आधुनिकतावाद से सामना : मेरी सृजनात्मकता और उसके समक्ष चुनौतियाँ
रणजीत दाश
04 अप्रैल 2026
एक
‘सृजनात्मकता’ शब्द से मेरे मन में प्राथमिक तौर पर दो चित्र उभरते हैं—एक, रोपाई के लिए बीज से पौध तैयार करने की अपनी क्यारी को सुबह की धुंध में निरखता हुआ एक अकेला किसान; और दूसरी, लालटेन की रोशनी में अपनी ड्रॉइंग-बुक में आसमान में बादलों और पक्षियों को बनाता हुआ एक बच्चा। सामूहिक रूप से इन दोनों छवियों से सृजनात्मकता की मेरे लिए एक अत्यंत निजी छवि बनती है। यह छवि मुझे यह स्पष्ट करती है कि धान उगाना और कविता लिखना—दोनों मनुष्य की उसी सृजनशीलता नामक सिक्के के सिर्फ़ दो पहलू हैं। मैं महसूस करता हूँ कि कल्पना की सृजनात्मकता को हर समय प्रकृति की सृजनात्मकता से ही प्रेरणा लेनी चाहिए।
एक कवि के रूप में मैं अपने भीतर सृजनात्मक शक्ति महसूस करता हूँ—मेरे मन में व्यापी हुई और मेरे हृदय तथा आत्मा का संचालन करती हुई। कवि होने की मेरी आकांक्षा से उद्भूत यह सृजनात्मकता मुझे प्रेम और पीड़ा की दारुण अनुभूति से भर देती है—कभी-कभी तो असहनीय स्तर तक। इसी सृजनशील दृष्टि से ही मैं मानवीय दुःख-संघर्षों की प्रकृति को समझ पाता हूँ और बुराई के समक्ष भलाई की शक्ति को पहचानता हूँ।
इस सृजनात्मक शक्ति का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह कवियों और कलाकारों को अपने चारों ओर की सामाजिक वास्तविकताओं से निर्मित सीमाओं से ऊपर उठने में सक्षम बनाती है। वे कला-सृजन करते रहते हैं, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि परिस्थितियाँ कितनी प्रतिकूल हैं। मैं यह बात अपने निजी अनुभव से कह रहा हूँ। मेरा जन्म किसी समृद्ध परिवार में नहीं हुआ। इसके विपरीत, मेरा जन्म एक अत्यंत निर्धन और संघर्षशील शरणार्थी परिवार में हुआ, जो वर्ष 1948 में बंगाल-विभाजन के बाद तत्कालीन पूर्वी बंगाल से विस्थापित होकर असम आ गया था। मेरा जन्म 1949 में हुआ—मैं अपने माता-पिता की छह संतानों में सबसे बड़ा था और हमारा परिवार रोज़मर्रा के जीवन-संघर्षों से जूझ रहा था। इसी में संघर्ष करते हुए मैंने अपना जीवन जिया और बड़ा हुआ...
