बहुत नाइंसाफ़ी है गदहों के साथ
राज़िक़ अंसारी
12 अक्तूबर 2026
गदहे को इंसानी समाज ने हमेशा से ही तुच्छ प्राणी समझा है। इसीलिए प्राणी संग्रहालय में गदहे को छोड़कर सब प्राणियों को रखा गया। क्या गदहों को इंसानों की इस हरकत का बुरा नहीं लगता होगा?
गदहा हमेशा से ही इंसान की दोग़ली नीति का शिकार रहा है। इंसान कभी अपने आपको शेर बताता है और कभी ख़ुद को शेर की औलाद। कभी सुना है आपने किसी ने अपने को या अपने बाप को गदहा कहा हो? अलबत्ता, सामने वाले को प्रताड़ित करने के लिए ‘गदहा’ शब्द की उपाधि ज़रूर प्रदान कर देता है और वह प्रताड़ित हो भी जाता है, क्योंकि इंसानी समाज ने गदहे की बहुत-सी बुरी-बुरी मिसालें गढ़ रखी हैं।
आपने गदहे को छोड़कर तमाम पशु-पक्षियों से इंसान को बात करते हुए फ़ोटो और वीडियो देखे होंगे। कभी देखा है किसी इंसान को गदहे को लाड़ से गले लगाते हुए या उससे बात करते हुए? और तो और, इंसान पिंजरे में बंद शेर को देखकर डरता भी है, उसके साथ फ़ोटो उतराने का शौक़ भी रखता है। इसके लिए वह एआई से फ़ोटो बनवाकर सोशल मीडिया पर डाल रहा है, जबकि इस काम के लिए गदहा आसानी से उपलब्ध है।
एक बार एक गदहा अपनी मेहनत से बहुत ऊँची पानी की टंकी पर चढ़ गया। लोगों ने उसकी फ़ोटो खींचकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दी। लोग लग गए ट्रोल करने—यह गदहा इतने ऊपर चढ़ा कैसे? इसको किसने चढ़ाया? उतरेगा कैसे? अरे मूर्खों, ट्रोल कर रहे हो तो इसको नीचे उतारने की जुगाड़ लगाओ।
इंसान ने आज तक गदहों की मेहनत और लगन की सराहना नहीं की। जब सामान ढोने के लिए वाहनों का आविष्कार नहीं हुआ था, तब से गदहा ही अपनी पीठ पर वज़्न ढो रहा है... और इंसान उसकी इस सेवा के सम्मान में क्या दे रहा है? यही कि जब कोई व्यक्ति ईमानदारी से दिन-रात मेहनत करता है, लोगों का बोझ ढोता है, तो लोग कहते हैं—‘सुबह से रात तक गदहे की तरह काम करता रहता है।’
इंसानी सोच देखिए। इन लोगों ने यह भी तय कर रखा है कि घोड़े पर कौन बैठेगा और गदहे पर कौन! जब किसी व्यक्ति को लज्जित या अपमानित करना हो, मुँह काला करके गदहे पर ही क्यों बैठाकर घुमाते हैं? घोड़े पर ही क्यों नहीं बैठाकर घुमाया जाता? और शादी के मौक़े पर घोड़े पर ही दूल्हे को क्यों बैठाया जाता है, गदहे पर क्यों नहीं? ख़ुदा जाने, गदहों के साथ यह पक्षपात कब तक चलता रहेगा।
इंसान को तमाम पशु-पक्षियों की आवाज़ पसंद है। कुछ में तो उसे सुरों की नदियाँ बहती दिखाई देती हैं। हाँ, शेर की दहाड़ से उसे डर तो लगता है, मगर कभी उसके ख़िलाफ़ दो शब्द नहीं कहे। गदहे की आवाज़ से इतनी चिढ़ है कि ज़रा भी आवाज़ बर्दाश्त नहीं होती। जब भी गदहे ने अपनी भाषा में कुछ कहा, लोग उसे मारने दौड़ पड़ते हैं और अगर वह उनकी रेंज में आ जाए तो मार भी देते हैं। जब कोई व्यक्ति बहुत ज़्यादा और बेतुकी बातें कर रहा हो तो कह दिया जाता है—‘क्या गदहों जैसी बातें कर रहे हो?’ ऐसा लगता है, इंसान कान लगाकर इनकी बातें भी सुनता है।
न जाने कैसे इंसान ने गदहे को मूर्खता का प्रतीक समझ लिया। जब भी कोई इंसान मूर्खता करता है, फ़ौरन उसे गदहे का सर्टिफ़िकेट दे दिया जाता है।
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