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C/O बंगाल : गुरुदेव और महात्मा

“लोग तुमसे तरह-तरह के अजीब सवाल करते हैं। कोई तुम्हें चिढ़ाता भी है। तुम भी उन सबके जवाब देते हो। संन्यासी की तरह रहते हो तुम। आख़िर इन सबको कैसे सँभाल लेते हो? ये सब अँग्रेज़ी शिक्षा का परिणाम है। तुम्हारा धैर्य सचमुच अद्भुत है!”

ये बातें 29 मई 1925 को द्विजेंद्रनाथ ठाकुर [रवींद्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई] ने गांधी जी से कही थीं। गांधी जी उनके चरणों के पास बैठे थे। गांधी जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “मैं तो कभी-कभी मूर्खतापूर्ण सवालों का भी अच्छा जवाब दे देता हूँ। कभी ऐसा अवसर भी मिल जाता है, जब मैं कुछ ऐसा लिख पाता हूँ जो इससे पहले कभी नहीं लिख पाया था। कभी-कभी उन सुविचारित या मूर्खतापूर्ण सवालों का जवाब देना भी कठिन हो जाता है। लेकिन मैं शिकायत नहीं कर सकता...”

इस काल और अवधि दरमियान बंगाल की गर्मी धीरे-धीरे अपने चरम की ओर बढ़ रही थी। लेकिन राजनीतिक भारत की हवा में एक अलग ही तरह की तपिश थी। महात्मा गांधी उन दिनों देश भर में चरख़े का संदेश लेकर घूम रहे थे। उनके लिए चरख़ा स्वदेशी अर्थव्यवस्था, श्रम की गरिमा, ग्रामीण भारत की आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता-साधना को एक सूत्र में बाँधने वाला प्रतीक था। 

लेकिन गांधी के इस चरख़ा-केंद्रित कार्यक्रम को लेकर बंगाल के महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर के मन में लंबे समय से अनेक प्रश्न और संशय थे। ‘घरे-बाइरे’ उपन्यास में भी स्वदेशी आंदोलन और उसके अतिरंजित आग्रहों को लेकर उनकी चिंताओं की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। गांधी के प्रति रवींद्रनाथ की श्रद्धा गहरी और निर्विवाद थी, लेकिन श्रद्धा का अर्थ उनके लिए बौद्धिक सहमति नहीं था। कवि के मन में मूल प्रश्न यह था कि किसी एक यांत्रिक कर्म को किस तरह मनुष्य की बहुआयामी सृजनशीलता और स्वतंत्र चेतना का सार्वभौमिक प्रतीक बनाया जा सकता है!

गांधी इस मतभेद से अनजान नहीं थे। रवींद्रनाथ भी जानते थे कि चरख़े को लेकर उनकी आपत्तियाँ महात्मा को सहज स्वीकार्य नहीं थीं। फिर भी दोनों के बीच संवाद कभी बंद नहीं हुआ। यही उनकी मित्रता और बौद्धिक संबंध की सबसे बड़ी विशेषता थी। वे एक-दूसरे का सम्मान करते हुए भी एक दूसरे से असहमति व्यक्त कर सकते थे।

1925 के उस मई महीने में जब गांधी ने रवींद्रनाथ से सीधे बातचीत करने की इच्छा व्यक्त की, तब लगा की दोनों के बीच लंबे समय से मौजूद बौद्धिक दूरी के भीतर संवाद का एक नया द्वार खुल रहा हो। उस मुलाक़ात का उद्देश्य असहमति को और निकट से समझना था। गांधी उन दिनों लगभग एक महीने से बंगाल में थे। चरख़े का प्रचार उनके इस दौरे के प्रमुख उद्देश्यों में से एक था। लेकिन वह जानते थे कि रवींद्रनाथ को समझे बिना बंगाल के बौद्धिक परिदृश्य में उनके इस कार्यक्रम की पूर्णता संभव नहीं है। इसलिए मुलाक़ात की इच्छा व्यक्त करते हुए उन्होंने स्वयं कवि को पत्र लिखा। रवींद्रनाथ ने महात्मा को शांतिनिकेतन आने का निमंत्रण दिया। यह पत्र पहुँचाने का दायित्व नेपालचंद्र राय ने लिया।

