अनशन की नैतिक शक्ति
विशाल कुमार
24 जुलाई 2026
आख़िरकार, इस देश की जनता कुछ जागी हुई-सी महसूस होती है। वह अराजनीतिकता का चोला उतारकर मूक से मुखर होती प्रतीत होती है। लेकिन जब हम कहते हैं कि इस देश की सरकार गूँगी, बहरी और अपने उत्तरदायित्व से भागने वाली है, तब एक क्षण रुककर हमें स्वयं से भी एक प्रश्न पूछना चाहिए—क्या हमारी रगों में विरोध का उबाल लाने के लिए किसी एक व्यक्ति की उभरती हुई पसलियों का दिखाई देना आवश्यक है? क्या जब तक कोई भूखा नहीं रहेगा, तब तक हमारी संवेदनाएँ और करुणा प्रसुप्त ऊष्मा की तरह कहीं दबी रहेंगी?
शिक्षा व्यवस्था का हाल किसी से छिपा नहीं है। पेपर लीक तो केवल एक मसला है; इस पूरी शिक्षा व्यवस्था में आख़िर क्या लीक नहीं हो रहा? विश्वविद्यालयों में कुलपति की कुर्सी से लेकर चपरासी की नियुक्ति तक, योग्यता से अधिक चापलूसी और संपर्क-लिंकबाज़ी का ही बोलबाला है। आप तब भी चुप थे, जब एक-एक करके उच्च शिक्षण संस्थानों की गरिमा को कलंकित किया जा रहा था। आप तब भी मौन रहे, जब प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों के साथ मनमानी छेड़छाड़ की जा रही थी। और सबसे बढ़कर, आप तब भी चुप थे, जब इस समाज के वातावरण में व्यवस्थित ढंग से ज़हर घोला जा रहा था। फिर आपको कैसे लग सकता है कि ऐसे वातावरण में आपका और आपके बच्चों का भविष्य सुरक्षित और सार्थक होगा?
संभव है, आप आज भी चुप ही रहते, यदि सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर न बैठे होते। दरअस्ल, हम सबको अपनी संवेदनाओं को जगाने के लिए किसी-न-किसी मूर्त प्रतीक की आवश्यकता पड़ती है। हमारी संवेदनाएँ स्थायी नहीं, अल्पकालिक हैं। इस देश में कितने ही पुल ढह जाते हैं, रेलगाड़ियाँ पटरी से उतर जाती हैं और अब तो हवाई जहाज़ भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं। लेकिन दो-चार दिन के शोर-शराबे के बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। आज कितने लोग जानते हैं कि अहमदाबाद विमान दुर्घटना का वास्तविक कारण क्या था? लापरवाही किसकी थी? बालासोर रेल दुर्घटना की जवाबदेही आख़िर किसने ली? ऐसी घटनाओं की एक लंबी फ़ेहरिस्त है। यहाँ आशय इन दुर्घटनाओं के कारणों पर निर्णय देना नहीं, बल्कि यह समझना है कि कुछ दिनों के शोर के बाद हमारी सार्वजनिक स्मृति और जवाबदेही की माँग लगभग समाप्त हो जाती है।
समस्या यही है कि हम एक विस्मृत समाज हैं। हमारे प्रश्न भी समयबद्ध हैं और हमारी संवेदनाएँ भी। हमारी चुप्पी केवल व्यक्तिगत नहीं, गहरे अर्थों में राजनीतिक चुप्पी है। और इस राजनीतिक चुप्पी से भी अधिक घातक है अपनी चुनी हुई सरकार को दिव्यता का आभामंडल प्रदान कर देना। जनता द्वारा चुनी गई सरकार जब पवित्र और प्रश्नातीत बना दी जाती है, तब वह जनता के प्रश्नों से दूर होती चली जाती है। विडंबना यह है कि नागरिक भी इस दासता को प्रतिरोध के बजाय सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।