फिर भी, इस सुंदर संसार में मुझे जीवन का इतना आनंद और आश्चर्य मिला कि मैंने स्कूली छात्र रहते हुए कविता लिखनी शुरू कर दी। मेरा परिवार सुदूर ग्रामीण परिवेश से आया था, शिक्षा और शहरी संस्कृति की रोशनी वहाँ बहुत कम थी। साहित्य की पुस्तकें हमारे घर में दुर्लभ थीं। सौभाग्य से, रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘संचयिता’—उनकी कविताओं का विशाल संग्रह हमारे घर में भी था —जोकि उस समय अधिकांश बंगाली घरों में पाया जाता था। वही पुस्तक मेरी पहली रोशनी, मेरा पहला गुरुकुल और मेरा पहला काव्य-मंदिर बनी। अपनी कविता-प्रेमी माँ की सहायता से मैं रवि ठाकुर के काव्य-संसार में डूब गया।
आज जब मैं अपने अभावग्रस्त घर में उस पुस्तक की लगभग चमत्कारिक उपस्थिति को याद करता हूँ—जो एक बच्चे की चेतना को कविता की सुंदरता से भर देती है और उसके भविष्य की दिशा को सदा के लिए बदल देती है—तो मुझे मनुष्य के जीवन को रूपांतरित कर देने वाली एक कविता-पुस्तक की अपार शक्ति का एहसास होता है। मैं यह भी महसूस करता हूँ कि सृजनात्मकता का यह आह्वान मूलतः एक आध्यात्मिक शक्ति है। इसलिए यह शक्ति सांसारिक विपत्तियों के अधीन कभी नहीं होती, बल्कि कभी-कभी तो मैं यह भी सोचता हूँ कि यदि मेरा बचपन संघर्षों से भरा न होता, यदि मुझे निरंतर प्रतिकूलताओं का सामना न करना पड़ा होता, तो शायद मैं कवि न बन पाता जोकि मैं आज हूँ! यह तथ्य है कि पंद्रह वर्ष की आयु से लेकर पिछले साठ वर्षों से मैं निरंतर कविता लिखता आ रहा हूँ और अब तक मेरे नाम से बारह कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। विश्व-टेनिस की महान् खिलाड़ी बिली जीन किंग ने प्रसिद्ध रूप से कहा था—“Pressure is a privilege” (दबाव एक विशेषाधिकार है), और यह वाक्य न्यूयॉर्क के टेनिस-स्टेडियम के सेंटर-कोर्ट में अंकित है। मैंने उनके शब्दों की सच्चाई को अपने जीवन में महसूस किया है।
दो
कलात्मक सृजन के सामने अनेक चुनौतियाँ होती हैं और उसी प्रकार एक कलाकार की दुविधाएँ भी कम नहीं होतीं। एक कवि के रूप में मेरी अपनी दुविधा यह है कि मैं कविता के आदर्शों—प्रेम और करुणा, सौंदर्य और शुभता—पर खरा उतर सकूँ और अपने काव्यात्मक एकाकीपन से बाहर निकलकर मानव-एकजुटता को समझ सकूँ। वास्तव में ये दुविधाएँ नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य के रूप में मेरी सीमाएँ हैं, जो एक कवि के आध्यात्मिक स्तर को प्राप्त करना चाहता है। यह मेरे लिए एक निजी समस्या है और इसे अपनी जाग्रत अवस्था के हर क्षण में मुझे अकेले ही सुलझाना होता है।
लेकिन आधुनिक समय में हमारी सृजनात्मकता के सामने एक ऐसी चुनौती है, जिस पर विशेष तौर पर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। यह चुनौती पश्चिमी आधुनिकतावाद के कुछ हानिकारक दृष्टिकोणों से उपजीं और आज दुनिया भर के कलात्मक मनों पर हावी हैं।
मैं इस चुनौती को भली-भाँति समझता हूँ और अपने लेखन के द्वारा इसका सामना करना मैंने अपना निजी लक्ष्य बना लिया है। यह आधुनिकतावादी विश्व-दृष्टि के विरुद्ध मेरे वैचारिक अभियान के विषय में है। मुझे यह विश्वदृष्टि इसके दो मूल सिद्धांतों में ही गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण लगती है—(1) अलगाव (Alienation) की अवधारणा, और (2) अस्तित्वगत निराशा (Existential Despair) की अवधारणा।
