चेतना के दस द्वीप : प्रयागराज की साहित्यिक विरासत और प्रतिरोध की गूँज
मनीष चौरसिया
29 जनवरी 2026
वरिष्ठ कवि हरिशचंद्र पांडे की अध्यक्षता में मंगलवार, 27 जनवरी को चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय (सीएमपी डिग्री कॉलेज), प्रयागराज के सभागार में कथाकार रणविजय सिंह ‘सत्यकेतु’ द्वारा संपादित काव्य-संकलन ‘चेतना के दस द्वीप’ पर संगत और आखर (साहित्यिक–सांस्कृतिक मंच) के संयुक्त तत्वावधान में परिचर्चा एवं कविता पाठ का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम महज़ एक साहित्यिक विमोचन नहीं, बल्कि ‘साझा विरासत’ और ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ को बचाने की दिशा में एक साहसी ललकार बनकर उभरा। आयोजन का रणनीतिक महत्त्व इस तथ्य से और गहरा हो जाता है कि जहाँ हाल ही में निराला जैसे महाप्राण कवि की जन्मतिथि (23 जनवरी) स्थानीय स्तर पर उपेक्षा का शिकार रही, वहीं यह मंच उस रिक्तता को भरने के संकल्प के साथ खड़ा हुआ।
यह कार्यक्रम प्रयागराज की उस अनूठी परंपरा का उत्सव था जिसे यहाँ के ‘कलमी आम’ (वे साहित्यकार जो बाहर से आकर यहाँ बसे और यहीं की मिट्टी में रच-बस गए) ने सींचा है। इन कवियों ने स्पष्ट किया कि प्रयागराज आज भी हिंदी-साहित्य में प्रतिरोध का वही प्रखर केंद्र है, जो सत्ता के सुविधानुसार गढ़े जा रहे नैरेटिव को चुनौती देने का माद्दा रखता है।
पूरा कार्यक्रम मुख्यतः दो चरणों में बँटा था। कार्यक्रम के पहले चरण में संकलन में शामिल कवियों और प्रतिभागियों द्वारा कविता पाठ किया गया तथा दूसरे चरण में कवि हरिश्चंद्र पांडे की अध्यक्षता में सुधांशु मालवीय, आशुतोष पार्थेश्वर, प्रणय कृष्ण, सरोज सिंह तथा कुमार बीरेंद्र ने वक्ता के तौर पर किताब पर अपनी बात रखी।
कवि अंशु मालवीय ने ‘अवस्थी ट्रंक स्टोर’ और ‘कसूर की घटना’ का पाठ किया। कविता ‘अवस्थी ट्रंक स्टोर’—एक पुराने लोहे के बक्से और उसमें रखी चीज़ों के माध्यम से बचपन, यादों और समय के गुज़रने का वर्णन करती है। ‘कसूर की घटना’—जो 2005 में पाकिस्तान में एक अहमदिया बच्ची की मौत की घटना पर आधारित है, जिसे सुन्नी क़ब्रिस्तान से निकालकर अहमदिया क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया था। यह कविता धर्म, कट्टरता और मानवीय संवेदनाओं के बीच के संघर्ष को दर्शाती है, जिसमें बच्ची के पिता के दर्द और समाज के सवालों को उठाया गया है। कविता में बाबा बुल्ले शाह के पद ‘माटी कुदम करेंदी यार’ का संदर्भ दिया गया है, जो मिट्टी और इंसान के रिश्ते पर आधारित है।
बसंत त्रिपाठी ने ‘युद्ध के बाद जीवन’ और ‘रात बहुत है बाक़ी अभी’ का पाठ किया।
‘युद्ध के बाद जीवन’, यह कविता युद्ध के बाद के जीवन की आशा और पुनरुत्थान को दर्शाती है। कवि युद्ध के विनाश के बाद भी प्रेम, सुंदरता और मानवीय संबंधों को बनाए रखने की इच्छा व्यक्त करता है। ‘रात बहुत बाक़ी है अभी’ यह कविता रात के विभिन्न पहलुओं का वर्णन करती है, जिसमें बेचैनी, अकेलापन और अज्ञात का डर शामिल है। दोनों कविताएँ मानवीय संबंधों की जटिलता और परिवर्तनशीलता को दर्शाती हैं। कवि परिचित और अपरिचित चेहरों के बीच के अंतर को उजागर करता है, और यह सवाल करता है कि क्या हम वास्तव में उन लोगों को जानते हैं जिन्हें हम जानते हैं।
कवि रविकांत ने ‘जीवन भीम पलाशी’ , ‘चमाइन’ और ‘औरंगजेब’ कविता का पाठ किया।
