगों की टट्टी की टोकरी सिर पर उठा रहे हैं (उसकी आवाज़ काँप उठती है)।”

रामचंदर के प्रति कथित उच्च जातियों का यह रवैया रहा। ऐसे में यह स्वाभाविक था कि उसके भीतर क्रोध पनपता ही रहा। फिर यह सवर्ण मानसिकता ही उसे नज़र उठाने नहीं देती!

“गर्दन अहंकार से अकड़ी हुई। वर्दी पर दाईं ओर लगी नेमप्लेट नाम-पट्टी पर प्रकाश—बी.डी. कपूर। यह अफ़सर किसी विजेता की मुद्रा में बैठा है।”

मेरी आपत्ति का दूसरा बिंदु : लेखक ने उत्पीड़क (बी.डी. कपूर) का चित्रण एक अहंकारी, यौन उत्पीड़क और उत्तेजित/उत्तेजक व्यक्ति के रूप में किया है। यह उसकी विकृत मानसिकता का द्योतक है। उत्पीड़क को हर कोण से नैतिक रूप से निकृष्ट बनाना क्यों ज़रूरी था? क्या नैतिक तौर पर पतित व्यक्ति, जो अपनी बीवी को मारता हो, गाली देता हो, भ्रष्ट हो, परपीड़क हो वही जातिवादी होता है? क्या सौम्य स्वभाव का व्यक्ति, ईमानदार, अनुरागशील पुरुष या स्त्री या उनकी संतान जातिवादी नहीं होते या नहीं हो सकते हैं? क्या यह अतिरंजना नाटक में ज़रूरी थी? हिंदी फ़िल्मों की विलेन की धारणा से मेल खाता यह चरित्र क्या गंभीर साहित्यकार के रुतबे के अनुकूल है? सबको अहंकार भाव से तंग करना और किसी को जाति, नस्ल, जेंडर के आधार पर तंग करना—ये दो अलग चीज़ें हैं।

मेरी आपत्ति का तीसरा बिंदु : आख़िर तक आते-आते रामचंदर फूट-फूट कर रोने लगता है।

“उसकी चीख़ अब किसी घायल जानवर के आर्तनाद में बदल जाती है। वह धीरे-धीरे नीचे झुकता है, बैठता है और उसका सिर लगभग फ़र्श के साथ जा लगता है। वह रोए जा रहा है। ऊँची आवाज़ में। कुछ क्षणों के लिए जैसे सबके चेहरे पथरा जाते है।”

चिनुआ अचेबे ने अपने ‘अफ़्रीका की एक छवि : कॉनरैड की हार्ट ऑफ़ डार्कनेस में नस्लवाद’ में कहा है कि “उसने तो कालों को भाषा ही नहीं दी, ज़ुबान ही नहीं दी, उनको बोलने का अधिकार नहीं दिया।” ठीक यही स्थिति रामचंदर की है। उसे बोलने का कोई अधिकार नहीं है, वह सिर्फ़ रो सकता है।

रोना आ सकता है। स्वाभाविक है। लेकिन रोने के बाद रामचंदर किसी तरह यह भी साफ़ कर सकता था कि वह इसलिए कुछ कहना नहीं चाहता, क्योंकि वह जानता है किसी को उसकी बात समझ में नहीं आएगी। ‘लोग मुझे यही कहेंगे कि और भी तरीक़े थे उससे निपटने के, उसकी शिकायत करते, ये करते वो करते...’ यह वह सीधे दर्शकों से भी कह सकता था, जज से या अभियोग लगाने वालों से कह सकता था, ख़ुद से कह सकता था, एकालाप या स्वभाषण हो सकता था, खिड़की के रास्ते कोई इशारा होता, किसी स्टाइलिस्टिक ढंग से बात कही जा सकती थी। नाटक में अपनी बात कहने की कई युक्तियाँ होती हैं। लेकिन वे सब लेखक के हाथों में होती हैं।

नाटक साफ़ तौर पर बताता है कि उसने जाति के आधार पर अपने इस उत्पीड़न की शिकायत नहीं की थी। अब लोग गवाही दे रहे हैं तो सच सामने आ रहा है। अब भी वह ख़ुद कुछ नहीं बता रहा है, सफ़ाई भी नहीं दे रहा है। चुपचाप जुर्म क़ुबूल करके खड़ा हुआ है। अगर उसे इस व्यवस्था से उम्मीद ही नहीं है तो वह व्यवस्था की आँखों में आँखें गाड़ कर कह सकता था कि मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, मेरी नज़रें क्यूँ झुकें? नज़रें तो तुम्हारी झुकनी चाहिए। वह शब्दों में न कहता, उसकी तनी पीठ कह सकती थी, गर्वोन्मत्त चेहरा, निडर आँखें, व्यंग्यात्मक मुस्कान... ये सब जतला सकते थे। भाव-भंगिमा दयनीय और ध्वनि निकले तो रुदन!