मेरा मानना है कि चरम व्यक्तिवाद और अस्तित्वगत निराशा के विवेकहीन भावनाओं से परिपूर्ण यह पश्चिमी विश्व-दृष्टि उन ग़ैर-पश्चिमी समाजों के आधुनिक साहित्यिक मनों को गहराई से दूषित कर चुकी है; जिनकी आनंद, विस्मय और पारिवारिक सुख जैसे विषयों पर आधारित अपनी प्राचीन दार्शनिक परंपराएँ रही हैं। व्यक्तिवाद का यह विषाणु विश्व-साहित्य में अस्तित्वगत उदासी की महामारी फैला चुका है। और अब समय आ गया है कि इस विषाणु से ‘वैश्विक-आनंद (cosmic joy)’ के टीके द्वारा मुक़ाबला किया जाए।
चूँकि अस्तित्ववाद आधुनिकतावाद की सबसे प्रमुख दर्शन-धारा है, जो समाज पर ‘स्व’ की प्रधानता का आग्रह करती है, इसलिए आधुनिकतावादी लेखक और विचारक इसके तीन मूल सिद्धांतों को मानते हैं—
1. स्व (Self) ब्रह्मांड से अलग-थलग है। इसलिए मनुष्य इस उदासीन और शत्रुतापूर्ण संसार में अकेला और असहाय है। जीवित रहने के लिए उसे स्वयं ही संघर्ष करना पड़ता है। अतः निराशा और मोहभंग उसका अस्तित्वगत भाग्य है।
2. स्व, समाज से श्रेष्ठ है। जो कुछ निजी है, वही पवित्र है। समाज भ्रष्ट और सड़ा हुआ है।
3. और महान् सूत्र—“सत्ता यानी ‘अस्तित्व’, ‘सार’ यानी अर्थवत्ता से पहले आती है (Existence precedes essence)”
पहले ‘अलगाव’ संबंधी विचार की मैं जाँच करना चाहूँगा। मैं यह समझने में हमेशा असफल रहा हूँ कि दर्शन के इतने तर्कसंगत और वैज्ञानिक क्षेत्र में यह आत्मकेंद्रित और अवास्तविक भावना—मनुष्य संसार से पृथक है—कैसे पहले दर्जे की बौद्धिक मान्यता पा सकी! क्योंकि मनुष्य प्रकृति की संतान है और अपने पूरे जीवनकाल में हर क्षण उसी की हवा, पानी, भोजन, आश्रय और पोषण पर निर्भर रहता है। प्रकृति ही उसे सौंदर्य को देखने और प्रेम में पड़ने की मूलभूत जीवनी शक्तियाँ प्रदान करती है। इसलिए अलगाव का विचार तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टियों में प्रारंभ से ही ग़लत है। फिर यह आत्ममुग्ध और रोने-धोने वाली भावना आधुनिकतावादी दार्शनिकों के लिए वैध सत्य कैसे बन गई?
मुझे इस भ्रांति के विरुद्ध और तर्क देने की आवश्यकता नहीं लगती। मैं अपने पक्ष में दो उद्धरण देकर बात समाप्त करना चाहूँगा—एक विज्ञान से और एक कविता से। हाल ही में प्रकाशित लोकप्रिय विज्ञान पुस्तक The Shortest History of the Universe (2022) में लेखक डेविड बेकर लिखते हैं—“जब हम रात के आकाश की ओर देखते हैं, तो हम ब्रह्मांड को नहीं देख रहे होते—हम स्वयं ब्रह्मांड हैं, जो स्वयं को देख रहा है।” (When we look into the night sky, we are not looking at the Universe, we are the Universe looking at itself) मुझे आशा है कि यह कथन संदर्भित प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करता है।
अब मैं हमारे महान् कवि रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘गीतांजलि’ (1910) से दो पंक्तियाँ उद्धृत करता हूँ :
“मेरे कवि !
क्या यही तुम्हारा आनंद है, अपनी रचना को मेरी आँखों से देखना?”
रवि ठाकुर के अपने अंग्रेज़ी अनुवाद में ये पंक्तियाँ हैं :
“My poet, is it thy delight to see thy creation through my eyes?”
क्या यह पंक्ति डेविड बेकर के कथन का पूर्वाभास नहीं देती? जिन्हें हम लंबे समय तक कवि की रहस्यवादी दृष्टि मानते रहे, वे आज एक सौ दस वर्ष बाद पूरी तरह से किसी विज्ञान की पुस्तक का अभिकथन प्रतीत होती हैं। यही रवि ठाकुर की महानता है और यही ब्रह्मांड की वह सुंदरता है और इससे जनित वह विस्मय है, जो अपने गूढ़ सत्य को विज्ञान से बहुत पहले कवियों और द्रष्टाओं के समक्ष प्रकट कर देता है!