फिर भी, भूख में इतनी ताक़त तो है कि लंबे समय बाद बेसुध पड़ी जनता में एक चिंगारी जगाने में वह सफल रही, भले ही अब तक सरकार को जगाने में सफल न हुई हो। लेकिन ध्यान देने की आवश्यकता है कि सरकार और सिस्टम कोई अमूर्त सत्ता नहीं हैं; वे हम लोगों से ही बने हैं। ‘सिस्टम’ कहकर चीज़ों को छिपाया नहीं जा सकता। आख़िर सिस्टम है क्या? किससे बनता है? सिस्टम कोई काला डिब्बा नहीं, बल्कि हम सभी उसके विभिन्न अंग हैं। वह हमसे ही निर्मित है और उसके सुधार की गुंजाइश भी हम से है।
सुधार के लिए सबसे पहले आवश्यक है कि हम तंत्र में निहित समस्याओं को पहचानें और उन्हें स्वीकार करें। और यदि ऐसा न हो रहा हो, तो उस तंत्र का पुरज़ोर विरोध करें। विरोध के तरीक़े अलग-अलग हो सकते हैं। विरोध का अर्थ अनिवार्यतः विद्रोह नहीं होता। वह साहित्य में, कला में, असहयोग के माध्यम से, शांतिपूर्ण प्रतिरोध के रूप में अथवा अनेक अन्य तरीक़ों से भी व्यक्त किया जा सकता है।
वर्तमान में देखा जा सकता है कि विरोध में लिखी गई कविताएँ और गीत लंबे अरसे बाद अपना अस्तित्व फिर से प्राप्त कर रहे हैं। ज़ाहिर है, नई पीढ़ी की कविताएँ और गीत भी नए होंगे। ‘हम देखेंगे’, ‘सितम के चार दिन’, ‘मारे जाएँगे’ आदि से सोशल मीडिया पटा पड़ा है। नया विरोध नए तरीक़ों, नए साहित्य और नई शब्दावली का भी सृष्टा होता है। इसलिए कहा जा सकता है कि अनशन और भूख हड़ताल एक नए युग के सृष्टिवाहक हैं—ऐसे वाहक, जो सामूहिक चेतना को जागृत कर सकते हैं; जिनका नैतिक बल इतना प्रबल हो कि वह सबके नैतिक बोध को रूपांतरित कर दे; जिनमें इतनी सामर्थ्य हो कि गूँगे भी बोलने लगें।
आख़िर अनशन में इतना सामर्थ्य आता कहाँ से है? एक भूखा व्यक्ति इतना ताक़तवर कैसे हो सकता है? इसका उत्तर गांधी से बेहतर शायद ही कहीं और मिल सके। गांधी का सत्याग्रह और अहिंसा इस देश के लिए सबसे बड़ा उपहार हैं। दरअस्ल, गांधी को भी यह उपहार इसी देश की परंपरा से मिला। भारत की मिट्टी और संस्कृति में ही ऐसी कल्पना संभव है कि आपके सामने चट्टान से भी अधिक शक्तिशाली साम्राज्य खड़ा हो और आप निर्बल, निःशस्त्र होकर भी उसकी आँखों में आँख डालकर खड़े हो सकें तथा उससे प्रश्न कर सकें। इस बल का स्रोत सत्य और व्यक्ति की निष्ठा में निहित है। व्यक्ति जितना अधिक निष्ठावान और कर्तव्यपरायण होगा, उसके अनशन के सफल होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। सत्य में अपार शक्ति और अनंत संभावनाएँ निहित हैं। सबसे पहले व्यक्ति स्वयं पर विजय प्राप्त करता है, और वही सबसे कठिन लड़ाई है। जो स्वयं पर विजय पा ले, उसे संसार की कोई शक्ति पराजित नहीं कर सकती। सोनम वांगचुक इस निष्ठा की परीक्षा में कहीं-न-कहीं सफल दिखाई देते हैं। इसलिए उनके आग्रह और अनुग्रह, दोनों की नैतिक शक्ति अत्यंत प्रबल है। उनमें ऐसा तेज है, जो स्वयं को दैवीय और दिव्य मान बैठे नीति-नियंताओं के आत्मविश्वास को भी डिगा देता है।
