हिंदी साहित्य का इतिहास :
हिंदी साहित्येतिहास दर्शन
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की पद्धतियाँ
हिंदी साहित्य का कालविभाजन और नामकरण, आदिकाल की विशेषताएँ एवं साहित्यिक प्रवृतियाँ, रासो-साहित्य, आदिकालीन हिंदी का जैन साहित्य, सिद्ध और नाथ साहित्य, अमीर ख़ुसरो की हिंदी कविता, विद्यापति और उनकी पदावली तथा लौकिक साहित्य
भक्तिकाल
भक्ति-आंदोलन के उदय के सामाजिक-सांस्कृतिक कारण, भक्ति-आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरुप और उसका अन्तःप्रादेशिक वैशिष्ट्य।
भक्ति काव्य की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, आलवार संत। भक्ति काव्य के प्रमुख सम्प्रदाय और उनका वैचारिक आधार। निर्गुण-सुगण कवि और उनका काव्य।
रीतिकाल
सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्टभूमि, रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ (रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त)
रीतिकवियों का आचार्यत्व।
रीतिकाल के प्रमुख कवि और उनका काव्य
आधुनिक काल
हिंदी गद्य का उद्भव और विकास। भारतेंदु पूर्व हिंदी गद्य, 1857 की क्रांति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण, भारतेंदु और उनका युग, पत्रकारिता का आरंभ और 19वीं शताब्दी की हिंदी पत्रकारिता, आधुनिकता की अवधारणा।
द्विवेदी युग : महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग, हिंदी नवजागरण और सरस्वती, राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रमुख कवि, स्वच्छंदतावाद और उसके प्रमुख कवि।
छायावाद : छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताएँ, छायावाद के प्रमुख कवि, प्रगतिवाद की अवधारणा, प्रगतिवादी काव्य और उसके प्रमुख कवि, प्रयोगवाद और नई कविता, नई कविता के कवि, समकालीन कविता (वर्ष 2000 तक) समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता।
हिंदी साहित्येतिहास दर्शन-
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की पद्धतियाँ-
हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन-
आधुनिक ढंग से इतिहास लेखन की शुरुआत भारत में ब्रिटिशकाल में हुई। हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन औपनिवेशिक शासन और उससे मुक्ति के संघर्षों के बीच शुरु हुआ था। परिणामतः प्रारंभिक काल में साहित्येतिहास लेखन पर जहाँ एक और औपनिवेशिक दृष्टिकोण का प्रभाव दिखा, वहीं दूसरी तरफ़ औपनिवेशिक मानसिकता विरोधी और राष्ट्रीय नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में विकसित होती इतिहास दृष्टि दिखी। गार्सा द तासी ने ‘इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी’ नाम से पहला इतिहास लिखा, जिसका पहला खंड सन् 1839 में और दूसरा खंड सन् 1847 में प्रकाशित हुआ। इसके पश्वात् शिवसिंह सेंगर का ‘शिवसिंह सरोज’ (सन् 1883) प्रकाशित हुआ। इसमें लगभग एक हज़ार रचनाकारों का जीवन चरित उनकी रचनाओं सहित वर्णित है। आगे चलकर सन् 1888 में एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल की पत्रिका के विशेषांक के रूप में जार्ज ग्रियर्सन का ‘द माडर्न वर्नाक्युलर लिट्रेचर ऑफ़ हिन्दुस्तान’ का प्रकाशन हुआ। इसे ही वास्तविक अर्थ में हिंदी का पहला इतिहास माना जाता है। ग्रियर्सन के बाद मिश्र-बंधुओं ने चार खंडों में ‘मिश्रबंधु-विनोद लिखा, जिसके तीन खंड सन् 1913 में और अंतिम खंड सन् 1919 में प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ में लगभग पाँच हज़ार रचनाकारों का वर्णन है। इसमें वर्णित सामग्री का बाद के अनेक इतिहासकारों ने उपयोग किया, जिनमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम भी शामिल है। मिश्र-बंधुओं के बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास’ (सन् 1929) लिखकर इस परंपरा की आगे बढ़ाया, जो नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हिंदी शब्द-सागर की भूमिका के रूप में लिखा गया। आगे चलकर इस परंपरा को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, भित्रदान सिंह चौहान, डॉ. नगेंद्र, रामखेलावन पांडेय, रमाशंकर शुक्ल, रामस्वरूप चतुर्वेदी, विश्वनाथ त्रिपाठी, चंद्रगुप्त वेदालंकार, और सुमन राजे ने समृद्ध किया।
हिंदी साहित्य के विस्तार को हिंदी साहित्य के घेरे में समेटने का प्रयास ‘हिंदी साहित्य का वृहत् इतिहास’ में किया गया है। हिंदी साहित्य का वृहत् इतिहास की योजना नागरी प्रचारणी सभा, काशी ने संवत् 2010 में की। इस योजना के अंतर्गत हिंदी साहित्य के इतिहास को सत्रह खंडों में प्रकाशित करना था। इसकी योजना कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ़ लिटरेचर के ढंग पर बनाई गई।
साहित्य का इतिहास दर्शन
नलिन विलोचन शर्मा ने सन् 1960 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् से प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’ के माध्यम से हिंदी में पहली बार इतिहास दर्शन पर व्यवस्थित तरीक़े से विचार करने की परंपरा शुरु की।
उन्होंने गार्सा द तासी, शिवसिंह सेंगर, जार्ज ग्रियर्सन, मिश्र बंधुओं, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रामशंकर शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की इतिहास दृष्टि पर विचार किया है।
नलिन जी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा की चर्चा करते हुए गार्सा द तासी के महत्व का उल्लेख करने के बावजूद साहित्येतिहास के क्षेत्र में हिंदी का पहला प्रयास शिवसिंह कृत, ‘शिवसिंह सरोज’ नामक वृत्त संग्रह को मानते हैं और युग विभाजन, पृष्ठभूमि-निर्देश, सामान्य प्रवृत्ति निरूपण, तुलनात्मक आलोचना, रचना के मूल्यांकन संबंधी प्रयास तथा विवेचन की साहित्यिकता के दृष्टिकोण के आधार पर हिंदी का पहला इतिहास ग्रियर्सन की पुस्तक ‘द माडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ़ हिन्दुस्तान’ को मानते हैं।
नलिन जी हिंदी साहित्येतिहास लेखन में विधेयवादी प्रणाली के सूत्रपात का श्रेय ग्रियर्सन को देते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है कि ‘हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए विधेयवादी प्रणाली के विनियोग के प्रवर्तन के श्रेय का अधिकारी पं. रामचंद्र शुक्ल अपने को मानते हैं, वह वस्तुतः ग्रियर्सन को प्राप्य है।’ आचार्य शुक्ल ने पश्चिमी इतिहास लेखन में प्रचलित विधेयवाद को थोडे़ नयेपन के साथ अपनाया था।
रामविलास शर्मा हिंदी के उन प्रमुख आलोचकों में शामिल है जिन्होंने भाषा, साहित्य और उनसे जुड़े पक्षों पर मार्क्सवादी ढंग से विचार किया है। उनके अनुसार किसी भी भाषा के साहित्येतिहास लेखन के लिए दो बुनियादी शर्तों को पूरा करना ज़रूरी है। पहली, दूसरी भाषाओं के साहित्यिक विकास और उनके अंतर्संबंधों का ज्ञान। रामविलास शर्मा ने साहित्येतिहास लेखन के लिए जिस दूसरी धारणा की आवश्यकता बतलाई, वह है उस जाति और भाषा के विकास के संबंध का ज्ञान। जैसे, हिंदी भाषा का विकास हिंदी जाति के साथ हुआ। अतः हिंदी साहित्य का इतिहास, हिंदी जाति के इतिहास में निरपेक्ष नहीं हो सकता है।
साहित्य इतिहास की स्त्री दृष्टि
हाल के दशकों में इतिहास लेखन संबंधी चिंतन में अस्तित्त्ववादी विमर्श के कारण नए इतिहास लेखन की माँग बढ़ी है। वर्तमान स्त्री-दलित सवालों ने इतिहास संबंधी चिंतन को गहराई से प्रभावित किया है। इस संदर्भ में चर्चित लेखिका सुमन राजे के इतिहास संबंधी लेखन पर विचार किया जा सकता है। सुमन राजे ने हिंदी साहित्य के इतिहास संबंधी चार पुस्तकें लिखीं :-
1. साहित्येतिहास : संरचना और स्वरूप (सन् 1975)
2. साहित्येतिहास : आदिकाल (सन् 1976)
3. हिंदी साहित्य का आधा इतिहास (सन् 2003)
4. इतिहास में श्री (सन् 2012), मृत्युपरांत
अंतिम दोनों पुस्तकों में यह इतिहास में स्त्री के स्थान की तलाश करती हैं। चूँकि पिछले कुछ दशकों में जब इतिहास में सबाल्टर्न को जगह मिलना शुरू हुआ, स्त्री विमर्श केंद्र में आया।
कालविभाजन और नामकरण की आवश्यकता
इतिहास को सही ढंग से समझने के लिए कालविभाजन और नामकरण आवश्यक है। साहित्येतिहास भी इसका अपवाद नहीं है। कालविभाजन और नामकरण करने से इतिहास के अध्ययन में एक प्रकार की व्यवस्था आती है। इसके द्वारा हमें प्रवृत्तिगत बदलाव के कारणों को समझने में आसानी होती है। बिना कालविभाजन के इतिहास अव्यवस्थित और दिशाहीन हो जाता है।
कालविभाजन और नामकरण से हमें साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों, ऐतिहासिक करकों तथा सामाजिक और वैचारिक बदलाव को समझने में सुविधा होती है। कालविभाजन और नामकरण के सहारे हम इन भिन्नताओं के मूल में प्रवेश करते हैं। इसके द्वारा हम संवेदना और शिल्प में आए परिवर्तनों को तर्कपूर्ण ढंग से तो समझते ही हैं, इससे हमारा रचनात्मक आस्वाद भी निखरता है। कदाचित् यही कारण है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पूर्व के लेखकों—गार्सा-द-तासी, शिवसिंह सेंगर, जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन और मिश्र बंधु ने जो हिंदी साहित्य के इतिहास लिखे वे शोध और संदर्भ की दृष्टि से सदा ही महत्वपूर्ण रहेंगे। इन्हीं का उपयोग करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कालविभाजन और नामकरण के आधार निर्मित किए और हिंदी साहित्य का पहला सुव्यवस्थित इतिहास लिखा।
समय बदलने के साथ-साथ युग की परिस्थितियों और प्रवृत्तियों भी बदलती हैं। कालविभाजन और नामकरण की आवश्यकता ही इसलिए पड़ी कि विभिन्न युगों में हुए बदलावों को चिह्नित किया जा सके।
कालविभाजन और नामकरण आधार
1. ऐतिहासिक कालक्रम - आदिकाल, मध्यकाल, आधुनिक काल
2. साहित्यकार केंद्रित - भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, प्रेमचंद प्रसाद युग
3. राष्ट्रीय-सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना - भक्तिकाल, नवजागरण काल
4. साहित्यिक प्रवृत्ति - रीतिकाल, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, नई कहानी आदि।
हिंदी साहित्य का आरंभ कब से माना जाए, इसके बारे में एक समस्या और भी है। वह है हिंदी भाषा और अपभ्रंश भाषा के पारस्परिक संबंध की। भाषा विज्ञान के विद्वान कहते हैं कि प्राकृत भाषा से अपभ्रंश भाषा का और अपभ्रंश भाषा से आधुनिक भारतीय भाषाओं जिनमें हिंदी भी एक है, का विकास हुआ। इस दृष्टि से अपभ्रंश भाषा हिंदी का प्रारंभिक रूप है। परंतु कुछ विद्वान अपभ्रंश को हिंदी से अलग न मानकर हिंदी का ही एक रूप मानते हैं। उदाहरण के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपभ्रंश को ‘प्राकृताभास हिंदी (ऐसी हिंदी जिसमें प्राकृत का आभास हो) माना है, तो राहुल सांकृत्यायन ने अपभ्रंश को ‘पुरानी हिंदी की संज्ञा देते हुए अपभ्रंश के सारे कवियों को हिंदी के कवियों के रूप में स्वीकार किया है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदी के विद्वानों के मुख्यतः दो वर्ग हैं :-
1. एक वर्ग में वे विद्वान आते हैं जो हिंदी और अपभ्रंश को एक मानते हुए हिंदी का आरंभ सातवीं शताब्दी से स्वीकार करते हैं।
2. दूसरे वर्ग में वे विद्वान आते हैं जो कि अपभ्रंश को हिंदी से अलग मानते हुए दसवीं शताब्दी के बाद से हिंदी साहित्य का आरंभ मानते हैं।
हिंदी साहित्य के कालविभाजन के विभिन्न प्रयास
हिंदी साहित्येतिहास के कालविभाजन का प्रथम श्रेय जार्ज ग्रियर्सन को जाता है। इसके बाद मिश्रबंधुओं, रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य के कालविभाजन का प्रयत्न किया है। इनके अतिरिक्त भारतीय हिंदी परिषद (डॉ. धीरेंद्र वर्मा द्वारा संपादित) और डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने भी कालविभाजन का प्रयत्न किया है।
जार्ज ग्रियर्सन द्वारा किया गया कालविभाजन
जार्ज ग्रियर्सन ने 1888 ई. में प्रकाशित ‘द माडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ़ हिन्दुस्तान’ में हिंदी साहित्य का कालविभाजन इस प्रकार से किया है :-
(क) चारण काल (700 ई. से 1300 ई. तक) (ख) पंद्रहवीं शती का धार्मिक पुनर्जागरण (ग) जायसी की प्रेम कविता (घ) कृष्ण संप्रदाय (ड) मुग़ल दरबार (व) तुलसीदास (छ) प्रेमकाव्य तुलसीदास (ट) विक्टोरिया के शासन में हिंदुस्तान।
जार्ज ग्रियर्सन के कालविभाजन में व्यवस्था का अभाव दिखाई पड़ता है। सबसे पहली बात तो यह है कि इसमें किसी साहित्यिक प्रवृत्ति को आधार नहीं बनाया गया है। मुग़ल दरबार, अठारहवीं शताब्दी, कंपनी के शासन में हिंदुस्तान आदि के आधार पर किया गया विभाजन किसी साहित्यिक परिवर्तन का संकेत नहीं देते।
निश्चय ही, हिंदी साहित्य के कालविभाजन के प्रथम प्रयास के रूप में इसका अपना महत्व है, पर इस कालविभाजन को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मिश्रबंधुओं द्वारा किया गया कालविभाजन
1. आरंभिक काल
(क) पूर्व आरंभिक काल-सं, 700 से 1343 (643 ई. से 1286 ई.) (ख) उत्तर आरंभिक काल-सं. 1344 से 1444 (1287ई. से 1387 ई.)
2. माध्यमिक काल
(क) पूर्व माध्यमिक काल-सं. 1445 से 1560 (1388 ई. से 1503 ई.) (ख) प्रौढ़ माध्यमिक काल-सं. 1561 से 1680 (1504 ई. से 1624 ई.)
3. अलंकृत काल
(क) पूर्व अलंकृत काल-सं. 1681 से 1790 (1624 ई. से 1733 ई.) (ख) उत्तर अलंकृत काल-सं. 1791 से 1889 (1734 ई. से 1832 ई.)
4. परिवर्तन काल सं. 1890 से 1925 (1833 ई. से 1868 ई.)
5. वर्तमान काल से 1926 से आगे (1869 ई. से आगे)
मिश्रबंधुओं ने ‘मिश्रबंधु विनोद’ (प्रथम तीन भाग 1913 ई. में तथा चतुर्थ भाग 1934 ई. में प्रकाशित) में कालविभाजन को व्यवस्थित करने का प्रयत्न किया है। मिश्रबंधुओं ने व्यवस्था के नाम पर हिंदी के कालखंडों को उप कालखंडों में विभक्त किया है। इससे स्पष्टता आने के बजाय एक भ्रम पैदा हो गया है। सभी कालों को उन्होंने दो उपखंडों में विभक्त किया, जिसका कोई ठोस आधार दिखाई नहीं पड़ता। माध्यमिक काल को दो हिस्सों में बाँटने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इस काल में एक ही साहित्यिक प्रवृत्ति (भक्ति भावना) की प्रधानता रही। यही बात अलंकृतकाल के लिए भी कही जा सकती है।
इस विभाजन को भी विद्वानों ने स्वीकार नहीं किया है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा (1929 ई. में प्रकाशित हिंदी साहित्य का इतिहास में) किया गया कालविभाजन
1. वीरगाथा काल सं. 1050 से 1375 (993 ई. से 1318 ई.)
2. भक्ति काल सं. 1375 ई. से 1700 (1318 से 1643 ई.)
3. रीतिकाल सं. 1700 से 1900 (1643 ई. से 1843 ई.)
4. आधुनिक काल से. 1900 से अब तक (1843 ई. से आगे)
हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा किया गया कालविभाजन
1. प्रारंभिक काल सन् 1000 ई. से 1400 ई.
2. पूर्व मध्यकाल सन् 1400 ई. से 1700 ई.
3. उत्तरी मध्य युग सन् 1700 ई. 1900 ई.
4. आधुनिक काल सन् 1900 से आगे
डॉ. धीरेंद्र वर्मा तथा अन्य सहयोगियों द्वारा संपादित भारतीय हिंदी परिषद के इतिहास में केवल तीन युगों की कल्पना की गई है आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल।
डॉ. गणपति चंद्र गुप्त ने भी इसी विभाजन को स्वीकार किया है। उनका मानना है कि मध्यकालीन चेतना कमोबेश एक ही रही है। संतकाव्य, प्रेमाख्यानक काव्य, रामकाव्य, कृष्णकाव्य, वीरकाव्य, रीतिकाव्य की धाराएँ पूरे मध्यकाल में प्रवाहित होती रहीं। पर यह मत भी विद्वानों द्वारा मान्य नहीं है। यह ठीक है कि संतकाव्य, प्रेमाख्यानक काव्य, रामकाव्य, कृष्णकाव्य आदि धाराएँ पूरे मध्यकाल में प्रवाहित होती रहीं, पर सत्रहवीं शताब्दी के आते-आते मुख्य प्रवृत्ति बदल गई थी। भक्ति के स्थान पर अलंकरण और शृंगार विलास की प्रवृत्ति मुख्य थी।
आदिकाल
नामकरण - विभिन्न विद्वानों ने इसका नामकरण इस प्रकार किया है :-
इतिहासकार एवं नामकरण
1. ग्रियर्सन - चारणकाल
2. मिश्रबंधु - प्रारंभिक काल
3. रामचंद्र शुक्ल - वीरगाथा काल
4. राहुल सांकृत्यायन - सिद्ध-सामंती युग
5. महावीरप्रसाद द्विवेदी - बीजवपन काल
6. विश्वनाथप्रसाद मिश्र - वीर काल
7. हजारीप्रसाद द्विवेदी - आदिकाल
8. रामकुमार वर्मा - संधिकाल और चारणकाल
ग्रियर्सन ने हिंदी साहित्येतिहास के आरंभिक काल का चारण काल के रूप में नामकरण किया; पर इस नाम के पक्ष में वे कोई ठोस तर्क नहीं उपस्थित कर पाए। वे हिंदी साहित्य के इतिहास की शुरुआत 643 ई. से करते हैं, पर उस समय की किसी चारण रचना या चारण प्रवृत्ति का उल्लेख वे नहीं कर सके हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्येतिहास के इस कालखंड का नाम वीरगाथा काल रखा। वीरगाथा काल नामकरण का आधार स्पष्ट करते हुए शुक्ल जी लिखते हैं आदिकाल की इस दीर्घ परंपरा के बीच प्रथम डेढ़ सौ वर्ष के भीतर तो रचना की किसी विशेष प्रवृत्ति का निश्चय नहीं होता है—धर्म, नीति, शृंगार, वीर सब प्रकार की रचनाएँ दोहों में मिलती है। इस अनिर्दिष्ट लोक प्रवृत्ति के उपरांत जब से मुसलमानों की चढ़ाइयों का प्रारंभ होता है तब से हम हिंदी साहित्य की प्रवृत्ति एक विशेष रूप में बँधती हुई पाते हैं। राजाश्रित कवि और चारण जिस प्रकार नीति, शृंगार आदि के फुटकल दोहे राजसभाओं में सुनाया करते थे, उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन करते थे। यही प्रबंध परंपरा ‘रासो’ के नाम से पाई जाती है, जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने वीरगाथा काल कहा है। आचार्य शुक्ल ने जिन बारह पुस्तकों के आधार पर आदिकाल का विवेचन तथा नामकरण किया, वे इस प्रकार है :-
1. विजयपाल रासो
2. हम्मीर रासो
3. कीर्तिलता
4. कीर्तिपताका
5. खुमान रासो
6. बीसलदेव रासो
7. पृथ्वीराज रासो
8. जयचंद्र प्रकाश
9. जयमयंक जसचंद्रिका
10. परमाल रासो
11. ख़ुसरो की पहेलियों और
12. विद्यापति पदावली
वे लिखते हैं कि इन्हीं बारह पुस्तकों की दृष्टि से ‘आदिकाल’ का लक्षण निरूपण और नामकरण हो सकता है। इनमें से अंतिम दो तथा बीसलदेव रासो को छोड़कर शेष सब ग्रंथ वीरगाथात्मक ही हैं। अतः आदिकाल का नाम वीरगाथा काल ही रखा जा सकता है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिन बारह पुस्तकों के आधार पर इस काल की प्रवृत्तियों का विवेचन और नामकरण किया है उनमें से कई बाद की रचनाएँ हैं और कई की नोटिस मात्र हैं और कई पुस्तकों के बारे में यह कहना मुश्किल है कि उनका मूल रूप क्या था। अतः केवल इन पुस्तकों के आधार पर वीरगाथा काल नाम दे देना उचित प्रतीत नहीं होता। इसके अतिरिक्त इस काल में वीरकाव्य ही नहीं लिखे गए, बल्कि धार्मिक, शृंगारिक और लौकिक साहित्य की भी रचना हुई। ‘वीरगाथा काल’ नामकरण के कारण इन प्रवृत्तियों की उपेक्षा हो जाती है।
राहुल सांकृत्यायन ने विवेच्य काल को ‘सिद्ध सामंत काल’ कहा है। यह नाम केवल दो वर्गों की ओर संकेत करता है सिद्ध और सामंत। सिद्ध जहाँ रचनाकार थे, वहीं सामंत रचना-प्रेरक। राहुल जी ने जो यह संयोग बनाया है, वह भी तर्कसंगत नहीं है। इसके अतिरिक्त यह कई अन्य प्रवृत्तियों को नज़रअंदाज कर देता है। नाथपंथी और हठयोगी कवियों तथा ख़ुसरो आदि की काव्य प्रवृत्तियों का इस नाम में समावेश नहीं होता। इसलिए यह नाम भी मान्य नहीं है।
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा दिया गया नाम ‘वीरकाल’ शुक्ल जी के नामकरण का रूपांतर हैं। इसमें कोई मौलिकता नहीं है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी दसवीं से चौदहवीं शताब्दी तक के काल खंड को ‘आदिकाल’ कहना पसंद करते हैं। उन्होंने ‘आदिकाल’ के अंतर्गत धार्मिक रचनाओं का भी समावेश किया है। उनका तर्क है कि यदि इस काल की धार्मिक रचनाओं को साहित्य का अंग न माना गया तो भक्तिकाल की संपूर्ण संपदा से हमें हाथ धोना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त इस समय और भी कई प्रवृत्तियों का जन्म और विकास हो रहा था, जैसे शृंगार काव्य, लौकिक काव्य आदि।
वीरगाथात्मक काव्य से अलग काव्य प्रवृत्तियाँ भी जनता की चित्तवृत्ति का ही प्रतीक है, अतः ‘आदिकाल’ का नामकरण करते समय उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
डॉ. रामकुमार वर्मा ने ‘आदिकाल’ को दो खंडों में विभाजित कर दिया है—संधिकाल और चारणकाल। संधिकाल भाषा की ओर संकेत करता है और चारणकाल से एक वर्ग विशेष का बोध होता है। इस नामकरण की कमज़ोरी यह है कि इसमें किसी प्रवृत्ति को आधार नहीं बनाया गया है। अतः यह नामकरण भी विद्वानों के बीच मान्य नहीं है।
वस्तुतः ‘आदिकाल’ ही ऐसा नाम है, जिस पर इतिहासकार किसी न किसी रूप में सहमत हैं। इस नाम से उस व्यापक पृष्ठभूमि का बोध होता है, जिस पर आगे आने वाले साहित्य का विशाल स्वरूप आधारित है। भाषा की दृष्टि से हम इस काल में हिंदी के आदिरूप की झलक पाते हैं, इसके अतिरिक्त हिंदी साहित्य की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों के आदिम बीज की खोज इस काल में की जा सकती है। परवर्ती साहित्य की विभिन्न शैलियों और काव्य रूपों का आदि रूप भी इस काल के साहित्य में प्राप्त हो जाता है। इस काल की आध्यात्मिक, शृंगारिक तथा वीरता आदि प्रवृत्तियों का विकास परवर्ती साहित्य में हुआ। अतः आदिकाल सर्वाधिक उपयुक्त और व्यापक नाम है।
आदिकाल की विशेषताएँ एवं साहित्यिक प्रवृतियाँ :
हिंदी साहित्य का जो ‘आदिकाल’ है वह भारतीय इतिहास का मध्यकाल है। धर्मोन्मुख समाज तथा सामंती सामाजिक संरचना मध्यकालीन जीवन के प्रमुख तत्व है। हिंदी का प्रारंभिक साहित्य इन्हीं के बीच से निकला। सिद्ध, नाथ तथा जैन कवि अलग-अलग धार्मिक दृष्टिकोण के प्रतिनिधि थे, जबकि ‘रासों के कवि विभिन्न राजाओं के दरबारों से जुड़े चारण कवि थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इनमें से सिर्फ़ रासो कवि की रचनाओं को महत्व दिया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी सिद्ध, नाथ तथा जैन कवियों की उपेक्षा के पक्षधर नहीं हैं। उनके अनुसार, केवल नैतिक और धार्मिक या आध्यात्मिक उपदेशों को देखकर यदि हम ग्रंथों को साहित्य सीमा से बाहर निकालने लगेंगे तो हमें ‘भक्ति काव्य’ से भी हाथ धोना पड़ेगा, तुलसी से भी अलग होना पड़ेगा, कबीर की रचनाओं को नमस्कार कर देना पड़ेगा और जायसी को भी दूर से दंडवत करके विदा कर देना होगा। मध्ययुग के साहित्य की प्रधान प्रेरणा धर्मसाधना ही रही है।
सिद्ध और नाथ कवियों की रचनाओं में ऐसी अनेक प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं जिन्हें बाद में भक्त कवियों ने अपनाया। सिद्धों द्वारा बाह्याडंबर का विरोध किया गया, इसे कबीर ने भी अपनाया।
सूफ़ी कवियों ने जैन कवियों की तरह हिंदू समाज की कथा को आधार के रूप में अपनाया।
सिद्धों नाथों की साधना पद्धति और अभिव्यंजना शैली का कबीर आदि संत कवियों पर काफ़ी प्रभाव है। इस दृष्टि से आदि काव्य के अंतर्गत रासो कवि के साथ सिद्ध, नाथ और जैन कवियों का अध्ययन आवश्यक है। इसके अतिरिक्त इस युग में अमीर ख़ुसरो, विद्यापति, धनपाल आदि लौकिक कवि भी हुए। इस काल का जो साहित्य है वह कुछ तो यथारूप मौजूद है और कुछ में तब्दीली होती रही है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, इस काल की पुस्तकें तीन प्रकार से रक्षित हुई हैं :- (1) राजाश्रय पाकर और राजकीय पुस्तकालयों में सुरक्षित रहकर, (2) सुसंगठित धर्म संप्रदाय का आश्रय पाकर और मठों, विहारों आदि की पुस्तकालयों में शरण पाकर और (3) जनता का प्रेम और प्रोत्साहन पाकर। राजाश्रय सबसे प्रबल साधन था। धर्मसंप्रदाय का संरक्षण उसके बाद ही आता है। तीसरे प्रकार की जो पुस्तकें उपलब्ध हुई हैं वे बदलती रही हैं। जनता को उनके शुद्ध रूप से कोई मतलब नहीं था।
रासो-साहित्य
आदिकालीन हिंदी साहित्य में रासो साहित्य के अनेक रूपों का परिचय मिलता है। कहीं तो इसमें धार्मिक दृष्टि की प्रधानता है तथा कहीं वह वीरगाथाओं के रूप में रचित है। यद्यपि कुछ जैन रासो काव्यों में भी चरित नायक के शौर्य और पराक्रम का वर्णन किया गया है परंतु उन कृतियों की समाप्ति अंततः वैराग्य या शांत रस में हुई है। उपर्युक्त दोनों विषयों से अलग हटकर कुछ कवियों ने शृंगारपरक रासो काव्य की भी रचना की, जिनकी कथावस्तु प्रेम, वियोग तथा पुनर्मिलन पर आधारित है।
रासो काव्य कृतियों के इस वैविध्य को देखते हुए काव्य-विषय की दृष्टि से इन्हें प्रमुखतः तीन वर्गों में विभक्त कर सकते हैं :-
(1) वीरगाथात्मक रासो काव्य
(2) शृंगारपरक रासो काव्य
(3) धार्मिक और उपदेशमूलक रासो
(1) वीरगाथात्मक रासो काव्य : प्रथम वर्ग के अंतर्गत उन वीरगाथात्मक कृतियों को लिया जाता है जो ‘रासो’ के नाम से रचित हैं। ये कृतियाँ मूलतः प्रशस्ति प्रधान चरित काव्य हैं। इस वर्ग के कवियों के अंतर्गत उन आश्रित कवियों का उल्लेख किया जाता है जिनका उद्देश्य अपने आश्रयदाता राजा के चरित्र का गान करना तथा उनके शौर्य का अत्युक्तिपूर्ण वर्णन करना था। वीरगाथात्मक रासो काव्य की प्रमुख कृतियाँ महाकवि चंदवरदाई द्वारा रचित ‘पृथ्वीराज रासो’, शारङ्गधर कृत ‘हम्मीर रासो’, दलपति विजय कृत ‘खुमाण रासो’, जगनिक कृत ‘परमाल रासो’, नल्हसिंह कृत ‘विजयपाल रासो’ आदि हैं।
(2) शृंगारपरक रासो काव्य : द्वितीय वर्ग शृंगारपरक रासो काव्यों का है। इस वर्ग के अंतर्गत वे गेय रचनाएँ आती हैं जिनका मूल विषय प्रेम तथा शृंगार रहा है। इस वर्ग की प्रमुख रचनाएँ अब्दुल रहमान कृत ‘संदेश रासक’, नरपति नाल्ह कृत ‘बीसलदेव रासो’ तथा किसी अज्ञात कवि द्वारा रचित ‘मुंज’ रासो हैं।
(3) धार्मिक और उपदेशमूलक रासो : तृतीय वर्ग में मुख्यतः जैन आचार्यों द्वारा रचित ‘रासो’ कृतियाँ हैं। इन ग्रंथों में धार्मिक दृष्टि की प्रधानता है तथा धर्म से संबद्ध नीति और उपदेशों का अंकन है। इस वर्ग के अंतर्गत आने वाली रचनाएँ जिनदत्त सूरि कृत ‘उपदेश रसायन रास, कवि आसगु कृत ‘चंदनबाला रास, जिनधर्म सूरि कृत स्थूलिभद्र रास, आचार्य शालिभद्र सूरि कृत ‘भरतेश्वर बाहुबलि रास’, विजयसेन कृत रेवंतगिरि रास’ आदि हैं।
आदिकालीन हिंदी का जैन साहित्य
जैन मुनियों ने अपने धर्म का प्रचार लोकभाषा में किया। यह अपभ्रंश से प्रभावित हिंदी थी। इनकी अधिकांश रचनाएँ धार्मिक हैं जिनमें जैन संप्रदाय की नीतियों का प्रमुख रूप से उल्लेख है। इन कवियों की कृतियाँ रास, फागू, चरित काव्य आदि विविध काव्य रूपों में प्राप्त होती हैं। इन कृतियों में उपदेशात्मक प्रवृत्ति की प्रधानता है। चरित काव्यों में प्रसिद्ध पुरुषों की कथा का वर्णन है, परंतु उनमें भी धार्मिक भावनाओं की प्रधानता है। प्रमुख रास काव्यों में प्रेम, विरह तथा युद्ध आदि का वर्णन है। लौकिक काव्य होने पर भी इनमें कहीं-कहीं धार्मिक तत्वों का समावेश हो गया है। कुछ जैन कवियों ने पौराणिक कथाओं के प्रमुख और प्रसिद्ध चरित्रों जैसे राम तथा कृष्ण को अपने धार्मिक सिद्धांतों के अनुरूप ढालकर प्रस्तुत किया है। इनके अतिरिक्त जैन कवियों ने रहस्यवादी काव्यों की भी सृष्टि की है। वास्तव में इन कृतियों की भाषा ही अधिक शिष्ट और परिनिष्ठित है। इनमें जोइंदु रचित ‘परमात्म प्रकाश’ और मुनि रामसिंह द्वारा रचित ‘पाहुड़दोहा’ उल्लेखनीय हैं।
जैन कवियों में रासो काव्यकारों के अतिरिक्त जिन प्रमुख कवियों का उल्लेख किया जाता है वे स्वयंभू तथा पुष्पदंत हैं।
स्वयंभू - इन्हें अपभ्रंश का प्रथम जैन कवि माना जाता है। अनुमानतः इनका जन्म सातवीं शती में हुआ था। इनकी उल्लेखनीय कृतियाँ तीन हैं, जिनके नाम ‘रिट्ठणेमि चरिउ (‘अरिष्ट नेमि चरित’), ‘पउम चरिउ’ (‘पद्म चरित’) तथा ‘स्वयंभू छंद हैं। ‘पउम चरिउ’ इनका प्रसिद्ध ग्रंथ है। यह जैन रामायण है तथा इसमें राम की कथा है। स्वयंभू ने जैन धर्म की रीति-नीति के अनुसार राम कथा में परिवर्तन किया है। अपनी इस कृति में कवि ने कुछ नवीन प्रसंगों की संरचना भी की है। इन्होंने अपनी इस कृति को पाँच कांडों में विभक्त किया है। इस ग्रंथ में कवि ने प्रकृति-वर्णन, युद्ध वर्णन आदि का विराट अंकन किया है। इस कृति के काव्य-सौंदर्य के आधार पर ही स्वयंभू को अपभ्रंश का वाल्मीकि कहा जाता है। राहुल सांकृत्यायन ने स्वयंभू द्वारा रचित इस रामायण को हिंदी का सबसे पुराना और उत्तम काव्य माना है।
पुष्पदंत - पुष्पदंत का आविर्भाव काल दसवीं शती के प्रारंभ में माना जाता है। इनकी उल्लेखनीय कृतियाँ ‘तिसट्ठि महापुरिस गुणालंकार महापुराण’ तथा ‘णायकुमार चरिउ’ (नागकुमार चरित) है। अपभ्रंश साहित्य की समृद्धि तथा हिंदी भाषा के विकास में जैन कवियों का उल्लेखनीय स्थान है।
सिद्ध और नाथ साहित्य
सिद्ध काव्य :
सिद्ध संप्रदाय को बौद्ध धर्म की परंपरा का हिंदू धर्म से प्रभावित एक धार्मिक आंदोलन माना जाता है। तांत्रिक क्रियाओं में आस्था तथा मंत्र द्वारा सिद्धि चाहने के कारण इन्हें ‘सिद्ध’ कहा जाने लगा। इन सिद्धों की संख्या 84 मानी गई है। राहुल सांकृत्यायन ने तथा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इन 84 सिद्धों के नामों का भी उल्लेख किया है जिनमें सरहपा, शबरपा, कण्हपा, लुइपा, डोम्भिपा, कुक्कुरिपा आदि प्रमुख हैं। इन सभी सिद्धों के नाम के आगे लगा ‘पा’ शब्द सम्मानसूचक शब्द ‘पाद’ का विकृत रूप है। इनमें से केवल 14 सिद्धों की रचनाएँ ही अभी तक उपलब्ध है।
सिद्धों द्वारा जनभाषा में लिखित साहित्य को ‘सिद्ध साहित्य’ कहा जाता है। यह साहित्य वस्तुतः बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का प्रचार करने हेतु रचा गया था। अनुमानतः इस साहित्य का रचनाकाल सातवीं से तेरहवीं शती के मध्य तक है। इन सिद्ध कवियों की रचनाएँ प्रमुखतः दो काव्य-रूपों में मिलती है- ‘दोहा कोष’ तथा ‘चर्यापद’। सिद्धाचार्यों द्वारा लिखित दोहों का संग्रह ‘दोहा कोष’ के नाम से जाना जाता है तथा उनके द्वारा रचित पद ‘चर्यापद’ या ‘चर्यागीत’ के नाम से प्रसिद्ध हैं।
सिद्ध साहित्य में स्वाभाविक सुख भोगों को स्वीकार करने की बात की गई है तथा गृहस्थ जीवन पर बल दिया गया है। इन्होंने पाखंड तथा बाह्य अनुष्ठानों का विरोध कर अपने शरीर में ही परमात्मा का निवास माना है। सिद्धों के साहित्य में गुरु के विशेष महत्व को प्रतिपादित किया गया है। उनके अनुसार शरीर में स्थित ब्रह्म की प्राप्ति गुरु की कृपा के द्वारा ही संभव है, क्योंकि विविध तांत्रिक क्रियाओं और उनके प्रयोगों का विश्लेषण गुरु ही बता सकता है जिसके माध्यम से अभीष्ट की प्राप्ति की जा सकती है।
सिद्ध साहित्य की भाषा को अर्धमागधी अपभ्रंश के निकट माना जाता है। चूँकि इस साहित्य की भाषा को अपभ्रंश तथा हिंदी के संधिकाल की भाषा माना जाता है, अतः इसे ‘संधा या संध्या भाषा’ का नाम भी दिया गया है।
वस्तुतः सिद्ध कवियों का अभीष्ट काव्य-लेखन नहीं था। वे तो केवल अपने विचारों और सिद्धांतों की अभिव्यक्ति के लिए जनभाषा में साहित्य रचते थे। इनकी भाषा शैली में जो अक्खड़पन और प्रतीकात्मकता है उसका प्रभाव परवर्ती हिंदी साहित्य पर पड़ा। इन कवियों ने अपनी बात सीधे-सादे ढंग से न कहकर तंत्र-मंत्र के अंतर्गत प्रयोग किए जाने वाले विशिष्ट शब्दों के माध्यम से की है। कबीर आदि संत कवियों में दृष्टव्य यह विशिष्ट शैली तथा अक्खड़पन इन्हीं कवियों का प्रभाव कहा जा सकता है। राहुल सांकृत्यायन परवर्ती हिंदी कवियों पर इनके प्रभाव के संबंध में कहते हैं, यही कवि हिंदी काव्यधारा के प्रथम स्रष्टा थे। नए-नए छंदों की सृष्टि करना तो इनका अद्भुत कृतित्व था। इन्होंने दोहा, सोरठा, चौपाई, छप्पय आदि कई सौ छंदों की सृष्टि की, जिन्हें हिंदी कवियों ने बराबर अपनाया है।
नाथ काव्य :
नाथ संप्रदाय को सिद्धों की परंपरा का विकसित रूप माना जाता है। नाथ साहित्य का प्रवर्तक गोरखनाथ को स्वीकार किया जाता है। इनकी साधना सिद्ध साधना से अलग है। नाथ संप्रदाय को अनेक नामों से जाना जाता है जैसे-नाथमत, योगमार्ग, योग संप्रदाय, अवधूत मत आदि। नाथ संप्रदाय में ‘नाथ’ शब्द का अर्थ ‘मुक्ति देने वाला’ प्रचलित है। नाथों ने अपने साहित्य में स्पष्ट किया है कि यह मुक्ति सांसारिक आकर्षणों और भोग-विलास से है। इस प्रकार नाथ संप्रदाय के योगियों ने निवृत्ति के मार्ग पर जोर दिया तथा उन्होंने गुरु को ही इस मार्ग का मार्गदर्शक माना। उनके साहित्य में विविध साधना द्वारा कुंडलिनी जाग्रत कर परमानंद आदि की क्रिया का विवरण मिलता है।
विरागी होने पर शिष्य प्राण साधना के माध्यम से कुंडलिनी जाग्रत कर मन को अंतर्मुखी कर लेता है जिससे उसे अपने भीतर ही परम आनंद की प्राप्ति होती है। इस संप्रदाय में प्राण साधना से पहले इंद्रिय निग्रह पर बल दिया गया है। इंद्रिय निग्रह के अंतर्गत नारी से दूर रहने की प्रवृत्ति विशेष रूप से दृष्टव्य है। आगे चलकर भक्तिकाल में कबीर ने भी इसी प्रवृत्ति को अपनाया तथा नारी का विरोध स्पष्ट शब्दों में किया। उनके तथा अन्य संत कवियों के काव्य में दृष्टव्य प्राण साधना, कुंडलिनी जागरण और मन साधना आदि की क्रियाओं का वर्णन भी नाथ योगी कवियों का प्रभाव कहा जा सकता है।
नाथ योगियों की संख्या 9 मानी गई है। इनके नाम नागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चंद्र, सत्यनाथ, भीमनाथ, गोरखनाथ, चर्पटनाथ, जलंघर और मलयार्जुन हैं। इस संप्रदाय का आचार्य गोरखनाथ को माना जाता है तथा मत्स्येंद्रनाथ उनके गुरु थे।
गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) - गोरखनाथ को नाथ संप्रदाय का आचार्य तथा नाथ साहित्य का प्रवर्तक माना गया है। इनके आविर्भाव काल के संबंध में अनेक विद्वानों में मतभेद हैं। राहुल सांकृत्यायन ने इनका समय 845 ई. माना। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी इन्हें नवीं शती का तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल इन्हें 13वीं शती का मानते हैं। बाद में विद्वानों द्वारा की गई खोजों के बाद यह माना जाने लगा कि इनका रचनाकाल 13वीं शती ही है।
गोरखनाथ द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या चालीस मानी जाती है परंतु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल आदि विद्वानों ने इनके द्वारा रचित जो ग्रंथ स्वीकार किए हैं उनके नाम हैं- ‘सबदी’, ‘पद’, ‘प्राण संकली’, ‘सिष्यादासन’ आदि।
अमीर ख़ुसरो की हिंदी कविता
अमीर ख़ुसरो बहुमुखी प्रतिमा के धनी थे। उन्हें विविध विधाओं में निपुणता हासिल थी। इतिहास, कविता, संगीत आदि विविध विषयों पर उन्होंने लेखनी चलाई। वे कई भाषाओं के जानकार थे। फ़ारसी, उर्दू, ब्रजभाषा, खड़ीबोली तथा कई अन्य भाषाओं में वे समान अधिकार के साथ लिख सकते थे।
उन्होंने जनता में प्रचलित पद्य, पहेलियों तथा मुकरियों को अपनाया। उनके दोहे तथा पहेलियों में एक ख़ास प्रकार की तुकबंदी है। कहीं-कहीं तो उन्होंने फ़ारसी भाषा और ब्रजभाषा की संगीतात्मक ध्वनि को एक-साथ पिरो दिया। दो भिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के छंद को एक साथ मिलाने का असाधारण कार्य कोई दृष्टि सम्पन्न अध्येता ही कर सकता है।
ख़ुसरो की हिंदी रचनाओं में दो प्रकार की भाषा पाई जाती है। ठेठ खड़ी बोलचाल की भाषा पहेलियों, मुकरियों और दो सुखनों में ही मिलती है—यद्यपि उनमें भी कहीं-कहीं ब्रजभाषा की झलक है। पर गीतों और दोहों की भाषा ब्रज या मुख प्रचलित काव्यभाषा ही है। मध्यदेश के जनमानस में प्रचलित भाषा और जनता की सोच-समझ को जानने के लिए आदिकालीन हिंदी साहित्य में ख़ुसरो का महत्व अतुलनीय है।
उन्होंने सभी काव्य-शैलियों का प्रयोग किया। उन्होंने एक नई फ़ारसी शैली का निर्माण किया जो बाद में सबक-ए-हिंदी या भारतीय शैली कहलाई। ख़ुसरो द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या सौ बताई जाती है, जिनमें बीस इक्कीस ही उपलब्ध हैं। खलिकबारी, पहेलियाँ, मुकरियों, दो सुखने, गजल आदि अधिक प्रसिद्ध है। ख़ुसरो की मुकरियों और पहेलियाँ जनता के बीच अधिक लोकप्रिय हैं। अमीर ख़ुसरो ने ब्रजभाषा में गीत और कव्वालियों को रचा। उन्होंने अरबी और ईरानी रागों को हिंदी प्रदेशों में प्रचलित किया। सितार और तबले जैसे वाद्ययंत्र के निर्माण का श्रेय भी ख़ुसरो को ही दिया जाता है।
विद्यापति और उनकी पदावली तथा लौकिक साहित्य
विद्यापति - विद्यापति का रचनाकाल चौदहवीं शताब्दी था। उस काल की देशभाषा को अपभ्रंश में मिलाकर रचने की प्रवृत्ति प्रचलित थी। विद्यापति ने भी इन रूढ़ियों का पालन किया, परंतु उनके काव्य में देशभाषा का स्वतंत्र विकास भी देखने को मिलता है। अपभ्रंश मिश्रित लोकभाषा जिसे विद्यापति ने अवहट्ठ कहा है, तथा मिथलांचल प्रदेश में प्रचलित लोकभाषा मैथिली दोनों ही भाषाओं में विद्यापति ने रचना की। विद्यापति की स्पष्ट मान्यता थी—
देसिल बयना सब जन मिट्ठा। ते तैसन जम्पओ अवहट्ठा।
अर्थात् देशी भाषा सबको मीठी लगती है, इससे वैसा ही अपभ्रंश में कहता हूँ। विद्यापति दो भाषाओं को स्वीकार करते हुए भी देशभाषा को प्रमुख मानते है। विद्यापति राजाश्रय में रचना कर रहे थे। वे कीर्ति सिंह के दरबार में रहते थे। कीर्तिलता और कीर्तिपताका उनकी रचनाएँ है। विद्यापति की भाषा में लोक अनुभूति और लोक-अनुभव का आधार इतना गहरा था कि उससे उनकी अवहट्ट्ठ रचनाएँ भी प्रभावित हुईं। उस अपभ्रंश की विशेषता यह है कि उसमें देशभाषा का कुछ अधिक प्रभाव है। यह वस्तुतः विद्यापति के सामने कविता की दो धाराएँ थीं एक प्राचीन मैथिली की और दूसरी उत्तरकालीन अवहट्ठ की। विद्यापति ने दोनों प्रकार की भाषाओं को मिलाकर एक नई शैली की उद्भावना की। आश्रयदाताओं की प्रशंसा के बावजूद मैथिल-कोकिल ने लोक अनुभूति से अपनी कविता को रचा। मिथिला का कोई पर्व-त्योहार, विवाह और अन्य लोकोत्सव मैथिल कोकिल के गीत के बिना अधूरा माना जाता है। लोक संवेदना में इतने गहरे स्तर तक हिंदी में किसी दूसरे कवि की पैठ नहीं मिलती। इसी अर्थ में डॉ. रामविलास शर्मा ने उन्हें मध्यकालीन नवजागरण का अग्रदूत माना है। विद्यापति के विषय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया जाता है कि ये भक्त थे अथवा शृंगारी। इस विवाद को उनकी कविता के आधार पर ही विवेधित किया जा सकता है। विद्यापति के काव्य में मानवीय सौंदर्य का गहरा रंग है। उनके द्वारा रचे गए सौंदर्य के चित्र सघन है। राधा और कृष्ण के साथ शिव और पार्वती को भी विद्यापति ने मानवीय बनाकर प्रस्तुत किया है। विद्यापति का काव्य जहाँ जयदेव के शृंगारी काव्य से प्रभावित है, वहीं दूसरी और उन पर कालिदास की स्वच्छंद अनुभूति का प्रभाव भी मिलता है। विद्यापति ने कृष्ण के अतिरिक्त, शिव को भी शृंगार रस का आलंबन बनाया है।
विद्यापति के शृंगार वर्णन की बहुत बड़ी विशेषता है कि उन्होंने अपने शृंगार वर्णन को सामंती शृंगार के सौंदर्य के उपभोग पक्ष से अलग रखा है। उनके शृंगारिक मनोभाव में लोकजीवन की सहजता है। उनके काव्य में किशोर और किशोरियों के प्रेम का सहज आकर्षण है, नवयौवन की चंचलता है और भावों की ऊहापोह है। वयःसंधि के प्रकरण में विद्यापति अद्वितीय है।
लौकिक साहित्य
आदिकालीन साहित्य में धार्मिक साहित्य और प्रशस्तिपरक रचनाओं से भिन्न दूसरे प्रकार के साहित्य की लोकधारा भी प्रवाहशील थी। साहित्य की यह लोकधारा ही वास्तविक अर्थ में देशभाषा काव्य थी जो हिंदी साहित्य के विकास के मूल में है। प्रशस्तिपरक साहित्य को जब से राजाश्रय प्राप्त हो गया, तब से उसमें भी शास्त्रीय रूढ़ियों जैसे अभिजात तत्व से रासो साहित्य आच्छादित हो गया, ऐसी परिस्थिति में साहित्य में नूतनता का प्रादुर्भाव लोक साहित्य द्वारा संभव हो सकता था। लौकिक साहित्य ने जीवन की रची-बसी विषय-वस्तु को अपने साहित्य का विषय बनाया इसलिए कविता या गद्य में अलंकरण न होकर जीवन की स्वाभाविक दशाओं का वर्णन है। लौकिक साहित्य के विभिन्न अंग केवल शुद्ध साहित्यिक दृष्टि से ही अध्ययन के विषय न होकर सांस्कृतिक अर्थात् मानव विज्ञान तथा समाजशास्त्र की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
हिंदी साहित्य के आदिकाल में मुलतान, राजस्थान, दिल्ली, अवध और मिथिला से लौकिक साहित्य प्राप्त हुए हैं। ‘संदेश रासक’ का कवि अदहमाण या अब्दुल रहमाण मुलतान का था, ‘ढोला मारू रा दूहा’ की रचना राजस्थान में हुई थी। अमीर ख़ुसरो दिल्ली के आसपास के रहने वाले थे, ‘उक्ति व्यक्तिप्रकरण’ का रचनाकार अवध का रहने वाला था और विद्यापति तथा ज्योतिरीश्वर ठाकुर मिथिला के निवासी थे। रचनाकार के जन्म स्थान बताने का उद्देश्य यह है कि रचनाकार की भाषा पर स्थानीयता का गहरा रंग चढ़ा हुआ है। इस रंग को पहचान कर हम उससे स्थानीय भाषा और संस्कृति को समझ सकते हैं।
भक्तिकाल
भक्ति-आंदोलन के उदय के सामाजिक-सांस्कृतिक कारण, भक्ति-आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरुप और उसका अन्तःप्रादेशिक वैशिष्ट्य।
भक्ति काव्य की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, आलवार संत। भक्ति काव्य के प्रमुख सम्प्रदाय और उनका वैचारिक आधार। निर्गुण-सुगण कवि और उनका काव्य।
भक्ति-आंदोलन के उदय के सामाजिक-सांस्कृतिक कारण
उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के उदय को लेकर हिंदी साहित्येतिहास में व्यापक विचार विमर्श हुआ है। इस संबंध में सर्वप्रथम जार्ज ग्रियर्सन ने अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा है हम अपने को एक ऐसे धार्मिक आंदोलन के सामने पाते हैं, जो उन सब आंदोलनों से कहीं अधिक व्यापक और विशाल है, जिन्हें भारतवर्ष ने कभी देखा था। इस युग में धर्म, ज्ञान का नहीं, बल्कि भावावेश का विषय हो गया था। यहाँ से हम साधना और प्रेमोल्लास के देश में आते हैं और ऐसी आत्माओं का साक्षात्कार करते हैं जो काशी के दिग्गज पंडितों की जाति का नहीं है, बल्कि जिसकी एकता मध्य युग के यूरोपियन भक्त बर्नर्ड ऑफ क्लेअरवक्स, टामस-ए-केम्पिस और सेंट घेरिसा से है। बिजली की चमक के समान अचानक इस समस्त पुराने धार्मिक मतों के अंधकार के ऊपर एक नई बात दिखाई दी। कोई हिंदू यह नहीं जानता कि यह बात कहाँ से आई और कोई भी इसके प्रादुर्भाव का कारण निश्चय नहीं कर सकता। ग्रियर्सन ने अनुमान किया है कि ईस्वी सन् की दूसरी-तीसरी शताब्दी में नेस्टोरियन ईसाई मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ हिस्सों में आकर बस गए थे। रामानुजाचार्य ने इन्हीं ईसाई भक्तों से भावावेश और प्रेमोल्लास की धार्मिक भावना का परिचय प्राप्त किया था, जो आगे चलकर उत्तर भारत में प्रचारित प्रसारित हुआ। इस आधार पर जार्ज ग्रियर्सन ने उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन को ईसाइयत की देन सिद्ध किया है। ग्रियर्सन के इस विश्लेषण का बाद के सभी इतिहासकारों ने विरोध किया। फिर भी ग्रियर्सन महत्वपूर्ण है तो बस इसलिए कि उन्होंने भक्ति आंदोलन की पहचान सबसे पहले की।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में भक्ति साहित्य हतोत्साहित और पराजित हिंदू जनता की प्रतिक्रिया है। शुक्ल जी के शब्दों में—ऐसी दशा में अपनी वीरता के गीत न तो वे गा ही सकते थे और न बिना लज्जित हुए सुन ही सकते थे। आगे चलकर जब मुस्लिम साम्राज्य दूर तक स्थापित हो गया तब परस्पर लड़ने वाले स्वतंत्र राज्य भी नहीं रह गए। इतने भारी राजनीतिक उलटफेर के पीछे हिंदू जनसमुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी छाई रही। अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?
आचार्य शुक्ल उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन का संबंध दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन से जोड़ते हैं। शुक्लजी का निष्कर्ष इस प्रकार है—भक्ति का जो सोता दक्षिण की ओर से धीरे उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ते हुए जनता के हृदयक्षेत्र में फैलाने के लिए पूरा स्थान मिला। यहाँ हम ‘भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लायो रामानंद’ वाली जनोक्ति देख सकते हैं। यहाँ शुक्ल जी ने भक्ति का मूल स्रोत दक्षिण भारत में माना है किंतु उसके विकास और प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थिति प्रस्तुत करने का संबंध उनके अनुसार सीधे तत्कालीन सामाजिक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की इतिहास दृष्टि शुक्लजी से भिन्न है। द्विवेदी जी हिंदी साहित्य की भूमिका में लिखते हैं मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस (हिंदी) साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है। द्विवेदी जी तात्कालिकता को तो महत्वपूर्ण मानते हैं, परंतु तात्कालिकता का प्रतिशत उनके यहाँ चार आना ही है। द्विवेदी जी का बल ‘परंपरा’ पर अधिक है। इसे उन्होंने ‘भारतीय पंरपरा का स्वाभाविक विकास’ या ‘भारतीय साहित्य की प्राणधारा’ कहा है। ‘प्राणधारा’ या ‘स्वाभाविक विकास’ स्वभावतः परिवर्तनशील है, किंतु परिवर्तन का यह क्रम अटूट भी है। द्विवेदी जी ने भक्ति आंदोलन को इसी प्राणधारा या स्वाभाविक विकास के रूप में पहचाना है।
द्विवेदी जी ने ‘हिंदी साहित्यः उद्भव और विकास’ में लिखा है यह बात अत्यंत उपहासास्पद है कि जब मुसलमान लोग उत्तर भारत के मंदिर तोड़ रहे थे तो उसी समय अपेक्षाकृत निरापद दक्षिण में भक्त लोगों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की। मुसलमानों के अत्याचार के कारण यदि भक्ति की भावधारा को उमड़ना था तो पहले उसे सिंध में या फिर उत्तर भारत में प्रकट होना चाहिए था, पर प्रकट हुई वह दक्षिण भारत में। इस तरह द्विवेदी जी ने शुक्लजी की ‘हतदर्प पराजित जाति की प्रतिक्रिया वाली अवधारणा का खंडन किया है। उन्होंने इस्लाम के प्रभाव को पूरी तरह से नकारा नहीं है। इस्लाम के प्रभाव को द्विवेदी जी ने सिर्फ़ चार आना ही माना है। सवाल उठता है कि बाक़ी का ‘बारह आना’ क्या है?