प्रकाशित नाटक के परिचय में ख़ुद स्वदेश दीपक ने बताया है, “31 दिसंबर। केंद्रीय पात्र ‘क़ातिल’ रामचंदर पर सबसे बड़ा प्रतिबंध कि उसके पास अपने बचाव में बोलने को एक भी संवाद नहीं। और मात्र एक छोटे-से दृश्य से उसे बदलनी है दर्शकों की सहानुभूति-धारा और जघन्य अपराध हत्या को बिल्कुल नया मोड़ देना है। गवाही के समय अनुशासित रुदन।”

यह है मक़सद : सहानुभूति-धारा को प्रवाहित करवाना। नेक इरादे वाले इससे आगे नहीं बढ़ते। इस नाटक में दया-भाव है, अनुकंपा है। इस नाटक में जाति है, जातिगत उत्पीड़न है, दलित-पीड़ा है, लेकिन दलित-चेतना नहीं है।

स्वदेश दीपक ने नाटक की क्रिया में रामचंदर के स्वाभिमान के चित्रण की सिर्फ़ एक कोशिश की है और वह है उसका हत्या को सीधे क़ुबूल करना। अन्यथा उसके चित्रण में वेदना ही प्रमुख रूप से व्यक्त हुई है। वह जातीय उत्पीड़न का कभी विरोध नहीं करता, दूसरों को बुरा लगता है... वे उसके तबादले की कोशिश करते हैं, लेकिन केंद्रीय चरित्र होकर भी रामचंदर उफ़् तक नहीं करता। लगता है जैसे वह अभिजात्य वर्ग की दया का याचक हो। लेखक ने न तो रामचंदर के हक़ की बात उठाई है, न ही स्वाभिमान की बात की है।

इस कोर्ट मार्शल के अध्यक्ष सूरत सिंह हैं। अब नाटक का पटाक्षेप देखें :

“सूरत सिंह : रामचंदर आज रात तुम मेरे मेहमान होगे। आओगे न पार्टी में।

रामचंदर : (भावुक आवाज़ में) आऊँगा सर! ज़रूर आऊँगा।

कपूर : काँग्रेटस फ़ॉर योअर प्रमोशन टु ब्रिगेडियर!

सूरत सिंह : (उसे और उसके बढ़े हुए हाथ को घूरते हुए) तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे हाथ मिलाने की। गेट लॉस्ट। डॉन्ट शो मी योअर डर्टी फ़ेस एवर इन लाइफ़। कपूर का हाथ नीचे झुका, गर्दन नीची झुकी, फिर वह मुर्दा चाल से मंच के बाहर निकल जाता है। सूरत सिंह मेज़ से दो गिलास उठाता है। रामचंदर के पास आकर रुकता है। तभी बाहर से गोली चलने की आवाज़ आती है। सब लोग लगभग भागकर गार्ड के पीछे-पीछे बाहर जाते हैं।

रामचंदर : सर, बाहर कुछ हुआ है... मैं देखकर आऊँ सर!

सूरत सिंह : मैं जानता हूँ जो कुछ हुआ है। पोएटिक जस्टिस।

रामचंदर : मैं समझा नहीं सर!

सूरत सिंह : जब दुनिया की अदालत इंसाफ़ न कर सके, तो कभी-कभी ऊपरवाला इंसाफ़ कर देता है। (गिलास उसकी तरफ़ बढ़ाकर) लो एक ड्रिंक लो।

रामचंदर : सर, मैं शराब नहीं पीता सर!

गार्ड : सर! कैप्टन कपूर ने अपने को गोली मार ली। ख़ुदकुशी कर ली।

सूरत सिंह : रामचंदर, तुम्हें मौत से डर लगता है?

