1936 - 2003 | उदयपुर, राजस्थान
सुप्रसिद्ध कथाकार। पाँच कहानी-संग्रह प्रकाशित।
सूरज ढले छग्गी पोखर टोले पहुँची थी। धनुष की ढब मुड़ी बाँस की खपच्चियों पर सधी अपनी झुग्गी के सामने, कंधे पर झूलते तार के छींके-पिंजरे पटक कर उसने हाथ झटक दिया। फिर ओछे हाथ को पूरे हाथ से सहलाकर सामने देखा—नरसिंघा मरी चाल से बढ़ा आता था। उसके कंधे पर
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