द्विवेदी जी का मानना है कि भारतीय पाण्डित्य ईसा के एक हज़ार साल बाद आचार-विचार और भाषा क्षेत्रों में स्वाभाविक रूप से ‘लोक’ की ओर झुक रहा था। ऐसे में आगे की शताब्दियों में इस्लाम का विस्तार न भी हुआ होता तब भी ‘भक्ति’ आंदोलन का रूप ले लेती। इसका कारण उनके अनुसार ‘भीतर की शक्ति’ है। ‘भीतर की शक्ति’ से उनका संकेत ‘लोक शक्ति’ की ओर है। यही लोक शक्ति शास्त्र को लोक की ओर, झुकने के लिए बाध्य कर रही थी। इस तरह द्विवेदी जी भक्ति आंदोलन को लोक आंदोलन या जन आंदोलन के रूप में पहचानते हैं। नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ में द्विवेदी जी की मध्ययुग विषयक दृष्टि को रेखांकित करते हुए लिखा है इस प्रकार मध्ययुग के भारतीय इतिहास का मुख्य अंतर्विरोध शास्त्र और लोक के बीच का द्वंद्व है, न कि इस्लाम और हिंदू धर्म का संघर्ष। द्विवेदी जी शास्त्र की इसी लोकोन्मुखता को भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि मानते हैं।
प्रसिद्ध इतिहासकार सतीशचंद्र ने भक्ति आंदोलन के उभार में मुस्लिम प्रभाव को एक नए दृष्टिकोण से देखा है। उनके अनुसार, ...उत्तर भारत में राजपूत-ब्राह्मण समझौता विगत पाँच सदियों तक प्रभावशाली रहा और यही समझौता कर्मकांड समर्थित वर्णाश्रम धर्म पर आधारित सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी था। उनका मानना है, तुर्कों द्वारा राज्यों के विजय और इस्लाम के आगमन ने ऐसी प्रभावशाली शक्तियों को बढ़ावा दिया, जिसने परवर्ती सदियों में लोकप्रिय आंदोलन के रूप में भक्ति के विकास का मार्ग प्रशस्त किया...। डॉ. रामविलास शर्मा भक्ति आंदोलन के उत्थान में व्यापार के विकास और इसके फलस्वरूप सामंती सामाजिक संरचना के टूटने को प्रमुख कारण मानते हैं। उनके अनुसार, गुप्तकाल व्यापारिक समृद्धि का काल है, कबीर और सूर का युग भी ऐसी समृद्धि का काल है। तमिलनाडु में जब आलवार संतों ने भक्तिकाव्य रचा, तब वहाँ भी व्यापारिक समृद्धि का काल था। व्यापार की प्रगति से सामाजिक संबंध शिथिल होते हैं। सामाजिक संबंधों की शिथिलता से भक्ति साहित्य का सीधा संबंध है। रामविलास शर्मा का मानना है कि सामंती व्यवस्था में धरती पर सामंतों का अधिकार था तो धर्म पर उन्हीं के समर्थक पुरोहितों का। सामंती व्यवस्था में आई टूटन से पुरोहितों का वर्चस्व टूटा तथा भक्ति आंदोलन के अनुकूल स्थिति बनी।
अतः कहा जा सकता है कि भक्ति आंदोलन का उत्थान किसी एक कारण के फलस्वरूप नहीं हुआ। इसके विकास और प्रसार में तत्कालीन समय की विविध परिस्थितियों की समन्वित भूमिका रही है।
भक्ति-आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरुप और उसका अन्तःप्रादेशिक वैशिष्ट्य।
भक्ति आंदोलन की शुरुआत सर्वप्रथम दक्षिण भारत में हुई। दक्षिण भारत का भक्ति आंदोलन बाद के दिनों में भारत के कई क्षेत्रों में फैला। दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन का एक सूत्र महाराष्ट्र के भक्ति आंदोलन से जुड़ा। तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर, नामदेव आदि भक्तों ने इस आंदोलन के माध्यम से महाराष्ट्र में एक जातीय एवं सांप्रदायिक एकता को मजबूत किया।
सत्रहवीं शताब्दी में तुकाराम और रामदास तक आते-आते यह आंदोलन महाराष्ट्रीय जनजीवन की एक शक्ति बन गया। महाराष्ट्र के भक्ति आंदोलन में सगुण-निर्गुण का विवाद नहीं था। इसी तरह बंगाल में चण्डीदास से लेकर चैतन्य (1485-1533 ई.) तक सभी भक्तों ने मनुष्य मात्र की समानता पर जोर देते हुए वैष्णव भक्ति आंदोलन को दृढ़ किया। इन भक्तों का संबंध भी दक्षिण के वैष्णव आंदोलन से है।
हिंदू तथा मुसलमानों की निम्न श्रेणियों वाले लोग भी चैतन्य के शिष्य थे। रुज, सनातन, हरिदास आदि मुसलमान थे, जो चैतन्य के प्रधान शिष्यों में गिने जाते थे। इनके यहाँ सगुण-निर्गुण का विवाद नहीं था। उन्होंने जाति आधारित धार्मिक प्रणालियों को त्याग कर कृष्ण की शरण में जाने का संदेश दिया। पंजाब प्रांत में गुरु नानक साहब ने सिख संप्रदाय की स्थापना की। नानक से लेकर गुरु गोविन्द सिंह तक संतों की लंबी पंरपरा है जिन्होंने समाज को संगठित करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भक्ति आंदोलन का स्वरूप अखिल भारतीय था। भक्ति आंदोलन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है कि उसने संपूर्ण भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ दिया।
भक्ति काव्य की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, आलवार संत।
भक्तिकाल का समाज सामंती समाज था। सुख-सुविधा राजा और सामंतों तक केंद्रित था। आम जनता बदहाली की दशा में गुज़र-बसर कर रही थी। समाज में जाति और धर्म का बहुस्तरीय बँटवारा था। जाति व्यवस्था के मानदंड अत्यंत कठोर थे। इस संदर्भ में इतिहासकार अलबरूनी ने लिखा है, ये (हिंदू) किसी को अपनी जाति बदलने नहीं देते थे। जो अपनी जाति का उल्लंघन करता उसे सदैव रोक दिया जाता।
भारत में केंद्रीय मुस्लिम शासन व्यवस्था की स्थापना के बाद इन स्थितियों में परिवर्तन आया। तत्कालीन आर्थिक गतिविधियों ने इसे नई दिशा दी। केंद्रीय शासन के स्थापित होने के बाद निर्माण और दस्तकारी के कार्य में वृद्धि हुई। इस कारण से निर्माण कार्य में लगी विभिन्न जातियाँ जिनकी परंपरागत भारतीय सामाजिक संरचना में अब तक उपेक्षा की गई स्थिति मजबूत हुई। इन्हीं के बीच से भक्ति आंदोलन का नेतृत्व करने वाले प्रारंभिक संत निकले।
जाति-पाँति की वर्जनाओं को चुनौती देना भक्तिकाल का केंद्रीय रूझान था। धर्म के आधार पर भी वैमनस्य की स्थिति थी। विभिन्न धार्मिक समुदाय ख़ुद को श्रेष्ठ मानते थे तथा दूसरे को हेय दृष्टि से देखते थे, इस कारण उनमें टकराहट की स्थिति बनी रहती थी।
भक्तिकाल के दौर में आर्थिक स्तर पर कामगार जातियों के लिए सकारात्मकता की स्थिति बनी तो उसी दौर में कई अवसरों पर आमलोगों को दुर्दिन का भी सामना करना पड़ा।
भक्तिकाल की सामाजिक पृष्ठभूमि मध्यकालीन सामंती मूल्यों से परिचालित था। उस समय की आर्थिक गतिविधियों से बनी नई परिस्थिति में इन मूल्यों को चुनौती मिली। व्यापक भू-भाग तथा लंबे समय (सवा तीन सौ वर्ष) में फैला यह आंदोलन विविध सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के बीच विकसित हुआ।
भक्तिकाल सांस्कृतिक दृष्टि से एक समन्वित संस्कृति के विकास का काल था। तुर्कों के आगमन से भारत की राजनीति में परिवर्तन आया। मुसलमानों के आगमन से पूर्व भारत में कई प्रकार के जातिगत समुदाय आते रहें। भारतीय संस्कृति पर उन जातियों का प्रभाव पड़ा। इससे एक मिली-जुली संस्कृति का विकास हुआ। इस्लाम धर्मावलंबियों के आगमन से फिर एक बार सांस्कृतिक हलचल पैदा हुई। लोगों के रहन-सहन, मनोरंजन के साधन, शिक्षा, साहित्य, स्थापत्यकला, मूर्तिकला और चित्रकला में भी परिवर्तन आया। इस समय दो संस्कृतियों के एक साथ आने से दो बातें हुईं एक, टकराव, कबीर ने इस टकराहट पर दोनों धर्मों के लोगों को फटकार लगाई है। दूसरा जो कि ज़्यादा महत्वपूर्ण परिघटना है कि दो भिन्न संस्कृतियों के आपसी मेल-जोल से इस दौर में समन्वित संस्कृति का विकास हुआ। सूफ़ियों ने भारतीय परंपरा से अद्वैत के दर्शन तथा भारतीय लोक कथाओं को अपनाया तो संत कवियों ने सूफ़ियों के प्रेम तत्व को लिया। स्वयं भारतीय समाज के अंदर भी समन्वय का प्रयास हो रहा था। भक्तिकाल के ज्ञानमार्गी संत कवियों ने सिद्धों, नाथों, वैष्णव संतों के विभिन्न तत्वों का समन्वय अपनी साधना पद्धति में किया। इसी तरह तुलसीदास ने भी सगुण-निर्गुण आदि के समन्वय का प्रयास किया। सूरदास के यहाँ देवत्व का मनुष्य के साथ समन्वय है। गोकुल में कृष्ण विशिष्ट होने के बावजूद सामान्य हैं। गोप-गोपियों के साथ उनका कोई भेद-भाव नहीं है।
सामाजिक-धार्मिक भेद-भाव, रंजिश आदि की उपस्थितियों के बावजूद भक्तिकाल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का मुख्य तत्व समन्वय है। इस काल की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उपलब्धि यह है कि इसमें लोक और ईश्वर के बीच सीधा संपर्क स्थापित करने की बात की गई और ईश्वर की आराधना के लिए लोक भाषाओं को संप्रेषण का माध्यम बनाया गया और इस प्रकार एक लोक संस्कृति का विकास हुआ।
आलवार संत
छठी सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर दसवीं सदी तक दक्षिण भारत में अनेक संतों ने भक्ति आंदोलन का विस्तार किया। इन संतों की भक्ति विशुद्ध प्रेम पर आधारित थी। इनके उपास्य देव शिव और विष्णु थे। ये संत नयनार (जो शिव के भक्त थे) और आलवार (जो विष्णु के भक्त थे) के नाम से प्रसिद्ध हुए। नयनार और आलवार संतों ने जैनियों और बौद्धों के अपरिग्रह को अस्वीकार कर ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति को ही मुक्ति का मार्ग बताया। इन संतों में ब्राह्मण के साथ-साथ निम्न जातियों के भी कई संत थे। उनमें अंदाल नामक एक महिला संत भी थी जिन्होंने कहा कि ईश्वर के साथ भक्त का संबंध पति के साथ स्नेहिल पत्नी के संबंध जैसा होता है। संतों के विस्तृत आधार वाले चरित्र के कारण प्रेमपूर्ण भक्ति का उनका संदेश किसी एक वर्ग के लिए नहीं था। सभी लोग इस भक्ति को ग्रहण कर सकते थे भले ही उनकी जाति, परिवार अथवा लिंग जो भी हो।
नयनारों और आलवारों के आक्रमण का प्रमुख लक्ष्य बौद्ध धर्म और जैन धर्म थे। उन दिनों दक्षिण भारत में बौद्ध एवं जैन अधिक प्रभावशाली थे। आम जनता को अपने साथ लाने में नयनार एवं आलवार संतों को सफलता मिली। इसका कारण कालांतर में बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का दकियानूस एवं पुराणपंथी हो जाना था। वे निरर्थक अनुष्ठानवाद में लिप्त हो गए थे तथा लोगों की भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाने में समर्थ नहीं रह गए थे। नयनार एवं आलवार संतों ने स्थानीय मिथकों एवं गाथाओं का सहारा लिया। उनकी भाषा आम लोगों की भाषा (तमिल एव तेलुगू) थी। इस तरह उन्होंने एक सरल एवं सहज धर्म का प्रचार-प्रसार किया। ये संत आम लोगों पर भावात्मक प्रभाव डालने में सफल हुए। इस आंदोलन को कई स्थानीय शासकों का भी समर्थन प्राप्त हुआ। लोगों का विश्वास और स्थानीय शासकों के समर्थन से यह आंदोलन पूरे दक्षिण भारत में फैल गया।
भक्ति काव्य के प्रमुख सम्प्रदाय और उनका वैचारिक आधार
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने धर्म की भावात्मक अनुभूति को भक्ति कहा है। उनके अनुसार भक्ति का सूत्रपात महाभारत काल में और प्रवर्तन पुराण काल में हुआ। यद्यपि भक्ति के बीज वेदों में ढूँढ़े जा सकते हैं। वेदकाल के देवी देवता प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के प्रतीक हैं। वेदों का मानव इन देवी-देवताओं का आवाहन करता हुआ दिखाई देता है। वहाँ इंद्र, वरुण, सूर्य आदि अनेक दिव्य शक्ति के प्रति मानव की भावात्मक अनुभूति प्रकट हुई है। उपनिषद् युग में मानव का ध्यान प्रकृति शक्ति की अपेक्षा परमशक्ति ब्रह्म की ओर अधिक गया। विभिन्न प्रकृति देवताओं के स्थान पर त्रिदेव-ब्रह्मा, विष्णु और महेश की उपासना का अधिक प्रचार हुआ। वेदोत्तर काल में व्यक्तिगत देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश) की उपासना शुरू होने पर भक्ति की संकल्पना भी पैदा हुई। ‘महाभारत’ (भगवत् गीता जिसका भाग है) में ज्ञान और कर्म के साथ-साथ भक्ति को भी मोक्ष का एक मार्ग माना गया है।
इस तरह भारत में प्राचीन काल से ही धर्म और मोक्ष की साधना के लिए तीन मुख्य मार्ग प्रचलित रहे है一कर्म, ज्ञान तथा भक्ति। इनमें से कभी कर्म की प्रधानता रही, कभी ज्ञान की और कभी भक्ति मार्ग की।
बौद्ध एवं जैन धर्म वैदिक संस्कृति के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में आए। भारतीय धर्म के क्षेत्र में बौद्ध एवं जैन धर्म एक नया आंदोलन था। बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म ज्यों-ज्यों प्राचीन होता गया त्यों-त्यों उसमें भी वैदिक कर्मकांड का प्रवेश होता गया तथा रूढ़िवादिता बढ़ती गई।
शंकराचार्य
आठवीं-नवीं सदी में दार्शनिक स्तर पर बौद्ध विचारों से टकराने की भूमिका शंकराचार्य ने निभाई। बौद्धों का प्रभाव घटाने तथा वेदों और ब्राह्मणों की महत्ता की स्थापित करने के लिए शंकराचार्य ने अपने दार्शनिक चिंतन में अद्वैतवाद के सिद्धांत पर जोर दिया। अद्वैतवाद का आधार है ब्रह्म सत्य है जगत् मिथ्या है। आत्मा परमात्मा ही है, वह उससे भिन्न या पृथक नहीं है। सांसारिक माया के कारण मानव आत्मा परमात्मा की एकता को पहचानने की भूल करता है। शंकराचार्य एक ओर बौद्ध एवं जैन दर्शन का विरोध कर रहे थे तो दूसरी ओर उनका विरोध आलवार एवं नयनार से था। शंकराचार्य के दर्शन में वर्ण-व्यवस्था का समर्थन किया गया है। कुल मिलाकर शंकराचार्य के दर्शन ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को मजबूत करने का ही कार्य किया। यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि शंकराचार्य ने ज्ञान के साथ-साथ निर्गुण ब्रह्म की उपासना का प्रचार किया। ईश्वर को शिव का स्वरूप देकर जन-साधारण के लिए शैव उपासना और पंडितों के लिए ज्ञान मार्ग के द्वारा एकेश्वरवाद का मार्ग प्रशस्त किया।
वैष्णव आचार्य
10वीं सदी तक दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन ने बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म पर विजय प्राप्त कर ली थी। परंतु आगे चलकर दक्षिण भारत का भक्ति आंदोलन धीरे-धीरे अपना उन्मुक्त और समतावादी चरित्र खोने लगा। संतों द्वारा जातिगत प्रतिबंध की उपेक्षा करने के बावजूद बृहत् अनुष्ठान एवं कर्मकांड की अधिकता होने लगी। इस स्थिति को सुधारने का प्रयास रामानुजाचार्य ने किया। उन्होंने आलवारों की भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। उनके मत को विशिष्टाद्वैतवाद के नाम से जाना गया। नयनार और आलवार संत पुस्तकीय ज्ञान की उपेक्षा करते थे, जबकि रामानुज ने भक्ति को वेदों की परंपरा के साथ जोड़ने का प्रयास किया। उनके मत में भक्ति का मार्ग सबके लिए खुला था। इसके बावजूद निम्न वर्ग के साथ खान-पान का निषेध बना रहा। आलवारों की भक्ति रामानुज के यहाँ दार्शनिक आधार पाकर नए युग की चुनौतियों का मुक़ाबला करने में सक्षम हुई। भक्ति आंदोलन के इस विकास क्रम में आगे चलकर रामानंद आए।
शंकराचार्य का निर्गुण ज्ञानवाद मन में बैठी निराशा से मानव को मुक्ति नहीं दे सका। यही कारण है कि आगे चलकर चिंतकों ने अद्वैतवाद का डटकर विरोध किया तथा वैष्णव संतों द्वारा निम्नलिखित चार मतों की स्थापना हुई।
रामानुज संप्रदाय (श्री वैष्णव) : इस संप्रदाय को रामानुजाचार्य ने स्थापित किया था और यह विशिष्टाद्वैत सिद्धांत पर आधारित है।
मध्वाचार्य संप्रदाय (ब्रह्म-मध्वा) : मध्वाचार्य द्वारा स्थापित, यह संप्रदाय द्वैतवाद सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि भगवान और संसार अलग-अलग हैं।
विष्णुस्वामी संप्रदाय : विष्णु स्वामी द्वारा स्थापित, यह संप्रदाय शुद्ध द्वैत सिद्धांत पर आधारित है, जो अलग तरह से द्वैतवादी दृष्टिकोण को देखता है।
निम्बार्क संप्रदाय : निम्बार्क द्वारा स्थापित, यह संप्रदाय भी द्वैतवाद पर आधारित है, लेकिन यह विभेद-अविभेद की अवधारणा को भी महत्व देता है।
इन चारों वैष्णव संप्रदायों ने शंकराचार्य के अद्वैत और ज्ञान मार्ग का विरोध किया। थोड़े बहुत अंतर के होते हुए भी इन सबकी प्रवृत्ति सगुण भक्ति की ओर होती चली गई। इन सभी ने ब्रह्म और जीव की पूर्ण एकता को अस्वीकार किया तथा इस धारणा का प्रचार-प्रसार किया कि सांसारिक जन्म के बाद जीव का ब्रह्म से एकीकरण समाप्त हो जाता है। हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में राम मार्गी भक्ति और कृष्ण मार्गी भक्ति का संबंध इन संप्रदायों से है।
राममार्गी भक्ति
रामानुजाचार्य के शिष्य राघवानंद ने उनके विचारों का प्रसार उत्तर भारत में किया। राघवानंद ने रामानुजाचार्य के सिद्धांत में कुछ संशोधन भी किया। इन संशोधनों में वैष्णव भक्ति में जाति पाँति के बंधन को तोड़ने की भावना, लक्ष्मीनारायण के उपास्य रूप के साथ सीता राम की उपासना, भक्ति को योग से समन्वित करना आदि महत्वपूर्ण है। राघवानंद के शिष्य रामानंद हुए। रामानंद ने श्री संप्रदाय का प्रसार 14वीं सदी में राम भक्ति के रूप में किया। रामानंद ने भी सभी वर्गों और वर्गों के लोगों को भक्ति का अधिकारी बताया। उन्होंने निम्न वर्ग के लोगों के साथ खान-पान पर निषेध का विरोध किया। ब्रह्म के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों की भक्ति का उपदेश उन्होंने दिया। उनके अनुसार सगुण ब्रह्म को ज्ञान और वैराग्यमुक्त प्रेमयोग से तथा निर्गुण ब्रह्म को प्रेम और वैराग्यमुक्त ज्ञानयोग से प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि रामानंद के अनुयायियों में निर्गुण संत तथा सगुण भक्त दोनों हुए। इन के बारह शिष्य जो प्रसिद्ध हैं वे हैं :- रैदास, कबीर, धन्ना, सेना, पीपा, भवानंद, सुखानंद, अनंतानंद, सुरसुरानंद, पद्मावती, सुरसुरी। रामानंद ने अपने मत का प्रचार लोक भाषा में किया।
कृष्ण-मार्गी भक्ति
रामानुजाचार्य के श्री संप्रदाय का उत्तर भारत में विकास रामभक्ति के रूप में हुआ, जबकि कृष्ण भक्ति का संबंध मध्वाचार्य के ब्रह्म संप्रदाय, विष्णुस्वामी के रुद्र संप्रदाय और निम्बार्काचार्य के सनकादि संप्रदाय से है। इन तीनों प्रवर्तकों के अनुयायियों में कुछ ऐसे भी हुए जिन्होने संप्रदाय विशेष में दीक्षित होकर भी निजी सिद्धांतों के आधार पर स्वतंत्र भक्ति संप्रदायों की स्थापना की। ऐसे अनुयायियों में चैतन्य महाप्रभु (1485-1533 ई.) और महाप्रभु बल्लभाचार्य (1478 ई.) प्रमुख हैं। बल्लभाचार्य की शिष्य परंपरा में हिंदी साहित्य के कृष्ण भक्त कवि आते हैं। बल्लभाचार्य की भक्ति को पुष्टिमार्गी भक्ति के नाम से जाना जाता है। अष्टछाप कवियों का संबंध इसी पुष्टिमार्गी भक्ति से है।
निर्गुण संत साहित्य
निर्गुण संतों का संबंध एक तरफ़ रामानंद से है तो दूसरी तरफ़ ये नाथों एवं सिद्धों से भी प्रभावित हैं। इस्लाम के आने से पहले उत्तर भारत में ब्राह्मण धर्म के विरोध में कुछ पंथ सक्रिय थे। नाथपंथी एवं सिद्ध इनमें प्रमुख थे।
नाथों का विस्तार मध्यदेश के पश्चिमोत्तर भागों में हुआ जबकि सिद्धों का पूर्वी भाग में। उत्तर भारत के निर्गुण संत साहित्य की पृष्ठभूमि के तौर पर नाथों एवं सिद्धों के साहित्य को देखा जा सकता है। सिद्धों एवं नाथों ने संधा भाषा शैली में रचनाएँ की हैं। संधा भाषा एक प्रकार की प्रतीक भाषा है। उन्होंने अंतः साधनात्मक अनुभूतियों को प्रतीक भाषा में ही व्यक्त किया है। यह कबीर के साहित्य में भी मौजूद है। इसे उलटबाँसी भी कहा जाता है। नाथों एवं सिद्धों के साथ ही कबीर आदि निर्गुण संतों पर महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर और नामदेव का प्रभाव भी देखा जा सकता है। सामाजिक क्षेत्र में समानता की भावना का विचार आलवारों, महाराष्ट्र के संतों और उत्तर भारतीय निर्गुण संतों में एक समान है। कबीर आदि निर्गुण संत रामानंद के शिष्य होते हुए भी श्री संप्रदाय से नहीं जुड़े। इन संतों ने अपना स्वतंत्र विकास किया।
सूफ़ी भक्ति साहित्य
भारत में सूफ़ी संप्रदाय अपेक्षाकृत नया है। इस्लाम के आगमन के साथ सूफ़ी साधकों का आगमन होने लगा। तब तक भारत में भक्ति आंदोलन अपना स्वरूप ग्रहण कर चुका था। भारत में सूफ़ी साधकों के कई संप्रदाय हैं, इनमें चिश्ती संप्रदाय, कादिरा संप्रदाय, सुहरावर्दी संप्रदाय, नक्शबंदी संप्रदाय और शत्तारी संप्रदाय प्रमुख हैं। सल्तनत काल के दौरान भारत में उन्नति करने वाले दो सर्वाधिक प्रसिद्ध सूफ़ी संप्रदाय चिश्ती और सुहरावर्दी थे। सुहरावर्दी संप्रदाय के लोग मुख्य रूप से पंजाब और सिंध में सक्रिय थे, जबकि चिश्ती लोग दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों, राजस्थान, पंजाब के कुछ भाग, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मालवा, गुजरात आदि एवं बाद में दक्षिण में भी फैल गए।
रहस्यवादियों का जन्म इस्लाम के अंतर्गत बहुत पहले हो गया था। यही रहस्यवादी बाद में सूफ़ी कहलाए। इनमें से अधिकांश ऐसे थे जो महान भक्त थे। ये भक्त समृद्धि के भोंडे प्रदर्शन और इस्लामी साम्राज्य की स्थापना के बाद उत्पन्न नैतिक पतन के कारण दुखी थे। यही कारण था कि सूफ़ियों को राज सत्ता से कोई सरोकार नहीं था। बाद में उनमें यही परंपरा जारी रही। सूफ़ियों ने ईश्वर और व्यक्ति के बीच प्रेम संबंध पर बहुत बल दिया। उनकी सर्वेश्वरवादी दृष्टि के कारण उनमें और इस्लामिक परंपरावादी तत्वों के बीच संघर्ष की स्थिति कई बार उत्पन्न हुई। इसके बावजूद मुस्लिम जनता में रहस्यवादी विचारों का प्रसार बढ़ता रहा। सूफ़ियों तथा हिंदू योगियों और रहस्यवादियों के बीच प्रकृति, ईश्वर, आत्मा और पदार्थ के संबंध में विचारों की काफ़ी समानता है। सूफ़ी कवियों ने हिंदू घरों में प्रसिद्ध कथानकों के माध्यम से सूफ़ी रचनाएँ की। सर्वेश्वरवादी होने के कारण सूफ़ी साधक भी इस भक्ति आंदोलन में शामिल हो गए।
निर्गुण ज्ञानमार्गी संत काव्य धारा
संत शब्द का अर्थ : संत शब्द का प्रयोग प्रायः बुद्धिमान पवित्रात्मा, परोपकारी व सज्जन व्यक्ति के लिए किया जाता है। संत शब्द उस ‘शुद्ध अस्तित्व’ का बोधक है जो सदा एकरस तथा अविकृत भाव रूप में विद्यमान रहता है। इस शब्द के सत् रूप का, ब्रह्म या परमात्मा के लिए किया गया प्रयोग बहुधा वैदिक साहित्य में भी पाया जाता है। अतएव संत शब्द, उस व्यक्ति की ओर संकेत करता है जिसने सत् रूपी परमतत्व का अनुभव कर लिया हो। जो अपने व्यक्तित्व से ऊपर उठकर उसके साथ तद्रूप हो गया हो। इस प्रकार जो सत्य का साक्षात्कार कर चुका हो, वही संत है।
संत मत
संत मत पहले से निश्चित किसी सिद्धांत या मत का संग्रह मात्र नहीं है। इसका प्रसार भिन्न संतों द्वारा समय-समय पर दिए उपदेशों से भी नहीं हुआ है। यह परंपरा, अनुभव से ज्ञान का संधान कर प्रसार को प्राप्त करती है। कबीरदास कहते हैं: ‘सतगुरु तत कह्यौ बिचार, मूल गयौ अनभै विस्तार।’ तत्व का ग्रहण कर, अनुभव और विवेक के समन्वय से ही यह मत अस्तित्व में आया।
संत कवि ईश्वर से तादात्म्य करने के लिए नामोपासना की पद्धति को स्वीकार करते हैं। परमतत्व के विषय में किसी प्रकार का दार्शनिक विवेचन इन्होंने नहीं किया। इसे ये कवि राम, ख़ुदा, रहीम, ब्रह्म आदि अनेक नामों से पुकारते हैं, किंतु सबका लक्ष्य परमतत्त्व का साक्षात्कार करना ही है।
निर्गुण: अर्थ और प्रकृति :
निर्गुण शब्द का शाब्दिक अर्थ गुण रहित होता है। किंतु संतों के काव्य में निर्गुण साहित्य का द्योतक न होकर, गुणातीत की ओर संकेत करता है। इनके यहाँ यह किसी निषेधात्मक सत्ता का वाचक न होकर उस परब्रह्म के लिए प्रयुक्त हुआ है जो सत्व, रजस और तमस तीनों गुणों से अतीत है, वाणी जिसके स्वरूप का वर्णन करने में असमर्थ है अर्थात जो गूँगे के गुड़ के समान अनुभूति का विषय है; जो रंग, रूप, रेखा से परे है। परंपरा में भारतीय चिंतक भी जिसके स्वरूप का वर्णन करने में असमर्थ रहकर नेति-नेति का आश्रय ले बैठे। यह निर्गुण ब्रह्म घट-घट वासी है, फिर भी इंद्रियों से परे है।
संक्षेप में निर्गुण :
• चराचर जगत में व्याप्त वह ब्रह्म है जो सामाजिकों के दुःख को जानता है और भावना से भावित है।
• यह ब्रह्म निराकार, अलक्ष्य, द्वैताद्वैतविलक्षण, सत्व, रजस और तमस तीनों गुणों से परे है, फिर भी घट-घट में समाया हुआ है।
• यह निर्गुण ब्रह्म अनुभूति का विषय है और प्रेम से प्राप्य है।
• यह निर्गुण ब्रह्म तत्कालीन सामाजिक विषमताग्रस्त समाज को ऐक्य की अनुभूति कराने का सशक्त माध्यम बन सका।
प्रमुख संत कवि :
नामदेव
इनका जन्म 1329 को सतारा के नरसी वमनी (बहमनी) गाँव में हुआ था। अपने पैतृक व्यवसाय की ओर इनकी रुचि नहीं थी, अतः बचपन से ही साधुसेवा एवं सतसंग में अपना जीवन बिताते रहे। संत विसोवा खेचर इनके गुरु थे तथा प्रसिद्ध संत ज्ञानेश्वर के प्रति भी इनकी गहरी निष्ठा थी। मराठी में रचित अभंगों के अतिरिक्त हिंदी भाषा में भी इनकी रचनाएँ उपलब्ध हैं। सधुक्कड़ी भाषा में रचित इनकी रचनाओं में निर्गुणोपासना, कर्मकांड का खंडन तथा ब्रह्म का स्वरूप निरूपण किया गया है।
संत नामदेव छीपा दर्जी थे। वे गज, कैंची और सुई धागे के माध्यम से ही भक्ति-रहस्य उद्घाटित करते थे। सामान्य जन उनकी आजीविका के कार्य से परिचित थे अतः उनकी रूपक योजना को सही ढंग से समझने में वे सक्षम थे।
कबीरदास (1456-1575)
इनके जन्म-काल, जीवन-मरण तथा जीवन की प्रसिद्ध घटनाओं के विषय में किंवदंतियाँ प्रसिद्ध हैं। इनका पालन-पोषण नीरू-नीमा नामक जुलाहा दम्पत्ति ने किया।
इन्होंने वर्णाश्रम धर्म में प्रचलित कुरीतियों को ही नहीं, लोक में प्रचलित अपधर्म (जादू-टोना, मंत्र-तंत्र, टोटका आदि) को भी पहचाना। कबीर साहसी और तेजस्वी व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी कथनी और करनी में ज़बरदस्त एकरूपता थी।
कवि के रूप में कबीर जीवन की सहजता के अधिक निकट हैं। उनकी कविता में छंद, अलंकार, शब्द-शक्ति आदि गौण हैं और लोकमंगल की चिंता प्रधान है। इनकी वाणी का संग्रह इनके अनुयायियों ने ‘बीजक’ के नाम से किया है। इसके तीन भाग हैं ‘रमैनी’, ‘सबद’ और ‘साखी’। ‘रमैनी’ और ‘सबद’ में गाने के पद हैं तथा साखी दोहा छंद में लिखी गई है। सिखों के गुरु ग्रंथ साहब में भी कबीर के नाम से ‘पद’ तथा ‘सलोकु’ संग्रहीत हैं। इन रचनाओं में कबीर साहब ने जाति-पाँति, छुआछूत, अंधविश्वास, रूढ़िवादी दृष्टिकोण, पूजा-अर्चना तथा धार्मिक कर्मकांड का विरोध किया है। वे ऐसे साधक थे, जिसने वेदांत के सत्य और पारमार्थिक सत्य को पृथक-पृथक नहीं माना, अपितु सत्य को भक्ति से सहज की प्राप्य बताया। कबीरदास की अभिव्यंजना शैली बहुत सशक्त थी। इनकी भाषा मूलतः तो पूरब की है, किंतु, उसमें अन्य बोलियों का भी मिश्रण होने के कारण उसे सधुक्कड़ी कहा जाता है। इनके काव्य में प्रतीक योजना का सुंदर निर्वाह हुआ है। ये प्रतीक दाम्पत्य एवं वात्सल्य जीवन की विविधता का संकेत करते हैं। साथ ही इनकी कविता में सांकेतिक प्रतीक, पारिभाषिक प्रतीक, संख्यामूलक प्रतीक, रूपात्मक प्रतीक तथा प्रतीकात्मक उलटबांसियों के भी उदाहरण मिलते हैं। रहस्यवाद के व्यंजक पदों में भी इन्होंने प्रतीक योजना का सहारा लिया है। छंद, अलंकारादि (प्रयत्नसाध्य) शैलीगत उपकरणों के प्रति इनके मन में कोई निष्ठा नहीं है।
रैदास
मध्ययुगीन साधकों में संत रैदास अथवा रविदास के जीवनकाल की तिथि के विषय में कुछ निश्चित रूप से ज्ञात नहीं होता। इनके समकालीन धन्ना और मीरा ने अपनी रचनाओं में बहुत श्रद्धा के साथ इनका नामोल्लेख किया है। ऐसा माना जाता है कि ये कबीर के समकालीन थे। ‘रैदास की परिचई’ में उनके जन्मकाल का उल्लेख नहीं है। अतः समकालीन व्यक्तियों को प्रमाण मानकर कहा जा सकता है कि इनका जन्म संभवतः पंद्रहवीं शताब्दी में हुआ होगा। रैदास की कविता में सामाजिक विषमता के प्रति विरोध है। उन्होंने वर्णवादी व्यवस्था की असमानता के प्रति आकोश प्रकट किया है। उनकी कविता में मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा आदि बाह्य विधान का विरोध किया गया है। रैदास ने जन सामान्य को निश्छल भाव से भक्ति की ओर प्रेरित किया। इनकी रचनाओं का कोई व्यवस्थित संकलन नहीं है, वह मात्र फुटकल रूप में ही उपलब्ध होता है। ‘आदिग्रंथ’ में इनके कतिपय पद मिलते हैं। अनन्यता, भगवत्-प्रेम, दैन्य, आत्मनिवेदन और सरल हृदयता इनकी रचनाओं की विशेषता है। संत ‘रविदास’ रामानंद के बारह शिष्यों में से एक थे।
गुरुनानक देव
गुरुनानक देव जी का जन्म सं. 1526 के वैशाख मास की तृतीया को तिलवंडी ग्राम में हुआ था। गुरुनानक देव की बचपन से ही अध्यात्म में रुचि थी। अतः वे ऐसे मत की ओर सहज रूप से आकर्षित हो गए जिसकी उपासना पद्धति साम्प्रदायिक न हो। कबीरदास प्रवर्तित ‘निर्गुण संतमत’ इन्हें अपने विचारों के अनुकूल जान पड़ा। इनकी बानियों का संग्रह ‘आदिग्रंथ’ के ‘महला’ नामक खंड में हुआ है। इनमें ‘शब्द’ और ‘सलोकु’ के साथ, ‘जपुजी’, ‘आसादीवार’, ‘रहिरास’ एवं ‘सोहिला’ का भी संग्रह है। इनकी रचनाओं में धार्मिक विश्वास, नाम स्मरण, एकेश्वरवाद, परमात्मा की सर्वव्यापकता, विश्व प्रेम, नाम की महत्ता आदि का परिचय मिलता है। सरलता और अहंभाव शून्यता इनकी प्रकृतिगत विशेषताएँ हैं। निरीहता एवं दैन्य की अभिव्यक्ति में ये रैदास के समतुल्य हैं। इनका अधिकांश साहित्य पंजाबी में है, किंतु कहीं-कहीं ब्रजभाषा, खड़ी बोली का प्रयोग भी मिलता है।
संत दादू दयाल
दादू पंथ के प्रर्वतक दादू दयाल का जन्म गुजरात प्रदेश के अहमदाबाद नगर में सं. 1601 में माना जाता है। इनकी मृत्यु सं. 1660 को राजस्थान प्रांत के नराणा गाँव में हुई, जहाँ पर इनके अनुयायियों का प्रधान मठ ‘दादू द्वारा’ वर्तमान में है। ये जाति के धुनिया थे। दादू को ‘परब्रह्म सम्प्रदाय’ का प्रवर्तक माना जाता है। बाद में इस परब्रह्म संप्रदाय को ‘दादूपंथ’ के नाम से संबोधित किया गया। इनके गुरु कौन थे, इस विषय में कुछ अधिक ज्ञात नहीं है। इनकी बानियों का संग्रह ‘हरडेवाणी’ के नाम से जगन्नाथ दास ने प्रस्तुत किया। इनके प्रमुख शिष्य रज्जब जी ने इसमें पाई जाने वाली त्रुटियों को सुधार कर इसे ‘अंगबधु’ नाम से प्रस्तुत किया। दादू जी की एक अन्य रचना ‘कामाबेलि’ है। इनकी बानी में ईश्वर की सर्वव्यापकता, सद्गुरु महिमा, आत्मबोध, संसार की अनित्यता का निरुपण हुआ है। संत दादू की विचारधारा कबीर से प्रभावित है। परंतु दादू की कविता में टकराहट का भाव नहीं मिलता है। उन्होंने सगुण और निर्गुण की बौद्धिक टकराहट से कविता को दूर रखा। उनकी कविता में प्रेमभाव की अभिव्यक्ति है। यह प्रेम निर्गुण निराकार ईश्वर के प्रति है।
निर्गुण भक्त कवि होने पर भी इन्होंने ईश्वर के सगुण स्वरूप को मान्यता दी है। इनकी रचनाओं की भाषा राजस्थानी है, जिसमें गुजराती, सिंधी, पंजाबी, फ़ारसी आदि के प्रयोग भी मिलते हैं।
संत सुंदरदास
संत दादूदयाल के योग्यतम शिष्य सुंदरदास का जन्म सं. 1653 में जयपुर राज्य की प्राचीन राजधानी धौत्ता नगर में हुआ था। इनका महाप्रस्थान सांगनेर में सं. 1746 में हुआ। देशाटन इन्हें बहुत प्रिय था, पूर्व में बंगाल, पश्चिम में द्वारिका, उत्तर में बदरिकाश्रम और दक्षिण में मध्यदेश तक इन्होंने यात्रा की। भ्रमण के समय ये दादू के सिद्धांतों का प्रचार करते थे और साथ ही साथ काव्य ग्रंथों की रचना भी करते थे। इनके बयालीस ग्रंथ कहे जाते हैं, जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना ‘सुंदर विलाप’ है। समाज की रीति, नीति तथा भक्ति पर इन्होंने विनोदपूर्ण उक्तियों कही हैं। निर्गुण संत काव्यधारा में एक प्रकार की अनगढ़ता मिलती है। इस काव्यधारा की कविता पर किसी प्रकार के शास्त्रीय अनुशासन का अंकुश नहीं होता था लेकिन सुंदरदास की कविता में शास्त्रीय अनुशासन है। उन्होंने कविता के लिए अलंकार और छंद का कुशल प्रयोग किया है। इसी प्रकार कविता में निर्गुण सगुण विवाद को तार्किक रूप में रखा है। लोकजीवन की रूढ़ियों के विरोध और विद्रोह का स्वर उनमें नहीं है। सुंदरदास की कविता को पढ़ने पर यह पता चलता है कि धीरे-धीरे निर्गुण भक्ति का आक्रोश भी मंद पड़ गया था। निर्गुण भक्ति काव्य शास्त्रीय बंधन में बंधने को तैयार होने लगा था।
निर्गुण भक्त कवि होने पर भी उन्होंने ईश्वर के सगुण स्वरूप को मान्यता दी है। इनकी रचनाओं की भाषा राजस्थानी है, जिसमें गुजराती सिंधी, पंजाबी, फ़ारसी, आदि प्रयोग भी मिलते हैं।
संत मलूकदास
संत मलूकदास का जन्म इलाहाबाद के कड़ा नामक गाँव में सं. 1631 में हुआ। 106 वर्ष की अवस्था में इनकी मृत्यु सं. 1739 में औरंगजेब के समय में हुई। इनके दीक्षा गुरु कौन थे, इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद बना हुआ है। एक मत के अनुसार ये कील के शिष्य थे, तथा दूसरा मत इन्हें द्राविड़ विठ्ठल का शिष्य बताता है। मलूकदास के प्रामाणिक ग्रंथ हैं ‘ज्ञानबोध’, ‘ज्ञानपरोछि, ‘रामअवतारलीला’, ‘रत्नखान’, भक्तवच्छावली’ ‘भक्ति विवेक’ ‘विभवविभूति’, ‘सुखसागर’, ‘ब्रजलीला’, ‘ध्रुवचरित’ आदि। जिनमें ‘रत्नखान’ और ‘ज्ञानबोध’ दो प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। मलूकदास की कविता में आख्यान शैली का प्रयोग मिलता है। इन्होंने विविध कथाओं का दृष्टांत देकर लोगों को इंद्रिय निग्रह, ब्रह्मोपासना आदि का उपदेश दिया है। अवतारों और चरित्रों से संबंधित इनकी रचनाएँ भी मिलती हैं। आत्मबोध और वैराग्य मलूकदास की कविता के मुख्य सरोकार हैं। इन्होंने अवधी और ब्रजभाषा में काव्य रचना की, तथा इनकी भाषा में अरबी, फ़ारसी के शब्दों का प्रयोग मिलता है।
निर्गुण प्रेममार्गी (सूफ़ी) काव्यधारा
सूफ़ी शब्द का अर्थ : सूफ़ी प्रेमाख्यानक काव्य परंपरा में प्रयुक्त ‘सूफ़ी’ शब्द के विषय में विद्वानों में मतभेद है। इसकी व्युत्पत्ति अनेक शब्दों से मानी गई है। ‘सूफ़ी’ शब्द के मूल अर्थ तक पहुँचने में इन विभिन्न मतों की महत्वपूर्ण भूमिका है। पहला मत ‘सुफ़्फा’ या ‘सुफ’ से इसका संबंध मानता है। जिसका अर्थ है ‘चबूतरा’। इस मत के मानने वालों का कहना है कि सऊदी अरब के एक पवित्र नगर मदीना की मस्जिद के सामने के चबूतरे पर एकत्र होकर परमात्मा का चिंतन करने वाले संत ही सूफ़ी कहलाए। ‘सूफ़ी’ शब्द की दूसरी व्युत्पत्ति ‘सफ’ शब्द से कही गई है। इस मत के विचारकों के अनुसार जीवन पर्यंत सफा अर्थात स्वच्छ एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने वाले संत ही सूफ़ी हैं। सूफ़ी वस्तुतः उन्हें ही कहना चाहिए जो मनसा, वाचा एवं कर्मणा पवित्र कहे जा सकते हैं। एक दूसरे मत के अनुसार ‘सफा’ शब्द यहाँ निष्कपट भाव के लिए व्यवहृत हुआ है, इसलिए ‘सूफ़ी’ ऐसे व्यक्ति को कहना चाहिए, जो न केवल परमात्मा के प्रति निश्छल भाव रखता है बल्कि तदनुसार सारे प्राणियों के साथ भी शुद्ध बर्ताव करता है (सूफी काल संग्रह-परशुराम चतुर्वेदी) इस शब्द की एक अन्य व्युत्पत्ति ‘सोफिया’ से भी कही गई है जिसका अर्थ है—ज्ञान। इस ज्ञान का वैशिष्ट्य उसकी निर्मलता में निहित है। इस व्युत्पत्ति के अनुसार निर्मल प्रतिभा संपन्न व्यक्ति ही सूफ़ी कहलाए। कुछ के अनुसार यह शब्द ‘सफ’ से निकला है जिसका अर्थ है सबसे आगे की पंक्ति अथवा प्रथम श्रेणी। यहाँ आगे की पंक्ति या प्रथम श्रेणी में रखने से अभिप्राय कयामत के दिन ईश्वर के प्रियपात्र होने के कारण सबसे आगे की पंक्ति में खड़े किए जाने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों से है। इसी व्युत्पत्ति क्रम में सूफा, बनू सूफा शब्द भी आते हैं। ‘सूफाह’ शब्द का अभिप्राय सांसारिकता से विरत हो ख़ुदा की सेवा में निरत रहने वालों से है और बनू सूफा एक घुमक्कड़ जाति विशेष है। अबू नच अल सर्राज, धाउन आरबेरी तथा वलीउद्दीन के अनुसार ‘सूफ़ी’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘सूफ’ शब्द से हुई है। जिसका अर्थ है—ऊन। इस व्युत्पत्ति के अनुसार मोटे सफ़ेद ऊन के कपड़े पहनकर परमात्मा के प्रेम में मगन रहने वाले फ़कीर ही सूफ़ी कहलाए। सूफ शब्द के इस सामान्य अर्थ के साथ कतिपय अन्य अर्थ भी संबद्ध कहे गए हैं। परशुराम चतुर्वेदी ने आधुनिक पाश्चात्य विचारकों के मतों एवं शब्द की इस व्युत्पत्ति के आलोक में अपना मत स्थिर करते हुए लिखा है ‘सूफ’ एवं सूफ़ी शब्दों के बीच सीधा शब्द साम्य दीखता है...ऐसे लोग अपने इन वस्त्रों के व्यवहार द्वारा अपना सादा जीवन तथा स्वेच्छा या दारिद्रय भी प्रदर्शित करते थे। ये लोग परमेश्वर की उपलब्धि को ही अपना एकमात्र ध्येय मानते थे।...परमेश्वर के साथ निर्वाध मिलन तथा उसके प्रति सच्चे अनुराग में ही कालयापन करना उनके जीवन का सर्वोच्च आदर्श था, और उसके अतिरिक्त सभी बातों को उपेक्षा की दृष्टि से देखा करना उनके लिए स्वाभाविक सा हो गया था।
‘सूफ़ीमत साधना और साहित्य’ के अंतर्गत डॉ. रामपूजन तिवारी भी सूफ़ी शब्द को सूफ शब्द से बना हुआ कहते हैं। उनका अभिमत है सूफ़ी शब्द की व्युत्पत्ति नाना प्रकार से की गई है। अधिकांश लोग सूफ शब्द से इसका बनना मानते हैं। ‘सूफ’ का अर्थ है ऊन। ईसवी सन् की आठवीं-नवीं शताब्दी में ऊन का व्यवहार करने वाले संसार-त्यागी साधकों का पता इस्लामी देशों में चलता है। सफा, अहल, सुफ्फाह, सफ्फे अव्वल, सोफिस्ता आदि से भी सूफ़ी शब्द के बनने की बात कही जाती है। लेकिन वे अधिकांश लोगों को मान्य नहीं है। जायसी ग्रंथावली में सूफ़ी मत का परिचय देते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है आरंभ में सूफ़ी एक प्रकार के फ़कीर या दरवेश थे, जो ख़ुदा की राह पर अपना जीवन ले चलते थे, दीनता और नम्रता के साथ बड़ी फटी हालत में दिन बिताते थे। ऊन के कंबल लपेटे रहते थे। कुछ दिनों तक तो इस्लाम की साधारण धर्म-शिक्षा के पालन में विशेष त्याग और आग्रह के अतिरिक्त इनमें कोई नई बात या विलक्षणता नहीं दिखाई पड़ती थी। पर ज्यों-ज्यों ये साधना के मानसिक पक्ष की ओर अधिक प्रवृत्त होते गए, त्यों-त्यों इस्लाम के बाह्य विधानों से उदासीन होते गए। फिर तो धीरे-धीरे अंतःकरण की पवित्रता और हृदय के प्रेम को मुख्य कहने लगे और बाहरी बातों को आडंबर।
सूफ़ी शब्द की उपर्युक्त विविध व्युत्पत्तियों के आलोक में ‘सूफ़ी’ के निम्नलिखत लक्षण स्वीकार किए जा सकते हैं:-
1. बाह्य आडंबरों के स्थान पर भीतरी तत्वों पर बल, जिसका प्रतिपादन वे मनसा, वाचा, कर्मणा करते हैं।
2. व्यक्तिगत साधनारत होते हुए भी लोक की अनदेखी नहीं।
3. परमात्मा के साथ-साथ प्राणीमात्र के प्रति उत्कट-अनुराग।
4. गहरा मानवीय मूल्य-बोध, जो संप्रदाय एवं साधना की सीमाओं में नहीं अटता। वैचारिक-उदारता उनके चरित्र का वैशिष्ट्य है।
सूफ़ी मत और सिद्धांत
सूफ़ीमत का भारत में आगमन कब हुआ, इस प्रश्न को लेकर विद्वानों में मतैक्य नहीं दिखाई पड़ता। विद्वानों का मत है कि 1000 ई. के बाद ही सूफ़ी मत भारत में आया। कुछ विद्वान भारत में सूफ़ीमत का प्रवेश ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती से मानते हैं।
भारत में इस सूफ़ीमत के चार प्रमुख संप्रदाय हैं :-
1. चिश्ती संप्रदाय (बारहवीं शताब्दी) यह भारत में सर्वाधिक प्रसिद्ध संप्रदाय है। ख़्वाजा अबू इसहाक शामी चिश्ती या उनके शिष्य अबू अब्दाल चिश्ती का नाम इस संप्रदाय के प्रवर्तक के रूप में लिया जाता है। इस संप्रदाय के माध्यम से सूफ़ी मत का प्रचार भारत वर्ष में करने का श्रेय ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी को जाता है। चिश्ती-संप्रदाय में संगीत-तत्व को प्रधानता दी गई है।
2. सुहवीर्दया, सुहरवर्दी या सोहरावर्दी संप्रदाय (बारहवीं शताब्दी) भारत में इस सूफ़ी संप्रदाय के प्रवर्तक बहाउद्दीन जकारिया कहे गए हैं। ठेठ इस्लाम धर्म की स्वीकृत बातों के प्रतिकूल चलकर इस संप्रदाय के साधकों ने अपनी उदारतावादी दृष्टि का परिचय दिया।
3. कादरी या कादिरिया संप्रदाय (पंद्रहवीं शताब्दी) इस संप्रदाय के प्रवर्तक अब्दुल कादिर अल-जीलानी ये। भारत में इसके प्रचारक सैयद मुहम्मद गौस ‘वाला पीर’ थे। इस संप्रदाय में संगीत का अधिक महत्वपूर्ण स्थान नहीं है।
4. नक्सबंदी या नक्श बंदिया संप्रदाय (पंद्रहवीं शताब्दी) इस संप्रदाय को ख़्वाजा बहाउद्दीन ‘नक्शबंद’ ने आरंभ किया था। भारत में इसका प्रचार करने वाले ख़्वाजा बाक़ी बिल्ला बेरंग रहे।
भारत में आकर उदार-धर्मी सूफ़ी मत यहाँ के दार्शनिक मतों एवं उनके सिद्धांतों का प्रभाव ग्रहण कर निरंतर विकासमान रहा है। यही कारण है कि पैगम्बरी एकेश्वरवाद (शुद्ध एकेश्वरवाद) से आरंभ सूफ़ी साधकों की यात्रा सर्वात्मवाद, एकतत्ववाद से होती हुई अद्वैतवाद तक पहुँचती है।
सूफ़ियों ने मनुष्य के चार विभाग स्वीकार किए हैं :-
नफ़्स अर्थात् विषयभोग वृत्ति या इंद्रिय या जड़ तत्व। मनुष्य के शरीर में समाहित यह तत्व उसका जड़ अंश बनाते हैं। अतः साधक का प्रथम लक्ष्य नफ़्स के साथ युद्ध होना चाहिए।
रूह अर्थात आत्मा और क़ल्ब का अर्थ है हृदय। क़ल्ब और रूह द्वारा ही साधक अपनी साधना करता है। क़ल्ब और रूह का भेद सूफ़ियों के यहाँ स्पष्ट नहीं।
अक्ल या बुद्धि यह मनुष्य का चौथा विभाग है।
सूफ़ी चार जगत मानते हैं (1) आलमे नासूत भौतिक जगत्, (2) आलमे मलकूत चित्त जगत् या आत्म जगत् (3) आलमे जबरूत आनंदमय जगत् जिसमें सुख-दुख आदि द्वंद्व नहीं और (4) आलमे लाहत सत्य जगत् या ब्रह्म। क़ल्ब रूह (आत्मा) और रूपात्मक जगत् के बीच का एक साधन रूप पदार्थ है।
साधना के प्रारंभिक सात सोपानों अनुताप, आत्म-संयम, वैराग्य, दारिद्र्य, धैर्य, ईश्वर-विश्वास तथा संतोष को पार कर साधक आगे के चतुर्विध सोपानों का अधिकारी हो जाता है।
सूफ़ी, ‘साधक’ की चार अवस्थाएँ कहते हैं (1) शरीअत अर्थात धर्मग्रंध के विधिनिषेध का सम्यक् पालन। इसे हमारे यहाँ के संदर्भ में कर्मकांड कहा जा सकता है। (2) तरीक़त का अर्थ है बाहरी क्रिया-कलाप से परे होकर केवल हृदय की शुद्धता द्वारा भगवान का ध्यान। इसे उपासना कांड के रूप में समझा जा सकता है। (3) हक़ीक़त से अभिप्राय भक्ति और उपासना के प्रभाव से सत्य के बोध से है। यह हमारे यहाँ का ज्ञानकांड हुआ। (4) मारर्फ़त अर्थात सिद्धावस्था, जिसमें कठिन उपवास और मौन आदि की साधना द्वारा साधक की आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है।
सूफ़ी काव्य परंपरा के महत्त्वपूर्ण रचनाकार :-
1. मुल्ला दाऊद - मुल्ला दाऊद या मौलाना दाऊद की रचना ‘चंदायन’ से सूफ़ी प्रेमाख्यानक काव्य परंपरा का आरंभ माना जाता है। यह लोर या लोरिक तथा चन्दा की प्रेमकथा है। विषयवस्तु की दृष्टि से इसमें भारतीय प्रेमाख्यानों की विभिन्न प्रवृत्तियों का निरूपण हुआ है। इसमें भी सूफ़ी रचनाओं के समान लोक प्रचलित विश्वासों के साथ-साथ परमतत्व से प्रेम की व्यंजना की गई है।
2. कुतुबन - चौपाई-दोहे के क्रम में कुतुबन ने ‘मृगावती’ की रचना 909 हिजरी (संवत् 1558) में की। इसमें चंद्रनगर के राजा गणपति देव के राजकुमार और कंचनपुर के राजा रूपमुरारि की कन्या मृगावती की प्रेमकथा का वर्णन है। इस कहानी के माध्यम से कवि ने प्रेममार्गी के त्याग और कष्ट का निरूपण करके साधक के भगवत्प्रेम का स्वरूप दिखाया है। बीच-बीच में सूफ़ियों की शैली पर बड़े सुंदर रहस्यमय आध्यात्मिक आभास हैं। ग्रंथ की परिणति शांत रस में दिखाई गई है।
3. मंझन - मंझन की रचना का नाम ‘मधुमालती’ (संवत् 1545) है। मधुमालती नाम की अन्य रचनाओं का भी पता चलता है। लेकिन मंझन कृत मधुमालती जायसी के पद्मावत के पाँच वर्ष बाद रची गई। जायसी ने अपने पूर्ववर्ती सूफ़ी प्रेमाख्यानक ग्रंथों का उल्लेख करते हुए जिस मधुमालती का नाम लिया है, वह मंझन की रची हुई नहीं है। इस ग्रंथ में कनेसर नगर के राजा सूरजभान के पुत्र राजकुमार मनोहर का महारस नगर की राजकुमारी मधुमालती के साथ प्रेम और पारस्परिक वियोग की कथा है। इस रचना में विरह-कथा के साथ आध्यात्मिक तथ्यों का निरूपण सुंदर ढंग से किया गया है।
4 मलिक मुहम्मद ‘जायसी’ - जायसी सूफ़ी साधकों एवं कवियों के सिरमौर हैं। हैं। प्रेममार्गी कवियों के इस प्रतिनिधि कवि की रचना-पद्मावत सन् 927 हिजरी (सन् 1520 ई.) में मानी गई है—
सन् नौ सै सत्ताईस अहा। कथा आरंभ बैन कवि कहा।
आ. शुक्ल ने इस कृति के संबंध में लिखा जायसी की अक्षय कीर्ति का आधार है ‘पद्मावत’, जिसके पढ़ने से यह प्रकट हो जाता है कि जायसी का हृदय कैसा कोमल और प्रेम की पीर’ से भरा हुआ था। क्या लोकपक्ष में, क्या अध्यात्म पक्ष में दोनों ओर उसकी गूढ़ता, गंभीरता और सरसता विलक्षण दिखाई देती है। इस कृति में राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की पद्मावती के प्रेम का वर्णन किया गया है। प्रेमगाया परंपरा की इस प्रौढ़ कृति में इतिहास और कल्पना का सुंदर समन्वय देखते ही बनता है।
5. उसमान - उसमान कवि की चित्रावली’ सन् 1613 ई. में लिखी गई थी। इसका कथानक कल्पनाश्रित है। इसमें नेपाल के राजकुमार सुजान के चित्रावली के साथ विवाह का वर्णन अत्यंत सरस रूप में हुआ है। रचनाकार अपने रचनाविधान में जायसी से प्रभावित रहा है। इसमें सूफ़ी और सूफ़ी प्रेमाख्यानक इतर काव्य की परंपराओं और काव्य-रूढ़ियों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
कृष्णभक्ति काव्य
हिंदी कृष्णभक्ति काव्य के प्रमुख संप्रदायों का प्रचार और प्रसार ब्रजमंडल क्षेत्र में व्यापकता से पाया जाता है। इस संदर्भ में संप्रदाय से अर्थ है विशिष्ट दार्शनिक विचारधारा का प्रतिपादन करने वाला सिद्धांत, मत या समूह।
भक्तिकाल में संप्रदाय का अर्थ है किसी विशिष्ट चिंतन परंपरा को विकसित और पोषित करने वाली एक विशेष पद्धति। इस दृष्टि से कृष्णभक्ति काव्य को समझने के लिए उसके प्रमुख संप्रदाय—
वल्लभ संप्रदाय
यह संप्रदाय वल्लभाचार्य द्वारा पंद्रहवीं सोलहवीं शती में स्थापित किया गया। इसकी भक्ति का नाम पुष्टिमार्ग है। इसे कृष्ण के प्रेम पर आधारित माना जाता है। इस मत का दार्शनिक सिद्धांत शुद्धाद्वैत कहलाता है। वल्लभाचार्य के चार शिष्य और विट्ठलनाथ के चार शिष्य को सम्मिलित करके अष्टछाप की स्थापना की गई। अष्टछाप के इन आठों कवियों ने इस संप्रदाय की विचारधारा के प्रसार में विशेष सहायता की। इन कवियों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—कुंभनदास, सूरदास, कृष्णदास, परमानंददास, गोविंददास, छीतस्वामी, नंददास और चतुर्भुजदास। इस संप्रदाय के इष्ट देव श्रीनाथ जी हैं। ये आठों भक्त कवि सखा भाव से कृष्ण की प्रेमाभक्ति में अनुरक्त रहे हैं। विशेष बात यह है कि ये आठों कवि विभिन्न जातियों और वर्गों से आए थे और संगीत तथा कलाओं पर इनका असाधारण अधिकार था।
माधव संप्रदाय
इस मत के अनुयायी मध्वाचार्य से प्रभावित थे। यह संप्रदाय भक्ति के आदर्श को निरूपित करता है। नाम कीर्तन इस संप्रदाय में विशेष रूप से प्रचलित हुआ। इनकी प्रमुख पुस्तक ‘भक्ति रत्नावली है।
विष्णु संप्रदाय
विष्णु स्वामी ने इस संप्रदाय की स्थापना की और बिल्वमंगल संन्यासी ने ‘कृष्ण कर्णामृत’ नामक कविता में राधा-कृष्ण का यश गायन कर इस मत का विशेष प्रचार किया। किंतु बाद में यह संप्रदाय वल्लभ संप्रदाय में मिल गया क्योंकि प्रभु वल्लभाचार्य ने विष्णु स्वामी के सिद्धांतों को लेकर बाद में ‘पुष्टिमार्ग की स्थापना की।
निंबार्क संप्रदाय
निंबार्काचार्य के इस संप्रदाय का विकास हरिव्यास मुनि और श्रीभट्ट की प्रसिद्ध रचनाओं से हुआ। इन्होंने श्रीकृष्ण के संकीर्तन को विशेष स्थान दिया। इस संप्रदाय की यह मान्यता है कि दैन्य भाव से कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और प्रेममूलक भक्ति से जीव का कल्याण होता है। भक्तों पर अनुग्रह के लिए ही कृष्ण अवतार धारण करते हैं।
चैतन्य संप्रदाय
चैतन्य संप्रदाय की स्थापना सोलहवीं शताब्दी में हुई। चैतन्य ने भागवत पुराण की भक्ति का आदर्श स्वीकार किया। जयदेव, चंडीदास और विद्यापति के कृष्ण विषयक पदों को गाकर चैतन्य ने कृष्णभक्ति का विशेष प्रचार किया। उन्होंने कृष्णभक्ति में राधा को विशेष स्थान दिया। विशिष्ट बात यह है कि इस संप्रदाय में जाति-पाँति का बंधन बिल्कुल नहीं है।
राधावल्लभ संप्रदाय
इस संप्रदाय की स्थापना पंद्रहवीं शताब्दी में हितहरिवंश ने वृंदावन में की। माधव और निंबार्क संप्रदाय से इस संप्रदाय को विशेष आधार मिला और इसी आधार से हितहरिवंश ने ‘राधा सुधानिधि’ की रचना की। इस संप्रदाय की विशेषता यह है कि इस संप्रदाय में श्रीकृष्ण नहीं, राधा प्रमुख है। राधा यहाँ परम प्रकृति है और कृष्ण उस पर आश्रित पुरुष हैं। कृष्ण राधा के साथ एकाकार होकर गोप-गोपियों के साथ लीलारत होते हैं और शृंगार के सौंदर्य मंडित रूप का विस्तार करते हैं। राधा-वल्लभ श्रीकृष्ण का ही उपास्य नाम है।
हरिदासी संप्रदाय
इस संप्रदाय की स्थापना स्वामी हरिदास ने की और उन्हीं के साथ इसका अंत भी मानना चाहिए। इस संप्रदाय को सखी संप्रदाय भी कहा जाता है क्योंकि स्वामी हरिदास ने नित्य बिहारी कृष्ण की निकुंज लीलाओं का गान किया है।
दत्तात्रेय संप्रदाय
इस मत के अनुयायी दत्तात्रेय को अपने पंथ का प्रवर्तक मानते हैं। दत्तात्रेय का रूप तीन सिरों से युक्त है। इनके साथ एक गाय और चार कुत्ते हैं। दत्तात्रेय स्वयं कृष्ण के अवतार माने जाते हैं। इस संप्रदाय में स्वयं कृष्ण ही आराध्य हैं और भगवतगीता ही परम अराधना की पुस्तक है। इस संप्रदाय का विशेष प्रचार महाराष्ट्र में हुआ।
हिंदी साहित्य में कृष्णभक्ति काव्य
हिंदी कृष्णभक्ति काव्य की परंपरा को बारहवीं शताब्दी के कवि जयदेव ने ‘गीत गोविंद’ लिखकर विशेष रूप से प्रेरित किया। संस्कृत में राधा-कृष्ण संबंधी यह प्रथम रचना है। विद्वानों का अनुमान है कि कवि को इस रचना की प्रेरणा लोकगीतों और लोककथाओं में मिली होगी।
विद्यापति (1350-1460 ई.) - कृष्णभक्ति की लोक परंपरा को चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में विद्यापति ने कृष्ण-राधा संबंधी अपने पदों की भावधारा में ढाल दिया। हिंदी में कृष्ण काव्य संबंधी गीति काव्य परंपरा के प्रमुख प्रवर्तक कवि विद्यापति ही हैं। कृष्ण और राधा के मधुर रूप को इन्होंने लोक परंपरा में रस-सिक्त कर दिया।
सूरदास (1478-1583 ई.) - विद्यापति के बाद हिंदी कृष्ण काव्य के प्रथम बड़े कवि सूरदास हुए। सूरदास की प्रतिभा का विकास पुष्टि र्ग के प्रवर्तक वल्लभाचार्य के संस्पर्श से हुआ। सूर ने गोपाल कृष्ण के गोकुल, वृंदावन और मथुरा के जीवन से संबंधित संपूर्ण आख्यान को ‘सूरसागर’ नामक अपनी कृति में प्रस्तुत किया है। कथा की सामान्य रूपरेखा श्रीमद्भागवत पुराण से ली, किंतु प्रसंगों और विवरणों को उन्होंने अपनी प्रतिभा से मौलिकता प्रदान करते हुए अद्वितीय बना दिया। सूरदास के जीवन और उनकी कृतियों की जानकारी के लिए नामादास कृत ‘भक्तमाल’ और गोकुलदास कृत ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ का आधार लिया जाता है।
सूरदास की भेंट 1510 ई. के आसपास वल्लभाचार्य से हुई। तब से इन्होंने दास्य और विनय के पद लिखना बंद करके सख्य, वात्सल्य और माधुर्य-भाव के पद लिखना शुरू किया। डॉ. दीनदयालु गुप्त ने अपनी पुस्तक ‘अष्टछाप और वल्लभ संप्रदाय में सूर रचित 25 ग्रंथों की सूची दी है जिनमें ‘सूरसागर’, ‘सूर सारावली’, ‘सूर साहित्य लहरी’, ‘सूर पचीसी’, ‘सूर रामायण’ आदि प्रमुख हैं। वस्तुतः ‘सूरसागर’ ही उनकी प्रमुख कृति है। ‘साहित्य लहरी’ उनके पदों का संग्रह है। अर्थ गोपन शैली में राधाकृष्ण की लीलाओं के वर्णन के लिए इस ग्रंथ का विशेष महत्व है। ‘सूरसागर’ की कथा का आधार श्रीमद्भागवत पुराण है, इसमें सघन अनुभूति और आत्माभिव्यक्ति को श्रेष्ठ सर्जनात्मक विस्तार मिलता है। वात्सल्य और शृंगार का उन्होंने इसमें जैसा उद्घाटन किया वैसा अनूठा वर्णन हिंदी साहित्य के किसी भी कवि में नहीं मिलता। ब्रजभाषा की साहित्यिक गरिमा को स्थापित करने वाली रचनाओं में ‘सूरसागर’ अग्रगण्य है। साथ ही राग रागिनियों के स्वर ताल से बँधी हुई पद शैली का अनूठा उदाहरण भी है।
कुंभनदास (1468-1583 ई.) - कुंभनदास ब्रज में गोवर्धन पर्वत से दूर एक गाँव में रहते थे। गृहस्थ होते हुए भी ये अनासक्त भाव से कृष्णभक्ति में लीन रहते थे। ये कीर्तन गायन में बड़े प्रसिद्ध थे
कुंभनदास की स्वतंत्र रचनाओं का उल्लेख नहीं मिलता, किंतु उनके कुछ पद ‘राग कल्पद्रुम’, ‘राग रत्नाकर’, ‘वसंत धमार कीर्तन’ आदि में संकलित हैं। इनके पदों में साहित्यिकता से ज़्यादा संगीत और लय का सौंदर्य है।
परमानंददास (1493-1553 ई.) - अष्टछाप के प्रमुख कवि परमानंददास का जन्म कन्नौज के निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वल्लभाचार्य से दीक्षा लेकर ये बाल लीला के पदों की रचना करते रहे। इनकी रचनाएँ ‘परमानंद सागर’ के नाम से प्रकाशित हैं। बाल लीला के सुंदर पद इन्होंने लिखे हैं किंतु उनमें सूरदास जैसी मार्मिकता नहीं है।
कृष्णदास (1495-1575 ई.) - ये कृष्णदास अधिकारी के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये दलित समुदाय से थे और गुजरात के राजनगर राज्य में जन्मे थे। प्रबंध पटुता के कारण ये ब्रज में आकर श्रीनाथ जी के मंदिर का प्रबंध देखने लगे। संगीत के मर्मज्ञ और गायक थे। बाल लीला तथा राधा-कृष्ण प्रेम प्रसंग में इनका मन रमता था। इनकी मातृभाषा गुजराती थी लेकिन ब्रजभाषा पर इनका अच्छा अधिकार था।
नंददास (1533-1586 ई.) - अष्टछाप के कवियों में नंददास काव्य सौंदर्य और दार्शनिकता की दृष्टि से सूरदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण कवि हैं। ये गोस्वामी विठ्ठलनाथ के शिष्य थे। इनका जन्म सोरों में हुआ था तथा काशी में इन्होंने शास्त्र का अध्ययन किया था। पुष्टि मार्ग में दीक्षित होने के बाद इन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की जिनमें ‘भँवरगीत’, ‘रास पंचाध्यायी’, ‘रस मंजरी’, ‘रूप मंजरी’, ‘स्याम सगाई’ आदि प्रसिद्ध हैं। ‘भँवरगीत’ इनकी अत्यंत प्रसिद्ध रचना है। अपनी दार्शनिकता और काव्यगत परिपक्वता के लिए भी यह कृति बेजोड़ मानी जाती है।
गोविंदस्वामी (1505-1585 ई.) - गोविंदस्वामी का जन्म भरतपुर राज्य के एक गाँव में हुआ। ये गृहस्थ थे। वैराग्य होने पर ब्रज मंडल में आ गए। संगीत शास्त्र का इन्हें अच्छा ज्ञान था और ये भक्तों को पद गायन सिखाते थे। 1535 ई. में गोस्वामी विट्ठलनाथ से पुष्टिमार्ग की दीक्षा लेकर अष्टछाप में सम्मिलित हो गए। प्रसिद्ध है कि अकबर के दरबार के गायक तानसेन इनके पास आकर पद गायन की शिक्षा लेते थे। इनके पद ‘गोविंदस्वामी के पद’ नाम से संकलित हैं। ब्रजभाषा का लालित्य इनमें अद्भुत ढंग से विद्यमान है।
छीतस्वामी (1500-1585 ई.) - ये मथुरा के चतुर्वेदी ब्राह्मण थे और बीरबल के पुरोहित थे। पुष्टिमार्ग में दीक्षित होकर अष्टछाप में सम्मिलित हो इन्होंने संगीत में अपने आपको समर्पित कर दिया। कीर्तन के लिए 200 पदों की रचना की। इनकी भक्ति की तन्मयता की बहुत किंवदंतियाँ प्रचलित हैं।
चतुर्भुजदास (1540-1585 ई.) - प्रसिद्ध है कि ये कुंभनदास के सबसे छोटे पुत्र थे। ये खेती-बाड़ी करते और भजन-कीर्तन में समय बिताते थे।
श्री भट्ट - कृष्ण की ललित लीलाओं का वर्णन करने वाले मधुर भाव के कवि हैं। इनका संबंध निंबार्क संप्रदाय से था। इनकी रचना ‘युगल शतक’ बहुत प्रसिद्ध हुई।
मीराबाई (1504-1558 ई.) - इनका जन्म राजस्थान में राव रत्न सिंह के घर में हुआ था। इनका विवाह चित्तौड़ के राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज से 1516 ई. में हुआ। दुर्भाग्यवश 7 वर्ष के बाद मीरा विधवा हो गई और जीवन भर संघर्ष झेलती रही। लोक-लाज और कुल की मर्यादा छोड़कर इन्होंने अपने को कृष्णभक्ति में समर्पित कर दिया। मीरा की भक्ति में तन्मयता और एकनिष्ठता है तथा गीतिकाव्य का मधुर रस। इनकी रचनाओं का प्रामाणिक संकलन मीराबाई की पदावली के नाम से प्रकाशित है। इनकी तुलना आलवार भक्तिन आंडाल से की जा सकती है। इनकी भाषा राजस्थानी गुजराती मिश्रित ब्रजभाषा है।
रसखान - रसखान के जन्म, शिक्षा-दीक्षा, निधन आदि का प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। किंतु रसखान रचित ‘प्रेम वाटिका’ के आधार पर कहा जाता है कि ये हुमायूँ के समय में मौजूद थे। बादशाह वंश की ठसक छोड़कर ये कृष्ण प्रेम के दीवाने हो गए। इनका असली नाम इब्राहिम ख़ाँ था। ये दिल्ली छोड़कर गोवर्धन धाम चले गए थे। प्रसिद्ध है कि इन्होंने विट्ठलनाथ जी से वल्लभ-संप्रदाय की दीक्षा ली थी। इनकी चार रचनाएँ प्रसिद्ध हैं—’सुजान रसखान’, ‘प्रेम वाटिका’, ‘दान लीला’ और ‘अष्टयाम’। इनमें भक्त और कवि का अद्भुत समन्वय है और इनकी रचनाओं में ब्रजभाषा कविता का रस-सौंदर्य छलक पड़ता है। राधा और कृष्ण की प्रेम भक्ति के ऐसे मधुर गायक हिंदी में कम हुए हैं।
ब्रजभाषा कृष्ण भक्ति काव्य की परंपरा बहुत समृद्ध है जिसके अंतर्गत अनेक कवियों के नाम उल्लेखनीय हैं। जैसे हरिव्यास देव, परशुराम देव, हित हरिवंश, ध्रुवदास, नेही नागरीदास, स्वामी हरिदास, जगन्नाथ गोस्वामी, बिट्ठल विपुल, बिहारिन्ददास, भक्तिकवि नागरीदास, राम राय, चंद्रदास, नरोत्तमदास, भगवान दास, माधवदास माधुरी, ब्रजवासी लाल आदि।
कृष्णभक्ति काव्य की जो परंपरा भक्तिकाल में शुरू हुई थी वह धीरे-धीरे रीतिकालीन शृंगारी काव्य में परिणत होती गई। रीतिकाल में आकर कृष्ण और राधा भक्ति के प्रतीक न रहकर शृंगार के प्रतीक हो गए। रीतिकाल के बाद आधुनिक काल में भी कृष्णकाव्य का सृजन हुआ और युगीन परिस्थितियों ने दृष्टिकोण में बदलाव पैदा किया।
हिंदी में सगुण रामकाव्य परंपरा
हिंदी के रामकाव्य की कथावस्तु का स्रोत संस्कृत के रामकाव्य संबंधी काव्यग्रंथ हैं, ख़ासकर वाल्मीकि कृत ‘रामायण’। लेकिन भक्ति आंदोलन के रामभक्त कवियों ने इसे युग की सामाजिक-राजनीतिक चेतना के अनुरूप विकसित किया।
रामानंद - अँग्रेज़ लेखक फर्कुहर ने इनका समय 1400-1470 ई. तक स्थिर किया है। इनका जन्म काशी में हुआ। रामानंद ने श्री वैष्णव संप्रदाय के आचार्य राघवानंद से दीक्षा ली। वर्णाश्रम धर्म में आस्था रखते हुए भी इन्होंने सभी वर्गों को भक्ति मार्ग का अधिकारी माना है।
अग्रदास - इनका जन्म सोलहवीं शताब्दी के मध्य में हुआ। इन्होंने अपनी कृतियों में भक्ति भावना के साथ-साथ कवित्व का भी सुंदर परिचय दिया है। सुंदर पद रचना तथा अलंकारों के सुंदर प्रयोग के द्वारा इन्होंने अपने साहित्य में शास्त्रीय ज्ञान को प्रमाणित किया है। इनकी प्रमुख कृतियों में ‘ध्यानमंजरी’, ‘राम भजन मंजरी, ‘रामाष्टयाम’, ‘उपासना बावनी’ और ‘पदावली है। इन्होंने ब्रजभाषा का लालित्यपूर्ण प्रयोग किया है। वस्तुतः अग्रदास जी से ही रामकाव्य के रसिक संप्रदाय का प्रवर्तन होता है। ‘रामाष्टयाम’ से इनके रसिक होने का परिचय मिलता है।
ईश्वरदास - विद्वानों ने ईश्वरदास जी की कृति ‘सत्यवती कथा’ (1501 ई.) के आधार पर इनकी जन्मतिथि 1480 ई. के आसपास स्वीकार की है। इनकी दो कृतियाँ ‘भरत मिलाप’ तथा ‘अंगद पैज’ रामचरित्र से संबंधित हैं। ‘भरत मिलाप’ का आरंभ राम वन गमन से होता है तथा भरत के आग्रह पर राम के वन से न लौटने पर भरत के द्वारा पर्णकुटी बनाकर निवास करने के प्रसंग पर रचना समाप्त हो जाती है। ‘अंगद पैज’ में रावण की सभा में अंगद की प्रतिज्ञा का प्रसंग निरुपित किया गया है। दोनों कृतियों का साहित्यिक महत्व साधारण है किंतु कवि की भक्ति भावना की इन कृतियों में उत्कृष्ट अभिव्यक्ति हुई है।
तुलसीदास गोस्वामी - तुलसीदास जी के जीवन वृत्त के संबंध में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद है। बेनी माधवदास द्वारा प्रणीत मूल गोसाई चरित तथा महात्मा रघुबर दास कृत ‘तुलसी चरित’ में गोस्वामी जी का जन्म संवत् 1554 (1497 ई.) स्वीकार किया गया है। बेनीमाधव ने तो गोस्वामी जी की जन्मतिथि (श्रवण शुक्ला सप्तमी) भी निर्दिष्ट की है। ‘शिव सिंह सरोज में इनका जन्म संवत् 1583 (1526 ई.) माना गया है। पं. राम गुलाम द्विवेदी ने इनका जन्म 1589 (1532 ई.) में स्वीकार किया है। इनके जन्म के साथ-साथ जन्म स्थान के संबंध में भी विवाद है। ‘मूल गोसाईं चरित’ तथा ‘तुलसी चरित में इनका जन्म स्थान राजापुर (बाँदा ज़िला) बताया गया है। लाला सीता राम, गौरीशंकर द्विवेदी, राम नरेश त्रिपाठी, डॉ. रामदत्त भारद्वाज गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म स्थान सोरो (ज़िला एटा) मानते हैं। जनश्रुति के अनुसार इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। अंतरसाक्ष्यों से यह भी प्रमाणित होता है कि इनका बचपन विषम परिस्थितियों में व्यतीत हुआ। जनश्रुति के अनुसार इनका विवाह दीनबंधु पाठक की कन्या रत्नावली से हुआ। शुक्ल जी ने गोस्वामी जी द्वारा रचित बारह ग्रंथ माने हैं :- दोहावली, कवित्त रामायण, गीतावली, रामचरितमानस, रामाज्ञा प्रश्न, विनय पत्रिका, रामलला नहछू, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी और कृष्ण गीतावली। ‘शिवसिंह सरोज’ में दस और ग्रंथों के नाम गिनाए गए हैं :- राम सतसई, संकटमोचन, हनुमद बाहुक, रामशालाका, छंदावली, छप्पय रामायण, कडखारामायण, रोला रामायण, झूलनारामायण और कुंडलिया रामायण। इन ग्रंथों की प्रामाणिकता के संबंध में विद्वानों में विवाद है।
गोस्वामी जी ने एक ओर नाथपंथियों के प्रभाव से नष्ट होती हुई जनमानस की आस्था को रामभक्ति के माध्यम से पुनः पल्लवित किया और दूसरी ओर रामकथा के विविध प्रसंगों के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक और पारिवारिक जीवन के विविध आदर्शों को जनता के समक्ष प्रस्तुत कर विशृंखलित हिंदू समाज को केंद्रित किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में इनकी वाणी की पहुँच मनुष्य के सारे भावों और व्यापारों तक है। एक ओर तो वह व्यक्तिगत साधना के मार्ग में विरागपूर्ण शुद्ध भागवद्भक्ति का उपदेश करती है तो दूसरी और लोक पक्ष में आकर पारिवारिक और सामाजिक कर्त्तव्यों का सौंदर्य दिखाकर मुग्ध करती है। व्यक्तिगत साधना के साथ ही साथ लोक धर्म की अत्यंत उज्ज्वल छटा उसमें वर्तमान है। उन्होंने परस्पर विरोधी विचारधाराओं, जीवन धाराओं और जीवन पद्धतियों में समन्वय की साधना करते हुए काव्य-मूल्यों और जीवन-मूल्यों के बीच अद्भुत सेतु की रचना की। शुक्ल जी के शब्दों में हम निस्संकोच कह सकते हैं कि यह एक कवि ही हिंदी को एक प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफ़ी है। रामकाव्य परंपरा के संपूर्ण विकास में तुलसी अद्वितीय हैं।
नाभादास - इनकी रचना ‘भक्तमाल’ का रचनाकाल 1596 ई. माना जाता है। इस आधार पर उनका जन्म 1570 ई. के आसपास ठहरता है। इन्होंने ‘भक्तमाल’ परंपरा का सूत्रपात करते हुए हिंदी को सर्वश्रेष्ठ ‘भक्तमाल’ प्रदान की। भक्तों का परिचय देने में समास शैली का कुशल उपयोग किया गया है। ‘अष्टयाम इनकी शृंगार रस से ओतप्रोत रचना है जिसमें रसिक भक्ति का प्रभाव स्पष्ट है। इनकी कृतियों से स्पष्ट है कि इन्हें छंदशास्त्र का ही नहीं बल्कि भारतीय काव्यशास्त्र का अच्छा ज्ञान था।
केशवदास - इनका जन्म 1555 ई. में तथा मृत्यु 1617 ई. में हुई। ओरछा के राजा महाराज राम सिंह के भाई इंद्रजीत सिंह की सभा में अपने पांडित्य के कारण इनका अतिशय सम्मान था। इनकी कृतियाँ हैं :- कविप्रिया, रसिकप्रिया, वीरसिंह चरित, रामचंद्रिका, विज्ञानगीता, रतनबावनी और जहाँगीर जस चंद्रिका। ‘रामचंद्रिका’ (1601 ई.) हिंदी रामकाव्य परंपरा की विशिष्ट कृति है। 39 प्रकाशों में विभाजित इस कृति के अनेक प्रसंगों पर ‘प्रसन्नराघव’, ‘अनर्घराघव’, ‘हनुमन्नाटक’, ‘कादंबरी’ आदि का पर्याप्त प्रभाव देखा जा सकता है। प्रबंध दृष्टि से अनेक कथा-प्रसंग विशृंखल हैं। मार्मिक प्रसंगों का भी ‘रामचंद्रिका’ में प्रायः अभाव है। इसका कारण है अलंकारों और शब्द-चमत्कार के प्रति अतिरिक्त आकर्षण। वाग्वैदग्ध्य ‘रामचंद्रिका’ की एक अनुपम विशेषता है जो निस्संदेह केशव के दरबारी परिवेश की देन थी।
नरहरिदास
नरहरिदास ने ‘पौरुषेय रामायण की रचना की। इसकी रचना शैली रासो ग्रंथ जैसी है। ‘वाल्मीकि रामायण’ को इस कृति में आधार माना गया है। दोहा-चौपाई पद्धति का अनुसरण करते हुए भी कवित्त, सवैया, छप्पय, पद्धरि आदि छंदों का प्रयोग किया गया है। भाषा राजस्थानी और ब्रज मिश्रित अवधी है। साहित्यिक दृष्टि से इस रचना का विशेष महत्व नहीं है।
रामकाव्य परंपरा के इन कवियों के अतिरिक्त प्राणचंद चौहान (रामायण महानाटक), माधवदास चारण (राम रासो), हृदय राम (हनुमन्नाटक), लाल दास (अवध विलास), कपूर चंद्र त्रिखा (रामायण जो गुरुमुखी लिपि में है) आदि भी इस परंपरा के विशिष्ट कवि हैं।
रीतिकाल
सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्टभूमि, रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ (रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त)
रीतिकवियों का आचार्यत्व।
रीतिकाल के प्रमुख कवि और उनका काव्य
रीतिकाल की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्टभूमि
सामाजिक पृष्ठभूमि
शासन-तंत्र निरंकुश और शोषक बन गया था। प्रजा की दयनीय दशा की तरफ़ ध्यान देने वाला कोई नहीं था। शोषक शासकों का समूह बढ़ता जा रहा था और शोषित प्रजा हर प्रकार के अत्याचार को सहने के लिए विवश होती जा रही थी।
कवि-कलाकार उत्पन्न होते थे प्रजा-वर्ग में, किंतु उन्हें अपनी कला के समादर और अपनी आजीविका के लिए सामंत या राजन्य वर्ग की शरण लेनी पड़ती थी। ऐसी स्थिति में वे अपने आश्रयदाता की रुचि के अनुकूल अपनी कला को ढालते थे। सामान्य जन में न तो कला की परख थी और न कलाकार को पुरस्कृत करने की क्षमता। उसके लिए तो परिवार का पेट भरना ही कठिन था। सारा जीवन घोर परिश्रम में ही बीत जाता था। उनके सुख-दुख की बात सुनने-सुनाने वाला कोई नहीं था। कवि-कलाकार को जहाँ से पोषण मिलता था, वे उसी वातावरण से प्रेरणा लेते थे। रीतिकाल के कवियों को रसिक वर्ग में रखा जा सकता है क्योंकि इन्हें राजदरबार में सामंतों के संसर्ग में रहना पड़ता था। इनकी भी रुचि नागर होती थी। ये अशिक्षित ग्रामीणों को गँवार समझते थे जिनकी गणना अरसिकों में होती थी।
इस प्रकार रीतिकालीन कविता का सामाजिक परिवेश नागर होता था जो विशेष संस्कार और रुचि से सम्पन्न माना जाता था। लोकजीवन की त्रासद स्थितियों की चर्चा करके वे आश्रयदाता का कोप भाजन नहीं बनना चाहते थे।
सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
रीतिकालीन कविता जिस संस्कृति की उपज थी, उस पर तत्कालीन दरबार का गहरा प्रभाव पाया जाता है। दरबारों में ही संगीत कला, चित्रकला और स्थापत्यकला का पोषण हो रहा था। दरबार चाहे मुग़ल बादशाहों, नवाबों का हो या राजा-महाराजाओं का, कलाकारों को वहीं प्रश्रय मिलता था।
चित्रकला
डॉ. कुमारस्वामी ने राजपूत शैली और मुग़ल शैली की चित्रकला को पृथक-पृथक माना था किंतु नए अनुसंधानों से दोनों शैलियों पर एक दूसरे का प्रभाव पाया गया है। रीतिकाल में इन शैलियों में चित्रकार की आंतरिक ऊर्जा के स्थान पर परंपरा निर्वाह की प्रवृत्ति ही प्राप्त होती है। चाहे ये चित्र नायक नायिका भेद से संबद्ध हों चाहे राग-रागिनियों से या फिर पौराणिक आख्यानों से, सब में विलासिता और प्रदर्शन की ही प्रमुखता होती है। पौराणिक आख्यानों या व्यक्ति चित्रों के आलेख में कोई मौलिकता या सजीवता नहीं मिलती।
वास्तुकला
फ़ारसी वास्तुशैली को भारतीय स्थापत्य कला से सम्मिश्रित करके जिस नई शिल्पकारी का जन्म हुआ था उसका श्रेष्ठ प्रमाण ‘ताजमहल’ है। अकबर के शासन काल में लाल पत्थरों के प्रयोग से निर्मित क़िले, सम्राट की महत्त्वाकांक्षा और पौरुष के प्रतीक बन गए थे। इसी समय से अलंकरण और प्रदर्शन की प्रवृत्ति शुरू हो गई थी फिर भी उनमें चमत्कारपूर्ण प्रभाव उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता थी। राजपूत शैली में निर्मित राजस्थान के महलों के निर्माण में मुग़ल शैली के अनुकरण का प्रयास लक्षित होता है। जहाँगीर ने वास्तुकला के विकास में विशेष योगदान दिया। वास्तव में वह चित्रकला का प्रेमी था अतः उसके समय में भवनों, मकबरों और मस्जिदों के निर्माण में भी बारीक पंच्चीकारी के नमूने प्राप्त होते हैं। विलास और ऐश्वर्य के इस युग में संगमरमर के श्वेत पत्थरों में तरह-तरह के बेलबूटे और क़ीमती पत्थरों के प्रयोग द्वारा युगानुरूप प्रभाव उत्पन्न करने का प्रयास किया गया। शाहजहाँ ने इनमें और भी सूक्ष्म सज्जा का प्रयोग किया। जामा मस्जिद और ताजमहल दोनों हुमायूँ के मकबरे के अनुकरण पर निर्मित है।
संगीत कला
अकबर के समय में संगीत का चरम उत्कर्ष दृष्टिगत होता है। ग्वालियर के दरबार में ‘ध्रुपद’ जैसी गंभीर शैली का विकास हुआ। तानसेन ने संगीत में एक कीर्तिमान स्थापित किया। जहाँगीर के समय में ‘संगीत दर्पण’ जैसे संगीत शास्त्र का सुव्यवस्थित ग्रंथ निर्मित हुआ। शाहजहाँ के समय में गंभीरता और उदात्तता के स्थान पर कोमल रागों का ज़्यादा प्रयोग हुआ। मुग़ल और हिंदू संगीतज्ञों को राज्याश्रय मिला। मुहम्मदशाह ‘रंगीले’ के समय में दिल्ली दरबार पुनः संगीतकारों और रसिक कलाकारों से सुशोभित हो उठा। भारतीय संगीत फ़ारसी प्रभाव से सम्पन्न होकर विलासवृत्ति प्रधान हो गया। इस युग में चतुंरग शैली में ब्याल, तराना, सरगम और चिवट (मृदंग के बोल) सबके मिश्रण से संगीत की वैचित्र्यपूर्ण रचना की जाती थी। इन ललित कलाओं के विकास और ह्रास पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट होता है कि ये सब अपने आश्रयदाताओं की रुचियों के परिवर्तनों का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। मुग़ल साम्राज्य के उत्थान के साथ इनका भी उत्थान हुआ और पतन के साथ ही इनमें भी पतन के लक्षण दृष्टिगत हुए।
रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ (रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त)
रीतिकाव्य का वर्गीकरण
आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास ग्रंथ में इस काल के सभी कवियों को दो भागों में बाँटा है। एक वर्ग तो ऐसे कवियों का है जिन्होंने समग्रतः या अंशतः रीति-परंपरा का पालन किया। दूसरे वर्ग के कवि वे हैं जिन्होंने परंपरा से मुक्त रहकर काव्य सूजन किया। रीतिकाल के विभाजन को उनके द्वारा दिया गया शीर्षक है ‘रीतिग्रंथकार कवि’ तथा ‘रीतिकाल के अन्य कवि।
शुक्ल जी के बाद के विद्वानों ने रीति-परंपरा को स्पष्टतः अपनाने, काव्य में इसके प्रत्यक्षतः या परोक्षतः पालन करने तथा इनसे सर्वथा मुक्त रहकर भी रस-दृष्टि से संपृक्त रहने के आधार पर रीतिकाल के कवियों और प्रवृत्तियों को तीन वर्गों में विभाजित किया। ये विभाजन इस प्रकार हैं :-
(1) रीतिबद्ध कवि : ये वे कवि थे जिन्होंने रीति परंपरा में बँधकर लक्षण-ग्रंथ लिखे। जो लक्षण इन्होंने प्रस्तुत किए उन्हें स्पष्ट और पुष्ट करने के लिए उदाहरणस्वरूप अपनी कविता भी प्रस्तुत की। चिंतामणि, मतिराम, देव, भिखारीदास, सोमनाथ, जसवंतसिंह आदि इसी प्रकार के कवि हैं।
रीतिबद्ध कवि दो प्रकार के हैं :-
1. सर्वांग निरूपक कवि
इस कोटि के कवियों ने काव्य के सभी अंगों रस, अलंकार, छंद आदि की व्याख्या की और उदाहरण के लिए कविताएँ भी लिखीं। इनमें प्रमुख हैं—चिंतामणि, कुलपति मिश्र, देव, भिखारीदास आदि।
2. विशिष्टांग निरूपक कवि
इस कोटि के कवियों ने काव्य के एक या एकाधिक अंगों की विवेचना की परंतु इनके आचार्यत्व और कविता कर्म के दायरे में काव्य के सभी अंग नहीं आ सके। उदाहरणस्वरूप ‘भाषा भूषण’ के रचयिता जसवंत सिंह, शिवराज भूषण के रचयिता भूषण को काव्य के एक विशिष्ट अंग अलंकार के निरूपक आचार्य के रूप में जाना गया, जबकि मतिराम ने अलंकार पर ‘ललितललाम’ तथा शृंगार-रस पर रसराज नामक ग्रंथ लिखा पर एकाधिक अंग पर लिखने के बावजूद उन्हें विशिष्टांग निरूपक कवि के रूप में जाना गया।
इसका कारण यह है कि रस विवेचन में मतिरास शृंगार रस तक ही सीमित रहे।
विशिष्टांग निरूपक कवियों को वर्ण्य-विषय के अनुसार निम्न कोटियों में बाँटा गया है।
रस निरूपक कवि
इस कोटि के कवियों ने अपने आचार्यत्व और कवित्व का आधार रस को बनाया। इनके भी दो प्रकार हैं :
सर्वरस निरूपक कवि इस कोटि के रस निरूपक कवियों ने शृंगार, वीर आदि सभी रसों का विवेचन किया और एतद्विषयक कविताएँ लिखीं। इस कोटि के कवियों में पद्माकर, रसलीन, बेनी प्रवीन आदि प्रमुख है।
शृंगार निरूपक कवि रीतिकाव्य में शृंगार रस का प्रभाव सबसे ज़्यादा है। बहुधा सर्वरस निरूपक कवियों ने भी शृंगार रस को प्रमुखता दी है। इस कोटि के कवियों ने शृंगार रस में भी नायक-नायिका भेद को सर्वाधिक महत्व दिया। इस कोटि के प्रमुख कवि हैं मतिराम, कृष्णदेव भट्ट आदि।
अलंकार निरूपक कवि
रीति निरूपण में रस के बाद जिस काव्यांग को सर्वाधिक महत्व मिला वह अलंकार है। अलंकार के माध्यम से रीति युगीन आचार्यों को काव्य-चमत्कार पैदा करने की सहूलियत मिली। अलंकार निरूपक कवियों में प्रमुख है—महाराजा जसवंत सिंह, मतिराम, भूषण, पद्माकर, गोप आदि।
छंद निरूपक कवि
इस कोटि के कवियों ने छंद के विभिन्न रूपों का विश्लेषण किया और कविताएँ लिखीं। हालाँकि कवित्व की दृष्टि से आज उनका विशेष उल्लेख नहीं किया जाता है। मुरलीधर ‘भूषण, सुखदेव मिश्र आदि प्रमुख छंद निरूपक कवि हैं।
(ii) रीतिसिद्ध कवि - ऐसे कावे जिन्होंने लक्षण बताने वाले ग्रंथ तो नहीं लिखे, फिर भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस परंपरा की मान्यताओं को अपने काव्य में उपयोग किया और सृजन के क्षणों में उनका प्रायः पूर्ण ध्यान भी रखा उन्हें रीतिसिद्ध कवि कहा गया है। बिहारी, सेनापति आदि इसी प्रकार के कवि है।
(iii) रीतिमुक्त कवि - इन कवियों ने न तो लक्षण ग्रंथों की रचना की और न ही रीतिकालीन परंपराओं को ही निभाया। इस प्रकार के दबाव से पूर्णतः स्वतंत्र रहकर इन्होंने विशुद्ध शृंगार की आत्मानुभूतिपरक कविताएँ लिखीं। विरक्ति-भावना और प्रकृति-चित्रण से संबंधित मुक्त काव्य रचने वाले ये रीतिमुक्त कवि निज प्रेम की पीड़ा को गाते-सुनाते रहे। इस तरह के कवियों में घनानंद, आलम, ठाकुर, बोधा और द्विजदेव प्रमुख हैं।
रीतिकवियों का आचार्यत्व।
रीतिकाव्य की शास्त्रीय परंपरा का सीधा संबंध संस्कृत काव्यशास्त्र के साथ है। यहाँ संस्कृत काव्यशास्त्र का सूक्ष्म व गहन विश्लेषण एवं काव्यदर्शन तो अनुपस्थित है पर भेदनिरूपण की प्रवृत्ति प्रबल हो चुकी है। रस, अलंकार आदि अवधारणाएँ मूलतः वहीं से आाई हैं। इसके अतिरिक्त शृंगार की रचना सामग्री का काफ़ी कुछ अंश वात्स्यायन के कामसूत्र से लिया गया है।
रीतिकाव्य की शृंगारिक परंपरा में संस्कृत काव्य का प्रभाव भी महत्वपूर्ण रहा है। अमरूक रचित अमरुशतक और गोवर्द्धनाचार्यकृत ‘आर्यासप्तशती’ का नाम इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनका अलंकरण प्रधान काव्यात्मक सौंदर्य रीतिकाव्य की पूर्वपरंपरा को परिभाषित करता है। शृंगारिक साजसज्जा और भावव्यंजना के अनूठे विधान ने इनको रीति कवियों का प्रिय ग्रंथ बना दिया है। ‘अमरुशतक’ पदमाकर और बिहारी जैसे कवियों का प्रेरणास्रोत रहा है। भानुदत्त की ‘रसमंजरी’ पर ‘आर्या सप्तशती’ का प्रभाव दिखाई देता है। प्राकृत में रचित ‘गाथा सप्तशती’ भी एक प्रमुख प्रेरणास्रोत रही है।
रीतिकाव्य की शृंगार परंपरा पर संस्कृत के स्त्रोत साहित्य का प्रभाव भी रहा है। दैवस्तुति होने के बावजूद स्त्रोत साहित्य अपने अलंकरण और काव्यसौंदर्य में ऐहिक काव्य के समकक्ष और संवेदना में शृंगारिक है। नख-शिख वर्णन का आलंकारिक सौंदर्य इसकी एक प्रमुख प्रवृत्ति है जिसका रीतिकवियों ने उत्साहपूर्वक वर्णन किया।
आचार्य केशवदास को हिंदी में काव्यशास्त्र की नींव रखने का श्रेय प्राप्त है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने चिंतामणि त्रिपाठी को इस पद का अधिकारी माना है किंतु उनका मत डॉ. नगेंद्र समेत हिंदी के बहुसंख्यक विद्वानों की स्वीकृति नहीं पा सका। देव, भिखारीदास आदि परवर्ती रीत्तिकवियों ने केशव को ही आचार्य के रूप में श्रद्धांजलि दी है। केशव के बाद रीतिग्रंथों की रचना इस युग की एक परंपरा ही बन गई। इस परंपरा की पहली कड़ी में कृपाराम की ‘हिततरंगिणी’, नंददास की ‘रसमंजरी’, केशव की ‘रसिकप्रिया और ‘कविप्रिया, सेनापति की काव्यकल्पद्रुम’ और सुंदरदास की ‘सुंदर शृंगार’ का नाम लिया जा सकता है।
‘रस रहस्य’ के रचयिता कुलपति मिश्र, ‘शब्द रसायन’ के रचयिता देव, ‘रसिक रसाल’ के रचयिता कुमारमणि, ‘काव्य सरोज’ के रचयिता श्रीपति, ‘काव्य निर्णय’ के रचयिता भिखारीदास, ‘काव्य विनोद’, ‘शृंगारमंजरी’, ‘अलंकार चिंतामणि’, और ‘काव्यविलास’ के रचयिता प्रतापसाहि आदि इस आचार्य परंपरा के कुछ अन्य महत्वपूर्ण नाम हैं। काव्यशास्त्रीय ग्रंथ भले ही संख्याबहुल हैं, किंतु मौलिक एक भी नहीं है। आचार्य केशवदास ने भामह, उद्भट और दंडी के काव्यादर्शों का अनुगमन किया है। ये अलंकारवादी थे। संस्कृत काव्यशास्त्र इसके आगे भी विकसित होकर रस और ध्वनि तक गया था। हिंदी का काव्यशास्त्र वहाँ तक नहीं पहुँचा। रस का जो विवेचन हुआ भी वह वस्तुतः नायिकाभेद तक ही सीमित और शृंगार की रचना का एक बहाना है। उसमें मौलिकता का अभाव तो है ही, विवेचन की सूक्ष्मता और गंभीरता भी अनुपस्थित है।
वास्तव में ये रीतिकालीन आचार्य कवि पहले थे, आचार्य बाद में, बल्कि कहा जा सकता है कि वास्तव में केवल कवि ही थे। आचार्य होने का दायित्व उन्होंने बेमन से ही निभाया।
इन जिन दरबारों में ये कवि की हैसियत से आश्रित थे, उन्हीं में शायद संस्कृत के पंडितों को उनके पांडित्य के लिए अधिक सम्मान प्राप्त होता रहा होगा। रीतिग्रंथ की रचना द्वारा आचार्यत्व का दावा शायद किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति रहा हो।
आश्रयदाता के संरक्षण में रहने वाले कवि के लिए यह आजीविका का भी प्रश्न था। रीतिग्रंथ की रचना आजीविका के अर्जन के लिए होती थी। ये काव्यशिक्षा के काम आने वाले ग्रंथ थे और प्रायः किसी आश्रयदाता के आदेश पर उसे काव्यविवेक की क्षमता देने के लिए रचे गए थे क्योंकि विकसित काव्यरुचि और कवि-कलाकार को संरक्षण देना उस युग में आभिजात्य की निशानी बन चुके थे। इन आचार्यों का उद्देश्य सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं, लक्षण के उदाहरण के रूप में मौलिक कविता की रचना करना था।
रीतिकाल के प्रमुख कवि और उनका काव्य
रीतिबद्ध काव्य
आचार्य केशवदास (सन् 1560-1601 ई.)