29 मई 1925

रात में ट्रेन बोलपुर स्टेशन पर आकर रुकी। गांधी के साथ सतीशचंद्र दासगुप्त, हेमप्रभा देवी, महादेव देसाई और प्यारेलाल नायर थे। उनका स्वागत करने के लिए स्टेशन पर चार्ल्स फ़्रीयर एंड्रूज़ उपस्थित थे... स्टेशन से मोटर द्वारा वह शांतिनिकेतन की ओर रवाना हुए।

इससे पहले गांधी आख़िरी बार 1920 में बोलपुर आए थे।

दक्षिण अफ़्रीका में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष करते हुए मोहनदास करमचंद गांधी ने एक अनोखे विद्यालय की स्थापना की थी। उस विद्यालय में खाना पकाने से लेकर खेती करने और मल-मूत्र की सफ़ाई तक, सभी काम शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर करते थे। वहाँ किसी को सेवक के रूप में नहीं रखा जाता था, सभी समान थे। न जातिगत भेद थे, न अमीर और ग़रीब के बीच कोई फ़र्क़।

इसी बीच बातचीत के लिए ब्रिटिश सरकार ने गांधी को बुलाया। वह इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। उनका उद्देश्य सिर्फ़ दक्षिण अफ़्रीका की समस्या पर ही नहीं, बल्कि इंग्लैंड के अधीन सभी उपनिवेशों की समस्याओं पर बातचीत करना था। पर प्रश्न यह था कि वह अपने विद्यार्थियों को कहाँ छोड़ें? उन्होंने उन्हें भारत भेजने का विचार किया। इन विद्यार्थियों को पहले हरिद्वार के गुरुकुल आश्रम में रखा गया, लेकिन वहाँ की कठोर जाति-व्यवस्था गांधी को बिल्कुल पसंद नहीं आई। इसके बाद उन्हें लगा कि शांतिनिकेतन ही इन विद्यार्थियों के लिए आदर्श स्थान हो सकता है। रवींद्रनाथ भी इसके लिए सहमत हो गए और उसी के अनुसार व्यवस्था की गई। रवींद्रनाथ ने इंग्लैंड में गांधी को पत्र लिखा : 

“आपके स्किन्स स्कूल के विद्यार्थियों को भारत लाकर मेरे विद्यालय में रखने का विचार आपको सबसे अधिक पसंद आया, यह जानकर मुझे सचमुच बहुत प्रसन्नता हुई। इन प्रिय विद्यार्थियों को आज अपने बीच पाकर वह आनंद और भी अधिक अनुभव कर रहा हूँ।”

इंग्लैंड का काम पूरा करके गांधी भारत लौटे। पुणे में उन्होंने बीमार गोपाल कृष्ण गोखले से भेंट की। इसके बाद वह पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ शांतिनिकेतन आए।

यह 1915 की बात है। 

उनके दो बेटे उस समय स्किन्स स्कूल के अन्य विद्यार्थियों के साथ शांतिनिकेतन में ही पढ़ रहे थे। लेकिन रवींद्रनाथ तब शिलाईदह में थे। गांधी के शांतिनिकेतन आने की ख़बर पाकर वह कलकत्ता होते हुए बोलपुर लौटे। लेकिन इस बीच गोखले के निधन का समाचार मिला और गांधी पुणे के लिए रवाना हो गए, रवींद्रनाथ के लौटने से ठीक दो दिन पहले।

22 फाल्गुन को गांधी फिर शांतिनिकेतन आए। 

रवींद्रनाथ के साथ उनकी वह पहली प्रत्यक्ष मुलाक़ात थी। हालाँकि वे दोनों काफ़ी पहले से ही एक-दूसरे के गुणों के प्रशंसक थे। गांधी ने सुझाव दिया कि शांतिनिकेतन में रोज़मर्रा के सभी काम शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर करें। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ समझने के लिए आत्मनिर्भर होना आवश्यक है, यह गांधी का मानना था। यह विचार रवींद्रनाथ को भी पसंद आया। उसी वर्ष 10 मार्च से शांतिनिकेतन में इसे लागू किया गया। खाना पकाने, पानी लाने, झाड़ू लगाने से लेकर अन्य दैनिक कार्य तक सभी मिलकर करते थे। हालाँकि विभिन्न कारणों से यह व्यवस्था अधिक दिनों तक नहीं चल सकी।