‘जीवन भीम पलाशी’—कविता में कवि ने ख़ुद को लू सहने वाला फट्ठे जैसा कुछ और न बनने की इच्छा व्यक्त की। ‘चमाइन’, कविता में कवि ने अपनी जाति चमार के बारे में बात की, जिसे बचपन में अपमान का कारण बताया गया था। समाज सुधारकों ने इस शब्द को गाली में बदल दिया और अब इसे कहने पर जेल हो सकती है। ‘औरंगजेब’ कविता में कवि ने औरंगजेब के भाई की हत्या के 350 साल बाद सत्ता के लिए फिर से करवट लेने की बात की। औरंगजेब ने दाराशिकोह के गुणों का प्रचार किया और श्री कृष्ण जन्मभूमि को मुक्त कराने की बात कही। कविता में राजनीति और सत्ता के खेल को दर्शाया गया है।
कवि संध्या नवोदिता ने ‘चाँद पर मालिकाना’, ‘आप तो नहीं हैं चूहा’ और ‘देश-देश’ कविता का पाठ किया। ‘चाँद पर मालिकाना’, जिसमें अँधेरे और उजाले के बीच के संबंध को दर्शाया गया है। कवि ने बताया कि कैसे ख़ूबसूरत घर ख़ूबसूरत औरतों की क़ब्रगाह बन जाते हैं। ‘आप तो नहीं हैं चूहा’, जिसमें बताया गया है कि कैसे लोग ख़ुद को चूहा नहीं मानते, लेकिन शेर की निगाह में वे चूहे से ज़्यादा नहीं हैं। यह कविता सत्ता और शक्ति के दुरुपयोग पर कटाक्ष करती है। ‘देश-देश’, जिसमें देश के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया है—उसके खेत, जंगल, नदियाँ, पहाड़, और उसकी पीड़ाएँ। यह कविता देश की वर्तमान स्थिति और उसके इतिहास को भी छूती है। कविता में देश को एक मछुआरे, समंदर, हिमालय, दंडकारण्य और अबूझमाड़ के रूप में चित्रित किया गया है। कविता में देश को लोहे का बस्तर, उड़ीसा के लाल कोयले की आग, टिहरी और मरती गंगा के रूप में भी दर्शाया गया है।
इसके बाद कवि विवेक निराला की अनुपस्थिति में बसंत त्रिपाठी ने उनकी दो छोटी कविताएँ पढ़ीं।
पहली कविता ‘पासवर्ड’, वक्ता ने अपने पूर्वजों की संपत्तिहीनता और अपने पिता के पास एक हारमोनियम होने का उल्लेख किया, जिसके स्वर उनकी निजी संपत्ति थे। वक्ता ने अपनी निजता और सामाजिकता के लंबे पासवर्ड का भी ज़िक्र किया। दूसरी कविता के दो छोटे हिस्से थे। पहले हिस्से का शीर्षक ‘रिक्ति’ था, जिसमें आत्मा के उधड़ने, दिन भर भागने, और तुरपन के लिए सुई-धागे की कमी का वर्णन किया गया था। दूसरे हिस्से में ऋतुओं के पंख फड़फड़ाने, एक साल और उड़ जाने, राग के गाढ़ा होने, और एक खोए हुए स्वर की ख़ाली जगह का ज़िक्र था, जो उदास करती है। इसमें स्वरों की गंभीरता, आलाप में बचा हुआ विलाप और एक छोटे ख़याल के बड़े ख़याल से वंचित होने का भी वर्णन था।
संतोष चतुर्वेदी ने ‘स्टेपनी’ और ‘पिता जी जब छोटे हो जाएँगे’ कविता पढ़ी। कवि ने एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बात की जो अक्सर उपेक्षित होता है, हमेशा पंक्ति में सबसे पीछे खड़ा रहता है और जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। ऐसे लोग जीवन में सबसे पीछे होते हैं, लेकिन जब सभी हार मान लेते हैं, तो अंततः यही काम आते हैं। ‘पिताजी जब छोटे हो जाएँगे’ कविता में एक पिता का अपनी चार साल की बेटी नव्या के साथ बातचीत का वर्णन है। नव्या की बड़ी बहन काव्या पूछती है कि पिता चलते समय हमेशा उनकी उंगली क्यों पकड़ते हैं। नव्या जवाब देती है कि जब पिताजी छोटे हो जाएँगे, तो वे उन्हें अपनी उंगली पकड़कर टहलाएँगी। कवि ने बताया कि यह सुनकर उन्हें लगा कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, माता-पिता छोटे होते जाते हैं। संतोष जी अपनी माँ के निधन के कारण भावुक हो गए और आगे नहीं पढ़ पाए।