यह बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि इस ताक़त को, इस रोशनी को उजली चादर से ढका जा सकता है। ढकना ही था, तो उजली चादर की जगह कालीन का उपयोग करते—वही रंग-बिरंगी कालीन, जिसका इस्तेमाल वे हर जगह करते हैं; अशांति को शांति की कालीन से ढकने के लिए, असहमतियों को सहमति से, सवालों को दूसरे सवालों से, हक़ को कर्तव्य से और अधिकार को दासता से ढकने के लिए। आख़िर हर तरह की कालीन तो है उनके पास। और यदि कालीन से भी इसे ढक पाने में असफल रहते, तो इस बग़ावत को भी किसी-न-किसी रंग में रंग देते—किसी बाहरी साज़िश का रंग, मजहबी रंग या कोई और रंग। आख़िर रंगों की कमी भी तो नहीं है उनके पास।
लेकिन ये रंग भी अंततः बेरंग ही सिद्ध होंगे, क्योंकि वह सफ़ेद चादर, जिससे आप सोनम को ढकना चाहते थे, स्वयं मटमैली हो चुकी है। इतना ही नहीं, उस पर अब ख़ून के धब्बे भी उभर आए हैं, जो प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे हैं। अब उन्हें छिपाने की हर कोशिश व्यर्थ है। सोनम के अनशन ने अपने आत्मबल और भूख की ताक़त के सहारे इन धब्बों को अधिकतम जनता के सामने उजागर कर दिया है।
अब आवश्यकता केवल इस बात की है कि जनता इस समझ को आगे तक ले जाए। उसे हर बार किसी सोनम की प्रतीक्षा न करनी पड़े। प्रगतिशील मूल्य केवल गीतों और कविताओं तक सीमित न रह जाएँ; उन्हें समाज के आधारभूत ढाँचे का हिस्सा बनना होगा।
सरकार का क्या है? यदि जनता स्वयं जाग उठे, तो अच्छे-अच्छों के सिंहासन डोलने लगते हैं। मेरा मानना है कि भारत को समझने के लिए केवल फ़ाशीवाद जैसी अवधारणाएँ पर्याप्त नहीं हैं। ऐसी अवधारणाएँ आयातित हैं। यहाँ आज भी मध्यकालीन सामंती मूल्यों और संरचनाओं का गहरा वर्चस्व है। समाज की लगभग हर संरचना में सामंती मानसिकता किसी-न-किसी रूप में विद्यमान है। इसलिए केवल फ़ाशीवाद या किसी एक राजनीतिक वाद के सहारे भारतीय समाज की जटिलताओं को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
लेकिन आवश्यकता केवल समझने की नहीं, बल्कि बदलने की है। यदि हम सत्ता की अपेक्षा अपने सामाजिक मूल्यों और संरचनाओं के परिवर्तन पर अधिक ध्यान दें, तो सरकार पूरी व्यवस्था का केवल एक अंग भर रह जाती है। वास्तविक आवश्यकता मूल्यों के परिवर्तन की है। यह परिवर्तन केवल सुधारवाद से संभव नहीं होगा; इसके लिए व्यवस्था के व्यापक पुनर्गठन और नए सामाजिक सृजन की आवश्यकता है। ऐसे आंदोलन उसी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण और आशाजनक कदम हैं। ऐसे आंदोलन लोकतंत्र के लिए सुखद हैं, और उनमें छात्रों की सहभागिता उससे भी अधिक सुखद है। सोनम के साथ नेहा, अमीन और मनीष तक भी साधुवाद पहुँचे।
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