फिर भी आज तक हर वर्ष 10 मार्च को शांतिनिकेतन के आश्रमिक ‘गांधी दिवस’ मनाते हैं। उस दिन आश्रम के सभी दैनिक कार्य वे स्वयं मिलकर करते हैं।

29 मई 1925

अब तक गांधी कुर्सी पर बैठे थे। इस बार वह उठकर द्विजेंद्रनाथ ठाकुर के चरणों के पास जाकर बैठ गए। ठीक वैसे ही, जैसे पैंतीस वर्ष पहले वह दादाभाई नौरोजी के चरणों के पास जाकर बैठ गए थे। द्विजेंद्रनाथ गांधी को बहुत पसंद करते थे, उनका आशीर्वाद झरने की तरह गांधी पर बरसने लगा। गांधी भी द्विजेंद्रनाथ के प्रति गहरा सम्मान और प्रेम रखते थे। 

द्विजेंद्रनाथ ने गांधी से कहा, “हिंदू-मुसलमानों के लिए तुम जो काम कर रहे हो, वह सचमुच महान् है।” इसके बाद उन्होंने शूद्रों और ब्राह्मणों के संबंध में भी कुछ बातें कहीं। लेकिन गांधी जी का उनके चरणों के पास बैठना, उन्हें जैसे सहज नहीं लग रहा था। उन्होंने कहा, “तुम कुर्सी पर क्यों नहीं बैठते? कुर्सी पर बैठो...”

गांधी जी ने शांत भाव से उत्तर दिया, “नहीं, मैं यहीं ठीक हूँ। दूसरों की नज़र में मैं चाहे जो भी हूँ, लेकिन यहाँ आपके सामने अपनी सारी महानता को एक तरफ़ रखकर नतमस्तक होकर बैठना ही मेरे लिए उचित है।”

वस्तुतः द्विजेंद्रनाथ के हृदय में गांधी जी के प्रति पुत्रवत् स्नेह का भाव था और उसी स्नेह के कारण उन्होंने गांधी जी के सभी दोष-त्रुटियों को अपनी दृष्टि-सीमा से बाहर कर दिया था। उनकी दृष्टि में गांधी निष्कलंक हो गए थे और उनके समस्त कार्य त्रुटिहीन एवं निर्दोष प्रतीत होते थे। असहयोग कार्यक्रम, चरख़ा, हिंदू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता-निवारण... सब कुछ द्विजेंद्रनाथ के मन को जीत चुका था। उन्होंने स्वराज के आदर्श को भी आत्मसात् कर लिया था। 

गांधी जी ने लिखा है, “जिस प्रकार पुत्र-स्नेह से अंधा पिता अपने बेटे का कोई दोष या त्रुटि नहीं देख पाता, उसी प्रकार वह भी मेरी कोई त्रुटि देखना नहीं चाहते। उनकी मुग्ध दृष्टि और प्रेम ही मुझे दिखाई देता है, जिसके योग्य बनने का मैं केवल प्रयास करता हूँ। उनकी आयु अस्सी वर्ष से अधिक हो चुकी है, फिर भी वह संसार की छोटी से छोटी बात से अवगत हैं। भारत में कहाँ क्या चल रहा है, इसकी पूरी जानकारी भी उन्हें रहती है।”

जब गांधी दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह के प्रयोगों के माध्यम से अपने राजनीतिक दर्शन का निर्माण कर रहे थे; तब रवींद्रनाथ बंगाल के समाज, शिक्षा, ग्रामीण जीवन और मनुष्य की आत्ममुक्ति को लेकर अपनी चिंतन-दृष्टि विकसित कर रहे थे। दोनों के बीच प्रत्यक्ष निकटता का संबंध विशेष रूप से 1915 के बाद मज़बूत हुआ। दक्षिण अफ़्रीका से गांधी के भारत लौटने के बाद रवींद्रनाथ के साथ उनका संपर्क धीरे-धीरे गहरा होता गया।