कवि अंशुल त्रिपाठी ने दो कविताएँ पढ़ीं। पहली ‘अलगाव’, जिसमें एक सर्द रात में कार के शीशे पर जमी दो लोगों की साँसों की परत का वर्णन है। यह परत न तो वाष्प है और न ही कोहरा, बल्कि कवि के लिए यह बारिशों के गुल की ख़ुशबू है जो दुनियावी कारोबार और उनके बीच एक पर्दा है। कवि पूछता है कि यदि अलग होना ही है, तो इस परत से अपनी साँसें पहचान लो।
दूसरी कविता ‘साधु कन्हाई और सांस्कृतिक केंद्र की एक शाम’ एक मित्र को समर्पित है, जिसने युवावस्था में थिएटर छोड़ दिया था। कविता मित्र की आँखों में कॉकटेल में घुली शाम के नशे और अधूरे सपनों का वर्णन करती है। कवि मित्र से पूछता है कि क्या नदियों का बहना उसे सुकून देता है या परेशान करता है, और क्या उसे अपने लिए न जी पाने की कसक कभी नहीं उठती। मित्र की शिकायत न करने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाया गया है। मित्र की बेपरवाह जीवनशैली का वर्णन किया गया है : बढ़ी हुई दाढ़ी, बिना मोजे के जूते, पुरानी जींस, न घड़ी, न मोबाइल, न पेन। कवि पूछता है कि यह सब किसके लिए है, क्योंकि यह अपने लिए तो नहीं है। कविता में कोर्ट मार्शल के बाद की एक शाम का भी जिक्र है, जब मित्र ने सिगरेट का धुआँ ज़मीन की ओर फेंकते हुए कहा था, “कमली जा रही है डॉक्टर प्रशांत?” कवि को महीनों के रिहर्सल, स्पर्श, पात्र, प्रेम और नाटक सब याद हैं।
इसके बाद शोध छात्रा मनीता यादव ने कवि वाज़दा ख़ान की कविता ‘नफ़रतों का दौर’ का पाठ किया। कविता में आधुनिक युग में बढ़ती नफ़रत और दूरियों को दर्शाया गया है। कविता में चाँद को संबोधित करते हुए कहा गया है कि अब लोग उसे अपनी शाइरी या जीवन में शामिल करने पर विश्वास न करें, क्योंकि उसे कभी भी हटाया जा सकता है। दुनिया हर चीज़ को अलग-अलग करने में लगी है, चाहे वह चाँद हो, धरती हो या पेड़-पौधे। अंत में, कवि ‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ पंक्ति को याद करती हैं, लेकिन अब उन्हें केवल ‘मज़हब सिखाता है आपस में बैर रखना’ की प्रतिध्वनि सुनाई देती है, जो यह दर्शाता है कि कैसे ‘नहीं’ शब्द की हत्या हो गई है।
एम.ए. के छात्र अंकित ने कवि बोधिसत्व की कविता ‘माँ का नाच’ का पाठ किया। कविता में कई स्त्रियाँ खेत या आँगन में नाच रही थीं, विभिन्न रंगों की साड़ियाँ पहने हुए, एक-दूसरे की मदद कर रही थीं। माँ की बारी आने पर, उसने सधे ढंग से नाचना और पुराना गीत गाना शुरू किया, जिससे सभी अचंभित रह गए। माँ के पैरों में बिवाइयाँ थीं, घुटने टूट चुके थे और कमर झुक चुकी थी, फिर भी वह बवंडर की तरह नाच रही थी, क्योंकि उसे बहुत दिनों बाद नाचने का मौक़ा मिला था। अचानक माँ का गाना बंद हो गया, पर वह इतनी गति में थी कि नाचती रही। गाने की जगह विलाप का स्वर उठा और वह बिलखते हुए नाचती रही।
इसके बाद अंजनी शुक्ला ने वसुंधरा पांडेय की कविता का पाठ किया। आधार वक्तव्य देते हुए सुधांशु मालवीय ने कहा कि यह संकलन आज के कवियों के प्रतिरोध के स्वर को सहेजता है। यह अन्याय के ख़िलाफ़ प्रतिरोध और गंगा-जमुनी संस्कृति को बढ़ावा देता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने इलाहाबाद के महान् कवि निराला को याद न किए जाने पर दुख व्यक्त किया और उनकी जयंती पर शहर में कोई कार्यक्रम न होने की आलोचना की।
हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आचार्य आशुतोष पार्थेश्वर ने ‘चेतना के दस द्वीप’ कविता संग्रह पर अपने विचार प्रस्तुत किए, जिसमें उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राय और कविताओं की अपनी समझ को स्पष्ट किया। उन्होंने संग्रह में शामिल कवियों और कविताओं के चयन के लिए संपादक सत्यकेतु जी की प्रशंसा की, विशेष रूप से इलाहाबाद से जुड़े कवियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए। उन्होंने संग्रह की कुछ कविताओं का विशेष रूप से उल्लेख किया, जैसे ‘पागल दास’, ‘अत्तार युसुफ़ और गलजिल का क़िस्सा’, और ‘संजीव हुसैन’। कविताओं की शिल्प कौशल, उनकी लय और कहने के तरीक़े की सराहना की, जो उन्हें पाठकों के लिए आकर्षक और यादगार बनाती है।
प्रोफ़ेसर प्रणय कृष्ण ने कहा कि यह संग्रह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें प्रेम, सामाजिक असमानता और वर्तमान समय की विभीषिका जैसे विभिन्न विषय शामिल हैं। कविताओं में उदासी, आग, अनंत रात और उल्लास जैसे अनेक रूप देखने को मिलते हैं। कुछ कवि बाज़ार और सत्ता द्वारा निर्मित ‘एस्पिरेशनल भारत’ के विचार के ख़िलाफ़ हैं, जो अधिक से अधिक हड़पने की आकांक्षा के विपरीत है। कविताओं में इतिहास और लोक परंपराओं को वर्तमान के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, जिससे वर्तमान अधिक पहचान योग्य और संवेद्य बन गया है।
प्रोफ़ेसर सरोज सिंह ने कहा कि संचयन की भूमिका सारगर्भित, विशद और विद्वत्तापूर्ण लिखा गया है, जो पाठक में रचनाओं के प्रति जिज्ञासा जगाती है।
कार्यक्रम के अंतिम वक्ता के रूप में प्रोफ़ेसर कुमार वीरेंद्र ने अपने वक्तव्य में इलाहाबाद में साहित्यकारों के योगदान पर प्रकाश डाला, विशेष रूप से उन लोगों पर जिन्होंने बाहर से आकर शहर को साहित्य का केंद्र बनाया। उन्होंने इसे ‘कलमी आम’ की संज्ञा दी। उन्होंने निराला की जयंती और पुण्यतिथि पर होने वाले कार्यक्रमों का उल्लेख किया, जिसमें राजेंद्र कुमार जी की अनुपस्थिति महसूस की गई।
और कार्यक्रम के सबसे अंत में अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ कवि हरिशचंद्र पांडे ने कहा कि लंबे अंतराल (41 साल) के बाद ऐसा महत्त्वपूर्ण काव्य-उपक्रम सामने आया है, जिसमें प्रेम, प्रकृति, श्रमशील जीवन और प्रतिरोध के स्वर एक साथ उपस्थित हैं। यह उपक्रम 1980-90 के दशक के लेखकों पर केंद्रित है। वक्ता को 40-45 साल पहले श्रीनिवास मिश्र के संपादन में निकली ‘उन्नयन’ पत्रिका का इलाहाबाद अंक याद आता है, जिसकी भूमिका जगदीश गुप्त ने लिखी थी।
हरिशचंद्र पांडे संपादक के मंतव्य को रेखांकित करते हैं, जिसमें अनुचित का सहज प्रतिकार, अन्य का हित और मानवता व मुहब्बत जैसे शब्द प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि संकलन में शामिल कवि अपने काव्य-प्रयोगों और नए छंदों के माध्यम से समकालीन कविता को समृद्ध करते हैं।
कार्यक्रम का संचालन प्रेमशंकर ने किया। ‘चेतना के दस द्वीप’ केवल कविताओं का संचयन नहीं, बल्कि प्रयागराज की उस उर्वर भूमि का ऋण है जो हमेशा ‘कलमी आम’ जैसे साहित्यकारों को अपनी गोद में पनाह देती रही है। यह आयोजन निष्कर्ष निकालता है कि आज के वैचारिक संकट के दौर में ‘संवाद’ ही अंतिम विकल्प है। ये कविताएँ हमें विश्वास दिलाती हैं कि प्रतिरोध के स्वर को दबाया नहीं जा सकता, क्योंकि वे स्मृतियों में ‘पखावज की लय’ और ‘इत्र की झील’ की तरह जीवित रहती हैं।
साहित्य की सामाजिक ज़िम्मेदारी महज़ शब्दों की कलाबाजी नहीं, बल्कि उस ‘नहीं’ को पुनर्जीवित करना है जिसे सत्ता और कट्टरता ने मिलकर दफ़्न कर दिया है; क्योंकि जब तक संवाद जीवित है, तब तक रोशनी के ये दीप बुझ नहीं सकते।
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