जहाँ तक दूसरे विचार यानी ‘स्व’ की समाज से श्रेष्ठता की बात है, मुझे यह चरम बुर्जुआ व्यक्तिवाद की धारणा लगती है, अन्य कुछ नहीं। ‘स्व’ कभी समाज से अलग नहीं होता, क्योंकि ‘स्व’ की अवधारणा स्वयं ही एक संश्लिष्ट सामाजिक संरचना है। हमारी आत्म-चेतना हमेशा सामाजिक संदर्भ में ही संभव होती है, इसके बाहर कभी नहीं। नैतिक रूप से भी यह विचार घृणास्पद है।
अब मैं अस्तित्ववाद के मूल सूत्र—“सत्ता, सार से पहले आती है”—पर आता हूँ। यह सूत्र सुनने में भले ही गहन और क्रांतिकारी लगे, लेकिन गहराई से देखने पर यह विरोधाभासी प्रतीत होता है, क्योंकि शब्दकोश के अनुसार ‘सार’ सत्ता का ही अंतर्निहित तत्त्व है। सार के बिना सत्ता का अस्तित्व ही संभव नहीं। फिर एक दूसरे से पहले कैसे हो सकता है? दर्शन की पुस्तकों में इस सिद्धांत की व्याख्या एक अत्यंत मनमानी, अतार्किक और अतिवैयक्तिक व्यक्तिवादी दृष्टि को उजागर करती है। फिर भी, सार्त्र और अन्य अस्तित्ववादी दार्शनिकों के प्रति न्यायोचित रहते हुए मैं दर्शन की एक मानक कोश-पुस्तिका देखता हूँ, ताकि इन दो शब्दों के दार्शनिक संदर्भ को समझ सकूँ। इस मानक कोश से गुजरकर मुझे पता चलता है कि यह व्यक्तिवाद का एक विचित्र व मनमाना, अतार्किक और बेहद आत्मनिष्ठ सिद्धांत है। कोश में अस्तित्ववाद के संदर्भ में दी गई प्रासंगिक प्रविष्टि इस प्रकार है :
“अस्तित्ववाद एक ऐसी दार्शनिक प्रवृत्ति या दृष्टिकोण है, जो बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में यूरोप में हाइडेगर, यास्पर्स, मार्सेल और सार्त्र की रचनाओं के माध्यम से प्रभाव में आया। अस्तित्ववाद सामान्यतः तर्कवाद के साथ ही उन अनुभववादी सिद्धांतों का विरोध करता है जो यह मानते हैं कि ब्रह्मांड एक पूर्व-निश्चित, सुव्यवस्थित प्रणाली है, जिसे एक चिंतनशील द्रष्टा ही समझ सकता है तथा उन प्राकृतिक नियमों की खोज कर सकता है जो सभी प्राणियों को नियंत्रित करते हैं; इस संबंध में मानव गतिविधि को दिशा देने वाली आवश्यक शक्ति—बुद्धि है। अस्तित्ववादी दृष्टिकोण के अंतर्गत, दार्शनिक अनुसंधान की प्रक्रिया में ‘अस्तित्व’ की समस्या को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि ज्ञान की समस्या को। अस्तित्व को वस्तुनिष्ठ जाँच का विषय नहीं बनाया जा सकता। वह निहित समय और स्थान में किसी व्यक्ति को उसके स्वयं के अद्वितीय व ठोस अस्तित्व पर चिंतन के माध्यम से प्रकट होता है।” — ए डिक्शनरी ऑफ फिलॉसफी, पैन बुक्स, 1979
मैं इस अस्तित्ववादी दृष्टिकोण से स्तब्ध रह जाता हूँ कि “अस्तित्व को वस्तुनिष्ठ जाँच का विषय नहीं बनाया जा सकता...” क्योंकि यह दर्शन के उस मूल सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन करता है, जो सत्य की वैज्ञानिक और दार्शनिक खोज से संबद्ध है। उपर्युक्त परिभाषा से यह भी स्पष्ट है कि जिस सूक्ति की जाँच की जा रही है, उसमें ‘अस्तित्व’ का अर्थ वास्तव में अस्तित्व नहीं है, बल्कि यह शब्द यूरोप के कुछ चिंतनशील दार्शनिकों की उदास, अंधकारमयी विश्व-दृष्टि को ढकने वाला एक छलपूर्ण आवरण बन गया है। यह पृथ्वी पर रहने वाले सभी लोगों की सार्वभौमिक अस्तित्वगत दृष्टि का प्रतिनिधित्व नहीं करता और न ही कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, उस सूक्ति में ‘सार’ (essence) का अर्थ वस्तुओं में निहित वास्तविक सार से नहीं है, बल्कि उसे जीवन के बारे में किसी बाहरी दार्शनिक ज्ञान के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। अस्तित्ववादी दृष्टि के अनुसार, यह ‘बाहरी’ दार्शनिक ज्ञान किसी व्यक्ति के मन के अत्यंत निजी अनुभव-क्षेत्र के बारे में कुछ नहीं बताता—जिसे एक आत्मग्रस्त, एकाकी और कुंठित मन के लोग भ्रामक रूप से ‘अस्तित्व’ कहते आए हैं।
वास्तव में, इस सूक्ति की ‘सार’-संबंधी अवधारणा में प्लेटो की वह कल्पना दिखाई देती है, जोकि उसके शाश्वत रूपों (eternal forms) से संबंधित सिद्धांत के बारे में है। किंतु आज, इक्कीसवीं सदी में हम प्लेटो और सार्त्र दोनों से क्षमा माँगते हुए यह स्पष्ट तौर पर कह सकते हैं कि ‘सार’ तो ‘अस्तित्व’ का डीएनए है, और वही वास्तविक जीवन-आस्वाद भी है।
जहाँ तक सार्त्र के इस सिद्धांत का प्रश्न है जिसमें वह “व्यक्ति के अस्तित्व को एक ऐसे स्वतंत्र और जिम्मेदार एजेंट के रूप में रेखांकित करता है, जो अपनी इच्छित कार्यों के माध्यम से अपने विकास का निर्धारण करता है...” (OED, 10वाँ संस्करण), तो मुझे कहना होगा कि वह एक व्यक्ति अवश्य है, किंतु वह माँ के गर्भ से लेकर क़ब्र तक जाने की अपनी यात्रा में अपने विकास को केवल अपनी व्यक्तिगत इच्छा-शक्ति से निर्धारित नहीं कर सकता; क्योंकि वह प्राकृतिक नियमों द्वारा नियंत्रित एक जैविक प्राणी है। वह अपने स्वयं की चेतना के विकास (जिसमें संसार के प्रति उसकी कुंठा भी सम्मिलित है) को भी प्रकृति और समाज से जीवन भर मिलने वाले निरंतर प्रभावों के बिना निर्धारित नहीं कर सकता।
अस्तित्ववाद को यह नहीं भूलना चाहिए कि व्यक्ति केवल तभी स्वतंत्र होता है, जब उसका संसार के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध हो, और वह उत्तरदायी भी केवल समाज और प्रकृति के प्रति होता है—स्वयं के प्रति एक ‘स्वयं-उत्तरदायी एजेंट’ के रूप में नहीं, क्योंकि यह एक विरोधाभास है।
इसके अतिरिक्त, किसी व्यक्ति का कोई ‘स्वयं का अद्वितीय ठोस अस्तित्व’ जैसी कोई चीज़ नहीं है, क्योंकि पृथ्वी पर किसी भी जीव का अपना नश्वर अस्तित्व मूलतः प्राकृतिक शक्तियों द्वारा संचालित होता है और ऐसा क्षणिक अस्तित्व विकास की ब्रह्मांडीय धारा में घूमता हुआ मात्र एक कण है; जिसे मनुष्य नामक उच्च चेतन स्तर का प्राइमेट अपनी व्यक्तिगत चेतना से किसी ‘अद्वितीयता’ के रूप में अनुभव करता है, वह वास्तव में उसका अपने प्रति तीव्र सचेत मन की आत्म-केंद्रित भ्रांति है। मुद्दा यह नहीं है कि अपनी व्यक्तिगत अस्तित्वगत प्रतिक्रियाओं को ‘अद्वितीय’ या ‘प्रामाणिक’ माना जाए, बल्कि यह है कि उन प्रतिक्रियाओं और अनुभवों को प्रकृति में अंतर्निहित सौंदर्य, प्रेम और पीड़ा को अद्भुत अस्तित्वगत सत्यों की अभिव्यक्ति के रूप में समझा जाए। व्यक्तिगत ‘अद्वितीयता’ की अनुभूति मात्र एक भ्रामक अहंकार है। मानव-जीवन के सार्वभौमिक अस्तित्वगत सत्यों को समझने में ऐसी धारणाओं का मूल्य बहुत कम है।
अब मैं आधुनिकतावादी विश्व-दृष्टि की अंतिम अवधारणा की ओर आता हूँ—अस्तित्वगत निराशा। यहाँ मैं इसकी वैधता तय करने के लिए किसी बौद्धिक विश्लेषण या दार्शनिक तर्क से बचूँगा। इसके बजाय, मैं सभी से अनुरोध करूँगा कि वे अपने हृदय पर हाथ रखें, केवल हृदय की सच्चाई कहने की शपथ लें, और केवल अपने जीवित अनुभव के आधार पर इस मूलभूत अस्तित्वगत प्रश्न का उत्तर दें : जीवन की प्रधान भावना क्या है—निराशा या आनंद? मुझे पूरा विश्वास है कि हर हृदय से एक ही स्पष्ट उत्तर आएगा—आनंद!
यहाँ मैं दांते के ‘नरक’ (Hell) की एक पंक्ति उधार लेते हुए सोचता हूँ कि जीवन वही है, जिसे हम उस आनंद के स्थान पर रोने-धोने में लगा देते हैं, जिसके लिए वह वास्तव में था। अतः मैं अपना व्यक्तिगत उत्तर प्रस्तुत करता हूँ : जीवन की प्रधान भावना आनंद है। मैंने अपने सबसे अंधकारमय क्षणों में भी अपने हृदय में असीम और छलकता हुआ आनंद अनुभव किया है और मैं उपनिषद के इस प्रसिद्ध श्लोक में निहित सत्य में दृढ़ विश्वास करता हूँ :
“आनंद से ही सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और आनंद में ही वे अंततः विलीन हो जाते हैं।”
— तैत्तिरीय उपनिषद (35/59)
‘‘It is from joy that all that exist are born;
and it is to joy that all depart and are withdrawn.’’
(Taittiriya Upanishad, 35/59)
मैंने अपने अबतक के अनुभव के द्वारा यह समझा है कि यदि ‘अस्तित्व’ शब्द का कोई अर्थ है, तो वह जीवित होने के आनंद की अनुभूति में है। अस्तित्वगत आनंद—जो प्रत्येक मानव हृदय में सदा से उपस्थित है—यही पृथ्वी पर मानव-जीवन को संभव बनाता है।
तीन
अंततः मैं ब्रह्मांड के सृजन और विकास के संदर्भ में हमारी कलात्मक सृजनात्मकता के स्रोत और स्वरूप पर विचार करना चाहूँगा। इस संदर्भ में विज्ञान से प्राप्त एक अद्भुत प्रमाण मेरे सामने आया है। नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक वेंकी रामकृष्णन अपनी पुस्तक Why We Die (2024) में लिखते हैं कि जीवन की डीएनए-लिपि स्थिर नहीं होती, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को संशोधित करती रहती है—जैसे कोई संगीत-निर्देशक धुन को या फ़िल्म-निर्देशक पटकथा को सँवारता है। यही जीवन की मूल प्रक्रिया है।