इनकी चर्चा साहित्य के इतिहासकारों ने भक्तिकाल के फुटकल कवियों में की है। किंतु बिना केशवदास का स्मरण किए हिंदी रीति साहित्य की भूमिका का प्रारंभ कोई न कर सका। पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र लिखते हैं केशव की रचना में इनके तीन रूप दिखाई देते हैं आचार्य का, महाकवि का और इतिहासकार का। ये परमार्थतः हिंदी के प्रथम आचार्य है।...इन्होंने ही हिंदी में संस्कृत की परंपरा की व्यवस्थापूर्वक स्थापना की थी। भगीरथ मिश्र ने भी विश्वनाथ जी के इस कथन का समर्थन किया है। आचार्य शुक्ल ने केशव की सहृदयता पर आक्षेप करते हुए इनकी कविता में दुरूहता और अस्पष्टता का सविस्तार उल्लेख किया है। डॉ. जगदीश गुप्त ने भी कहा है कि ‘सुबरन’ की खोज में तथा कवि रूढ़ियों के निर्वाह में तल्लीन उनकी काव्य चेतना कवि-सुलभ रागात्मक तारतम्य और सहज सौंदर्य बोध से प्रायः वंचित रह गई है। इन्होंने मुक्तक और प्रबंध दोनों काव्य रूपों में अनेक काव्यों की रचना की उदाहरण के रूप में रस (रसिकप्रिया), अलंकार (कविप्रिया) छंद और भक्ति (रामचंद्रिका, छंदमाला), वीर-प्रशस्तिकाव्य (वीर सिंह देवचरित, जहाँगीर जस चंद्रिका, रतन बावनी), वैराग्य (विज्ञानगीता) आदि को लिया जा सकता है।
रीतिकालीन कविता की सभी प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व केशव का साहित्य करता है। केशव की कविता में शास्त्रीय विवेचन की सामग्री मिलती है। ‘कविप्रिया’ और ‘रसिकप्रिया’ शास्त्रीय ग्रंथ हैं। ये दोनों ग्रंथ रीतिकाल के आधारभूत लक्षण ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों की विषयवस्तु का विवेचन करना अनिवार्य होगा। ‘रसिकप्रिया’ में नायिका भेद का वर्णन है। कामशास्त्र के अनुसार, विभिन्न उम्र के अनुसार आदि कई प्रकारों से नायिका भेद का विवेचन किया गया है।
कविप्रिया की रचना केशव ने अपनी साहित्य शिष्या प्रवीणराय के लिए की थी। प्रवीणराय केशव के आश्रयदाता इंद्रजीत सिंह के दरबार की गणिका थी। कविप्रिया में 16 प्रभावों का वर्णन है। काव्य रचना में उपयोगी अनेक बातों का विवरण दिया गया है। अलंकार के अनेक प्रकार के अतिरिक्त नखशिख वर्णन, बारहमासा, ऋतु वर्णन तथा होली आदि का विस्तृत वर्णन मिलता है।
मतिराम
मतिराम रीतिकाल के विशिष्टांग (रस, अलंकार, छंद) निरूपक आचार्यों में प्रमुख थे। इन्होंने भानु मिश्र के रस और नायिका भेद के लक्षणों का आधार लेकर ‘रसराज’ नामक प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ की रचना की। इन्होंने दोहों में लक्षण और सरस सवैयों कवित्तों में उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। इनका ग्रंथ ‘ललितललाम’ प्रसिद्ध अलंकार- निरूपक ग्रंथ ‘कुवलयानंद’ के आधार पर निर्मित है। इसके उदाहरण भाग में राजा भावसिंह हाड़ा की प्रशस्ति पाई जाती है। छंदों-निरूपक ग्रंथ ‘छंदसार’ शंभुनाथ सोलंकी को समर्पित है। इनकी ‘सतसई’ में 703 दोहे हैं जिनमें पूर्व निर्मित ग्रंथों के भी दोहे संगृहीत हैं। सतसई के अंत में आश्रयदाता भोगनाथ की प्रशंसा की गई है। आचार्य शुक्ल ने लिखा है, मतिराम की-सी स्निग्ध और प्रसादपूर्ण भाषा रीति का अनुसरण करने वालों में बहुत ही कम मिलती है। भाषा के ही समान मतिराम के न तो भाव कृत्रिम है और न उनके व्यंजक व्यापार और चेष्टाएँ। वास्तव में इनकी प्रसिद्धि का मूल कारण इनके द्वारा दिए गए उदाहरणों की स्वाभाविक सरसता ही है। मतिराम के काव्य में स्वाभाविकता है। रीतिकाल के अन्य कवियों की तरह उन्होंने वैचित्र्य को अपने काव्य में स्थान नहीं दिया है। रीतिकाल की परिपाटी का पालन करते हुए भी वे रूढ़ियों से मुक्त हैं। उनकी कविता में नायिका के रूप वर्णन अथवा कार्य व्यापार के जो चित्र मिलते हैं, उसमें गृहस्थ जीवन की झलक मिलती है।
भूषण
भूषण शिवाजी के समकालीन थे और उन्होंने शिवाजी तथा छत्रसाल दोनों का आश्रय ग्रहण किया। शिवराज भूषण, शिवा बावनी और छत्रसाल दशक इनके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। रीतिकाल की सर्वाधिक लोकप्रिय काव्य प्रवृत्ति शृंगारिकता की उपेक्षा करते हुए इन्होंने अपने प्रसिद्ध अलंकार-निरूपक ग्रंथ ‘शिवराजभूषण’ में वीर प्रशस्तिपरक उदाहरणों की रचना की है। इसमें ‘मतिराम के ललितललाम’ के 100 अलंकारों के अतिरिक्त 5 शब्दालंकारों का भी समावेश किया गया है। पं. विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने सही संकेत किया है कि परंपरा के फेर में हिंदी के कितने ही कवियों का सच्चा और उत्कृष्ट रूप निखरने नहीं पाया। अलंकारों के बोझ से वीर रस दब गया।... भूषण के लक्षण कई स्थानों पर अस्पष्ट और भ्रामक है। भूषण को काव्यरीति का अच्छा अभ्यास न था। (भूषण-आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र)
इनके दो मुक्तक ग्रंथ ‘शिवाबावनी’ और छत्रसाल दशक’ में इनका कविरूप अधिक उभर सका है। वीर रस के साथ-साथ अद्भुत, भयानक, वीभत्स और रौद्र भी इसमें व्यंजित हुए हैं। इनके ‘भूषण उल्लास’, ‘दूषण उल्लास’ और ‘भूषण हजारा’ भी यदि उपलब्ध हो जाते तो इन्हें संभवतः आचार्य के रूप में प्रतिष्ठा मिल सकती थी। भूषण की सभी रचनाएँ मुक्तक हैं। इनकी साहित्यिक भाषा ब्रज है। रीतिकार के रूप में चाहे इन्हें सफलता न मिली हो परंतु कवित्व की दृष्टि से इनका प्रमुख स्थान है।
‘भूषण’ वास्तव में इनका नाम नहीं बल्कि उपाधि है जो इन्हें चित्रकूट के नरेश सोलंकी हृदयराम के पुत्र रुद्र ने प्रदान की थी।
देव
रीतिकालीन सर्वांगनिरूपक आचार्यों में देव का स्थान महत्वपूर्ण है। बिहारी व भूषण की तरह इन्हें कोई ऐसा आश्रयदाता न मिल सका जो इन्हें पूर्णतः संतुष्ट कर सकता। अतः जीवनभर इन्हें अनेक छोटे बड़े दरबारों के चक्कर लगाने पड़े। संभवतः यही कारण है कि उन्हें अपने पुराने छंदों में कुछ नए जोड़कर अनेक ग्रंथों का निर्माण करना पड़ा। इनके ग्रंथों की संख्या 72 बताई गई है पर अभी तक 25 ग्रंथ ही उपलब्ध हुए हैं। इनमें से हिंदी साहित्य के वृहत इतिहास’ में केवल 18 ग्रंथों का उल्लेख है। प्रेमचंद्रिका, रागरत्नाकर, देवशतक, देवचरित्र और देवमायाप्रपंच को छोड़कर शेष काव्य शास्त्रीय है। इनके विवरणों में न जाकर सामान्यतः यह कहा जा सकता है कि ‘प्रेमचंद्रिका’ में वासना रहित प्रेम का महत्त्व प्रतिपादित है। इस कृति में प्रेमस्वरूप, प्रेममहात्म्य आदि विषयों को ललित शैली में वर्णित किया गया है। ‘रागरत्नाकर’ में संगीत विषयक चर्चा है। देव शतक अंतिम दिनों की रचना होने के कारण वैराग्य परक है। इसमें कवि ने दार्शनिक भावनाओं को पूर्ण अनुभूति के साथ अंकित किया है। देवचरित्र’ श्रीकृष्ण के चरित्र पर आधारित प्रबंध काव्य है। ‘देवमाया प्रपंच’ संस्कृत के ‘प्रबोधचंद्रोदय’ का पद्यमय अनुवाद है। काव्य शास्त्रीय ग्रंथों में भावविलास रस, नायिका भेद और अलंकार निरूपक ग्रंथ है। ‘शब्दरसायन’ में काव्यांगों की चर्चा है। ‘सुखसागर तंरग’ भी काव्यांगों पर लिखित उदाहरणों का संग्रह है। ‘अष्टयाम’ अपने नाम से ही वर्णावस्तु का संकेत देता है। इन्होंने शृंगार को मूल रस के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
भिखारीदास
इन्हें सर्वांग-निरूपक आचार्यों में प्रमुख माना जाता है। इनके द्वारा रचित ‘रस सारांश’ में रस और रसांगों का तथा ‘शृंगार निर्णय’ में शृंगार के आलंबन नायक-नायिका के भेदों का वर्णन भानुदत्त की ‘रसमंजरी और ‘रसतरंगिणी’ के आधार पर किया गया है। ‘काव्य निर्णय’ में मम्मट, विश्वनाथ, जयदेव और अप्पम दीक्षित आदि के ग्रंथों को आधार बनाया गया है। इसमें रस, अलंकार, गुण, पौष और ध्वनि का विवेचन किया गया है। इनका काव्य उत्कृष्ट और ललित है। भाव पक्ष और कलापक्ष का सुंदर सामंजस्य इनके कवि कर्म की उत्कृष्टता को प्रमाणित करते हैं, पर आचार्य कर्म में इन्हें पर्याप्त सफलता नहीं मिली। अलंकारों के वर्गीकरण और तुकों के विवेचन में इनकी मौलिकता झलकती है। ‘छंदार्णन पिंगल’ में संस्कृत-प्राकृत हिंदी ग्रंथों से सहायता ली गई है। इन्होंने नीतिपरक सुंदर सूक्तियों की भी रचना की है।
रीतिकाव्य में भिखारीदास का महत्त्व कवि और आचार्य दोनों रूपों में है। अलंकार विवेचन के क्रम में उन्होंने अलंकारों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया। नायिका भेद पर उन्होंने नई दृष्टि से विचार किया। छंद विवेचन में भी कवि ने मौलिक सूझबूझ का परिचय दिया है। छंद के संदर्भ में इन्होंने प्राकृत और संस्कृत काव्यों का अध्ययन किया। इन्होंने अपने अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष दिया कि तुक का प्रारंभ अपभ्रंश काव्य से होता है। काव्यांग के निरूपण में भी भिखारीदास का महत्वपूर्ण स्थान है। इन्होंने छंद, रस, अलंकार, रीति, गुण, दोष, शब्द-शक्ति आदि सब विषयों पर गहराई से विश्लेषण किया है।
पद्माकर
कवि पद्माकर रीतिकाल के विशिष्टांग निरूपक आचार्य के रूप में जाने जाते हैं। जयपुर नरेश जगतसिंह के आश्रय में इन्होंने ‘जगद्विनोद’ नामक नवरस-निरूपक ग्रंथ की रचना की। मतिराम जी के ‘रसराज’ के समान पद्माकर जी का ‘जगद्विनोद’ भी काव्यरसिकों और अभ्यासियों दोनों का कंठहार रहा है। इन्होंने ‘हिम्मतबहादुर विरुदावली’ नाम की वीर रस की एक बहुत ही फड़कती हुई पुस्तक लिखी। डॉ. बच्चन सिंह ने इनके रीतिकाव्य-ग्रंथों की सराहना की है पर प्रशस्तिपरक और भक्तिपरक काव्य को ‘काव्याभास’ माना है, क्योंकि इनमें काव्य-रूढ़ियों का निर्वाह अधिक है। किंतु शुक्लजी ने समग्रतः पद्माकर की नूतन कल्पना, दृश्य-चित्रण और भाषा की अनेक रूपता की प्रशंसा की है। ‘गंगालहरी’ और ‘प्रबोधपचासा’ काव्य-सौष्ठव की दृष्टि से सामान्य हैं। गंगालहरी में कवि ने गंगा का अलंकारों से अद्वितीय अलंकरण किया है। इन ग्रंथों की रचना कवि ने अपने अंतिम दिनों में कानपुर में गंगा के तट पर की थी, अतः इनमें चमत्कार की अपेक्षा भक्ति और ज्ञान-वैराग्य की भावना प्रमुख है। इनका अलंकार ग्रंथ ‘पद्माभरण’ लक्षणों की स्पष्टता और उदाहरणों की सरसता के कारण अधिक प्रसिद्ध हुआ। इन्होंने मुक्तक तथा प्रबंध दोनों शैलियों में रचना की। इनकी भाषा में प्रवाहमयता है तथा वह सरस एवं व्याकरण सम्मत है।
पद्माकर की कविता में मुख्य रूप से उल्लास और आनंद का वर्णन है। शृंगारिक भाव की व्यजंना में उन्मुक्तता और खुलापन है। ब्रजमंडल में फाग के दृश्य का अद्भुत वर्णन उन्होंने किया है।
रीतिसिद्ध काव्य
बिहारी
इनका एक ही काव्यग्रंथ उपलब्ध है, किंतु उसके द्वारा इन्होंने जो कीर्ति अर्जित की वह किसी अन्य हिंदी कवि द्वारा संभव नहीं हो सका। इनकी ‘सतसई’ मुक्तक काव्य परंपरा की एक प्रतिनिधि रचना है। इसका एक-एक दोहा हिंदी साहित्य में एक-एक रत्न माना जाता है। इसकी पचासों टीकाएँ रची गई। ...इस प्रकार बिहारी संबंधी एक अलग साहित्य ही खड़ा हो गया है। (हिंदी साहित्य का इतिहास-आ. रामचंद्र शुक्ल) आगे शुक्लजी ने लिखा है कि मुक्तक कविता में जो गुण होना चाहिए वह बिहारी के दोहों में अपने चरम उत्कर्ष को पहुँचा है। बाद में इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा कि इसके लिए कवि को मनोरम वस्तुओं और व्यापारों का एक स्तवक सा कल्पित करके उन्हें अत्यंत संक्षिप्त और सशक्त भाषा में प्रदर्शित करना पड़ता है। अतः जिस कवि में कल्पना की समाहार-शक्ति के साथ भाषा की सामासशक्ति जितनी ही अधिक होगी उतना ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा। यह क्षमता बिहारी में पूर्ण रूप से विद्यमान थी। बिहारी ने दोहा ओर सोरठा जैसे छोटे छंद में भी पूर्ण और सजीव चित्र उपस्थित कर दिया है। बिहारी ने मुक्तक काव्य की प्राचीन परंपरा का अनुसरण करते हुए अपने दोहों में शृंगार, भक्ति, नीति-वैराग्य, प्रशस्ति, हास्य-व्यंग्य सबका समावेश किया है किंतु युगानूकूल उनमें शृंगार के विविध रूपों, नायक-नायिका भेद, नखशिख, षड्ऋतु और बारहमासे का वर्णन अधिक है। इन्होंने प्रकृति का प्रयोग अनेक रूपों में किया है।
बिहारी को कुछ विद्वान अलंकारवादी मानते हैं क्योंकि इनके दोहों में कई-कई अलंकारों का सहज विन्यास पाया जाता है किंतु ये अलंकार प्रेषणीयता को बढ़ाने में ही सहयोगी सिद्ध होते हैं। कुछ लोग इन्हें शुद्ध रसवादी मानते हैं क्योंकि बिहारी ने स्वयं ‘सतसई’ के अंत में लिखा है, ‘करी बिहारी सतसई भरी अनेक सवाद’। डॉ. विजयेन्द्र स्नातक ने इन्हें ध्वनिवादी सिद्ध करते हुए लिखा है, यदि उनके लक्ष्यों (दोहों) की परीक्षा की जाए तो यह तथ्य और अधिक स्पष्ट हो जाएगा कि रस ध्वनि के उदाहरणों की भरमार होने पर भी वे रस-संप्रदाय के पोषक न होकर ध्वनि-संप्रदाय के ही अनुगामी हैं।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि बिहारी ने ‘सतसई’ की रचना अलंकारों के उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए नहीं की। यदि ऐसा होता तो सभी अलंकारों का उसमें विधि प्रतिपादन होता। यदि उन्होंने शृंगार रस के भेद-प्रभेदों और नायक-नायिका-भेद को दृष्टि में रखा होता तो उसी के सर्वांगों का निदर्शन होता। इन्होंने वर्ण्यवस्तु का आधार तो सबसे ज़्यादा शृंगार को ही बनाया पर उसमें भी नख-शिखपरक रचना ज़्यादा है। वियोग पक्ष में पूर्वानुराग का वर्णन अधिक है। विरह वर्णन में जहाँ ये फ़ारसी-उर्दू के प्रभाव से मुक्त रहे हैं, वहाँ स्वाभाविकता है किंतु जहाँ विदेशी प्रभाव ज़्यादा है वहाँ ऊहात्मक कथन हास्यापद हो गए हैं। इनकी अनुभाव योजना की प्रशंसा आचार्य शुक्ल से लेकर आज तक के सभी समीक्षकों ने की है। राज प्रशस्ति की दृष्टि से बिहारी बहुत ही संयमित रहे हैं। इन्होंने अपने आश्रयदाता मिर्जाराजा जयसिंह की युद्धवीरता, दानवीरता, धर्मवीरता के साथ ही उनके रूप-गुण की भी प्रशंसा की है। बिहारी की नीतिपरक उक्तियाँ मात्र सूक्तियाँ नहीं हैं। अपितु उनमें जीवनानुभवों का उपयोग सरस और व्यंजक शैली में किया गया है। हास्य-व्यंग्य की उक्तियों में उन्होंने समाज के रुग्ण पक्ष पर मार्मिक प्रहार किया है जिसके लक्ष्य प्रायः ज्योतिषी, वैद्य, पौराणिक, घरजमाई आदि रहे हैं।
बिहारी धार्मिक दृष्टि से निम्बार्क संप्रदाय में दीक्षित थे, परंतु रीतिकाल के अन्य कवियों की भाँति उनमें भी सांप्रदायिक आग्रह नहीं मिलता। उन्हें भक्तकवि नहीं माना जा सकता।
डॉ. बच्चन सिंह ने बिहारी को स्वच्छंदधारा में न रखकर अभिजात (क्लासिकल) वर्ग में रखा है जो प्रायः रीतिसिद्ध कवि वर्ग ही है। इन्होंने बिहारी के मध्यममार्गीय होने का प्रतिपादन करते हुए लिखा है कि इनकी कविता न तो रीतिबद्ध कवियों की तरह पूर्णतः निर्वैयक्तिक है न रीतिमुक्त कवियों की तरह वैयक्तिक ही, बल्कि इनमें दोनों तत्व घुलेमिले हैं।
भाषा की दृष्टि से आचार्य शुक्ल ने रीतिबद्ध कवियों में पद्माकर, रीतिमुक्त कवियों में घनानंद और रीतिसिद्ध कवियों में बिहारी की विशेष प्रशंसा की है। पद्माकर और बिहारी की तुलना के संदर्भ में उन्होंने लिखा है—इनकी मधुर कल्पना ऐसी स्वाभाविक और हावभावपूर्ण मूर्तिविधान करती है कि पाठक मानो प्रत्यक्ष अनुभूति में मग्न हो जाता है। ऐसा सजीव मूर्तिविधान करने वाली कल्पना बिहारी को छोड़कर और किसी कवि में नहीं पाई जाती। बिहारी की भाषा को शुक्लजी ने ‘चलती’ होने पर भी ‘साहित्यिक’ माना है। आचार्य मिश्र लिखते हैं, बिहारी की भाषा बहुत कुछ शुद्ध ब्रजी है, पर है वह साहित्यिक। इनकी भाषा में पूर्वी प्रयोग भी मिलते हैं। खड़ी बोली के कृदंत और क्रियापद अनुप्रास के आग्रह से रखे गए हैं।... बिहारी की भाषा व्याकरण से गठी हुई है, मुहावरों के प्रयोग, सांकेतिक शब्दावली और सुष्ठु पदावली से संयुक्त है।... उसमें साहित्यिक दोषों को ढूँढ़ निकालना श्रमसाध्य है। विन्यास सम्मत, प्रयोग व्यवस्थित और शैली परमार्जित है।
बिहारी के अतिरिक्त इतिहास ग्रंथों में ‘रीतिबद्ध कवियों’ में बेनी कवि का उल्लेख किया गया है जो इसी नाम के बेनी बंदीजन (टिकैतरायप्रकाश’ अलंकारग्रंथ, ‘रसविलास’ रसनिरूपक ग्रंथ और भँडौवा-हास्यरस के कर्ता) और बेनी प्रवीन (शृंगारभूषण और नवरसरंग तथा ‘नानारावप्रकाश’ नामक अलंकार ग्रंथ के रचयिता) से भिन्न असनी के बंदीजन है। इनके शृंगार परक फुटकल छंद ही प्राप्त होते हैं। कृष्ण कवि (बिहारी सतसई के टीकाकार) को इस वर्ग में बिहारी सतसई के दोहों का सरस कवित्त-सवैयों में पल्लवन करने के कारण रखा गया है। ‘रसनिधि’ बरौनी (दतिया राज्य) के ज़मींदार थे। इन्होंने बिहारी सतसई की पद्धति पर शृंगाररस के एक प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रतनहजारा’ की रचना की थी। इनके अनेक काव्यग्रंथ, खोज में प्राप्त हुए हैं। नृपशंभु का ‘नखशिख’ सरस काव्यग्रंथ है। रामसहाय दास, पजनेस और राजा मानसिंह का भी उल्लेख इसी श्रेणी में मिलता है।
रीतिमुक्त काव्य
घनानंद
शुक्लजी घनानंद को साक्षात् रसमूर्ति और ब्रजभाषा के काव्य के प्रधान स्तंभों में मानते हैं। घनानंद के काव्य में अनुभूति पक्ष और अभिव्यक्ति पक्ष का सम्यक् संयोजन प्राप्त होता है। इन्होंने विभाव पक्ष का वर्णन कम और भावों का अधिक किया है। इन भावों में रीझ, विषाद, उलझन, अभिलाष, भूल, उपालंभआदि प्रमुख हैं। इन्होंने प्रेम व्यापार के मूल उपादान नेत्रों और प्राणों का मानवीकरण करके भावों को सहज संप्रेष्य बना दिया है। इनकी प्रेयसी (बादशाह मुहम्मदशाह रंगीले के दरबार की नर्तकी) सुजान दिल्ली दरबार छूटने पर भी, घनानंद की भावना से छूट न पाई फलतः वही श्रीकृष्ण के विशेषण के रूप में इनके काव्य में व्याप्त हो गई। इस प्रकार इस प्रकार इनकी लौकिक भावना का रूपांतरण आध्यात्मिक भावना में हो गया।
घनानंद ने यद्यपि सुजान श्रीकृष्ण के प्रति प्रणयानुभूति निवेदित की है पर इन्हें भक्त नहीं माना जा सकता। आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने लिखा है कि रहीम और सेनापति भी भक्त नहीं थे उसी प्रकार रसखान, आलम और घनानंद भी प्रेमोमंग के कवि है भक्त नहीं है, किंतु यदि व्यापक दृष्टि से विचार किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि कवित्त और सवैयों में लौकिक प्रेम की विवृत्ति है पर धीरे-धीरे घनानंद का मन श्रीराधाकृष्ण के अलौकिक प्रेम अर्थात् भक्ति में निमग्न दिखता है। रीतिकाल के अन्य कवियों की तरह शृंगार और भक्ति की खिचड़ी पकाने के स्थान पर घनानंद ने अपना प्रेम जीवन और भक्ति जीवन अलग-अलग रखकर दोनों को पूर्णता तक पहुँचाया। उन्होंने सारे सांसारिक प्रेम और सौंदर्य को अलौकिक प्रेम और सौंदर्य का एक कण या बूँद का विस्तार माना है। घनानंद का परवर्ती पद-साहित्य भक्ति प्रधान है जिसमें सरल भक्तिभाव का अभिव्यंजन है।
डॉ. बच्चनसिंह का मत बहुत ही सटीक है कि धनानंद संगीत, नृत्य, वाद्य, चित्र, काव्य को एक साथ प्रस्तुत करते हुए एक व्यावहारिक सौंदर्यशास्त्र बनाते हैं। वे प्रेम की भावानुभूति, काव्यानुभूति और काव्य भाषा को नए बोध के अनुसार रचते हैं। घनानंद की कविता में जिस प्रेम को अभिव्यंजित किया गया है, वह उनके जीवन की वास्तविकता है। घनानंद के प्रेम में आत्मानुभूति की प्रधानता है। सौंदर्य और प्रेम उनकी कविता का आधार है। सौंदर्य और प्रेम के प्रति उनमें समर्पण है। घनानंद की कविता में विलास से परे शुद्ध अनुराग की अनुभूति है।
आत्मानुभूति के कारण ही घनानंद की भाषा में लाक्षणिक सौंदर्य है।
घनानंद की कविता की भाषा में स्वाभाविक प्रेम की स्निग्धता के साथ-साथ वाग्वैदग्ध्य की उक्त्तिवकता का परिचय भी मिलता है।
ठाकुर
हिंदी के इतिहास में तीन कवि ठाकुर नामधारी हो चुके हैं जिनमें से दो असनी के ब्रह्मभट्ट थे और एक बुंदेलखंड के कायस्थ। ये तीसरे ठाकुर ही रीतिमुक्त धारा के प्रसिद्ध कवि हैं। इनकी कविता बड़ी ही सरस और सरल है। इनके स्फुट छंदों के दो संग्रह ‘ठाकुर शतक’ और ‘ठाकुर ठसक’ नाम से प्रसिद्ध हैं।
बोधा
बोधा बुदेलखंड के रहने वाले थे। इनका कविता काल सन् 1773 से 1803 ई. तक माना जाता है। घनानंद की भाँति इनका भी प्रेम पन्ना दरबार की नर्तकी सुभान से हो गया था जिसके कारण इन्हें देश निकाला मिला। इस निर्वासन में इन्होंने ‘माधवानलकामकंदला चरित्र’ या विरहवारीश’ की रचना की।
‘माधवानलकामकंदला’ (विरहवारीश) प्रसिद्ध प्रेमाख्यान पर आधारित है और आलम के इसी नाम के प्रबंध से प्रभावित है। ‘इश्कनामा’ इनका दूसरा काव्यांग है जिसमें प्रेम के महत्त्व और उसके विविध पक्षों का वर्णन है। रीतिमुक्त कवियों में ‘प्रेम की पीर’ का चित्रण करने वाले बोधा बहुत ही मर्मस्पशी कवि है।
रीति-स्वच्छंद काव्य धारा के अंतर्गत आलम, रसखान और द्विजदेव का भी उल्लेख किया जाता है। इन कवियों ने स्वानुभूति के आधार पर काव्य रचना की है।
आधुनिक काल
हिंदी गद्य का उद्भव और विकास। भारतेंदु पूर्व हिंदी गद्य, 1857 की क्रांति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण, भारतेंदु और उनका युग, पत्रकारिता का आरंभ और 19वीं शताब्दी की हिंदी पत्रकारिता, आधुनिकता की अवधारणा।
हिंदी गद्य का उद्भव और विकास
आधुनिक काल के आरंभ से पहले अर्थात् उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व अन्य भारतीय भाषाओं की तरह हिंदी भाषा में भी गद्य की रचनाएँ बहुत अधिक नहीं थीं। आज खड़ी बोली, साहित्य की भाषा है, किंतु पूर्व आधुनिक काल यानी सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में उसका साहित्य में प्रयोग बहुत समय तक नगण्य-सा ही रहा, क्योंकि उस समय ब्रजभाषा साहित्य की भाषा थी। लंबे समय तक साहित्यिक रचनाएँ ब्रजभाषा में ही होती रहीं।
ब्रजभाषा गद्य
ब्रजभाषा साहित्यिक भाषा थी और भाव-विचार को व्यक्त करने के लिए पद्य में इसका प्रयोग होता था, लेकिन इस भाषा के बोलचाल के रूप का प्रयोग भी साहित्य में होता था।
ब्रजभाषा गद्य का प्रामाणिक रूप 17वीं शताब्दी उत्तरार्ध की दो रचनाओं ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ तथा ‘दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ में मिलता है।
इसी प्रकार वि. संवत् 1660 के आस-पास भक्त नाभादास की रचना ‘अष्टयाम’ में ब्रजभाषा गद्य का जो रूप देखने को मिलता है उसकी भाषा भी सामान्य बोलचाल की ही है, हालाँकि वह कुछ अधिक परिमार्जित है।
खड़ी बोली गद्य
खड़ी बोली जनसाधारण के बोलचाल की भाषा थी। धीरे-धीरे साहित्य में इसका प्रयोग होने लगा और गद्य की रचनाएँ भी इसमें होने लगी। तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति ने खड़ी बोली के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चौदहवीं शताब्दी में खड़ी बोली दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्र में बोली जाने लगी थी। अँग्रेज़ी साम्राज्य की स्थापना के साथ भारत में परिवर्तनों का जो सिलसिला आरंभ हुआ, उसने भारतीय जनजीवन पर बहुत व्यापक असर छोड़ा। ये परिवर्तन किसी एक क्षेत्र से संबद्ध नहीं थे। इनमें से कई परिवर्तनों का सीधा संबंध हिंदी गद्य के विकास से है।
ईसाई मिशनरियाँ
मुग़लों के शासन के उत्तरकाल में ईसाई धर्म प्रचारक इस देश में आए थे। जब अँग्रेज़ों ने भारत को पराधीन बनाया और अपना शासन स्थापित किया तो ईसाई धर्म प्रचारकों की गतिविधियाँ भी तेज़ हो गई। धर्म प्रचार के लिए उन्होंने भारतीय भाषाओं का सहारा लिया। इनमें हिंदी भी एक थी।
हिंदी गद्य में छोटी-छोटी प्रचार-पुस्तिकाओं तथा धर्मग्रंथ ‘बाइबिल’ के हिंदी अनुवाद से ईसाई धर्म के प्रचार को जहाँ गति मिली, वहाँ प्रकारांतर से इससे हिंदी गद्य के विकास में सहायता भी मिली।
नवीन आविष्कार अँग्रेज़ों ने अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करने के लिए मुद्रण, यातायात और संचार के नए साधनों का इस्तेमाल किया। मुद्रण यंत्रालयों (प्रिंटिंग प्रेस) की स्थापना ने हिंदी सहित विभिन्न भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों का प्रकाशन संभव बनाया। यातायात के तेज़ साधनों ने इन पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों को रेल तथा अन्य तेज़ वाहनों से जल्दी-से-जल्दी दूसरे शहरों तक पहुँचाना आरंभ किया। तार की सुविधा से समाचारों को जल्दी प्राप्त करना और भेजना शुरू हुआ। इसी से बड़ी मात्रा में समाचारपत्रों का प्रकाशन और प्रसारण संभव हुआ। और इसी कारण गद्य लेखन का तेज़ी से विस्तार हुआ।
शिक्षा के लिए जिन नए स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना की गई थी उनमें अँग्रेज़ी के साथ-साथ कहीं-कहीं हिंदी-उर्दू की शिक्षा भी दी जाती थी। सन् 1800 में स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज में सन् 1803 से हिंदी-उर्दू की पढ़ाई आरंभ हुई और सन् 1824 से हिंदी की पढ़ाई का विशेष प्रबंध हुआ। इस कॉलेज के संचालकों की नीति हिंदी के बहुत अनुकूल नहीं थी। सन् 1823 में आगरा कॉलेज की स्थापना हुई ओर उसमें हिंदी शिक्षा की व्यवस्था की गई। सन् 1817 ई. में ‘कलकत्ता स्कूल बुक सोसायटी’ और सन् 1833 में ‘आगरा स्कूल बुक सोसायटी’ की स्थापना हुई। इन संस्थाओं ने अच्छे-अच्छे पाठ्य ग्रंथ तैयार करवाए। इस तरह शिक्षा के विस्तार ने भी हिंदी गद्य को विकसित करने में मदद की।
समाज-सुधार आंदोलन
19वीं सदी में कई समाज-सुधार आंदोलनों की शुरूआत हुई। इन आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य था भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करना तथा जनता में अपने देश और धर्म के प्रति चेतना जगाना। चूँकि जनता तक अपना संदेश पहुँचाने के लिए जनता की भाषा आवश्यक थी। अतः जिन नेताओं ने इस कार्य को शुरू किया, उन्होंने जनता की भाषा में अपने मत का प्रचार किया। राजा राममोहन राय ने ‘ब्रह्म समाज’ द्वारा यह कार्य किया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की और अपनी पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना हिंदी गद्य में ही की। श्रद्धाराम फुल्लौरी तथा नवीनचंद्र राय ने भी समाज सुधार के लिए हिंदी गद्य का ही सहारा लिया। पंजाब में हिंदी प्रचार के लिए इन्होंने पत्र निकाला और गद्य में रचनाएँ भी कीं।
हिंदी गद्य
पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन मुद्रण की सुविधा से पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन सरल हो गया। 30 मई सन् 1826 ई. में पंडित जुगलकिशोर शुक्ल ने कलकत्ता से हिंदी में ‘उदंत मार्तंड’ पत्र का प्रकाशन आरंभ किया। यह हिंदी का पहला समाचार-पत्र था। यह साप्ताहिक पत्र था। लगभग डेढ़ वर्ष निकलकर 4 दिसंबर 1827 ई. को यह पत्र बंद हो गया।
हिंदी का दूसरा पत्र ‘बंगदूत’ का प्रकाशन 9 मई सन् 1829 को कलकत्ता में हुआ था। कलकत्ता से ही 1834 ई. में ‘प्रजामित्र’ नाम का तीसरा हिंदी पत्र प्रकाशित हुआ। हिंदी भाषी क्षेत्र से पहला समाचारपत्र 1844 ई. में निकला था, इसका नाम ‘बनारस’ था और इसे राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ ने निकाला था। 1846 ई. में मौलवी नासिरुद्दीन के संपादकत्व में ‘मार्तंड’ नामक एक और पत्र प्रकाशित हुआ। इस तरह 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में कई समाचार-पत्र प्रकाशित हुए। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में तो पत्र-पत्रिकाओं की संख्या काफ़ी बढ़ गई। पत्र-पत्रिकाओं ने हिंदी गद्य को विकसित और परिमार्जित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रारंभिक गद्य लेखन
सन् 1800 में अँग्रेज़ों के प्रयास से कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई। सन् 1803 ई. में इस कॉलेज के हिंदी-उर्दू अध्यापक जान गिलक्राइस्ट ने हिंदी और उर्दू में पुस्तकें लिखाने का प्रयत्न किया। इन्होंने कई मुंशियों की नियुक्ति की। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार जान गिलक्राइस्ट प्रधान रूप से हिंदुस्तानी या उर्दू के पक्षपाती थे, परंतु वे जानते थे कि उस भाषा की आधारभूत भाषा हिंदवी या हिंदुई थी। इसी आधारभूत भाषा की जानकारी के लिए उन्होंने कुछ ‘भाषा मुंशियों’ की सहायता प्राप्त की। (हिंदी साहित्यः उद्भव और विकास पृ. 226) भाषा मुंशियों में श्री लल्लूलालजी और पं. सदल मिश्र ने हिंदी में गद्य पुस्तकें लिखीं।
इसी समय दिल्ली निवासी मुंशी सदासुखलाल जी ने बहुत ही सुंदर भाषा में भागवत की कथा का ‘सुखसागर’ नाम से भाषांतर किया और लखनऊ के मुंशी इंशाअल्ला खाँ ने ‘रानी केतकी की कहानी’ नाम से एक ऐसी कथा लिखी, जिसमें अरबी-फ़ारसी के शब्दों को हटाकर शुद्ध हिंदी लिखने की कोशिश की गई थी। हिंदी गद्य के आरंभिक विकास में इन चारों लेखकों का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
मुंशी सदासुखलाल नियाज - (1746-1824) उर्दू और फ़ारसी के अच्छे लेखक और कवि थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार इनकी भाषा कुछ निखरी हुई और सुव्यवस्थित है, पर तत्कालीन प्रचलित पंडिताऊ प्रयोग भी इनमें मिल जाते हैं। ‘सुखसागर’ के अतिरिक्त ‘विष्णु पुराण’ के प्रसंगों के आधार पर मुंशी सदासुखलाल ने एक अपूर्ण ग्रंथ की भी रचना की थी। सदासुखलाल जी की भाषा में सहजता और स्वाभाविकता है।
(हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की पुस्तक से उद्धृत संस्करण 1952 ई.. पृ. 228)
इंशाअल्ला खाँ ने अपनी भाषा को बाहर की बोली (अरबी, फ़ारसी, तुर्की), (ब्रजभाषा, अवधी आदि) और भाखापन (संस्कृत शब्दों का मेल) से मुक्त रखने की प्रतिज्ञा की थी किंतु उनके वाक्य विन्यास पर फ़ारसी का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। शुक्ल जी के अनुसार “आरंभकाल के चारों लेखकों में इंशा की भाषा सबसे चटकीली, मटकीली, मुहावरेदार और चलती है।”
लल्लूलाल जी (सन् 1763-1825) - फोर्ट विलियम कॉलेज से संबद्ध थे। इन्होंने भागवत के दशम स्कंध की कथा के आधार पर ‘प्रेमसागर’ की रचना की। इसकी भाषा पर ब्रजभाषा का प्रभाव है। अरबी-फ़ारसी के शब्द इसमें कहीं-कहीं आ गए हैं, किंतु कोशिश इनसे बचने की है। द्विवेदी जी के शब्दों में इस ब्रजरंजित खड़ी बोली में भी वह सहज प्रवाह नहीं है जो सदासुखलाल की भाषा में है। शुक्ल जी की दृष्टि में इसकी भाषा नित्य व्यवहार के अनुकूल नहीं है।
पं. सदल मिश्र बिहार के रहने वाले थे और लल्लूलालजी की तरह फोर्ट मिलियम कॉलेज से संबद्ध थे। इन्होंने ‘नासिकेतोपाख्यान’ की रचना की। शुक्लजी ने लल्लूलालजी की भाषा से इनकी भाषा की तुलना करते हुए लिखा है कि लल्लूलालजी के समान इनकी भाषा में न तो ब्रजभाषा के रूपों की वैसी भरमार है और न परंपरागत काव्य भाषा की पदावली का स्थान-स्थान पर समावेश। इन्होंने व्यवहारोपयोगी भाषा लिखने का प्रयत्न किया है और जहाँ तक हो सकता है, खड़ी बोली का ही व्यवहार किया है। सदल मिश्र की भाषा में भी वह साफ़ सुथरापन नहीं है जो सदासुखलाल के यहाँ है। इनकी भाषा पर पूरबी बोली का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। आधुनिक हिंदी गद्य का जो आभास सदासुखलाल और सदल मिश्र की भाषा में दिखाई देता है, उसी का आगे विकास हुआ है।
राजा शिव प्रसाद ‘सितारेहिन्द’ (1823-1895)
राजा शिवप्रसाद शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त थे। वे हिंदी के पक्षघर थे. लेकिन सरकारी नीति के कारण उसका खुलकर समर्थन नहीं कर सकते थे। सरकारी हलकों में उर्दू को शिष्ट भाषा और हिंदी को गँवारू भाषा माना जाता था। ऐसी परिस्थिति में राजा जी ने ठेठ हिंदी का सहारा लिया। अरबी, फ़ारसी के शब्दों को ग्रहण करने में भी उन्होंने संकोच नहीं किया। उस समय साहित्य के पाठ्यक्रम के लिए पुस्तकें नहीं थीं। राजा शिवप्रसाद ने स्वयं तो कोर्स की पुस्तकें लिखी ही, पंडित श्रीलाल और पंडित वंशीधर को भी इस कार्य पर लगाया। पाठ्यक्रम के लिए उन्होंने कई कहानियों की रचना की जिनमें ‘राजा भोज का सपना’ में उन्होंने सरल और चलती हिंदी का प्रयोग किया है।
बाद में राजा साहब उर्दू के पक्षपाती होते गए। ऐसा शायद अँग्रेज़ अधिकारियों के दबाव के कारण हुआ। फिर भी उनके प्रारंभिक कार्यों से हिंदी गद्य के विकास में सहायता मिली, इसमें कोई संदेह नहीं। सन् 1864 में उन्होंने ‘इतिहास तिमिर नाशक’ इतिहास ग्रंथ लिखा था। इसका नाम तो संस्कृतनिष्ठ है किंतु भाषा उर्दू के नज़दीक है। उन्होंने ‘बनारस’ नाम का अख़बार भी निकाला था। उसकी भाषा भी उर्दूनिष्ठ होती थी।
राजा लक्ष्मणसिंह (सन् 1826-1896)
राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ के भाषा संबंधी दृष्टिकोण की तीव्र प्रतिक्रिया भी हुई। राजा लक्ष्मणसिंह ने हिंदी और उर्दू को दो अलग-अलग भाषाएँ माना। उन्होंने कहा कि “कुछ अवश्य नहीं है कि अरबी-फ़ारसी के शब्दों के बिना हिंदी न बोली जाय और न हम उस भाषा को हिंदी कहते हैं जिसमें अरबी-फ़ारसी के शब्द भरे हैं।” आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने राजा लक्ष्मणसिंह की भाषा पर अपना मत प्रकट करते हुए लिखा है कि राजा साहब की भाषा में तद्भव शब्दों की मात्रा कम नहीं है। यद्यपि वह आरंभिक हिंदी गद्य का ही नमूना है तथापि उसमें वक्ता और श्रोता के अनुकूल होने की क्षमता है और हमारी विशाल साहित्यिक परंपरा के अनुकूल है। भाषा में अरबी-फ़ारसी के शब्द नहीं के बराबर हैं परंतु वह काव्य की ब्रजभाषा के प्रभाव से एकदम मुक्त नहीं है। राजा साहब ने कालिदास के कई ग्रंथों का अनुवाद किया। उसमें ‘मेघदूत’, ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’, का ‘शकुंतला नाटक’ नाम से अनुवाद और ‘रघुवंश’ का अनुवाद काफ़ी लोकप्रिय हुआ। उर्दूनिष्ठ हिंदी को उन्होंने यहाँ के लोगों के अनुकूल नहीं माना। अतः उन्होंने शुद्ध और संस्कृतनिष्ठ हिंदी को आगे बढ़ाया। इस कार्य के लिए सन् 1841 में उन्होंने ‘प्रजाहितैषी’ नामक पत्र निकाला।
बाबू नवीनचंद्र राय ने सन् 1863 और सन् 1880 के बीच भिन्न-भिन्न विषयों की बहुत-सी हिंदी पुस्तकें तैयार कीं ओर दूसरों से तैयार कराईं। नवीनचंद्र राय ने ब्रह्म समाज के सिद्धांतों के प्रचार के उद्देश्य से कई पत्रिकाएँ निकालीं जिनमें ‘ज्ञानदायिनी’ पत्रिका (सन् 1867) उल्लेखनीय है। (हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 302) बाबू नवीनचंद्र राय का दृष्टिकोण उर्दू के प्रति अनुकूल नहीं था और उन्होंने उसका लगातार विरोध किया।
पंजाब में हिंदी को प्रचारित करने में महत्त्वपूर्ण नाम पं. श्रद्धाराम फुल्लौरी का था। इन्होंने भी अपने प्रचार द्वारा ईसाई धर्म के प्रभाव को निस्तेज करने का प्रयास किया और धार्मिक और सामाजिक जागृति फैलाने का कार्य किया। श्रद्धाराम जी ने ‘सत्यामृत प्रवाह’ नाम का एक सिद्धांत ग्रंथ लिखा था जिसकी भाषा बहुत साफ़ और प्रौढ़ है। उन्होंने ‘आत्म चिकित्सा’, ‘तत्वदीपक’, ‘धर्म-रक्षा’, ‘उपदेश संग्रह’ आदि पुस्तकें लिखी थीं और ‘भाग्यवती’ नाम का एक सामाजिक उपन्यास भी लिखा था। यह उपन्यास सन् 1873 ई. में प्रकाशित हुआ था। इस प्रकार 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध तक आते-आते हिंदी गद्य का व्यापक व्यवहार होने लगा था और साहित्य रचना के लिए आवश्यक ज़मीन तैयार हो चुकी थी।
1857 की क्रांति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण
भारतेंदु हरिश्चंद्र
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 3 सितम्बर सन् 1850 ई. में हुआ था। स्वाध्याय से इन्होंने संस्कृत, उर्दू, हिंदी, बंगला एवं गुजराती भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। काव्य ग्रंथों में, 48 प्रबंध काव्य, 21 काव्य ग्रंथों, तथा सैकड़ों मुक्तक काव्य की रचनाएँ कीं। नीचे इनकी रचनाओं का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।
1. भक्त सर्वस्व, 2. प्रेममालिका, 3. फूलों का गुच्छा, 4. जैन कुतुहला, 5. प्रेम सरोवर, 6. प्रेमाश्रु वर्णन, 7. प्रेम फुलवारी, 8. प्रेत तरंग, 9. भक्तमाल उत्तरार्द्ध; 10. बैसाख महात्मय, 11. प्रेम प्रलाप, 12. गीत-गोविन्दानन्द, 13. सतसई सिंगार, 14. होली, 15. मधु मुकुल, 16. वर्षा विनोद, 17. प्रेम माधुरी, 18. विनय प्रेम पचासा, 19. कृष्ण चरित, 20. कार्तिक स्नान, 21. राग संग्रह।
प्रबंध काव्यों में राजभक्ति संबंधी रचनाएँ हैं—श्री राजकुमार शुभागमन, भारत भिक्षा, भारत वीरत्व, विजय वल्लरी, विजयिनी विजय पताका, जातीय संगीत एवं रिपनाष्टक। भक्तिकाव्य संबंधी प्रबंध रचनाएँ हैं—कृष्ण काव्य, प्रबोधिनी विविध विषयों से संबंधित रचनाएँ—चतुरंग वसंत, होली, उर्दू का स्यापा, बकरी विलाप, बंदर सभा, नए जमाने की मुकरी। भारतेंदु ने जहाँ परंपरा से प्राप्त भक्तिपूर्ण रचनाएँ की वहीं नवीन प्रवृत्तियों से युक्त रचनाएँ कीं।
बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन
पं. बदरीनारायण का जन्म सं. 1912 ई. में ज़िला गोंडा के दतापुर ग्राम में हुआ था। ये भारतेंदु युग के महत्वपूर्ण कवि हुए। इन्होंने भारतेंदु द्वारा किए गए कार्य को आगे बढ़ाया इन्हें प्रकृति से बहुत प्रेम था। विशेष रूप से बादलों के भिन्न-भिन्न रूपों को देखकर ये मुग्ध हो जाते थे। यही कारण है कि इन्होंने अपना उपनाम प्रेमघन रखा। जिस प्रकार भारतेंदु ने तदीय समाज की स्थापना द्वारा समाज सुधार का कार्य किया, उसी प्रकार इन्होंने भी संदर्भ सभा तथा रसिक समाज की स्थापना करके समाज सुधार का कार्य कया। आनंद कादंबिनी तथा नागरी नीरद पत्रिकाओं का प्रकाशन करके हिंदी साहित्य को आगे बढ़ाने का कार्य किया। वे परंपरागत से आरंभ कर नवीनता की ओर पढ़ते गए। राजभक्ति, देश भक्ति तथा हिंदी के प्रति अनन्य प्रेम और हास्य से संबंधित कविताएँ कीं। इनकी रचनाओं का विवरण इस प्रकार है।
रचनाएँ :- राजभक्ति-मंगलाशा, हार्दिक हर्षादर्श, भारत बधाई आर्याभिनंदन, और सौभाग्य नभागम।
देश भक्तिपूर्ण रचनाएँ :- मंगलाशा, पितर प्रलाप, कलिकाल, तर्पण, स्वागत पत्र, आनंद बधाई, कजली, होली आदि।
हास्यपूर्ण रचनाएँ :- हास्यबिन्द तथा होली की नकल।
प्रतापनारायण मिश्र
प्रतापनारायण मिश्र भारतेंदु युग के महत्वपूर्ण कवि हैं। 24 सिंतबर सन् 1856 ई. को कानपुर में इनका जन्म हुआ था। स्कूली शिक्षा नहीं मिल पाई। स्वाध्याय से ही हिंदी अँग्रेज़ी, उर्द, फ़ारसी और बंगला भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। भारतेंदु द्वारा प्रकाशित पत्रिका के कविवचन सुधा से प्रेरणा पाकर ये साहित्य सेवा की ओर मुड़े। प्रथम रचना ‘प्रेम प्रेम पुष्पावली’ की प्रशंसा भारतेंदु ने की जिससे इन्हें बहुत बल मिला और वे अधिक उत्साह से हिंदी साहित्य की सेवा में लग गए। तत्कालीन लेखकों की तरह उन्होंने भी ‘ब्राहमण’ नामक मासिक पत्र निकाला। मिश्र जी की काव्य रचनाएँ इस प्रकार हैं :-
1. प्रेम पुष्पावली, 2. मन की लहर, 3. शृंगार विलास, 4. दंगल खंड (आल्हा), 5. ब्रेडला स्वागत, 6. लोकोक्ति शतक।
राधाचरण गोस्वामी
भारतेंदु की प्रेरणा से तत्कालीन कवियों की एक मंडली तैयार हो गई। इस मंडली के सभी कवियों में एक साथ भारतेंदु द्वारा प्रारंभ किए गए कार्य में हाथ बँटाया। पं. राधाचरण गोस्वामी का जन्म 25 फ़रवरी सन् 1859 को वृंदावन में हुआ था। इनके पिता कवि थे। जिस प्रकार प्रतापनारायण मिश्र को भारतेंदु द्वारा प्रकाशित पत्रिका से हिंदी सेवा की प्रेरणा मिली थी। उसी प्रकार राधाचरण गोस्वामी भी भारतेंदु की पत्रिका से प्रेरित होकर हिंदी साहित्य की सेवा में लग गए। इन्होंने अपने प्रेरणा पुरुष भारतेंदु के नाम पर ही भारतेंदु नामक पत्र निकालकर हिंदी साहित्य के संवर्द्धन में हाथ बँटाया। इन्होंने राजभक्ति से संबंधित काव्य रचनाएँ भी कीं। किंतु जैसा कि तत्कालीन सभी कवियों ने शासक वर्ग की नीति से क्षुब्ध होकर उनके विरोध में रचनाएँ की उसी प्रकार राधाचरण जी ने भी शासन की खुलकर आलोचना की। नवचेतना फैलाने के लिए उन्होंने भी अतीत के गौरव का चित्रण किया है। राधाचरण जी काव्य रचनाएँ इस प्रकार हैं :-
नव भक्तमाल, दामिनी दूतिका, शिशिर सुषमा, इश्क चमन, भ्रमरगीत, निपट नादान बारहमासी, प्रेम बीगीची, भारत संगीत, विधवा-विलाप, भू-भार हरणार्थ-प्रार्थना, पतित स्रोत, रेलवे स्रोत, यमलोक की यात्रा (व्यंग्यपूर्ण रचनाएँ)।
राधाकृष्ण दास
भारतेंदु की प्रेरणा से बाहर ही नहीं उनके घर के लोग भी समान रूप से प्रभावित हुए थे। भारतेंदु के फुफेरे भाई राधाचरण दास ने भी भारतेंदु के कार्य को ही आगे बढ़ाया। इन्होंने तत्कालीन अँग्रेज़ी सरकार की हिंदी विरोधी नीति को अच्छी तरह परखा था। अदालतों में हिंदी के प्रवेश के लिए उन्होंने भरसक प्रयत्न किया। इनकी काव्य रचनाओं में भी उन्हीं विषयों को स्थान मिला जिनका भारतेंदु ने प्रणायन किया। राधाकृष्ण दास ग्रंथावली के अनुसार इनकी समस्त काव्य रचनाएँ इस प्रकार हैं :-
मेकडानेल पुष्पांजलि, विजयिनी विलाप, पृथ्वीराज प्रयाण, भारत बारहमासा, जुबिली, देश दशा, छप्पन की विदाई, नए वर्ष की बधाई, राम जानकी, प्रताप विसर्जन, रहिमन विलास, विनय, फुटकर कविता।
पत्रकारिता का आरंभ और 19वीं शताब्दी की हिंदी पत्रकारिता
हिंदी की पत्रकारिता का प्रारंभ
हिंदी में पत्रकारिता का उदय और विकास इसी शताब्दी में हुआ। बंगाल से प्रकाशित ‘गौस्पेल मैगजीन प्रारंभ में द्विभाषी (अँग्रेज़ी तथा बंगला में) की बाद में त्रिभाषी हो गई। इस पत्रिका में कुछ अंश नागरी में भी प्रकाशित हुए जिसकी सर्वप्रथम सूचना डॉ. शारदा वेदालंकार ने अपने ग्रंथ ‘प्रारंभिक हिंदी गद्य का स्वरूप’ में दी है। अगस्त 1820 से अब हिंदी पत्रकारिता का उद्गम माना जाना चाहिए।
पत्रकारिता जगत में सामाजिक सुधारों के अगुआ राजा राममोहन राय (सन् 1774-1833 ई.) का विशेष योगदान रहा है।
राममोहन राय द्वारा बंगला में ‘बंगदूत तथा संवाद कौमुदी’ (सन् 1821) का संपादन किया गया। हिंदी में पत्रकारिता के उदय का सूत्रपात यहीं से होता है। ‘संवाद’ तथा ‘संवाददाता’ शब्द जो बंगाल में प्रचलित हुए, वही आज तक प्रचलन में है।
आगे चलकर कलकत्ता में ही प्रारंभ में हिंदी पत्रकारिता का गढ़ कहा जा सकता है।
हिंदी की पत्रकारिता का इतिहास काफ़ी प्राचीन तथा विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है। हिंदी का पहला समाचार पत्र 30 मई 1826 ई. को कलकत्ता से ‘उदंत मार्तंड’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इसका पता लगाने का श्रेय पं. बनारसीदास चतुर्वेदी को है जो स्वयं यशस्वी पत्रकार थे और वृंदावन में संपन्न हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन पर राष्ट्रभाषा के संदर्भ में पत्रकारिता के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष भी हुए। फलतः चतुर्वेदी जी ने विशाल भारत के कई अंकों में सन् 1831 ई. के इस पत्र की विस्तार से सूचनाएँ दीं।
भारतेंदु युग तक आते-आते पत्रों के प्रकाशकों को दिशा मिल चुकी थी।
इस पत्र के बंद होने से ही पहले मई 1829 से बंगदूत प्रारंभ हो चुका था। यह साप्ताहिक पत्र शनिवार को प्रकाशित होता था। संपादक मंडल में राजा राममोहन राय भी थे। इसके प्रारंभ में लिखा रहता था।
बंगाल का दूत पूत वहि वायु को जानी।
होय विदित सब देश क्लेश को लेश न मानो॥
प्रथम हिंदी दैनिक सुधावर्षण’ (सन् 1854) है जिसका प्रकाशन सन् 1868 ई. तक रहा। इसके संपादक श्री श्याम सुंदर सेन थे। सन् 1845 ई. से राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद का ‘बनारस’ अख़बार प्रारंभ हुआ जिसकी भाषा हिंदुस्तानी थी। इसकी उर्दू प्रधान शैली कर ख़ूब विरोध हुआ। यह उर्दू का हिमायती था। पंजाब से नवीनचंद्र राय ने ‘ज्ञानप्रदायिनी’ प्रकाशित की। नवीनचंद्र शुद्ध हिंदी के पक्षपाती थे।
सन् 1852 में सदासुखलाल जी ने ‘बुद्धि प्रकाश’ पत्रिका आगरा से प्रारंभ की। इसकी भाषा की आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने प्रशंसा की।
भारतेंदु ने पंद्रह अगस्त सन् 1867 में ‘कविवचन सुधा’ नामक मासिक पत्रिका प्रारंभ की। यह सोलह पृष्ठों की पत्रिका थी जिसमें भारतेंदु स्वयं लिखते थे और अपने परिकर की सामग्री प्रकाशित करते थे। इससे भाषा-शैली का स्वरूप स्पष्ट हुआ। भारतेंदु ने ही 1873 ई. में ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ निकाली जो सन् 1874 ई. में हरिश्चंद्र चंद्रिका’ कर दी गई। उस काल के अन्य पत्रों में वृत्तांत दर्पण (सदासुखलाल), विद्यादर्श, समय विनोद, हिंदू प्रकाश, प्रयाग दूत, प्रेमपत्र, बिहार बंधु, बालबोधिनी, नागरी प्रकाश, आर्यदर्पण, आर्यभूषण आदि प्रमुख हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी के कुछ उत्कृष्ट पत्रकार
अमृतलाल चक्रवर्ती - (सन् 1863-1936) हिंदी बंगवासी, हिंदोस्थान, भारत मित्र, वेंकटेश्वर समाचार आदि पत्रों का संपादन। हिंदी पत्रकारिता के विकास में अभूतपूर्व योगदान।
पं. अधिकादत्त व्यास (1859-1900) भारतेंदु युग में वैष्णव पीयूष प्रवाह’ का संपादन किया।
पं. अंबिका प्रसाद बाजपेयी (1890-1968) हिंदी बंगवासी, नृसिंह, भारतमित्र, सनातन धर्म आदि के संपादक। पत्रकारिता जगत के संस्मरण बड़े विस्तार से लिखे हैं।
गोपाल राम गहमरी (1866-1946) - वेंकटेश्वर समाचार, बिहार बंधु, दैनिक हिंदोस्थान का संपादन किया। सामाजिक रचनाओं द्वारा हिंदी-सेवा की।
पं. माधव प्रसाद मिश्र (1871-1907) - सुदर्शन तथा वैश्योपकारक’ के यशस्वी संपादक।
पं. राधाचरण गोस्वामी - वृंदावन ‘भारतेंदु’ पत्र का संपादन किया।
राधामोहन गोकुल (1866-1935) - ब्राह्मण तथा प्राणवीर द्वारा राष्ट्रीय जागरण का उद्घोष।
पं. शाबरमल शर्मा (1888-1983) - यशस्वी साहित्यकार झाबरमलजी भारत, फलसमाचार के संपादक रहे।
दुर्गा प्रसाद मिश्र (1860-1910) - सार सुधानिधि, उचितवक्ता, भारत मित्र का संपादन।
नरेंद्र देव (1868-1960) - जनवाणी, रणभेरी, संघर्ष के संपादक।
प्रतापनारायण मिश्र (1856-1894) - ब्राह्मण और हिंदोस्थान।
बालकृष्ण भट्ट (1844-1914) - ‘हिंदी प्रदीप’ के संपादक।
बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन’ (1855-1923) - आनंद कादम्बिनी और नागरी नीरद।
बाल मुकुंद गुप्त (1865-1907) - भारतमित्र, बंगवासी, हिंदोस्थान।
पं. मदनमोहन मालवीय (1861-1946) - हिंदोस्थान’ व ‘अभ्युदय’ का संपादन, हिंदी साहित्य सम्मेलन के संस्थापक, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के जनक, हिंदी भाषा के लिए उन्नायक, कचहरी में नागरीलिपि का प्रारंभ करने का श्रेय महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938) ‘सरस्वती’ के यशस्वी संपादक, युगनिर्माता, हिंदी को मानक रूप प्रदान करने में विशेष योगदान।
गंगाशंकर मिश्र (1887-1972) - ‘सन्मार्ग’ का संपादन।
मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्तव (1888-1939) मतवाला, वीरभूमि, हिंदीमंच, चाँद आदि पत्रों का संपादन।
बद्रीदत्त पांडेय (1882-1968) शक्ति और अल्मोड़ा अख़बार के संपादक रहे।
शारदा चरण मित्र (1848-1917) – हावड़ा हितकारी, देवनागर का संपादन।
राधाकृष्ण दास (1866-1907) साहित्य सुधानिधि, सरस्वती के संपादक रहे।
पं. माधवराव सप्रे (1871-1926) हिंदी केसरी, छत्तीसगढ़ मित्र तथा कर्मवीर के संपादक।
आधुनिकता की अवधारणा
सामान्य समझ के मुताबिक़ वर्तमान में होना या अपने समय में अवस्थित होना आधुनिक होने की पहचान है। यहाँ समकालीन और आधुनिक के शब्दार्थ भेद (semantic difference) जान लेना आवश्यक है। समकालीन यह है जो हमारे समय में घटित हो रहा है। यह समय एवं इतिहास से जुड़ी हुई परिघटना है। लेकिन जो कुछ समकालीन है, वह आधुनिक भी हो यह ज़रूरी नहीं है। सत्रहवीं शताब्दी में यूरोप में आधुनिक शब्द का प्रयोग वर्तमान समय के संदर्भ में होता था। रूढ़िग्रस्त, अप्रचलित एवं पुराने विचारों के ख़िलाफ़ इसका प्रयोग होता था। आधुनिक होना क्रमशः श्रेष्ठ होना माना जाने लगा। इसी दौर में यूरोप में आधुनिक और पुरातन के बीच सांस्कृतिक संघर्ष की स्थिति भी उत्पन्न हुई। पुरातनपंथी शास्त्रीयता के पोषक थे, जबकि आधुनिकता के हिमायती लोग विज्ञान और बुद्धिवाद के पोषक थे।
आधुनिक होना एक बौद्धिक अभिवृत्ति है। इसमें पारंपरिक विचारों, सिद्धांतों एवं सांस्कृतिक मूल्यों से परे हटते हुए विवेक, वैज्ञानिकता एवं तर्क के आधार पर चीज़ों को जानने और समझाने का प्रयास किया जाता है। विवेकयुक्त (rational) होना आधुनिक होने की पहचान है। आधुनिकता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं कि आधुनिकता वैज्ञानिकता के सहारे आई है। वह हमें अधिक वस्तुपरक बनाती है। वस्तु को आत्मगत दृष्टि से नहीं बल्कि, तद्गत वस्तुगत दृष्टि से देखना सत्य को देख पाने की शर्त है। (हिंदी आलोचना, पृ.179) ‘परंपरा और आधुनिकता’ नामक निबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आधुनिकता के तीन लक्षण बताएँ हैं—एक है ऐतिहासिक दृष्टि, दूसरा यह कि इसी दुनिया में मनुष्य को सब प्रकार की भीतियों और पराधीनता से मुक्त करके सुखी बनाने का आग्रह, और तीसरा यह कि व्यष्टि मानव के स्थान पर समस्त मानव या संपूर्ण मानव समाज की कल्याण कामना। इस प्रकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ऐतिहासिक दृष्टि, इहलौकिकता एवं मुक्ति की सामूहिक चेतना को आधुनिकता का प्रमुख लक्षण माना।
निष्कर्षत: आधुनिकता विवेकवाद एवं वस्तुनिष्ठता की बुनियाद पर विकसित चिंतन जिसकी काल यात्रा यूरोप में कुस्तुंतुनिया के पतन के बाद पुनर्जागरण, ज्ञानोदय एवं धार्मिक सुधार आंदोलन से गुजरती है यह वैज्ञानिक चिंतन पर आधारित है। विकास की एक रैखिकता एवं निष्पत्तियों की सार्वभौमिकता इसके अभिलक्षण हैं।
द्विवेदी युग
महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग, हिंदी नवजागरण और सरस्वती, राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रमुख कवि, स्वच्छंदतावाद और उसके प्रमुख कवि महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग भाषा साहित्य के क्षेत्र में अराजकता एवं उच्छृंखलता का वातावरण बन गया। ऐसे समय में महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे व्यक्ति का आगमन होता है। उन्होंने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से हिंदी को अराजकता के घेरे से बाहर निकाला। लेखकों को अपने अनुशासन से ठीक किया। भाषा-साहित्य को परिमार्जित एवं सरल रूप प्रदान करने का उनका कार्य चिरस्मरणीय बन गया।
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने इस संबंध में ठीक ही लिखा है “भावना की वह गहन तन्मयता, जो रवींद्रनाथ को कविता के निगूढ़ रहस्यमय अंतःपट का दर्शन करा देती है, द्विवेदी जी में नहीं मिलती, न इन्हें कल्पना की वह आकाशगामिनी गति ही मिली है जो सदा रवि बाबू के साथ रहती है। परंतु इन प्रदेशों में निष्पन्न, कर्मठ ब्राह्मण की भाँति द्विवेदी जी का शुष्क, सात्विक आचार साहित्य पर भी अपनी छाप छोड़ गया है, जिसमें न कल्पना की उच्च उद्भावना है, न साहित्य की सूक्ष्म दृष्टि, केवल एक शुद्ध प्रेरणा है, जो भाषा का भी मार्जन करती है और समय पर सरल, उदात्त भावों का भी सत्कार करती है। यही द्विवेदी जी की देन है। शुष्कता में व्यंग्य है, सात्त्विकता में विनोद है। द्विवेदी जी में ये दोनों ही है। स्वभाव की रुखाई, कपास की भाँति नीरस होती हुई भी गुणमय फल देती है। द्विवेदी जी ने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में कपास की ही खेती की। निरस विसद गुणमय फल जाए।” (हिंदी साहित्य: बीसवीं शताब्दी, पृ. 11)
द्विवेदी जी के व्यक्तित्व की इस विशेषता को डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने भी रेखांकित किया है “भारतेंदु के व्यक्तित्व में बंगाल की कोमलता और भावुकता थी, आचार्य द्विवेदी के व्यक्तित्व में महाराष्ट्र की कठोरता और वस्तून्मुखत्ता।” (हिंदी साहित्य और संवदना का विकास, पृ. 108)
द्विवेदी जी का यह व्यक्तित्व ही उनके युग के साहित्य के मूल चरित्र को प्रभावित करता है। आर्य समाज के हिंदी क्षेत्र पर बढ़ते प्रभाव ने उसे और पुष्ट किया है एवं दृढ़ बनाया है।
द्विवेदी जी का साहित्यिक आदर्श क्या था, इसका कुछ आभास ऊपर जो कुछ लिखा गया है, उससे मिल जाता है। सूत्र रूप में कहा जा सकता है कि उनकी दृष्टि उपयोगितावादी थी। वे ‘कला कला के लिए’ नहीं मानते थे। वे साहित्य के माध्यम से लोगों की रुचि का परिष्कार करना चाहते थे। वे कविता को न तो शब्द-कीड़ा मानते थे और न ही मानसिक विलास की चीज। हिंदी के कवि से उनकी अपेक्षा थी कि वह लोगों की रुचि का विचार रखकर अपनी कविता ऐसी सहज और मनोहर रचे कि साधारण पढ़े-लिखे लोगों में भी पुरानी कविता के साथ-साथ नई कविता पढ़ने का अनुराग उत्पन्न हो जाए। पढ़ने वालों के मन में नई-नई उपमाओं को, नए-नए शब्दों को और नए-नए विचारों को समझने की योग्यता उत्पन्न करना कवि ही का कर्तव्य है। जब लोगों का झुकाव इस ओर होने लगे तब समय-समय पर कल्पित अथवा सत्य आख्यानों के द्वारा सामाजिक, नैतिक और धार्मिक विषयों की मनोहर शिक्षा दे।’ (रसज्ञ-रंजन, पृ. 29-30)
द्विवेदी जी का यह साहित्यादर्श बहुत दृढ़ था। उसमें क्रमशः थोड़ा-बहुत विकास तो हुआ, लेकिन मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ। द्विवेदी जी ने रचना के सभी आयामों और सत्-असत् पर ही विचार नहीं किया अपितु सत्साहित्य के आधारभूत सिद्धांतों का भी विवेचन किया है। उन्होंने लोकरुचि का भी परिष्कार किया तथा लेखन सत्साहित्य लेखन की प्रेरणा दी। यही कारण है कि द्विवेदी जी को युग-प्रवर्तक कहा जाता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के बारे में कहा है ‘निबंधों और समालोचनाओं द्वारा ये साहित्यिकों को निरंतर प्रेरणा देते रहे। द्विवेदी जी की समालोचनाओं ने जहाँ एक ओर तरुण साहित्यकारों को रूढ़िमुक्त होकर लिखने की प्रेरणा दी, दूसरी ओर कई कृती-साहित्यकारों को वाद-विवाद के क्षेत्र में उतरने और विचारोत्तेजक लेख लिखने का प्रोत्साहन दिया।’
हिंदी नवजागरण और सरस्वती
जिस तरह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बीसवीं शताब्दी के प्रथम दो दशकों के साहित्य को अनुशासित और निर्देशित किया वैसा न उनसे पहले और न ही उनके बाद कोई एक व्यक्ति कर सका। वे सच्चे अर्थों में युग-निर्माता थे। और यह कार्य उन्होंने किया ‘सरस्वती’ के माध्यम से। इस पत्रिका का पहला अंक जनवरी, 1900 ई. में प्रकाशित हुआ। पहले वर्ष में इसके संपादक थे श्यामसुंदरदास, कार्तिक प्रसाद खत्री, राधाकृष्णदास, जगन्नाथदास रत्नाकर और किशोरीलाल गोस्वामी। अगले वर्ष अर्थात् 1901 ई. में केवल श्यामसुंदरदास इसके संपादक रह गए। जनवरी, 1903 ई. में द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ का संपादन संभाला और 1920 ई. तक, बीच के दो वर्ष छोड़कर, वे इसका संपादन करते रहे। उनके संपादन काल में इसमें जो भी रचनाएँ प्रकाशित हुईं, द्विवेदी जी ने न केवल उनकी भाषा को सुधारा, अपितु उनके भावों और विचारों को भी नियंत्रित किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा का संस्कार शुरू किया।। उस समय खड़ी बोली में रचना करने वाले लेखक अलग-अलग रचना सिद्धांत रखते थे। अँग्रेज़ी, बंगला, संस्कृत आदि के काव्य के अनुसार कई शैलियाँ चल पड़ी थीं। द्विवेदी जी ने काव्य रचना के क्षेत्र में काव्य भाषा को परिमार्जित एवं स्थिर रूप देने के लिए कार्य किया। एक समर्थ आलोचक की भाँति उन्होंने विभिन्न रचनाकारों की रचना को सुधारा। भाषा को सजाने-सँवारने का कार्य उन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से किया। गद्य और पद्य की एक भाषा के लिए द्विवेदी जी ने अथक परिश्रम किया। उनकी लगन से ही खड़ी बोली का परिमार्जित रूप उभर कर सामने आया और पद्य और गद्य की भिन्न भाषा का झगड़ा दूर हो गया। मुख्य रूप से उन्होंने भाषा को प्रसाद गुण से युक्त, व्याकरण संबंधी अशुद्धियों से दूर, अभिव्यंजना शक्ति से पूर्ण बनाने का प्रयत्न किया। रचनाकारों को उन्होंने, शब्दाडंबर के साथ-साथ अश्लील और ग्राम्य शब्द प्रयोग से बचने का भी सुझाव दिया। उन्होंने लेखकों को देशज शब्द के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया। मुहावरों का प्रयोग तथा स्वाभाविक अलंकारों के प्रयोग के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार एक कठोर शासक के समान उन्होंने भाषा के क्षेत्र में लेखकों को नियंत्रित किया। यह नियंत्रण उन्होंने संपादक होने से पहले ही प्रारंभ कर दिया था। 1901 ई. में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित अपने ‘कवि-कर्त्तव्य’ शीर्षक लेख में उन्होंने लिखा था “कविता का विषय मनोरंजन एवं उपदेशात्मक होना चाहिए। यमुना के किनारे केलि-कौतूहल का अद्भुत अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका। न परकीयाओं पर प्रबंध लिखने की अब आवश्यकता है और न स्वकीयाओं के ‘गतागत’ की पहेली बुझाने की। चींटी से लेकर हाथी पर्यंत जीव, भिक्षु से लेकर राजा पर्यंत मनुष्य, बिंदु से लेकर समुद्र पर्यंत जल, अनंत आकाश, अनंत पृथ्वी, अनंत पर्वतं सभी पर कविता हो सकती है, सभी से उपदेश मिल सकता है और सभी के वर्णन से मनोरंजन हो सकता है। यदि ‘मेघनादवध’ अथवा ‘यशवंतराव महाकाव्य’ वे नहीं लिख सकते तो उनको ईश्वर की निस्सीम सृष्टि में से छोटे-छोटे सजीव अथवा निर्जीव पदार्थों को चुनकर उन्हीं पर छोटी-छोटी कविताएँ करनी चाहिए।” (रसज्ञ रंजन, पृ. 23) द्विवेदी जी के इस निर्देश का पालन उनके युग के कवियों ने किया था, यह उनकी रचनाओं से स्पष्ट है।
राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रमुख कवि
हिंदी कविता की समस्त काव्य-धाराओं में राष्ट्रीय काव्यधारा का विशेष महत्व है। राष्ट्रीय कविताओं द्वारा राष्ट्र के भिन्न-भिन्न वर्गों, सम्प्रदायों और प्रांतों में भावात्मक एकता के विचार पुष्ट होते हैं। राष्ट्रीय कविताएँ जाति, समाज और प्रांतीयता की संकीर्ण भावना मिटाती हैं, जन-सामान्य के हृदय में कर्तव्य की भावना जगाती हैं। इन्हीं कविताओं से प्रेरणा पाकर अनेक वीरों ने हँसते-हँसते अपने को देश की आज़ादी के लिए अर्पित कर दिया। वास्तव में हिंदी कविता ने स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्र को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
इस काव्य में अतीत का गौरवगान, राष्ट्रीय स्वाभिमान, देशोद्धार का संकल्प, मातृभूमि रक्षा हेतु त्याग, बलिदान की भावना साफ़ झलकती है।
मैथिलीशरण गुप्त
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त, सन् 1886 को चिरगांव (झांसी, उत्तर प्रदेश) में हुआ था।
कवि की स्वर्ण जयंती के अवसर पर महात्मा गांधी ने उन्हें ‘मैथिली काव्य मान’ ग्रंथ भेंट करते हुए ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया। 1936 में साकेत के लिए हिन्दुस्तानी एकेडमी पुरस्कार और 1938 में मंगलाचरण पारितोषिक प्राप्त हुआ। 1946 में ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ ने उन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ से अलंकृत किया। 1948 में आगरा विश्वविद्यालय और 1960 में काशी विश्वविद्यालय ने डी.लिट् की मानद उपाधि देकर उन्हें सम्मानित किया। 1952 में गुप्त जी राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए। ‘पद्मभूषण’ से उन्हें सम्मानित किया गया।
12 दिसंबर 1964 को गुप्त जी का देहाँत हुआ। सुप्रसिद्ध कवि सियारामशरण गुप्त, गुप्त जी के छोटे भाई थे।
नवजागरण से जिन विभिन्न प्रवृतियों का उद्भव हुआ, उनकी अभिव्यक्ति गुप्त जी के काव्य में युग-चेतना तीन स्तरों पर अभिव्यक्त हुई है। प्रथम उनकी अतीत गौरव-गान में दूसरे गांधीवादी विचारों की प्रस्तुति में और तीसरे मानवतावादी धरातल पर विश्व राज्य की कल्पना में।
अतीत गौरव गान के द्वारा गुप्त जी ने राष्ट्रीय चेतना को जगाने का कार्य किया जिसके लिए पौराणिक, ऐतिहासिक कथानकों का आधार लेकर अतीत के गौरवशाली चित्र को जनमानस के समक्ष साकार किया। जिससे हीनता की भावना से मुक्त होकर स्वाधीन भारत का सुनहरा सपना देखा जाए। राष्ट्रीय आंदोलन को जब महात्मा गांधी का नेतृत्व प्राप्त हुआ तो गांधीवादी विचारों का प्रभाव साहित्य पर भी चढ़ा। गांधीवादी प्रभाव को ग्रहण करते हुए गुप्त जी ने राष्ट्रवादी चिंतन को विश्वव्यापी मानवतावादी आयाम दिया। गांधी जी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत को गुप्त जी ने बीज मंत्र के रूप में ग्रहण किया है। तत्कालीन युग चेतना को स्वर देते हुए समाज में नारी की दयनीय स्थिति के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए साहित्य में उपेक्षित नारियों की वेदना को अभिव्यक्त किया। गुप्त जी ने दबी हुई नारियों में आत्मविश्वास का भाव जगाया है, उन्हें अबला के स्थान पर सबला बनाया है। दलित किसान, शोषितों की सोचनीय स्थिति पर प्रकाश डालकर उनके उद्धार की आवश्यकता और उनके आर्थिक, सामाजिक अधिकारों की माँग की। उत्पीड़न और शोषण के विरुद्ध उनका काव्य आक्रोश कर उठता है। सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना के रूप में सर्व-धर्म समभाव और धार्मिक एकता की आवश्यकता पर जोर दिया। गुप्त जी की साहित्यिक यात्रा राष्ट्रीयता और विश्व मानवता की एक लंबी यात्रा है।
मैथिलीशरण गुप्त की काव्य रचनाओं की संख्या 34 के आसपास है। गुप्त जी सतत रूप से 50 वर्षों तक काव्य लेखन करते रहे। मूल काव्य रचनाओं के अलावा, गुप्त जी ने उर्दू, संस्कृत और बंगला के ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया है। उनकी संख्या लगभग 9 है। गुप्त जी के काव्य रचनाओं की सूची इस प्रकार हैं—
काव्य संग्रह :- जयद्रथ वध, रंग में भंग, भारत-भारती, किसान, वैतालिक, शकुंतला, पंचवटी, अवध, स्वदेश संगीत, हिन्दू, त्रिपथगा, गुरूकुल, विकटभट, झंकार, साकेत, यशोधरा, मंगलधर, द्वापर, सिद्धराज, नहुष, कुणालगीत, विश्ववेदना, काबा और कर्बला, अजित, प्रदक्षिण, अंजलि और अर्ध्य, पृथ्वीपुत्र, जयभारत, दिवोदास, राजा और प्रेम, विष्णुप्रिया, जयिनी, रत्नावली, लीला, उच्छवास, पद्यप्रबंध, पत्रावली।
अनुवाद ग्रंथ :- विरहिणी वज्रांगना, मेघनाथ वध, प्लासी का युद्ध, रूबाइयात उमर खय्याम, स्वप्नवासवदत्रा, दूत घटोत्कच, गीतामृत, वृत्र संहार, वीरांगना।
माखनलाल चतुर्वेदी
माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल सन् 1889 को होशंगाबाद से 14 मील दूर ‘बाबई’ ग्राम में हुआ था।
माखनलाल चतुर्वेदी एक ओर तो गांधीवाद का अनुगमन करते थे तो दूसरी ओर क्रांतिकारियों के प्रति स्नेह भी रखते थे। बलिदानी वीरों के प्रति उनके मन में गहरी आत्मीयता थी। अतः वे जहाँ क्रांतिकारियों को सहायता पहुँचाते थे वहीं दूसरी ओर असहयोग आंदोलन और राष्ट्रीय गतिविधियों में सक्रिय हिस्सा भी लेते थे।
राजनीतिक नेता, पत्रकार, कवि तथा गद्यकार के रूप में इन्होंने देश और साहित्य की सेवा की। इस कारण ये लोकप्रिय हुए।
1943 में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने ‘हिमकिरीटनी’ पर उन्हें देव पुरस्कार दिया।
1947 में उन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ उपाधि प्रदान की गई।
1955 में ‘साहित्य अकादमी’ की ओर से ‘हिमतरंगिनी’ पर राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।
1963 में गणतंत्र दिवस पर भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने व्यक्तिगत गुणों के लिए इन्हें पद्मभूषण की उपाधि प्रदान की। परंतु जब भारतीय संसद में हिंदी को पूर्णतः राष्ट्रभाषा बनने की अवधि में परिवर्तन करने के लिए विधेयक पारित किया गया तो उसके विरोध में इन्होंने वह सम्मान लौटा दिया।
रचनाएँ : - कृष्णार्जुन युद्ध नाटक, सिरजन और मंचन 1916, प्रकाशन (पुस्तकाकार) 1918 ई., हिमकिरीटिनी (कविता संग्रह) 1943 ई., साहित्य-देवता (निबंध संग्रह) 1948 ई., यद्यपि इसके अधिकांश निबंध 1921-22 में विलासपुर जेल में लिखे गए थे। 4. हिमतरंगिनी (कविता-संग्रह) 1949 ई., माता (कविता-संग्रह) 1951 ई., युग चरण (कविता संग्रह) 1956 ई., समर्पण (कविता-संग्रह) 1956 ई., अमीर इरादे गरीब इरादे (निबंध संग्रह) 1960 ई., वेणु लो गूंजे धरा (कविता संग्रह) 1960 ई., समय के पाँव (संस्मरणात्मक निबंध) 1962 ई., चिंतन की लाचारी (भाषण-संग्रह) 1965 ई., बीजुरी काजल आँज रही (कविता संग्रह) 1980 ई. जिसमें 1955 से 64 के बीच रची रचनाएँ हैं। रंगों की बोली (निबंध संग्रह) 1982 ई. जिसमें बहुत पुराने 1944 तक के निबंध भी हैं।
‘प्रभा’, ‘कर्मवीर’ और ‘प्रताप’ के माध्यम से उन्होंने देश की जनता में व्याप्त जड़ता को तोड़ा एवं क्रांति का संदेश दिया।
सुभद्रा कुमारी चौहान
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त सन् 1904 ई. इलाहाबाद के गाँव निहालपुर में हुआ था।
सुभद्रा कुमारी चौहान स्वाधीनता संग्राम की सेनानी तो थी ही साथ ही राष्ट्रीय काव्यधारा की सुप्रसिद्ध लेखिका भी रही हैं। उनकी लेखनी ने ‘झाँसी की रानी’ और ‘वीरों का कैसा हो बसंत’ जैसी ओजस्वी, देशप्रेम की कविताएँ दी थी।
कविता संग्रह :- मुकुल, त्रिधारा
कहानी संग्रह :- बिखरे मोती – 1932, उन्मादिनी – 1934, सीधे-साधे चित्र -1947
बाल-साहित्य, झाँसी की रानी, कदम्ब का पेड़, सभा का खेल
कविता संकलन :- ‘मुकुल तथा अन्य कविताएँ’ (बाल कविताओं के अतिरिक्त संकलित असंकलित समस्त कविताओं का संग्रह। प्रकाशक-हंस प्रकाशन इलाहाबाद।)
कथा संकलन-सीधे-साधे चित्र-1983 (संकलित-असंकलित समस्त कहानियों का संग्रह। प्रकाशक - हंस प्रकाशन इलाहाबाद)
सम्मान :- सेकसरिया पारितोषिक (1931) मुकुल (कविता-संग्रह) के लिए, सेकसरिया पारितोषिक- (1932) बिखरे मोती (कहानी संग्रह) के लिए (दूसरी बार)
अन्य सम्मान :- भारतीय डाक तार विभाग ने 6 अगस्त 1976 को सुभद्रा कुमारी चौहान के सम्मान में 25 पैसे का एक डाक टिकट जारी किया।
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’
बालकृष्ण शर्मा का जन्म 8 दिसंबर 1897 ई. को तत्कालीन ग्वालियर राज्य के भ्याना नामक गाँव में हुआ था।
साहित्यिक रचनाएँ :- 1917 में गणेशशंकर विद्यार्थी से मिलने के बाद उन्होंने व्यवस्थित ढंग से लेखन कार्य शुरू किया। वे तत्कालीन एक महत्वपूर्ण पत्र ‘प्रताप’ से जुड़ गए थे। वे इस पत्र के संपादक भी रहे। राष्ट्रीय काव्यधारा को प्रचारित करने वाली पत्रिका ‘प्रभाग’ का भी लगभग वर्षों तक संपादन भी किया।
काव्य रचनाएँ :- कुंकुम, रश्मिरेखा, अपलक, कवासि, विनोबास्तवन, उर्मिला, प्राणर्पण, हम विषपाई जनम के, अर्चणा के फूल, आधुनिक हिंदी काव्य, आधुनिक काव्य संग्रह, आकाशवाणी काव्य-संगम (भाग-1), आकाशवाणी काव्य-संगम (भाग-2), कवि भारती, कविताएँ, कवियों की झाँकी, काव्य सरोवर, काव्य धारामा, गांधी अभिवादन, निकुंज, परिचय, पुष्कतरिणी, भारतीय कविता पार, मुंशी अभिनंदन ग्रंथ, राष्ट्रीय कविताएँ,
राजधानी के कवि, रूपांबंश, साहित्य चयन, सौहार्द-सुमन, संकेत, हिंदी के वर्तमान कवि और उनका काव्य,
हिंदी के सर्वश्रेष्ठ प्रेमगीत।
गद्य :- हमारी संसद
रामधारी सिंह दिनकर
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 30 सितंबर सन् 1908 को बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया नामक ग्राम में हुआ था।
रचनाएँ :- ‘छात्र सदोदर’ में उनकी पहली काव्य रचना छपी थी। सन् 1935 से ‘रेणुका-काव्य संग्रह’ के प्रकाशन से उनकी पुस्तकें छपने लगी थी। उन्होंने कुल 40 पुस्तकें लिखी जो इस प्रकार से है।
काव्य :- रेणुका, सामधेनी, कुरुक्षेत्र, चक्रवात, रश्मिरथी, उर्वषी, कोयल और कवित्व, परशुराम की प्रतीक्षा, हारे को हरिनाम, हुंकार।
वैचारिक गद्य :- संस्कृति के चार अध्याय, शुद्ध कविता की खोज साहित्यमुखी, भारतीय एकता, राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता, पंत, प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त।
विविध :- संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ (संस्मरण), दिन की डायरी, मेरी यात्राएँ।
श्यामनारायण पांडेय
श्यामनारायण पांडेय का जन्म सन् 1907 में आज़मगढ़ ज़िले के डुमगाँव (उ.प्र) में हुआ।
रचनाएँ :- तुमुल (1928 ई.), हल्दीघाटी (1939 ई.) (इस रचना के लिए ‘देव सम्मान’ से अंलकृत), जौहर (1944 ई.) (द्विवेदी पुरस्कार), आरती (1946 ई.), रूपान्तर (1948), जय हनुमान (1956 ई.) (उ.प्र. सरकार का पुरस्कार), गोरा वध (1956 ई.), शिवाजी (1970 ई.) (उ.प्र. सरकार का पुरस्कार), बालिवध (1975 ई.),
वशिष्ठ (1975 ई.), परशुराम (1985 ई.)।
स्वच्छंदतावाद और उसके प्रमुख कवि
छायावाद : छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताएँ, छायावाद के प्रमुख कवि
छायावाद
छायावादी शैली से सुपरिचित एक तत्कालीन कवि श्री मुकुटधर पांडेय ने 70 वर्ष पूर्व जबलपुर से प्रकाशित ‘श्रीशारदा’ नामक पत्रिका के 1920 के अंकों में ‘हिंदी कविता में छायावाद’ नाम से एक लेखमाला आरंभ की और उसमें न केवल पहली बार छायावाद का नामकरण किया बल्कि छायावादी कविता के आरंभिक चरण चिह्नों को अंकित भी किया। उन्होंने लिखा था “छायावाद एक मायामय सूक्ष्म वस्तु है। इसमें शब्द और अर्थ का सामंजस्य बहुत कम रहता है।”
1921 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में सुशील कुमार नामक लेखक ने ‘हिंदी में छायावाद’ शीर्षक एक संवादात्मक निबंध लिखा। इन निबंधों से स्पष्ट है कि नई तरह की कविताओं के लिए ‘छायावाद’ शब्द 1920 तक स्वीकृत हो चुका था।