रामचंदर : नहीं सर, रामचंदर किसी से नहीं डरता।

सूरत सिंह : मैं कल सुबह तुम्हें सज़ा-ए-मौत दे रहा हूँ। तुम्हें देने के लिए मेरे पास सिवाय मृत्युदंड के और कुछ नहीं।

रामचंदर : (सीना तानकर) आप जो देंगे, सिर-आँखों पर, सर!

सूरत सिंह : (गिलास उसे देता है) क्या अब भी नहीं पीओगे! आख़िरी जाम मेरे साथ।

रामचंदर : (गद्गद् भाव से) पीऊँगा सर! ज़रूर पीऊँगा! थैंक्यू सर!

सूरत सिंह उसके गिलास से अपना गिलास टकराता है। रामचंदर एक घूँट में गिलास ख़ाली कर देता है।

सूरत सिंह : थैंक्यू रामचंदर!

(पर्दा गिरता है।)”

जैसा कि बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ने अपने मशहूर नाटक ‘द एक्सेप्शन एंड द रूल’ (1930) में कहा है : “क्योंकि उन्होंने जो सिस्टम बनाया हैं, उसमें इंसानियत एक अपवाद है। अगर आप इंसानियत वाला काम करते हैं, तो आपको सज़ा मिलती है।”

मेरी आपत्ति का चौथा बिंदु : जब वह पार्टी होती है और रामचंदर को उसमें आमंत्रित किया जाता है। जज सूरत सिंह, जो उसे फाँसी की सज़ा सुनाने वाला है, निजी जगह (स्पेस) में रामचंदर की प्रशंसा कर रहा है, वह उसकी प्रताड़ना पर सहानुभूति जता रहा है, रामचंदर से हाथ मिला रहा है और ज़िंदगी का पहला और आख़िरी जाम पिला रहा है। यह दिख रहा है कि वह रामचंदर से निजी स्पेस में माफ़ी माँग रहा है। दिख रहा है कि वह कह रहा है कि मैं तुम्हारी बात समझ सकता हूँ और मेरी नज़र में तुम मेरे बराबर हो, मैं तुमसे हाथ मिला रहा हूँ, जाम पिला रहा हूँ। पर वह जज सार्वजनिक स्थान पर स्टैंड नहीं ले सकता है। उसमें हिम्मत ही नहीं है; जबकि उसके पास अथॉरिटी/ताक़त है, लेकिन वह अपराध को कम आँकना ही नहीं चाहता और न ही उसकी सज़ा कम करता है। शायद उसके पीछे उस प्रमोशन वाले फ़ोन-कॉल की भूमिका रही होगी, जो कुछ देर पहले उसे आया था। व्यवस्था की यही ताक़त है और इसे लेखक ने बहुत अच्छे से दिखाया है कि इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए रामचंदर की बलि लेना ज़रूरी है... और बलि लेने वाला एक तरीक़े से माफ़ी माँग रहा है कि चलो तुम्हारा सिर क़लम करना है, पर फिर भी मुझे माफ़ कर दो मरने से पहले। व्यवस्था के अंदर के लोगों को कुछ एहसास तो हो रहा है।

रामचंदर की बलि ज़रूरी है, यह बिंदु लेखक ने बड़े अच्छे से दिखाया है और उस ज़रूरत को सूरत सिंह के परिवार के बलि लेने के इतिहास से बहुत अच्छे से जोड़ा भी है। लेकिन यह नाटक और भी प्रभावशाली तब बनता, जब केंद्रीय पात्र रामचंदर कुछ कहता। यह व्यवस्था इतनी मज़बूत है कहना और दर्शाना लेखक का मक़सद नहीं है न, लेखक का मक़सद तो इस व्यवस्था के घिनौनेपन को उजागर करना है। फिर भी व्यवस्था पर कोई फ़ैसला वह दलित से नहीं सुनवा रहा है।

अब रामचंदर आज़ाद है, सेना की बंदिश से, उसके पदानुक्रम के अनुशासन से। उसे फाँसी होने वाली है। वह जाम लेने से दृढ़ता से मना भी कर सकता था या रामचंदर हँसकर कह सकता था कि आपके आग्रह पर मैंने जाम ले लिया, पर क्या इससे न्याय हो जाएगा? एक इशारे से ही वह दलित रामचंदर भी अंत में फ़ैसला सुना सकता था। वह कुछ भी कह सकता था। उसके पास अब खोने को बचा ही क्या है? लेकिन वह मौक़ा भी नाटककार ने उससे छीन लिया। बस यहीं पर रामचंदर बोलता है और यहाँ भी वह मातहत नौकर ही रहता है। वह बोलने ही लगा कि नाटक बंदूक़ की गोली की आवाज़ से ख़त्म होने लगा। कपूर ने ख़ुदकुशी कर ली!