“हमारे डीएनए में लिखी जीवन की कोई स्थिर पटकथा नहीं होती है। वह अपने इतिहास और परिवेश के अनुसार चलते-बदलते-ढलते जाती है। इस पटकथा में उसके द्वारा नई पंक्तियाँ जोड़ने की उसकी क्षमता ठीक वैसे ही है, जैसे कोई संगीत-निर्देशक सुरों की रचना पर या कोई फ़िल्म-निर्देशक दी हुई पटकथा पर अपनी टिप्पणियाँ करता है। यही जीवन की कुछ सबसे आधारभूत प्रक्रियाओं की आधारशिला है। इसी कारण ही एक अकेली कोशिका से ही पूरा का पूरा जीव विकसित होता जाता है।”
— (वेंकी रामकृष्णन, Why We Die)
जीवन की रचना पर की गई एक महान् वैज्ञानिक की यह अद्भुत टिप्पणी, संगीत-निर्देशक और फ़िल्म-निर्देशक की सृजनात्मक प्रक्रिया के रूपक का सहारा लेती है; ताकि स्पष्ट रूप से यह समझाया जा सके कि एक कोशिका से पूरा जीव कैसे बनता है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि कला की सृजनात्मक प्रक्रिया स्वयं जीवन की सृजनात्मक प्रक्रिया में गहराई से शामिल है।
कितनी आश्चर्यजनक बात है! पृथ्वी पर जीवन की रचना करते समय प्रकृति किसी मिस्त्री की तरह नहीं, बल्कि एक संगीत-निर्देशक की तरह काम करती है। हमारी कलात्मक सृजनशीलता जीवन के विकास में निहित प्रकृति की आदिम रचनात्मक शक्तियों से ही उत्पन्न होती है।
इस निष्कर्ष पर ग़ौर कीजिए :
आपका शरीर स्वयं एक संगीत-रचना है, जोकि प्रकृति के द्वारा डीएनए की धुन से संचालित होती है। (Your body itself is a piece of music conducted by Nature from its DNA score!) पृथ्वी पर जीवन की रचना में ब्रह्मांड के संगीतमय निहितार्थों के बारे में और अधिक क्या कहा जा सकता है!
आगे, सृजनात्मकता के प्रसंग में संगीत की बात करते हुए मुझे रवींद्रनाथ ठाकुर रचित ‘गीतांजलि’ की एक कविता बार-बार याद आती है, जोकि इस प्रकार है :
जो गीत गाने मैं यहाँ आया था,
वह अब भी नहीं गाया जा सका है।
बस साज का हल्का अभ्यास है अभी,
एक इच्छा के वशीभूत मैं बढ़ रहा हूँ
सुरों को तो अभी मैंने छुआ ही नहीं है,
शब्दबद्ध तो अभी तक कुछ हुआ ही नहीं
बस एक गीत की बेचैनी है मेरे अंतर में।
अब भी बंद है वह कली—
जिसे हवा की एक साँस ने मात्र हिलाया भर है।
(The song I came to sing here stays unsung.
It’s still the scales, just the wish carrying me along.
I haven’t yet hit the notes. I haven’t yet fixed the words.
Within me there’s just a song’s disquiet.
The bud’s still closed. Just a breath of air has stirred.’)
जब भी मैं इन पंक्तियों से गुज़रता हूँ, मेरे भीतर वही भाव जाग उठते हैं—जो गीत मैं गाने आया था, वह अब तक गाया नहीं जा सका। मेरा जीवन प्रायः इसी उद्यम में बीत गया—उसके सूक्ष्म संगीत को समझने और उसके मार्फ़त अब तक निर्मित न हो पाए शब्दों से जूझने में। फिर भी मैं सतत जी रहा हूँ , क्योंकि मेरे हृदय में उस अधूरे गीत की बेचैनी है। शायद हम सबके साथ ऐसा ही होता है। संभवतः हमारी सृजनात्मकता को आगे बढ़ाने वाली शक्ति भी हमारे भीतर बसे उस अपूर्ण, अलौकिक गीत की ही बेचैनी है।
•••
‘अकार’ के 73वें अंक से साभार प्रस्तुत।
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