‘छायावाद’ नाम कैसे प्रचलित हुआ, इस संबंध में विद्वानों में मतभेद है। सुशील कुमार के लेख से स्पष्ट है कि उनके लिए ये कविताएँ टैगोर स्कूल की चित्रकला के समान ‘अस्पष्ट’ होने के कारण छायावादी कही जाने लगीं। मुकुटधर पांडेय ने अपनी लेखमाला के दूसरे निबंध ‘छायावाद क्या है?’ में इस प्रश्न पर विचार किया है। उनके अनुसार ‘अँग्रेज़ी या किसी पाश्चात्य साहित्य अथवा बंग साहित्य की वर्तमान स्थिति की कुछ भी जानकारी रखने वाले तो सुनते ही समझ जाएँगे कि यह शब्द ‘मिस्टिसिज्म’ के लिए आया है।” (डॉ. नामवर सिंह की पुस्तक ‘छायावाद’ से उद्धृत) आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, “पुराने ईसाई संतों के छायाभास तथा यूरोपीय काव्यक्षेत्र में परिवर्तित आध्यात्मिक प्रतीकवाद के अनुकरण पर रची जाने के कारण बंगाल में ऐसी कविताएँ ‘छायावाद’ कही जाने लगी थीं। यह वाद क्या प्रकट हुआ, एक बने बनाए रास्ते का दरवाज़ा-सा खुल पड़ा और हिंदी के कुछ नए कवि उधर एकबारगी झुक पड़े।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने छायावाद के दो अर्थ किए हैं—एक रहस्यवाद के अर्थ में और दूसरा काव्य शैली के अर्थ में। उन्हीं की शब्दों में, छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए। एक तो रहस्यवाद के अर्थ में, जहाँ उसका संबंध काव्यवस्तु से होता है अर्थात जहाँ कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है।
‘छायावाद’ शब्द का दूसरा प्रयोग काव्य शैली या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है। उनके अनुसार, छायावाद का पहला अर्थ लेकर तो हिंदी काव्य क्षेत्र में चलने वाली महादेवी वर्मा ही हैं। छायावाद की कविताओं के संदर्भ में ईसाई धर्म, पश्चिम के स्वच्छंदतावादी कवियों और रवींद्रनाथ की कविताओं की विशेष रूप में चर्चा हुई। शुक्ल ने छायावाद पर ईसाई धर्म, यूरोपीय कविता और रवींद्रनाथ के प्रभाव की चर्चा की है। उन्होंने छायावाद को या तो ‘अज्ञात के प्रति जिज्ञासा’ के भाव के आधार पर रहस्यवाद समझ या फिर वे छायावाद को शैली मात्र समझते रहे।
आचार्य नंददलारे वाजपेयी यद्यपि छायावाद के आध्यात्मिक पक्ष को स्वीकारते हैं परंतु उनके अनुसार उसकी मुख्य प्रेरणा धार्मिक न होकर मानवीय और सांस्कृतिक है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी छायावाद में ‘मानवतावादी दृष्टि की प्रधानता’ स्वीकार की है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि ‘छायावादी कविता बाह्य ऐंद्रियबोध तथा चेतन मन की सीमाओं को पार कर अचेतन के रहस्य लोक में पहुँचती है और जाने-अनजाने उसका मर्मोद्घाटन करती है।
पश्चिम के स्वच्छंदतावादी कवियों, टैगोर के काव्य और निराला आदि छायावादी कवियों के काव्य की समानता के कारण पर विचार करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा है कि शैली, ठाकुर और निराला के युगों की परिस्थितियों में एक बात समान रूप से विद्यमान है और वह है पूँजीवाद का प्रारंभिक विकास। डॉ. नामवर सिंह ने छायावाद को राष्ट्रीय जागरण से जोड़ते हुए लिखा है कि ‘छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से। इस जागरण में जिस तरह क्रमशः विकास होता गया, इसकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति भी विकसित होती गई और इसके फलस्वरूप ‘छायावाद’ संज्ञा का भी अर्थ विस्तार होता गया।
डॉ. नगेंद्र इसे दमित रोमानी स्थूल वृत्ति की सूक्ष्म प्रतिक्रिया माने रहे तो शिवदान सिंह चौहान इसे पलायनोन्मुखी प्रवृत्ति कहते रहे।
छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताएँ
आत्माभिव्यक्ति की भावना : छायावादी कवियों ने पहली बार अपने ‘स्व’ को व्यक्त करने की कोशिश की। उन्होंने ‘मैं’ द्वारा अपने भावों को व्यक्त किया। अपनी निजता को आत्मीय ढंग से वाणी दी। अगर उन्होंने अपने प्रेम को व्यक्त किया तो राधा-कन्हाई का बहाना नहीं ढूँढ़ा। अपने मन की पीड़ा को भी शब्द दिए। डॉ. नामवर सिंह के अनुसार, छायावादी कवि ने यह जो ‘मैं’ शैली अपनाई, वह केवल शैली भर नहीं है। इस निजता और आत्मीयता के पीछे आधुनिक युवक का पूरा व्यक्तित्व है, जो अपने को सीधे-सीधे अभिव्यक्त करने की सामाजिक स्वाधीनता चाहता है।
आरंभ में छायावादी कवियों ने अपनी प्रणय-भावना को अभिव्यक्ति दी, बाद में कवियों ने अपने जीवन के दूसरे दुःख-दर्द को भी वाणी दी। इस दृष्टि से निराला की सरोज स्मृति’ कविता विशेष उल्लेखनीय है।
रूढ़ियों से मुक्ति : छायावाद का कवि सामाजिक बंधनों के बीच छटपटा रहा था क्योंकि उसके हृदय में स्वतंत्रता की भावना उत्पन्न हो गई थी। यह ‘आत्म-प्रसार की आकांक्षा’ ही विभिन्न रूपों में छायावाद में व्यक्त हुई है। एक ओर इस भावना ने छायावादी कवि को प्राचीन रूढ़ियों और बंधनों से मुक्त किया तो दूसरी ओर इस भावना को ठीक-ठीक न समझ पाने के कारण उसे आध्यात्मिक आवरण प्रदान किया। आत्मप्रसार की इस इच्छा ने छायावादी कवियों को यह समझ प्रदान की कि संकीर्णता और रूढ़िबद्धता से आत्मविकास नहीं किया जा सकता।
रहस्यवाद : डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में “सामाजिक रूढ़ियों के प्रहार की आशंका से कवि को वैयक्तिक अनुभूतियों के लिए रहस्यवाद का आश्रय लेना पड़ा। पुरुष तो अपनी प्रणय भावना को किसी न किसी ढंग से व्यक्त कर सकता था, लेकिन नारी के लिए यह सहज संभव नहीं था।” दूसरी ओर रीतिवाद ने प्रणय भावना को इतना हल्का और क्षुद्र बना दिया था कि छायावादी कवि अपने प्रेम को उस धरातल पर नहीं उतारना चाहते थे। इसलिए ‘ऐहिक व्यक्तिकता की क्षुद्रता से उसे बचाने के लिए’ उस पर रहस्यात्मकता का आवरण डाल दिया। छायावाद में रहस्य भावना का सामाजिक आधार यही है।
डॉ. नामवर सिंह के अनुसार काव्य में रहस्य-भावना एक प्रकार से ‘परोक्ष की जिज्ञासा’ है। वैज्ञानिक उन्नति ने आधुनिक मनुष्य को अंधविश्वासों से मुक्त कर दिया। अब वह प्रकृति और सृष्टि को जानना-समझना चाहता है। उसमें प्रकृति के प्रति जिज्ञासा का भाव उत्पन्न हुआ। स्वच्छंदतावादी काव्य की यह ख़ास विशेषता है।
प्रकृति-प्रेम : छायावादी कवियों ने प्रकृति को न तो उद्दीपन रूप में प्रस्तुत किया और न ही अप्रस्तुत विधान के रूप में। उन्होंने प्रकृति के कण-कण से अपना रागात्मक संबंध जोड़ा। उसकी गतिविधियों को सूक्ष्मता से देखा और उन्हें नया अर्थ दिया। प्रकृति के विराट और सूक्ष्म दोनों रूपों को अपनी कविता का विषय बनाया।
छायावादी कवियों द्वारा प्रकृति के सूक्ष्म और नवीन सौंदर्य बोध की अभिव्यक्ति का कारण सपष्ट करते हुए डॉ. नामवर सिंह कहते हैं, प्रकृति ने मनुष्य में सौंदर्य बोध जगाया और मनुष्य ने उस सौंदर्य बोध के द्वारा प्रकृति में छिपे हुए नए-नए सौंदर्य का उद्घाटन किया।
नारी-स्वातंत्र्य की भावना : द्विवेदीयुगीन साहित्य में नारी की दीन-हीन दशा को कविता का विषय बनाया गया परंतु वहाँ कवि का भाव दया ही अधिक था। नारी के प्रति प्रेम को सहज रूप से स्वीकार करना और उसे उतनी ही सहजता से कविता में प्रस्तुत करना छायावाद में ही संभव हुआ। नारी को अपनी ही तरह मानवी मानना, उसे अपना सहचर और मित्र समझना आधुनिक शिक्षा का परिणाम था। जहाँ एक ओर नए विचारो ने नारी के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन किया, वहीं दूसरी ओर स्वयं नारी की स्थिति में भी परिवर्तन हुआ।
छायावाद ने पहली बार स्त्री और पुरुष के प्रेम को वैयक्तिक भावनाओं के धरातल पर देखा। अब स्त्री ‘पत्नी’, ‘देवी’, ‘कामिनी’, ‘दासी’ के रूप में नहीं वरन् प्रेयसि, प्रियतम, सखि जैसे रूप में सामने थी। इन संबोधनों में कहीं बराबरी का भाव था।
राष्ट्रीय भावना : मुक्ति की जो आकांक्षा छायावादी कवियों की मुख्य प्रेरणा थी, उसने केवल वैयक्तिक भावनाओं के क्षेत्र में ही कवि को बंधन मुक्त नहीं किया वरन् उसे यह भी समझ दी कि राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के बंधनों से भी वह मुक्त हो। यही कारण है कि छायावादी काव्य में राष्ट्रीयता की भावना कई रूपों में व्यक्त हुई है। यद्यपि छायावादी कवियों ने सीधे-सीधे राजनीतिक कविताएँ बहुत कम लिखी हैं परंतु राष्ट्र प्रेम और स्वतंत्रता की भावना को व्यक्त करने वाली कविताएँ काफ़ी रची हैं।
कल्पना का नवोन्मेष : नामवर सिंह ने अनुसार “तीव्र भावावेग में ही उदात्त कल्पना का जन्म होता है।” उन्हीं के अनुसार, भावावेग जितना ही तीव्र होता है, अप्रस्तुत चीज़ों का रूप उतना ही अद्भुत और असामान्य होता है, और फिर ये अद्भुत तथा असामान्य चित्र हृदय में नए ढंग का आह्लाद और कंपन उत्पन्न करते हैं। संवेदना कल्पना को जाग्रत करती है और कल्पना संवेदना में वृद्धि करती है।
इस कल्पना शक्ति ने छायावादी कवियों को वास्तविक जगत् को देखने की नई दृष्टि प्रदान की। उन्होंने प्रकृति के विविध रूपों को व्यक्त करने के लिए ऐसे नवीन अप्रस्तुतों की योजना की है, जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
काव्य-भाषा : द्विवेदी युग की भाषा विश्लेषणात्मक, शुष्क और विचार-प्रधान थी। जबकि छायावादी कवि संवेदनशील, भावुक और कल्पनाजीवी था। उसकी प्रवृत्ति स्वच्छंद थी तथा कोमलता, सुंदरता और भावप्रवणता की ओर उसका झुकाव था। इसलिए उसके लिए यह ज़रूरी था कि वह द्विवेदी युग से प्राप्त काव्य-भाषा को नया रूप प्रदान करे। द्विवेदी युग की भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों का बाहुल्य था, लंबे समास वाले पदों के कारण भाषा जटिल हो गई थी। छायावादी कवियों ने यद्यपि संस्कृत शब्दों के प्रयोग की प्रवृत्ति का ही अनुसरण किया परंतु शब्द चयन में उन्होंने अपनी प्रवृत्ति का ध्यान रखा। इसी तरह लंबे समास पदों की बजाए छंद और लय के अनुकूल पद-रचना पर उन्होंने विशेष ध्यान दिया।
छंद से मुक्ति : छंद के क्षेत्र में छायावाद का सबसे बड़ा योगदान है मुक्त छंद। अर्थात् छंद के बंधन से मुक्ति। मुक्त छंद-छंद के बाह्य आडंबर अर्थात् तुक और मात्रा की गिनती, सम-विषम चरण से मुक्त अवश्य है लेकिन कविता की आत्मा लय से मुक्त नहीं है। हिंदी में मुक्त छंद की शुरुआत निराला की कविता ‘जूही की कली’ से हुई है।
बिंब और प्रतीक : शुक्ल जी के शब्दों में “आभ्यंतर प्रभाव-साम्य के आधार पर लाक्षणिक और व्यंजनात्मक पद्धति का प्रचुर विकास छायावाद की काव्य-शैली की असली विशेषता है। डॉ. नामवर सिंह का भी मानना है कि कल्पना प्रधान काव्य में अनूठी उपमाओं और प्रतीकों का बाहुल्य तथा भाव-विदग्ध हृदय से लाक्षणिक वक्रता-भरी भाषा का निकलना स्वाभाविक है।”
प्रमुख छायावादी कवि
छायावाद के प्रमुख कवियों में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा की गणना होती है।
जयशंकर प्रसाद - जयशंकर प्रसाद (1889-1937) ने काव्य रचना का आरंभ ब्रजभाषा से किया और उनकी आरंभिक रचनाएँ रीतिकालीन ढंग की हैं जो उनके काव्य-संग्रह ‘चित्राधार’ (1918) में संकलित हैं। लेकिन प्रसाद शीघ्र ही नवीन काव्य-प्रवृत्ति की ओर उन्मुख हो गए। उन्होंने खड़ी बोली में रचना भी साथ-ही-साथ आरंभ कर दी थी और खड़ी बोली में लिखी कविताओं का पहला संग्रह ‘कानन कुसुम’ 1913 ई. में प्रकाशित हुआ था।
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अनुसार “भारतीय परंपरा और भारतीय संस्कृति का प्रेम ही उन्हें अतीत की ओर खींचता है। नाटकों में वे देश के अतीत की ओर जाते हैं। ‘कामायनी’ में भी अतीत की ओर जाते हैं तथा ‘आँसू’ में अपने ही प्रेम के अतीत में जाते हैं। यह अतीत प्रेम कवि प्रसाद की एक विशेषता है। यह अतीत प्रेम नहीं बल्कि संस्कृति का प्रेम है।
उनके काव्य में क्लासिकीय गरिमा हैं। उनके काव्य में चिंतन की भी प्रधानता है।
‘चित्राधार’ कवि की सबसे पहली काव्य-कृति है। सन् 1909 से 1912 तक की पाँच रचनाएँ उसमें समाहित हैं। ‘अयोध्या का उद्धार’, ‘वन-मिलन’, ‘प्रेम राज्य’ (पूर्वाद्ध तथा उत्तरार्द्ध), ‘पराग’ और ‘मकरन्द बिन्दु’ नामक इन रचनाओं में ‘पराग’ ऐसा काव्य-संगह है जिसमें 24 स्फुट कविताएँ संकलित हैं। इसके बाद ‘प्रेम-पथिक’, ‘करूणालय’, तथा ‘कानन कुसुम’ सन् 1913 में प्रकाशित हुई। ‘कानन कुसुम’ में सन् 1909 से सन् 1917 तक की 49 स्फुट कविताएँ एकत्र की गई हैं। सन् 1914 में ‘महाराजा का महत्व’ प्रकाशित हुई। फिर सन् 1918 में 55 स्फुट कविताओं का संग्रह ‘झरना’ प्रकाश में आया। इसी प्रकार सन् 1925 में ‘आँसू’ सन् 1933 में 33 स्फुट कविताओं का अद्वितीय काव्य संग्रह ‘लहर’ प्रकाशित हुआ।
प्रसाद में राष्ट्रीय गौरव का भाव भी बहुत गहराई तक समाया हुआ था। नाटकों के अतिरिक्त उनकी कई कविताओं में भी यह भाव व्यक्त हुआ है। ‘शेरसिंह का शस्त्र समर्पण’ ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ और ‘महाराणा का महत्व’ इसी तरह की रचनाएँ हैं।
प्रसाद की श्रेष्ठता का एक और प्रमाण ‘कामायनी (1935) है जो आधुनिक युग का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। इसमें रूपक शैली में मानव चेतना का विकास अत्यंत प्रभावशाली रूप में दिखाया गया है।
डॉ. नगेंद्र के शब्दों में “कामायनी मानव चेतना के विकास का महाकाव्य है अथवा मानव सभ्यता के विकास का यह विराट रूपक, साहित्य के इतिहास में एक नवीन प्रयोग है, एक अद्भुत उपलब्धि है।”
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (1899-1961) की आरंभिक रचना ‘जूही की कली’ को ‘सरस्वती’ के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लौटा दिया था, यही रचना बाद में छायावाद और मुक्त छंद की पहली रचना स्वीकार की गई।
निराला की प्रांरभिक रचनाओं में ‘अनामिका’ (प्रथम) (सन् 1922), परिमल (सन् 1930), गीतिका (सन् 1936) एवं अनामिका (द्वितीय) (सन् 1938) हैं। अनामिका (प्रथम) में केवल सात कविताएँ थीं। वे आगे चलकर अन्य संग्रहों में ले ली गई। वास्तव में परिमल को ही उनकी प्रथम काव्य कृति होने का गौरव प्राप्त है। इससे पूर्व निराला ‘मतवाला’ में ‘जूही की कली’ नामक कविता के माध्यम से साहित्य जगत में अपने कवि रूप की पहचान बना चुके थे। ‘परिमल’ में निराला लिखित 1930 तक की कविताएँ संकलित हैं। स्वच्छंद छंद की कविताएँ उनके इस प्रांरभिक सृजन में प्राप्त हो जाती हैं। ‘परिमल’ में लगभग 78 रचनाएँ हैं निराला का प्रसिद्ध गीत ‘तुम और मैं’, माया, विधवा, भिक्षुक, बादल राग एवं जागो फिर एक बार आदि ‘परिमल’ की अनेक रचनाएँ हैं जो निराला के समर्थ कवि रूप को साहित्य लोक में स्थापित कर गई।
‘परिमल’ के पश्चात् निराला ने लगभग 101 गीतों के संग्रह के रूप में ‘गीतिका’ की सृष्टि की। इस संग्रह की कविताओं में निराला ने कई प्रयोग किए हैं। अद्वैतवादी काव्य रचनाओं की संख्या यहाँ पर्याप्त मात्रा में देखी जा सकती है। ‘कौन तम के पार रे कह’ एवं ‘पास ही रे हीरे की खान’ आदि गीतों में रहस्य की भावना का संस्पर्श स्पष्टतः देखा जा सकता है। कुछ गीतों का स्वर राष्ट्रीय सांस्कृतिक भावना से परिपूर्ण हैं। ‘वर दे वीणा वादिनी’ और ‘भारती जय विजय करें’ गीतों में कवि की राष्ट्रीय भावना का उज्ज्वल एवं सांस्कृतिक रूप दृष्टव्य है। गीतिका के विषय में जयशंकर प्रसाद का निम्न कथन महत्वपूर्ण हैं—“गीतिका, हिंदी साहित्य के लिए सुंदर उपहार है। उसके चित्रों की रेखाएँ पुष्ट, वर्णों का विकास भास्कर है। उसका दार्शनिक पक्ष गंभीर और व्यंजना मूर्तिमती है।”
सन् 1938 में निराला का तीसरा काव्य संग्रह अनामिका प्रकाशित हुआ। इसमें कुछ 56 कविताओं को संग्रहीत किया गया है। इसमें मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार की रचनाएँ एक साथ रखी गई हैं। ‘सरोज स्मृति’, ‘वह तोड़ती पत्थर’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ विशेष चर्चित काव्य रचनाएँ। इसमें भी ‘राम की शक्ति पूजा’ सबसे अधिक सशक्त और प्रौढ़तम रचना मानी जाती है।
निराला के कृतित्व की एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि है—’तुलसीदास’। महाकाव्योचित शैली में रचित यह प्रबंध कृति निराला काव्य की अक्षय-कीर्ति का आधार है।
साहित्य में सर्वथा नए आयाम को लाने वाली रचना ‘कुकुरमुत्ता’ निराला के सृजक रूप को एक नया मोड़ प्रदान करती है। इस की भाषिक संरचना ठेठ शब्दावली पर आधारित है। ‘कुकुरमुत्ता’ में काव्य के परंपरित मानदंडों से पूर्णतः भिन्न शैली को कवि ने अपनाया है। काव्य क्षेत्र में ऐसा साहसपूर्ण विस्फोट निराला जैसा सशक्त और निर्भीक रचनाकार ही कर सकता है। इसका रचना काल सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय का है। पैनी हास्य-व्यंग्य की दृष्टि इस काव्य की विशेषता है।
‘अणिमा’, ‘बेला’ और ‘नए पत्ते’ आदि काव्य संग्रह प्रगतिशील एवं प्रयोगवादी रचनाओं से अनुष्ठित हैं। ‘अणिमा’ में कवि की एकाकी भावना की पीड़ा और भक्ति का स्वर भी यत्र-तत्र देखा जा सकता है। प्रयोगवादी ढर्रे की कविता ‘चूँकि यहाँ दाना है’ अपनी विचित्र प्रकार की संरचना के कारण उल्लेखनीय है। इस कविता में पूँजीवादी संस्कृति पर तीखा व्यंग्य प्रहार किया गया है। ‘बेला’ में निराला ने अनेक रंगों के गीतों की सृष्टि की है। भाषा, भाव एवं प्रयोग की दृष्टि से ‘बेला’ के गीतों में नवीनता और विविधता का रूप झलकता है। उर्दू ग़ज़लों की लोकप्रियता का प्रभाव भी कुछ रचनाओं में पाया जाता है। ‘नए पत्ते’ में हास्य व्यंग्य का पुट लिए कई कविताएँ हैं परंतु उनका व्यंग्य कहीं-कहीं बड़ा मार्मिक रूप अपना लेता है। इसकी पहली कविता ‘रानी और कानी’ में चेचक के दाग, काली, नाक चिपटी, गंजा सिर, एक आँख कानी पर, ‘माँ उसको कहती है रानी’ के द्वारा माँ के हृदय की कारुणिक अवस्था को देखा जा सकता है।
‘अर्चना’, ‘आराधना’ और ‘गीत गुंज’ ये तीनों गीत संग्रह निराला की अंतिम स्थिति है। निरंतर संघर्षों से जूझने के कारण निराला का मानसिक संतुलन डगमगा गया, उस अवस्था का रूप इन गीतों में कहीं-कहीं देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त भक्ति भावना, विनय और प्रार्थना मिश्रित करुणा की आभा लिए कुछ गीतों की भी रचना उन्होंने की है।
उन्होंने जीवन भर सामाजिक-आर्थिक शोषण और निरर्थक परंपराओं का विरोध किया, जीवन भर अंधकार की भयंकर शक्तियों से जूझते रहे, लेकिन झुके नहीं। संघर्षों ने उन्हें विद्रोही बना दिया था। उनका सारा जीवन और साहित्य इसी विद्रोह की भूमि पर पनपा है। (विश्वनाथ प्रसाद तिवारी)
रामचंद्र शुक्ल ने अपने ‘इतिहास’ में निराला के बारे में लिखा था कि उनमें ‘बहुवस्तुस्पर्शिनी’ प्रतिभा है। निराला के काव्य में भावबोध और कला दोनों ही स्तरों पर अन्य छायावादी कवियों की तुलना में कहीं अधिक वैविध्य मिलता है।
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने उनकी विशेषता को ध्यान में रखते हुए लिखा है—“निराला के काव्य में एक ओर उल्लास है तो दूसरी ओर अवसाद। एक ओर जीवन की चाह है तो दूसरी ओर मृत्यु की शांति। एक ओर क्रांति है तो दूसरी ओर प्रपत्ति। एक ओर प्रकृति प्रेम तो दूसरी ओर सामाजिक क्रांति। कला के क्षेत्र में विविधता का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं, “एक ओर उन्होंने छोटे-छोटे मुक्तक लिखे हैं तो दूसरी ओर लंबी कथात्मक कविताएँ। एक ओर छंदोबद्ध रचनाएँ तो दूसरी ओर मुक्त छंद। एक ओर समाज पदावली तो दूसरी ओर सपाटबयानी”। निराला के काव्य का यह वैविध्य उनके बहु आयामी व्यक्तित्व की देन है।
सुमित्रानंदन पंत - सुमित्रानंदन पंत (1900-1977) ने अपने लेखन का आरंभ 1916-18 के आसपास किया था।
‘वीणा’ उनका आरंभिक काव्य संग्रह 1918 ई. में और दूसरा काव्य-संग्रह ‘ग्रंथि’ 1920 ई. में प्रकाशित हुआ। तीसरे काव्य संग्रह ‘पल्लव’ में 1922-1926 ई. तक की बत्तीस कविताएँ हैं। चौथे काव्य संग्रह ‘गुंजन’ में 1926-1932 तक की 46 कविताएँ हैं। पाचवाँ संग्रह ‘ज्योत्सना’ 1934 में छायावाद की प्रगति-कला के चरम विस्तार को लेकर आया।
पंत जी अन्य काव्य कृतियों में ‘युगान्त’ (1935), युग वाणी (1937), ग्राम्या 1939-40, स्वर्ण किरण (1974), स्वर्ण धूलि (1947), मधु ज्वाल, (उमर खैय्याम का भावनुवाद) युग पथ (1948 ई.), खादी के फूल (1948), रजतशिखर (1951 ई.), तथा शिल्पी, अतिमा, सौवर्ण, वाणी, कला और बूढ़ा चाँद हैं।, लोकायतन (1964) कवि का प्रथम महा काव्य है। इसके बाद ‘किरण वीणा’, पुरुषोत्तम राम, पौ फटने से पहले, गीत हंस, पतझर, एकभाव क्रांति, शंख ध्वनि (1971), शशि की तरी, समाधिता, ‘आस्था, सत्यकाम, सक्रांति और गीत-अगीत (1977 ई.) जैसे कई काव्य संग्रह आते रहे हैं।
‘ज्योत्सना’ पंत की काव्य नाटिका है जो प्रतीकात्मक है और पाँच अंकों में विभाजित है। ‘वीणा’ से ‘ज्योत्सना’ तक की रचनाओं को पंत की काव्य-यात्रा का पहला चरण माना जाता है और इसे स्वच्छंदतावादी या छायावादी चरण कहा गया है।
पंत के काव्य का दूसरा चरण प्रगतिशीलता से प्रभावित है यद्यपि ‘परिवर्तन’ जैसी कविताओं में उसका आभास पहले चरण में भी मिल चुका है। ‘युगांत’, ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्या’ की रचनाएँ इसी प्रगतिशील चरण की कविताएँ हैं।
सन् 1940 के आसपास पंत अरविंद दर्शन से प्रभावित हुए और उनका झुकाव अध्यात्म की ओर हो गया। यह पंत की काव्य-यात्रा का तीसरा चरण माना जाता है। स्वर्ण किरण (1947), स्वर्णधूलि, उत्तरा, रजतशिखर, शिल्पी, सौवर्ण, अतिमा (1955), वाणी (1958) आदि इस आध्यात्मिक काव्य चरण की कविताएँ हैं।
पंत जी का संपूर्ण काव्य प्राकृतिक सौंदर्य एवं शिवम् का सम्मिलित रूप है।
महादेवी वर्मा - महादेवी वर्मा (1907-1987) यद्यपि छायावादी काव्यधारा में कुछ देर से प्रविष्ट हुई परंतु उनके काव्य के बिना छायावाद का अध्ययन अधूरा ही कहा जाएगा। महादेवी का प्रथम काव्य-संकलन ‘नीहार’ 1930 में प्रकाशित हुआ जब छायावाद का सर्वोत्तम प्रकाश में आ चुका था। उनके काव्य संग्रह हैं :- रश्मि (1932 ई.), नीरजा (1934 ई.) और सांध्यगीत (1936 ई.) बाद में ये चारों संग्रह ‘यामा’ नामक संकलन में संग्रहीत होकर एक साथ प्रकाशित हुए।
महादेवी का काव्य नारी की वेदना और आत्म-पीड़ा की अभिव्यक्ति है।
प्रगतिवाद की अवधारणा, प्रगतिवादी काव्य और उसके प्रमुख कवि
प्रगतिवाद की अवधारणा
मार्क्सवाद समाज के विकास की एक वैज्ञानिक विचारधारा है जो सामाजिक परिवर्तनों की व्याख्या ही नहीं करती बल्कि उसके रूपांतरण के उपायों को भी प्रस्तुत करती है। प्रगतिवादी साहित्य सिद्धांत बताता है कि साहित्य का उद्देश्य क्या होना चाहिए। वह जनता की भावनाओं, आकांक्षाओं और सपनों को व्यक्त करने पर बल देता है। वह वस्तु पर बल देकर भी रूप की उपेक्षा नहीं करता।
प्रगतिवाद ने आंदोलन का रूप बीसवीं सदी के तीसरे दशक में लिया था, जब दुनिया में फासीवाद के उदय के कारण विश्वयुद्ध का आसन्न संकट उपस्थित हो गया था। हमारे यहाँ आज़ादी का आंदोलन भी मध्यवर्ग की सीमाओं से पार जाकर जनता का आंदोलन बन गया था। किसानों और मज़दूरों की भागीदारी ने आंदोलन के चरित्र को बदल डाला था और देश में वामपंथ की ताक़तें उभरने लगी थीं।
प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना 1936 में लखनऊ में हुई थी जिसका सभापतित्व प्रेमचंद ने किया था। लेकिन लेखक संघ बनाने के प्रयास इससे पहले से शुरू हो गए थे। दुनिया के दूसरे देशों में फासीवाद के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी संगठित हो रहे थे। भारत में भी उपनिवेशवाद के विरुद्ध लेखक प्रगतिशील लेखक संघ के झंडे तले एकत्र हुए। प्रगतिशील लेखक संघ अखिल भारतीय आंदोलन था। इसमें सभी भारतीय भाषाओं के लेखक शामिल थे। प्र.ले.सं. ने भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की स्थापना की भी प्रेरणा दी।
प्रगतिवादी काव्य की विशेषताएँ :
आम जनमानस की समस्याओं, दुविधाओं को समझना, जमाख़ोरी का विरोध करना; स्थापित समाज व्यवस्था की रूढ़ियों और जड़ मनस्थितियों का खंडन करना, जन और समाज के जीवन यथार्थ को पूरी वास्तविकता में देखना, राष्ट्र एवं विश्व के प्रति सजग दृष्टि रखना, जीवन की सहजता बाधित करने वाली जर्जर मान्यताओं, पद्धतियों को निरस्त कर नई व्यवस्था का अह्वान करना, प्रगति और परिवर्तन के प्रति सचेत और सावधान रहना, मानवीय और नैतिक पद्धति के जीवन-यापन हेतु नागरिक को प्रेरित करना, अपने अधिकार की रक्षा हेतु निरंतर संघर्षोन्मुख रहना आदि प्रगतिशील कविता-धारा की कुछ मूल विशेषताएँ हैं।
राष्ट्रीयता की भावना की अभिव्यक्ति
प्रगतिवाद में राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति एक प्रमुख विशेषता रही है। प्रगतिशील कविता में व्यक्त राष्ट्रीय भावना छायावादी राष्ट्रीय भावना से कई मायनों में अलग थी। इन कवियों ने एक और देशभक्ति की भावना को क्रांतिकारी धार दी, तो दूसरी ओर उन्होंने उसे सामाजिक मुक्ति के सवाल से भी जोड़ा। उन्होंने इतना ही कहना पर्याप्त नहीं समझा कि देश को विदेशी दासता से मुक्त होना चाहिए बल्कि यह भी कि आज़ाद भारत किस तरह का होगा और राजसता पर किसका शासन होगा।
वामपंथी विचारधारा और राजनीति का प्रभाव
प्रगतिशील कविता पर मार्क्सवाद के प्रभाव का कारण सन् 30 के बाद की परिस्थितियाँ है। 1917 में रूस की बोल्शेविक क्रांति और सोवियत संघ के अस्तित्व में आने ने दुनिया भर के कलाकारों और बुद्धिजीवियों को प्रभावित और प्रेरित किया था।
शोषित-उत्पीड़ित जनता से जुड़ाव
प्रगतिशील कविता में किसान-मज़दूरों के प्रति गहरी सहानुभूति और लगाव की अभिव्यक्ति हुई और शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति के सामूहिक प्रयासों की ज़रूरत को रेखांकित ही नहीं किया बल्कि यह भी बताया कि जन क्रांति इसका एकमात्र रास्ता है।
ग्राम्य जीवन के प्रति लगाव
प्रगतिवाद से पूर्व के काव्य में ग्राम्य जीवन की अभिव्यक्ति आमतौर पर रूमानी क़िस्म की थी, जिसका मूल भाव कुछ इस तरह का होता ‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है?’। ग्राम्य जीवन में व्याप्त विषमताओं, विडंबनाओं और संघर्षों का जैसा चित्रण प्रगतिशील कविता में मिलता है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ग्राम्य जीवन के चित्रण में विविधता का अभाव है। प्रगतिशील कवियों ने ग्राम प्रकृति और ग्राम परिवेश के भी बहुरंगी चित्र अपनी कविताओं में अंकित किए हैं। इस दृष्टि से नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन की कविताएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। नागार्जुन की कविता में मिथिलांचल, केदार के यहाँ बुंदेलखंड और त्रिलोचन की कविता में अवध जनपद का सौंदर्य जैसे मूर्तिमान हो उठा है। ये कवि प्रकृति का चित्रण करते हुए भी कभी भी वहाँ के लोगों और वहाँ के सामाजिक जीवन को नहीं भूलते।
शोषक सत्ता का विरोध
प्रगतिशील कविता की एक प्रमुख प्रवृत्ति यह है कि इसमें पूँजीवादी, सामंतवादी और साम्राज्यवादी शोषक सत्ता का विरोध लगातार दिखाई देता है। आज़ादी के पहले प्रगतिशील कविता की मुख्य धारा पूँजीवादी साम्राज्यवादी ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध थी।
सामाजिक परिवर्तन पर बल
प्रगतिशील कविता की एक अन्य प्रवृत्ति रही है सामाजिक यथार्थ के चित्रण पर बल। इस संदर्भ में नामवर सिंह की यह बात ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है। उनका कहना है, “जिस तरह कल्पनाप्रवण अंतर्दृष्टि छायावाद की विशेषता है और अंतर्मुखी बौद्धिक दृष्टि प्रयोगवाद की उसी तरह सामाजिक यथार्थ दृष्टि प्रगतिवाद की विशेषता है।”
प्रगतिवादी काव्य के प्रमुख कवि
नागार्जुन - मैथिली काव्य रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित नागार्जुन खड़ी बोली हिंदी कविताओं में भी गहरी आंचलिकता, ठेठपन, तद्भवता, व्यंग्यपूर्ण आक्रामकता और गहरी जीवनासक्ति का प्रमाण देते हैं। राजनीतिक कविताएँ नागार्जुन के यहाँ बड़ी संख्या में हैं। कविता के लिए जो विषय अकल्पनीय या असंभव माने जाते हैं उन पर भी नागार्जुन ने कविताएँ लिखीं हैं और असाधारण सफलता प्राप्त की है। जीवन के प्रति प्रगाढ़ राग की कविताएँ भी उनके यहाँ कम नहीं हैं। उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं :- युगधारा, शपथ, प्रेत का बयान, खून और शोले, चना जोर गरम, सतरंगे पंखोंवाली, प्यासी पथराई आँखें, तालाब की मछलियाँ। नागार्जुन ने हिंदी काव्य के साथ-साथ मैथिली में भी कविताएँ लिखी हैं, जो ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ में संग्रहीत हैं।
केदारनाथ अग्रवाल - प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रतिनिधि तथा महत्वपूर्ण कवि हैं। रूमानी आदर्शवाद से यथार्थवाद तक, रूपासक्ति से जीवनासक्ति तक और कोमल रागात्मकता से खुरदरे वस्तुचित्रण तक केदार की कविता के अनेक रंग हैं। भावुकता केदार के यहाँ आत्मीयता का पर्याय है। पत्नी प्रेम पर जैसी अकुंठ कविताएँ केदारनाथ अग्रवाल ने लिखी हैं, किसी ने नहीं लिखीं। प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति के गहरे लगाव के साथ केदार संघर्षशील जनता के कठोर जीवन, कठिन श्रम और दृढ़ वैचारिक आस्था की ओर बराबर सजग रहे हैं। ‘चंद्रगहना से लौटती बेर, ‘बसंती हवा’ से केदार की ख़ास पहचान बनी। केदारनाथ अग्रवाल स्वीकार करते हैं कि मार्क्सवादी विचारधारा के कारण ही उन्हें नई जीवन दृष्टि और नई काव्यदृष्टि मिली। उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। फूल नहीं रंग बोलते हैं, गुलमेंहदी, अपूर्वा।
शमशेरबहादुर सिंह - शमशेरबहादुर सिंह को प्रगतिवादी काव्यधारा से संबद्ध करने में उन्हें कठिनाई होती है जो प्रगतिवाद को स्थिर मतवाद ही मानते हैं, तथा जो उनकी काव्यात्मक संभावनाओं को महत्व नहीं देते हैं। शमशेर को प्रयोगवादी या रूपवादी मानकर अलग कर दिया जाता है। शमशेर विचारधारा की दृष्टि से मार्क्सवादी हैं और मार्क्सवाद को विशेष महत्व देते हैं। जनता के प्रति उनकी सहानुभूति किसी से कम नहीं है। पर कविताओं को वे उसकी मुक्त संभावनाओं में देखते हैं। रूप और शिल्प उन्हें जीवन की प्रकट सच्चाइयों की तरह ही ज़रूरी जान पड़ते हैं। उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं :- कुछ कविताएँ, कुछ और कविताएँ, इतने पास अपने, चुका भी हूँ नहीं मैं।
त्रिलोचन शास्त्री - उन्होंने राजनीतिक विषयों पर कविताएँ प्रायः नहीं लिखीं हैं। साधारण विषयों पर, जीवन के बहुत मामूली प्रसंगों पर लिखते हुए भी वे अपनी प्रगतिशील दृष्टि का प्रमाण देते हैं। सॉनेट त्रिलोचन का प्रिय छंद है। सॉनेटों में जितनी सहजता से वे आत्मकथ्य या सामाजिक संदेश बिखेरते चलते हैं। उसी से उनकी साफ़ दृष्टि और असाधारण काव्य क्षमता का पता चलता है। त्रिलोचन की कविताएँ सीधे जीवन को पकड़ती हैं। त्रिलोचन का प्रथम महत्वपूर्ण संग्रह ‘धरती’ है। दूसरा संग्रह है ‘दिगंत’। अन्य संग्रह हैं। ताप के तापे हुए दिन, उस जनपद का कवि हूँ।
प्रयोगवाद और नई कविता
प्रयोगवाद
आधुनिक हिंदी कविता में ‘प्रयोगवाद’ का जन्म छायावाद की अतिशय अशरीरी कल्पना, सूक्ष्मतावादी सौंदर्य-बोध और एकांगिता के विरोध से हुआ। ऐतिहासिक दृष्टि से ‘प्रयोगवाद’ का आरंभ अज्ञेय के संपादकत्व में निकलने वाले काव्य संग्रह ‘तारसप्तक’ से हुआ। ‘तारसप्तक’ में विविध विचारधाराओं के कवि एक साथ एकत्रित हुए जिनमें अज्ञेय को छोड़कर ज़्यादातर कवि प्रगतिशील विचाराधारा के समर्थक थे। किंतु प्रयोगवाद नाम इस काव्य-प्रवृत्ति के विरोधियों द्वारा दिया गया है।
अज्ञेय ने ‘प्रगतिवाद’ से असंतुष्ट होकर ‘व्यक्ति स्वातंत्र्य सिद्धांत’ की स्थापना का अभियान ‘प्रयोगवाद’ में चलाया। प्रगतिशील साहित्य में साहित्येतर मूल्यों को स्थान मिला था—किंतु ‘प्रयोगवाद’ साहित्यिक मूल्यों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ा। फलतः ‘प्रयोगवाद’ के अतिवाद से बचने के चक्कर में ‘प्रयोगवाद’ स्वयं अपने ही अंतर्विरोधों अतिवादों का शिकार होकर रूपवाद (फार्मलिज्म) के जाल में फँसता गया जिससे उसे मुक्ति नई कविता आंदोलन में मिली।
इसी समय काव्य में ‘प्रयोग’ को आधार बनाकर एक आंदोलन नकेनवादियों या प्रपद्यवादियों ने खड़ा कर दिया। ‘प्रयोग’ शब्द अँग्रेज़ी के ‘एक्सपेरिमेंट’ का हिंदी पर्याय है और इसका संबंध विज्ञान के ‘प्रयोग’ से न होकर आधुनिक चित्रकला के ‘प्रयोग’ से है। आधुनिक चित्रकला के प्रवर्तक चित्रकार सेजा ने अपने चित्रों को ‘प्रयोग’ कहा फिर चित्रकला से यह ‘प्रयोग’ शब्द साहित्य में आया और चल पड़ा। अन्यथा ‘प्रयोग’ या ‘प्रयोगवाद’ का ‘एक्सपेरिमेंट लिज्म’ जैसा कोई समानांतर आधार पश्चिम में भी नहीं है। नकेनवादियों ने ‘प्रयोग’ को काव्य में साध्य और साधन, दोनों घोषित किया। लेकिन ‘प्रयोगवाद’ के काफ़ी पीछे ‘नकेनवाद’ आंदोलन चला। नकेनवाद का ‘भाव और व्यंजना स्थापत्य तथा ‘प्रपद्यवाद’ की दार्शनिक पृष्ठभूमि को ये रचनाकार स्वयं स्पष्ट नहीं कर सके। नतीजा यह हुआ कि काव्य-आंदोलन एकदम किनारे पड़कर विलुप्त हो गया।
‘तारसप्तक’ के सात कवि है गजानन माधव मुक्तिबोध, नैमिचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजा कुमार माथुर, राम विलास शर्मा और अज्ञेय। संकलनकर्ता और संपादक अज्ञेय हैं ‘तारसप्तक’ की भूमिका की वे स्थापनाएँ जो केंद्र में रही है, इस प्रकार है—
“अब भी उनके बारे में उतनी ही सच्चाई के साथ कहा जा सकता है कि उनमें मतैक्य नहीं है। सभी महत्वपूर्ण विषयों पर उनकी राय अलग-अलग है जीवन के विषय में, समाज धर्म और राजनीति के विषय में, काव्य-वस्तु और शैली के, छंद और तुक के, कवि के दायित्वों के प्रत्येक विषय में उनका आपस में मतभेद है।”
“दूसरा मूल सिद्धांत यह था कि संगृहीत सभी कवि ऐसे होंगे जो कविता को प्रयोग का विषय मानते हैं जो यह दावा नहीं करते कि काव्य का सत्य उन्होंने पा लिया है केवल अन्वेषी ही अपने को मानते हैं। तारसप्तक में सात कवि संगृहीत हैं। सातों एक-दूसरे से परिचित है बिना इसके इस ढंग का सहयोग कैसे होता किंतु इससे यह परिणाम न निकाला जाए कि वे कविता के किसी एक ‘स्कूल’ के कवि है। या कि साहित्य जगत के किसी गुट अथवा दल के सदस्य या समर्थक है।”
ऐसा होते हुए भी वे एकत्र संगृहीत हैं। इसका कारण...काव्य के प्रति एक अन्वेषी का दृष्टिकोण उन्हें समानता के सूत्र में बाँधता है।
“इसका यह अभिप्राय नहीं है कि प्रस्तुत संग्रह की सब रचनाएँ रूढ़ि से अछूती हैं या कि केवल यही कवि प्रयोगशील है, बाक़ी सब घास छीलने वाले, वैसा दावा यहाँ कदापि नहीं, दावा केवल इतना है कि ये सातों अन्वेषी हैं।
प्रयोगवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ :-
प्रयोगवाद का उदय प्रगतिवाद की प्रतिक्रिया में हुआ इसलिए यह स्वाभाविक था कि प्रयोगवाद समाज की तुलना में व्यक्ति को, विचारधारा की तुलना में अनुभव को, विषयवस्तु की तुलना में कलात्मकता को श्रेयस्कर मानता है।
विचारधारा से मुक्ति
प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने ‘वाद के विरुद्ध विद्रोह को प्रयोगवाद की सर्वप्रथम विशेषता माना है। स्वयं अज्ञेय ने कहा प्रयोग का कोई वाद नहीं है।’ प्रयोगवादी कवियों का मानना था कि कोई भी वाद या विचारधारा मनुष्य को सत्य तक नहीं पहुँचा सकती। राजनीतिक पक्षधरता को वे अनावश्यक मानते हैं। अज्ञेय के अनुसार ‘हमारा जन्म लेना ही पक्षधर होना है। जीवन संघर्ष में यह किसी बाह्य सत्य, किसी वैज्ञानिक दर्शन की उपयोगिता को स्वीकार नहीं करते।
सत्य के लिए निरंतर अन्वेषण
डॉ. नामवर सिंह ने ‘सत्य के लिए निरंतर अन्वेषण’ को प्रयोगवाद की दूसरी विशेषता माना है। जब एक बार प्रयोगवादी कवि ने विचारधारा से अपने को अलग कर लिया तब सत्य को जानने के लिए निरंतर अन्वेषण आवश्यक हो गया। अज्ञेय ने ‘दूसरा सप्तक’ की भूमिका में कहा था, प्रयोग दोहरा साधन है, क्योंकि एक तो वह उस सत्य को जानने का साधन है, जिसे कवि प्रेषित करता है, दूसरे उस प्रेषण की क्रिया को और उसके साधनों को जानने का भी साधन है। अर्थात् प्रयोग द्वारा कवि अपने सत्य को अधिक अच्छी तरह जान सकता है और अधिक अच्छी तरह अभिव्यक्त कर सकता है।
व्यक्तिवाद
प्रयोगवादी कवियों ने व्यक्ति के एकांत महत्त्व पर विशेष बल दिया है। ‘नदी के द्वीप’ कविता में अज्ञेय ने व्यक्ति और समाज के संबंधों पर विचार किया है। उनके अनुसार व्यक्ति द्वीप के समान है जो काल रूपी नदी के बीच दृढ़ता से अवस्थित रहता है। वह समाज रूपी भूखंड की तरह नदी को गंदला नहीं करता। ‘नदी के द्वीप’ कविता में व्यक्ति और समाज अलग-अलग हैं। उनकी अन्य कई कविताओं में भी व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व पर बल दिया गया है।
यथार्थ-दृष्टि
प्रयोगवादी कविता में भावुकता की बजाए बौद्धिकता का आग्रह अधिक है। जीवन के यथार्थ को रंगीन, मोहक और भावमय रूप में प्रस्तुत करने की बजाए प्रयोगवाद ने उसे सहज और साधारण रूप में प्रस्तुत किया। यद्यपि प्रयोगवादी कवि का जीवनानुभव बहुत सीमित था, परंतु यह सीमित अनुभव यथार्थपरक रूप में ही व्यक्त हुआ।
छायावादी और प्रयोगवादी कविता में नारी चित्रण की तुलना करते हुए डॉ. नामवर सिंह ने लिखा है कि “छायावादी कवि प्रायः प्रकृति की मोहक पृष्ठभूमि में अथवा सुंदर प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से नारी की छाया प्रतिमा निर्मित करते रहे, लेकिन प्रयोगवादी कवि ने यहाँ भी अप्सरामयी नारी को स्पप्नस्थित गरिमामय पद से उतारते हुए सामान्य भावभूमि पर प्रतिष्ठित कर दिया।
काव्य-भाषा
प्रयोगवाद में शब्द प्रयोग की ओर विशेष ध्यान दिया गया। डॉ. नामवर सिंह के अनुसार प्रयोगवादी कवियों की भाषा अधिक सहज और सरल बनी। उसमें अधिक पारदर्शिता और संप्रेषणीयता आई। भाषा में गेयता और आलंकारिता कम हुई। सभी प्रयोगवादी कवियों की भाषा एक सी नहीं है।
छंद और लय
डॉ. नामवर सिंह ने लिखा है कि “छायावाद युग में जो मुक्त छंद वैकल्पिक था, वह प्रयोगवादी कविता का मुख्य स्वर हो गया। मुक्त छंद को ही विशेष रूप से अपनाने के कारण प्रयोगवादियों ने इसमें नए-नए स्वरों और नई-नई लयों के प्रयोग किए। छायावाद में प्रायः रोला और घनाक्षरी की लय पर ही मुक्त छंद लिखे गए, लेकिन प्रयोगवाद में सवैया तथा अन्य प्राचीन छंदों की लय को मुक्त ढंग से प्रयोग किया गया।
प्रतीक और बिंब
अज्ञेय काव्य में प्रतीकों का महत्वपूर्ण स्थान मानते हैं। उनके अनुसार कोई भी स्वस्थ काव्य-साहित्य प्रतीकों की, नए प्रतीकों की सृष्टि करता है और जब वैसा करना बंद कर देता है तब जड़ हो जाता है या जब जड़ हो जाता है तब वैसा करना बंद करके पुराने प्रतीकों पर ही निर्भर करने लगता है। अज्ञेय प्रतीक को सत्वान्वेषण का साधन मानते हैं।
नई कविता
सर्वप्रथम अज्ञेय ने इस काव्य-प्रवृति को ‘नई कविता’ नाम (आज का भारतीय साहित्य, पृ. 403) देने का प्रस्ताव किया। संयोगवश यह नाम चल निकला और नई प्रवृत्तियों के लिए रूढ़ हो गया।
इलाहाबाद से 1954 में ‘नई कविता’ पत्रिका आरंभ हुई। ‘नई कविता’ के प्रकाशन से यह नाम चर्चित होकर पूरे प्रवाह में आ गया। इलाहाबाद के नए रचनाकार और आलोचक धर्मवीर भारती, रघुवंश तथा विजयदेव नारायण साही ‘आलोचना’ त्रैमासिक के संपादकत्व मंडल में थे एक विचार गोष्ठी में इन सभी ने नई सर्जनात्मक संवेदना पर पाठकों का ध्यान केंद्रित करने के लिए ‘नई कविता’ पत्रिका निकालने का निर्णय लिया। संपादन का दायित्व जगदीश गुप्त (नई कविता आंदोलन के कवि आलोचक) तथा डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी (नए साहित्य नव लेखन के प्रख्यात आलोचक) को सौंपा गया। ‘नई कविता’ के सन् 1954 से 1967 तक आठ अंक प्रकाशित हुए जिनमें लक्ष्मीकांत वर्मा, सर्वेश्वर, कुँवर नारायण, विपिन कुमार अग्रवाल, श्रीराम वर्मा आदि की कविताएँ तथा अज्ञेय, रघुवंश, विजयदेवनारायण साही, जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी जैसे काव्य-मर्मज्ञों की टिप्पणियों और लेख प्रकाशित हुए। भारती की ‘कनुप्रिया’ तथा ‘अंधायुग’ जैसी रचनाओं के अंश भी ‘नई कविता’ में प्रकाशित हुए।
‘नई कविता’ पत्रिका के कुछ लेख ‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ (साही जी), ‘अर्थ की लय’ तथा ‘रसानुभूति और सह-अनुभूति’ बहुत प्रसिद्ध हुए।
‘नए पत्ते’, ‘निकष’, ‘प्रतिमान’ जैसी पत्रिकाएँ परिमल वृत्त के लेखकों ने निकाली। ‘परिमल’ की गोष्ठियों के संयोजन का कार्य लक्ष्मीकांत वर्मा, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, हरदेव बाहरी तथा हरिमोहन दास टंडन ने किया। ‘प्रतिमान’ पत्रिका विज्ञापित हुई पर प्रकाशित नहीं हो पाई। फलतः डॉ. रघुवंश ने ‘क ख ग’ त्रैमासिक का प्रकाशन किया, जिसके पंद्रह अंक निकले और नए साहित्य को इस लघु पत्रिका ने अनेक नए पाठक दिए।
‘नई कविता’ आंदोलन को प्रतिष्ठित करने में अज्ञेय की भूमिका अविस्मरणीय है। सन् 1951 में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने ‘दूसरा सप्तक’ निकाला। ‘दूसरा सप्तक’ नई कविता का बेजोड़ दस्तावेज है। इसमें भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंतला माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय तथा धर्मवीर भारती मौजूद हैं। ‘तीसरा सप्तक’ (1959) इसी नई कविता चेतना का विस्तार कहा जा सकता है जिसमें प्रयाग नारायण त्रिपाठी, कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, विजयदेवनारायण साही, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना को स्थान मिला है।
डॉ. जगदीश गुप्त इस बात पर बल देते हैं कि ‘कविता में नवीनता की उत्पत्ति सच्ची कविता लिखने की आकांक्षा से ही होती है। नई कविता को परिभाषित करते हुए अनुभूति की अभिव्यक्ति पर विशेष बल दिया गया। अज्ञेय ने अनुभूति की विशिष्टता को महत्वपूर्ण माना तो गिरिजाकुमार माथुर ने अनुभूति की साधारणता को ही विशिष्टता माना है। डॉ. जगदीश गुप्त ने नई कविता को अपने युग की नई वास्तविकता के अनुरूप बताया। धर्मवीर भारती ने नई कविता को पुराने और नए मानव मूल्यों के टकराव से उत्पन्न तनाव की कविता कहा है। नई कविता में व्यक्ति स्वातंत्र्य की भावना भी प्रबल रही। मुक्तिबोध के अनुसार नई कविता की अपनी कोई विशेष दार्शनिक धारा या विचारधारा नहीं रही। उनके अनुसार नई कविता मूलतः एक परिस्थिति के भीतर पलते हुए मानद हृदय की पर्सनल सिचुएशन की कविता है।
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि नई कविता की कोई सुनिश्चित परिभाषा प्रस्तुत करना असंभव है। यहाँ तक सही है कि संपूर्ण नई कविता का संबंध अपने युग के यथार्थ से है। लेकिन इस यथार्थ को व्यक्त करने वाली भिन्न-भिन्न दृष्टियों है। इनमें कई दृष्टियाँ एक दूसरे से नितांत विरोधी भी हैं। नई कविता पर विचार करते हुए जहाँ एक ओर इस बात को ध्यान में रखना होगा कि उसका संबंध तत्कालीन यथार्थ से है वहीं उसमें अंतर्निहित विभिन्न दृष्टियों, काव्याभिरुचियों एवं कवि की वैयक्तिक क्षमताओं को भी ध्यान में रखना होगा।
नई कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ
व्यक्ति-स्वातंत्र्य
व्यक्ति-स्वातंत्र्य नई कविता की प्रमुख प्रवृत्ति कही जा सकती है। नई कविता आंदोलन के दौरान नए कवियों ने नए मनुष्य की प्रतिष्ठा का नारा दिया। यह नया मनुष्य कैसा हो, इसको लेकर उनमें तीव्र मतभेद था। कोई इसे लघु मानव (लक्ष्मीकांत वर्मा) की संज्ञा दे रहा था तो कोई इसे सहज मानव की (विजयदेव नारायण साही)। कोई इसे स्वतंत्रता का असली प्रवक्ता बता रहा था तो कोई इसे भीड़ से घिरा अकेला और एकाकी। लेकिन यह मानव मध्यवर्ग का ही प्रतिनिधि था। यह मध्यवर्गीय व्यक्ति अपने को व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का प्रबल पक्षधर मानता था।
आस्था और अनास्था
नई कविता के दौरान आस्था का प्रश्न भी महत्वपूर्ण रहा। नए कवियों का कहना था कि हमारा काव्य अगर अनास्थावादी लगता है तो इसलिए कि आज की सच्चाई यही है। उनके अनुसार, नई कविता वादों, विचारधाराओं, रुढ़ियों, सामूहिकों निर्णयों पर झूठी आस्था का विरोध करती है। वह नियतिवादी भविष्य के भ्रम जालों और आशा के झूठे जंजालों पर विश्वास नहीं करती। नई कविता व्यक्ति के अपने विवेक पर आस्था व्यक्त करती है।
अनुभूतिपरकता
नई कविता में अनुभूति की अभिव्यक्ति पर विशेष बल दिया गया है। अज्ञेय यह मानते हैं कि संसार की अनुभूतियाँ और घटनाएँ साहित्यकार के लिए मिट्टी हैं, जिनसे वह प्रतिमा बनाता है। लेकिन नए कवि अनुभूति की विशिष्टता पर विशेष बल देते हैं।
नई कविता के कवि
प्रयोगवादी काव्य की जो भी विशेषताएँ और सीमाएँ हैं उन्हें श्रेष्ठ रूप में अज्ञेय के काव्य में देख सकते हैं। अज्ञेय का पहला काव्य-संग्रह ‘भग्नदूत’ (1933) में प्रकाशित हुआ। चिंता (1942) और इत्यलम् (1946) तक की कविताओं में प्रयोगवादी रुझान बहुत साफ़ उभरकर सामने नहीं आया था। लेकिन 1949 में प्रकाशित ‘हरी घास पर क्षण भर’ में प्रयोगवाद को स्पष्ट पहचाना जा सकता है। अज्ञेय की आरंभिक कविताओं पर छायावाद का प्रभाव भी देखा जा सकता है। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अनुसार ‘मुक्ति और जीने की लालसा या कहें स्वातंत्र्य की खोज ही अज्ञेय के काव्य की सही जमीन है।’ अज्ञेय की कविताओं में प्रकृति के प्रति विशेष लगाव के दर्शन होते हैं। उनके अधिकांश प्रिय प्रतीक भी प्राकृतिक हैं जैसे नदी, तट, मछली, सागर चिड़िया, चाँदनी, इंद्रधनुष, साँझ आदि। इसके विपरीत उनकी कविताओं में शहरी जीवन के प्रति गहरी वितृष्णा के दर्शन भी होते हैं। औद्योगिक बस्ती, साँप, हवाई यात्रा, ऊँची उड़ान, बड़े शहर का एक साक्षात्कार, पश्चिम के समूह जन, हिरोशिमा आदि कविताओं में आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के प्रति उनके गहरे अलगाव को व्यक्त करने वाली कविताएँ हैं। अज्ञेय ने अपनी कविताओं में काव्य सत्य पर विचार किया है। जिजीविषा और सत्य की निरंतर खोज उनकी कविताओं के प्रिय विषय रहे हैं। उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं :- बावरा अहेरी (1954), इंद्रधनु रौंदे हुए ये (1957), अरी ओ करुणा प्रभामय (1959), आँगन के पार द्वार (1961), कितनी नावों में कितनी बार (1967), आदि।
अज्ञेय ने काव्य संबंधी समस्याओं पर निरंतर लेखन किया है। त्रिशंकु (1945), आत्मनेपद (1960) और हिंदी साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य (1967), में उनके साहित्य संबंधी लेखों को संग्रहीत किया गया है।
गिरिजाकुमार माथुर - गिरिजाकुमार माथुर ने काव्य-यात्रा की शुरूआत मंजीर (1941) से की थी। उनके काव्य की ज़मीन प्रेम और सौंदर्य है। नाश और निर्माण (1946), धूप के धान (1955), जो बंध न सका (1968) उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। नारी प्रेम और प्रकृति प्रेम उनकी कविताओं के मुख्य विषय हैं। गेयता उनके काव्य की ख़ास पहचान है। वे काव्य में नाद-सौंदर्य को प्रमुख स्थान देते हैं। अज्ञेय की तरह उनकी सौंदर्य-चेतना सामाजिक जीवन से निरपेक्ष नहीं है। प्रेम और सौंदर्य दोनों ही संसार के बीच आकार लेते हैं। उनकी कविता में दैहिकता अधिक है, कल्पनाशीलता कम है। प्रयोगवादी कवियों में रूमानियत का सबसे अधिक प्रभाव गिरिजाकुमार माथुर पर ही रहा है। नई कविता के दौर तक आते-आते उनमें यह रूमानियत कम हुई है।
भारतभूषण अग्रवाल - भारतभूषण अग्रवाल का प्रथम काव्य-संग्रह छवि के बंधन (1941) पर छायावाद का और दूसरा काव्य संग्रह जागते रहो (1942) पर प्रगतिवाद का प्रभाव था। तीसरा संग्रह मुक्तिमार्ग (1947) में उन्होंने अपना अलग रास्ता खोजा। भारतभूषण अग्रवाल की कविताओं में मुख्यतः दर्द की अभिव्यक्ति हुई है, अपनी भी और जगत् की भी। इस दर्द की अभिव्यक्ति कहीं त्रासदी रूप में है तो कहीं व्यंग्य रूप में है। प्रयोग की प्रवृत्ति भारतभूषण अग्रवाल में भी है लेकिन उनकी कविताएँ वक्तव्य-प्रधान अधिक है। प्रतीक भी सामान्य और सरल हैं। कविता में भावनाओं की गहराई या जटिल वैचारिकता का अभाव है। उनके अन्य प्रमुख काव्य संग्रह हैं :- ओ अप्रस्तुत मन (1959), अनुपस्थित लोग (1965), एक उठा हुआ हाथ (1970) तथा उतना वह सूरज है (1977) आदि।
नरेश मेहता - नरेश मेहता नई कविता के अन्य प्रमुख कवि हैं। इन पर भी आरंभ में प्रगतिवाद का प्रभाव था। नरेश मेहता की कविता में भी प्रकृति के प्रति गहरे लगाव के दर्शन होते हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति अपने विविध रूपों में आती है। नदी, झील, आकाश, बादल, सूरज, चाँद, चिड़िया, फूल, वसंत, पहाड़, घाटी, सावन आदि कई रूपों में प्रकृति उनकी कविताओं में मौजूद है। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अनुसार, “नरेश जी की कविता में असंख्य प्रकृति-चित्रों को देखकर लगता है जैसे कवि मन पर प्रकृति का जादू हो। जहाँ भी प्राकृतिक दृश्य आते हैं उनका वर्णन कवि बड़े उल्लास के साथ करता है।” नरेश मेहता की कविता में, उषा, धूप और किरन का वर्णन सबसे अधिक हुआ है। ‘दूसरा सप्तक’ में नरेश मेहता की कविताएँ संकलित हैं। ‘संशय की एक रात’ (1962) उनकी प्रसिद्ध काव्य रचना है। समय देवता’ उनकी लंबी कविता है। उनके प्रमुख संग्रह हैं :- ‘वन पाखी! सुनो!!’ (1957), ‘बोलने दो चीड़ को’ ‘मेरा समर्पित एकांत’ (1962)।
शमशेर और मुक्तिबोध दोनों का संबंध प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता तीनों से रहा है। इन तीनों कवियों में यद्यपि प्रयोगशीलता की प्रवृत्ति काफ़ी मुखर रही है। परंतु वैचारिक दृष्टि से इन्हें प्रयोगवादी नहीं कहा जा सकता।
शमशेर बहादुर सिंह - शमशेर बहादुर सिंह यद्यपि वैचारिक दृष्टि से मार्क्सवादी कवि हैं, परंतु उनका कवि सौंदर्यवादी है। शमशेर में प्रयोग की प्रवृत्ति अधिक है। उनकी कविता में सूक्ष्म और संश्लिष्ट अनुभवों की अभिव्यक्ति अधिक हुई है। उनका झुकाव अमूर्तन की ओर अधिक है यही कारण है कि कहीं-कहीं उनकी कविता दुरूह भी हो जाती है। लेकिन परिष्कृत बिंब, उत्कृष्ट शिल्प और आत्मीयता का भाव उनकी कविताओं को असामान्य भी बनाता है। शमशेर भी ‘दूसरा सप्तक’ के कवि हैं। इसके अतिरिक्त उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं :- कुछ कविताएँ (1959), कुछ और कविताएँ (1961), चुका भी हूँ नहीं मैं (1975)।
मुक्तिबोध - मुक्तिबोध आत्मसंघर्ष के कवि हैं। उनकी कविताएँ उनके आत्मसंघर्ष का ही प्रतिफलन हैं, लेकिन आत्मसंघर्ष बाहरी संघर्ष से उत्प्रेरित हैं। इसके पीछे वैयक्तिक आकांक्षा या अहम् का भाव नहीं है। मुक्तिबोध वस्तुतः तीखे सामाजिक अनुभवों के कवि हैं। सामाजिक संघर्ष ही उनके आत्म संघर्ष का कारण है। सामाजिक यथार्थ उनकी कविताओं में ‘अँधेरे’ के रूप में मौजूद है। अँधेरा उनकी कविताओं में बार-बार भिन्न-भिन्न रूपों में आता है। यथार्थ उनके यहाँ भयावह ख़बर की तरह है। उनकी कविताएँ प्रायः बहुत लंबी होती हैं जिनमें सामाजिक यथार्थ और आत्मसंघर्ष मिलकर ऐसी फैंटसी का निर्माण करती हैं जो हिंदी कविता की अमूल्य निधि है। उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं :- ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ और ‘भूरी-भूरी खाक धूल’।
धर्मवीर भारती - धर्मवीर भारती नई कविता के प्रमुख कवियों में से हैं। उन्होंने पद्य के अतिरिक्त गद्य भी लिखा है। काव्य में उनका गीतिनाट्य ‘अंधायुग’ सर्वाधिक चर्चित रचना है, जिसमें ‘महाभारत’ के अठारहवें दिन की घटनाओं को कथा का आधार बनाया गया है। ‘कनुप्रिया’ डॉ. भारती द्वारा रचित खंडकाव्य है जिसमें राधा-कृष्ण के प्रेम को कथा का आधार बनाया गया हैं। ‘ठंडा लोहा’ और ‘सात गीत वर्ष’ उनके चर्चित काव्य संग्रह हैं। डॉ. भारती की कविताएँ ‘दूसरा सप्तक’ में भी संग्रहीत की गई हैं। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अनुसार, ‘भारती का रचनाकार एक अर्थ पाने के लिए बेचैन है और इसके लिए वह किसी नई भावभूमि की खोज करना चाहता है। भारती ने अपने काव्य द्वारा ‘अंधे संशय, दासता, पराजय से मानव भविष्य को बचाने के लिए मानवीय संभावनाओं की खोज’ की है। इसके लिए उन्होंने मिथकों की नई व्याख्याएँ की हैं। धर्मवीर भारती ने नारी प्रेम और प्रकृति के संबंध में भी कविताएँ लिखी हैं। प्रकृति और नारी-प्रेम दोनों के प्रति उनकी दृष्टि रूमानी है। ‘अंधायुग’ को छोड़कर उनके प्रायः संपूर्ण काव्य की भाषा पर रूमानीपन का प्रभाव देखा जा सकता है।
कुँवर नारायण - कुँवर नारायण के काव्य को विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ‘बृहत्तर जिज्ञासा का काव्य’ कहा है। वस्तुतः कुँवर नारायण ने अपने काव्य में ऐसे सवालों को उठाया है जिनका संबंध मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व से है। उनका खंड काव्य ‘आत्मजयी’ इसका ज्वलंत उदाहरण है जिसमें नचिकेता की कथा के माध्यम से जीवन-मृत्यु के शाश्वत प्रश्नों पर विचार किया गया है। कुँवर नारायण की प्रवृत्ति चिंतन की ओर अधिक है इसलिए उनकी काव्य-भाषा में भी हम यह बात देख सकते हैं। ‘आत्मजयी’ के अतिरिक्त उनके महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह हैं :- चक्रव्यूह (1956), परिवेश : हम-तुम (1961) इन दिनों (2002), वाजश्रवा के बहाने (2008)। कुँवर नारायण की कविताएँ ‘तीसरा सप्तक’ में भी संग्रहीत हैं।
रघुवीर सहाय - रघुवीर सहाय नई कविता के उन कवियों में हैं जिनका प्रभाव समकालीन कविता पर सबसे अधिक पड़ा है। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अनुसार रघुवीर सहाय का काव्य-संसार मामूली, अभावग्रस्त और उपेक्षित ज़िंदगी का संसार है। उनकी कविताओं में बदलाव की बड़ी-बड़ी बातें तो नहीं है परंतु वे हमारे समकालीन यथार्थ को तल्ख़ी और संवेदना के साथ पेश करते हैं। रघुवीर सहाय की कविताएँ संकीर्ण अर्थों में राजनीतिक नहीं हैं। किसी मत विशेष के प्रति आग्रही न होने के बावजूद उनकी कविताएँ प्रबल रूप से जनपक्षीय हैं। भाषा को भी उन्होंने नया तेवर दिया है। व्यंग्य, सपाटबयानी और बिंबात्मकता तीनों का उन्होंने सर्जनात्मक प्रयोग किया है। उनके प्रमुख संग्रह हैं :- सीढ़ियों पर धूप में (1960) आत्महत्या के विरुद्ध (1967), हँसो हँसो जल्दी हँसो (1975) लोग भूल गए हैं (1982)। रघुवीर सहाय की कविताएँ ‘दूसरा सप्तक’ (1951) में भी संग्रहीत हैं।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता यात्रा में कई मोड़ आए हैं। आरंभ में उन पर नई कविता की व्यक्तिवादी धारा का प्रभाव था, बाद में वे प्रगतिशील काव्यधारा की ओर झुके। सर्वेश्वर की कविताओं में एक प्रकार की निजता और आत्मीयता हमेशा रही है। वे सामाजिक जागरूकता के कवि हैं और सामाजिक यथार्थ के विभिन्न पक्षों को अपनी कविताओं का विषय बनाते हैं। सर्वेश्वर ‘तीसरा सप्तक’ (1959) के कवि हैं। उनकी विभिन्न रचनाओं का पहला संग्रह ‘काठ की घटियाँ’ (1959) है जिसमें भी कविताएँ संग्रहीत हैं। इनके अतिरिक्त ‘गर्म हवाएँ’ (1969), ‘जंगल का दर्द’ (1976) आदि प्रमुख काव्य संग्रह हैं।
केदारनाथ सिंह - केदारनाथ सिंह भी ‘तीसरा सप्तक’ के कवि हैं। तीसरा सप्तक के अतिरिक्त उनकी कविताएँ ‘अभी बिल्कुल अभी’ संग्रह में संकलित हैं जो 1960 में प्रकाशित हुआ था। इसके बीस साल बाद ‘जमीन पक रही है’ (1980) नामक नया काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ है। परमानंद श्रीवास्तव के अनुसार, ‘केदारनाथ सिंह का काव्य संसार आज के भारतीय समाज के प्रति गहरी संवेदनात्मक उन्मुखता या लगाव प्रमाणित करने वाला संसार है। केदारनाथ सिंह भी उन कवियों में हैं जिन पर नई कविता की नकारात्मक प्रकृतियों का प्रभाव लगभग न के बराबर रहा है। यही कारण है कि केदारनाथ सिंह आज भी उतने ही सक्रिय, सृजनशील और सार्थक नज़र आते हैं। केदारनाथ सिंह की काव्य यात्रा धीरे-धीरे नई कविता की व्यक्तिवादी धारा से मुक्त होती हुई जनपक्षीय प्रगतिशील धारा की ओर बढ़ती रही है। केदारनाथ सिंह बिंबों को काव्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानते रहे हैं। काव्य-भाषा की दृष्टि से भी उनकी कविता में ताजगी, सरलता, पारदर्शिता और सर्जनात्मकता के दर्शन होते हैं। उनके अन्य महत्वपूर्ण काव्य संग्रह हैं :- यहाँ से देखो, अकाल में सारस, तालस्ताय और साइकिल तथा सृष्टि पर पहरा।
श्रीकांत वर्मा - श्रीकांत वर्मा का पहला काव्य संग्रह ‘भटका मेघ (1957) है जिसमें कवि का धरती और मनुष्य के प्रति लगाव व्यक्त हुआ है। लेकिन बाद के संग्रहों में इनमें व्यक्तिवादी प्रवृत्ति प्रबल होती गई है। मध्यवर्ग व्यक्ति की आत्मबद्धता, निराशा, विफलता, पराजय और अपराधबोध के भावों को श्रीकांत वर्मा ने अपनी कविताओं में अत्यंत तीखेपन से व्यक्त किया है। श्रीकांत वर्मा के काव्य में वक्तव्य और सपाटबयानी की प्रमुखता है जो नई कविता के बाद के काव्य की प्रमुख विशेषता है। भटका मेघ के अतिरिक्त प्रमुख काव्य संग्रह हैं :- ‘दिनारंभ’ (1967), ‘माया दर्पण’ (1967), ‘जलसाघर’ (1973), ‘मगध, (1984), ‘गरुड़ किसने देखा’ है (1987)।
समकालीन कविता (वर्ष 2000 तक)
समकालीन कविता का समय मोटे तौर पर 1980 से आज तक का माना जाता है। कुछ लोग इसे 1975 से भी मानते हैं। तथ्य-संवेदना और रूप में यह कविता किसी भी विदेशी आंदोलन या विचारधारा की नक़्ल नहीं है। यह हमारे ही परिवेश की समाज संस्कृति की, जीवन जगत की स्थिति परिस्थिति से उपजी कविता है। इसमें हमारा देश पूरी तरह मौजूद है। जन-जन की व्यथा कथा का इसमें सच्चा इतिहास है।
प्रमुख प्रवृत्तियाँ :-
समकालीन कविता की कोई एक दिशा नहीं है। इसमें अनेक परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों दिखाई देती हैं। इनमें से भी कुछ प्रवृत्तियाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, कुछ बीज रूप में मौजूद है।
व्यवस्था से विद्रोह
इस दौर में वे कवि भी सक्रिय रहे, जिन्होंने अकविता और उसके बाद के दौर में अतिक्रांतिकारी एवं विद्रोही कविताएँ लिखी थीं। उनकी कविताओं का स्वर बदला हुआ दिखाई देता है। उदाहरण के लिए लीलाधर जगूड़ी और वेणु गोपाल को लिया जा सकता है।
कविता में ख़बर
समकालीन कविता की इस प्रवृत्ति का प्रारंभ रघुवीर सहाय से होता है। रघुवीर सहाय ने पहली बार ख़बर को कविता में स्मांतरित किया। अब तक यह माना जाता रहा है कि ख़बर और कविता अलग-अलग हैं। ख़बर तथ्यात्मक और गैर-काव्यात्मक घटना है, जबकि कविता में भाव, संवेदनाएँ और इंद्रिय बोध रहता है। इसलिए कविता अधिक मानवीय अभिव्यक्ति है। रघुवीर सहाय ने इस द्वैत को तोड़ा। उन्होंने दिखाया कि ख़बर का भी एक मानवीय और भावात्मक पक्ष है।
आत्मऔचित्य की स्थापना
नई कविता के कवियों पर टिप्पणी करते हुए मुक्तिबोध ने लिखा था कि नया कवि आत्म औचित्य की स्थापना करता है। समकालीन कविता में इस प्रवृत्ति के अनेक रूप मिलते हैं।
डायरी का अनुभव और कविता
आज का युग मीडिया का युग है। सूचनाओं के इस दबाव में कई कवियों ने कुछ ऐसी बातों पर कविताएँ लिखी हैं, जिन्हें ख़बरों में, अख़बारों में, राजनीतिक वक्तव्यों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यहीं समकालीन कविता डायरी के अनुभव के क़रीब पहुँच जाती है।
समकालीन हिंदी काव्यधारा के प्रमुख कवि
विष्णु खरे - विष्णु खरे का जन्म 09 फ़रवरी 1940 को छिन्दवाड़ा (मध्य प्रदेश) में हुआ। सन् 1960 में प्रकाशित टी. एस. इलियट की प्रसिद्ध कविता ‘वेस्ट लैण्ड’ का हिंदी अनुवाद उनकी पहली प्रकाशित कृति है। ‘वयम्’ पत्रिका का उन्होंने संपादन किया। सन् 1970 में उनका पहला कविता संग्रह ‘एक गैर रूमानी समय में’ प्रकाशित हुआ। उन्होंने असंख्य विदेशी रचनाओं का हिंदी में तथा कई महत्वपूर्ण हिंदी कवियों की कविताओं का अँग्रेज़ी एवं जर्मन में अनुवाद किया। ‘ख़ुद अपनी आँख से’, ‘सबकी आवाज़ के पर्दे में’ ‘पिछला बाक़ी’ ‘काल और अवधि के दरमियान’ और ‘अन्य कविताएँ’ (कविता संग्रह) तथा ‘आलोचना की पहली किताब’ (आलोचना) उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ है।
मंगलेश डबराल - मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई 1948 को गढ़वाल ज़िले के काफलपानी गाँव में हुआ। प्रतिष्ठित हिंदी कवि के रूप में उन्होंने कई देशों की यात्राएँ कीं। उनका पहला संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’ सन् 1981 में प्रकाशित हुआ। उन्हें ओम प्रकाश स्मृति सम्मान, श्रीकांत वर्मा पुरस्कार, साहित्य अकादेमी सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। ‘घर का रास्ता’, ‘हम जो देखते हैं’ ‘नए युग में शत्रु’ (कविता संग्रह) उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ है।
विनोद कुमार शुक्ल - विनोद कुमार शुक्ल का जन्म सन् 1937 में मध्य प्रदेश में हुआ। सन् 1971 में उनका पहला संग्रह पहचान सीरीज के अंतर्गत प्रकाशित हुआ। उनकी कई रचनाएँ मराठी, मलयालम, उर्दू, अँग्रेज़ी और जर्मन भाषाओं में अनूदित एवं प्रकाशित हैं। उन्हें मध्य प्रदेश शासन का गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप सन् 1975-76 के लिए दिया गया। सन् 1981 में मध्य प्रदेश कला परिषद का रजा पुरस्कार - ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह’ कविता संग्रह के लिए दिया गया। उन्हें दयावती मोदी कविशेखर सम्मान, साहित्य अकादेमी एवं ज्ञानपीठ सम्मान से भी सम्मानित किया गया। ‘लगभग जय हिंद’ ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ ‘कविता से लंबी कविता’, ‘आकाश धरती को खटखटाता है’ (कविता संग्रह), ‘नौकर की कमीज’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ (उपन्यास) ‘पेड़ पर कमरा’ (कहानी संग्रह) उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं।
राजेश जोशी - राजेश जोशी का जन्म सन् 1946 में मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ में हुआ। प्रारंभ में उन्होंने वातायन, लहर पहल, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका के लिए विशेष रूप से स्वतन्त्र लेखन किया, फिर बाद में ‘नया विकल्प’ ‘नया पथ’ और ‘वर्तमान साहित्य’ के संपादन कार्य में अपना प्रचुर अवदान दिया। इसी बीच उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की। उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं ‘एक दिन बोलेंगे पेड़, दो पंक्तियों के बीच ‘चाँद की वर्तनी’ (कविता संग्रह), ‘समरगाथा’ (लंबी कविता) समवर और अन्य कहानियाँ, कपिल का पेड़ (कहानी संग्रह) आदि। इसके अलावा राजेश जोशी ने नाटक एवं बच्चों के लिए कई महत्वपूर्ण गीत भी लिखे हैं। उनकी कई रचनाएँ अँग्रेज़ी, उर्दू, रूसी एवं जर्मन भाषाओं सहित कई अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित हैं। उन्हें मुक्तिबोध पुरस्कार, माखन लाल चतुर्वेदी पुरस्कार श्रीकांत वर्मा स्मृति सम्मान, शिखर सम्मान, और सन् 2002 में ‘दो पंक्तियों के बीच’ कविता संग्रह के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
अशोक वाजपेयी - अशोक वाजपेयी का जन्म सन् 1941 में हुआ। भारतीय प्रशासनिक सेवा में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए उन्होंने विविध सांगठनिक कार्य किए। कई विधाओं में उनकी कृतियाँ प्रकाशित और प्रशंसित हैं। उनके महत्वपूर्ण प्रकाशन हैं ‘शहर अब भी सम्भावना है’, ‘कहीं नहीं वहीं’ ‘तत्पुरुष’, ‘बहुरि अकेला’, ‘इबारत से गिरी मात्राएँ’, ‘उम्मीद का दूसरा नाम’, ‘विवक्षा घास में दुबका आकाश’ (कविता संग्रह); ‘फिलहाल’, ‘कुछ पूर्वग्रह’, ‘समय से बाहर, ‘कविता का गल्प’ (आलोचना), आदि। इसके अलावा उन्होंने अनुवाद में भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। उनकी रचनाएँ कई भारतीय भाषाओं तथा अन्य विदेशी भाषाओं में अनूदित हैं। उन्हें साहित्य अकादेमी सम्मान, दयावती मोदी कविशेखर सम्मान सहित कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया है। वे महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रथम कुलपति रह चुके हैं।
अरुण कमल - अरुण कमल का जन्म 15 फ़रवरी 1954 को नासरीगंज (रोहतास, बिहार) में हुआ। काव्य-लेखन के लिए उन्हें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार, रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार, शमशेर सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। ‘नए इलाके में’ कविता संग्रह के लिए उन्हें सन् 1998 में साहित्य अकादेमी सम्मान दिया गया। अफ्रो एशियाई युवा लेखक सम्मेलन, ब्राजाविले में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे कुछ समय तक सुप्रसिद्ध हिंदी पत्रिका ‘आलोचना’ के संपादन से संबद्ध रहे। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं ‘अपनी केवल धार, ‘सबूत’, ‘नए इलाके में’ ‘पुतली में संसार’ (कविता संग्रह): गोलमेज (आलोचनात्मक निबंध)। इसके अलावा वियतनामी कवि तोहू की कविताओं एवं टिप्पणियों की एक अनुवाद पुस्तिका तथा अँग्रेज़ी में वायसेज नाम से भारतीय युवा कविता की पुस्तक भी प्रकाशित है। उनकी कविताएँ कई भारतीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में अनूदित हैं।
समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता
हिंदी साहित्य की गद्य विधाएँ
हिंदी उपन्यास : भारतीय उपन्यास की अवधारणा। प्रेमचंद पूर्व उपन्यास, प्रेमचंद और उनका युग। प्रेमचंद के परवर्ती उपन्यासकार (वर्ष 2000 तक)।
हिंदी उपन्यास : भारतीय उपन्यास की अवधारणा
हिंदी में लाला श्रीनिवास दास के उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’ पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने टिप्पणी की थी कि वह हिंदी में अँग्रेज़ी ढंग का पहला उपन्यास है। संभवतः इसके साथ ही यह धारणा प्रचलित हो गई कि हिंदी में सामाजिक उपन्यास लिखने का चलन अँग्रेज़ी के अनुकरण पर ही हुआ जबकि सच्चाई यह है कि भारतीय भाषाओं में ठेठ भारतीय विषयवस्तु पर उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति का आरंभ इससे कहीं पहले हो चुका था।
डॉ. नामवर सिंह ने अपने एक लेख ‘अंग्रेज़ी ढंग का नावेल और भारतीय उपन्यास’ में बंकिमचंद्र के तीन उपन्यासों ‘दुर्गेशनंदिनी’ (1865), ‘कपालकुंडला’ (1866), और ‘मृणालिनी’ (1869) का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि इन तीनों उपन्यासों में से एक भी ‘अँग्रेज़ी ढंग’ का नावेल नहीं है, उसी तरह जैसे हिंदी में ठाकुर जगमोहन सिंह का ‘श्यामा स्वप्न’। उनके अनुसार बंकिमचंद्र के उपन्यास संस्कृत की ‘कादम्बरी’ की याद दिलाते हैं, अर्थात् भारतीय परंपरा में आते हैं। इस ढंग के भारतीय उपन्यासों को डॉ. नामवर सिंह ने नाम दिया ‘रोमांस’। उनका कहना है कि ‘भारतीय मानस’ का सही प्रतिनिधित्व ‘कपाल कुंडला’ करती है ‘परीक्षा गुरु’ नहीं। उन्होंने लगे हाथों यह भी कहा कि ‘परीक्षा गुरु’ का महत्व अधिक से अधिक ऐतिहासिक है और वह भी सिर्फ़ हिंदी के लिए। उनके अनुसार “बंकिमचंद्र के रोमांसधर्मी उपन्यास ने भारतीय राष्ट्र और भारतीय उपन्यास की अपनी पहचान बनाने में पहल की।”
जिस समय बंगला के बंकिमचंद्र ‘रोमांस’ की शैली में भारतीय उपन्यास की रचना कर रहे थे। उसी के आसपास तेलुगु में दूसरे ढंग के उपन्यासों की रचना की शुरुआत हो रही थी। इन उपन्यासों में दलित-विमर्श की आरंभिक आहटें सुनाई पड़ती हैं। तेलुगु में 1872 ई. में नरहरि गोपाल कृष्णाम्मा चेट्टि ने ‘श्री रंगराया चरित्र की, और 1875 ई. में कंडुकुरी वीरसलिंगम पंतुहा ने ‘श्री राजशेखर चरित्र’ की रचना की।
भारतीय उपन्यास के सामने भारतीय होने की पहली शर्त थी उपनिवेशवाद के मूर्त रूप अँग्रेज़ी शासन का विरोध और प्रतिरोध करना। इसी चेतना को लक्ष्य करते हुए नामवर सिंह ने निष्कर्ष निकाला कि ‘उपन्यास ने यदि राष्ट्र का रूप निर्मित किया तो राष्ट्रीय कल्पना ने उपन्यास के रूप-निर्माण में भी नियामक भूमिका अदा की। इस प्रकार राष्ट्र-निर्माण और उपन्यास के बीच द्वंद्वात्मक संबंध है। इस द्वंद्व के कारण ही उन्नीसवीं शताब्दी के अधिकांश भारतीय उपन्यास ‘राजनीतिक’ हैं। कथानक चाहे ऐतिहासिक हो चाहे सामाजिक अथवा नितांत निजी प्रेम की कहानी, अंततः उनसे कोई न कोई राजनीतिक अर्थ ध्वनित होता है। संभवतः इसी बात को लक्षित करते हुए अमेरिका के प्रसिद्ध मार्क्सवादी समालोचक फ्रेडरिक जेम्सन ने “भारत-सहित तीसरी दुनिया के सभी देशों के उपन्यासों को ‘नेशनल एलिगरी’ (राष्ट्रीय रूपक) कहा है।”
भारतीय उपन्यास की सबसे बड़ी पहचान यह है कि उसमें समाज में होने वाली किसी महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक घटना को कभी अनदेखा नहीं किया गया। भारतीय इतिहास में बीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी घटना देश के विभाजन की त्रासदी थी। इस घटना के देश को विषय बनाकर लिखे गए भारतीय उपन्यासों और कहानियों की सूची खासी लंबी है। कुछ महत्वपूर्ण नाम है यशपाल का ‘झूठा सच’ भीष्म साहनी का ‘तमस’, राही मासूम रजा का ‘आधा गाँव’, कृष्णा सोबती का ‘ज़िंदगीनामा’, ज्योतिर्मयी देवी का ‘एपार गंगा ओपार गंगा’, इंतिज़ार हुसैन का ‘बत्ती’, अब्दुल्ला हुसैन का ‘उदास नस्लें’, मुकुल केशवन का ‘लुकिंग थ्रू ग्लास’, बाप्सी सिदवा का ‘द आइस कैंडी मैन’। इन उपन्यासों में विभाजन से पहले की साझी संस्कृति में हिस्सेदारी की स्मृति और बाद में उसके बीचोंबीच से चाक कर दिए जाने का देश तो अपनी जगह है ही, इसके अलावा हिंदू मुस्लिम, सिखों के बीच अलग-अलग रीति-रिवाज़ों और जीवन-शैली की निष्क्रिय स्वीकृति ही नहीं बल्कि सामाजिक सबंधों के बीच दैनंदिन आपसी व्यवहार में इस साझी संस्कृति का प्रतिफलन इनमें महसूस किया जा सकता है।
ऐतिहासिक रोमांस और यथार्थ केंद्रित सामाजिक उपन्यास इस बात का प्रमाण है कि भारतीय उपन्यास उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक एक निजी स्वरूप विकसित कर चुका था और उसकी अपनी अस्मिता कायम हो गई थी। इस अस्मिता का निर्माण अँग्रेज़ी नॉवेल की नकल करके नहीं, अँग्रेज़ी उपनिवेशवाद के विरोध में हुआ था। इस उपन्यास का मूल किस परंपरा से जुड़ा था, इस बात का प्रमाण है कि मराठी में उपन्यास के लिए ‘कादम्बरी’ संज्ञा का प्रयोग किया जाता है जो इस विधा के संस्कृत मूल की ओर संकेत करता है। सभी भारतीय भाषाओं में बाणभट्ट की औपन्यासिक शैली और गद्य-विन्यास का अनुसरण भले ही नहीं हुआ हो पर इसमें संदेह नहीं कि आरंभिक दौर के इन उपन्यासों की मूल संवेदना और सरोकार पूर्णतः जातीय है।
प्रेमचंद पूर्व उपन्यास
हिंदी में 1860 ई. के पूर्व कथा साहित्य अत्यंत अविकसित अवस्था में था। पर इस दशक के अंतिम वर्ष की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना पं. गौरीदत्त रचित देवरानी-जेठानी की कहानी (1870 ई.) का प्रकाशन है। यह हिंदी की पहली मौलिक कथा पुस्तक है जिसमें एक यथार्थवादी कथा संसार की रचना की गई है। हिंदी उपन्यास का प्रारंभ यहीं से माना जाना चाहिए। पं. गौरीदत्त ने अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखा है, स्त्रियों को पढ़ने-पढ़ाने के लिए जितनी पुस्तकें लिखी गई हैं सब अपने अपने ढंग और रीति से अच्छी है परंतु मैंने इस कहानी को नये रंग-ढंग से लिखा है। कथा का यही ‘नया रंग ढंग’ उपन्यास को जन्म देता है।
शताब्दी के आठवें दशक में ‘देवरानी जेठानी की कहानी के ढंग की दो और पुस्तकें लिखी गयीं। मुंशी ईश्वरी प्रसाद और मुंशी कल्याण राय द्वारा लिखित ‘वामा शिक्षक’ (1872 ई.) तथा पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी लिखित ‘भाग्यवती (1877 ई.)। भाग्यवती की रचना भी हिंदू स्त्रियों को गार्हस्थ धर्म का उपदेश देने के निमित्त ही हुई थी। यह भी मूलतः उपदेशाख्यान कोटि की ही रचना है। पर इसमें तत्कालीन हिंदू समाज की अनेक कुरीतियों-यथा बाल-विवाह, विवाहोत्सव संबंधित अंधविश्वास, श्राद्धकर्म संबंधी प्रपंच और अपव्यय आदि का यथार्थवादी अंकन है। इस प्रकार नारी का आदर्श रूप प्रस्तुत करना और उपदेश देना मुख्य लक्ष्य होते हुए भी इसमें यथार्थ चित्रण का आग्रह है जो इसे ‘उपन्यास’ के निकट ला देता है।
पं. गौरीदत्त और पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी दोनों में से किसी ने भी अपनी रचना को ‘उपन्यास’ की संज्ञा नहीं दी। यद्यपि उपन्यास पद का प्रथम प्रयोग 1875 ई. में ही ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ में प्रकाशित एक कहानी के लिए हो चुका था और पं. बालकृष्ण भट्ट का ‘रहस्य कथा उपन्यास भी ‘हिंदी प्रदीप’ के नवंबर 1879 ई. अंक से प्रकाशित होना शुरू हो चुका था पर ‘उपन्यास’ नाम से लिखित हिंदी की पहली पुस्तक राधाकृष्ण दास कृत ‘निरसहाय हिंदू’ है। इसकी रचना 1881 ई. में हुई थी (यद्यपि इसका प्रकाशन 1890 ई. में हुआ था)। ‘निस्सहाय हिंदू’ में तत्कालीन जीवन का विश्वसनीय चित्र प्रस्तुत किया गया है। इसका मुख्य प्रतिपाद्य गोवध समस्या है। कथा की आश्चर्यजनक नवीनता इस बात में है कि इसमें एक मुसलमान पात्र गोवध निवारण के लिए अपनी जान दे देता है। हिंदू पात्र और मुसलमान पात्र के बीच सच्ची दोस्ती का चित्रण करके कथाकार ने हिंदू-मुस्लिम एकता को भी सामने लाने का प्रयास किया है।
उन्नीसवीं सदी के नवें दशक में ‘निस्सहाय हिंदू’ के अतिरिक्त प्रकाशित होने वाली प्रमुख रचनाएँ लाला श्रीनिवास दास कृत ‘परीक्षा गुरु’ (1882 ई.), ठाकुर जगन्मोहन सिंह कृत ‘श्यामा स्वप्न’ (1885 ई.), पं. बालकृष्ण भट्ट कृत ‘नूतन ब्रह्मचारी’ (1886 ई.) तथा किशोरीलाल गोस्वामी कृत ‘प्रणयिनी परिणय’ (1887 ई.), त्रिवेणी व सौभाग्य श्रेणी (1888) ई.) और ‘स्वर्गीय कुसुम व कुसुम कुमारी’ (रचना काल-1877 ई., प्रकाशन वर्ष 1901 ई.) हैं।
हिंदी उपन्यास की विकास यात्रा की एक उल्लेखनीय रचना ठाकुर जगन्मोहन सिंह लिखित ‘श्यामा स्वप्न’ (रचना काल-1885, प्रकाशन वर्ष-1888) है जिसे उसके आवरण पृष्ठ पर हिंदी में ‘एक कल्पना’ और अँग्रेज़ी में ‘एन ओरिजिनल नॉवेल’ कहा गया है।
हिंदी उपन्यास की विकास यात्रा में उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम तथा बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशकों का महत्वपूर्ण योगदान है। सन् 1890 ई. के पूर्व हिंदी में उपन्यासोन्मुख गद्य कथाओं की रचना छिटपुट रूप में ही हुई। 1890 ई. के बाद हिंदी में तीन कथाकार लगभग एक साथ उभरे जिन्होंने अपने विपुल कथा-साहित्य से हिंदी उपन्यास को अलग-अलग ढंग से समृद्ध बनाया। ये कथाकार हैं—देवकीनंदन खत्री, किशोरीलाल गोस्वामी और गोपाल राम गहमरी।
देवकीनंदन खत्री मूलतः उर्दू दास्तानों की परंपरा के कथाकार हैं जिनके कथा-संसार की मूल प्रेरणा संभवतः ‘तिलस्में होशरूबा’ है। उन्होंने ‘चंद्रकांता’ (1891 ई.), ‘चंद्रकांता संतति’ (1894-1905 ई.) और ‘भूतनाथ’ (1907-1913 ई.) शीर्षक से लगातार चलने वाली तिलस्मी ऐयारी प्रधान कथाओं की शृंखला के रूप में एक बृहत् और जटिल कथा संसार का निर्माण कर न केवल तत्कालीन हिंदी पाठकों को वरन् उर्दू पाठकों को भी आकृष्ट किया। प्रसिद्ध है कि इन कथाओं को पढ़ने के लिए अनेक उर्दू के पाठकों ने हिंदी पढ़ना सीखा। निस्संदेह हिंदी पाठक वर्ग के निर्माण में देवकीनंदन खत्री की इन पुस्तकों का महत्वपूर्ण योगदान है।
इस काल के दूसरे महत्वपूर्ण कथा लेखक किशोरीलाल गोस्वामी हैं जिनकी अधिकांश कथा पुस्तकें, स्वयं लेखक के साक्ष्य पर, लिखी तो गईं 1890-1900 ई. की अवधि में ही, पर प्रकाशित 1901-1915 ई. की अवधि में हुई। गोस्वामी जी के दो उपन्यास ‘प्रणयिनी परिणय’ (रचना काल- 1887 ई.) और ‘त्रिवेणी वा सौभाग्य श्रेणी (रचनाकाल - 1888 ई.) 1890 ई. में प्रकाशित हो चुके थे, पर शेष उपन्यास जिनकी संख्या इन्हें छोड़कर 27 है, 1900 ई. के बाद ही प्रकाशित हुए। गोस्वामी जी हिंदी में ऐतिहासिक रोमांस के प्रवर्तक हैं। इन्होंने कुल 12 ऐतिहासिक रोमांस लिखे ‘हृदयहारिणी व आदर्शरमणी (1890 ई.), ‘भातृस्नेह’ (1902 ई.), ‘तारा व क्षत्रकुल कमलिनी (1902 ई.), लवंगलता व आदर्शबाला’ (1904 ई.), ‘गुलबहार व आदर्श’ ‘कनककुसुम व मस्तानी’ (1904 ई.), ‘हीराबाई व बेहयायी का बोरका’ (1904 ई.), ‘मल्लिका देवी व बंग सरोजिनी’ (1905 ई.), ‘लखनऊ की कब्र व शाही महलसरा’ (1906 ई.), ‘सोना और सुंगध व पन्नाबाई’ (1909 ई.), ‘लाल कुँवर व शाही रंगमहल’ (1909 ई.), ‘नूरजहाँ’ (1909 ई.) और ‘गुप्त गोदना’ (1922-23 ई.) जिनमें उन्होंने भारतीय इतिहास के मुस्लिम काल को आधार बनाकर अपने विशिष्ट दृष्टिकोण से हिंदू गौरव का चित्रण किया।
तीसरे कथाकार गोपाल राम गहमरी हैं, जिनकी 1900-1917 ई. के बीच 107 मौलिक या मौलिकप्राय अपराध कथाएँ प्रकाशित हुई।
1891 ई. से लगभग 1915 ई. तक हिंदी में ऐय्यारी-तिलिस्म प्रधान, अपराध प्रधान, ऐतिहासिक और सामान्य रोमांसों का बोलबाला रहा। पर हिंदी उपन्यास की यथार्थवादी धारा, जिसका आरंभ ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ से हुआ, इस कालखंड में भी विकसित होती रही। इन यथार्थवादी उपन्यास लेखकों में भुवनेश्वर मिश्र, ब्रजनंदन सहाय और मेहता लज्जाराम शर्मा प्रमुख हैं।
1900-1917 ई. के बीच के अवधि के हिंदी के अन्य प्रमुख उपन्यासकार हैं—ब्रजनंदन सहाय और मेहता लज्जाराम शर्मा। ब्रजनंदन सहाय ने ‘राजेंद्र मालती’ (1897 ई.), ‘अदभूत् प्रायश्चित्त’ (1901 ई.), ‘सौन्दर्योपासक’ (1911 ई.), ‘राधाकांत’ (1912 ई.) और ‘अरण्य बाला’ (1915 ई.) नामक उपन्यास तथा ‘लाल-चीन’ (1916 ई.) नामक ऐतिहासिक उपन्यास की रचना की थी। मेहता लज्जाराम शर्मा ने 1899 से लेकर 1915 ई. तक सामाजिक उपन्यास लिखे, उनके प्रमुख उपन्यास हैं ‘धूर्त रसिकलाल’ (1899 ई.), ‘स्वतंत्र रमा और परतंत्र लक्ष्मी’ (1899 ई.), ‘हिंदू गृहस्थ’ (1902 ई.), ‘आदर्श दम्पत्ति’ (1902 ई.), ‘सुशीला विधवा’ (1907 ई.). ‘बिगड़े का सुधार अथवा सती सुखदेवी’ (1907 ई.), ‘विपत्ति की कसौटी’ (1909 ई.) तथा ‘आदर्श हिंदू’ (1914-15 ई)।
प्रेमचंद और उनका युग
प्रेमचंद
प्रेमचंद का हिंदी में प्रथम प्रकाशित उपन्यास ‘सेवासदन’ है। हिंदी में इसका प्रकाशन 1918 ई. में हुआ था। हालाँकि पहले यह ‘बाज़ारे हुस्न’ नाम से उर्दू में लिखा गया था। इसका उर्दू रूप हिंदी रूपांतरण के बाद प्रकाशित हुआ। ‘सेवासदन’ से पूर्व प्रेमचंद उर्दू में उपन्यास लिखा करते थे। उनके उर्दू के प्रमुख उपन्यास हैं—’असरारे मआविद उर्फ देवस्थान रहस्य’ (1903-05 ई.), ‘हमखुर्मा व हमसवाब’ (1906 ई.), ‘किसना’(1908 ई.) तथा ‘जलवा ए ईसार’ (1912 ई.)।
हिंदी में ‘सेवासदन’ (1918 ई.) के बाद 1922 ई. में ‘प्रेमाश्रम’ और 1925 ई. में ‘रंगभूमि’ का प्रकाशन हुआ। ये उपन्यास भी मूलतः उर्दू में क्रमशः ‘नाकाम गोशए-आफियत’ और ‘चौगाने हस्ती’ नाम से लिखे गए थे। मूल रूप से हिंदी में लिखा गया उनका प्रथम उपन्यास ‘कायाकल्प’ था जिसका प्रकाशन 1926 ई. में हुआ था। ‘कायाकल्प’ के बाद प्रेमचंद ने 1927 ई. में ‘निर्मला’, 1931 ई. में ‘गबन’, 1932 ई. में ‘कर्मभूमि’ और 1936 ई. में ‘गोदान’ की रचना की। उनकी मृत्यु के बाद उनका अधूरा उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ 1948 ई. में प्रकाशित हुआ।
नवजागरण की चेतना की उपस्थिति प्रेमचंद द्वारा उर्दू में लिखित उपन्यासों से ही दिखाई देने लगती है। ‘असरारे मआविद उर्फ देवस्थान रहस्य’ में उन्होंने मंदिरों और तीर्थ स्थानों में फैले भ्रष्टाचार और पाखंड को विषय बनाया है। ‘हमखुर्मा व हमसवाब’ में उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया। हिंदी में प्रकाशित ‘सेवासदन’ में वेश्या जीवन से जुड़ी समस्याओं को उठाया गया है। पुरुष सत्ता के बरक्स मजबूत स्त्री पात्र को यहाँ पेश किया गया है। इस उपन्यास में स्त्री द्वारा वेश्यावृत्ति की राह चुनने का कारण सामाजिक पारिवारिक व्यवस्था है। ‘प्रेमाश्रम’ में प्रेमचंद ने अँग्रेज़ी राज में किसानों और ज़मींदारों के संबंध का चित्रण किया है। इसमें अँग्रेज़ी शासन-व्यवस्था में किसानों के शोषण का यथार्थपूर्ण चित्रण किया गया है। ‘रंगभूमि’ में प्रेमचंद ने सूरदास के माध्यम से गांधीवादी तरीक़े से औपनिवेशिक सत्ता से संघर्ष की कथा कही है। इस उपन्यास का नायक सूरदास भिखारी है, संसाधनहीन है पर औपनिवेशिक सत्ता के आगे घुटने नहीं टेकता। प्रेमचंद के इन उपन्यासों में नवजागरण की चेतना के साथ ही आदर्शवाद की भी उपस्थिति है। गोपाल राय के अनुसार, महात्मा गांधी सत्याग्रह, हृदय परिवर्तन, आश्रमों की स्थापना आदि के द्वारा तत्कालीन समस्याओं का समाधान ढूँढ़ रहे थे। यदि इन सबका असर प्रेमचंद के उपन्यासों पर है तो इसे अप्रत्याशित नहीं माना जा सकता।
‘कायाकल्प’, ‘निर्मला’, ‘ग़बन’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ में प्रेमचंद पराधीन राष्ट्र के विभिन्न यथार्थ को व्यापक आयामों और जटिलताओं के साथ प्रस्तुत करते हैं। ‘कायाकल्प’ और ‘गोदान’ में किसानों की निर्धनता और शोषण का चित्रण हुआ है। ‘निर्मला’ के केंद्र में अनमेल विवाह और दहेज की समस्या है। ‘ग़बन’ में स्त्री के आभूषण-प्रेम और मध्यवर्गीय युवक की प्रदर्शनप्रियता के परिप्रेक्ष्य में उसके पतन की कथा है पर अंत में यह कथा राष्ट्रीय आंदोलन के संदभों से जुड़ जाती है। ‘गोदान’ में अँग्रेज़ी भू-व्यवस्था में हर तरह से प्रताड़ित किसानों की कथा है जो अपनी ‘मरजाद’ की रक्षा के लिए किसान से मज़दूर बन जाता है और अंततः अतृप्त आकांक्षाओं के साथ उसकी मृत्यु हो जाती है।
प्रेमचंद अगर ज़मींदार और अँग्रेज़ों के शोषण का चित्रण करते हैं तो किसानों की धर्मभीरूता को भी दर्शाते हैं। किसानों की धर्मभीरूता उनकी दुर्दशा को और बढ़ा देती है। ‘गबन’ का एक पात्र देवीदीन खटिक स्वतंत्रता आंदोलन में आ रहे विरोधाभासों को भी उजागर करता है। ‘कायाकल्प’ में प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता के पीछे किस प्रकार दूषित राजनीति का हाथ होता है, इस यथार्थ को दर्शाया है। ‘रंगभूमि’ में पूँजीपति द्वारा गाँव की ज़मीन को हथियाने के प्रयास का प्रतिरोध व्यक्त हुआ है। प्रेमचंद ने पहली बार तत्कालीन मध्यवर्ग के ढुलमुलपन, नैतिक विरोधाभास, आर्थिक संघर्ष आदि को विश्वसनीयता के साथ चित्रित किया।
इस प्रकार प्रेमचंद अपने उपन्यासों के ज़रिए न केवल पराधीन भारत के यथार्थ से हमें परिचित कराते हैं बल्कि आज़ाद भारत का भावी स्वरूप भी ढूँढ़ते नज़र आते हैं। प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में आम लोगों की समझ में आनेवाली भाषा को माध्यम बनाया।
प्रेमचंदयुगीन अन्य उपन्यासकार
हिंदी उपन्यास विधा में प्रेमचंद का रचनाकाल 1918 ई. से 1936 ई. तक है। यह पूरा दौर उपन्यास लेखन की दृष्टि से विविधताओं से भरा हुआ है। प्रेमचंद के अतिरिक्त इस दौर में जो अन्य उपन्यासकार सक्रिय थे उनमें शिवपूजन सहाय, विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जैनेंद्र, भगवती चरण वर्मा, वृंदावनलाल वर्मा, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, चतुरसेन शास्त्री आदि प्रमुख है।
इस अवधि में शिवपूजन सहाय का एकमात्र उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ 1926 ई. में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में बिहार के भोजपुर अंचल के ग्रामीण जीवन को वहाँ की भाषा, बोली-बानी, गीत, मुहावरा आदि के माध्यम से पेश किया गया है। उपन्यास लेखन की आंचलिक शैली का पहला प्रयोग इसी उपन्यास में हुआ था।
विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ ने प्रेमचंद की शैली का अनुसरण किया। उनके दो उपन्यास ‘माँ’ तथा ‘भिखारिणी’ उल्लेखनीय हैं। इन दोनों ही उपन्यासों का प्रकाशन 1929 ई. में हुआ। इन उपन्यासों में तत्कालीन पारिवारिक और सामाजिक जीवन का अंकन सहज भाषा में यथार्थवादी रूप में हुआ है। ‘माँ’ में एक आदर्श माँ के स्नेह और त्याग को प्रस्तुत किया गया है। ‘भिखारिणी’ में समाज में मौजूद जातिगत वर्जना की विद्रूपता का चित्रण किया गया है। इन दोनों उपन्यासों के अतिरिक्त आगे चलकर 1945 ई. में इनका ‘संघर्ष’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ।
कविता, कहानी और नाटक की तरह उपन्यास विधा में भी जयशंकर प्रसाद का महत्वपूर्ण योगदान है। उनके तीनों उपन्यास ‘कंकाल’ (1930 ई.), ‘तितली’ (1934 ई.) तथा ‘इरावती’ (1936 ई.) इसी अवधि में लिखे गए। इन उपन्यासों में प्रसाद का यथार्थवादी दृष्टिकोण सामने आता है। ‘कंकाल’ में प्रसाद ने प्रेमचंद की आदर्शोन्मुख यथार्थवादी शैली से अलग शुद्ध यथार्थवाद को अपनाया। प्रसाद ने इस उपन्यास में धार्मिक बाह्याचारों की आलोचना की है। इस उपन्यास में धर्म के नाम पर चलने वाले आडंबरों और दुराचारों का चित्रण किया गया है। ‘तितली’ में किसानों, मज़दूरों के शोषण तथा निम्नवर्गीय समाज की दयनीय स्थिति का यथार्थ चित्रण किया गया है। इस उपन्यास में यूरोपीय और भारतीय मूल्य का टकराव भी है। ‘इरावती’ प्रसाद की अधूरी कृति है। इसकी कथावस्तु ऐतिहासिक है।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के “उपन्यास मूलतः स्वच्छंदतावादी भाव-भूमि पर लिखे गए है, किंतु उनमें प्रगतिशील विचारधारा के सूत्र भी बिखरे हुए हैं।” (डॉ. रामचंद्र तिवारी, हिंदी उपन्यास, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, पृ. 42) प्रेमचंद युग में निराला के चार उपन्यास ‘अप्सरा’ (1931 ई.), अलका’ (1933 ई.), प्रभावत्ती (1938 ई.) तथा निरूपमा (1936) ई.) प्रकाशित हुए। ‘अप्सरा’ वैश्या जीवन पर केंद्रित उपन्यास है। ‘अलका’ में अवध क्षेत्र के किसानों की दयनीय स्थिति तथा किसानों के विद्रोह का अंकन किया गया है। उपन्यास में नारी का चित्रण आदर्श रूप में किया गया है। ‘प्रभावती’ स्वयं निराला के शब्दों में ऐतिहासिक रोमांस है जिसमें सामंती समाज के युद्ध, प्रेम, विवाह, षड्यंत्र का वर्णन है। ‘निरूपमा’ यथार्थपरक उपन्यास है जिसमें ग्रामीण जीवन में मौजूद रूढ़ियों, संकीर्णताओं और ज़मींदारों के द्वारा किए जाने वाले शोषण तथा बेकारी की समस्या का चित्रण किया गया है।
वृंदावनलाल वर्मा
वृंदावनलाल वर्मा प्रेमचंद युग के एक महत्वपूर्ण उपन्यासकार है। इन्होंने बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर मुख्यतः ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की है। गोपाल राय के अनुसार, वर्मा जी के पूर्व हिंदी में, सही अर्थों में, ऐतिहासिक उपन्यास का अभाव था। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम और बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में किशोरीलाल गोस्वामी, गंगा प्रसाद गुप्त, जयराम दास गुप्त आदि ने इतिहास पर आधारित उपन्यास लिखे थे पर उन्हें ऐतिहासिक उपन्यास न कहकर ऐतिहासिक रोमांस कहना ही संगत है। (हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, पृ. 162) प्रेमचंद युग में लिखे गए उनके प्रमुख उपन्यास हैं ‘गढ़कुंडार’ (1930 ई.) और ‘विराटा की पद्मिनी’ (1936 ई.)। ‘गढ़कुंडार’ में कुंडारों और बुंदेलों के रंजिश और संघर्ष का वर्णन है जिसमें अंततः कुंडार पर बुंदेलों की सत्ता स्थापित होती है। ‘विराटा की पदमिनी में कुमुद के सौंदर्य की ख्याति, कुंजर से उसका प्रेम, अलीमर्दाना की विराटा पर चढ़ाई, युद्ध में कुंजर की मौत तथा कुमुद का प्राणत्याग की कथा कही गई है। इन उपन्यासों के अतिरिक्त वृंदावनलाल वर्मा का प्रसिद्ध उपन्यास ‘झाँसी की रानी 1946 ई. में प्रकाशित हुआ।
जैनेंद्र कुमार
जैनेंद्र कुमार इस दौर के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यासकारों में शुमार किए जाते हैं। इन्होंने हिंदी उपन्यास को एक नई दिशा दी। प्रेम, मानसिक ऊहापोह, सामाजिक-नैतिक अंतद्वंद्ध के ताने-बाने से उन्होंने बिल्कुल अलग तरह की कथा का सूजन किया। इस अवधि में उनके द्वारा लिखे गए प्रमुख उपन्यास है परख (1929 ई.) और ‘सुनीता’ (1934 ई.)। ‘परख में बाल विधवा कट्टो सत्यधन से प्रेम करती है, पर विवाह नहीं हो पाता। कट्टो को सत्यधन का मित्र बिहारी अपना लेता है, पर दोनों देह के धरातल पर पति-पत्नी की तरह नहीं रहने का निर्णय लेते हैं। सामाजिक नैतिकता और व्यक्ति के मनोविज्ञान के अंतर्द्धद्ध का इस उपन्यास में सफल चित्रण हुआ है। सुनीता में दाम्पत्य से बाहर स्त्री के प्रेम का पहली बार सशक्त चित्रण हुआ है। जैनेंद्र के उपन्यास विवेच्य अवधि के बाद भी प्रकाशित होते रहें। उनके अन्य उपन्यास हैं त्यागपत्र (1937 ई.). ‘कल्याणी’ (1939 ई.), सुखदा (1952 ई.), ‘विवर्त’ (1952 ई.). ‘व्यतीत’ (1953 ई.), जयवर्द्धन’ (1956 ई.), ‘मुक्तिबोध’ (1965 ई.), ‘अनंतर’ (1968 ई.), ‘अनाम स्वामी (1974 ई.) तथा ‘दशार्क’ (1983 ई.)।
प्रेमचंद युग में भगवतीचरण वर्मा के तीन उपन्यास ‘पतन’ (1928 ई.), ‘चित्रलेखा’ (1934 ई.) और ‘तीन वर्ष’ (1936 ई.) प्रकाशित हुए। ‘चित्रलेखा’ भगवतीचरण वर्मा का अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास है। इस उपन्यास में भोग, योग, पाप, पुण्य जैसे दार्शनिक प्रश्न को प्रेमकथा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। ‘तीन वर्ष’ के केंद्र में यह प्रश्न है कि प्रेम की परिणति विवाह में आवश्यक है अथवा नहीं।
पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ प्रेमचंद युग के एक विशिष्ट उपन्यासकार हैं। इनका यथार्थ चित्रण प्रेमचंद और प्रसाद दोनों से अलग है। इन्होंने यथार्थ को पूरी तरह अनावृत करके पेश किया। इनके उपन्यासों में समाज की कुरीतियों और विडंबनाओं का साहसपूर्ण तथा खुला चित्रण किया गया है। इस दौर में प्रकाशित इनके उपन्यास हैं- ‘दिल्ली का दलाल’ (1927 ई.), ‘चंद हसीनों के खतूत’ (1927 ई.), ‘बुधुआ की बेटी’ (1928 ई.) और ‘शराबी’ (1930 ई.)। ‘दिल्ली का दलाल’ में लड़कियों के खरीद-फरोख्त का पर्दाफाश किया गया है। ‘चंद हसीनों के खतूत’ में हिंदू और मुसलमान युवक-युवतियों के प्रेम और विवाह का चित्रण है, साथ ही, दोनों समुदाय के लोगों की अमानवीयता का चित्रण भी किया गया है। ‘बुधुआ की बेटी’ में त्रासद दलित जीवन तथा दलितों के प्रतिरोध का चित्रण किया गया है। विवेच्य अवधि के पश्चात प्रकाशित उग्र जी के प्रमुख उपन्यास है- ‘सरकार तुम्हारी आँखों में (1937 ई.). ‘जी जी जी (1939 ई.) तथा ‘फागुन के दिन’ (1960 ई.)।
चतुरसेन शास्त्री का पहला उपन्यास ‘हृदय की परख’ प्रेमचंद युग के प्रारंभ (1918 ई.) से एक वर्ष पूर्व 1917 ई. में प्रकाशित हो चुका था। इस उपन्यास में विवाह पूर्व के अवैध संतान की समस्या को उठाया गया है। प्रेमचंद युग की समय-सीमा में प्रकाशित उनके प्रमुख उपन्यास हैं-’हृदय की प्यास’ (1927 ई.), ‘अमर अभिलाषा’ (1933 ई.) और ‘आत्मदाह’ (1934 ई.)। इन उपन्यासों में पुरुषों का दैहिक आकर्षण, स्त्रियों की स्वाधीनता की चेतना, विधवा विवाह आदि का चित्रण है। इन उपन्यासों के अतिरिक्त बाद के वर्षों में प्रकाशित चतुरसेन शास्त्री के अन्य प्रमुख उपन्यास हैं- ‘वैशाली की नगरवधू (1941 ई.), ‘आलमगीर’ (1954 ई.), ‘वयं रक्षामः’ (1955 ई.), ‘सोमनाथ’ (1955 ई.) आदि।
श्रीयुत इंद्र बसावड़ा
श्रीयुत इंद्र बसावड़ा इस युग के एक महत्वपूर्ण उपन्यासकार हैं। इन्होंने 1935 ई. में दलित उपन्यास ‘घर की राह’ का लेखन किया। ‘घर की राह’ की खासियत यह है कि इसमें एक दलित बच्चे के नज़रिए से पूरे समाज का अवलोकन किया गया है। उपन्यास के आरंभ से अंत तक वह घर की राह ढूँढता रहता है, पर उसे अपना ‘घर’ नहीं मिलता। इस लिहाज से यह उपन्यास विशिष्ट है। इस उपन्यास की प्रस्तावना प्रेमचंद ने लिखी थी।
ऋषभचरण जैन
ऋषभचरण जैन प्रेमचंद युग के एक प्रमुख उपन्यासकार हैं। इन्होंने भारतीय समाज की विद्रुपताओं को अपने उपन्यास लेखन का विषय बनाया। समाज की आपराधिक गतिविधियों तथा वेश्याओं के जीवन का चित्रण इनके उपन्यासों में प्रमुखता से हुआ है। इनके प्रमुख उपन्यास हैं- ‘दिल्ली का व्यभिचार’, (1928 ई.), ‘वेश्यापुत्र’ (1929 ई.), ‘मास्टर साहब (1929 ई.). ‘सत्याग्रह’ (1930 ई.), ‘रहस्यमयी’ (1931 ई.), ‘दिल्ली का कलंक’ (1936 ई.) आदि।
इलाचंद्र जोशी के ‘घृणामयी’ उपन्यास का प्रकाशन इस अवधि में (सन् 1929 ई.) में हुआ, लेकिन उनके महत्वपूर्ण उपन्यासों का प्रकाशन बाद के वर्षों में हुआ। इनकी चर्चा आगे की जाएगी।
इस युग में अनेक महिलाओं ने भी उपन्यास लेखन किया। ‘हिंदी उपन्यास का इतिहास’ पुस्तक में गोपाल राय द्वारा दी गई सूचना के अनुसार प्रेमचंद युग में सोलह लेखिकाओं ने उपन्यास लिखे। ( हिंदी उपन्यास का इतिहास, गोपाल राय, पृ. 164)।इन लेखिकाओं में उषा देवी मित्र (‘वचन का मोल’, 1936 ई.) आगे के वर्षों में भी उपन्यास लेखन में सक्रिय बनी रहीं।
प्रेमचंदोत्तर उपन्यास
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व का उपन्यास लेखन
इस अवधि में प्रेमचंद युग से सक्रिय जैनेंद्र कुमार, इलाचंद्र जोशी, उषा देवी मित्र, वृंदावनलाल वर्मा आदि के महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुए। ऐसे उपन्यास लेखक जिन्होंने इस अवधि में उपन्यास लेखन की शुरुआत की उनमें कुछ महत्वपूर्ण नाम है- राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, अज्ञेय, यशपाल, राहुल सांकृत्यायन, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ आदि।
इस दौर में जैनेंद्र कुमार के दो उपन्यास ‘त्यागपत्र’ (1937 ई.) और ‘कल्याणी’ (1939 ई.) का प्रकाशन हुआ। ‘त्यागपत्र’ की गणना हिंदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यासों में की जाती है। इस उपन्यास में भारतीय समाज में नारी की स्थिति को चित्रित किया गया है। स्त्री के प्रेम का अधिकार, जड़ सामाजिक मानदंडों का प्रतिरोध, सामाजिक अस्वीकृति तथा आत्मदमन का जटिल अंतःसंघर्ष इस उपन्यास में अभिव्यक्त हुआ है। ‘कल्याणी’ में भी पुरुषसत्ता द्वारा स्त्री के दमन और शोषण के चित्र हैं।
इस दौर में एकाधिक उपन्यास लिखने वाली लेखिका उषा देवी मित्र हैं। इस दौर में उनके ‘पिया’ (1937 ई.), ‘मुस्कान’ (1939 ई.), ‘पंथचारी’ (1940 ई.) आदि उपन्यासों का प्रकाशन हुआ।
इलाचंद्र जोशी अपने उपन्यास लेखन की शुरुआत प्रेमचंद युग में ही कर चुके थे। 1929 ई. में प्रकाशित ‘घृणामयी’ में वे प्रेम की असफलता से उत्पन्न कुंठा के प्लॉट पर मनोवैज्ञानिक उपन्यास लिख चुके थे। विवेच्य अवधि में प्रकाशित उनके उपन्यासों में मनोवैज्ञानिक चित्रण की शैली और स्पष्टता से सामने आई। इलाचंद्र जोशी ने प्रमुख मनोवैज्ञानिक चिंतकों-फ्रायड, एडलर, युंग के सिद्धांत के अनुरूप उपन्यास लिखा। इस दौर में प्रकाशित उनके प्रमुख उपन्यास हैं- ‘संन्यासी (1941 ई.), ‘पर्दे की रानी (1941 ई.), ‘प्रेम और छाया’ (1946 ई.) तथा ‘निर्वासित’ (1946 ई.) 1
इस दौर के प्रथम वर्ष 1937 ई. में राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह का ‘राम रहीम’ के साथ हिंदी उपन्यास में पदार्पण हुआ। ‘राम रहीम’ में उन्होंने धार्मिक समरसता का आहवान किया है। इनके उपन्यासों का स्वरूप आदर्शवादी है। इनके उपन्यासों में स्त्री-जीवन की समस्याओं का अंकन सहानुभूतिपूर्ण ढंग से हुआ है। इस क्रम में वे भारतीय समाज की परंपरागत नारी विषयक रूढ़ियों-वर्जनाओं को भी प्रश्नांकित करते हैं। इस अवधि में प्रकाशित इनके अन्य उपन्यास हैं- ‘सावनी समाँ’ (1938 ई.), ‘पुरुष और नारी’ (1938 ई.), ‘टूटा तारा’ (1941 ई.) और ‘सूरदास’ (1943 ई.)। आगे चलकर इनके ‘संस्कार’ (1951 ई.), ‘पूरब और पश्चिम (1951 ई.), ‘चुम्बन और चाँटा (1957 ई.) आदि उपन्यास प्रकाशित हुए।
हिंदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यासों में शुमार किए गए ‘शेखर एक जीवनी’ के लेखक अज्ञेय का उपन्यास विधा में आगमन 1940 ई. में हुआ। इस वर्ष ‘शेखर एक जीवनी का पहला भाग प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का दूसरा भाग 1944 ई. में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में अज्ञेय ने बौद्धिक, रूढ़िभंजक और विद्रोही व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक और संवेदनात्मक जीवन-यात्रा का चित्रण किया है। ‘शेखर एक जीवनी’ के अतिरिक्त अज्ञेय के दो और उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ (1951 ई.) तथा ‘अपने-अपने अजनबी’ (1961 ई.) हैं।
यशपाल मार्क्सवादी वर्गीय दृष्टि के अनुरूप उपन्यास लिखने वाले पहले उपन्यासकार थे। ... यशपाल प्राचीन मान्यताओं एवं रूढ़ियों के विरोधी हैं और नये संदर्भ के अनुकूल नवीन विचारधारा के समर्थक हैं। यह नवीन विचारधारा मार्क्सवादी जीवन दर्शन है। (रामचंद्र तिवारी, हिंदी उपन्यास, पृ.-71)। ‘दादा कामरेड’ (1941 ई.) यशपाल का पहला
उपन्यास है।
‘दादा कामरेड’ में सशस्त्र क्रांति द्वारा भारत को अँग्रेज़ों से मुक्त कराने के प्रयास में लगे क्रांतिकारियों की कथा और उनके अनेक अंतर्विरोधों को अंकित किया गया है। इस अवधि में प्रकाशित यशपाल के अन्य उपन्यास हैं- ‘देशद्रोही’ (1943 ई.), ‘दिव्या’ (1945 ई.) तथा ‘पार्टी कामरेड’ (1946 ई.)। ‘दिव्या’ की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक है। इस उपन्यास में समाज में स्त्री की दशा को चित्रित किया गया है। यशपाल का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास ‘झूठा सच’ है।
राहुल सांकृत्यायन
ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले हिंदी के लेखकों में राहुल सांकृत्यायन एक प्रमुख नाम हैं। 1944 ई. में उनके दो उपन्यास ‘सिंह सेनापति’ और ‘जय यौधेय’ प्रकाशित हुए। ‘सिंह सेनापति’ में पाँच सौ ई.पू. की तक्षशिला और वैशाली को कथाभूमि बनाया गया है। यह एक आदर्शोन्मुख उपन्यास है जिसमें निजी संपत्ति रहित, सामंत रहित, शोषण रहित समाज का चित्रण किया गया है। ‘जय यौधेय’ में चित्रित समाज का समय ईसा की चौथी शताब्दी है। इस उपन्यास में भी सुंदर समाज की परिकल्पना है जिसमें अर्थगत ऊँच-नीच के बावजूद परस्परता और मानवता की भावना मौजूद है। दोनों ही उपन्यासों में समाजवादी व्यवस्था की सकारात्मकता को उद्घाटित किया गया है।
हजारीप्रसाद द्विवेदी
हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ का प्रकाशन 1946 ई. में हुआ। इस उपन्यास में भी कथा का संदर्भ ऐतिहासिक है। उपन्यास के केंद्र में बाणभट्ट है जो हषवर्धन का दरबारी था। लेकिन उपन्यास में इतिहास की घटनात्मकता का उपयोग कम किया गया है। कल्पना और जनश्रुति के इस्तेमाल से तत्युगीन सांस्कृतिक चित्र उपस्थित किया गया है। समाज में नारी की स्थिति तथा राष्ट्र के समक्ष मौजूद संकट की अभिव्यक्ति उपन्यास का महत्वपूर्ण पक्ष है। है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अन्य उपन्यास हैं- ‘चारु चंद्रलेख’ (1963 ई.), ‘पुनर्नवा’ (1943 ई.) तथा ‘अनामदास का पोथा’ (1976 ई.)।
रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’
रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ का ‘चढ़ती धूप’ 1945 ई. में प्रकाशित हुआ। उनके अन्य उपन्यास हैं - ‘उल्का’ (1947 ई.) तथा ‘नई इमारत’ (1947 ई.)। ‘चढ़ती धूप’ 1932-1937 की अवधि में राष्ट्र के पटल पर चल रहे राजनीतिक गतिविधियों पर आधारित है। उपन्यास में उस दौर में कांग्रेस तथा कम्युनिस्ट पार्टी के बीच उभरे द्वंद्व का चित्रण प्रमुखता से हुआ है। ‘उल्का’ स्त्री सशक्तिकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपन्यास है। इस उपन्यास में स्त्री के अधिकारों की मुखर वकालत की गई है।
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यास
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के दौर में सक्रिय हुए उपन्यासकारों की एक लंबी फहरिस्त है।
इससे पूर्व उन कुछ प्रमुख उपन्यासकारों की चर्चा की जा रही है जो पहले से सक्रिय थे लेकिन उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों (उपन्यास) का प्रकाशन विवेच्य दौर में हुआ। चतुरसेन शास्त्री के प्रसिद्ध उपन्यास ‘वैशाली की नगरवधू’ का प्रकाशन 1949 ई. में हुआ। इस उपन्यास में चतुरसेन शास्त्री ने अम्बपाली के बहाने तत्कालीन गणराज्यों की टकराहट और सांस्कृतिक जीवन का चित्रण किया है। इलाचंद्र जोशी का महत्वपूर्ण उपन्यास ‘जहाज का पंछी’ 1955 ई. में प्रकाशित हुआ। देश के विभाजन पर केंद्रित तथा हिंदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यासों में चिह्नित यशपाल के ‘झूठा सच’ के प्रथम खंड (‘वतन और देश) का प्रकाशन 1958 ई. में तथा इसके दूसरे खंड (‘देश का भविष्य) का प्रकाशन 1960 ई. में हुआ। आज़ादी के साथ ही देश विभाजन की त्रासदी का वस्तुनिष्ठ चित्रण ‘झूठा सच’ में हुआ है। इसके दूसरे खंड में आज़ादी के बाद के भारतीय सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य का चित्रण किया गया है। प्रेम-त्रिकोण पर आधारित अज्ञेय के ‘नदी के द्वीप’ का प्रकाशन 1951 ई. में तथा अस्तित्ववादी दर्शन पर आधारित ‘अपने-अपने अजनबी’ का प्रकाशन 1961 ई. में हुआ। उपेंद्रनाथ अश्क 1940 ई. में ‘सितारों का खेल’ उपन्यास लिख चुके थे, लेकिन उनकी प्रसिद्धि 1946 ई. में प्रकाशित ‘गिरती दीवारें के कारण है। इस उपन्यास में मध्यवर्गीय कुंठा, नैतिकता और संबंधों राख’ (1952 ई.)’, ‘शहर में घूम घूमता आईना’ (1962 ई.), ‘निमिषा’ (1980 ई.) आदि।
रांगेय राघव के प्रथम उपन्यास ‘घरौंदा’ का प्रकाशन 1946 ई. में हुआ। बंगाल के अकाल पर केंद्रित ‘विषाद मठ’ का प्रकाशन भी इसी वर्ष हुआ। 1948 ई. में उनका ‘मुर्दों का टीला’ प्रकाशित हुआ। यह मोहनजोदड़ो की सभ्यता की पृष्ठभूमि में लिखा गया है। इसमें द्रविड़ सभ्यता के सकारात्मक पक्ष का चित्रण किया गया है। रांगेय राघव के ‘कब तक पुकारूँ’ शीर्षक उपन्यास का प्रकाशन 1957 ई. में हुआ। इस उपन्यास में दलित और कबीलाई समाज के संघर्षपूर्ण जीवन का मार्मिक अंकन किया गया है। रांगेय राघव के अन्य महत्वपूर्ण उपन्यास हैं- ‘प्रतिदान’ (1950 ई.), ‘हुजूर’ (1951 ई.), ‘अंधेरे में जुगनू’ (1953 ई.), ‘पक्षी और आकाश (1957 ई.), ‘लोई का ताना’ (1954 ई.), ‘लखिमा की आँखें’ (1957 ई.), ‘राई और पर्वत’ (1958 ई.), ‘आखिरी आवाज़’ (1962 ई.)। ‘लखिमा की आँखें’ विद्यापति के जीवन से संबंधित है, जबकि ‘लोई का ताना’ कबीर के जीवन से।
भैरवप्रसाद गुप्त मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखने वाले प्रमुख उपन्यासकार हैं। इनका पहला उपन्यास ‘शोले’ 1946 ई. में प्रकाशित हुआ। देश की आज़ादी के पश्चात प्रकाशित इनके प्रमुख उपन्यास हैं ‘मशाल’ (1948 ई.), ‘गंगा मैया’ (1952 ई.), ‘जंजीरें और नया आदमी’ (1955 ई.), ‘सत्ती मैया का चौरा’ (1959 ई.), ‘धरती’ (1962 ई.) आदि। इनका अंतिम उपन्यास ‘छोटी-सी शुरुआत इनके मरणोपरांत 1997 ई. में प्रकाशित हुआ। ‘शोले’ में मज़दूर आंदोलन का चित्रण है। ‘मशाल’ में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर काल में ब्रिटिश भारत के यथार्थ तथा प्रगतिशील राजनीति के उदय का चित्रण है। ‘सत्ती मैया का चौरा’ भैरव प्रसाद गुप्त का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है। इसमें किसानों की वर्गीय चेतना और संघर्ष का चित्रण किया गया है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सक्रिय हुए उपन्यास लेखकों में नागार्जुन प्रारंभिक महत्वपूर्ण उपन्यासकार हैं। नागार्जुन ने बिहार के मिथिला क्षेत्र के जीवन-संघर्ष को अपने उपन्यासों की विषय-वस्तु बनाया। नागार्जुन के उपन्यासों में मिथिला क्षेत्र के कृषकों का संघर्षमय जीवन, स्त्रियों की व्यथा तथा हाशिए के लोगों के संघर्ष का चित्रण मिलता है। नागार्जुन का प्रथम उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ का प्रकाशन 1948 ई. में हुआ। ‘रतिनाथ की चाची’ में कृषक संघर्ष तथा परिवार और समाज में स्त्री की व्यथा और विडंबना का चित्रण है। 1952 ई. में प्रकाशित प्रसिद्ध उपन्यास ‘बलचनमा’ में नागार्जुन ने निम्नवर्गीय समाज और कृषक समाज के शोषण, कांग्रेस की राजनीति में ज़मींदारों का प्रवेश और उनकी स्वार्थपूर्ण गतिविधियों तथा निम्नवर्गीय समाज में राजनीतिक चेतना के विकास का चित्रण किया है। नागार्जुन के अन्य उपन्यास हैं ‘बाबा बटेसरनाथ (1954 ई.), ‘वरुण के बेटे’ (1957 ई.). ‘दुखमोचन’ (1957 ई.). ‘उग्रतारा’ (1963 ई.), ‘हीरक जयंती’ (1963 ई.), ‘जमनिया के बाबा’ (1968 ई.) आदि।
सन् 1947 ई. में ‘महाकाल’ से उपन्यास लेखन की शुरुआत करने वाले अमृतलाल नागर स्वातंत्र्योत्तर भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास लेखकों में है। गोपाल राय के अनुसार, नागर जी का कथा संसार बहुत व्यापक और वैविध्यपूर्ण है। सच पूछे तो नागर जी इस दृष्टि से प्रेमचंदोत्तर युग के सबसे बड़े उपन्यासकार हैं। (हिंदी उपन्यास का इतिहास, पृ. 221) 1 नागर जी का ‘बूँद और समुद्र’ 1956 ई. में प्रकाशित हुआ। बड़े कलेवर के इस उपन्यास में मध्यवर्गीय सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का बहुआयामी चित्रण किया गया है। ‘अमृत और विष’ (1966 ई.) में मध्यवर्गीय जीवन और राजनीतिक मूल्यहीनता का चित्रण किया गया है। ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ (1978 ई.) दलित जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण हिंदी उपन्यासों में से एक है। ‘मानस का हंस’ (1972 ई.) तुलसीदास के जीवन और सृजन को आधार बनाकर लिखा गया महत्वपूर्ण उपन्यास है, जबकि ‘खंजन नयन’ सूरदास के जीवन पर आधारित उपन्यास है। अमृतलाल नागर के अन्य महत्वपूर्ण उपन्यास हैं- ‘सुहाग के नूपुर (1960 ई.), ‘सात घूँघट वाला मुखड़ा (1968 ई.). ‘एकदा नैमिषारण्ये’ (1972 ई.), ‘बिखरे तिनके’ (1982 ई.), ‘अग्निगर्भा’ (1983 ई.), ‘करवट’ (1985 ई.), ‘पीढ़ियाँ’ (1990 ई.) आदि।
धर्मवीर भारती
धर्मवीर भारती ने शहरी मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय जीवन में प्रेम को आधार बनाकर दो उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ (1949 ई.) और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ (1952 ई.) लिखे। ‘गुनाहों का देवता’ हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों में है। इसमें किशोर प्रेम का भावुकतापूर्ण चित्रण किया गया है। ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ में जो कथा कही गई है उसका निश्चित सामाजिक परिप्रेक्ष्य बनता है। यहाँ हर बार प्रेम आर्थिक बंधन और सामाजिक रूढ़ियों के कारण दम तोड़ देता है।
विष्णु प्रभाकर
विष्णु प्रभाकर का उपन्यास लेखन में आगमन 1951 ई. में ‘ढलती रात’ उपन्यास से हुआ। यही उपन्यास पुनः 1955 ई. में ‘निशिकांत’ नाम से प्रकाशित हुआ। इनके अन्य उपन्यास हैं ‘तट के बंधन’ (1955 ई.), ‘स्वप्नमयी’ (1956 ई.), ‘दर्पण का व्यक्ति’ (1968 ई.), ‘कोई तो’ (1980 ई.) तथा ‘अर्द्धनारीश्वर’ (1992 ई.) है। विष्णु प्रभाकर के उपन्यासों में नारी जीवन की समस्याओं को विविध रूपों में चित्रित किया गया है। ‘अर्द्धनारीश्वर’ विष्णु प्रभाकर का चर्चित उपन्यास है जिसमें बलात्कार पीड़ित स्त्रियों की यातनापूर्ण जीवन का चित्रण किया गया है।
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ हिंदी उपन्यास को नई दिशा देने वाले सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यासकारों में से एक हैं। रेणु को हिंदी का सर्वश्रेष्ठ आंचलिक उपन्यासकार माना गया है। रेणु से पूर्व तथा उनके बाद अनेक लेखकों ने आंचलिक विशिष्टताओं को अपने उपन्यासों में पिरोया, लेकिन आंचलिकता का सबसे निखरा हुआ रूप रेणु में ही दिखाई देता है। उन्होंने बिहार के पूर्णिया क्षेत्र की बोली-बानी, गीत-संगीत, मान्यताएँ-रूढ़ियाँ, व्यवहार प्रणाली के नियोजन से ऐसा कथा-शिल्प निर्मित किया जो हिंदी उपन्यास की दृष्टि से सर्वथा अनूठा है। रेणु के प्रथम उपन्यास ‘मैला आँचल’ का प्रकाशन 1954 ई. में हुआ। इस उपन्यास में रेणु ने मेरीगंज नामक गाँव के पिछड़ापन, जड़ता, जातिगत विद्वेष और वर्जनाओं के साथ उस समय राजनीति में आ रहे मूल्यगत ह्रास को चित्रित किया है। रेणु के अन्य उपन्यास हैं ‘परती परिकथा’ (1957 ई.). ‘दीर्घतपा’ (1970 ई.). ‘जुलूस’ (1965 ई.), ‘कितने चौराहें (1966 ई.) और ‘पल्टूबाबू रोड’ (1979 ई.)।
उदयशंकर भट्ट एक अन्य महत्वपूर्ण आंचलिक उपन्यासकार हैं। 1956 ई. में प्रकाशित ‘सागर, लहरें और मनुष्य’ इनका चर्चित उपन्यास है। इस उपन्यास में उदयशंकर भट्ट ने मुंबई के बरसोवा में बसे मछुआरों के जीवन को चित्रित किया है।
नरेश मेहता के प्रथम उपन्यास ‘डूबते मस्तूल’ का प्रकाशन 1954 ई. में हुआ। ‘डूबते मस्तूल’ में आधुनिक जीवन के संदर्भ में नारी की समस्याओं को चित्रित किया गया है। इनके अन्य उपन्यास हैं- ‘यह पथ बंधु था’ (1964 ई.), ‘धूमकेतू एक श्रुति’ (1962 ई.), ‘दो एकांत’ (1964 ई.), ‘नदी यशस्वी है (1967 ई.) आदि। ‘यह पथ बंधु था’ नरेश मेहता का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है। उपन्यास में कथावस्तु का समय आज़ादी से पूर्व का है। इसमें एक आदर्शवादी स्वाभिमानी युवा की कहानी है जो उस समय चल रहे आंदोलनों से निराश होता है। रामदरश मिश्र के अनुसार, यह उपन्यास अनुभवों का उपन्यास है- मध्यवर्ग के एक ईमानदार व्यक्ति के अनुभवों का इतिहास। (हिंदी उपन्यास एक अंतर्यात्रा, पृ.-161)।
राजेंद्र यादव
राजेंद्र यादव ने शहरी मध्यवर्गीय जीवन में प्रेम और दाम्पत्य के तनाव के विविध रूपों को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया है। इनका प्रथम उपन्यास ‘प्रेत बोलते हैं’ 1952 ई. में प्रकाशित हुआ। इसी उपन्यास का संशोधित रूप 1960 ई. में ‘सारा आकाश’ के नाम से प्रकाशित हुआ। ‘सारा आकाश’ में राजेंद्र यादव ने दाम्पत्य जीवन के तनाव को विषय बनाया है। ‘उखड़े हुए लोग (1956 ई.) में एक नेता के दोहरे और अनैतिक चरित्र को चित्रित किया गया है। राजेंद्र यादव के अन्य उपन्यास हैं- ‘शह और मात’ (1959 ई.), ‘अनदेखे अनजान पुल’ (1963 ई.) आदि।
कमलेश्वर
कमलेश्वर का प्रथम उपन्यास ‘एक सड़क सत्तावन गलियाँ’ 1957 ई. में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में नौटंकी पेशा में लगे लोगों तथा अपराध कर्म में लगे लोगों के जीवन का चित्रण किया गया है। ‘लौटे हुए मुसाफिर’ (1961 ई.) में पाकिस्तान के नाम पर छले गए मुसलमानों की विवशता का चित्रण है। कमलेश्वर का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ (2000 ई.) है। इस उपन्यास में धर्म, राजनीति, भौतिकता आदि का मानवता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव का अंकन किया गया है। ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ (1967 ई.), ‘काली आँधी’ (1974 ई.), ‘आगामी अतीत’ (1976 ई.), सुबह-दोपहर-शाम (1982 ई.) आदि कमलेश्वर के अन्य प्रमुख उपन्यास हैं।
श्रीलाल शुक्ल
श्रीलाल शुक्ल का प्रथम उपन्यास ‘सूनी घाटी का सूरज’ का प्रकाशन 1957 ई. में हुआ। इनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘राग दरबारी’ 1968 ई. में प्रकाशित हुआ
इस उपन्यास के केंद्र में कस्बानुमा गाँव शिवपालगंज की कथा है। शिवपालगंज के को-आपरेटिव यूनियन, इंटर कॉलेज, ग्राम सभा में घटने वाली गतिविधियों के माध्यम से भारतीय ग्रामीण और कस्बाई ज़िंदगी में फैले भ्रष्टाचार और मूल्यहीनता की कथा कही गई है। यह उपन्यास ग्रामीण-कस्बाई जीवन से संबद्ध परंपरागत आदर्शवादिता और भोलेपन के मिथक को तोड़ता है। ‘विश्रामपुर का संत’ (1998 ई.) में ऊपर से गरिमापूर्ण नज़र आने वाले राजनीतिक व्यक्ति के पाखंड की कथा कही गई है। श्रीलाल शुक्ल के अन्य उपन्यास हैं ‘सीमाएँ टूटती हैं’ (1973 ई.), ‘मकान’ (1976 ई.) तथा ‘पहला पड़ाव’ (1987 ई.)।
आज़ादी के बाद के दौर में प्रचुर मात्रा में उपन्यासों का सृजन करने वालों में शैलेश मटियानी का नाम प्रमुख है। 1959 ई. में उनका पहला उपन्यास ‘बोरीबली से बोरीबंदर प्रकाशित हुआ। इसमें महानगर की ऊपरी चमक-दमक के अंदर की यातना भरी ज़िंदगी का चित्रण किया गया है। ‘कबूतरखाना’ (1960 ई.) तथा ‘किस्सा नर्मदाबेन गंगूबाई’ (1961 ई.) मुंबई के जीवन पर केंद्रित उनके अन्य उपन्यास हैं। ‘हौलदार’ (1961 ई.), ‘चिट्ठी रसैन’ (1961 ई.) ‘मुख सरोवर के हंस (1962 ई.) आदि उपन्यासों में उत्तराखंड के कुमायूँ अंचल के पहाड़ी जीवन की विविध स्थितियों का चित्रण किया गया है। उनके बाद के उपन्यासों में ‘सर्पगंधा’ (1979 ई.), ‘आकाश कितना अनंत है’ (1979 ई.), ‘गोपुली गफूरन’ (1981 ई.), ‘बावन नदियों का संगम’ (1981 ई.), ‘चंद औरतों का शहर’ (1992 ई.) आदि प्रमुख हैं।
रेणु और उदयशंकर भट्ट की तरह रामदरश मिश्र ने भी उपन्यासों में आंचलिकता को अपना आधार बनाया, ख़ासकर ‘पानी के प्राचीर’ (1961 ई.) तथा ‘जल टूटता हुआ’ (1969 ई.) में। इन्होंने ‘पानी के प्राचीर’ में गोरखपुर ज़िले के पांडेपुरवा गाँव को केंद्र में रखकर इस क्षेत्र के अभावग्रस्त जीवन, उनके स्वप्न तथा स्पनभंग की कथा कही है। इनके अन्य उपन्यास है ‘अपने लोग’ (1976 ई.). ‘आकाश का छत’ (1979 ई.). ‘बिना दरवाजे का मकान’ (1984 ई.), ‘बीस बरस’ (1996 ई.) आदि।
मोहन राकेश का पहला उपन्यास ‘अंधेरे बंद कमरे’ 1961 ई. में प्रकाशित हुआ। इनके अन्य दो उपन्यास ‘न आने वाला कल’ (1968 ई.) तथा ‘अंतराल’ (1972 ई.) हैं। मोहन राकेश के उपन्यास मुख्य रूप से मध्यवर्गीय जीवन के प्रेम, दाम्पत्य, संघर्ष, टूटन, कुंठा आदि प्रवृत्तियों पर केंद्रित हैं। ‘अंधेरे बंद कमरे’ में ऐसा ही तनाव पत्रकार और कलाकार की ज़िंदगी में है।
आज़ादी के बाद हिंदी कथा साहित्य में भाषागत प्रयोग के कारण निर्मल वर्मा की विशिष्ट स्थिति है। उनके उपन्यासों में मध्यवर्गीय जीवन के तनाव, कुंठा, अवसाद, विडंबना आदि तत्वों की लगातार उपस्थिति है। 1964 ई. में निर्मल वर्मा का प्रथम उपन्यास ‘वे दिन’ का प्रकाशन हुआ। विदेशी पृष्ठभूमि पर लिखे गए इस उपन्यास में विश्वयुद्ध के बाद के दिनों के प्राग (चेकोस्लोवाकिया) के जन-जीवन में छायी हुई हताशा, विडंबना बोध, अवसाद, आर्थिक तंगी और घुटन की कथा कही गई है। ‘एक चिथड़ा सुख (1979 ई.) में निर्मल वर्मा ने थियेटर में काम करने वाले लोगों के माध्यम से महानगरीय संदर्भ में जटिल मानवीय संबंध, तनाव और हताशा का चित्रण किया है। ‘रात का रिपोर्टर’ (1979 ई.) का संदर्भ आपातकाल है। इस उपन्यास में आपातकाल के दौरान के दहशत को चित्रित करने का प्रयास किया गया है। इनके अन्य उपन्यास हैं- ‘लाल टीन की छत’ (1974 ई.) तथा ‘अंतिम अरण्य’ (2000 ई.)।
1964 ई. में शानी के दो उपन्यास ‘कस्तूरी’ तथा ‘बंद आवाज़’ का प्रकाशन हुआ, लेकिन उन्हें सर्वाधिक सराहना 1965 ई. में प्रकाशित ‘काला जल’ से मिली। इस उपन्यास को मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज के यथार्थ का सबसे ज़्यादा प्रमाणिक चित्रण करने वाले उपन्यासों में शुमार किया गया है। इसकी कथा भूमि बस्तर क्षेत्र है तथा कथा का विस्तार आज़ादी के पूर्व से लेकर आज़ादी के बाद तक के समय में है। उपन्यास में आज़ादी के बाद भारत में रह गए मुसलमानों के प्रति बने विडंबनापूर्ण माहौल का भी संदर्भ है। शानी के अन्य उपन्यास हैं ‘नदी और सीपियाॅं(1970 ई.) तथा ‘साॅंप और सीढ़ी (1983 ई.)।
राही मासूम रजा का पहला उपन्यास ‘आधा गाँव 1966 ई. में प्रकाशित हुआ। उपन्यास के केंद्र में गंगोली गाँव (ज़िला-गाजीपुर, उत्तर प्रदेश) के शिया मुसलमानों का जीवन है। स्वतंत्रता पूर्व से लेकर देश-विभाजन तक की विभिन्न परिस्थितियों का उनके जीवन पर पड़े प्रभाव का चित्रण इस उपन्यास में किया गया है। इस उपन्यास का स्वरूप आंचलिक है। सीन 75’ (1977 ई.) तथा कटरा बी आर्जू’ (1978 ई.) ये दोनों उपन्यास आपातकाल से संबंधित हैं इनके अन्य उपन्यास है टोपी शुकना (1969 ई), हिम्मत जौनपुरी (1969 ई.), ओस की बूंद’ (1970 ई.) तथा ‘दिल एक सादा कागज (1973 ई.)।
गिरिराज किशोर का पहला उपन्यास ‘लोग’ 1966 ई. में प्रकाशित हुआ। उपन्यास में अँग्रेज़ी शासन के खत्म होने के बाद ज़मींदार वर्ग के अंदर उत्पन्न संशय और आशंका का चित्रण किया गया है। रामदरश मिश्र के अनुसार, राय साहब या ऐसे अनेक साहबों की तस्वीर हमारे उपन्यास साहित्य में मिल जाती है। लेकिन यह ख़ास तरह की फार्मूले से बनी हुई मालूम पड़ती है। किंतु ‘लोग’ में राय साहब एक प्रमाणिक व्यक्ति हैं अपने आभिजात्य में तने हुए और घुले हुए (हिंदी उपन्यास एक अंतर्यात्रा, पू. 164) ‘जुगलबंदी (1973 ई.) में कहते हुए सामंती समाज का चित्रण किया गया है। ‘परिशिष्ट (1984 ई.) में शिक्षा संस्थानों में दलितों के उत्पीड़न का चित्रण किया गया है। गिरिराज किशोर के अन्य उपन्यास है- ‘चिड़ियाघर’ (1968 ई.), ‘यात्राएँ (1971ई) ‘इंद्र सुनें (1978) ‘यथा प्रस्तावित’ (1982 ई.), ‘पहला गिरमिटिया’ (1999 ई.) आदि।
भीष्म साहनी का पहला उपन्यास ‘झरोखे’ है। इसका प्रकाशन 1967 ई. में हुआ था। इस उपन्यास में आर्यसमाजी मध्यवर्गीय परिवार की विभिन्न घटनाओं को पिरोया गया है। 1973 ई. में प्रकाशित ‘तमस’ भीष्म साहनी का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है। देश विभाजन की पृष्ठभूमि में घटने वाली अमानवीय घटनाओं का इस उपन्यास में मार्मिक चित्रण किया गया है। 1988 ई. में प्रकाशित मय्यादास की माड़ी भीष्म साहनी का एक और महत्वपूर्ण उपन्यास है। इस उपन्यास में पंजाब के एक परिवार को केंद्र में रखते हुए तीन पीढ़ियों के सामाजिक-राजनैतिक-सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रक्रिया को रेखांकित किया गया है। भीष्म साहनी के अन्य उपन्यास है कड़ियों (1970 ई.), बसंती (1980), कुंती (1993 ई.) और नीलू नीलिमा नीलोफर (2000 ई.)।
शिवप्रसाद सिंह
शिवप्रसाद सिंह का उपन्यास ‘अलग-अलग वैतरणी’ ग्रामीण जीवन से संबद्ध हिंदी का एक प्रमुख उपन्यास है। यह इनका पहला उपन्यास है जिसका प्रकाशन 1967 ई. में हुआ था। इसके केंद्र में पूर्वांचल का करैता गाँव है। इस गाँव की कथा के माध्यम से स्वातंत्रता के बाद पूर्वांचल के गाँवों की दिनोंदिन बदतर होती जा रही स्थिति का चित्रण किया गया है। इनके अन्य उपन्यास है ‘गली आगे मुड़ती है’ (1974 ई), नीला चौद (1988 ई.), ‘कुहरे में युद्ध’ (1963 ई), दिल्ली दूर है (1993 ई.) आदि नीला चाँद’ में माध्यकाल के काशी का चित्रण है। ‘कुहरे में युद्ध तथा ‘दिल्ली दूर है’ इन दोनों उपन्यासों में तराईन के युद्ध में पृथ्वीराज की हार से लेकर दिल्ली सल्तनत के दिनों की घटनाओं को समेटा गया है।
विवेकी राय
विवेकी राय ग्रामीण संवेदना के हिंदी के प्रमुख उपन्यासकारों में है। प्रथम उपन्यास बबूल 1964 ई. में प्रकाशित हुआ। उनके अन्य उपन्यास हैं ‘पुरुष पुराण (1975 ई.), ‘लोक ऋण (1977 ई.), श्वेत पत्र (1979 ई.). सोना माटी (1983 ई.), ‘समर शेष है’ (1988 ई.), ‘मंगल भवन’ (1994 ई) तथा अभंगहारी। ‘सोना माटी’ में पूर्वांचल के ग्रामीण जीवन की व्यथा का चित्रण किया गया है। यहाँ की मिट्टी सोना उगलती है पर लोग भूमिपतियों, नौकरशाही और नेताओं से त्रस्त हैं। ‘समर शेष है उन लोगों की कथा है जो आज़ादी मिलने के बावजूद ‘सूरज’ का इंतजार कर रहे हैं। ‘मंगल भवन में 1962 ई. के चीनी आक्रमण के बाद गाँवों पर पड़े प्रभाव का चित्रण किया गया है।
गोविंद मिश्र
1989 ई. में प्रकाशित ‘अपना चेहरा’ गोविंद मिश्र का पहला उपन्यास है। उनके अन्य प्रमुख उपन्यास हैं लाल पीली जमीन’ (1976 ई.), हुजूर दरबार’ (1881 ई.), ‘पाँच आँगनों वाला घर (1993 ई.) आदि। ‘लाल पीली ज़मीन’ में बुंदेलखंड के पिछड़ेपन, राजनीतिक चेतना विहीनता और जातीय संघर्ष का चित्रण किया गया है। ‘पीच आँगन वाला घर उच्चवर्गीय परिवार के टूटने-बिखरने की कथा है।
राजकमल चौधरी
राजकमल चौधरी ने ज़िंदगी की गलीज और नकारात्मक तत्वों से अपने उपन्यास का ढाँचा निर्मित किया है। उनके उपन्यासों में हर तरह के सामाजिक पाखंड का पर्दाफाश है। इनके उपन्यासों में वेश्याओं-समलैंगिकों की गतिविधियों, संबंधों के प्रति अनास्था का भाव, शराब सेक्स में डूबे लोगों की उपस्थिति निरंतर दिखाई देती है। हालाँकि इन सबके द्वारा उन्होंने हर तरह की सामाजिक विद्रूपता का उद्घाटन करने का प्रयास किया है। इसके साथ ही वे मानवीय करुणा और संवेदना की तलाश भी करते हैं। गोपाल राय के अनुसार, ... ऊपर से देखने पर राजकमल चौधरी का औपन्यासिक संसार एक बदबूदार नाली की तरह है जिसमें घिनौने और जहरीले कीड़े कुलबुला रहे हैं। पर इसके भीतर उपन्यासकार की पीड़ित संवेदना अंतर्धारा की तरह प्रवाहित है। (हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ.335) राजकमल चौधरी के प्रमुख उपन्यास है ‘नदी बहती थी (1961 ई.), शहर था शहर नहीं था (1966 ई.), ‘देहगाथा (1966 ई.), मछली मरी हुई (1966 ई.) आदि। मछली मरी हुई राजकमल चौधरी का प्रसिद्ध उपन्यास है। इसमें रामलैंगिकता का संदर्भ है, पर इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण है मनुष्य के अंदर के विरोधाभासी प्रवृत्तियों का सफल चित्रण। राजकमल चौधरी मनुष्य के स्याह पक्ष के चित्रण के साथ उसके सामाजिक संदर्भ का भी संकेत करते हैं।
अमरकांत
अमरकांत का पहला उपन्यास सूखा पत्ता 1959 ई. में प्रकाशित हुआ।। इसमें इसमें प्रेम प्रेम की टूटन और सामाजिक संघर्ष के संकल्प की कथा कही गई है। ‘आकाशपक्षी’ (1967 ई.) में स्वातंत्र्योत्तर भारत के अंतर्विरोध की कथा कही गई है। ‘इन्हीं हथियारों से’ (2003 ई.) अमरकांत का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है। इस उपन्यास में 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर देश की आज़ादी तक उत्तर प्रदेश के बलिया के सामाजिक-राजनीतिक हलचलों को चित्रित किया गया है।
बदीउज्ज़माॅं
बदीउज्ज़माॅं के प्रसिद्ध उपन्यास ‘एक चूहे की मौत’ का प्रकाशन 1971 ई. में हुआ। इस उपन्यास में बदीउज्ज़माॅं ने प्रतीकात्मक रूप से व्यवस्था का बारीक-चित्रण किया है। ‘छाको की वापसी’ (1975 ई.) बदीउज्जमों का एक अन्य महत्वपूर्ण उपन्यास है। देश विभाजन पर आधारित इस उपन्यास में भारत से पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) गए मुसलमानों के साथ होने वाले भेदभाव तथा उनकी पीड़ा और विवशता का चित्रण किया गया है।
जगदंबा प्रसाद दीक्षित
मुंबई की ज़िंदगी के नकारात्मक पक्ष को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करने वाले जगदंबा प्रसाद दीक्षित का पहला उपन्यास ‘कटा हुआ आसमान 1971 ई. में प्रकाशित हुमा। ‘कटा हुआ आसमान के केंद्र में मुंबई के अध्यापक वर्ग की जद्दोजहद से भरी ज़िंदगी है। इसके साथ ही इस उपन्यास में देश के विभिन्न भागों से अवसर की तलाश में आए लोगों की कठिन जीवन स्थितियों का चित्रण किया गया है। जगदंबा प्रसाद दीक्षित का प्रसिद्ध उपन्यास मुर्दाघर (1974 ई.) में पूरी तरह विद्रूप परिस्थिति में जीने को मजबूर लोगों की ज़िंदगी का मार्मिक वर्णन किया गया है। ‘मुर्दाघर’ में बीमार, असहाय, गटर की संड़ाघ में साथ रहने को मजबूर, देह-व्यापार में लगी स्त्रियाँ तथा व्यवस्था के अत्याचार को सहने को विवश लोगों की ज़िंदगी का चित्रण किया गया है। इनके एक अन्य उपन्यास ‘अकाल’ (1997 ई.) में गाँवों की दुर्दशा का चित्रण किया गया है।
जगदीश चंद्र
जगदीश चंद्र का पहला उपन्यास ‘यादों के पहाड़ 1966 ई. में प्रकाशित हुआ। इनका बेहद चर्चित और हिंदी के कुछ महत्वपूर्ण उपन्यासों में गिना जाने वाला ‘धरती धन न अपना’ दलित जीवन के यथार्थ को मार्मिक और तथ्यपरक रूप में पेश करता है। इस उपन्यास की कथाभूमि स्वतंत्रता पूर्व के पंजाब का एक गाँव है। ‘आधा पुल’ (1973 ई.) युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास है। ‘घास गोदाम’ (1985 ई.) में दिल्ली महानगर के आसपास के गाँव तक फैलने की प्रक्रिया में वहाँ के किसानों की दुर्दशा का चित्रण किया गया है। ‘नरक कुंड में वास (1994 ई.) में ‘धरती धन न अपना’ से आगे की कथा है। उपन्यास का नायक गाँव की यंत्रणा से त्रस्त होकर शहर भाग आता है पर यहाँ भी उसे कोई राहत नहीं मिलती। यहाँ भी उसे विपरीत स्थिति के बीच ही रहना पड़ता है। जगदीश चंद्र के अन्य उपन्यास हैं-’कभी न छोड़ें खेत’ (1976 ई.), ‘मुट्ठी भर काँकर’ (1976 ई.), ‘टुंडा लाट’ (1978 ई.) और ‘लाट की वापसी’ (2000 ई.)।
नरेंद्र कोहली
नरेंद्र कोहली की पहचान ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के कथा-प्रसंगों को लेकर उपन्यास लिखने वाले लेखक के रूप में है। रामायण और महाभारत’ आधारित उपन्यास शृंखला से पूर्व 1972 ई. में ‘आतंक’ नाम से उनका पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में अपराधियों और नेताओं के गठबंधन और शिक्षण संस्थाओं में अपराधियों के आतंक का चित्रण किया गया है। रामकथा शृंखला में नरेंद्र कोहली के प्रमुख उपन्यास ‘दीक्षा’ (1975 ई.). ‘अवसर’ (1976 ई.) ‘संघर्ष की ओर’ (1978 ई.) तथा ‘युद्ध’ (1979 ई., दो भागों में) हैं। महाभारत की कथा पर आधारित इनके उपन्यास हैं ‘बंधन’ (1988 ई.), ‘अधिकार’ (1990) ई.), ‘कर्म (1991 ई.). ‘धर्म’ (1993 ई.), ‘अंतराल’ (1995 ई.), ‘प्रछन्न’ (1997 ई.). ‘प्रत्यक्ष (1998 ई.) और ‘निबंध (2000 ई.)। महाभारत कथा आधारित इन उपन्यासों को ‘महासमर शृंखला के अंतर्गत लिखा गया है। रामकथा वाली शृंखला बाद में ‘अभ्युदय शीर्षक से दो खंडों में प्रकाशित हुई। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के कथा-प्रसंग से उपन्यासों की रचना के अतिरिक्त नरेंद्र कोहली ने विवेकानंद के जीवन पर आधारित उपन्यास ‘अभिज्ञान’ (1981 ई.) तथा दो भाग में ‘तोड़ो कारा तोड़ो’ (1992-93 ई.) लिखा है।
मंजूर एहतेशाम
मंजूर एहतेशाम का पहला उपन्यास ‘कुछ दिन और’ 1976 ई. में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास दाम्पत्य जीवन पर लिखा गया है। इनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘सूखा बरगद’ 1986 ई. में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में स्वातंत्र्योत्तर भारत में मुस्लिम समाज के अंतद्वंद्व को अभिव्यक्त किया गया है। इनके अन्य उपन्यास है ‘दास्तान-ए-लापता (1995 ई.) तथा ‘बशारत मंजिल’ (2004 ई.)। ‘दास्तान-ए-लापता में भोपाल के मध्यवर्गीय समाज में खत्म होती परस्परता का चित्रण किया गया है।
विनोद कुमार शुक्ल
विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के उन कुछ विशिष्ट उपन्यासकारों में हैं जिनकी भाषा और शिल्प की अपनी निजी पहचान है। इनका पहला उपन्यास ‘नौकर की कमीज़ 1979 ई. में प्रकाशित हुआ। इनके अन्य उपन्यास हैं खिलेगा तो देखेंगे’ तथा ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’
। विनोद कुमार शुक्ल मुख्य रूप से मध्यवर्गीय तथा निम्न मध्ववर्गीय जीवन के उपन्यासकार हैं। ‘नौकर की कमीज़ में उपन्यासकार ने यह दिखलाया है कि निम्नस्तरीय कर्मचारी किस प्रकार व्यवस्था और बाबुओं के द्वारा शोषण को अभिशप्त हैं। ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में पूँजीवादी-शहरी जीवन शैली का प्रतिरोध प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त किया गया है।
मनोहर श्याम जोशी
मनोहर श्याम जोशी का ‘कुरू कुरू स्वाहा’ 1980 ई. में प्रकाशित हुआ। यह उनका प्रथम और प्रयोगात्मक उपन्यास है। ‘इसकी प्रयोगशीलता विशेषतः इसके शिल्प में है जहाँ एक ही नायक तीन स्तरों पर चलता है-
(1) बुद्धिवादी जोशी (ii) किशोर मानसिकता वाला मनोहर (iii) तटस्थ नैरेटर। (रामदरश मिश्र,हिंदी उपन्यास एक अंतर्यात्रा, पृ.-183)
इस उपन्यास में मुंबई महानगर के अपराध, षड्यंत्र, नैतिक क्षरण तथा देह व्यापार की दुनिया को नए और जटिल अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। ‘कसप’ एक प्रेम कहानी है। इसके केंद्र में कुमाऊँ का मध्यवर्गीय समाज है। मनोहर श्याम जोशी के अन्य उपन्यास हैं ‘टा-टा प्रोफेसर’ (1995 ई.), ‘हरिया हरक्यूलीज की हैरानी’ (1996 ई.),’हमजाद’ (1996 ई.) और ‘क्याप’ (2001 ई.)।
सुरेंद्र वर्मा
सुरेंद्र वर्मा का पहला उपन्यास ‘अंधेरे से परे’ 1980 ई. में प्रकाशित हुआ। सुरेंद्र वर्मा की ख्याति 1993 ई. में प्रकाशित बेहद लोकप्रिय और चर्चित उपन्यास ‘मुझे चाँद चाहिए’ के कारण है। इस उपन्यास में महत्वाकांक्षी लड़की वर्षा वशिष्ट की छोटे शहर के रूढ़िग्रस्त परिवार से निकलकर बरास्ता राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय मुबंई के फिल्मी दुनिया की बुलंदियों को छूने की कथा कही गई है। ‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ (1998 ई.) तथा ‘काटना शामी के वृक्ष का पद्म पंखुरी के धार से’ इनके अन्य उपन्यास हैं।
संजीव
संजीव का पहला उपन्यास ‘किसनगढ़ के अहेरी’ का प्रकाशन 1981 ई. में हुआ। इनके अन्य उपन्यास हैं ‘सर्कस’ (1984 ई.), ‘सावधान ! नीचे आग है (1986 ई.), ‘धार’ (1990 ई.), ‘पाँव तले की दूब’, ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ (2000 ई.), ‘सूत्रधार’ आदि। संजीव के उपन्यास लिखने की शैली शोधपूर्ण और समाजशास्त्रीय है। उनका ‘सर्कस’ उपन्यास सर्कस में काम करने वाले लोगों की ज़िंदगी पर आधारित है। ‘सावधान! नीचे आग है’ में कोयला खादानों की दुनिया है। ‘सूत्रधार’ में उन्होंने भोजपुरी के रंग कलाकार भिखारी ठाकुर के जीवन और रंगकर्म को उपन्यास में पिरोया है।
पंकज बिष्ट
पंकज बिष्ट का पहला उपन्यास ‘लेकिन दरवाजा’ 1982 ई. में प्रकाशित हुआ। उनके एक अन्य उपन्यास ‘उस चिड़िया का नाम’ का प्रकाशन वर्ष 1989 ई. है। ‘लेकिन दरवाजा’ में साहित्यिक दुनिया में घर कर रही लालसा, प्रपंच, मूल्यहीनता को उजागर किया गया है। ‘उस चिड़िया का नाम’ पहाड़ी जीवन के विविध पहलुओं पर केंद्रित है।
अब्दुल बिस्मिल्लाह के चर्चित उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया का प्रकाशन 1986 ई. में हुआ। यह उपन्यास बनारस के बुनकरों के कष्टमय जीवन पर आधारित है। इनके अन्य उपन्यास हैं ‘समर शेष है, ‘ज़हरबाद’, ‘दंतकथा’ (1990 ई.), ‘मुखड़ा क्या देखे (1996 ई.) आदि।
उषा प्रियंवदा
उषा प्रियंवदा का पहला उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ का प्रकाशन 1961 ई. में हुआ। इस उपन्यास में आधुनिक सोच वाली स्त्री का परंपरागत मध्यवर्गीय समाज से द्वंद्व तथा इससे उपजी यंत्रणा का चित्रण किया गया है। 1967 ई. में प्रकाशित ‘रुकोगी नहीं राधिका’ में मनोविज्ञान, आधुनिकतावादी परिवेश और मूल्यबोध का जटिल ताना-बाना है। इस जटिल परिस्थिति में एक स्त्री कैसे भटकाव को अभिशप्त है, इसका तथ्यपरक चित्रण इस उपन्यास में है। उषा प्रियंवदा के अन्य उपन्यास हैं- ‘शेष यात्रा’ (1984 ई.) तथा ‘अंतर्वशी’ (2000 ई.) आदि।
कृष्णा सोबती
कृष्णा सोबती के पहले उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ का प्रकाशन 1967 ई. में हुआ। इनके अन्य उपन्यास हैं- ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ (1972 ई.), ‘ज़िंदगीनामा’ (1979 ई.), ‘दिलो दानिश’ (1993 ई.). ‘समय सरगम (2000 ई.) आदि। ‘मित्रो मरजानी’ में स्त्री की अस्मिता और यौनिकता के प्रश्न को साहसिक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। ‘ज़िंदगीनामा’ में बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों के पंजाब के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का चित्रण किया गया है। ‘समय सरगम’ में मध्यवर्गीय परिवार में वृद्धों के जीवन और उनकी समस्याओं का चित्रण किया गया है।
मन्नू भंडारी
मन्नू भंडारी का पहला उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ राजेंद्र यादव के साथ सह-लेखक के रूप में 1962 ई. में प्रकाशित हुआ। 1971 ई. में मन्नू भंडारी का पहला स्वतंत्र उपन्यास ‘आपका बंटी प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में तलाकशुदा स्त्री द्वारा नये संबंध स्थापित करने के बाद पूर्व के दाम्पत्य संबंध से हुए संतान की जटिल स्थिति का चित्रण किया गया है। 1979 ई. में प्रकाशित इनका दूसरा उपन्यास ‘महाभोज’ में राजनीति के अपराधीकरण और मूल्यहीनता की कथा है।
ममता कालिया
ममता कालिया के प्रसिद्ध उपन्यास ‘बेघर’ का प्रकाशन 1971 ई. में हुआ। इस उपन्यास में उन्होंने परंपरागत सामाजिक व्यवस्था में स्त्री के ऊपर यौनशुचिता का बंधन किस क्रूरता और निर्णायक ढंग से आरोपित है, इसका चित्रण किया है। ममता कालिया के अन्य उपन्यास हैं ‘नरक दर नरक’ (1975 ई.), ‘प्रेम कहानी’ (1980 ई.), ‘एक पत्नी के नोट्स 1997 ई.) आदि।
मृदुला गर्ग
‘उसके हिस्से का धूप’ मृदुला गर्ग का पहला उपन्यास है। इसका प्रकाशन 1975 ई. में हुआ। उनके अन्य उपन्यास हैं- ‘चितकोबरा’ (1979 ई.), ‘अनित्य’ (1980 ई.), ‘कठगुलाब’ (1996 ई.) आदि। ‘उसके हिस्से का धूप’ तथा ‘चितकोबरा’ में आधुनिक नारी के मन और संबंध की जटिल स्थिति तथा देह संबंध में पारंपरिक वर्जना के अस्वीकार का चित्रण किया गया है। ‘अनित्य’ में स्वतंत्रता के दो दशक पूर्व से लेकर स्वतंत्रता के लगभग एक दशक के बाद की राजनीतिक गतिविधियों को विषय बनाया गया है।
सूर्यबाला
1980 ई. के आसपास सूर्यबाला का उपन्यास ‘सुबह के इंतज़ार तक’ प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में निम्न मध्यवर्गीय समाज की विडंबना को चित्रित किया गया है। 1991 ई. में प्रकाशित ‘यामिनी कथा’ में पूर्व पति से हुए संतान तथा वर्तमान पति के बीच मानसिक रूप से बँटी स्त्री का चित्रण किया गया है। ‘जूझ’ (1992 ई.) में शैक्षणिक परिसर (campus) की वास्तविकता को व्यक्त किया गया है।
चंद्रकांता
चंद्रकांता ने उपन्यास लेखन की शुरुआत लघु उपन्यासों से की। 1981 ई. में उनके ‘अर्थातरण’ तथा ‘अंतिम साक्ष्य दो लघु उपन्यासों का प्रकाशन हुआ। ‘बाक़ी सब खैरियत’ (1983 ई.), ‘ऐलान गली जिंदा है’ (1984 ई.), ‘यहाँ वितस्ता बहती है’ (1992 ई.) तथा ‘अपने-अपने कोणार्क’ (1995 ई.) इनके अन्य उपन्यास हैं। इनके दो उपन्यास ‘ऐलान गली जिंदा है’ तथा ‘यहाँ वितस्ता बहती है’ कश्मीर की पृष्ठभूमि पर आधारित है। ‘अपने-अपने कोणार्क में एक पढ़ी लिखी आत्मनिर्भर लड़की का सामाजिक मान्यताओं के साथ उसके अंतद्वंद्ध का चित्रण किया गया है।
नासिरा शर्मा
ईरान की पृष्ठभूमि पर आधारित ‘सात नदियाँ एक समुंदर नासिरा शर्मा का पहला उपन्यास है जिसका प्रकाशन 1984 ई. में हुआ। इस उपन्यास में नासिरा शर्मा ने तत्कालीन दौर के ईरान के राजनीतिक-सांस्कृतिक संकट का चित्रण किया है। ‘शाल्मली’ (1987 ई.) में हिंदू परिवार और समाज में तथा ‘ठीकरे की मँगनी’ (1989 ई.) में मुस्लिम समाज में स्त्री के दोयम दर्जे का चित्रण किया गया है। ‘जिंदा मुहावरे’ (1993 ई.) में विभाजन के बाद भारत में रह गए या पाकिस्तान चले गए, दोनों ही स्थितियों में मुस्लिम समाज की यंत्रणा और अलगाव-बोध का चित्रण किया गया है।
प्रभा खेतान
प्रभा खेतान का पहला उपन्यास 1990 ई. में ‘आओ पेपे घर चलें’ नाम से प्रकाशित हुआ। इसमें अमेरिकी समाज में स्त्री के त्रासद जीवन का चित्रण है। ‘छिन्नमस्ता’ (1993 ई.), ‘अपने-अपने चेहरे’ (1994 ई.) ‘पीली आँधी’ (1996 ई.) आदि उपन्यासों में विभिन्न संदर्भों में भारतीय सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था में स्त्री के ऊपर आरोपित वर्जनाएँ, उनके शोषण तथा संघर्ष का चित्रण किया गया है।
मैत्रेयी पुष्पा का पहला उपन्यास ‘स्मृति दंश’ (1990 ई.) है। इसके बाद ‘बेतवा बहती रही’ (1993 ई.) का प्रकाशन हुआ। इन उपन्यासों में पुरुष वर्चस्व वाले समाज में स्त्री की यंत्रणा का वर्णन किया गया है। ‘इदन्नमम’ (1994 ई.) बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास है। इस उपन्यास में भी विषय स्त्री का शोषण है लेकिन यहाँ स्त्री की संघर्षशीलता का भी चित्रण किया गया है। ‘चाक’ (1997 ई.), ‘झूला नट’ (1999 ई.), ‘अल्मा कबूतरी’ (2000 ई.) आदि मैत्रेयी पुष्पा के अन्य उपन्यास हैं।
चित्रा मुद्गल
1990 ई. में प्रकाशित अपने पहले उपन्यास ‘एक ज़मीन अपनी’ में चित्रा मुद्गल ने विज्ञापन की दुनिया की मूल्यहीनता, पुरुष द्वारा स्त्री को भोग्या समझे जाने की स्थिति तथा स्त्री द्वारा पारंपरिक पुरुषवादी सोच के प्रतिरोध का चित्रण किया है। 2000 ई. में प्रकाशित ‘आवाँ’ में एक स्त्री के शोषण और संघर्ष की कथा है। देह को लेकर उसे बार-बार अनचाही स्थिति का सामना करना पड़ता है। इन सबके बावजूद वह मज़दूरों के अधिकार के लिए संघर्ष करती है। ‘नालासोपारा’ इनका अन्य महत्वपूर्ण उपन्यास है।
अलका सरावगी
1998 ई. में अलका सरावगी का पहला उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाइपास’ प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में मारवाड़ी समाज की पाँच पीढ़ियों की कथा है। मारवाड़ी समाज की कथा के साथ विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हलचल को भी व्यक्त किया गया है। इनके अन्य उपन्यास हैं ‘शेष कादंबरी’, ‘एक ब्रेक के बाद’ आदि।
हिंदी कहानी :
हिंदी कहानी का उद्भव और विकास, 20वीं सदी की हिंदी कहानी और प्रमुख कहानी आंदोलन एवं प्रमुख कहानीकार।
हिंदी कहानी का उद्भव और विकास
प्रेमचंद युग से पूर्व की हिंदी कहानी
उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही हिंदी में मौखिक कथाओं को लिखित रूप देने की परंपरा शुरू हुई। इस शताब्दी में लिखी गई किसी भी कहानी को ‘आधुनिक कहानी’ की संज्ञा नहीं दी जा सकती। इस समय लिखी सभी कहानियाँ या तो मध्यकालीन सूफ़ी आख्यानों की नकल हैं या प्राचीन संस्कृत साहित्य का अनुवाद या रूपांतरण।
इस शताब्दी की रचनाओं में पहली कहानी है इंशाअल्ला खाँ कृत ‘रानी केतकी की -कहानी’। इसकी रचना 1803 ई. में हुई थी।
‘रानी केतकी की कहानी मध्यकाल में प्रचलित प्रेमाख्यानकों का आधुनिक गद्य रूप है। इसके अतिरिक्त इस शताब्दी के प्रथम सात दशकों में संस्कृत, फारसी और अँग्रेज़ी में उपलब्ध कथाओं के हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत किए गए।
पं. गौरीदत्त ने ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ (1870) लिखी जो अपनी प्रकृति में उपन्यास और कहानी दोनों का मूल रूप है। आधुनिक कहानी यथार्थ के आधार पर खड़ी होती है और ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ यथार्थ की जमीन से दृढ़तापूर्वक जुड़ी हुई है। पर ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ से यद्यपि इसके शीर्षक में कहानी शब्द जुड़ा हुआ है हम हिंदी कहानी का आरंभ नहीं मान सकते। विधा के रूप में कहानी का जन्म उसके बीस वर्ष बाद 1901 ई. में प्रकाशित माधवराव सप्रे की कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी से हुआ। यह एक रोचक तथ्य है कि कहानी शब्द का प्रयोग ‘रानी केतकी की कहानी’ और ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ दोनों में हुआ है पर ‘रानी केतकी की कहानी’ में कहानी शब्द का प्रयोग परंपरागत कथा के रूप में हुआ है जबकि ‘देवरानी जेठानी की कहानी में कहानी पद के उपयोग के पीछे नवल कथा की अवधारणा है। यह कहानी किसी राजा-रानी की कहानी न होकर एक मध्यवर्ग के देवरानी और जेठानी की कहानी है। यह कहानी चूँकि शिल्प के रूप में कथा की प्रविधि का अनुकरण करती है, उसमें ‘किस्सागों’ शुरू से आखिर तक विद्यमान है अतः वह आधुनिक कहानी की शर्तों को पूरा नहीं करती परंतु कथ्य में निहित यथार्थवादी स्वर को देखते हुए उसे आधुनिक कहानी का पूर्व रूप मानने में किसी विवाद की गुंजाइश नहीं है।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में फोर्ट विलियम कॉलेज के तत्वावधान में ‘बैताल पचीसी’, ‘प्रेमसागर’, ‘राजनीति’ और ‘चंद्रावती’ या ‘नासिकेतोपाख्यान’ का अनुवाद किया गया। इसके अलावा उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम तीन दशकों में ‘माघोनल’, ‘माघव विलास’, ‘नीति-कथा, ‘गोरा बादल की बात’, ‘सुखसागर’, ‘उपदेश कथा नामक कथा पुस्तकें अनूदित की गईं। ‘गोरा बादल की बात’ को छोड़कर सभी पुस्तकों की रचना पाठ्यपुस्तकों के रूप में की गई थी। इस समय ‘किस्सा हातिमताई’, ‘किस्सा चहादरवेश’, ‘सूरजपुर की कहानी’, ‘कथासागर’, ‘वीरसिंह का वृत्तांत’, ‘वामामनरंजन’, ‘लड़कों की कहानी’, ‘रॉबिन्सन क्रूसो का इतिहास’, ‘यात्रा स्वप्नोदय’, ‘गुलबकावली’ आदि रचनाएँ प्रकाशित हुई। ये सभी रचनाएँ अनूदित हैं। 1886 ई. में राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ ने ‘राजा भोज का सपना’ लिखा। इन कहानियों में कहीं भी यथार्थ का आग्रह नहीं है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य के इतिहास’ में निम्नलिखित कहानियों की सूची दी है :
(1) इंदुमती (किशोरीलाल गोस्वामी), 1900 ई.
(2) गुलबहार (किशोरीलाल गोस्वामी), 1902 ई.
(3) प्लेग की चुड़ैल (मास्टर भगवानदास), 1902 ई.
(4) ग्यारह वर्ष का समय (रामचंद्र शुक्ल), 1903 ई.
(5) दुलाईवाली (बंग महिला), 1907 ई.
बाद में माधवराव सप्रे की कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ का पता चला जो 1901 ई. में लिखी गई थी। यह कहानी आधुनिक ढंग की कहानी है। कुछ विद्वान ‘इंदुमती’ को हिंदी की पहली कहानी मानते हैं। परंतु यह मौलिक कहानी नहीं है। इसकी कथावस्तु शेक्सपियर के नाटक ‘टेम्पेस्ट’ पर आधारित है। अंतर केवल यह है कि इसमें वातावरण भारतीय है। यह कहानी भी परंपरागत किस्से की शैली से मुक्त नहीं हो सकी है। इससे भी पहले 1887 ई. में ‘प्रणयिणी परिणय’ नाम से किशोरीलाल गोस्वामी की एक कहानी प्रकाशित हो चुकी थी। परंतु इसे किसी भी कोण से आधुनिक कहानी नहीं कहा जा सकता। इसका कथ्य, शिल्प, भाषा सब कुछ पारंपरिक गद्य कथाओं का अनुकरण है।
बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में ही वृंदावनलाल वर्मा की कहानी ‘राखीबंद भाई’ (1909 ई.) प्रकाशित हुई। उनकी दूसरी कहानी ‘ततार और वीर राजपूत’ (1910) थी। बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में आधुनिक ढंग की कहानियों की धूम मच गई। पत्र-पत्रिकाओं में आधुनिक ढंग की कहानियाँ प्रकाशित होने लगीं। ‘इंदु’ पत्रिका में जयशंकर प्रसाद की पहली कहानी ‘ग्राम’ 1911 ई. में प्रकाशित हुई। 1911 ई. में ही ‘भारत मित्र’ में चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘सुखमय जीवन’ छपी। राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह प्रेमचंद युग के एक महत्वपूर्ण कहानीकार हैं। इनकी पहली कहानी ‘कानों में कंगना’ 1913 ई. में प्रकाशित हुई थी। यह कहानी सामंती पारिवारिक संरचना की विडंबनापूर्ण स्थिति को सामने लाती है। इस कहानी में पत्नी तथा वेश्या के प्रति प्रेम और इससे उत्पन्न टकराहट भरी स्थिति को चित्रित किया गया है। ‘सुरबाला’, ‘मरीचिका’, बिजली आदि इनकी अन्य कहानियाँ हैं। विवेच्य अवधि के अंतिम वर्ष (1938 ई.) में ‘गांधी टोपी’ नाम से इनका संग्रह छपा जिसमें ‘गांधी टोपी’, ‘दरिद्रनारायण’ आदि महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं। 1914 ई. में आचार्य चतुरसेन की कहानी ‘गृहलक्ष्मी’ छपी। प्रेमचंद की हिंदी में पहली कहानी ‘सौत’ 1915 ई. में ‘सरस्वती’ में छपी यद्यपि 1908 ई. में ही उर्दू में उनका पहला कहानी संग्रह ‘सोजेवतन’ प्रकाशित हो चुका था। बालकृष्ण शर्मा नवीन की कहानी ‘संतू’ 1918 ई. में ‘सरस्वती’ में छपी।
कहानियाँ तो इस दशक में ख़ूब लिखी गई पर चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ ने सबको पीछे छोड़ दिया। यह कहानी 1915 ई. में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुई थी। गौरतलब है कि प्रेमचंद की पहली कहानी ‘सौत’ भी इसी वर्ष ‘सरस्वती’ में ही प्रकाशित हुई थी। परंतु अपने कथ्य, शिल्प, भाषा और पूरी बनावट में ‘उसने कहा था’ था’ समय से काफ़ी आगे की कहानी है।
प्रेमचंद युग
हिंदी कहानी में प्रेमचंद का आगमन 1915 ई. में हुआ। हिंदी कहानी की यथार्थवादी और आलोचनात्मक परंपरा को प्रेमचंद ने न केवल आगे बढ़ाया बल्कि उसे नई दिशाएँ भी दिखाई।
प्रेमचंद ने तीन सौ से ऊपर कहानियाँ लिखी हैं। 1908 ई. से 1915 ई. के बीच प्रेमचंद की चालीस कहानियाँ उर्दू में प्रकाशित हुई। 1908 ई. में ‘सोजेवतन’, 1914 ई. में ‘प्रेमपचीसी’ भाग-1 और 1918 ई. में भाग-2 कहानी संग्रहों का प्रकाशन हुआ। ‘सोजेवतन’ में देशप्रेम से युक्त कहानियाँ संकलित हैं। इसके अलावा अन्य संग्रहों में मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार की समस्याओं, मानवीय मूल्यों, धार्मिक पाखंडों और सामाजिक रुढ़ियों का वर्णन हुआ है। इस समय प्रेमचंद ने ‘सिर्फ एक आवाज’ नामक कहानी लिखी जो अछूतोद्धार से संबंधित है। इस कहानी में प्रेमचंद की दलित संवेदना प्रकट हुई है।
1915 ई. में प्रेमचंद की पहली हिंदी कहानी ‘सौत’ प्रकाशित हुई। प्रेमचंद की कहानी कला में विकास की दृष्टि से 1916-29 ई. का काल विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस काल में लिखी कहानियाँ विषय-वैविध्य, सामाजिक चेतना, मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि और कहानी कला के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
प्रेमचंद की कहानियों में तत्कालीन यथार्थ के विविध रूपों का चित्रण हुआ है। उन्होंने साम्प्रदायिक भेदभाव, दलित के शोषण तथा स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी कहानियाँ भी लिखीं।
प्रेमचंद की कहानियों में आदर्श और यथार्थ का समन्वय मिलता है। लेकिन धीरे-धीरे प्रेमचंद अपने ‘आदर्शों’ से मुक्त होते गए और उनकी कहानियाँ ‘यथार्थ’ चित्रण की सशक्त हथियार बन गईं।। ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘ठाकुर का कुँआ’, ‘सद्गति’ आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं।
जयशंकर प्रसाद
जयशंकर प्रसाद की पहली कहानी ‘ग्राम’ 1911 ई. में प्रकाशित हुई। इसी के बाद ‘छाया’
नाम से उनका कहानी-संग्रह प्रकाशित हुआ।
संबंधों की जटिलता, द्वंद्व और अंतर्विरोध को प्रसाद अपने पात्रों के ज़रिए सूक्ष्मता से वर्णित करते हैं। प्रसाद की कहानियों में वर्णित घटनाएँ अवास्तविक लगते हुए भी मन को छूती हैं।
विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ और सुदर्शन प्रेमचंदकालीन प्रमुख कहानीकार हैं। ये दोनों ही प्रेमचंद की परंपरा के कहानीकार माने जाते हैं। कौशिक की ‘रक्षाबंधन’ 1912 में प्रकाशित हुई। उन्होंने अपनी कहानियों में बाल विवाह, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा जैसी अनेक पारिवारिक समस्याओं को चित्रित किया है। उन्होंने दो सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं हैं। ‘ताई’ और ‘पगली’ कौशिक की प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
सुदर्शन ने भी अपनी कहानियों में पारिवारिक जीवन को चित्रित किया है। उनकी कहानियों पर परंपरागत भारतीय कथा और परंपरा का प्रभाव दीखता है। हृदय परिवर्तन, सत्य की विजय और परंपरागत सकारात्मक मूल्यों की स्थापना उनकी कहानियों का मुख्य स्वर है। ‘हार की जीत’ और ‘कवि की स्त्री’ सुदर्शन की लोकप्रिय कहानियाँ हैं।
चतुरसेन शास्त्री, रायकृष्ण दास और विनोदशंकर व्यास प्रसाद की परंपरा के कहानीकार हैं। इनकी कहानियाँ ऐतिहासिकता, प्रेम और करुणा को आधार बनाकर लिखी गई है।
1923 ई. में पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ ने अपनी पहली कहानी ‘चिनगारियाँ’ लिखी। उग्र ने अपनी कहानियों में समाज का यथार्थ अनावृत रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी कहानियों में सामाजिक शोषण और कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आक्रोश है। ‘चिनगारियाँ’ कहानी संग्रह में राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत कहानियाँ हैं। इसलिए इस कहानी संग्रह को सरकार ने जब्त कर लिया था। उनकी कहानियाँ व्यंग्य के पैनेपन के लिए जानी जाती हैं। कलात्मक दृष्टि से उग्र की कहानियाँ बहुत श्रेष्ठ नहीं कही जा सकती परंतु विषय और उसके विश्लेषण की दृष्टि से वह अपने युग के कथाकारों से आगे थे।
जैनेन्द्र ने हिंदी कहानी को नई संभावनाओं से जोड़ा और उसे नई दिशा दिखाई। हिंदी कहानी के विकास में उनका योगदान यह है कि उन्होंने कहानी की वृत्तात्मकता और वर्णनात्मकता का त्याग किया और चरित्र के माध्यम से ही कहानी कहने का प्रयास किया। ऐसा नहीं था कि इससे पहले कहानी में पात्र होते ही नहीं थे। पात्रों के बिना तो कहानी बन ही नहीं सकती। परंतु वहाँ पात्र प्रमुख नहीं हुआ करते थे, घटनाएँ प्रमुख होती थीं। पात्र घटनाओं के बहाव में बहते थे। जैनेन्द्र ने इस क्रम को उलट दिया। अब पात्र प्रमुख हो गए।
खेल’, ‘नीलम देश की राजकन्या’, ‘पाजेब’, ‘एक दिन’ आदि उनकी प्रमुख कहानियाँ हैं। इनमें व्यक्ति मन की दुविधाओं, द्वंद्वों, अंतर्विरोधों, शंकाओं, आदि का अंकन किया गया है।
प्रेमचंदोत्तर कहानी
अज्ञेय, यशपाल आदि कहानीकार प्रेमचंद युग से ही हिंदी कहानी में सक्रिय थे, लेकिन इनकी कहानियों का बड़ा हिस्सा प्रेमचंद युग के बाद लिखा गया।
अज्ञेय का प्रथम कहानी संग्रह ‘विपथगा’ 1931 ई. में प्रकाशित हुआ था। विपथगा युद्ध विरोधी तथा नारी मुक्ति की कहानी है। ‘अमरवल्लरी’, ‘हरसिंगार’ आदि कहानियों में अज्ञेय का रोमानी और भावुक मन हिलोरे मारता दिखाई पड़ता है। इन कहानियों में प्रेम का अंकन हुआ है और स्त्री का आदर्श रूप सामने आया है। इनमें प्रेम के अछूते आयामों को पकड़ने का प्रयास किया गया है। जिजीविषा, चिड़िया घर, पहाड़ी जीवन’ आदि कहानियों में सहज मानवीय स्थितियों का अंकन किया गया है। अज्ञेय की आरंभिक कहानियों में रोमानीपन है परंतु गैंग्रीन’ जैसी कहानियाँ यथार्थ पर आधारित है। ‘विपथगा’, कोठरी की बात’, शरणार्थी, ‘जयदोल’, ‘अमर वल्लरी और ये तेरे प्रतिरूप उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह है।
इलाचंद्र जोशी
इलाचंद्र जोशी की कहानियां विभिन्न मनोवैज्ञानिक स्थितियों को दर्शाती है।
खंडहर की आत्माएँ, ‘डायरी के नीरस पृष्ठ’, ‘आहुति’ और ‘दीवाली’ उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं।
यशपाल सामाजिक यथार्थवादी रचनाकार है। प्रेमचंद की प्रगतिशील चेतना यशपाल में प्रखर रूप से प्रकट हुई। माक्र्सवादी दर्शन को आधार बनाकर यशपाल ने समाज में फैली विषमता पर आघात किया। यशपाल ने मनोवैज्ञानिक और यौन समस्याओं पर भी कहानियाँ लिखी है। ‘चित्र का शीर्षक’, ‘आतिथ्य’, ‘गवाही’, प्रतिष्ठा का बोझ’, ‘परदा, ‘मक्रील’, ‘मक्खी या मकड़ी’, ‘आदमी का बच्चा, ‘कोकला डकैत’ आदि उनकी कुछ प्रमुख कहानियां हैं।
नई कहानी
बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में कहानियाँ एकाएक महत्वपूर्ण हो उठीं और कहानियों की अनेक पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगीं। 1954 ई. में ‘कहानी’ पत्रिका का पुनर्प्रकाशन आरंभहुआ। ‘नई कहानी’ के नाम से एक कहानी आंदोलन की शुरुआत हो गई। नए भावबोध की कहानियाँ होने के कारण इन्हें ‘नई कहानी’ का नाम दिया गया। यह एक साथ मूल्य-भंग और मूल्य-निर्माण की कहानियाँ हैं।
मार्कंडेय, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, अमरकांत, भीष्म साहनी, फणीश्वरनाथ रेणु, निर्मल वर्मा, शेखर जोशी, शैलेश मटियानी, उषा प्रियंवदा, राजकमल चौधरी, हरिशंकर परसाई, धर्मवीर भारती, शिवप्रसाद सिंह, रामकुमार, रमेश बक्षी, कृष्ण बलदेव वैद, कृष्णा सोबती आदि इस युग और प्रवृत्ति के प्रमुख कहानीकार हैं।
इन कहानीकारों को ‘नए कहानीकार’ कहा जाता है। इन्होंने अलग-अलग ढंग से आधुनिक जीवन के ‘संकट’ को चित्रित किया है और इन सबकी प्रतिक्रिया अलग-अलग है। ‘नई कहानी’ के पुरोधा होने के बावजूद इनकी मानसिकता, विचार और कहानी कहने का ढंग एक जैसा नहीं है। नई कहानी’ का नयापन कोई नारा नहीं है बल्कि नया जीवन-बोध और दृष्टि है। यह लेखक का भोगा हुआ यथार्थ है। इसलिए ‘नई कहानी’ के लेखकों ने विषय के अनुसार अलग-अलग शिल्प अपनाया।
डॉ. नामवर सिंह ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ को पहली ‘नई कहानी और निर्मल वर्मा को पहला नया कहानीकार कहा है। नामवर जी का यह निर्णय सर्वमान्य नहीं है। मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव आदि ने टूटते हुए परिवार, महानगरीय अकेलेपन और आधुनिक जीवन की विडंबनाओं और विसंगतियों को अपनी कहानी का विषय बनाया है। राजेंद्र यादव की ‘एक कमजोर लड़की की कहानी’, ‘टूटना’, ‘किनारे से किनारे तक’ कमलेश्वर की ‘राजा निरबंसिया’, ‘खोई हुई दिशाएँ’; मोहन राकेश की ‘एक और ज़िंदगी’, ‘सुहागिनें’, ‘आखिरी सामान’ आदि कहानियों में प्रेम और दाम्पत्य जनित विभिन्न स्थितियों को चित्रित किया गया है। इन कहानियों में आधुनिक जीवन में नितांत निजी संबंधों में घर कर गई कुंठा, तनाव, अजनबीपन आदि की अभिव्यक्ति है। अमरकांत शोषित वर्ग के कथाकार हैं। उन्होंने निम्न मध्यवर्गीय परिवार की वंचनाओं और विडंबनाओं को अपनी कहानियों में बहुत अच्छे ढंग से पिरोया है। इस लिहाज से ‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलक्टरी’, ‘सुख-दुख का साथ’ उल्लेखनीय कहानियाँ है। भीष्म साहनी इस दौर के एक प्रमुख कहानीकार हैं। उनकी ‘चीफ की दावत’ हिंदी की अविस्मरणीय कहानी है। ‘पहला पाठ’ शीर्षक कहानी में उन्होंने आर्य समाजी मूल्य व्यवस्था के अंतर्विरोध को सामने लाया है। ‘तमगे’, ‘समाधि भाई राम सिंह’, ‘अमृतसर आ गया है’, ‘साग- मीट’, ‘पटरियाँ’ आदि उनकी महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं। फणीश्वरनाथ रेणु, मार्कंडेय, शिव प्रसाद सिंह और विवेकी राय ग्रामीण संवेदना के कथाकार हैं। फणीश्वरनाथ रेणु ने हिंदी कहानी में एक नई कोटि-आंचलिक कहानी को विकसित किया। इसका तात्पर्य यह है कि ये कहानियाँ जिस क्षेत्र विशेष की है वहाँ की बोली-बानी, गीत-संगीत, मान्यताएँ, तीज-त्योहार और जीवन के ढब का कहानी में केंद्रीय स्थान होता है। वस्तु के स्तर पर रेणु ने प्रेम और विस्थापन को प्रमुखता से अपना विषय बनाया है। ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’, ‘रसप्रिया’, ‘एक आदिम रात्रि की महक उनकी प्रसिद्ध प्रेम कहानियाँ हैं। विघटन के क्षण’, ‘भित्तिचित्र की मयूरी’, ‘उच्चाटन’ आदि कहानियों में उन्होंने गाँव से होने वाले विस्थापन को अपना विषय बनाया है। मार्कंडेय की कहानियों में योजनाओं के नाम पर की जा रही ठगी को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। इस लिहाज से ‘भूदान’, ‘आदर्श कुक्कुट गृह’ आदि उनकी महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं। ‘हंसा जाई अकेला’ प्रेम संवेदना की कहानी है। ‘गुलरा के बाबा में ग्रामीण जीवन के बदलते यथार्थ को दर्शाया गया है। शिव प्रसाद सिंह की ‘कर्मनाशा की हार’ में ग्रामीण जीवन की रूढ़ियों और संकीर्णताओं का चित्रण किया गया है। ‘अरूंधती’, ‘केवड़े का फूल’, ‘रेती’ आदि कहानियों में उन्होंने स्त्री के साथ होने वाले ज्यादतियों का चित्रण किया है। विवेकी राय ने अपनी कहानियों में आज़ादी के बाद उपेक्षित गाँवों को विषय बनाया है। शानी मध्यवर्ग और मुस्लिम जीवन का चित्र खींचते हैं। रांगेय राघव ने मध्यवर्ग, सत्ता-व्यवस्था, मज़दूरों की स्थिति, बेरोजगारी तथा आम जन की पीड़ा को अपनी कहानियों में पिरोया, परंतु उनकी हिंदी कहानी में उनकी प्रतिष्ठा उनकी बेहद सराही गई कहानी ‘गदल’ के कारण है। इस कहानी में एक ओर प्रेम संबंध की सूक्ष्म अभिव्यक्ति हुई है वहीं स्त्री के स्वाभिमान को बड़े ही संवेदनशील रूप से प्रस्तुत किया गया है। ‘मृगतृष्णा’, ‘कुत्ते की दुम और शैतान’ आदि इनकी अन्य कहानियाँ हैं। शैलेश माटियानी की कहानी के दो आयाम हैं एक ओर उन्होंने पहाड़ी जीवन से संबद्ध कई महत्वपूर्ण कहानियाँ लिखीं। ऐसी कहानियों में ‘रमौती’, ‘जिबूका’, ‘पोस्टमैन’, ‘कालिका अवतार’, ‘वह तू ही था आदि उल्लेखनीय हैं। ‘कालिक अवतार’ में इस समाज विशेष के अंधविश्वास को विषय बनाया गया है। ‘जिबूका’ में यह दर्शाया गया है कि एक निम्न तबके का बच्चा पारिवारिक कुत्सा का कैसे शिकार होता है। पहाड़ी जीवन से अलग इन्होंने बंबई के निम्नवर्गीय तथा हाशिए के जीवन-यथार्थ को अपनी कहानियों में प्रमुखता से स्थान दिया है। ‘गंगाराम वल्द जमनादास’, ‘चिथड़े’, ‘सिने गीतकार’, पत्थर आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं। निर्मल वर्मा स्मृति-दंश, चीख और टेरर उभारने में माहिर हैं। हरिशंकर परसाई अपने व्यंग्य से कहानी को नया रूप देते हैं। उषा प्रियंवदा, मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती अपनी कहानियों में आधुनिक महिलाओं की परेशानियों, समस्याओं और दुविधाओं का चित्रण करती हैं। उषा प्रियंवदा की प्रसिद्ध कहानी ‘वापसी’ में परिवार के अंदर बुजुर्ग की उपेक्षा का चित्रण किया गया है। उनकी ‘मछलियाँ’, ‘सागर पार संगीत’, ‘झूठा दर्पण’ आदि कहानियों में प्रेम संबंध को विविध रूपों में दर्शाया गया है। मन्नू भंडारी के ‘त्रिशंकु’ में प्रेम के संदर्भमें परंपरागत दृष्टिकोण तथा आधुनिक दृष्टिकोण के अंतद्वंद्व का चित्रण किया गया है। ‘रानी माँ का चबूतरा में स्त्री संघर्षशीलता और स्वाभिमान को उभारा गया है। ‘यही सच है’ तथा ‘ऊँचाई’ में प्रेम के संदर्भ में कहानीकार परंपरागत दृष्टिकोण को अस्वीकार करतीं हैं।
अकहानी
सन् 1960-62 के आस-पास ‘नई-कहानी’ के स्थान पर ‘अ-कहानी’ को प्रतिष्ठित किया गया। इसके समर्थक गंगाप्रसाद विमल, रवींद्र कालिया, दूधनाथ सिंह, प्रयाग शुक्ल, सुधा अरोड़ा, ज्ञानरंजन, रमेश बक्षी, श्रीकांत वर्मा, विजयमोहन सिंह, विश्वेश्वर आदि थे। ‘अ-कहानी’ आन्दोलन ‘नई कहानी’ के विरोध में शुरू हुआ था। इसमें नई कहानी की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ सामने आईं। ‘नई कहानी’ के विरोध में दूसरा आन्दोलन ‘सचेतन कहानी’ है। इसके पुरोधा डॉ. महीप सिंह है। इसका आरंभ सन् 1964 में आधार पत्रिका के ‘सचेतन कहानी विशेषांक’ के प्रकाशन के साथ माना जा सकता है।’सचेतन कहानी’ आन्दोलन ने पश्चिम से आयातित जीवन-मूल्यों निराशा, कुण्ठा, ऊब, अकेलापन, अनास्था आदि का विरोध किया। इस आन्दोलन में भारतीय परिवेश के भीतर सहज गति से प्रवाहमान जीवन स्थितियों को स्वीकार कर संघर्षशील चेतना की सक्रियता पर बल दिया। इस आन्दोलन से महीप सिंह, कमल जोशी, मधुकर सिंह, योगेश गुप्त, वेद राही, हिमांशु जोशी, मनहर चौहान आदि जुड़े रहे।
इसके बाद अमृतराय ने ‘सहज कहानी’ का नारा दिया, पर यह आन्दोलन का रूप नहीं ले सका। इसमें अमृतराय ने किसी भी प्रकार के बने-बनाए ढाँचे का विरोध किया। सन् 1972 के आस-पास कमलेश्वर, जो ‘नई कहानी’ के सशक्त हस्ताक्षर थे, ने ‘सारिका’ पत्रिका के माध्यम से ‘समान्तर कहानी आन्दोलन’ चलाया। इस ‘समान्तर कहानी आन्दोलन’ ने ‘आम आदमी’ को कहानी में प्रतिष्ठित किया।
सन् 1979 में राकेश वत्स ने ‘मंच’ पत्रिका के माध्यम से ‘सक्रिय कहानी’ आन्दोलन का सूत्रपात किया। इसकी अवधारणा में ‘समान्तर कहानी’ और ‘जनवादी कहानी’ की अवधारणा घुल-मिल गई। इसके कारण इसका प्रभाव सीमित रहा।
। डॉ. गंगाप्रसाद विमल ‘एँटी स्टोरी’ की तर्ज पर ‘अकहानी’ के प्रमुख प्रवक्ता बने। इसमें सबकुछ के अस्वीकार पर बल दिया गया। साठोत्तरी कहानी के प्रमुख कहानीकार हैं- ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, महेन्द्र भल्ला, राजकमल चौधरी आदि। ‘अकहानी’ का बहुत बड़ा भाग संबंधों पर केंद्रित है। संबंध में आ रहे अपरिचय, विक्षोभ आदि को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। इस दृष्टि से ज्ञानरंजन की ‘पिता’, ‘शेष होते हुए’, ‘यात्रा’, ‘संबंध’ आदि महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं। काशीनाथ सिंह की ‘आखिरी रात’, ‘सुबह का डर’, रवींद्र कालिया की ‘त्रास’ भी संबंधों में आ रहे अजनबीयत को दर्शाती है। ज्ञानरंजन की कहानी ‘फेंस के इधर उधर’ में सामाजिक संबंधहीनता की कहानी है। इसके अलावा ‘पिता’, ‘अमरूद का पेड़’ जैसी कहानियों में परिवार में बनते-बिगड़ते संबंधों, पुरानी और नई पीढ़ी के संघर्ष और उससे उत्पन्न यातना को उकेरा गया है। मध्यवर्गीय अवसरवादिता, दोहरापन, पलायन आदि की प्रवृत्ति को ज्ञानरंजन ने प्रमुखता से उठाया है। इस दृष्टि से उनकी ‘घंटा’ और ‘बहिर्गमन’ महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं। रवींद्र कालिया की कहानियाँ भी नगर-बोध की कहानियाँ हैं। इसमें ‘बड़े शहर का आदमी’, ‘क ख ग’, ‘नौ साल छोटी पत्नी’ उनकी प्रमुख कहानियाँ हैं। ‘चाल’ शीर्षक कहानी में उन्होंने बेरोजगारी की बेबसी और उससे दाम्पत्य संबंध में आती अजनबीयत को दर्शाया है। काशीनाथ सिंह की कहानियों, जैसे ‘सुबह का डर’, ‘चायघर में मृत्यु’, ‘लोग बिस्तरों पर’ आदि में आधुनिक जीवन की विसंगतियों और संवेदनाओं की मौत को बड़े ठंडेपन से पेश किया गया है। ‘सुबह का डर’ में एक आदमी अस्पताल में मौत से जूझ रहा है और दूसरा तफरीह कर रहा है। काशीनाथ सिंह ने ‘लोग बिस्तरों पर’ कहानी में फैंटेसी के ज़रिए अस्मिता और अस्तित्व का सवाल सामने रखा है। ‘कस्बा, जंगल और साब’ में अपने परिवेश से कट जाने और अकेले रहने के लिए अभिशप्त होने की कथा आई है। अकहानी के पुरोधा गंगाप्रसाद विमल की कहानियों में आंतरिक अकेलापन, खालीपन, अस्तित्वहीनता, एकांत, भय आदि चित्रित हुआ है। ‘विध्वंस’, ‘शहर में’ और ‘बीच की दीवार’ उनकी चर्चित कहानियाँ हैं।
विजयमोहन सिंह ने भी अपनी कहानियों में जीवन की विसंगति उजागर की है। ‘कितना अलग’ और ‘भीड़ के बाद’ उनकी चर्चित कहानियाँ हैं।
दूधनाथ सिंह आधुनिकता बोध के कहानीकार हैं। उनकी कहानियों में यह बोध जटिल और
उलझे हुए रूप में सामने आता है। ‘कबंध’ नामक कहानी में समकालीन जीवन में पनपी संवादहीनता की स्थिति को दर्शाया गया है। उनकी लंबी कहानी ‘सुखांत’ में फैंटेसी के माध्यम से समकालीन बौद्धिक संसार को उभारने का प्रयत्न किया गया है। ‘रीछ’ भी एक प्रतीकात्मक कहानी है जिसमें प्रेम और दाम्पत्य के तनाव को उजागर किया गया है।
राजकमल चौधरी की कहानियों में सेक्स के परंपरागत ढाँचों और मूल्यों को तोड़ने का प्रयत्न किया गया है। उनकी ‘पिरामिड’ कहानी इसका स्पष्ट उदाहरण है।
महेंद्र भल्ला की कहानियाँ पाठक के परंपरागत मन को धक्का पहुँचाती हैं, जब वह एक पात्र को सोचते हुए पाता है कि ‘अगर वह मेरी पत्नी न होती तो उसे चूम लेता।’ ‘एक पति के नोट्स’ और महेंद्र भल्ला की अन्य कहानियों में सेक्स का गैर परंपरागत उपयोग किया गया है। इसके अलावा उनकी कहानियों में नगर का एकाकीपन भी बार-बार उभरता है।
इस दौर की कहानियों में आधुनिकता शहरों तक सीमित रह गई। गाँवों तक इसकी पहुँच बहुत धीमी और ढीली है। इसलिए आधुनिक बोध भी नगर-बोध और नगरीकरण में सिमट कर रह गया। परंतु हर नगर का अपना अलग बोध होता है, ख़ासकर कस्बाई बोध, नगरीय बोध और महानगरीय बोध में तो अच्छा-खासा फर्क होता है। गिरिराज किशोर की कहानियों में यही बोध ज़िंदगी के खोखलेपन, खालीपन और रिश्तों के टूटने के रूप में प्रकट हुआ है। उनकी कहानियों में मनुष्य के मन में पड़ी गाँठों को खोलने की कोशिश की गई है।
साठोत्तरी कहानी में प्रतीकों का प्रचुरता से इस्तेमाल होता रहा। महीप सिंह, जगदीश चतुर्वेदी, हृदयेश, हिमांशु जोशी, मृदुला गर्ग, बदीउज्ज्माँ आदि कहानीकारों ने प्रतीकों का इस्तेमाल किया।
साठोत्तर काल के हिंदी कहानीकारों ने शिल्प के क्षेत्र में साहसिक प्रयोग किए हैं।
‘सचेतन कहानी’ के कहानीकारों में महीप सिंह, मनहर चौहान, धर्मेन्द्र गुप्त आदि प्रमुख हैं। महीप सिंह की ‘पानी और पुल’ देश-विभाजन के बाद की परिस्थितियों पर आधारित कहानी है। ‘सन्नाटा’ कहानी में उन्होंने महानगरीय जीवन में घर कर गए संवादहीनता को विषय बनाया है। मनहर चौहान की ‘बीस सुबहों के बाद भी शहरी अजनबीपन को दर्शाता है। इस कहानी में एक लॉज के एक ही कमरे में रहने वाले दो व्यक्तियों के बीच नौकरी की भागमभाग और दिनचर्या के अंतर के कारण बीस दिन बाद मुलाकात हो पाती है।
‘सहज कहानी’ के प्रस्तावक अमृत राय ने कहानी में उब, कुंठा, घुटन की जगह कथा-रस के वापसी का प्रस्ताव किया, पर सहज कहानी का कोई रचनात्मक प्रभाव नहीं दिखाई देता।
‘समांतर कहानी’ का नेतृत्व करते हुए कमलेश्वर ने कहानी में आम आदमी की पुनः वापसी पर बल दिया। मधुकर सिंह, इब्राहीम शरीफ, जितेन्द्र भाटिया, निरूपमा सेवती आदि इस कहानी आंदोलन से जुड़े थे।
‘सक्रिय कहानी’ को राकेश वत्स ने चलाया था जिसमें राकेश वत्स, रमेश बतरा आदि शामिल थे।
इस दौर में श्रीकांत वर्मा, मुक्तिबोध, कुंवर नारायण जैसे हिंदी के कवियों ने भी कहानियाँ लिखी हैं। मुक्तिबोध ने ‘विपात्र’ और ‘ब्रह्मराक्षस’ में एक कलाकार के तनाव और बेचैनी को प्रस्तुत किया है। अपनी बात कहने के लिए मुक्तिबोध कहानी की संरचना को तोड़ने में संकोच नहीं करते। सर्वेश्वेर दयाल सक्सेना की कहानी ‘छाता’ में आधुनिक संवेदना उभरी है। रघुवीर सहाय ने अपनी कहानी ‘मेरे और नंगी औरत के बीच’ में स्त्री-पुरुष के नए संबंध को उजागर किया है। धर्मवीर भारती की कहानी ‘बंद गली का आखिरी मकान’ पर मृत्यु-बोध की छाया मंडराती रहती है।
समकालीन कहानी
कहानी आंदोलनों के बाद की कहानी को सामान्यतः समकालीन कहानी के अंतर्गत रख कर अध्ययन किया जाता है। समकालीन दौर की कहानियाँ किसी प्रकार के दिशा-निर्देश से निर्देशित नहीं है तथा उसमें एक जनपक्षधरता के रूझान की निरंतर मौजूदगी है। इसमें एक क्षीण-सी धारा ग्रामीण जीवन पर लिखने वाले कथाकारों की भी है। आगे चलकर समकालीन कहानी में सांप्रदायिकता का प्रतिरोध तथा भूमंडलीकरण के बाद उत्पन्न नए यथार्थ का चित्रण प्रमुख रूझान बना जो वर्तमान में भी जारी है।
अस्सी के दशक में पंजाब में आतंकवाद का उभार हुआ। इसने सदियों के हिंदू और सिख समाज के बीच की परस्परता को झकझोर दिया। अरुण प्रकाश की ‘भैया एक्सप्रेस’, स्वयं प्रकाश की ‘क्या तुमने सरदार भिखारी देखा है, भीष्म साहनी की ‘झुटपुटा’ तथा महीप सिंह की ‘आओ हँसे’ इसके विविध आयामों पर प्रकाश डालती है।
बाजारवादी मानदंड के तहत पारिवारिक मूल्यों के ध्वस्त होने की कथा अखिलेश की ‘शापग्रस्त’, ‘जलडमरूमध्य तथा उदय प्रकाश की ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ में भी कही गई है। संजय खाती की कहानी ‘पिंटी का साबुन आज की उस स्थिति का बयान करती है जिसमें उपभोग की वस्तुएँ मानवीय संबंध से ज़्यादा प्रश्रय पा रही हैं। रघुनंदन त्रिवेदी की कहानी ‘इंद्रजाल’ विज्ञापन के दुष्प्रभाव को सामने लाती है। जयनंदन की ‘विश्व बाजार का ऊँट’, रमेश उपाध्याय की ‘डॉक्युड्रामा’, संजीव की ‘लिटरेचर,’ धीरेंद्र अस्थाना की ‘पिता’ आदि कहानियाँ भूमंडलीकरण-बाजारवाद के विभिन्न आयामों का उद्घाटन करती हैं।
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक से कहानीकार फिर से गाँव की ओर मुड़ा है और कई अच्छी कहानियाँ सामने आई हैं। शेखर जोशी, शिवमूर्ति, अरुण प्रकाश, संजीव और मिथिलेश्वर ग्रामीण पृष्ठभूमि पर अच्छी कहानियाँ लिख रहे हैं। इनमें नए ढंग के गाँवों का चित्रण हुआ है।
रामदरश मिश्र की कहानियों में भी गाँव का दर्द, अनुभूति और संवेदना व्यक्त हुई है। लेकिन उनकी कहानियाँ केवल गाँव की ही कथा नहीं कहतीं बल्कि शहरी संवेदना और समग्र रूप से मानवीय संवेदना को भी उनकी कहानियों में जगह मिली है। अपने कहानी संग्रह ‘फिर कब आएँगे’ में उन्होंने युगीन संकटों और हादसों का बयान किया है।
शिवमूर्ति ने ‘भारतनाट्यम’ कहानी में ग्रामीण यथार्थ को चित्रित किया है। उन्होंने इस यथार्थ को उसकी समस्त जटिलताओं और पेंचदगियों के साथ प्रस्तुत किया है। इसी प्रकार ‘तिरिया चरित्तर’ में भी परिवेश गाँव का ही है।गाँव में सरकारी योजना आई और इस योजना के साथ आया भ्रष्टाचार और शहर से आयातित हुई अनैतिकता।
विवेकी राय ने अपनी कहानियों में इसी यथार्थ को बेपर्द किया है। आज़ादी के बाद भारत के गाँवों की जैसी उपेक्षा हुई है और जिस प्रकार विकास के नाम पर लूट मची हुई है, इनका जवाब शायद सत्ता के गलियारे में न मिले पर समकालीन रचनाओं में इन्हें अवश्य ढूँढा जा सकता है। विवेकी राय की कहानियों में चरित्र नहीं स्थितियाँ प्रधान हैं, इसलिए उनकी कहानी में हिरामन जैसा पात्र नहीं है। विवेकी राय ठेठ गँवई अंदाज में कहानी कहते हैं। ‘बाढ़ की यमदाढ़’, ‘गोबरभवन में एक दिन’, ‘तिल-मूँग’, ‘रावण’ आदि उनकी कुछ उल्लेखनीय कहानियाँ हैं।
अब्दुल बिस्मिल्लाह की कहानियाँ भी लोक-रस में रची बसी होती हैं। ‘रफ रफ मेल’ ऐसा ही एक प्रसिद्ध कहानी संग्रह है।
मिथिलेश्वर लोक मन के कथाकार हैं। उनकी रचनाओं में गवई ज़िंदगी में मौजूदा शोषण और उसके ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई का चित्रण हुआ है। ‘भोर होने से पहले में कहानीकार का स्तर आशावादी है। उनका मानना है कि सुबह तो होगी ही परंतु, सुबह होने तक अंधेरे से संघर्ष तो करना ही है।
असगर वजाहत, पंकज बिष्ट और स्वयं प्रकाश समकालीन यथार्थ को सहज रूप में चित्रित करते हैं। पंकज बिष्ट ने अपनी कहानी ‘टुंड्रा प्रदेश’ में दो बच्चों की कहानी के ज़रिए, समाज में व्याप्त सामाजिक और आर्थिक विषमता पर तीखा व्यंग्य किया है। आज हमारे समाज में अनेक ‘घर’ ऐसे हैं जिनका गुजारा ‘बच्चों के श्रम’ पर होता है। इसी बाल श्रम की दारुण स्थिति का चित्रण करते हुए पंकज बिष्ट ने यथार्थ का एक नया रूप सामने रखा है। सृजय ने अपने कहानी संग्रह ‘कामरेड का कोट’ में राजनैतिक व्यवस्था पर कटाक्ष किया है। शेखर जोशी ने पहाड़ी पृष्ठभूमि पर अनेक कहानियाँ लिखी है जो ‘मेरा पहाड़’ नामक कहानी संकलन में संकलित हैं। ‘हलवाहा’ और ‘दाज्यू इस संकलन की उत्कृष्ट कहानियाँ हैं। वीरेंद्र सक्सेना ने अपनी कहानियों में मुख्य रूप से ‘स्त्री-पुरुष संबंध को ही आधार बनाया है। विजय ने अपने कहानी संग्रहों ‘अभिमन्यु’, ‘गंगा और डेल्टा’ और ‘क़िले’ में विभिन्न सामाजिक संदर्भों को उठाया है।
बदीउज्जमाँ की कहानी ‘दुर्ग’ (1972) में दुर्ग आज की सड़ाँघ भरी और दमघोंटू व्यवस्था का प्रतीक है जिसे फैंटेसी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। फैंटेसी के माध्यम से इस कहानी में क़िले को तोड़ने की योजना बनाई गई है। क़िला पुरानी व्यवस्था का प्रतीक है जिसका टूटना नई व्यवस्था की माँग है। पंचतंत्र की कथा को आधार बनाकर बदीउज्जमाँ की लिखी कहानी ‘चौथा ब्राह्मण’ आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा में भाग-दौड़ करने वाले नागरिकों पर व्यंग्य है। गाँव से उखड़कर शहर में बसे लोग निर्मूल, अजनबी और एक दूसरे से अनजान बन गए हैं। अलगाव, ऊब और संत्रास ने उन्हें घेर लिया है।
कामतानाथ की कहानियों में यातना का स्वर प्रमुख है। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘पूर्वार्द्ध’ में एक व्यक्ति के परिवार के प्रति लापरवाह होने से पूरे परिवार की बर्बादी का चित्रण किया गया है। वह अपने परिवार से छुटकारा पाने के प्रयत्न में अजीब सी अजनबीयत से घिर जाता है। इससे उसमें भीतर और बाहर तनाव पैदा होता है, जिससे यातना का परिवेश निर्मित होता है।
उदय प्रकाश और अखिलेश ने विषयवस्तु की नवीनता तथा कथन की भंगिमा से समकालीन कहानी में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। उदय प्रकाश की ‘तिरिछ’ में शहरी अपरिचय, आक्रमकता और अमानवीयता का चित्रण किया गया है।
अखिलेश ने ‘ऊसर’, ‘बायोडाटा’ इन दोनों कहानियों में राजनीति से नैतिकता के पूर्णतः लोप होने की स्थिति का चित्रण किया है। इन कहानियों के केंद्र में युवा वर्ग है जो राजनीति को कैरियर के रूप में साधना चाहते हैं और उनमें कोई आदर्श या परिवर्तनकारी चेतना नहीं है। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘चिट्ठी’ युवाओं की बेरोजगारी और विकल्पहीनता को सामने लाती है। ‘ग्रहण’ में अखिलेश ने दलित समुदाय के शोषण तथा प्रतिक्रिया में उनके प्रतिरोध का चित्रण किया है।
दलित संदर्भ
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में दलित चेतना से संपृक्त अनेक कहानियाँ लिखी गई हैं। मार्कंडेय का ‘हलयोग’, हृदयेश की कहानी ‘मनु’ और ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘बैल की खाल’ और ‘सलाम’ तथा विभांशु दिव्याल की ‘गड़ासा’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय कहानियाँ हैं।
इधर स्वयं दलित कथाकारों ने हिंदी कहानी में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। उन्होंने परंपरागत सौंदर्यशास्त्र के मानदंड को अस्वीकार करते हुए नकार तथा विद्रोह को अपना मानदंड बनाया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल चौहान, मोहनदास नैमिशराय, प्रहलादचंद्र दास आदि हिंदी कहानी को नई दिशा और दृष्टि देने वाले प्रमुख कहानीकार हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘यह अंत नहीं’ में उच्च जाति के वर्चस्व वाले समाज में दलित समुदाय के शोषण की कथा सामने लायी गई है। इस कहानी में उन्होंने यह भी दर्शाया है कि व्यवस्था किस प्रकार से दलितों के विरूद्ध पक्षपात करती है। ‘शवयात्रा’ में इन्होंने इस तथ्य का उद्घाटन किया है कि जाति व्यवस्था की विडंबना से दलित समाज भी मुक्त नहीं है। सूरजपाल चौहान की कहानी ‘परिवर्तन की बात’ में इस तथ्य को प्रस्तुत किया गया है कि दलित समाज द्वारा अपनी सामाजिक हैसियत के उत्थान के लिए किए गए हर प्रयास को प्रभुत्वशाली जातियाँ असफल बनाने की चेष्टा करती हैं। मोहनदास नैमिशराय की कहानी ‘अपना गाँव’ परंपरागत, शोषणयुक्त ग्रामीण सामाजिक संरचना के प्रतिकार की कहानी है। प्रहलादचंद्र दास की कहानी ‘लटकी हुई शर्त’ में दलित समुदाय के आत्मसम्मान की तलाश की कथा कही गई है। प्रेम कपाड़िया की ‘जीवन साथी’ मोहनदास नैमिशराय की ‘महाशूद्र’, ‘आवाजें’, डॉ. कुसुम ‘वियोगी’ की ‘आटे सने हाथ, विपिन बिहारी की ‘आमने-सामने’, नीरा परमार की ‘वैतरणी’, कावेरी की ‘सुमंगली’, डॉ. कुसुम मेघवाल की ‘अंगारा’ आदि दलित जीवन से जुड़ी कुछ अन्य महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं।
हिंदी कहानी में स्त्री-स्वर
चंद्रकिरण सौनरेक्सा हिंदी की प्रारंभिक सशक्त महिला कहानीकारों में है। उनकी पहली कहानी ‘घीसू चमार’ 1931 ई. में प्रकाशित हुई थी। चंद्रकिरण सौनरेक्सा ने अपने समय की नारियों के जीवन के विविध पक्षों का चित्रण अपनी कहानियों में किया है।
‘गृहस्थी का सुख’, ‘पहली भूल’, ‘सुबह का भूला’, ‘एजुकेटेड वाइफ’ आदि कहानियों में सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर स्त्री के साथ होने वाले व्यवहार का चित्रण किया गया है। कालांतर में हिंदी कहानी में स्त्री-विमर्श का जो स्वरूप उभरा उसका प्रारंभिक बीज चंद्रकिरण सौनरेक्सा में दिखाई देता है। गोपाल राय के अनुसार, ‘परंपरागत नारी संहिता के विरूद्ध जिहाद छेड़ने वाली लेखिका के रूप में चंद्रकिरण स्मरणीय हैं।
महिलाओं की समस्याओं, संघर्षों और लड़ाइयों को कई महिला कहानीकार अपनी कहानियों में अभिव्यक्ति दे रही हैं। इनमें प्रमुख हैं मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, राजी सेठ, शशिप्रभा शास्त्री, मंजुल भगत, मधु कांकरिया, सूर्यबाला, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा, चंद्रकांता, उर्मिला शिरीष, अलका सरावगी, मुक्ता, कमल कुमार आदि।
कृष्णा सोबती वरिष्ठ हिंदी कथाकार हैं जो ‘नई कहानी’ के जमाने से कहानियाँ लिखती रही हैं। उन्होंने सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टियों से नारी सबलीकरण से जुड़े सवाल उठाए हैं। उनके नारी पात्र कुंठित, डरपोक और दब्बू नहीं बल्कि जुझारू और संघर्षशील हैं। ‘मित्रो मरजानी की मित्रो में अभूतपूर्व साहस और निडरता है। वह पुरुष समाज की बनायी नैतिकताओं को धता बताते हुए सीना तानकर चलती है। ‘ए लड़की’ की मुख्य पात्र अम्मू मृत्यु की देहरी पर खड़ी है परंतु मृत्यु उसे डरा नहीं पाती। वह अपना जीवन सहज ढंग से जीती है। अम्मू का मानसिक द्वंद्व और अतीत की शृंखलाओं का सरस रचनात्मक उपयोग हुआ है। सोबती की कहानियों में करुणा और व्यंग्य का अद्भुत सम्मिश्रण है। है। मन्नू भंडारी ने अपनी कहानियों में प्रेम के अंतर्द्वद्ध, पुरुष सत्ता द्वारा आरोपित नैतिक वर्जना तथा स्त्री की संघर्षशीलता को अपनी कहानियों में प्रमुखता से स्थान दिया है। ‘मैं हार गई’, ‘क्षय’, ‘रेत की दीवार’, ‘एक बार और’, ‘बाँहों का घेरा’, बंद दराजों के साथ’ आदि उनकी अन्य महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं।
मंजुल भगत ने लहूलुहान होती नारी और उसके जीवन को अपनी कहानी का विषय बनाया है। उनकी कहानियों के पात्र अपनी अस्मिता और सार्थकता ढूँढने के लिए संघर्ष करती दीख पड़ती हैं। कृष्णा सोबती के समान मंजुल भगत की नारी पात्र भी पुरुष के बनाए नैतिक दायरों को तोड़ती हैं। ‘बंद’ की बानो और ‘अनारों’ की अनारो बहुत पढ़ी लिखी नहीं हैं पर अपनी अस्मिता और अधिकार के प्रति सचेत हैं। मंजुल भगत ने अपनी कहानियों में शहर के निम्नवर्ग और ग्रामीण पात्रों को लिया है।
मृदुला गर्ग ने आरंभ से ही अपनी कहानियों में संघर्षरत नारी के द्वंद्व का चित्रण किया है। ‘अवकाश’, ‘कितनी कैदें’, ‘तीन किलो की छोरी’, ‘करार’, ‘चकरधिन्नी’ आदि इनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
मृणाल पांडे और मणिका मोहिनी ने भी स्त्री-पुरुष के बदलते संबंधों को लेकर कहानियाँ लिखी हैं।
राजी सेठ की कहानियों में आंतरिक टूटन, दरकन और पीड़ा का सूक्ष्म और संवेदनशील चित्रण हुआ है। उनकी कहानियाँ केवल नारी पात्रों की संवेदना तक सीमित नहीं है। घरेलू नौकरों के द्वंद्व और शोषण को भी उन्होंने मार्मिक बनाकर प्रस्तुत किया है। ‘घोड़े से गदहे कहानी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ‘आगत’ का केंद्रीय पात्र अपाहिज है। कुल मिलाकर उनकी कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन में इर्द-गिर्द घूमती हैं।
सूर्यबाला ने अपनी कहानियों में नारी की थरथराती मानसिकता को पकड़ने का प्रयास किया है। उन्होंने कहानियों में पराए दुख को अपना दुख बनाकर प्रस्तुत किया है। विविध संवेदनाओं से युक्त उनकी कहानियों में अनुभूति का विस्तृत संसार मिलता है। ‘अनाम लमहों के नाम’, ‘बिन रोई लड़की’, ‘उत्सव’, ‘बिहिश्त बनाम मौजीराम का झाडू’, ‘उजास’, ‘सुमिन्तरा की बेटियाँ’, ‘मुडेर पर’ आदि उनकी कुछ उल्लेखनीय कहानियाँ हैं। जीवन के प्रति अखंड आस्था सूर्यबाला के रचना संसार का प्रमुख स्वर है।
चंद्रकांता की अधिकांश कहानियों की पृष्ठभूमि कश्मीर है परंतु उनकी कहानियों की आत्मा नारी सबलीकरण है। अपनी कहानियों में उन्होंने परिवार के दायरे में पिसती, टूटती, जूझती और परिवार के दायरे को तोड़कर बाहर निकलती स्त्रियों का चित्रण किया है। ‘बस इतना ही’, ‘अनावृत्त’, ‘ओ सोनकिसरी’, ‘सूरज उगने तक’, ‘काली बर्फ आदि उनकी कुछ प्रमुख कहानियाँ हैं।
चित्रा मुद्गल ने अपनी कहानियों में महिलाओं और ख़ासकर छोटी बच्चियों के यौन शोषण और बलात्कार के भयावह पक्ष को प्रस्तुत किया है। ‘प्रेतयोनि’ नामक कहानी में बलात्कार की पीड़ा को झेलती लड़की के माँ-बाप ही उसके सबसे बड़े दुश्मन बन जाते हैं। परंतु लड़की आत्महत्या नहीं करती बल्कि अपने बलात्कार के ख़िलाफ़ पुलिस मुख्यालय के समक्ष प्रदर्शन करती है। ‘जिनावर संवेदनहीन होते सामाजिक संबंधों की कथा है। ‘सुख’ और ‘स्टेपनी’ में महिलाओं के यौन शोषण और उनके संघर्ष की कहानी है। लेकिन मुद्गल की कहानियाँ केवल महिलाओं की संवेदनाओं और समस्याओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि इनमें जीवन का बहुरंगी यथार्थ चित्रित हुआ है। ‘शिनाख्त हो गई है’, ‘पानी का आदमी’ और ‘त्रिशंकु’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय कहानियाँ हैं।
मैत्रेयी पुष्पा नई पीढ़ी की चर्चित लेखिका हैं। उन्होंने गाँवों में महिलाओं के संघर्ष और सबल होती नारी का चित्रण किया है। गाँव में सबल होती नारी उनकी कहानियों का मुख्य स्वर है। ‘चिन्हार’, ‘ललमनियाँ’, ‘फैसला’ आदि उनकी प्रमुख कहानियाँ हैं।
ऋता शुक्ल महत्वपूर्ण महिला कथाकार हैं जिन्होंने गाँव के मन की पीड़ा को अपनी कहानियों में व्यक्त किया है। ‘अमरो’ में शहर की ओर पलायन और वृद्ध व्यक्ति की वेदना व्यक्त हुई है। ‘मान-मरजाद’ में दो पीढ़ियों की टकराहट है तो ‘निष्कृति’ में रिश्तों की मिठास है। ‘सातवीं बेटी’ गाँव में बेटियों के साथ होने वाले बर्ताव का चित्रण है जिसमें वे असमय मुरझा जाती हैं।
उर्मिला शिरीष की कहानियों में ख़ुद को खोजती नारी की कई तस्वीरें हैं। ‘शहर में अकेली लड़की’ उनका ताजा कहानी संग्रह है। नई कहानीकारों में अलका सरावगी का नाम प्रसिद्धि पा रहा है। अलका सरावगी मध्यवर्ग के अनुभवों और संबंधों को बड़े ही सूक्ष्म और जटिल रूप में पेश करती हैं। ‘कनफेशन’, ‘मन्नत’, ‘वाइल्ड फ्लाइवर हॉल’ आदि उनकी कुछ चर्चित कहानियाँ हैं। मधु कांकरिया ने अपनी कहानियों में बाजारीकरण और उपभोक्तावाद के नए परिवेश में टूटते परिवार और अपने को बचाए रखने के लिए नारी के संघर्ष का चित्रण किया है। ‘अंतहीन मरूस्थल’ में इसी तर्ज की कहानियाँ संकलित हैं। मुक्ता ने ‘पलाश वन के घुंघरू’ और ‘आधा कोस’ नामक कहानी संग्रहों में नारी मन की व्यथा को ही उजागर किया है। इसके अलावा नासिरा शर्मा, अर्चना वर्मा, क्षमा शर्मा, दूर्वा सहाय, जया जदवानी आदि हिंदी की चर्चित महिला कलाकार हैं जिनकी कहानियों में स्त्री संवेदना के विविध चित्र अंकित हुए हैं।
हिंदी नाटक
हिंदी नाटक और रंगमंच, विकास के चरण, भारतेंदुयुग, प्रसाद युग, प्रसादोत्तर युग, स्वातंत्र्योत्तर युग, साठोत्तर युग और नया नाटक हिंदी एकांकी। हिंदी रंगमंच और विकास के चरण, हिंदी का लोक रंगमंच। नुक्कड़ नाटक।
प्रमुख नाट्यकृतियाँ, प्रमुख नाटककार (वर्ष 2000 तक)।
भारतेंदु युगीन हिंदी नाटक
हिंदी नाटक की सशक्त परंपरा भारतेंदु युग में शुरू हुई। इस काल के सभी प्रतिभा संपन्न रचनाकारों ने गद्य की विविध विधाओं में योगदान दिया किंतु केंद्रीय विधा नाटक ही रही। प्राचीन संस्कृत, बंगला, मराठी, अँग्रेज़ी आदि भाषाओं के नाटकों से प्रभाव ग्रहण करते हुए नाटक का नया ढाँचा निर्मित हुआ। ब्रजभाषा पद्य की रूढ़ियों से मुक्ति पाकर खड़ी बोली गद्य में नाट्य लेखन की शुरूआत हुई। मौलिक नाट्य लेखन के साथ-साथ संस्कृत, अँग्रेज़ी और बंगला से प्रचुर मात्रा में अनुवाद हुआ। भारतेंदु न केवल आधुनिक हिंदी नाटक के जनक हैं बल्कि हिंदी नाट्य परंपरा में जागरण- सुधार युग की संपूर्ण चेतना को प्रतिष्ठित करने वाले अग्रदूत भी हैं। भारतेंदु से पहले महाराज विश्वनाथ सिंह का ‘आनंद रघुनंदन’ और गोपालचंद्र गिरिधरदास का ‘नहुष’ नाटक मिलते हैं; किंतु ये दोनों ही ब्रजभाषा में लिखित हैं और नाट्यकला की कसौटी पर भी खरे नहीं उतरते। भारतेंदु ने अपनी नवजागरणपरक चेतना तथा दृष्टि की आधुनिकता से नाट्य कला को जनप्रियता तथा कलात्मकता प्रदान की। उन्होंने मौलिक तथा अनूदित दोनों ही तरह के नाटक हिंदी को दिए। उनके मौलिक नाटकों में ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘विषस्य विषमौषधम्’, ‘चंद्रावली’, ‘भारत दुर्दशा’, ‘नीलदेवी’, ‘सती प्रताप’, ‘अंधेर नगरी’ तथा संस्कृत से अनुवादों में ‘रत्नावली’, ‘पाखंड विडंबन’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘धनंजय विजय’, ‘कर्पूर मंजरी’; बंगला से अनुवादों में ‘भारत जननी’; अँग्रेज़ी से अनुवादों में ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का ‘दुर्लभ बंधु’ नाम से अनुवाद विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
अपने नाटकों के माध्यम से उन्होंने अपने समय और समाज की अनेक समस्याओं को जाँचा-परखा तथा जन-सामान्य को राष्ट्रीय चेतना की ओर उन्मुख किया।
भारतेंदु के लेखन ने उनके समसामयिक रचनाकारों को प्रभावित किया। प्रतापनारायण मिश्र, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, शीतलाप्रसाद त्रिपाठी, बालकृष्ण भट्ट आदि ने भारतेंदु का अनुसरण किया और नाटक लेखन तथा प्रस्तुतीकरण की धूम सी मच गई। भारतेंदु ने नाटक लेखन के अलावा नाट्य सिद्धांतों पर भी विचार किया तथा नाट्य मंडली की स्थापना की। भारतेंदु और उनके सहयोगी लेखक प्रतापनारायण मिश्र ओर ‘प्रेमघन’ नाटकों के अभिनय की व्यवस्था तो करते ही थे स्वयं अभिनय भी करते थे। इस तरह वे तत्कालीन पारसी रंगमंच की कुरीतियों के विरोध में जनरुचि का परिष्कार करने में भरसक संलग्न थे।
भारतेंदु ने नाटक के क्षेत्र में जो पथ प्रदर्शन किया उसका सिलसिला जारी रहा। नाट्य दिशाएँ वे ही रहीं जिनकी शुरूआत भारतेंदु ने की थी। इस युग में सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, राष्ट्रीय चेतनापरक और व्यंग्यात्मक नाटकों के अलावा प्रेम प्रधान नाटक भी लिखे गए। इस युग के नाटकों का मूल स्वर नीतिपरक रहा। आगे हम इस युग के प्रमुख नाटककारों और उनके नाटकों की चर्चा करेंगे।
पंडित बालकृष्ण भट्ट ने पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक नाटक और प्रहसन लिखे तथा बंगला के दो नाटकों का अनुवाद किया। इनके प्रमुख नाटक हैं ‘दमयंती स्वयंवर’, ‘वेणी संहार’, ‘किरातार्जुनीय’, ‘बृहन्नला’, ‘जैसा काम वैसा परिणाम’, ‘नई रोशनी का विष’ आदि। अपने नाटकों में भट्टजी ने प्रधानतया संस्कृत नाट्य परंपरा को अपनाया है। उनके प्रहसन तीखे हैं और सामाजिक कुरीतियों तथा पाखंड पर व्यंग्य करते हैं।
राधाकृष्ण दास ने ‘महाराणा प्रतापसिंह’, ‘महारानी पद्मावती’ तथा ‘दुःखिनी बाला रूपक’ नामक नाटकों की रचना की। इनमें पहले दो ऐतिहासिक हैं तीसरा नाटक दुखांत है। इसमें सामाजिक व्यंग्य को उभारा गया है।
प्रतापनारायण मिश्र लेखन में भारतेंदु को अपना आदर्श मानते थे और अपनी विनोदप्रियता तथा व्यंग्य-वक्रता के लिए प्रसिद्ध थे। ‘हमीर हठ’, ‘गौ संकट नाटक’, ‘कलि कौतुक रूपक’, ‘जुआरी खुआरी प्रहसन’ आदि उनके प्रमुख नाटक हैं। लाला श्री निवासदास ने ‘रणधीर और प्रेममोहिनी’ नामक दुखांत नाटक की रचना की। यह उस समय काफ़ी लोकप्रिय हुआ ओर कई बार मंच पर प्रस्तुत किया गया। इसके उर्दू और गुजराती अनुवाद भी हुए। उन्होंने ‘संयोगिता स्वयंवर’ तथा ‘प्रहलाद चरित्र’ नामक पौराणिक नाटक भी लिखे।
काशीनाथ खत्री ने एक अंक के लघु रूपकों की रचना की। इनमें ‘ग्राम पाठशाला’, ‘निकृष्ट नौकरी’, ‘सिंधु देश की राजकुमारियाँ’, ‘गुन्नौर की रानी’ आदि प्रमुख हैं। खत्री जी स्वभाव से सुधारवादी थे, इसलिए उनकी रचनाओं में सुधार की प्रेरणा ही प्रमुख है। इनका ‘बाल विधवा संताप’ नाटक ईश्वरचंद विद्यासागर की प्रेरणा से लिखा गया है।
राधाचरण गोस्वामी ने ‘अमरसिंह राठौर’, ‘श्रीदामा’, ‘तन-मन-धन गोसाई जी के अर्पण’ और ‘बूढ़े मुँह मुहासे’ नाटकों की रचना की। देवकीनंदन खत्री ने ‘सीताहरण’, ‘रुक्मिणी हरण’, ‘कंस वध’, ‘बाल विवाह’, ‘स्त्री चरित्र’, ‘सैकड़ों के दस-दस’ आदि नाटक लिखे।
नाटकों के अनुवाद
मौलिक नाटक लेखन के साथ-साथ संस्कृत, बंगला और अँग्रेज़ी के नाटकों के अनुवाद की जो परंपरा भारतेंदु ने शुरू की थी वह उनके बाद भी लंबे समय तक चलती रही। संस्कृत से ‘रत्नावली’, ‘प्रबोध चंद्रोदय’, ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’, ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘उत्तर रामचरितम्’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘कर्पूर मंजरी’ आदि नाटकों के अनुवाद हुए।
बंगला से माइकेल मधुसूदन दत्त के ‘शर्मिष्ठा’ और ‘पद्मावती’ का अनुवाद बालकृष्ण भट्ट ने किया। ‘एई की सभ्यता बोले’ का अनुवाद ‘क्या इसी को सभ्यता कहते हैं’ नाम से ब्रजनाथ ने किया। लक्ष्मीनारायण चक्रवर्ती के नाटक ‘नवाब सिराजुद्दौला’ का अनुवाद शिवनंदन त्रिपाठी ने किया। ब्रह्मनंदन सहाय ने ‘सप्तम प्रतिभा’ और ‘बूढ़ा वर’ का अनुवाद किया।
अँग्रेज़ी से शेक्सपियर के ‘किंग लियर’, ‘ओथेलो’, ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’, ‘ऐज यू लाइक इट’, ‘रोमियो एँड जूलियट’ के अनुवाद किए गए। जोसेफ एडीसन के ‘केटो’ नाटक का अनुवाद ‘केटो वृत्तांत’ नाम से किया गया।
द्विवेदी युगीन हिंदी नाटक
हिंदी के मौलिक साहित्यिक नाटकों की दृष्टि से भारतेंदु के बाद एक ठहराव सा आ गया।
प्रसाद का नाट्य लेखन ‘सज्जन’ (1910 ई--11 ई.) कल्याणी ‘परिणय’ (1912 ई.) प्रायश्चित (1914 ई.) इसी काल में शुरू हो गया था। द्विवेदी युग (1900 ई-1920 ई.) में पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, रोमांचक विषयों पर नाटक लिखे गए। ये सभी नाटक राष्ट्रीय चेतना और समाज सुधार की भावना से लिखे गए।
इस युग के कुछ नाटक हैं बनवारी लाल का ‘कंसवध’ (1909 ई.), नारायण सहाय का ‘रामलीला’ (1911 ई.), लक्ष्मीप्रसाद का ‘उर्वशी’ (1910 ई.), जयशंकर प्रसाद का ‘करुणालय’ (1912 ई.). ‘राज्यश्री’ (1915 ई.), बद्रीनाथ भट्ट का ‘कुरुवन दहन’ (1915 ई.), ‘चंद्रगुप्त’ (1915 ई.), वृंदावनलाल का ‘सेनापति ऊदल’ (1909 ई.), प्रतापनारायण मिश्र का ‘भारत दुर्दशा’, भगवती प्रसाद का ‘वृद्ध विवाह’ (1905 ई.), मिश्रबंधु का ‘नेत्रोन्मीलन’ (1915 ई.) आदि।
पारसी रंगमंच पर प्रस्तुति के लिए रोमांचकारी नाटक भी द्विवेदी युग में लिखे गए। इनकी विषय-वस्तु फारसी प्रेमाख्यानों और पौराणिक आख्यानों पर आधारित है। ये नाटक ‘कोरस’ से आरंभ होते थे और प्रमुख कथा के समानांतर एक ‘प्रहसन’ भी चलता था जो दर्शकों को हँसाने या फिर मूल नाटक की भावधारा में परिवर्तन करने के लिए प्रयुक्त होता था। इन नाटकों की भाषा पहले उर्दू-फारसी मिश्रित हुआ करती थी। बाद में साधारण बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया जाने लगा। इन नाटककारों में मोहम्मद मियाँ ‘रौनक’, सैयद मेंहदी ‘हसन’, नारायण प्रसाद ‘बेताब’, आगा मोहम्मद हश्र ‘कश्मीरी’ और राधेश्याम कथावाचक आदि प्रमुख हैं।
द्विवेदी युगीन प्रहसनों में बद्रीनाथ भट्ट का ‘चुंगी की उम्मीदवारी’ (1912 ई), गंगाप्रसाद श्रीवास्तव का ‘उलटफेर’ (1918 ई.) और ‘नोक-झोंक (1918 ई.) उल्लेखनीय हैं।
अनूदित नाटक - इस युग में संस्कृत, अँग्रेज़ी और बंगला भाषा से कुछ नाटकों के अनुवाद भी किए गए हैं। संस्कृत से सदानंद अवस्थी ने ‘नागानंद’ (1906 ई), लाला सीताराम ने ‘मृच्छकटिकम्’ (1913 ई.) और ‘कविरत्न’ सत्य नारायण ने ‘उत्तर रामचरितम्’ का अनुवाद किया।
प्रसाद युगीन हिंदी नाटक
प्रसाद का नाट्य सृजन 1910-1911ई में शुरू हो गया था। ‘सज्जन’, प्रायश्चित’, ‘कल्याणी परिणय’, ‘करुणालय’, ‘राज्यश्री’ आदि वस्तुतः उनके प्रयोग-काल की रचनाएँ हैं। सन् 1921 ई. में ‘विशाख’ के प्रकाशन से हिंदी नाटक के क्षेत्र में नई उद्भावनाओं की शुरूआत होती है। इसके बाद सन् 1933 ई. तक का समय ‘प्रसाद’ के नाट्य लेखन का उत्कर्ष काल है। इसमें ‘अजातशत्रु’ (1922), ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ (1923 ई.), ‘कामना’ (1923-24 ई.), ‘स्कंदगुप्त’ (1928 ई.), ‘एक घूँट’ (1929 ई.), ‘चंद्रगुप्त’ (1931 ई.), ‘ध्रुवस्वामिनी’ (1933 ई.) की रचना हुई।
प्रसाद युगीन अन्य नाटककार
प्रसाद जी के समसामयिक हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ ने अपने नाटकों में भारत की सांस्कृतिक अखंडता को नए ढंग से प्रस्तुत किया है। मध्यकालीन इतिहास से अपनी कथावस्तु चुनते हुए उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को केंद्र में रखा है। ‘रक्षाबंधन’, ‘प्रतिशोध’, ‘स्वप्न भंग’, ‘आहुति’ जैसे नाटकों की संवाद-योजना तथा चरित्र-योजना में राष्ट्रीय जागरण का स्वर प्रधान है। इनकी भाषा बोलचाल की भाषा के निकट है।
प्रसाद युग के अन्य नाटककारों में सुदर्शन, सेठ गोविंददास, बद्रीनाथ मिश्र, बलदेव प्रसाद मिश्र आदि का नाम लिया जा सकता है। रंगमंच तथा साहित्यिक महत्व के अभाव में इनके द्वारा लिखित नाटकों का सिर्फ ऐतिहासिक महत्व है।
प्रसादोत्तर हिंदी नाटक
प्रसाद युग के बाद हिंदी नाटक के नए युग का प्रारंभ होता है। प्रसादोत्तर काल में नाटक विषय और शिल्प दोनों दृष्टि से और भी अधिक विकसित हुए। नाट्य साहित्य में समस्या नाटकों का सूत्रपात हुआ। इसके प्रमुख प्रवर्तक लक्ष्मीनारायण मिश्र थे। मिश्र जी ने लेखन की शुरूआत प्रसाद के समय में ही कर दी थी। उनका नाटक ‘संन्यासी 1930 में आया था।
सबसे पहले लक्ष्मीनारायण मिश्र ने ही बुद्धिवाद के द्वारा आज की नई वैयक्तिक समस्याओं का विश्लेषण करना आरंभकिया। ‘सिंदूर की होली’ (1933 ई.), ‘आधी रात’ (1936 ई.). ‘राजयोग’ (1933 ई.), ‘संन्यासी’ (1930 ई.), ‘राक्षस का मंदिर’ (1931 ई.), ‘मुक्ति का रहस्य’ (1932 ई.) आदि समस्या नाटकों की उन्होंने रचना की। अपने लेखनकाल के अंतिम दौर में उन्होंने पौराणिक ऐतिहासिक नाटक भी लिखे। ऐसे कुछ नाटक हैं ‘नारद की वीणा’ (1946 ई.), ‘चक्रव्यूह’ (1953 ई.), ‘दशाश्वमेध’ (1950 ई.), ‘वितस्ता की लहरें’ (1953 ई.)।
सेठ गोविंददास
सेठ गोविंददास ने सवा सौ से अधिक नाटकों की रचना की है और विषय-वस्तु तथा शिल्प-विधान के क्षेत्र में भी विविध प्रयोग किए हैं। इनके नाटक पौराणिक, ऐतिहासिक और तत्कालीन सामाजिक विषयों से संबद्ध हैं। कार्य व्यापार, नाटकीयता, कौतूहल, भाषा, संवाद आदि की दृष्टि से ‘कुलीनता’ (1940 ई.) और ‘शेरशाह’ नामक (1945 ई.) ऐतिहासिक नाटक अपेक्षाकृत प्रभावशाली और सशक्त हैं। अन्य नाटक हैं ‘सुख किस में’ (1940 ई), ‘ दलित कुसुम’ (1942 ई.), ‘कर्ण’ (1946 ई.), ‘भूदान यज्ञ’ (1954 ई.) आदि।
उदयशंकर भट्ट (1819-1966 ई.) आधुनिक नाटककारों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनके प्रारंभिक नाटकों के कथानक ऐतिहासिक और पौराणिक विषयों से लिए गए हैं।। बाद में उन्होंने सामाजिक जीवन की ज्वलंत समस्याओं को लेकर भी नाटक लिखे। उनके गीति नाटक, प्रतीक नाटक, रेडियो रूपक, एकांकी आदि की प्रयोगशीलता दर्शनीय है। उनके कुछ प्रमुख नाटक हैं ‘विद्रोहिणी अम्बा’ (1935 ई.), ‘सागर विजय’ (1937 ई.), ‘दाहर’ (1933 ई.)। तीन गीति नाट्य हैं ‘मत्स्यगंधा’ (1937 ई.), ‘विश्वामित्र’ (1938 ई.), ‘राधा’ (1941 ई.)। ‘कमला’ (1939 ई.) उनका समस्या नाटक है। इसमें आधुनिक समाज की उलझनों और मानव चरित्र की जटिलताओं का अंकन हुआ है।
डॉ रामकुमार वर्मा (1905 ई.) मूलतः एकांकीकार हैं लेकिन उन्होंने कुछ नाटकों की भी रचना की है। ‘विजय पर्व (1956 ई.), ‘नाना फड़नवीस’ (1964 ई.), ‘सारंगस्वर’ (1970 ई.) उनके ऐतिहासिक और ‘पृथ्वी का स्वर्ग’ (1971 ई.) सामाजिक नाटक हैं।
उपेंद्रनाथ अश्क हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार हैं। उनके नाटकों का रचनाकाल 1937 ई. से आरंभ होता है। तकनीक की दृष्टि से अश्क जी के नाटकों में पर्याप्त विविधता है। उन्होंने समय-समय पर अनेक नए प्रयोग किए हैं। ‘छठा बेटा’ स्वप्न नाटक के रूप में, ‘कैद’ (1945 ई) लघु नाटक, ‘अंजो दीदी’ मनोवैज्ञानिक नाटक और ‘पैंतरे’ फिल्मी झाँकी के रूप में उल्लेखनीय हैं।
हिंदी नाटक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु धर्मवीर भारती के काव्य नाटक ‘अंधा युग’ (1955 ई.) के साथ आया। कविता और नाटक के बीच गहरे रिश्ते को इसने पहली बार रंगमंच पर सिद्ध किया। ‘अंधा युग’ के अनेक सफल प्रदर्शन हुए। इसी से प्रेरित होकर दुष्यंत कुमार ने ‘एक कंठ विषपायी’ (1963) नामक काव्य नाटक लिखा। सुमित्रानंदन पंत ने भी कई काव्य नाटक लिखे जिसमें ‘शिल्पी’ अधिक प्रसिद्ध हुआ।
भुवनेश्वर प्रसादोत्तर नाटकों में कथ्य और शिल्प दोनों की ही दृष्टि से गुणात्मक परिवर्तन करने वाले नाटककार हैं। प्रसाद के अंतिम नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ के प्रकाशन के समय ही भुवनेश्वर के ‘श्यामा’ ‘प्रतिभा का विवाह’, 1933 ई. में आ गए थे। बाद में ‘शैतान’ (1939 ई.), ‘रोमांस, रोमांच’ (1935 ई.) तथा एकांकी संकलन ‘कारवाँ’ (1936 ई.) आया। स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर कई तरह के मनोवैज्ञानिक प्रश्नों का सूत्रपात इन नाटकों में होता है।
मोहन राकेश नाटक और रंगमंच के रिश्ते को पहचानते हुए सार्थक नाट्य सृजन करने वालों में प्रमुख नाम है। इतिहास, कविता और नाटक के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए गहन मानवीय भावों की सार्थक अभिव्यक्ति की जो परंपरा जयशंकर प्रसाद ने शुरू की थी तथा स्वाभाविकता, नाटकीयता, यथार्थपरकता और काव्यात्मकता का जो मिश्रण जगदीशचंद्र माथुर (‘कोणार्क’) ने किया था उसका अगला चरण मोहन राकेश के नाटकों में मिलता है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ (1958 ई.). ‘लहरों के राजहंस’ (1963 ई.) तथा ‘आधे अधूरे’ ने हिंदी नाटक और रंगमंच को विस्तृत आयाम दिया।
इसी समय लक्ष्मीनारायण लाल ने नाट्य लेखन और नाट्य संचालन (प्रदर्शन और प्रशिक्षण) के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका आरंभ की। भारतेंदु के बाद एक बार फिर नाटक और रंगकर्म एक-दूसरे से व्यावहारिक रूप से जुड़े। उनके नाटकों में ‘अंधा कुआँ, ‘तीन आँखों वाली मछली’, ‘मादा कैक्टस’, (1959 ई.) ‘तोता मैना’, ‘रात रानी’, ‘मिस्टर अभिमन्यु’, ‘दर्पण’ आदि प्रमुख हैं।
रंगमंच के इस नए आंदोलन ने विष्णु प्रभाकर को भी प्रभावित किया। सन् 1958 में ‘डॉक्टर’ नामक मौलिक नाटक के लेखन के बाद उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण उपन्यासों और कहानियों के नाट्य रूपांतर प्रस्तुत किए। इनमें प्रेमचंद के ‘गबन’ और ‘गोदान’ के नाट्य रूपांतर ‘चंद्रहार’ और ‘होरी’ तथा प्रभातकुमार मुखोपाध्याय की बंगला कहानी ‘देवी’ का नाट्य रूपांतर ‘देवी’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आगे चलकर उपन्यासों के नाट्य रूपांतर का यह सिलसिला हिंदी में तेजी से बढ़ा। प्रेमचंद, जैनेंद्र, हजारीप्रसाद द्विवेदी, मनोहरश्याम जोशी, अमृतलाल नागर, मन्नू भंडारी, कृष्ण बलदेव वैद आदि के उपन्यासों के सफल नाट्य रूपांतरों ने हिंदी रंगमंच को समृद्ध किया है।
साठ-सत्तर के दशक में हिंदी रंगकर्म में क्रांति की लहर आई और नाट्य लेखन का सिलसिला बना। इस दौर के महत्वपूर्ण नाटक लेखकों और उनकी प्रमुख कृतियों में विनोद रस्तोगी का ‘नए हाथ’, नरेश मेहता का ‘सुबह के घंटे’ और ‘खंडित यात्राएँ’, लक्ष्मीकांत वर्मा का ‘खाली कुर्सी की आत्मा’, ‘रोशनी एक नदी है’, शिवप्रसाद सिंह का ‘घाटियाँ गूँजती हैं’, मन्नू भंडारी का ‘बिना दीवारों का घर’, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का ‘बकरी’, मुद्राराक्षस का ‘तिलचट्टा’, ‘इकतारे की आँख’, शंकर शेष का ‘एक और द्रोणाचार्य’, ‘पोस्टर’, भीष्म साहनी का ‘हानूश’, ‘मुआवजे’ तथा ‘कबिरा खड़ा बाजार में, सुरेन्द्र वर्मा का ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’, ‘आठवाँ सर्ग’, मणि मधुकर का ‘रस गंधर्व’, ‘दुलारी बाई’ रेवतीशरण शर्मा का ‘चिराग की लौ’ ज्ञानदेव अग्निहोत्री का ‘नेफा की एक शाम’, प्रभात कुमार भट्टाचार्य का ‘काठ महल’, ब्रजमोहन शाह का ‘त्रिशंकु’, ‘शह ये मात’, हबीब तनवीर का ‘आगरा बाजार’, ‘चरणदास चोर’, दया प्रकाश सिन्हा का ‘कथा एक कंस की’, सुशील कुमार सिंह का ‘सिंहासन खाली है’, रामेश्वर प्रेम का ‘चारपाई’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
हिंदी एकांकी
नाट्य-इतिहास के आधुनिक युग में एकांकी एक स्वतंत्र नाट्य विधा के रूप में विकसित हुआ। इसकी विशेषताएँ हैं :
(1) सम्पूर्ण नाटक की एक ही अंक में समाप्ति
(ii) एक खंड, स्थिति या संवेदना का प्रस्तुतीकरण।
(iii) एक ही मूल कथानक।
(iv) कथा के प्रभाव की सघनता और तीव्रता।
(v) पात्र संख्या कम तथा गौण पात्र नगण्य।
(vi) स्थान, कार्य और समय की एकता।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के ‘अंधेर नगरी’, ‘विषस्यविषमौषधम्’, ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ आदि नाटक एक अंक में समाप्त होने वाली रचनाएँ हैं। बद्रीनाथ भट्ट का ‘रेगड़ समाचार के एडीटर की धूल दच्छिना’, रूप नारायण पांडेय का ‘मूर्ख मंडली’, बेचन शर्मा उग्र का ‘चार बेचारे’, सुदर्शन का ‘आनरेरी मजिस्ट्रेट’ आदि भी एक अंकीय नाट्य कृतियाँ हैं। इन लघु नाटकों में प्राचीन परंपरा का प्रभाव भी दिखाई पड़ता है। किंतु आज हम जिसे एकांकी नाटक कहते हैं, उसका स्वरूप इस परंपरा से बहुत भिन्न है।
हिंदी एकांकी का प्रारंभ जयशंकर प्रसाद के ‘एक घूँट’ (1929 ई.) से माना जाता है। इसमें एकांकी की तकनीक का पूरा निर्वाह किया गया है। हिंदी में पाश्चात्य एकांकी के शिल्प से प्रभावित एकांकी नाटकों की रचना 1930 के दशक से होने लगी। हिंदी एकांकी परंपरा को विकसित करने का श्रेय डॉ रामकुमार वर्मा को दिया जाता है। उनका पहला एकांकी ‘बादल की मृत्यु’ 1930 ई. में प्रकाशित हुआ। इसके बाद वे निरंतर एकांकी रचना करते रहे।
रामकुमार वर्मा के ‘शिवाजी’, ‘औरंगजेब की आखिरी रात’, ‘चारुमित्रा’, ‘विक्रमादित्य’, ‘पृथ्वीराज की आँखें, जगदीश चंद्र माथुर के ‘कलिंग विजय’, डॉ. सत्येंद्र के ‘कुणाल’, चतुरसेन के ‘पन्नाधाय’, ‘हाड़ा रानी’, तथा हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘मान का मंदिर’ और ‘मालव प्रेम’ आदि एकांकी नाटकों में इतिहास के उन प्रसंगों को कथानक का विषय बनाया गया जो तत्कालीन परिस्थितियों में राष्ट्रीय चेतना को मजबूत बना सकें।
चौथे और पाँचवें दशक में समस्यामूलक हिंदी एकांकी नाटक अधिक लिखे गए। यद्यपि 1936 ई. में भुवनेश्वर का ‘कारवाँ’ एकांकी संग्रह प्रकाशित हो चुका था जिसमें समाज की कुंठाजन्य विकृतियों और यौन समस्या को उभारा गया था।
इस युग के एकांकीकारों ने समाज की सूक्ष्म कमजोरियों को देखा, समझा, पहचाना और उसका समाधान प्रस्तुत किया। उदयशंकर भट्ट ने ‘सेठ लाभचंद’, ‘दस हज़ार’, ‘उन्नीस सौ पैंतीस’ आदि एकांकियों में मध्यवर्गीय बाह्य आडंबरों पर चोट की है। ‘नेता’ एकांकी में उन्होंने स्वार्थी राजनीतिक व्यक्तियों पर गहरा व्यंग्य किया है। उपेंद्रनाथ अश्क ने अपने ‘जॉक’, ‘तौलिये’, ‘सूखी डाली’ जैसे एकांकियों में मध्यवर्गीय परिवारों के पात्रों की मनोवैज्ञानिक और आर्थिक-सामाजिक स्थितियों को हास्य-व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है। भगवतीचरण वर्मा कृत ‘सबसे बड़ा आदमी’ में भी इसी का चित्रण है। नए और पुराने संस्कारों का टकराव अश्क कृत ‘सूखी डाली’ और उदय शंकर भट्ट कृत ‘बीमार का इलाज’ एकांकियों में दिखाई पड़ता है।
एकांकी नाटक की सामान्य प्रवृत्तियाँ
हिंदी एकांकी का उदय उस समय हुआ जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन पूरी तरह जोरों पर था। एकांकी की विषय-वस्तु भी अन्य साहित्यिक विधाओं की भाँति अपने समय की आवश्यकताओं से प्रेरित थी। इस दौर के एकांकी नाटकों में भी देशप्रेम, राष्ट्रीय भावना और समाज सुधार आदि को विषय बनाया गया था। इसके लिए ऐतिहासिक कथानकों का सहारा लिया गया। दूसरी ओर सामाजिक समस्याओं के लिए तत्कालीन सामाजिक यथार्थ को विषय बनाया गया। इतिहास आधारित एकांकी नाटकों में प्राचीन इतिहास और साहित्य के उन प्रसंगों को चुना गया है जिनसे देश की प्राचीन गरिमा का पता लगे तथा साहस, बलिदान, शौर्य और त्याग जैसे सद्गुणों से जन-मानस उद्वेलित हो सके। रामकुमार वर्मा के ‘शिवाजी’, ‘औरंगजेब की आखिरी रात’, ‘चारुमित्रा’, ‘विक्रमादित्य’, ‘पृथ्वीराज की आँखें, जगदीश चंद्र माथुर के ‘कलिंग विजय’, डॉ. सत्येंद्र के ‘कुणाल’, चतुरसेन के ‘पन्नाधाय’, ‘हाड़ा रानी’, तथा हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘मान का मंदिर’ और ‘मालव प्रेम’ आदि एकांकी नाटकों में इतिहास के उन प्रसंगों को कथानक का विषय बनाया गया जो तत्कालीन परिस्थितियों में राष्ट्रीय चेतना को मजबूत बना सकें।
चौथे और पाँचवें दशक में समस्यामूलक हिंदी एकांकी नाटक अधिक लिखे गए। इन एकांकियों में युगीन समस्याओं को प्रस्तुत करके उनके समाधान भी खोजे जाने लगे थे। पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित भारतीय समाज में नई समस्याएँ उठ खड़ी हुई। एक ओर प्राचीन रूढ़ियों और मान्यताओं के प्रति विद्रोह भाव जाग रहा था तो दूसरी ओर नारी के स्वतंत्र व्यक्तित्व, प्रेम और विवाह की समस्याएँ तथा विकृत कुंठाएँ समाज और व्यक्ति को घेरने लगी थीं। यद्यपि 1936 ई. में भुवनेश्वर का ‘कारवाँ’ एकांकी संग्रह प्रकाशित हो चुका था जिसमें समाज की कुंठाजन्य विकृतियों और यौन समस्या को उभारा गया था। भुवनेश्वर पर इब्सन और बर्नार्ड शॉ का प्रभाव पड़ा। भुवनेश्वर सर्वथा नई तकनीक और दृष्टि लेकर हिंदी एकांकी के क्षेत्र में आए। राष्ट्रीय आंदोलन और गांधीवादी विचारधारा के प्रभाव से अहिंसा, सांप्रदायिकता, जाति उत्थान जैसी समस्याओं के समाधान में भी एकांकी नाटकों का सृजन किया गया।
इस युग के एकांकीकारों ने समाज की सूक्ष्म कमजोरियों को देखा, समझा, पहचाना और उसका समाधान प्रस्तुत किया। उदयशंकर भट्ट ने ‘सेठ लाभचंद’, ‘दस हज़ार’, ‘उन्नीस सौ पैंतीस’ आदि एकांकियों में मध्यवर्गीय बाह्य आडंबरों पर चोट की है। नेता एकांकी में उन्होंने स्वार्थी राजनीतिक व्यक्तियों पर गहरा व्यंग्य किया है। उपेंद्रनाथ अश्क ने अपने ‘जॉक’, ‘तौलिये’, ‘सूखी डाली’ जैसे एकांकियों में मध्यवर्गीय परिवारों के पात्रों की मनोवैज्ञानिक और आर्थिक-सामाजिक स्थितियों को हास्य-व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है। भगवतीचरण वर्मा कृत ‘सबसे बड़ा आदमी’ में भी इसी का चित्रण है। नए और पुराने संस्कारों का टकराव अश्क कृत ‘सूखी डाली’ और उदय शंकर भट्ट कृत ‘बीमार का इलाज’ एकांकियों में दिखाई पड़ता है।
राजनीति के क्षेत्र में चुनाव पद्धति से उत्पन्न विकृतियों को अश्क के ‘अधिकार का रक्षक’ एकांकी में चित्रित किया गया है। इस तरह युगीन समस्याएँ केवल प्रेम और विवाह से ही जुड़ी हुई नहीं हैं, वरन् नई-पुरानी विचारधारा के संघर्ष, व्यक्ति की स्वतंत्रता, टूटते संयुक्त परिवार, राजनीति, मज़दूर आंदोलन आदि विविध विषयों से संबंधित हैं।
इस युग के एकांकी नाटकों में कथानक स्थूल से निरंतर सूक्ष्म की ओर अग्रसर हुए हैं। मनोद्वंद्व के सूक्ष्म चित्रण के साथ ही एकांकियों के शिल्प में सांकेतिकता को महत्व मिलने लगा। गणेश प्रसाद द्विवेदी के ‘सुहाग बिंदी’, ‘दूसरा उपाय ही क्या है’, ‘वह फिर आयी थी’
राजनीति के क्षेत्र में चुनाव पद्धति से उत्पन्न विकृतियों को अश्क के ‘अधिकार का रक्षक’ एकांकी में चित्रित किया गया है।
गणेश प्रसाद द्विवेदी के ‘सुहाग बिंदी’, ‘दूसरा उपाय ही क्या है’, ‘वह फिर आयी थी’ आदि एकांकी नाटकों में नारी और पुरुष मन की गहराई का चित्रण मिलता है।
चंद्रगुप्त विद्यालंकार के ‘मनुष्य की कीमत’, ‘भेड़िये’, ‘नव प्रभात’ आदि एकांकियों में समाज और राष्ट्र की विविध समस्याओं का अंकन यथार्थवादी ढंग से किया गया है।
डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल के ‘ताजमहल के आँसू’, ‘जहाँनारा का स्वप्न’, ‘नूरजहाँ की एक रात’, ‘वरुण वृक्ष का देवता’ आदि एकांकी नाटकों में प्रतिशोध, करुणा आदि का मनोविश्लेषण मिलता है। विनोद रस्तोगी मध्यकालीन इतिहास द्वारा नारी के शौर्य और बलिदान की गौरवगाथा प्रस्तुत करते हैं, जैसे ‘आज मेरा विवाह है’, ‘जाह्नवी विजय’, ‘कसम कुरान की’, ‘काला दाग’, ‘दो चाँद’ आदि।
हिंदी एकांकी ने रंगमंच को भी एक कलात्मक रूप दिया। जगदीश चंद्र माथुर ने ‘रीढ़ की हड्डी’, ‘भोर का तारा’, ‘मकड़ी का जाला’ आदि के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों, मनोवैज्ञानिक जटिलताओं और साहित्यकार के दायित्व को रेखांकित किया। विष्णु प्रभाकर, मोहन राकेश और सत्येंद्र शरत के एकांकी नाटकों में समाज की विद्रूपताओं और समस्याओं का गहरा अंकन मिलता है। मोहन राकेश कृत ‘अंडे के छिलके’ एकांकी में पुरानी और नई पीढ़ी के जीवन-मूल्यों की टकराहट को दर्शाया गया है तथा मानव मन की ग्रंथियों और कुंठाओं को खोला गया है। विष्णु प्रभाकर कृत ‘ये रेखाएँ ये दायरे’ एकांकी में परिवार नियोजन की समस्या उठाई गई है तथा ‘आँचल और आँसू’ में बहुपतित्व की समस्या पर प्रकाश डाला गया है। सेक्स के विकृत रूप को लेकर भी कई एकांकी रचे गए हैं। सत्येंद्र शरत के ‘गुडबाई अनीता’, ‘एस्फोडेल’ और ‘प्रतिशोध’ में काम समस्या और उससे उत्पन्न तनाव का चित्रण मिलता है।
राजनीतिक गुटबंदी और शासन-तंत्र के खोखलेपन को लेकर भी कई एकांकी नाटक रचे गए
विष्णु प्रभाकर का ‘कांग्रेस मैन बनो, बनो’, राजेंद्र कुमार शर्मा के ‘अफसर और ‘एक दिन की छुट्टी’ एकांकी इसी तरह के हैं।
नुक्कड़ नाटक
नुक्कड़ नाटक आधुनिक युग की देन है। भारत में नुक्कड़ नाटक के उदय का श्रेय ‘इप्टा-(भारतीय जननाट्य संघ इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) को है। सन् 1936 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रोत्साहन से इप्टा ने जन-साधारण की समस्याओं, भावनाओं को नाटकों में वाणी दी और अपना पहला प्रदर्शन 1942 ई. में जनता के बीच जाकर किया।
दरअसल भारत में रंगमंच (थियेटर) बड़े शहरों में ही पाए जाते हैं और सर्वसाधारण का उन तक पहुँचना आसान नहीं होता। रंगमंचीय नाटक में तमाम व्यवस्थाएँ करनी पड़ती हैं, जैसे लाइटिंग व्यवस्था, वेशभूषा, मेकअप आदि।। नाटक के प्रचार-प्रसार के कार्य में काफ़ी काफ़ी मेहनत, समय और पैसे की आवश्यकता होती है। इन परेशानियों को देखते हुए आम जनता तक नाटक पहुँचाने के उद्देश्य से नुक्कड़ नाटक का उदय हुआ। इस तरह के नाटकों के प्रदर्शन के लिए किसी विशेष रंगमंच की आवश्यकता नहीं होती। सार्वजनिक पार्क, बाजार, बस स्टॉप, गली-मोहल्ले और औद्योगिक क्षेत्र नुक्कड़ नाटक की रंगशालाएँ बन जाते हैं। इन रंगशालाओं के लिए बहुत अधिक पैसा नहीं चाहिए। लाइटिंग व्यवस्था, मेकअप, वेशभूषा आदि की भी कोई आवश्यकता नहीं होती। कथ्य और आंगिक, वाचिक अभिनय ही इनकी प्रमुख शक्ति होता है। ये नाटक दिन में भी खेले जा सकते हैं। हाँ, केवल जनता के प्रति प्रतिबद्ध कलाकार ही इस क्षेत्र में आगे आने का साहस कर सकते हैं।
इस तरह जनता की भावनाओं को अभिव्यक्ति देने वाले लोकप्रिय माध्यम के रूप में नुक्कड़ नाटक का उदय हुआ है। कई राज्यों में यह किसानों, छात्रों, मेहनतकश गरीब तबके के लोगों की आवाज के साथ आवाज मिलाने के माध्यम के रूप में उभरा है। भारतीय नुक्कड़ नाटक प्राचीन नाटकों, लोक-नाटकों और पश्चिमी रंगमंच से समान रूप से प्रभाव ग्रहण करता रहा है। आज के नुक्कड़ रंगकर्मी इसके विशिष्ट आकारगत स्वरूप के बारे में अधिक सजग हैं। वे अब एक अभिनय शैली, नाटकीय संरचना, लेखन, प्रशिक्षण, संगीत, काव्य और समूहगान आदि सभी क्षेत्रों में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं।
हिंदी का पहला नुक्कड़ नाटक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का ‘बकरी’ माना जाता है। सत्तर के दशक में इस नाटक की देश के विभिन्न भागों में प्रस्तुतियों ने हिंदी रंगकर्म को व्यापक लोकप्रियता दिलाई और दर्शकों में अपने परिवेश की विडंबनापूर्ण स्थितियों-परिस्थितियों के प्रति जागरूकता प्रदान की। नुक्कड़ नाटक के लेखन की दृष्टि से सफदर हाशमी, असगर वजाहत, रमेश उपाध्याय, स्वयं प्रकाश, गुरुशरण सिंह, शिवराम और राजेश जोशी का योगदान सराहनीय है। रमेश उपाध्याय का ‘राजा की रसोई’ और ‘गिरगिट’ (चेखव की कहानी का रूपांतरण), शिवराम का ‘जनता पागल हो गई है’ तथा गुरुशरण सिंह का ‘जंगीराम की हवेली’ नाटक काफ़ी चर्चित हुए और कई बार खेले गए। जन नाट्य मंच, नई दिल्ली के नुक्कड़ नाटकों से सफदर हाशमी जुड़े रहे। उनके नाटकों में उल्लेखनीय हैं ‘मशीन’ (1978 ई.), ‘गाँव से शहर तक’ (1978 ई.), ‘राजा का बाजा’ (1979 ई.), ‘अपहरण भाईचारे का’ (1986 ई.), और ‘हल्ला बोल’।
हिंदी रंगमंच
व्यापक अर्थ में ‘रंगमंच’ शब्द से तात्पर्य समस्त नाट्य प्रस्तुति व्यापार से है जिसमें प्रस्तुति के लिए नाटक के चयन से लेकर प्रस्तुति की तैयारी, पूर्वाभ्यास, प्रस्तुति-स्थल की साज-सज्जा, प्रकाश व्यवस्था से लेकर नाट्य प्रस्तुति तो शामिल है ही नाट्यगृह अथवा नाट्यशाला और उसकी व्यवस्था भी शामिल है। इसलिए जब हम हिंदी रंगमंच की बात करते हैं तो इसका अर्थ हिंदी में नाट्य प्रस्तुति की पूरी परंपरा से हैं।
पारसी रंगमंच
व्यावसायिक पारसी रंगमंच आरंभ में तो अँग्रेज़ अफसरों और सैनिकों के मनोरंजन के उद्देश्य से ही स्थापित हुआ था किंतु अमानत की ‘इंदरसभा’ की लोकप्रियता देख इन लोगों को महसूस हुआ कि हिंदी-उर्दू मिश्रित रंगमंच व्यावसायिक रूप से पर्याप्त सफल हो सकेगा। परिणामतः पेस्टनजी और फरोम जी नामक पारसी व्यावसायियों ने 1860 में भारतीय भाषा का पहला व्यावसायिक रंगमंच स्थापित किया। ओरिजनल थिएटर नामक इस कम्पनी के कलाकारों में पारनिस, खुर्शीद जी, कावस जा खटाऊ, सोहराब जी और जहाँगीर जी का नाम स्मरणीय है। कम्पनी के नाटक लेखकों में मोहम्मद मियाँ रौनक और हुसैन मियाँ जरीक मुख्य थे। अमानत के ‘इंदरसभा’ की लोकप्रियता देख इस कम्पनी ने अपनी प्रस्तुति के लिए एक नया नाटक ‘इंदरसभा’ मुंशी मदारीलाल से लिखवाया। इस नाट्य कम्पनी की लोकप्रियता को देखकर 1877 ई. में विक्टोरिया थिएटर और 1890 ई. में न्यू एल्फ्रेड कम्पनी की स्थापना हुई। इन कम्पनियों ने एक ओर तो शेक्सपियर के नाटकों के अनुवादों का मंचन शुरू किया तथा दूसरी ओर पौराणिक कथाओं के आधार पर नाटक तैयार कराए। ‘महाभारत’, ‘रामायण’, ‘कृष्ण-सुदामा’, ‘वीर अभिमन्यु’ आदि नाटकों ने हिंदी रंगमच को आम जनता के बीच प्रसारित किया। इस तरह पारसी रंगमंच हिंदी-उर्दू क्षेत्र की प्रधान प्रस्तुतिपरक गतिविधि बन गई। नाट्य लेखकों में विनायक प्रसाद तालिब, नारायण प्रसाद बेताब, सैयद मेंहदी हसन, आगा हश्र कश्मीरी, पं. राधेश्याम कथावाचक प्रमुख हैं।
हिंदी रंगमंच के सुरुचि संपन्न विकास की सामर्थ्य न होने के कारण पारसी रंगमंच में एक तरह का सतहीपन और तात्कालिक मनोरंजन तक ही सीमित रहने की मानसिकता पनपी। स्वाभाविक ही था कि हिंदी का जागरूक लेखक-पत्रकार वर्ग इस विकृत परंपरा से मुक्ति का प्रयास करते हुए हिंदी रंगमंच को प्राचीन संस्कृत रंगमच से जोड़ने का प्रयास करे।
भारतेंदु युगीन रंगमंच
इस दिशा में पहला और महत्वपूर्ण कदम भारतेंदु हरिश्चंद्र ने उठाया। पाँच नवंबर 1884 को बलिया में उन्होंने स्वयं ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक की प्रस्तुति कराई और उसमें हरिश्चंद्र का अभिनय किया। हिंदी रंगमंच को पारंपरिक संस्कृत रंग परंपरा से जोड़ते हुए उन्होंने घोषित किया कि वह नाटक को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखना चाहते। इसके माध्यम से भारतीय जीवन पद्धति के आधारभूत मूल्यों को पुनः स्थापित करके जनमानस का परिष्कार करना चाहते थे। पारसी रंगमंच पर पौराणिक और सांस्कृतिक घटनाओं और पात्रों की प्रस्तुति काफ़ी कृत्रिम और घटिया ढंग से होती थी। प्राचीन अथवा पौराणिक पात्रों के अनुकूल भाषा भी इन नाटकों में प्रयुक्त नहीं होती थी। पाश्चात्य प्रभाव और कृत्रिम भाषा के कारण यह नाटक संवेदना शून्य और मार्मिक प्रभाव विहीन प्रतीत होते थे। इसके विपरीत भारतेंदु और उनके समय के अन्य नाटककारों, पत्रकारों, पं. बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, रामनारायण त्रिपाठी प्रभाकर माधव शुक्ल आदि ने भारतीय रंग-परंपरा के क्लासिकी तत्वों को उद्घाटित करने और समसामयिक जीवन से उसे जोड़ने का प्रयास किया। इस तरह हिंदी रंगमंच राष्ट्रीय सांस्कृतिक नवजागरण की प्रक्रिया का प्रबल और सशक्त माध्यम बना। विषयानुकूल एवं पात्रानुकूल भाषा एवं अभिनय आने से हिंदी रंगमंच आत्महीनता से मुक्त होने के साथ-साथ ही अपने समय के ज्वलंत सामाजिक-सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्रश्नों से जुड़ा। ‘भारत दुर्दशा’ और ‘अंधेर नगरी’ जैसे नाटकों से उस परंपरा का सूत्रपात हुआ जिसने हिंदी रंगमंच को स्वाधीनता और जागरण सुधार आंदोलनों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। दूसरी ओर रंगमंच को ‘नाट्यशास्त्र’ की परंपरा से जोड़ने का प्रयास करते हुए भारतेंदु ने ‘सत्य हरिश्चंद्र’ में सूत्रधार नान्दीपाठ, भरतवाक्य, विष्कंभक, अंकावतार आदि का विधान किया। साथ ही संस्कृत नाटकों के हिंदी अनुवाद करके उनके प्रस्तुतिकरण के माध्यम से प्राचीन रंगपरंपरा से हिंदी रंगमंच को जोड़ने का विधान किया। इस तरह पारसी रंगमंच के समानांतर अव्यावसायिक रंगमंच की शुरूआत ने नवजागरण की प्रक्रिया में अपना सक्रिय योगदान देते हुए जनरुचि के संस्कार परिष्कार का कार्य आरंभ कर दिया। भारतेंदु को बाबू रविदत्त शुक्ल, बाबू ऐश्वर्य नारायण सिंह और पंडित शीतलादीन का सहयोग विशेष रूप से प्राप्त हुआ। नाटक के मंचन को खेल तमाशा की प्रवृत्ति से बाहर निकाल कर नवजागरण की चेतना से जोड़ने में हिंदी रंगमंच आंदोलन की अविस्मरणीय भूमिका रही है।
जयशंकर प्रसाद के नाट्यलेखन काल के दौरान हिंदी में रंगमंचीय गतिविधियाँ लगभग शून्य ही रही थीं। उनके उदात्त नाटकों को दर्शकों तक पहुँचने का सौभाग्य ही न मिल सका। बालकृष्णदास (बल्लीबाबू) और लक्ष्मीकांत झा के प्रयास से भारतेंदु नाटक मंडली और रत्नाकर रसिक मंडल द्वारा’चंद्रगुप्त’, ‘स्कंदगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’ आदि की इक्का-दुक्का प्रस्तुतियाँ ही हो सकीं।
इन्हीं दिनों प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना सन् 1936 ई. में हुई। इस संगठन के प्रोत्साहन से भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का गठन किया गया और इसने अपना पहला प्रदर्शन बम्बई में सन् 1942 में किया। इप्टा ने हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में नाटकों को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इप्टा ने नाटकों का मंचन जनता के बीच किया और ऐसे नाटक अधिक खेले जिनमें गरीब जनता के दुख-दर्द को विषय बनाया गया हो।
उस दौर में सरवालकर का ‘दादा’ और सरदार जाफ़री का ‘यह किसका खून है’ नाटक महत्वपूर्ण थे। इस प्रकार जिस सामाजिक सोद्देश्य कथावस्तु की तलाश थी, वह रंगमंच को प्राप्त हो गई। मानवीय संवेदना रंगमंच के माध्यम से सशक्त रूप में प्रस्तुत होने लगी। रंग-विधान के साथ सोद्देश्य नाट्य चेतना की यह लहर अखिल भारतीय स्तर पर फैलाने का वास्तविक कार्य ‘भारतीय जन-नाट्य संघ’ ने ही किया। लेकिन सन् 1950 ई. के बाद भारतीय जन नाट्य संघ का वह प्रभाव नहीं रहा।
पृथ्वी थियेटर्स : सन् 1944 में पृथ्वीराज कपूर ने ने ‘पृथ्वी थियेटर्स’ की स्थापना की। यह
पारसी रंगमंच से प्रभावित होने पर भी उससे बहुत भिन्न था और इसने किसी न किसी रूप में प्रगतिशील नाट्य परंपरा से अपने को जोड़े रखा। यह मानव जीवन को यथार्थ रूप में प्रकट करने में सफल रहा। पृथ्वीराज कपूर का सशक्त अभिनय हिंदी रंग-जगत में विशेषकर उल्लेखनीय है। ‘पृथ्वी थियेटर्स’ में अभिनीत प्रमुख नाटक हैं ‘दीवार, ‘शकुंतला’, ‘पठान’, ‘गद्दार, ‘आहुति’, ‘कलाकार’, ‘पैसा और किसान’।
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी रंगमंच का विकास
सन् 1947 के आसपास महानगरों बम्बई, दिल्ली के अतिरिक्त उपनगरों बनारस, कानपुर लखनऊ इलाहाबाद आदि में भी रंगमंचीय वातावरण क्रियाशील हो रहा था। अनेक छोटी-बड़ी नाट्य संस्थाएँ मूल नाटक या अनुवादों का अभिनय प्रस्तुत करने लगी थीं। साथ ही साहित्यिक नाटकों का भी सृजन होने लगा था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार का ध्यान कलाओं के विकास की ओर आकर्षित हुआ और उसको समृद्ध बनाने के लिए भारत सरकार ने ‘संगीत नाटक अकादमी’ की स्थापना की।
राजधानी के रंगमंचों में श्री आर्ट्स क्लब, दिल्ली आर्ट थियेटर, लिटिल थियेटर ग्रुप, इंद्रप्रस्थ थियेटर यांत्रिक, कला साधना मंदिर, रंगमंच आदि संस्थाएँ उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा अग्रदूत, अंकिता, अभियान, छायानट, प्रयोग, सृजन आदि संस्थाएँ दिल्ली में उभरीं।
सन् 1959 ई. में संगीत नाटक अकादमी की ओर से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा) और एशियन थियेटर इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई। अब नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा, शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय का एक स्वायत्त संगठन बन गया है। इसमें तीन वर्ष का नाटक अभिनय, मंचसज्जा, निर्देशन आदि संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। भारतीय और पाश्चात्य नाट्य सिद्धांत एवं साहित्य के अध्ययन के साथ-साथ अभिनय एक्टिंग, सीनिक डिज़ाइन, कास्ट्यूम डिज़ाइन, लाइटिंग, मेकअप, थियेटर आर्किटेक्चर का अध्ययन कराया जाता है। साथ ही डायरेक्शन, स्टेजक्राफ्ट और स्कूल ड्रामेटिक्स का विशेष अध्ययन कराया जाता है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा) के विद्यार्थियों द्वारा समय-समय पर नाटकों का अभिनय प्रदर्शन भी किया जाता है। इसके पास अपना ‘ओपेन एयर थियेटर भी है। इसके निदेशकों में अब्राहम अलकाज़ी, ब.व. कारंत, बृजमोहन शाह, रामगोपाल बजाज, राजिन्दरनाथ, कीर्ति जैन, देवेन्द्र राज अंकुर, अनुराधा कपूर, वामन केंद्रे विशेष उल्लेखनीय हैं।
22 दिसंबर, सन् 1955 को कलकत्ता में ‘अनामिका’ की स्थापना हुई। इसके निदेशकों में श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल, बद्री तिवारी, कृष्ण कुमार और शिवकुमार जोशी उल्लेखनीय हैं। कलकत्ता में ही सन् 1966 में ‘अदाकार’ की स्थापना हुई। इसके निदेशक और संस्थापक हैं- कृष्णकुमार। कलकत्ता में ‘संगीत कलामंदिर (1945) ने अपने नाटकों का प्रदर्शन सन् 1963 में आरंभ किया।
बम्बई में सत्यदेव दुबे के निर्देशन में चलने वाली नाट्य संस्था ‘थियेटर यूनिट’, कानपुर की संस्था दर्पण, इलाहाबाद का प्रयाग रंगमंच, वाराणसी की नागरी नाटक मंडली, श्री नाट्यम् आदि नाट्य संस्थाएँ हिंदी रंगमंच के उत्थान में सक्रिय योग दे रही हैं।
इब्राहीम अल्काजी, सत्यदेव दुबे, श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल, हबीब तनवीर, शीला भाटिया, ब.व. कारंत, ओम शिवपुरी, दीनानाथ, सई परांजपे, रामगोपाल बजाज, लक्ष्मीनारायण लाल, अमाल अल्लाना, बी.एम. शाह, आदि नाट्य निर्देशकों ने सफल प्रस्तुतियाँ कीं। नाटक की परंपरागत शास्त्रीय पद्धतियों के साथ-साथ लोक नाट्य शैलियों में प्रस्तुति भी इन दिनों काफ़ी लोकप्रिय हुई। इन क्षेत्रों में पहल हबीब तनवीर ने की। उसके बाद छत्तीसगढ़ी नाचा शैली, राजस्थानी ख्याल शैली, कनार्टक की यक्षगान शैली, उत्तर प्रदेश की नौटंकी शैली में बहुत ही सफल प्रस्तुतियाँ हुई।
हिंदी रंगमंच पर प्रस्तुत अनूदित नाटकों में गिरीश कर्नाड का ‘तुगलक’ और ‘हयवदन’, आद्य रंगाचार्य का ‘सुनो जनमेजय, विजय तेंदुलकर का ‘खामोश आदलत जारी है, घासीराम कोतवाल’, ‘सखाराम बाइंडर, बादल सरकार का ‘जुलूस’, ‘वल्लभपुर की रूपकथा’, ब्रेख्त का ‘खड़िया का घेरा, ‘हिम्मत माई’, ऑलस्टाल का ‘पाप का प्रकाश’, मॉलियर का ‘कंजूस’ और ‘बीबियों का मदरसा’, शेक्सपियर का ‘वरनम वन’ आदि विशेष रूप से चर्चित रहे हैं।
आज हिंदी रंगमंच पर प्रस्तुत होने वाले नाटकों में अनूदित नाटकों की संख्या मौलिक नाटकों के लगभग बराबर ही होती है। विविध भाषाओं के संस्कारों के इस सम्मिश्रण से हिंदी रंगमंच तथा नाटक के लिए नई दिशाओं की संभावनाएँ खुल रही हैं।
हिंदी निबंध
हिंदी निबंध का उद्भव और विकास, हिंदी निबंध के प्रकार और प्रमुख निबंधकार।
हिंदी निबंध की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से मानी जाती है। निबंध की आरंभिक परंपरा में भारतेंदु युग के लेखकों का विशेष महत्व है क्योंकि उन्होंने विषय, शैली और भाषा तीनों स्तरों पर निबंधों में नए प्रयोग किए किंतु निबंधों को प्रौढ़ रूप द्विवेदी युग मे ही प्राप्त हुआ। इस दौर में जहाँ एक ओर भाषा का मानक रूप निर्मित हुआ, वहीं दूसरी ओर चिंतन में प्रौढ़ता और शैली में परिष्कार भी हुआ। हिंदी निबंध के विकास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का केंद्रीय महत्व रहा है। उन्होंने विचार, शैली और भाषा तीनों स्तरों पर हिंदी निबंध को उच्च स्तरीय स्वरूप प्रदान किया। जिस प्रकार हिंदी नाटक और कविता के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद का विशेष महत्व रहा है उसी प्रकार हिंदी निबंध के क्षेत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का विशेष महत्व है। इसीलिए हिंदी निबंध के विकास के केंद्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को मानते हुए हम उसे तीन युगों में बाँट सकते हैं:
(1) शुक्ल-पूर्व युग (1850 ई. से 1920 ई.)
(ii) शुक्ल युग (1920 ई. से 1940 ई.)
(iii) शुक्लोत्तर युग (1940 ई. से आज तक)
शुक्ल पूर्व युग (1850 ई. से 1920 ई.)
हिंदी नाटक की ही भाँति हिंदी निबंध लेखन की शुरुआत भारतेंदु युग से हुई। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1868 ई. में ‘कविवचन सुधा’ का प्रकाशन आरंभ किया। इसके प्रकाशन ने हिंदी में साहित्यिक लेखन को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया। बाद में भारतेंदु ने ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ और ‘बालाबोधिनी’ पत्रिका की भी शुरूआत की। भारतेंदु युग के ही कई अन्य लेखकों ने भी पत्र-पत्रिकाएँ शुरू कीं। इनमें प्रतापनारायण मिश्र द्वारा प्रकाशित ‘ब्राह्मण’, बालकृष्ण भट्ट’ का हिंदी प्रदीप, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ का ‘आनंद कादंबिनी’, श्रीनिवास दास का ‘सदादर्श’ आदि प्रमुख हैं। उस युग में लिखे गए निबंध प्रायः इन्हीं में लिखे गए निबंध प्रायः इन्हीं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे।
वैसे हिंदी में निबंध लेखन की शुरुआत कब हुई और पहला निबंध कब लिखा गया और किसने लिखा, यह बहुत स्पष्ट नहीं है। आम तौर पर माना जाता है कि बालकृष्ण भट्ट हिंदी निबंध के जनक हैं।
भारतेंदु युग (1875 ई से 1900 ई.)
भारतेंदु युग के निबंधों की मूल प्रेरणा अपने समाज के नैतिक और राजनीतिक जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने की भावना है। इसलिए इस युग के निबंधकारों ने समाज सुधार, राष्ट्रप्रेम, देशभक्ति, अतीत-गौरव का प्रेम, विदेशी शासन के प्रति आक्रोश आदि को अपने निबंधों का विषय बनाया है। यद्यपि उस समय विदेशी शासन के विरुद्ध जन आंदोलन शुरू नहीं हुए थे। इसलिए लेखकों ने अँग्रेज़ी शासन के प्रति भक्ति भावना भी दिखलाई है, लेकिन राष्ट्र के विकास की चिंता और उसके प्रति प्रेम भी बराबर व्यक्त किया है। भारतेंदु युग के निबंधकारों ने इन विषयों के अतिरिक्त ऐसे विषयों पर निबंध लिखे जिनमें उनकी जिंदादिली और विनोदवृत्ति झलकती है। जैसे ‘आँख’ ‘नाक’, भौं’, ‘धोखा’, ‘बुढ़ापा’ आदि विषयों पर निबंध लिखे गए। भारतेंदु युग के लेखकों की मूल प्रवृत्ति मनोविनोद की थी, इसलिए वे गंभीर से गंभीर विषय को हास्य और व्यंग्यपूर्ण शैली में सजीव बनाकर प्रस्तुत करते थे। व्यक्तित्व का सहज समावेश होने के कारण इस दौर के निबंधों की प्रमुख विशेषता आत्मनिष्ठता है।
इस युग के प्रमुख निबंधकारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, लाला श्रीनिवासदास, अंबिकादत्त व्यास, बालमुकुंद गुप्त, जगमोहन सिंह, केशवराम भट्ट, राधाचरण गोस्वामी आदि हैं।
भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850 ई.-1885 ई.)
उन्होंने इतिहास, पुरातत्व, धर्म, समाज-सुधार, जीवनी, यात्रा वर्णन, भाषा आदि विषयों पर व्यंग्यात्मक शैली में निबंध लिखे। विषयों की विविधता उनके विस्तृत अध्ययन और व्यापक जीवनानुभवों का परिणाम थी। उनके निबंधों में जहाँ इतिहास, धर्म, संस्कृति और साहित्य की गहरी जानकारी का परिचय मिलता है, वहीं देशप्रेम, समाज सुधार की चिंता और गौरवशाली अतीत के प्रति निष्ठा का भाव भी प्रकट होता है। ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है’, ‘लेवी प्राण लेवी’ और ‘जातीय संगीत’ में राष्ट्र के प्रति उनकी गहरी निष्ठा व्यक्त हुई है तो ‘स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन’, ‘पाँचवें पैगम्बर’, ‘कानून ताजीरात शौहर’, ‘ज्ञात विवेकिनी सभा’, ‘अँग्रेज़ स्तोत्र’, ‘कंकड़ स्तोत्र’ जैसे निबंधों में उनकी राजनीतिक चेतना के साथ ही व्यंग्य-विनोद क्षमता का पता लगता है। भारतेंदु के निबंधों की भाषा में उर्दू, संस्कृत और बोलचाल की हिंदी के शब्दों का प्रयोग हुआ है।
बालकृष्ण भट्ट (1844 ई-1914 ई.) इस युग के प्रमुख निबंधकार हैं। बालकृष्ण भट्ट ने बत्तीस वर्षों तक ‘हिंदी प्रदीप’ निकाला। उन्होंने समाज, साहित्य, धर्म, संस्कृति, रीति, प्रथा, भाव, कल्पना सभी क्षेत्रों से विषयों का चयन किया है। भट्ट जी के निबंधों में हास्य-विनोद के साथ कल्पना, भावना और वैचारिकता भी दृष्टिगत होती है। उनकी भाषा प्रायः बोलचाल के समीप है। उन्होंने ‘चारुचरित्र’, ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’, ‘चरित्रपालन’, प्रतिभा’, ‘आत्मनिर्भरता’ जैसे विचारात्मक निबंध; ‘आँसू’ मुग्ध माधुरी’ ‘पुरुष अहेरी की स्त्रियाँ अहेर हैं’, ‘प्रेम के बाग का सैलानी’ आदि भावात्मक निबंध; ‘संसार-महानाट्यशाला’, ‘चंद्रोदय’, ‘शंकराचार्य’ और ‘नानक’ जैसे वर्णनात्मक निबंध; ‘आँख’, ‘कान’, ‘नाक’, ‘बातचीत’ जैसे सामान्य विषयों तथा ‘इंगलिश पढ़े सौ बाबू होय’, ‘दंभाख्यान’, ‘अकिल अजीरन रोग’ जैसे व्यंग्य-विनोदपरक निबंध लिखे। सामाजिक समस्याओं पर लिखे गए उनके निबंध हैं-’बालविवाह’, ‘स्त्रियाँ और उनकी शिक्षा’ ‘महिला स्वातंत्र्य’ आदि।
प्रतापनारायण मिश्र (1856 ई. 1894 ई.) का हिंदी निबंध के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनमें तीखे व्यंग्य और विनोद की वृत्ति थी, जिसका उल्लेख स्वयं रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास ग्रंथ में किया है। इनकी भाषा में व्यंग्यपूर्ण वक्रता की मात्रा अधिक है। इसके लिए वे लोकोक्तियों और मुहावरों का भी प्रयोग करते हैं। मिश्र जी ने जहाँ एक ओर ‘भौं’, ‘बुढ़ापा’, ‘होली’, ‘घोखा’, ‘मरे को मारे शाहमदार’ जैसे विनोद और सूझपूर्ण निबंध लिखे हैं वहीं दूसरी ओर ‘शिवमूर्ति’, ‘काल’, ‘स्वार्थ’, विश्वास’, ‘नास्तिक’ जैसे गंभीर विषयों पर भी लेखनी चलाई है।
बालमुकुंद गुप्त (1965 ई 1907 ई.) भारतेंदु युग के प्रतिभावान निबंधकार हैं। इन्होंने द्विवेदी युग में भी महत्वपूर्ण लेखन किया है। गुप्त जी ने ‘बंगवासी’ और ‘भारतमित्र’ पत्रिकाओं का संपादन किया। इन पत्रिकाओं के माध्यम से ही उनके निबंध प्रकाशित हुए। उनके निबंधों में गहन चिंतन, तीखा व्यंग्य और मीठी हँसी का समावेश मिलता है। शिवशंभु का चिट्ठा’ के आठों चिट्ठे उनकी देशभक्ति की भावना के द्योतक तो हैं ही, व्यंग्य और गहरी विचारशीलता के भी परिचायक हैं। इनके निबंधों का संग्रह ‘गुप्त निबंधावली’ नाम से प्रकाशित हुआ है।
द्विवेदी युग (1900 ई. से 1920 ई.) हिंदी निबंध का द्वितीय युग ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ तथा ‘सरस्वती’ के प्रकाशन से प्रारंभ होता है। इस युग में राष्ट्रीय चेतना और अधिक परिपक्व हो चुकी थी। यह युग राष्ट्रीय जागृति, विश्वप्रेम, सामाजिक एकता, अतीत गौरव, सांस्कृतिक नवजागरण तथा भाषा के परिष्कार का युग है। अतः इस युग के निबंधों में विषयों की विविधता, विचारों की गंभीरता और भाषा की शुद्धता और व्याकरण सम्मतता मिलती है। इस युग के निबंध जिन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए उनमें ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ (1896 ई.). ‘सरस्वती’, ‘समालोचक’ (1902 ई.), ‘इंदु’ (1909 ई.), ‘मर्यादा’ (1910 ई.), ‘प्रभा’ (1913 ई.) आदि प्रमुख है।
इस युग के निबंधकारों में महावीरप्रसाद द्विवेदी, बालमुकुंद गुप्त, श्यामसुंदर दास, रामचंद्र शुक्ल, सरदार पूर्णसिंह, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, माधवप्रसाद मिश्र आदि प्रमुख हैं।
महावीरप्रसाद द्विवेदी (1864 ई 1938 ई.) ने मूलतः विचारात्मक निबंध लिखा। अँग्रेज़ी के ‘बेकन’ के निबंधों का अनुवाद भी ‘बेकन विचार रत्नावली’ के नाम से प्रस्तुत किया, जिससे हिंदी के अन्य लेखकों को निबंध लिखने की प्रेरणा मिली।
महावीरप्रसाद द्विवेदी के समीक्षात्मक निबंधों में ‘कवि और कविता’, ‘साहित्य की महत्ता; वर्णनात्मक निबंधों में ‘एक योगी की साप्ताहिक समाधि’ और ‘अद्भुत इंद्रजाल’ आदि प्रमुख हैं। युगव्यापी नीरसता से अलग हटकर उन्होंने कुछ ऐसे निबंध भी लिखे जिनमें विचारों के ऊपर लालित्य का रंग चढ़ गया है। साधारण विषय को भी गंभीर स्तर तक उठाने और गूढ़ अर्थों के उद्घाटन का प्रयत्न किया गया है। ‘दंडदेव का आत्मनिवेदन इस प्रसंग में उल्लेखनीय है।
पंडित माधव प्रसाद मिश्र द्विवेदी युग के प्रभावशाली लेखक थे। उन्होंने ‘सुदर्शन’ का संपादन किया था। कुछ चिंतनपरक निबंध भी है जैसे- ‘सब मिट्टी हो गया। त्योहारों और पर्वों पर उनके निबंध भावपूर्ण और कल्पना के सौंदर्य से सम्पन्न हैं। ‘होली’, ‘रामलीला’, ‘व्यासपूजा’, ‘श्रीपंचमी’ आदि ऐसे ही निबंध हैं। शोध और अनुसंधान के क्षेत्र में उनकी खंडन-मंडन वाली शैली प्रभावपूर्ण थी। ‘बेवर का भ्रम’ इसका अच्छा उदाहरण है।
बाबू श्यामसुंदर दास के अधिकांश निबंध आलोचनात्मक हैं। उनके विषय प्रायः साहित्यिक और सांस्कृतिक रहे। श्यामसुंदर दास की भाषा संस्कृतनिष्ठ और प्रवाहपूर्ण थी। बोलचाल अथवा उर्दू के शब्दों का व्यवहार उन्होंने कम ही किया है। उनके विचारात्मक निबंधों में व्यास-शैली के दर्शन होते हैं जैसे- ‘भारतीय साहित्य की विशेषताएँ’ निबंध में।
सरदार पूर्ण सिंह (1881 ई-1931 ई.) द्विवेदी युग के ऐसे लेखक हैं जो केवल छः निबंधों के बल पर श्रेष्ठ निबंधकार माने गए।
ललित निबंध की जो धारणा आज प्रचलित है, उसका प्रत्यक्ष रूप इनके तीन निबंधों ‘आचरण की सभ्यता’, ‘मजदूरी और प्रेम’ तथा ‘सच्ची वीरता’ में मिल जाती है। उनके शेष तीन निबंध हैं ‘कन्यादान’, ‘पवित्रता’ ‘अमेरिका का मस्त जोगी वाल्ट विटमैन’।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी (1883 ई--1920 ई.) ‘कछुआ धर्म’ (विचार प्रधान) और ‘मारेसि मोहि कुठाँव’ (भाव प्रधान) में आग्रह, सामयिकता और तात्कालिक कर्त्तव्य का ही है। गुलेरी के निबंध उनके व्यक्तित्व की सजीवता से ओत-प्रोत हैं। उनकी भाषा अधिकतर चलते हुए शब्दों से बनी है।
पद्मसिंह शर्मा के निबंध आलोचनात्मक हैं। निबंध मुख्यतः साहित्यिक विषयों अथवा व्यक्तियों पर लिखे गए हैं। इनके निबंधों के संग्रह ‘पद्मपराग’ और ‘पंद्ममंजरी’ नाम से प्रकाशित हुए।
शुक्ल युग (1920 ई. से 1940 ई.)
शुक्ल युग में गद्य की भाषा में सृजनात्मक प्रयोग का कार्य आरंभ हुआ। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने गद्य भाषा को निखारने और जटिल से जटिल विषय, विचार और भाव को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करने का उल्लेखनीय कार्य किया।
द्विवेदी युग की अपेक्षा इस युग में संरचनात्मक दृष्टि से निबंध के अधिक स्पष्ट लक्षण निर्मित हुए और लेखकों तथा आलोचकों के बीच इस विषय की सही धारणा विकसित हुई। (हिंदी वाङ्मय : बीसवीं शती-संपादक डॉ नगेंद्र)।
शुक्ल युग के निबंधकारों में रामचंद्र शुक्ल, गुलाब राय, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, निराला, महादेवी वर्मा, नंददुलारे वाजपेयी, शांतिप्रिय द्विवेदी, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, रामनाथ सुमन, माखनलाल चतुर्वेदी आदि प्रमुख हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1884 ई 1941 ई.) इस युग के प्रतिनिधि निबंधकार हैं। शुक्ल जी ने विभिन्न विषयों पर निबंध लिखे जो ‘चिंतामणि’ के तीन भागों में संकलित हैं।
उन्होंने ‘भय’, ‘क्रोध’, ‘श्रद्धा और भक्ति’, ‘घृणा’, ‘करुणा’, ‘लज्जा’, ‘ग्लानि’, ‘लोभ और प्रीति’, ‘ईर्ष्या’, ‘उत्साह’ आदि विभिन्न मनोभावों पर दस निबंध लिखे जिनमें इन मनोभावों के सामाजिक पक्ष का विश्लेषण किया गया है।
बाबू गुलाबराय (1888 ई--1963 ई.) का निबंध साहित्य इस युग में इसलिए उल्लेखनीय है कि वह मुख्यतः आत्मपरक और व्यंग्यमूलक होने के साथ-साथ लेखक के पांडित्य और जीवन दर्शन की छवि भी प्रस्तुत करता है। उनके निबंधों में गंभीर चिंतन तो मिलता ही है, आत्मीयतापूर्ण व्यंग्य-विनोद भी उनमें देखा जा सकता है। इसके प्रमाणस्वरूप उनके दो निबंध संग्रह सामने रखे जा सकते हैं ‘फिर निराशा क्यों’ और ‘मेरी असफलताएँ’। पहले संग्रह में विचार और तत्व चिंतन की प्रधानता है, सामाजिक दायित्व और राष्ट्रीय और वैयक्तिक आचारमूलक प्रश्न उठाए गए हैं, अंतर्वृत्तियों की मनोवैज्ञानिक छानबीन है। उधर दूसरे संग्रह में हास्य, रससिक्त आत्माभिव्यंजन और व्यंग्य-विनोद से निबंधों को लालित्यपूर्ण बनाया गया है।
माखनलाल चतुर्वेदी तन, मन और प्राण से पूर्णतः राष्ट्रीय थे। ‘साहित्यदेवता’ संग्रह में रसपूर्ण, आत्मभिव्यंजक निबंध हैं। चतुर्वेदी जी ने अप्रस्तुत योजना (प्रतीकात्मक अर्थ) का आश्रय लेकर भाषा को बिंब-विधायिका बना दिया है। उनकी गद्य शैली भावावेग से विचारों को प्रस्तुत करती है।
राहुल सांकृत्यायन बहुभाषाविद्, पर्यटक, साहित्यकार, अन्वेषक और पुरातत्ववेत्ता थे। उनके पुरातत्व विषयक निबंध ‘पुरातत्व निबंधावली’ में प्रकाशित हैं। ‘साहित्य निबंधावली’ में भाषा और साहित्य विषयक निबंध संकलित हैं। उनके यात्रा विवरणों को उत्कृष्ट निबंधों की कोटि में रखा जा सकता है।
‘मातृभाषाओं का प्रश्न’, ‘प्रगतिशील लेखक’, ‘हमारा साहित्य’, ‘भोजपुरी’ आदि निबंध बहुचर्चित समस्याओं को संबोधित करते हैं।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला महाकवि के रूप में तो विख्यात हैं ही, गद्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने अनेक प्रभावशाली निबंध लिखे जो ‘प्रबंध पद्म’, ‘प्रबंध-प्रतिमा’, ‘चयन’, ‘चाबुक’ आदि निबंध संग्रहों में संकलित हैं। ये निबंध मुख्यतः काव्य, साहित्य और हिंदी भाषा की अपनी समस्याओं से संबद्ध हैं।
17.2.3 शुक्लोत्तर युग (1940 से आज तक)
द्विवेदी युग और शुक्ल युग के निबंध अधिकाधिक गंभीर, साहित्यिक, विवेचनापूर्ण और Jan
तर्कसंकुल हो गए। इनमें न तो भारतेंदु युगीन निबंधों जैसी वैयक्तिकता है और न भावना की तरलता। यद्यपि छायावादी कवियों के निबंधों में व्यक्तित्व और आत्मीयता की झलक पाई जाती है किंतु अधिकतर निबंधों में आत्मपरकता और जिंदादिली का अभाव रहा। शुक्ल युग के बाद के दौर में एक बार फिर निबंधों में वैयक्तिकता का समावेश हुआ और वह विचारों को प्रकट करने का प्रमुख और सशक्त माध्यम बना। उसका आकार भी छोटा हुआ। भाषा बोलचाल की सी होने लगी। उसमें तत्सम शब्दों के स्थान पर तद्भव और प्रयोग अधिक होने लगा। निबंध के विषयों में विविधता बढ़ने लगी है।
शुक्लोत्तर युग (1940 से आज तक)
शुक्ल युग के बाद के दौर में निबंध लेखन की कई शैलियों ने अपनी अलग पहचान बनाई। इस युग में तीन प्रमुख शैलियों ने निबंध लेखन को उत्कर्ष पर पहुँचाया। ये शैलियाँ हैं-ललित निबंध, व्यंग्य निबंध और वैचारिक निबंध।
वैचारिक निबंध : शुक्ल जी के बाद भी हिंदी में वैचारिक निबंधों की परंपरा बराबर बनी रही। इस दौर के वैचारिक निबंधों में विचार की स्पष्टता और तर्कपूर्ण चिंतन के साथ विचारधारात्मक आग्रह भी व्यक्त हुए। जैनेन्द्र कुमार, डॉ संपूर्णानंद, रामविलास शर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी, नगेंद्र आदि के निबंधों से उनकी वैचारिक दृष्टि का परिचय मिलता है।
जैनेंद्र कुमार प्रसिद्ध कथाकार तो थे ही, निबंध के क्षेत्र में भी उन्होंने ख्याति अर्जित की। उन्होंने सांस्कृतिक, नैतिक और राजनीतिक चिंतन को अपनी विशिष्ट शैली में विवेचनात्मक निबंधों के रूप में प्रस्तुत किया। कहीं-कहीं प्रश्नोत्तर अथवा साक्षात्कार (इंटरव्यू) की पद्धति भी अपनाई गई है। उनके निबंधों की ख़ास विशेषता यह है कि वे समस्या के दार्शनिक पहलू को लेकर चलते हैं और उसे जीवन के किसी बड़े सत्य से जोड़ देते हैं।
डॉ. संपूर्णानंद के निबंधों में दार्शनिक विवेचन है, लेकिन उनमें जटिलता नहीं है। ‘शिक्षा की समस्या’ उनका विचार प्रधान निबंध है।
वैचारिक निबंधकारों में रामधारी सिंह दिनकर का नाम प्रमुख है। उनके निबंध में भारतीय जीवन के सांस्कृतिक, मनौवैज्ञानिक तथा मानवीय पहलुओं की अभिव्यक्ति हुई है। उन्होंने भाषा और साहित्य के मुद्दों पर भी निबंध लिखा है। ‘अर्धनारीश्वर’, ‘हमारी सांस्कृतिक एकता’, ‘राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय साहित्य’, ‘रेती के फूल’ आदि उनके प्रमुख निबंध संग्रह हैं।
डॉ. रामविलास शर्मा के निबंधों में प्रेमचंद और शुक्ल जी दोनों की विशेषताएँ मौजूद हैं। उनकी निबंध शैली तीक्ष्ण व्यंग्य से बनी है। भाषा विश्लेषणात्मक किंतु सरल और सहज है। उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर भी निबंध लिखे हैं। ऐसे निबंध ‘विराम चिह्न’ में संकलित हैं।
डॉ. नगेंद्र ने अपने निबंधों में मुख्यतः काव्यशास्त्र और साहित्य के गंभीर विषयों को निरूपण के लिए चुना। नगेंद्र जी ने निबंधों के क्षेत्र में अनेक प्रयोग किए हैं। उन्होंने न केवल उसके कलेवर को निखारा-सँवारा है, वरन उसकी प्राण-चेतना को भी अधिक शक्तिशाली बनाया है। उनके प्रमुख निबंध संग्रह हैं - ‘विचार और विवेचन’ (1944 ई.), ‘विचार और अनुभूति’ (1949 ई.), ‘आस्था के चरण’ (1969 ई.) आदि। SI
विवेकी राय : स्वातंत्र्योत्तर भारत के एक प्रमुख निबंधकार हैं। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के बाद के दौर में विकास-प्रक्रिया की खामियाँ तथा आम लोगों के दुःख, चिंता और सरोकारों पर प्रचुरता से लिखा है। ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ तथा ‘फिर बैतलवा डाल’ पर उनके प्रतिनिधि निबंध संग्रह हैं। उनके अन्य निबंध संग्रह हैं गुलाब’, ‘आम रास्ता नहीं है’ आदि। ‘जुलूस रुका है’, ‘गवई-गंध-
ललित निबंध: ललित निबंध में लालित्य अर्थात सरस शैली के उत्कर्ष पर विशेष बल होता है। निबंधकार अपने भावों और विचारों को इस रूप में प्रस्तुत करना चाहता है कि वह सरस, अनुभूतिजन्य, आत्मीय और रोचक लगे। भाषा शुष्क न हो बल्कि उसमें कल्पनाशीलता, सहजता और सरसता हो।ललित निबंधों में रचनाकार के व्यक्तित्व की छाप रहती है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का ललित निबंधकारों में प्रमुख स्थान है। उनके निबंधों में मानवतावादी जीवन दर्शन और भावुक हृदय के दर्शन होते हैं। उन्होंने संस्कृत के प्राचीन साहित्य के साथ-साथ पालि, अपभ्रंश और बंगला भाषाओं के साहित्य तथा मध्यकालीन हिंदी साहित्य का व्यापक अध्ययन किया था, लेकिन उनकी दृष्टिआधुनिक थी। इसीलिए उनके निबंधों में पांडित्य के साथ-साथ नवीन चिंतन-दृष्टि भी मिलती है। उनके प्रमुख निबंध संग्रह ‘अशोक के फूल’, ‘विचार और वितर्क’, ‘कल्पलता आदि हैं।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अतिरिक्त ललित निबंधकारों में विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, विवेकी राय आदि प्रमुख हैं।
विद्यानिवास मिश्र संस्कृत भाषा और साहित्य के विद्वान हैं। लोक संस्कृति और लोक साहित्य में भी वे गहरी पैठ रखते हैं। इसलिए उनके निबंधों में पांडित्य (शास्त्र ज्ञान) के साथ-साथ लोक संस्कृति का भी सम्मिलन हुआ है। विद्यानिवास मिश्र के प्रमुख निबंध संग्रह हैं ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’, ‘तुम चंदन हम पानी’, ‘तमाल के झरोखे से’, ‘संचारिणी’, ‘लागौ रंग हरि’ आदि।
हिंदी के ललित निबंधकारों में कुबेरनाथ राय का नाम महत्वपूर्ण है। उनकी दृष्टि आधुनिक आधुनिक है तथा उनके निबंधों में चिंतन और कला-प्रेम की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ‘प्रिया नीलकंठी’, ‘रस आखेटक’, ‘निषाद बाँसुरी’, ‘गंध मादन’, ‘विषाद योग’ आदि उनके प्रसिद्ध निबंध संग्रह है।
व्यंग्य निबंध : हिंदी में व्यंग्य निबंधों का प्रारंभ भारतेंदु युग में हुआ था। उस दौर में स्वयं भारतेंदु ने तथा प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट आदि ने कई व्यंग्य निबंध लिखे, लेकिन बाद में व्यंग्य निबंध लिखने की परंपरा शिथिल हो गई। यद्यपि आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बाबू गुलाब राय, रामविलास शर्मा आदि के निबंधों में व्यंग्य और विनोद का भाव दिखाई पड़ता है किंतु अधिकांश निबंधकारों में वह बात नहीं थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद व्यंग्य निबंध के नए युग की शुरूआत हुई। इसका श्रेय हरिशंकर परसाई को है जिन्होंने व्यंग्य को एक स्वतंत्र साहित्य-रूप की तरह प्रतिष्ठित किया।
व्यंग्य निबंधकार प्रायः समसामयिक विषयों पर लिखता है और उन्हें अपने व्यंग्य का लक्ष्य बनाता है। हिंदी व्यंग्य लेखकों में हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवींद्रनाथ त्यागी, प्रभाकर माचवे, गोपाल प्रसाद व्यास, बरसाने लाल चतुर्वेदी आदि प्रमुख हैं। डॉ. नामवर सिंह का ‘बकलम ख़ुद’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय रचना है।
गोपाल प्रसाद व्यास के निबंधों में शुद्ध हास्य का रूप मिलता है। इनके निबंधों में पारिवारिक जीवन की असंगतियों और युग-जीवन की विकृतियों का उपहास उड़ाया गया है और उन पर व्यंग्य भी किया गया है। ‘मैंने कहा, ‘कुछ सच कुछ झूठ’, ‘तो क्या होता’ और हलो-हलो’ इनके निबंध संग्रह हैं।
प्रभाकर माचवे के निबंधों में आदर्शों का ढोल पीटने वाले लोगों की स्वार्थपरता, अश्लीलता
की पोल खोली गई है, परंतु भाषा में संयम सर्वत्र विद्यमान है। अनेक स्थलों पर भाषा के लाक्षणिक प्रयोग अनूठे बन पड़े हैं जो हास्य के साथ चिंतन भी प्रस्तुत करते हैं- ‘अभाव में भाव तो बढ़ता ही है’, ‘कुछ भी हो लंगड़ा पलायनवादी नहीं हो सकता’, ‘आप चाहे सुर या असुर कहें, ससुर नहीं कह सकते इत्यादि। खरगोश के सींग’, ‘बेरंग’ और ‘तेल की पकौड़ियाँ’ इनके निबंध संग्रह हैं। माचवे जी का व्यंग्य पैना और व्यंजक है।
हरिशंकर परसाई के निबंध सोद्देश्य हैं जिनके पीछे स्पष्ट वैज्ञानिक दृष्टि है जो जो समाज समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, दंभ, अवसरवादिता, अंधविश्वास, सांप्रदायिकता, नौकरशाही, शासन के ढीलेपन आदि पर तीव्र प्रहार करती है।
हरिशंकर परसाई के निबंध संग्रह हैं ‘तब की बात और थी’, ‘भूत के पाँव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’ ‘पगडंडियों का जमाना’, ‘सदाचार की तावीज’, ‘शिकायत मुझे भी है’, ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’, ‘सुनो भाई साधो निठल्ले की डयरी’ आदि।
बरसाने लाल चतुर्वेदी कृत ‘मिस्टर चोखेलाल’ संग्रह में 39 निबंध हैं जिनमें हास्य और व्यंग्य का पुट है। इन निबंधों में जीवन के सामान्य क्रियाकलापों की उन घटनाओं के द्वारा हास्य की सृष्टि की गई है जो नित्य प्रति हमें प्रभावित करती रहती है।
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी निबंध में अज्ञेय और निर्मल वर्मा का महत्वपूर्ण योगदान हैं। अज्ञेय और निर्मल के चिंतन की दिशा लगभग एक ही रही है। समाज, व्यक्ति, परंपरा, काल, औपनिवेशिकता आदि ऐसे बिंदु हैं जिसे दोनों रचनाकारों ने समान रूप से उठाया है। कला, साहित्य और संस्कृति के आंतरिक रिश्तों की पहचान के साथ आधुनिक युग के संकट के संदर्भ में उनका मूल्यांकन दोनों रचनाकारों के प्रिय विषय रहे हैं। दोनों रचनाकारों की शैली में अंतर है। अज्ञेय के निबंध के गद्य विचारात्मक उत्कृष्टता के प्रामाणिक दस्तावेज हैं। निर्मल के निबंध में लयात्मकता है। उनके विचार लयात्मक चिंतन में ढले हुए प्रतीत होते हैं। ‘त्रिशंकु’, ‘आत्मनेपद’, ‘सर्जना और संदर्भ’, ‘आलवाल’, ‘संवत्सर’, आदि अज्ञेय के प्रतिनिधि निबंध संग्रह हैं। ‘कला का जोखिम’, ‘हर वारिस में’, ‘शब्द और स्मृति’, ‘भारत और योरोप प्रतिश्रुति के क्षेत्र’ आदि निर्मल की मुख्य निबंध कृतियाँ हैं।
शुक्लोत्तर युग में साहित्यिक, भावपूर्ण एवं विचारपूर्ण निबंध लिखने वाले लेखकों में कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, शिव प्रसाद सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय आदि प्रमुख हैं।
हिंदी आलोचना - हिंदी आलोचना का उद्भव और विकास। समकालीन हिंदी आलोचना एवं उसके विविध प्रकार। प्रमुख आलोचक।
हिंदी आलोचना का विकास
हिंदी आलोचना का प्रारंभ भी गद्य की अन्य विधाओं के साथ ही साथ भारतेंदु युग यानी आधुनिक युग से हुआ है। गद्य का विकास भी आधुनिक आलोचना के उद्भव और विकास का सहायक कारण बना। आलोचना के विकास में पाश्चात्य साहित्य और बौद्धिक जागृति प्रधान कारण थे। आलोचना के प्रारंभिक काल में निंदा-स्तुति की अधिकता रही। भारतेंदु काल की आलोचना में भी यही हुआ। इस युग के बाद पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रयत्नों से हिंदी आलोचना का स्वरूप कुछ और अधिक व्यवस्थित और सुनियोजित हुआ। हिंदी आलोचना में विश्लेषण और मूल्यांकन की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी आलोचना को शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया। इसलिए हिंदी आलोचना के विकास के केंद्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को मानते हुए उसे तीन युगों में बाँट सकते हैं -
1) शुक्ल पूर्व हिंदी आलोचना (1850 से 1920 ई.)