रवींद्रनाथ ने ही उन्हें ‘महात्मा’ कहकर सबसे पहले संबोधित किया था, यह संबोधन आगे चलकर भारतीय राजनीतिक इतिहास में इस तरह स्थापित हुआ कि गांधी के नाम के साथ ‘महात्मा’ शब्द लगभग अविभाज्य हो गया। दूसरी ओर, गांधी रवींद्रनाथ को ‘गुरुदेव’ कहकर पुकारते थे। लेकिन यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात याद रखना आवश्यक है कि रवींद्रनाथ गांधी के अंधसमर्थक नहीं थे। गांधी ने भी रवींद्रनाथ के प्रत्येक विचार को स्वीकार नहीं किया, बल्कि उनके संबंध की सबसे आकर्षक विशेषता ही यही थी कि वे एक-दूसरे का सम्मान करते हुए भी एक-दूसरे से असहमति और तर्क कर सकते थे। आज की राजनीतिक संस्कृति में जहाँ मतभेद बहुत आसानी से व्यक्तिगत विरोध में बदल जाते हैं, वहीं रवींद्रनाथ और गांधी का संबंध इसके बिल्कुल विपरीत एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।

1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान यह अंतर विशेष रूप से स्पष्ट होकर सामने आया। गांधी का मानना था कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनता को संगठित करने के लिए विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, चरख़ा, खादी, असहयोग और आत्मनिर्भरता जैसे कार्यक्रमों को जन-जीवन के केंद्र में लाना आवश्यक है। रवींद्रनाथ ने इस आंदोलन के नैतिक उद्देश्य को अस्वीकार नहीं किया, लेकिन उन्हें आशंका थी कि राजनीतिक बहिष्कार और नकारात्मक अस्वीकृति मनुष्य की सृजनात्मक चेतना को सीमित कर सकती है। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ मनुष्य के भीतर मौजूद भय, अज्ञान, संकीर्णता और अंधानुकरण की प्रवृत्ति से मुक्ति था।

इसी कारण चरख़े को लेकर गांधी और रवींद्रनाथ के बीच हुआ विवाद भारतीय बौद्धिक इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। गांधी के लिए चरख़ा श्रम की गरिमा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भरता और राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक था। रवींद्रनाथ ने प्रश्न उठाया कि यदि किसी एक प्रतीक को राष्ट्रीय मुक्ति का केंद्रीय मापदंड बना दिया जाए, तो मनुष्य की बहुआयामी सृजनशीलता का स्थान कहाँ रहेगा? 

6 सितंबर 1921 को कोलकाता के जोरासांको स्थित ठाकुरबाड़ी में गांधी और रवींद्रनाथ के बीच चरख़े को लेकर एक लंबी बातचीत हुई थी। गांधी से संबंधित दस्तावेज़ों में इस मुलाक़ात का उल्लेख मिलता है और समकालीन विवरणों में भी उनके ‘टेम्परामेंट’ अर्थात् स्वभाव और मानसिक प्रवृत्तियों के बीच व्यापक अंतर की चर्चा मिलती है। 

रवींद्रनाथ की आपत्ति मूलतः किसी एक राजनीतिक पद्धति को सार्वभौमिक सत्य के रूप में स्वीकार करने के विरुद्ध थी, जबकि गांधी का पक्ष उस पद्धति की सामाजिक और आर्थिक आवश्यकता पर आधारित था। बाद में इस बहस को ‘Politics, Truth and Non-Violence’, ‘Nationalism—Ethics and Responsibility’ और ‘Caste’ जैसे प्रश्नों के साथ जोड़कर पढ़ा और समझा गया है। यहाँ तक कि विश्वभारती के वर्तमान इतिहास-पाठ्यक्रम में भी ‘Gandhi-Tagore Debate’ को एक स्वतंत्र चर्चा के विषय के रूप में शामिल किया गया है।