ऐसा भी नहीं है कि व्यवस्था ने उसे कुछ दिया नहीं है। वह अच्छा धावक है, व्यवस्था उसे बढ़ावा भी दे रही है। उसकी ख़ुराक का भी इंतज़ाम किया हुआ, क्योंकि उससे मेडल भी मिलने हैं। व्यवस्था का गौरव भी उस पर निर्भर है। नाटक में ये सब भी है। नाटक जटिल है और ये सब दिखाता है। फिर भी नाटक एकदम मौक़े पर हमेशा चूक जाता है, कमज़ोर रह जाता है।

यह जो अंतर्विरोध है कि एक तरफ़ आप निजी स्थान में माफ़ी माँग लेते हैं और सार्वजनिक स्थान पर आप वह नहीं करते हैं जिसकी आपसे अपेक्षा की जाती है, यह क्या जतलाता है? शायद जज नियम से बँधा हो, पर जज सूरत सिंह मान तो सकता था कि ये सब उकसावे में हुआ है। यह नाटक है, यहाँ नियम की बात नहीं है। नाटक एक लेखक की कल्पना है; इसलिए वह इस सीमा को लाँघ सकता था, लेकिन लेखक ऐसा नहीं करता। वह यथार्थ में प्रस्तुत संभावनाओं को तलाश तो सकता ही था, लेकिन नाटककार चूक जाता है।

स्वदेश दीपक का लेखक तो उल्टा रामचंदर को रुलाकर एक स्वाभिमानी व्यक्ति के उसके रूप की हत्या कर देता है। उसके बाद उसे फाँसी हो न हो, क्या फ़र्क़ पड़ता है! यहाँ लेखक रामचंदर को विद्रोही-व्यक्तित्व प्रदान नहीं कर रहा है। रामचंदर शुरू से विद्रोही नहीं है, लेखक ने दिखाया है कि वह नम्रता से और विनीत भाव में जिया है। जैसा कि उसके अफ़सरों ने भी कहा है, “नहीं सर! मारपीट तो दूर, रामचंदर की कभी किसी से बहस तक नहीं हुई। बिल्कुल गऊ आदमी है। रामचंदर हमेशा मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी करता है। उसके ख़िलाफ़ कभी कोई शिकायत नहीं हुई।”

परिस्थितियों के कारण रामचंदर होते-होते विद्रोही हो गया है और इस हद तक कि उसने अपने एक वरिष्ठ अफ़सर की हत्या ही कर दी। तो इस विद्रोह का स्वर नाटक में कहाँ है?

लेखक ने बख़ूबी अपने नाटक में रामचंदर के संबंध में विकासक्रम निभाया—पहला वेदना, दूसरा नकारना, तीसरा विद्रोह। पर फिर एक ही झटके में सारा विकासक्रम धुल गया और यह दिखा दिया कि आज भी यह चाबी सवर्णों के हाथों में है।

और अंत में आततायी कपूर अपनी ज़िल्लत से दुखी होकर ख़ुदकुशी कर लेता है। अगर प्रतीकात्मक रूप से सवर्ण उत्पीड़क की आत्महत्या ही इंसाफ़ है तो व्यवस्था-परिवर्तन की आशा ही फ़ज़ूल है। रामचंदर रोते रहेंगे, फाँसी के फंदे चूमते रहेंगे और कपूर सरीखे उत्पीड़क मर जाएँगे... लेकिन माफ़ी नहीं माँगेंगे।

जातिगत भेदभाव और घिन का प्रभावशाली चित्रण होने के बावजूद स्वदेश दीपक दलितों के अधिकार के हक़ में खड़े नज़र नहीं आते। ‘कोर्ट मार्शल’ दलितों की चेतना को सलाम तो क्या ही करेगा, वह न उसको दिखाता है, न उसका अनुमोदन करता है। दया, करुणा, ख़ामोशी—यह अधिकार की भाषा नहीं है। यह नाटक व्यवस्था की क्रूरता तो दिखाता है, लेकिन उस व्यवस्था के विरुद्ध खड़े मनुष्य की पूर्ण चेतना को आवाज़ नहीं देता।

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट