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भगवान सिंह

1931 | गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

भगवान सिंह का परिचय

भगवान सिंह हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक, लेखक, इतिहासकार और भाषा वैज्ञानिक हैं। वे शोधपरक लेखन इतिहास और भाषा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं। उनका जन्म 1 जुलाई 1931 को गोरखपुर जनपद के गगहा गाँव में एक किसान परिवार में हुआ। उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम. ए. (हिंदी) करते हुए आरंभिक लेखन की शुरुआत सर्जनात्मक कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना से की। उन्होंने 'ऋग्वेद की परंपरा’ पर धारावाहिक लेखन किया और 'नया ज्ञानोदय’ से संबद्ध रहे।

प्रमुख कृतियाँ :- महाभिषग (1973), काले उजले टीले (1964), अपने अपने राम (1992), परम गति (1999), उन्माद (2000), शुभ्रा  (2000), अपने समानान्तर (1970), इन्द्र धनुष के रंग (1996)। 

शोधपरक रचनाएँ :- स्थान नामों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन (अंशत: प्रकाशित, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, 1973), आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता (1973), हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य, दो खंडों में (1987); दि वेदिक हड़प्पन्स (1995), भारत तब से अब तक (1996), भारतीय सभ्यता की निर्मिति (2004), भारतीय परंपरा की खोज (2011), प्राचीन भारत के इतिहासकार (2011), कोसंबी : मिथक और यथार्थ (2011), आर्य द्रविड़ भाषाओं का अंत संबंध (2013), इतिहास का वर्तमान (2016)।

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