इस बीच गांधी अहिंसा और असहयोग के अपने आंदोलन के माध्यम से स्वतंत्रता-संग्राम में पूरी तरह उतर गए। उन्होंने कांग्रेस के पहले तीस वर्षों की मुख्यतः याचिका और संवैधानिक सुधारों पर आधारित राजनीति को सक्रिय जन-आंदोलन की दिशा में मोड़ने में महती भूमिका निभाई। 1921 में आंदोलन के तौर-तरीक़ों को लेकर रवींद्रनाथ और गांधी के बीच गंभीर वैचारिक विवाद सामने आया।

रवींद्रनाथ ने स्कूलों और कॉलेजों के बहिष्कार तथा विदेशी कपड़ों को जलाने जैसी गतिविधियों पर आपत्ति जताई। सी.एफ़. एंड्रूज़ को लिखे एक पत्र में उन्होंने बताया कि कुछ युवा विद्यार्थी उनसे मिलने आए थे। उन्होंने कहा था कि यदि रवींद्रनाथ उन्हें स्कूल छोड़ने का आदेश दें, तो वे उसका पालन करेंगे। लेकिन रवींद्रनाथ ने स्पष्ट रूप से ऐसा करने से इनकार कर दिया। इससे वे विद्यार्थी नाराज़ होकर चले गए और उन्हें मातृभूमि के प्रति रवींद्रनाथ के प्रेम की ईमानदारी पर भी संदेह हुआ। रवींद्रनाथ ने अपने इनकार का कारण बताते हुए कहा था, “ख़ालीपन की अराजकता मुझे कभी आकर्षित नहीं करती।”

रवींद्रनाथ ने बहुत पहले ही शांतिनिकेतन और श्रीनिकेतन के माध्यम से ऐसी शिक्षा-व्यवस्था और ग्रामीण पुनर्गठन का सपना देखा था, जिसमें शिक्षा जीवन के साथ गहराई से जुड़ी हो। गांधी की ‘नई तालीम’ में भी शिक्षा को जीवन, श्रम और समाज से जोड़ने की प्रबल आकांक्षा दिखाई देती है। 

रवींद्रनाथ ठाकुर ने बाहरी दुनिया के सामने महात्मा गांधी को भारत की आध्यात्मिक आत्मा के रूप में प्रस्तुत करने में कभी संकोच नहीं किया। 1938 में उन्होंने चीन के मार्शल च्यांग काई-शेक को एक पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने कहा, “नैतिक उथल-पुथल के इस विकट समय में हमारे लिए यह आशा करना स्वाभाविक है कि जिस महाद्वीप ने मानव-इतिहास के समूचे क्रम में बुद्ध और ईसा जैसे दो महानतम व्यक्तियों को जन्म दिया है, वह आज भी अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करेगा और मनुष्य की दुष्ट प्रतिभा द्वारा विज्ञान के दुस्साहसपूर्ण दुरुपयोग के सामने चरित्र की सबसे शुद्ध अभिव्यक्ति को बनाए रखेगा। क्या यह आशा पहले ही गांधी के व्यक्तित्व में अपनी पूर्ति की पहली उज्ज्वल किरण के रूप में उस ऐतिहासिक क्षितिज पर दिखाई नहीं दे रही, जो सदियों से...?” 

रवींद्रनाथ ने गांधी के बारे में कहा था, “वह हज़ारों वंचितों की झोपड़ियों की दहलीज़ पर ऐसे रुके जैसे उन्हीं में से एक हों। उन्होंने उनसे उनकी अपनी भाषा में बात की। आख़िरकार यहाँ जीवंत सत्य उपस्थित था, पुस्तकों के उद्धरण नहीं। इस महात्मा के लिए भारत की जनता ने जो नाम दिया है, वही उनका वास्तविक नाम है।”

एक बार और रवींद्रनाथ ने गांधी के उस आह्वान का उल्लेख किया, जिसमें वह प्रतिदिन आधे घंटे चरख़ा चलाने की बात करते थे। रवींद्रनाथ ने प्रश्न किया कि यदि चरख़ा देश को स्वतंत्रता या स्वराज प्राप्त करने में सहायता कर सकता है तो फिर आधे घंटे ही क्यों, साढ़े आठ घंटे क्यों नहीं? चरख़े को स्वतंत्रता-साधना का केंद्रीय साधन मानने को लेकर उनकी मूल आपत्ति थी। इस मुद्दे पर दोनों की सहमति नहीं बन सकी।

20 मई 1932 को महात्मा गांधी ने यरवदा जेल में दलित-वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन-व्यवस्था के ब्रिटिश प्रस्ताव के विरोध में उपवास आरंभ किया। गांधी के इस उपवास के समर्थन में रवींद्रनाथ ने उन्हें तार भेजा। उन्होंने लिखा कि भारत की एकता और उसकी सामाजिक अखंडता के लिए बहुमूल्य जीवन का बलिदान भी सार्थक है। उन्होंने यह आशा व्यक्त की कि देशवासी ऐसी राष्ट्रीय त्रासदी को चरम सीमा तक नहीं पहुँचने देंगे और कहा कि उनके शोकाकुल हृदय गांधी जी के इस महान् तप का श्रद्धा और प्रेम के साथ अनुसरण करेंगे।

गांधी ने उस तार का उत्तर देते हुए लिखा कि उन्होंने हमेशा ईश्वर की कृपा का अनुभव किया है। उन्होंने बताया कि उसी सुबह उन्होंने रवींद्रनाथ का आशीर्वाद माँगते हुए लिखा था और अब उनका संदेश उन्हें भरपूर आशीर्वाद के रूप में प्राप्त हुआ है।

उसी दिन उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ को एक पत्र भी लिखा। उन्होंने लिखा कि मंगलवार की सुबह तीन बजे का समय है और दुपहर में वह ‘अग्नि-द्वार’ में प्रवेश करने वाले हैं। यदि रवींद्रनाथ उनके इस प्रयास को आशीर्वाद दे सकें, तो वह उसे पाना चाहते हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि रवींद्रनाथ उनके सच्चे मित्र रहे हैं, क्योंकि वह एक स्पष्टवादी मित्र की तरह अक्सर अपने विचार खुलकर व्यक्त करते रहे हैं। गांधी ने उनसे कहा कि यदि उनके हृदय में उनके इस निर्णय की निंदा हो, तो वह उनकी आलोचना को भी उतने ही सम्मान से स्वीकार करेंगे। उन्होंने लिखा कि वह अपनी भूल को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने में गर्व का अनुभव करेंगे और यदि उन्हें लगे कि वह ग़लत हैं तो वह अपनी गलती स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। 

इस पत्र के अंत में गांधी ने एक टिप्पणी भी जोड़ी थी कि जब वह यह पत्र जेल-अधीक्षक को सौंपने ही वाले थे, तभी उन्हें रवींद्रनाथ का ‘प्रेमपूर्ण और शानदार तार’ प्राप्त हुआ। उन्होंने लिखा कि आने वाले तूफ़ान के बीच वह संदेश उन्हें सहारा देगा। [इस पत्र का स्रोत : ‘रवींद्र-रचनावली’, खंड 14]

यरवदा जेल में गांधी के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रवींद्रनाथ स्वयं पुणे पहुँचे। गांधी ब्रिटिश सरकार द्वारा अनुसूचित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन-व्यवस्था के प्रस्ताव का विरोध करते हुए उपवास कर रहे थे। रवींद्रनाथ ने स्वयं जाकर गांधी जी की स्थिति देखने का निर्णय लिया। गांधी जी ने अपने पुत्र को भेजकर रवींद्रनाथ को भीतर बुलवाया। तब तक ब्रिटिश सरकार गांधी की माँग स्वीकार कर चुकी थी और उस दिन दुपहर तक मौन-व्रत धारण किए हुए गांधी ने उपवास समाप्त करने पर सहमति दे दी थी। कमला नेहरू ने रस तैयार किया और कस्तूरबा ने गांधी को उसका पहला घूँट पिलाया। इसके बाद गांधी जी ने रवींद्रनाथ से अपना कोई गीत सुनाने का अनुरोध किया। रवींद्रनाथ ने गाया :

“जीवन जखन सुखाय जाय, करुणाधाराय एसो...” 
[जीवन जब सूख जाए, करुणाधारा में आओ...]

महात्मा गांधी ने शांतिनिकेतन स्थित रवींद्रनाथ के विद्यालय और विश्वविद्यालय का चार बार दौरा किया—दो बार कस्तूरबा के साथ और दो बार अकेले। 1936 में विश्वभारती की आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए पैसा जुटाने के उद्देश्य से रवींद्रनाथ अपने नृत्य-नाट्य दल के साथ इलाहाबाद और लखनऊ होते हुए दिल्ली पहुँचे। इतनी अधिक आयु में अपने गुरुदेव को इस प्रकार धन-संग्रह के लिए घूमते देखकर गांधी अत्यंत व्यथित हुए। उन्होंने रवींद्रनाथ से मुलाक़ात की और विश्वभारती की आर्थिक आवश्यकता पूरी करने के लिए धन की व्यवस्था की। उनके संबंध और व्यक्तित्व के बारे में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1941 में अपनी जेल डायरी में लिखा था, “गांधी और ठाकुर, दो ऐसे व्यक्तित्व हैं जो एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न हैं और फिर भी दोनों भारत के प्रतिनिधि हैं, दोनों भारत के महान् व्यक्तियों की एक लंबी परंपरा की कड़ी हैं। लंबे समय से मुझे लगता रहा है कि आज की दुनिया में वे दोनों असाधारण व्यक्तित्व हैं। निस्संदेह ऐसे अनेक लोग हैं जो उनसे अधिक सक्षम हो सकते हैं या अपने-अपने क्षेत्र में उनसे बड़े प्रतिभाशाली हो सकते हैं। लेकिन यह किसी एक गुण के कारण नहीं, बल्कि उनके समूचे व्यक्तित्व के कारण है। मुझे लगता है कि आज दुनिया के महान् व्यक्तियों में गांधी और ठाकुर मनुष्य के रूप में सर्वोच्च हैं। मेरे लिए यह कितना बड़ा सौभाग्य है कि मुझे दोनों के निकट संपर्क में आने का अवसर मिला।”

1940 में, रवींद्रनाथ ठाकुर के निधन से एक वर्ष पहले, गांधी जी कस्तूरबा के साथ अस्वस्थ कवि से मिलने शांतिनिकेतन पहुँचे। उस भेंट के दौरान रवींद्रनाथ ने गांधी से अनुरोध किया कि उनके निधन के बाद वह विश्वभारती की ज़िम्मेदारी सँभालें। 

रवींद्रनाथ ठाकुर ने ही सबसे पहले गांधी को ‘महात्मा’ अर्थात् ‘महान् आत्मा’ कहकर संबोधित किया था। उन्होंने कहा था, “गांधी जी के आह्वान पर भारत एक नई महानता में खिल उठा, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन काल में बुद्ध ने समस्त जीवों के प्रति सहानुभूति और करुणा का सत्य उद्घाटित किया था।” 

दूसरी ओर, गांधी रवींद्रनाथ को ‘महान् प्रहरी’, ‘द ग्रेट सेंटिनल’ और ‘गुरुदेव’ कहकर संबोधित करते थे। इन संबोधनों के भीतर दोनों महान् व्यक्तित्वों के बीच मौजूद गहरी आत्मीयता, वैचारिक संवाद और पारस्परिक श्रद्धा की पूरी कहानी छिपी है।

गांधी और रवींद्रनाथ का संबंध इसलिए असाधारण था कि उसमें न तो अंधानुकरण था, न असहमति के कारण दूरी। एक ओर गांधी के लिए रवींद्रनाथ ‘गुरुदेव’ थे, दूसरी ओर रवींद्रनाथ के लिए गांधी भारत की नैतिक चेतना के एक अद्वितीय प्रतिनिधि महात्मा। वे एक-दूसरे के विचारों से असहमत हो सकते थे, एक-दूसरे की राजनीतिक पद्धतियों पर प्रश्न उठा सकते थे; लेकिन उस असहमति के भीतर भी परस्पर सम्मान, आत्मीयता और संवाद की जगह कभी समाप्त नहीं हुई।

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