2) शुक्ल युगीन हिंदी आलोचना (1920 से 1940 ई.)
3) शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना (1940 से आज तक)
शुक्ल पूर्व हिंदी आलोचना
हिंदी आलोचना की विधिवत् शुरूआत भारतेंदु युग से हुई थी। किंतु इससे पहले भी भक्ति और रीति युग में आलोचना के क्षेत्र में अनेक प्रयास दिखायी पड़ते हैं। अतः शुक्ल पूर्व हिंदी आलोचना के विकास को दरअसल तीन युगों के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा-
भारतेंदु पूर्व हिंदी आलोचना
भारतेंदु युगीन हिंदी आलोचना
द्विवेदी युगीन हिंदी आलोचना
भारतेंदु पूर्व हिंदी आलोचना
भारतेंदु से पूर्व भक्ति और रीति युग में आलोचना के क्षेत्र में प्रयास हुए हैं। इस काल में भक्तों के जीवन, विचार, भक्ति से परिचित कराने वाले ग्रंथ लिखे जाने लगे थे जिन्हें ‘वार्ता-साहित्य के नाम से जाना जाता है। भक्त कवियों की कविता के संबंध में भी कहीं-कहीं विचार हुआ है। काव्य के वर्ण्य विषय और शैली संबंधी विशेषताओं के अतिरिक्त काव्य के जन-साधारण पर पड़ने वाले प्रभाव का भी उल्लेख हुआ है किंतु इनमें प्रशंसात्मक दृष्टिकोण ही अपनाया गया है।
रीतिकाल में मौलिक विचारों की प्रवृत्ति तो है किंतु गूढ़ चिंतन और विषय के शास्त्रीय एवं यथार्थ ज्ञान का अभाव है। इसका कारण यही हो सकता है कि उस काल में गद्य रचना की पुष्ट परंपरा नहीं थी। रीतिकाल का कवि पहले काव्य के अंगों का लक्षण देता था और बाद में स्वरचित कविताओं को उदाहरण स्वरूप रख देता था। इस युग में संस्कृत समीक्षा शास्त्र की कई शैलियों का अनुकरण किया गया। अनेक कवियों का काव्य शास्त्रीय विवेचन आचार्यत्व की कोटि तक पहुँच गया। ऐसे कवियों में प्रमुख हैं आचार्य केशवदास, चिंतामणि, कृपाराम, पद्माकर भिखारीदास, देव, घनानंद, मतिराम, बिहारी आदि। इनमें आलोचना की दो विशिष्ट धाराओं को देखा जा सकता है -
• अलंकारवादी
• रसवादी
अलंकारवादी धारा के प्रवर्त्तक केशवदास हैं तो रसवादी धारा के प्रवर्त्तक देव, मतिराम और बिहारी।
भारतेंदु युगीन हिंदी आलोचना
जुलाई-अगस्त सन् 1898 ई. में ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका में एक उपन्यास की आलोचना हिन्दू-मुस्लिम समस्या को लेकर की गई है जिसमें जातियों के पारस्परिक मेल का समर्थन किया गया है।
भारतेंदु युग में अधिकांश आलोचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ही विकसित होती रहीं। ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’, ‘भारत मित्र ‘सार सुधा निधि ‘ब्राह्मण’ आदि पत्रिकाओं में विविध विषयों पर लिखित लेख और टिप्पणियों से आलोचना दृष्टि का विकास हुआ।
डॉ. नगेंद्र के अनुसार इस युग में तीन प्रकार की आलोचनाओं की प्रधानता रही
1) रीतिकालीन लक्षण ग्रंथों की परंपरा की सैद्धान्तिक आलोचना।
2) ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली-गद्य में लिखी गई टीकाओं के रूप में प्रचलित आलोचना।
3) इतिहास ग्रंथों तथा कवि-परिचय के रूप में लिखी गई आलोचना।
पहले वर्ग के अंतर्गत पिंगल, अलंकार, रस, सम्पूर्ण काव्यशास्त्र पर लक्षण ग्रंथों की रचना की गई। उदाहरण के लिए जगन्नाथ प्रसाद भानु कृत ‘छंद प्रभाकर’ (1894 ई.) और जगन्नाथ् दास रत्नाकर रचित ‘घनाक्षरी-नियम रत्नाकर (1897 ई.) इस युग में रचित उल्लेखनीय पिंगल ग्रंथ हैं। कुछ महत्वपूर्ण अलंकार ग्रंथ हैं लछिराम कृत ‘रावणेश्वर कल्पतरु (1892 ई.) और बिहारी लाल रचित ‘अलंकारादर्श’ (1897 ई.)। रस ग्रंथों में साहब प्रसाद सिंह रचित ‘रस रहस्य (1887 ई.) और प्रतापनारायण सिंह का ‘रस कुसुमाकर (1894 ई.) उल्लेखनीय हैं। इसमें लक्षण खड़ी बोली गद्य में दिए गए हैं। सम्पूर्ण काव्यशास्त्र को ध्यान में रखकर लिखा गया जानकी प्रसाद का ग्रंथ ‘काव्य सुधाकर’ (1886 ई.) उल्लेखनीय है।
द्वितीय वर्ग की आलोचनाओं में टीकाएँ हैं, जिनमें कुछ प्रमुख हैं ‘बिहारी सतसई’ पर की गई लल्लू लाल जी की टीका ‘लाल चंद्रिका (1819 ई.) जो ब्रजभाषा प्रभावित खड़ी बोली गद्य में है तथा ‘बिहारी सतसई पर ही प्रभुदयाल पांडेय ने भी 1896 ई. में खड़ी बोली गद्य में एक अच्छी टीका लिखी थी।
तृतीय वर्ग के अंतर्गत दो इतिहास ग्रंथ इस काल में लिखे गए शिव सिंह सेंगर रचित ‘शिवसिंह सरोज (1878 ई.) और जार्ज ग्रियर्सन लिखित ‘द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ नार्दन हिंदुस्तान (1889 ई.) इन इतिहास ग्रंथों में दिए गए कवि परिचयों में आलोचना के तत्व नहीं के बराबर हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन आचार्यों और कवियों के आलोचनात्मक परिचय ‘हिंदी प्रदीप’ पत्रिका में प्रकाशित होते रहे।
दरअसल भारतेंदु युग में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित पुस्तक समीक्षाओं में ही आधुनिक आलोचना का रूप दिखाई पड़ता है। ‘आनंद कादंबिनी पत्रिका की ‘संयोगिता स्वयंवर’ और ‘बंग विजेता’ तथा ‘हिंदी प्रदीप’ पत्रिका की ‘सच्ची समालोचना’ इस शैली के प्रौढ़ उदाहरण हैं।
भारतेंदु युग के मुख्य आलोचक हैं -भारतेंदु, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन और बालकृष्ण भट्ट।
भारतेंदु हरिश्चंद्र: भारतेंदु हरिश्चंद्र को अन्य गद्य विधाओं के साथ ही आलोचना की विधिवत शुरूआत का श्रेय भी दिया जाता है। उन्होंने नाट्यशास्त्र संबंधी महत्वपूर्ण कृति ‘नाटक’ (1883 ई.) की रचना कर आधुनिक हिंदी आलोचना का प्रारंभ किया। इस निबंध में लगभग साठ पृष्ठों में नाटक का शास्त्रीय विवेचन और इतिहास प्रस्तुत किया गया है। यह निबंध यद्यपि संस्कृत नाट्यशास्त्र को आधार बनाकर लिखा गया है किंतु इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्राचीन नाट्य शास्त्र की जानकारी दी गई है। साथ ही युग प्रवृत्ति का ध्यान रखकर प्राचीन जटिल शास्त्रीय नियमों से छूट लेने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है-
बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
भारतेंदु मंडल के लेखकों में बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने श्रीनिवासदास रचित संयोगिता स्वयंवर नाटक और गदाधर सिंह लिखित ‘बंग विजेता’ उपन्यास के हिंदी अनुवादों की विस्तृत आलोचना ‘आनंद कादम्बिनी पत्रिका में की थी। इसी से व्यावहारिक हिंदी आलोचना का सूत्रपात माना जाता है।
बालकृष्ण भट्ट
उन्होंने ‘नीलदेवी ‘परीक्षा गुरु ‘संयोगिता स्वयंवर’ तथा ‘एकांतवासी आदि कृतियों पर जो व्यावहारिक आलोचनाएँ लिखी हैं वे उल्लेखनीय हैं। भट्ट जी कवि के परिचय में तो तटस्थ, गंभीर और विश्लेषणात्मक हैं लेकिन पुस्तकों की आलोचना में कहीं-कहीं मीठी चुटकियाँ भी ले लेते हैं। उनकी शैली व्यंग्य-प्रधान है।
नई समीक्षा के भावी विकास का पूर्वाभास भारतेंदु काल में मिलने लगा था। आगे द्विवेदी युग में हिंदी आलोचना को नया और विस्तृत स्वरूप मिला।
द्विवेदी युगीन हिंदी आलोचना
पुस्तकीय समीक्षा से परे हिंदी आलोचना की कई महत्वपूर्ण पद्धतियाँ द्विवेदी युग में विकसित हुई। इस युग में ‘सरस्वती के अतिरिक्त ‘माधुरी’, ‘वीणा’, ‘विशाल भारत ‘, ‘साहित्य समालोचक’, ‘मर्यादा आदि पत्रिकाओं ने आलोचना के विकास में बहुत योग दिया। द्विवेदी युग में हिंदी आलोचना के पाँच रूप मिलते हैं-
1) शास्त्रीय आलोचना
2) तुलनात्मक आलोचना
3) अनुसंधानपरक आलोचना
4) परिचयात्मक आलोचना
5) व्याख्यात्मक आलोचना
प्रथम वर्ग की शास्त्रीय आलोचना में संस्कृत आचार्यों की पद्धति पर लक्षण-ग्रंथ लिखने की परंपरा है जो रीतिकाल से चली आ रही थी। इस प्रकार की आलोचनाओं में जगन्नाथ प्रसाद भानु कृत ‘काव्य प्रभाकर’ (1910 ई.) तथा ‘छंद सारावली (1917 ई.) और लाला भगवानदीन रचित ‘अलंकार मंजूषा (1916 ई.) महत्वपूर्ण हैं। जगन्नाथ प्रसाद ने अँग्रेज़ी में भूमिका लिखी है और हिंदी के पारिभाषिक शब्दों के अँग्रेज़ी पर्याय भी दिए हैं। लाला भगवानदीन ने हिंदी अलंकारों की समुचित जानकारी देने के साथ ही साथ फारसी, अरबी और अँग्रेज़ी अलंकारों का भी उल्लेख किया है।
तुलनात्मक आलोचना द्विवेदी युग की प्रमुख प्रवृत्ति कही जा सकती है। इस क्षेत्र में पं. पद्मसिंह शर्मा का नाम महत्वपूर्ण है। उन्होंने बिहारी और देव की तुलना द्वारा 1907 ई. में तुलनात्मक आलोचना का आरंभ किया। मिश्र बंधुओं (पं. गणेश बिहारी, श्याम बिहारी तथा शुक्रदेव बिहारी) द्वारा रचित ‘हिंदी नवरत्न’ (1910 ई.) में भी तुलनात्मक आलोचना को महत्व दिया गया। लाला भगवानदीन और कृष्णबिहारी मिश्र ने देव और बिहारी की विशद तुलना करते हुए एक को दूसरे से बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न किया।
अनुसंधानपरक आलोचना का विकास ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका (1897 ई.) के प्रकाशन से हुआ। शोधपरक आलोचना के उल्लेखनीय आलोचक हैं मिश्र बंधु, श्यामदास, जगन्नाथ दास रत्नाकर और सुधाकर द्विवेदी। मिश्र बंधु रचित ‘मिश्र बंधु-विनोद’ (1913 ई.) में कवियों के जीवन-वृत्तों के साथ उनकी कृतियों की जानकारी तथा उनके काव्य के संबंध में अपना मत प्रकट किया गया। आगे चलकर चंद्रघर शर्मा गुलेरी ने जयपुर से ‘समालोचक (1902 ई.) पत्र निकाला जो मुख्यतः आलोचना का पत्र था।
परिचयात्मक आलोचना में ‘सरस्वती’ के माध्यम से स्वयं महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखी गई आलोचनाएँ हैं। उन्होंने ‘समालोचना समुच्चय’ नाम से अलग से भी अपना एक निबंध संग्रह प्रकाशित किया जिसमें ज्ञान-विज्ञान तथा प्राचीन काव्य से संबंधित उनके कई महत्वपूर्ण लेख संग्रहीत हैं।
उनका आलोचनात्मक ग्रंथ ‘हिंदी कालीदास की आलोचना’ (1901 ई.) हिंदी में आलोचना-साहित्य की किसी कवि पर पूरी तरह विचार करने वाली पहली पुस्तक मानी जाती है।
व्याख्यात्मक आलोचना में आलोच्य विषय की उपयोगिता को ध्यान में रखा जाता है तथा नैतिक, समाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और सौंदर्यपरक मूल्यों के आधार पर विशद और गंभीर विवेचन किया जाता है। बालकृष्ण भट्ट ने ‘हिंदी प्रदीप’ में ‘नील देवी’, ‘परीक्षा गुरु’ और संयोगिता स्वयंवर की गंभीर आलोचना करके इस पद्धति को मजबूत किया। बालमुकुंद गुप्त ने ‘हिंदी बंगवासी’ में ‘अनुमती’ नामक बंगला नाटक के हिंदी अनुवाद (मुंशी उदित नारायण कृत) की आलोचना द्वारा इस परंपरा को आगे बढ़ाया। किंतु आलोचना की इस गंभीर शैली का पूर्ण विकास आगे चलकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया।
इस तरह द्विवेदी युग में आलोचना के दो प्रतिमान मुख्य रहे एक तो परंपरागत शास्त्रीय दृष्टि जिसके आधार पर आलोच्य कृति के गुण-दोषों का विवेचन किया जाता था और उसे उत्कृष्ट या हीन बताया जाता था। दूसरी नैतिक-सांस्कृतिक मूल्यों की दृष्टि जो आलोच्य कृति के प्रभाव को ध्यान में रखकर उसे श्रेष्ठ या हीन सिद्ध करती थी।
शुक्ल युगीन हिंदी आलोचना
शुक्ल युग से पूर्व दोष-दर्शन, गुणकथन, निर्णय और तुलना जैसे स्थूल तत्वों को प्रमुखता दी जाती थी पर आचार्य शुक्ल ने अपनी आलोचना में विश्लेषण (Analysis), विवेचन (Interpretation) और निगमन (Induction) जैसे तत्वों को प्रमुखता दी जिनमें आलोचक की तटस्थता का तत्व भी निहित था। कवि विशेष के सामान्य गुण-दोष प्रकट करने के साथ ही उसके काव्य की मूल प्रवृत्तियों और उसमें निहित शाश्वत तत्वों की छानबीन भी की गई।
इस युग में समीक्षा के लिए जो मानदंड और शैली अपनाई गई उनमें प्रमुख है :-
1. सुरुचि और नैतिकता
2. शास्त्रीयता
3. कवि के व्यक्तित्व का अध्ययन
4. तुलना और निर्णय
5. देशकाल की समीक्षा
शुक्ल युग के प्रमुख आलोचक हैं गुलाबराय, बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, लक्ष्मीनारायण ‘सुधांशु’, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, डॉ. रामकुमार वर्मा आदि।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल,
शुक्ल जी ने ‘कविता क्या है’, ‘साहित्य’, ‘काव्य में रहस्यवाद’ आदि निबंधों से सैद्धांतिक समीक्षा का सूत्रपात किया। ‘चिंतामणि’ में संकलित निबंधों से उनके व्यापक अध्ययन और गहरी मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय मिलता है।
शुक्ल जी ने हिंदी में पहली बार रस-विवेचन को मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया। रस मीमांसा में रस के शास्त्रीय विवेचन की मौलिक व्याख्या की। उन्होंने रस को काव्य की आत्मा तो माना, परन्तु रस की परंपरागत व्याख्या उन्हें मान्य न थी। उन्होंने अपने रसवाद में अनुभूति को सर्वोपरि महत्व देकर उसे लोक मानस से जोड़ा। वे अनुभूति प्रधान काव्य को ही उत्तम काव्य समझते थे।
निबंध की विवेचना में उन्होंने लिखा ‘यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है। भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबंधों में ही सबसे अधिक संभव होता है।’
आचार्य शुक्ल के प्रमुख ग्रंथ हैं ‘जायसी ग्रंथावली (1925 ई.), भ्रमरगीतसार (1926 ई.), ‘गोस्वामी तुलसीदास (1933 ई.), ‘हिंदी साहित्य का इतिहास (1929 ई.)।
बाबू श्याम सुंदरदास : बाबू श्याम सुंदरदास ने सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों क्षेत्रों में कार्य किया। ‘साहित्यालोचन’ ग्रंथ की रचना उन्होंने एम.ए. के विद्यार्थियों को विषय की अधिकाधिक जानकारी देने के लिए की। उन्होंने रस और अलंकार के साथ-साथ उपन्यास, कहानी, निबंध, आलोचना आदि नवीन विधाओं का भी विवेचन किया। नाटक पर उन्होंने ‘रूपक रहस्य’ की रचना की।
‘कबीर ग्रंथावली की भूमिका ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ तथा ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र’, उनकी व्यावहारिक आलोचना के प्रतिनिधि ग्रंथ हैं।। ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका में तो उनके लेख बराबर ही प्रकाशित होते रहे। प्राचीन पुस्तकों के शोध कार्य का विवरण भी इसी पत्रिका के माध्यम से देते रहे जो कम महत्व नहीं रखता।
गुलाबरायः गुलाबराय ने ‘साहित्य संदेश’ नामक आलोचनात्मक पत्रिका का संपादन करके हिंदी आलोचना के प्रचार-प्रसार में काफ़ी योग दिया। उन्होंने दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार पर काव्य सिद्धांतों की परख ‘जीवन के तत्व और काव्य के सिद्धांत’ (1942 ई.) ग्रंथ में की।
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र - मिश्र जी का मध्ययुगीन काव्य की साफ़-सुथरी टीकाओं के लिए तत्कालीन आलोचना में महत्वपूर्ण स्थान है। ‘वाङ् मय विमर्श’, ‘बिहारी की वाग्विभूति’, ‘हिंदी साहित्य का अतीत’ और ‘हिंदी का सामयिक साहित्य’ ग्रंथों की रचना द्वारा मिश्र जी ने सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया।
तीसरे दशक की आलोचना के विकास में छायावादी कवियों का भी उल्लेखनीय योगदान है। छायावादी काव्य पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लगाए गए आरोपों के जवाब में छायावादी कवियों ने अपनी कविता के बचाव में जो आलोचनाएँ लिखीं, उनका बड़ा महत्व है। उन्होंने आलोचना को नई दिशा देने के लिए प्राचीन शास्त्रवादी साहित्यिक मूल्यों का विरोध तो किया ही, नए मूल्यों के प्रश्न भी खड़े किए।
सबसे पहले सुमित्रानंदन पंत ने ‘पल्लव (1927 ई.) और ‘वीणा’ (1929) की भूमिकाओं में रीतिकाल से द्विवेदी युग तक की कविता की कमियाँ बताते हुए छायावादी कविताओं की वकालत की।
जयशंकर प्रसाद ने 1936 ई. में ‘हंस’ के अनेक अंकों में काव्य की आलोचना विषयक निबंध लिखे जिसका संकलन बाद में ‘काव्य और कला तथा अन्य निबंध’ (1939 ई.) शीर्षक से हुआ। प्रसाद ने छायावाद की आलोचना से संबंधित तीन काम किए-छायावाद को भारतीय चिंतन परंपरा से विकसित माना, छायावाद को मात्र शैली चमत्कार न मानकर उसका संबंध अनुभूति से जोड़ा तथा छायावादी कविता के सौंदर्य में निहित शिवत्व के दर्शन कराए।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने ‘पंत और पल्लव (1927 ई.) शीर्षक निबंध माला की कविताओं का सूक्ष्म विश्लेषण किया। ‘परिमल की भूमिका (1930 ई.) में निराला ने मुक्त छंद के विवेचन द्वारा हिंदी में एक नए छंद शास्त्र की स्थापना की।
का समन्वय नहीं कर सके। ‘साहित्यालोचन ग्रंथ की रचना उन्होंने एम.ए. के विद्यार्थियों को विषय की अधिकाधिक जानकारी देने के लिए की। इस ग्रंथ में उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य सिद्धांतों का समन्वय करके साहित्य समीक्षा को उदार बनाया। बाबूजी का सिद्धांत प्रतिपादन शास्त्रीय एवं तर्क संगत है। उन्होंने कवियों की प्रामाणिक जीवनी अद्वितीय ढंग से प्रस्तुत की। उन्होंने रस और अलंकार के साथ-साथ उपन्यास, कहानी, निबंध, आलोचना आदि नवीन विधाओं का भी विवेचन किया। नाटक पर उन्होंने ‘रूपक रहस्य की रचना की।
‘कबीर ग्रंथावली की भूमिका ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ तथा ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र’, उनकी व्यावहारिक आलोचना के प्रतिनिधि ग्रंथ हैं। इनके अतिरिक्त बाबूजी ने पत्र पत्रिकाओं में बहुत से आलोचनात्मक लेख भी लिखे। ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका में तो उनके लेख बराबर ही प्रकाशित होते रहे। प्राचीन पुस्तकों के शोध कार्य का विवरण भी इसी पत्रिका के माध्यम से देते रहे जो कम महत्व नहीं रखता। इस प्रकार बाबूजी ने हिंदी के आलोचना शास्त्र को स्वतंत्र रूप से विकसित करने का प्रयत्न किया और इस दिशा में कार्य करने के लिए अध्यापकों और शोधार्थियों को प्रोत्साहित किया।
गुलाबरायः गुलाबराय ने ‘साहित्य संदेश नामक आलोचनात्मक पत्रिका का संपादन करके हिंदी आलोचना के प्रचार-प्रसार में काफ़ी योग दिया। उन्होंने दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार पर काव्य सिद्धांतों की परख ‘जीवन के तत्व और काव्य के सिद्धांत’ (1942 ई.) ग्रंथ में की।
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र मिश्र जी का मध्ययुगीन काव्य की साफ़-सुथरी टीकाओं के लिए तत्कालीन आलोचना में महत्वपूर्ण स्थान है। ‘वाङ् मय विमर्श’, ‘बिहारी की वाग्विभूति’, ‘हिंदी साहित्य का अतीत’ और ‘हिंदी का सामयिक साहित्य’ ग्रंथों की रचना द्वारा मिश्र जी ने सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया।
तीसरे दशक की आलोचना के विकास में छायावादी कवियों का भी उल्लेखनीय योगदान है। छायावादी काव्य पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लगाए गए आरोपों के जवाब में छायावादी कवियों ने अपनी कविता के बचाव में जो आलोचनाएँ लिखीं, उनका बड़ा महत्व है। उन्होंने आलोचना को नई दिशा देने के लिए प्राचीन शास्त्रवादी साहित्यिक मूल्यों का विरोध तो किया ही, नए मूल्यों के प्रश्न भी खड़े किए।
सबसे पहले सुमित्रानंदन पंत ने ‘पल्लव (1927 ई.) और ‘वीणा’ (1929) की भूमिकाओं में रीतिकाल से द्विवेदी युग तक की कविता की कमियाँ बताते हुए छायावादी कविताओं की वकालत की। जयशंकर प्रसाद ने 1936 ई. में ‘हंस’ के अनेक अंकों में काव्य की आलोचना विषयक निबंध लिखे जिसका संकलन बाद में ‘काव्य और कला तथा अन्य निबंध’ (1939 ई.) शीर्षक से हुआ। इन निबंधों में उन्होंने काव्य और कला, रहस्यवाद, नाटकों में रस का स्थान, रंगमंच, यथार्थवाद, छायावाद आदि के संबंध में अपने विचार प्रकट किए। प्रसाद ने छायावाद की आलोचना से संबंधित तीन काम किए-छायावाद को भारतीय चिंतन परंपरा से विकसित माना, छायावाद को मात्र शैली चमत्कार न मानकर उसका संबंध अनुभूति, चमत्कार से जोड़ा तथा छायावादी कविता के सौंदर्य में निहित शिवत्व के दर्शन कराए।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने ‘पंत और पल्लव (1927 ई.) शीर्षक निबंध माला की कविताओं का सूक्ष्म विश्लेषण किया। ‘परिमल की भूमिका (1930 ई.) में निराला ने मुक्त छंद के विवेचन द्वारा हिंदी में एक नए छंद शास्त्र की स्थापना की।
महादेवी ने भी ‘सांध्यगीत’ (1936 ई.) की भूमिका में छायावाद और रहस्यवाद की व्याख्या का प्रयत्न किया। ‘साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध’ उनके स्फुट लेखों का संग्रह है।
शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना
शुक्लोत्तर युग में आलोचना अनेक धाराओं में विकसित हुई:-
स्वच्छंदतावादी समीक्षा
ऐतिहासिक समीक्षा
मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा
मार्क्सवादी आलोचना
कुछ अन्य विशिष्ट आलोचक
स्वच्छंदतावादी समीक्षा
छायावाद के साहित्यिक विश्लेषण के लिए स्वच्छंदतावादी एवं सौष्ठववादी समीक्षा पद्धति की शुरूआत हुई। अँग्रेज़ी की रोमांटिक कविता तथा रोमांटिक क्रिटिसिज्म के अध्ययन का भी इस पर प्रभाव पड़ा। स्वच्छंदतावादी आलोचकों ने प्राचीन सिद्धांतों से अलग हट कर काव्य में सूक्ष्म-सौंदर्य और सौष्ठव देखने का प्रयत्न किया। आलोचकों ने उपादेयता के आधार पर साहित्य का मूल्यांकन न कर आनंद को प्रधानता दी। इस समीक्षा में जीवन के प्रति एक ऐसा भावमय दृष्टिकोण है जो अनुभूति को केंद्र में रखकर विकसित होता है। स्वच्छंदतावादी समीक्षा पद्धति के प्रतिनिधि आलोचक हैं पं. नंददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेंद्र और पं. शांतिप्रिय द्विवेदी।
पं. नंददुलारे वाजपेयीः पं. नंददुलारे वाजपेयी छायावाद के समर्थ आलोचक और स्वच्छंदतावादी समीक्षा पद्धति के प्रतिनिधि समालोचक रहे। वाजपेयी ने द्विवेदी काल के उत्तरार्द्ध में आलोचना क्षेत्र में प्रवेश किया था। तब ‘सरस्वती’ आदि पत्रिकाओं के माध्यम से उनकी आलोचनाएँ प्रकाशित होती रहती थीं। डॉ. भगवत स्वरूप मिश्र ने वाजपेयी जी की आलोचना की दो प्रधान विशेषताएँ बताई हैं कलाकार की अन्र्त्तवृत्तियों का अध्ययन तथा कलाकृति के सौष्ठव का अनुभूतिपूर्ण विश्लेषण। वाजपेयी जी को छायावादी, प्रगतिवादी प्रयोगवादी रचनाओं की गंभीर और विस्तृत समीक्षा का श्रेय जाता है।
वाजपेयी जी के प्रधान आलोचना ग्रंथ हैं ‘हिंदी साहित्यः बीसवीं शताब्दी’, ‘जयशंकर प्रसाद’, ‘सूर संदर्भ की भूमिका’, ‘आधुनिक साहित्य’, ‘महाकवि सूरदास’, और ‘नया साहित्य नए प्रश्न ‘।
डॉ. नगेंद्र
डॉ. नगेंद्र भी स्वच्छंदतावादी एवं सौष्ठववादी समीक्षा पद्धति के आलोचक हैं। उन्होंने समीक्षा का आरंभ छायावाद पर स्फुट निबंध से किया। ‘हंस’ (1937 ई.) में उनका पहला निबंध जो सुमित्रानंदन पंत पर था, प्रकाशित हुआ। छायावादी काव्य की अंतर्मुखी साधना, सौंदर्य चेतना और कलात्मकता के प्रति उनका विशेष आकर्षण था। ‘सुमित्रानंदन पंत’ (1938 ई.) पुस्तक में पंत जी की कविताओं में मनोदशाओं का उन्होंने सुंदर चित्रण किया है। धीरे-धीरे वे व्यावहारिक आलोचना से सैद्धांतिक आलोचना की ओर आकृष्ट हुए। ‘रीतिकाव्य की भूमिका तथा ‘देव और उनकी कविता’ (1946 ई.) से इसका स्पष्ट आभास मिलता है। अपनी व्यावहारिक आलोचनाओं के लिए उन्होंने विविध विषय चुने हैं- काव्य, उपन्यास, नाटक, रेखाचित्र आदि। उन्होंने मध्ययुग से आधुनिक युग तक के कृतिकारों की समीक्षा की है। किंतु वे मुख्य रूप से आधुनिक काव्य के आलोचक हैं। उनके कुछ निबंधों में फ्रायडीय प्रभाव की झलक मिलती हैं। इसलिए उन्होंने मनोविश्लेषणात्मक व्याख्याएँ की हैं। किंतु डॉ. नगेंद्र मूलतः रसवादी आलोचक हैं। ‘रस सिद्धांत’ (1964 ई.) में उन्होंने रस का पूरा विवेचन कर उसकी पुनः प्रतिष्ठा का प्रयास किया है। साहित्य को वे आत्माभिव्यक्ति मानते हैं इसलिए अनुभूति तत्व को विशेष मान्यता देते हैं।
डॉ. नगेंद्र आधुनिक साहित्य और समसामयिक आंदोलनों से भी जुड़े रहे। जहाँ उन्होंने ‘कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ (1962 ई.) ग्रंथ लिखा वहीं वे समय-समय पर नई कविता, उपन्यासों और कहानियों की भी आलोचना करते रहे हैं। ‘नई आलोचनाः नए संदर्भ (1970 ई.) में मूल्यों का विघटन, सांस्कृतिक संकट, आधुनिकता का प्रश्न आदि पर भी उन्होंने विचार व्यक्त किए हैं। पाश्चात्य काव्य शास्त्र के नए सिद्धांतों की जानकारी देने के लिए उन्होंने ‘काव्य बिंब’ (1967 ई.) की रचना की। डॉ. नगेंद्र ने हिंदी आलोचना में दो कार्य किए-एक तो भारत और पश्चिम के आलोचना शास्त्र की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया। यहाँ तक कि अनुवादों के माध्यम से सामग्री सुलभ कराई। दूसरे छायावाद के शिल्प पक्ष की सूक्ष्मताओं को उजागर किया।
पं. शांतिप्रिय द्विवेदी
द्विवेदी जी ने मुख्यतः छायावादी साहित्य पर ही विचार किया है। वे छायावाद पर ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करने वाले समीक्षक थे। वे काव्य से जीवन की प्रेरणा प्राप्ति को महत्व देते हैं। उन्होंने इस ओर संवेदनीयता को काव्य के उद्देश्य में स्थान दिया है। द्विवेदी जी ने छायावादी काव्य के विकास में गांधीवाद और प्रथम विश्व युद्ध की परिस्थितियों को सहायक माना है। ‘हमारे साहित्य निर्माता’ (1932 ई.) ‘कवि और काव्य (1937 ई.) तथा ‘साहित्यिकी’ (1938 ई.) उनके प्रमुख ग्रंथ हैं।
द्विवदी जी ने ‘इतिहास के आलोक’ निबंध में वर्तमान कविता के क्रम विकास का तथा ‘छायावाद और उसके बाद’ निबंध में साहित्य के विकास का अध्ययन किया है जिसमें उनके वैयक्तिक चिंतन की झलक है।
ऐतिहासिक समीक्षा
ऐतिहासिक समीक्षक युग-चेतना के प्रभावों के साथ ही यह भी अध्ययन करता है कि किस रचना ने समाज के साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास में कितना योगदान किया है।
ऐतिहासिक समीक्षा के समाजशास्त्रीय रूप का विकास परवर्ती काल में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा ही हुआ।
हजारी प्रसाद द्विवेदी
‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ (1940 ई.) में उन्होंने आलोचना की ऐतिहासिक पद्धति की प्रतिष्ठा करते हुए बताया कि किसी रचनाकार का स्थान निर्धारण उसके सामाजिक, सांस्कृतिक एवं जातीय पृष्ठभूमि के आधार पर करना चाहिए। अर्थात् किसी रचना के अध्ययन के लिए रचनाकार का अध्ययन और रचनाकार के लिए उसके जीवन परिवेश और परंपरा का अध्ययन आवश्यक है। द्विवेदी जी की पहली पुस्तक ‘सूर साहित्य’ (1936 ई.) में छायावादी भावुकता की प्रधानता थी किंतु ‘कबीर (1942 ई.) में उनका प्रायोगिक (व्यावहारिक) दृष्टिकोण स्पष्ट हुआ। उन्होंने कबीर को सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और साहित्यिक परंपरा के व्यापक परिप्रेक्ष्य मे देखा। कबीर के भाषागत वैशिष्ट्य पर भी सबसे पहले उन्हीं की दृष्टि गई।
द्विवेदी जी मानव को जीवन के सभी प्रयत्नों का लक्ष्य मानते थे। ‘अशोक के फूल’ निबंध संग्रह में संकलित उनके एक निबंध का शीर्षक है ‘मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है। ‘हिंदी साहित्य’ (1952 ई.) में तथा अन्य स्थानों पर भी उन्होंने सूर, तुलसी आदि का मूल्यांकन मानवतावादी दृष्टि से किया। प्रेमचंद का आकलन भी इसी दृष्टि से हुआ। मनुष्यता को उन्होंने साहित्य और रस का पर्याय माना।
उनकी सैद्धांतिक मान्यताएँ ‘साहित्य का मर्म’ में सामने आईं।
मार्क्सवादी समीक्षा
सन् 1936 ई. में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता करते हुए प्रेमचंद ने साहित्य के युगानुकूल नए उद्देश्य स्पष्ट किए। इस प्रकार हिंदी में प्रगतिशीलता का एक नया दौर शुरू हुआ और उसके अनुसार आलोचना के क्षेत्र में भी नई मान्यताएँ प्रकट होने लगीं।
इस अवधि के साहित्य पर कार्ल मार्क्स की विचारधारा का प्रमुख प्रभाव रहा। मार्क्स के जीवनदर्शन के अनुसार संसार की सभी वस्तुओं में विरोधी तत्वों का संघर्ष होता रहता है। उस संघर्ष के फलस्वरूप विभिन्न पदार्थों, उनकी शक्तियों और अस्तित्वों का लगातार विकास होता रहता है। इसी को मार्क्स के ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद से भी जाना जाता है।
मार्क्सवादी विचारधारा के मानने वाले साहित्यकारों ने कला को जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए शोषित और पीड़ित मानव को अपने साहित्य का आलम्बन बनाया।
प्रगतिशील साहित्यकार पूँजीवादी संस्कृति के विरोध और जनवादी संस्कृति के निर्माण की कामना लेकर आगे बढ़े।
सामाजिक यथार्थवाद और मानवतावाद के आदर्श को लेकर चलने वाले इस प्रगतिशील साहित्य में भावों की अभिव्यक्ति के लिए अलंकार गौण हो गए जिससे प्रगतिवादी काव्य सरल हुआ। नए-नए सरल छंद इसकी विशेषता बन गए।
मार्क्सवादी आलोचकों में शिवदान सिंह चौहान, प्रकाशचंद्र गुप्त और डॉ. रामविलास शर्मा अग्रणी हैं।
शिवदान सिंह चौहानः शिवदान सिंह चौहान ने मार्च 1937 ई. के ‘विशाल भारत’ में सबसे पहले ‘भारत में प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता’ शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमें प्रगतिशील साहित्य के सिद्धांतों को सूत्रबद्ध किया। उनके अनुसार प्रगतिशील शक्ति वह है जो न केवल संसार को स्पष्ट करती है बल्कि उसे परिवर्तित करने में भी बराबर लगी रहती है। ‘आलोचना के सिद्धांत’ और ‘हिंदी साहित्य के अस्सी वर्ष’ इनकी मुख्य रचनाएँ हैं।
चौहानजी ‘हंस’ और ‘आलोचना’ पत्रिकाओं के संपादक रहे। उनके आरंभिक निबंध ‘प्रगतिवाद (1946 ई.) में संकलित हैं। उनके आलोचनात्मक निबंधों के तीन संकलन ‘साहित्य की परख’ (1947ई.), ‘साहित्यानुशीलन’, तथा ‘आलोचना के मान’ (1958 ई.) प्रमुख है जिनमें पुस्तक समीक्षाएँ और सैद्धांतिक निबंध भी हैं।
प्रकाशचंद्र गुप्तः प्रकाशचंद्र गुप्त ने मार्क्सवादी सिद्धांतों के विवेचन के साथ हिंदी साहित्य की पुरानी परंपरा और समसामयिक साहित्य का सहानुभूतिपूर्ण अध्ययन किया। उनकी आलोचना सुबोधता, सरलता और शालीनता के गुणों से युक्त है। उनके तीन प्रमुख निबंध संकलन हैं ‘आधुनिक हिंदी साहित्यः एक दृष्टि (1952 ई.), ‘हिंदी साहित्य की जनवादी परंपरा (1953 ई.) और ‘साहित्यधारा (1956 ई.)।
डॉ. रामविलास शर्मा
डॉ. रामविलास शर्मा ने छायावादी काव्य और उसमें विशेषकर निराला के साहित्य की व्याख्या से आलोचना कार्य आरंभ किया। रामचंद्र शुक्ल और प्रेमचंद पर भी किया गया उनका आलोचना कार्य महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना’, ‘प्रेमचंद और उनका युग’, ‘निराला की साहित्य साधना’ तथा ‘हिंदी आलोचना की उपलब्धियाँ’ है। रामविलास शर्मा ने मार्क्सवादी साहित्य-सिद्धांतों का कोरा सैद्धांतिक प्रतिपादन ही नहीं किया वरन् मार्क्सवादी दृष्टि से समूचे हिंदी साहित्य की परंपरा की नई व्याख्या प्रस्तुत की। इतना ही नहीं उन्होंने बाल्मीकि, कालिदास और भवभूति के साहित्य का भी विश्लेषण किया। ‘आदिकाव्य’, ‘साहित्य के स्थायी मूल्यों की समस्याः कालिदास’, तथा ‘भवभूति की करुणा उनकी उल्लेखनीय आलोचनाएँ हैं।उन्होंने मार्क्सवादी आलोचना के लिए देशज जमीन तैयार की।
गजानन माधव मुक्तिबोध
मुक्तिबोध ने सैद्धांतिक आलोचना में अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया। आचार्य शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना को सर्वाधिक ‘पद’ और शब्द मुक्तिबोध ने दिए हैं। मुक्तिबोध ने व्यावहारिक आलोचना के क्षेत्र में भी पर्याप्त कार्य किया है। ‘कामायनी एक पुनर्विचार में उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टि से कामायनी का विश्लेषण किया है।
नई कविता के मूल्यांकन को लेकर वे पुराने प्रगतिवादी आलोचकों से अलग थे। उन्होंने आधुनिक लेखक की रचना-प्रक्रिया की जटिलता का विश्लेषण किया है। यह हिंदी आलोचना को मुक्तिबोध की मुख्य देन है। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ (1964 ई.) ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध’ (1964 ई.) और ‘नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ (1971 ई.) उनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।
डॉ. नामवर सिंह
डॉ. नामवर सिंह की आलोचना समाजवादी जीवन दृष्टि और नई कविता के भाव बोध को लेकर चली है। इसीलिए उन्हें प्रगतिवादी आलोचकों में भी गिना जाता है और नए आलोचकों में भी। उन्होंने नई कविता को सहानुभूति से परखा है।
नामवर सिंह की पुस्तक ‘छायावाद’ (1954 ई.) में छायावादी कविता के छाया-चित्रों में निहित सामाजिक सत्य का उद्घाटन किया गया है।
डॉ. नामवर सिंह ने ‘कविता के नए-प्रतिमान’ (1968 ई.) में नई कविता के संदर्भ में काव्य-मूल्यों का प्रश्न उठाया है। काव्य-समीक्षा से हटकर साहित्यिक मूल्यों को स्पष्ट करने का प्रयास उन्होंने अपनी पुस्तक ‘इतिहास और आलोचना’ में संकलित निबंधों में किया है। इसके अतिरिक्त ‘इतिहास का नया दृष्टिकोण (1952 ई.) और ‘हिंदी साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार (1962 ई.) नामक निबंधों में मार्क्सवादी दृष्टिकोण से हिंदी साहित्य के इतिहास की पुनर्व्याख्या की गई है। इन निबंधों के माध्यम से उन्होंने मूल्यांकनपरक आलोचना और साहित्यिक इतिहास के बीच संबंध स्थापित किया है।
नामवर सिंह ने कथा-समीक्षा के स्तर को भी काव्य-समीक्षा के स्तर तक उठाया। इस दृष्टि से उनकी पुस्तक ‘कहानी-नई कहानी (1964 ई.) महत्वपूर्ण है।
मनोविश्लेषणात्मक
मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा के सिद्धांत के अनुसार काव्य-सृजन कवि के सामाजिक दायित्व का परिणाम नहीं वरन् उसकी प्रवृत्तियों द्वारा प्रेरित है। काव्य के पात्र, वर्ण्य-विषय, शैली आदि सभी वस्तुओं पर दमित इच्छाएँ अथवा प्रभुत्व की कामना और जीवित रहने की इच्छा की अभिव्यक्ति ही कला-कृति के स्वरूप का निर्धारण करती है। इस तरह मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा में कलाकार के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति को प्रमुखता दी गई। अतः रचना को ठीक-ठीक समझने के लिए रचनाकार के व्यक्तित्व को समझना आवश्यक समझा गया।
पश्चिमी आलोचक फ्रायड, एडलर और युंग ने साहित्य प्रेरणा के तीन सिद्धांतों की चर्चा की काम-वासना (दमित इच्छाएँ), प्रभुत्व की कामना तथा जीवित रहने की इच्छा। इन सिद्धांतों ने हिंदी साहित्य को भी प्रभावित किया। हिंदी में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय और इलाचंद्र जोशी के उपन्यास इसी विचारधारा से प्रभावित हैं।
मनोविश्लेषणवादी समीक्षा के क्षेत्र में अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी और देवराज उपाध्याय के नाम उल्लेखनीय हैं।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
अज्ञेय ने विशेषतः एडलर (प्रभुत्व कामना) को अपनाया। इनका समन्वित रूप ही उन्होंने ग्रहण किया। उन्होंने अपने ‘त्रिशंकु’ नामक निबंध संग्रह में ‘प्रभुत्व कामना और ‘क्षतिपूर्ति के सिद्धांतों को स्पष्ट किया। अज्ञेय जी ने ‘त्रिशंकु’ के निबंध ‘कला का स्वभाव और उद्देश्य में लिखा है ‘हमारे कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध’ (1964 ई.) और ‘नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ (1971 ई.) उनकी उल्लेखनीय हैं।
डॉ. नामवर सिंह डॉ. नामवर सिंह की आलोचना समाजवादी जीवन दृष्टि और नई कविता के भाव बोध को लेकर चली है। इसीलिए उन्हें प्रगतिवादी आलोचकों में भी गिना जाता है और नए आलोचकों में भी। उन्होंने नई कविता को सहानुभूति से परखा है।
नामवर सिंह की पुस्तक ‘छायावाद’ (1954 ई.) में छायावादी कविता के छाया-चित्रों में निहित सामाजिक सत्य का उद्घाटन किया गया है। इस पुस्तक में कुल 12 अध्याय हैं। विभिन्न अध्यायों के अधिकांश शीर्षक छायावादी कविता की पंक्तियों के टुकड़े हैं। ‘प्रथम रश्मि, केवल मैं केवल मैं’, ‘जागो फिर एक बार आदि शीर्षकों से स्पष्ट है कि विवेचन में छायावादी काव्य-वस्तु से सैद्धांतिक निष्कर्ष तक पहुँचा गया है।
डॉ. नामवर सिंह ने ‘कविता के नए-प्रतिमान’ (1968 ई.) में नई कविता के संदर्भ में काव्य-मूल्यों का प्रश्न उठाया है। काव्य-समीक्षा से हटकर साहित्यिक मूल्यों को स्पष्ट करने का प्रयास उन्होंने अपनी पुस्तक ‘इतिहास और आलोचना में संकलित निबंधों में किया है। इसके अतिरिक्त ‘इतिहास का नया दृष्टिकोण (1952 ई.) और ‘हिंदी साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार (1962 ई.) नामक निबंधों में मार्क्सवादी दृष्टिकोण से हिंदी साहित्य के इतिहास की पुनर्व्याख्या की गई है। इन निबंधों के माध्यम से उन्होंने मूल्यांकनपरक आलोचना और साहित्यिक इतिहास के बीच संबंध स्थापित किया है।
इतना ही नहीं, नामवर सिंह जी ने कथा-समीक्षा के स्तर को भी काव्य-समीक्षा के स्तर तक उठाया। इस दृष्टि से उनकी पुस्तक ‘कहानी-नई कहानी (1964 ई.) महत्वपूर्ण है।
मनोविश्लेषणात्मक
मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा के सिद्धांत के अनुसार काव्य-सृजन कवि के सामाजिक दायित्व का परिणाम नहीं वरन् उसकी प्रवृत्तियों द्वारा प्रेरित है। काव्य के पात्र, वर्ण्य-विषय, शैली आदि सभी वस्तुओं पर दमित इच्छाएँ अथवा प्रभुत्व की कामना और जीवित रहने की इच्छा की अभिव्यक्ति ही कला-कृति के स्वरूप का निर्धारण करती है। इस तरह मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा में कलाकार के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति को प्रमुखता दी गई। अतः रचना को ठीक-ठीक समझने के लिए रचनाकार के व्यक्तित्व को समझना आवश्यक समझा गया।
दरअसल पश्चिमी आलोचक फ्रायड, एडलर और युंग ने साहित्य प्रेरणा के तीन सिद्धांतों की चर्चा की काम-वासना (दमित इच्छाएँ), प्रभुत्व की कामना तथा जीवित रहने की इच्छा। इन सिद्धांतों ने पश्चिमी जगत में तहलका मचा दिया। इसने हिंदी साहित्य को भी प्रभावित किया। हिंदी में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय और पं. इलाचंद्र जोशी के उपन्यास इसी विचारधारा से प्रभावित हैं।
यूँ तो मनोविश्लेषणवादी समीक्षा-शैली के दर्शन शुक्लजी से लेकर परवर्ती काल के सभी आलोचकों में होते हैं। पर मनोविश्लेषणात्मक शैली की समालोचनाएँ हिंदी में कम हैं। नगेंद्र जी ने मनोविश्लेषणवादी साहित्य सिद्धांतों के आधार पर हिंदी साहित्य का थोड़ा-बहुत मूल्यांकन भी किया है लेकिन वे मूलतः नूतन रसवादी हैं। मनोविश्लेषणवादी समीक्षा के क्षेत्र में अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी और देवराज उपाध्याय के नाम उल्लेखनीय हैं।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
अज्ञेय जी ने विशेषतः एडलर (प्रभुत्व कामना) को अपनाया। इनका समन्वित रूप ही उन्होंने ग्रहण किया। उन्होंने अपने त्रिशंकु नामक निबंध संग्रह में ‘प्रभुत्व कामना और ‘क्षतिपूर्ति के सिद्धांतों को स्पष्ट किया।
‘अज्ञेय’ ने अपनी कविता की व्याख्या के साथ ही अपने कुछ समकालीन कवियों के रचना-कर्म का मूल्यांकन भी किया। उनके द्वारा संपादित तार सप्तक की भूमिका हिंदी आलोचना में एक प्रस्थान बिंदु है। दूसरा सप्तक’ और ‘तीसरा सप्तक’ की भूमिकाएँ भी अत्यंत बहस तलब रहीं। उन्होंने कविता में शब्द और अर्ध दोनों क्षेत्रों में प्रयोग पर बल दिया। उनके साहित्य-चिंतन को समझने के लिए ‘आत्मनेपद’ (1960) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। काव्य की रचना प्रक्रिया और संप्रेषणीयता के संबंध में उनका चिंतन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पं. इलाचंद्र जोशी
जोशी जी के कला-विवेचन में भी फ्रायड और एडलर के सिद्धांतों का उपयोग हुआ। जोशी जी ने काव्य का चरम लक्ष्य सौंदर्य माना जिसमें मंगल भावना भी निहित है। जोशी जी ने ‘साहित्य-सर्जना’ (1940 ई.), ‘विवेचना’ (1948 ई.), ‘साहित्य संतरण’ (1953 ई.), ‘विश्लेषण’ (1954 ई.), और ‘साहित्य-चिंतन (1955 ई.) में संग्रहीत निबंधे में मनोविश्लेषण को प्रमुखता दी।
मैनेजर पांडेय : साहित्य के मूल्यांकन के लिए ऐतिहासिक दृष्टि और समाजशास्त्रीय दृष्टि के मेल से अपने आलोचनात्मक प्रतिमान विकसित करते हैं। इस प्रक्रिया में वे इतिहास विरोधी कलावादी चिंतन का व्यापक विरोध करते हैं। अपनी पुस्तक ‘साहित्य और इतिहास-दृष्टि के माध्यम से वे साहित्य के मूल्यांकन के लिए ऐतिहासिक दृष्टि के महत्व को स्थापित करते है तो ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ के माध्यम से हिंदी आलोचना में समाजशास्त्रीय दृष्टि का विकास करते हैं उन्होंने परंपरा के मूल्यांकन का गंभीर आलोचकीय दायित्व भी निभाया है। इस दृष्टि से उनकी पुस्तक ‘भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य’ अत्यंत उल्लेखनीय है। अस्मितामूलक विमशों के प्रति मार्क्सवादी आलोचना का नजरिया प्रायः विरोध का रहा है। पर, मैनेजर पांडेय का रवैया इन विमर्शों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रहा है। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के प्रति सकारात्मक दृष्टि रखते हुए वे मार्क्सवादी आलोचना के दायरे को विस्तृत करते हैं। ‘शब्द और कर्म’, ‘अनमैं साँचा’, ‘आलोचना की समाजिकता’ और ‘आलोचना में सहमति असहमति’ उनकी अन्य महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियाँ हैं।
विश्वनाथ त्रिपाठी: विश्वनाथ त्रिपाठी सहृदय आलोचक हैं। ‘लोकवादी तुलसीदास’ और
‘मीरा का काव्य’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से वे इन रचनाकारों के साथ-साथ संपूर्ण भक्ति काव्य में निहित प्रगतिशील मूल्यों को रेखांकित करते हैं। मार्क्सवादी आलोचना में तुलसीदास को लेकर गंभीर बहसें हुई हैं। त्रिपाठी जी अतिवाद से बचते हुए तुलसीदास की विलक्षण लोक-संशक्ति को रेखांकित करते हैं। शुरूआती मार्क्सवादी आलोचकों के निषेधात्मक रवैये के बरक्स वे तुलसी-काव्य का युग-सदंर्भों को ध्यान में रखकर संपूर्णता में विश्लेषण करते हैं। हिंदी आलोचना’ पुस्तक में उन्होंने हिंदी आलोचना की विकास यात्रा को वस्तुनिष्ठ ढंग से प्रस्तुत किया है। हरिशंकर परसाई की व्यंग्य दृष्टि की बारीक व्याख्या करने के साथ ही त्रिपाठी जी ने कहानी आलोचना के क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप किया है। वे नई कहानी को व्यापक परिप्रेक्ष्य और संदर्भों में देखने की ज़रूरत पर बल देते हैं। वे नई कहानी को सिर्फ मध्यवर्गीय संबंधों के दायरे में देखने का विरोध करते हैं।
नई समीक्षा
1950 के बाद हिंदी आलोचना का विकास नए संदर्भों में नई आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सही दिशा में अग्रसर हुआ। नई आलोचना से पूर्व किसी कृति को आँकने और परखने के लिए जो तरीक़े अपनाए जा रहे थे, वे मुख्यतः आलोचना के अपने मानदंड के आधार पर थे। किंतु नई आलोचना में कृति को ही आधार बनाया गया। अतः प्रचलित पद्धतियाँ जैसे रसवादी, ऐतिहासिक, मार्क्सवादी, मनोविश्लेषणवादी स्वतः धूमिल पड़ गईं। हालांकि नई पद्धति भी पश्चिम से ही ली गई जहाँ रैनसम, बट पन वारेन, ब्लैकमर और टेट आदि लेखक इस क्षेत्र में प्रयोग कर रहे थे। नई आलोचना में रचना की संगति पर विशेष ध्यान दिया गया। रचना के ताने-बाने, उसके रचाव के साथ-साथ उसकी मूल्यगत प्रासंगिकता को भी मद्देनज़र रखा गया। इससे आलोचना कृति की तह तक पहुँच सकी।
‘व्यक्ति स्वातंत्र्य के सिद्धांतों को लेकर साहित्य की जो धारा इस काल में विकसित हुई और उसके जिन मूल्यांकन सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ, उन्हें इस वर्ग में रखा गया। उसे ‘नई कविता’ या ‘नवलेखन’ के वज़न पर ‘नई आलोचना’ नाम दिया गया।
इस वर्ग के आलोचकों ने व्यक्ति स्वातंत्र्य को जीवन का सर्वोच्च मूल्य स्वीकार कर साहित्य की नई मर्यादाओं की स्थापना की।
मानवीय मूल्य, बौद्धिकता, आधुनिकता, क्षण के महत्व, सृजनात्मकता, विषय की उपेक्षा, काव्य का महत्व एवं कलाकार के अंतर्मन की परख आदि साहित्य-मूल्यों के साथ ही नए समीक्षक ने काव्य में लय के प्रश्न को भी उठाया।
हिंदी आलोचना में नई आलोचना के प्रयास ‘अज्ञेय’ से शुरू हुए और इसे आज तक आलोचकों ने न केवल अपनाया बल्कि उसे नई दिशा और नए आयाम भी दिए हैं।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
‘अज्ञेय’ ने हिंदी आलोचना में नई कविता के आस्वाद और मूल्यांकन के लिए नया आधार तैयार किया। उन्होंने ‘तीसरा सप्तक’ की भूमिका में कवियों की आलोचना को कर्म की ओर प्रवृत्त किया। ‘अज्ञेय’ ने अपनी कविता की व्याख्या के साथ ही अपने कुछ समकालीन कवियों की समीक्षाएँ भी लिखीं। इतना ही नहीं काव्य तथा साहित्य संबंधी कुछ सैद्धांतिक स्थापनाएँ भी कीं। आधुनिक हिंदी-कविता के संकलन ‘पुष्करिणी’ की भूमिका में उन्होंने जो आधुनिक कविता की विस्तृत आलोचना की है वह उल्लेखनीय है।
‘अज्ञेय’ ने आरंभ में फ्रायड और एडलर के मनोविश्लेषण से प्रभावित होकर मनोविश्लेषणवादी सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था किंतु बाद में आगे चलकर उसे छोड़ दिया। उनके परवर्ती विचारों के लिए ‘आत्मनेपद’ (1960 ई.) और ‘हिंदी साहित्यः एक आधुनिक परिदृश्य (1967 ई.) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
मुक्तिबोध ने व्यावहारिक समीक्षाएँ भी लिखी हैं। ‘कामायनीः एक पुनर्विचार में ‘कामायनी’ का उन्होने इसी दृष्टि से विश्लेषण किया है।
गिरिजा कुमार माथुर
गिरिजा कुमार माथुर ने नई कविता के शिल्प पक्ष के साथ-साथ सैद्धांतिक पक्ष पर भी विचार किया है। उनके आलोचनात्मक निबंधों का संकलन ‘नई कविताः सीमाएँ और संभावनाएँ (1966 ई.) नाम से प्रकाशित हुआ। कविता की आलोचना उन्होंने ‘अस्वीकृति का नवोन्मेष नामक निबंध में लिखी। गिरिजा कुमार के आलोचनात्मक लेखों से आधुनिक भाव-बोध का वैज्ञानिक पक्ष उजागर होता है।
शमशेर बहादुर सिंह
कवि शमशेर बहादुर सिंह ने ‘हंस’ और ‘नया साहित्य’ पत्रिकाओं में काफ़ी दिनों तक समकालीन कृतियों की समीक्षाएँ लिखीं, जिनका संकलन ‘दो आब’ (1947 ई.) नाम से प्रकाशित हुआ। इन समीक्षाओं में ‘तार सप्तक की समीक्षा उल्लेखनीय है। ‘मुक्तछंद निबंध में भी महत्वपूर्ण विवेचन प्राप्त होता है।
धर्मवीर भारती
धर्मवीर भारती प्रयोगशील नई कविता के पक्षधर थे। उन्होंने नई कविता के मूल्यों को सैद्धांतिक स्तर पर स्थापित किया है। उनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं-’साहित्य और मानव मूल्य’ (1960 ई.) और ‘पश्यंति’ (1969 ई.)।
नेमिचंद्र जैन
नेमिचंद्र जैन ने कविता, उपन्यास, नाटक आदि सभी क्षेत्रों में आलोचनाएँ लिखीं है किंतु कथा-समीक्षा और नाट्य-समीक्षा में उन्हें विशेष ख्याति मिली। ‘अधूरे साक्षात्कार’ (1966 ई.) पुस्तक में उन्होंने समकालीन उपन्यासों पर महत्वपूर्ण आलोचना लिखी। इसी प्रकार ‘रंग-दर्शन’ (1957 ई.) में नाटक-रंगमंच की विवेचना की गई है।
इन तमाम आलोचकों के साथ-साथ कई अन्य आलोचक भी सक्रिय हैं डॉ. जगदीश गुप्त, डॉ. विजयदेव नारायण साही, डॉ. शंभुनाथ सिंह, डॉ. बच्चन सिंह, डॉ. शिवप्रसाद सिंह, डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त, डॉ. देवीशंकर अवस्थी, डॉ. इंद्रनाथ मदान, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, डॉ. रमेश कुंतल मेघ आदि।
कुछ अन्य विशिष्ट आलोचक
नलिन विलोचन शर्मा
नलिन विलोचन शर्मा रूपवादी आलोचक थे, लेकिन उनका रूपवाद व्यापक और उदार था। उनके लिए रूपवाद एक ऐसा साहित्यिक मूल्य है, जिसके आधार पर वे अपनी आलोचना में किसी साहित्यिक कृति को साहित्येतर कारणों से नहीं, बल्कि साहित्यिक कारणों से कमतर या श्रेष्ठ घोषित करते हैं। उन्होंने साहित्य कला की दृष्टि से प्रेमचंद के महत्व को प्रतिपादित किया। रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ के महत्व की और सबसे पहले हिंदी जगत का ध्यान खींचने का श्रेय नलिन विलोचन शर्मा को ही जाता है। उनके साहित्य, आधुनिक साहित्य और पाश्चात्य साहित्य तीनों में उनकी समान रूप से गति थी। उनका मुख्य आलोचनात्मक लेखन 1940 से 1961 के बीच का है। साहित्य संबंधी शायद ही कोई विषय हो, जिस पर उन्होंने विचार न किया हो। उपन्यास उनकी आलोचना का सबसे शक्तिशाली पक्ष है। ‘दृष्टिकोण’ ‘साहित्य का इतिहास दर्शन, ‘हिंदी उपन्यास विशेषतः प्रेमचंद’ आदि उनकी उल्लेखनीय पुस्तकें हैं
विजयदेव नारायण साही
विजयदेव नारायण साही की आलोचना-दृष्टि न तोइतिहास निरपेक्ष है और न ही समाज निरपेक्ष। पर वे इतिहास और समाज के साथ साहित्य के रिश्ते के संबंध में मार्क्सवादी आलोचना की मान्यताओं से सहमत नहीं है। इस दृष्टि से उनका निबंध ‘मार्क्सवादी समीक्षा की कम्युनिस्ट परिणति’ उल्लेखनीय है, जिसमें उन्होंने मार्क्सवादी आलोचना के संकीर्णतावाद को लक्षित किया है। ‘लघुमानव के बहारे हिंदी कविता पर एक बहस, शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट’ आदि जैसे उनके कुछ निबंधों की चर्चा आलोचना में लंबे समय तक होती रही। प्रखर आलोचनात्मक निबंधों के अतिरिक्त साही की आलोचनात्मक कृति ‘जायसी’ हिंदी आलोचना की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस पुस्तक में उन्होंने जायसी की कवि-दृष्टि और उनके काव्य-सौंदर्य का जिस तरह से उद्घाटन किया है, वह विलक्षण है।
रघुवंश:
‘साहित्य का नया परिप्रेक्ष्य’ रघुवंश की उल्लेखनीय आलोचनात्मक कृति है। यह उनके आलोचनात्मक निबंधों का प्रतिनिधि चयन है। नई कविता पर विचार करते हुए उनका एक महत्वपूर्ण निबंध ‘समसामयिकता और आधुनिक हिंदी कविता’ है। सामाजिक उपयोगिता को ध्यान में रखकर साहित्य-सृजन के वे पक्षधर नहीं है। उन्होंने आधुनिक रचनाशीलता के संदर्भ में भारतीय काव्यशास्त्र की अर्थवत्ता पर गंभीर विचार किया है।
रामस्वरूप चतुर्वेदी: रामस्वरूप चतुर्वेदी आधुनिक साहित्य के आलोचक हैं। उन्होंने ‘कामायनी’, ‘अज्ञेय’ और रामचंद्र शुक्ल पर उन्होंने महत्वपूर्ण लिखा है। ‘कामायनी का पुनर्मूल्यांकन’ में वे ‘कामायनी’ के रचना-विधान और बिंब-विधान का गहराई से मूल्यांकन करते हैं। अपने प्रिय रचनाकार अज्ञेय पर उन्होंने ‘अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या’ जैसी उल्लेखनीय किताब लिखी जो उनपर लिखी गई कुछ बेहतरीन पुस्तकों में शामिल है। ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक है। ‘हिंदी नवलेखन, ‘भाषा और संवेदना’ ‘इतिहास और आलोचना दृष्टि’ तथा ‘आचार्य रामचंद्र शुक्लः आलोचना का अर्थ, अर्थ की आलोचना उनकी अन्य महत्वपूर्ण आलोचनात्मक पुस्तकें हैं।
लक्ष्मीकांत वर्मा
लक्ष्मीकांत वर्मा नई कविता और प्रयोगवाद को केंद्र में रखकर काव्य-आलोचना का मानदंड तैयार करते हैं। उनकी पुस्तक ‘नई कविता के प्रतिमान’ नई कविता को समझने का पहला व्यवस्थित प्रयास है। इसी पुस्तक में उन्होंने नई कविता के संदर्भ में ‘लघुमानव’ की अपनी प्रसिद्ध मान्यता रखी है। उनहोंने नई कविता के मूल्यांकन के लिए रस जैसे पुराने काव्य प्रतिमानों की अप्रासंगिकता को उजागर किया है। काव्य आंदोलन के रूप में नई कविता की रचना-प्रक्रिया और उसके वैचारिक भाव-बोध का उनके द्वारा किया विश्लेषण काफ़ी महत्व का है।
विजय बहादुर सिंह विजय बहादुर सिंह ने छायावाद के तीन प्रमुख कवियों :- प्रसाद, निराला और पंत की कविताओं के केंद्र में रखकर एक महत्वपूर्ण किताब लिखी है ‘छायावाद के कवि’। यह पुस्तक छायावादी काव्य के मूल्यांकन की दृष्टि से उल्लेखनीय है। इसके बाद उन्होंने अपना सर्वाधिक आलोचनात्मक लेखन नागार्जुन को केंद्र में रखकर किया। ‘नागार्जुन का रचना-संसार’, ‘नागार्जुन संवाद’, ‘कविता और संवेदना’ आदि उनकी उल्लेखनीय पुस्तकें हैं। आलोचनात्मक पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने ‘भवानी प्रसाद मिश्र ग्रंथावली (आठ खंड), ‘दुष्यंत कुमार ग्रंथावली’ (चार खंड) और नंद दुलारे वाजपेयी ग्रंथावली (आठ खंड) का संपादन भी किया है। उन्होंने हिंदी आलोचना को देशज संदर्भों में विकसित करने का गंभीर प्रयास किया है।
हिंदी की अन्य गद्य विधाएँ
रेखाचित्र, संस्मरण, यात्रा साहित्य, आत्मकथा, जीवनी और रिपोर्ताज, डायरी।
रेखाचित्र
1940 के बाद हिंदी साहित्य में प्रयोग का दौर शुरू हुआ। प्रयोग मात्र कविता में ही नहीं किए गए। प्रयोग का असर साहित्य की विविध विधाओं पर भी हुआ। 1940 के बाद साहित्यिक विधाओं के नए-नए रूप सामने आए। उपन्यास जो अभी तक वर्णनात्मक विधा थी। उसे जीवनी की शक्ल में पेश किया गया। अज्ञेय का ‘शेखर एक जीवनी’ इसका उदाहरण है। कविता और नाटक के संयोग से काव्य नाटक का जन्म हुआ। ‘अंधायुग’ काव्य नाटक का प्रत्यक्ष प्रमाण है। विधाओं के मिश्रण में हमारे जीवनानुभव के प्रतिबिंब मिलते हैं। वस्तुतः समाज की जटिलता के बीच हमारे अनुभव की गति सीधी नहीं रह सकी सामाजिक अनुभव से ऐसी संवेदनाएँ पैदा हुई जो मिली जुली थीं। इसलिए शिल्प के ढाँचे को भी नवीन रूप देना पड़ा। कहानी के कथानक की संवेदनशीलता, चित्रकला के रंग रेखाओं की सूक्ष्मता और सांकेतिकता तथा संस्मरण के स्मृति तत्व के मिश्रण से रेखाचित्र का स्वरूप निर्मित हुआ। रेखाचित्र गद्य की एक नवीन विधा है। अपनी व्यापक संवेदनशीलता और सुंदर कलात्मक शैली के कारण आज हिंदी की समस्त आधुनिक विधाओं में रेखाचित्र ने अपना एक निश्चित और विशिष्ट सथान बना लिया है।
रेखाचित्र की स्मृति में पीड़ा का बोध होता है। इस पीड़ा में बिछुड़ने की संवेदना होती है। रेखाचित्रकार जिसका वर्णन कर रहा होता है। उससे अलग होने की पीड़ा और दर्द ही उसे रेखाचित्र निर्मित करने को प्रेरित करता है। श्रेष्ठ रेखाचित्रकार की कृतियों को पढ़ने पर यह अहसास और भी तीव्र हो जाता है। महादेवी ने अपने रेखाचित्र के संग्रह का नाम ही ‘अतीत के चलचित्र’ रखा है। इसमें अतीत के प्रति सम्मोहन है, उससे अलग होने की घनी पीड़ा भी है। वस्तुतः रेखाचित्र की साहित्यिक विधा के रूप में चर्चा ही महादेवी की रचनाओं से आरंभ होती है। समाज में निम्नस्तर पर रहने वाले लोगों के प्रति महादेवी में करुणा और सहानुभूति है। लेखिका ने जिन पात्रों को अपने रेखाचित्र में स्थान दिया है उन सभी के जीवन में कुछ न कुछ अभाव है। यह अभाव उन पात्रों के प्रति सहानुभूति को जन्म देते हैं। महादेवी के कुछ रेखाचित्र आकोश को जगाते हैं। महादेवी के रेखाचित्रों में ‘अतीत के चलचित्र’ (1941) और ‘स्मृति की रेखाएँ (1947) उनकी प्रतिनिधि कृतियाँ हैं। महादेवी के पूर्व के रेखाचित्रकारों में श्रीराम शर्मा की कृति ‘बोलती प्रतिमा’ (1937), ‘जंगल के जीव’ (1947) आदि के नाम भी उल्लेखनीय हैं। महादेवी के बाद रेखाचित्र लेखकों में रामवृक्ष बेनीपुरी का स्थान महत्वपूर्ण है। बेनीपुरी का ‘लालतारा’ और ‘माटी की मूरतें’ प्रसिद्ध रेखाचित्र हैं।
प्रकाशचंद्र गुप्त का ‘रेखाचित्र’ भी रेखाचित्रों में उल्लेखनीय है। राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह का ‘टूटा तारा’ रेखाचित्र का बेजोड़ उदाहरण है। उनकी शैली में चमत्कारिक शक्ति है। शिवपूजन सहाय के रेखाचित्र ‘वे दिन वे लोग’ व्यंग्य प्रधान रेखाचित्र के उदाहरण हैं। देवेन्द्र सत्यार्थी की ‘रेखाएँ बोल उठी’ रेखाचित्र विधा की उल्लेखनीय रचना है। विष्णु प्रभाकर के ‘कुछ शब्द कुछ रेखाएँ’ सामाजिक विसंगति को उभारने वाले रेखाचित्र हैं।
संस्मरण साहित्य
संस्मरण और रेखाचित्र में बहुत ही सूक्ष्म अंतर है। यदि लेखक व्यक्तित्व चित्रण तक ही स्मृति को सीमित रखता है तो वह रचना रेखाचित्र की श्रेणी में रखी जाएगी। यदि लेखक स्मृतियों से प्रसंग को उभारने का काम करता है तो वह रचना संस्मरण कहलाएगी।
संस्मरण में पूरा संदर्भ और प्रसंग अर्थवान होता है। रेखाचित्र में व्यक्ति चित्रांकन का केंद्र बिंदु होता है। स्मृति में एक विशिष्ट प्रकार की संवेदना होती है। यह संवेदना हमारे नोस्टलजिक बोध को झंकृत कर देती है। संस्मरण से हमारा अतीत बोध जुड़ा होता है। अतीत का कोई मूल्यवान क्षण संस्मरण रचने को प्रेरित करता है। संस्मरण में कथा का ताना-बाना सच्ची घटनाओं से बुना जाता है।
संस्मरण आधुनिक गद्य विधा है। हिंदी में संस्मरण साहित्य का प्रारंभ द्विवेदी युग से होता है। सरस्वती पत्रिका में कुछ संस्मरण यदा कदा प्रकाशित हो जाते थे। हिंदी में संस्मरण लिखने का प्रांरभ पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ही हुआ। ‘सरस्वती’, ‘माधुरी’, ‘क्षुधा’, ‘विशाल भारत’ आदि में साहित्यिकों और समाज सुधारकों के संस्मरण छपते रहते थे, हिंदी में पहला संस्मरण 1907 ई. में बालमुकुन्द गुप्त द्वारा प्रतापनारायण मिश्र पर लिखा गया था, इसके कुछ दिन बाद ही गुप्त जी द्वारा लिखित ‘हरिऔध जी के संस्मरण’ नामक एक अन्य संस्मरणात्मक पुस्तक का भी उल्लेख मिलता है। इसमें पन्द्रह संस्मरण संकलित हैं। सन् 1928 में रामदास गौड़ ने श्रीधर पाठक और राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’ जैसे साहित्यकारों का संस्मरण लिखा, ये संस्मरण दोनों साहित्यकारों की साहित्यिक अंतर्दृष्टि स्पष्ट करने में सहायक हैं। ‘क्षुधा’ पत्रिका में इलाचंद्र जोशी ने ‘मेरे प्रारंभिक जीवन की स्मृतियाँ’ शीर्षक से अपने बचपन की स्मृतियों को लिखा। 1932 ई. में ‘विशाल भारत’ पत्रिका में बनारसीदास चतुर्वेदी ने श्रीधर पाठक का संस्मरण रेखाचित्र लिखा। ये संस्मरण कभी तो संस्मरण लेखक के ही बारे में होते थे कभी इनमें किसी व्यक्ति के जीवन की विशेषताओं का चित्रण होता था। देखा जाए तो, बीसवीं शताब्दी के प्रथम, द्वितीय और तृतीय दशकों में संस्मरण विधा स्थापित होने लगी थी। इस संस्मरणों में उस समय की राजनीतिक और साहित्यिक जीवन की गतिविधियों का चित्र भी प्राप्त होता है। इस समय रूपनारायण पांडेय, गोपालराम गहमरी, महावीर प्रसाद द्विवेदी आदि के संस्मरण भी प्रकाशित होने लगे थे।
महादेवी वर्मा के संस्मरण हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उनकी कृति ‘पथ के साथी’ (सन् 1956) में लेखिका ने अपने समकालीन रचनाकारों का संस्मरण लिखा है। इस कृति में पंत, निराला, सुभद्राकुमारी चौहान, मैथिलीशरण गुप्त आदि के संस्मरण संकलित हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी के संस्मरण ‘जंजीरे और दीवारे’ में उनके जेल जीवन के संस्मरण है। कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की कृति ‘भूले हुए चेहरे’ उल्लेखनीय संस्मरण रचना है। संस्मरण लेखन में रामधारी सिंह दिनकर की कृति ‘लोकदेव नेहरू’ तथा ‘संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ’ महत्वपूर्ण हैं। ‘लोकदेव नेहरू’ में नेहरू के जीवन की अंतरंगता और अनौपचारिकता से परिचित कराया गया है। नेहरू के समकालीन रचनाकारों के संबंधों पर भी प्रकाश डाला गया है। ‘संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ’ में लेखक ने अपने युग के प्रमुख राजनीतिज्ञों और साहित्यकारों का स्मरण किया है। डॉ नगेंद्र के संस्मरण ‘चेतना के बिंब’ में सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त आदि व्यक्तियों के जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को संस्मरण में उभारने को प्रयत्न किया गया है। हरिवंश राय बच्चन की कृति ‘कवियों में सौम्य संत हैं’ में सुमित्रानंदन पंत के आत्मीय और साहित्यिक संस्मरण दिए गए हैं। डॉ. रामकुमार वर्मा का ‘संस्मरणों के सुमन’, विष्णु प्रभाकर की ‘मेरे अग्रजः मेरे मीत’ तथा फणीश्वरनाथ रेणु का ‘वन तुलसी की गंध’ उल्लेखनीय संस्मरणात्मक कृतियाँ हैं। संस्मरण साहित्य में अज्ञेय की कृति ‘स्मृतिलेखा’ का महत्वपूर्ण स्थान है।
जीवनी
जीवनी भी आधुनिक गद्य की विधा है। वस्तुतः जीवनी किसी रूप में हमारे पारंपरिक साहित्य में भी वर्तमान रही है। जीवनी लेखक की कल्पना को मनमानी छूट नहीं होती है। पात्र के जीवन की वास्तविक जानकारी के आधार पर ही लेखक कल्पना द्वारा एक चित्र उकेर सकता है। जीवनी लेखक को इतिहास के घटनाक्रम और उपन्यास की रोचकता के मध्य अपना मार्ग ढूँढ़ना पड़ता है। घटनाक्रम की प्रामाणिक जानकारी के आधार पर ही उसे विवेचन करना होता है। जीवनी की रचना के लिए निष्पक्षता की ज़रूरत होती है। जीवनी में लेखक को उन मानवीय कमजोरियों को भी उभारना होता है जो पात्र के जीवन में हैं। जीवन के घटनाक्रम को व्यवस्थित रूप में भी प्रस्तुत करना होता है ताकि उसमें क्रम बना रहे। जीवनी गद्य साहित्य का वह रूप है जिसकी अपनी पहचान होती है और उसके स्वरूप की यही निजता उसे गद्य की अन्य विधाओं से अलग करती है। जीवनी किसी व्यक्ति के जीवन का प्रभावपूर्ण और कमबद्ध किंतु धारावाहिक रूप में किया गया वर्णन है। देश-काल और परिस्थितियों का अंकन भी चरित नायक के जीवन की घटनाओं को पुष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक होता है। इसमें चरित नायक के चरित्र का खुला वर्णन, उसके शारीरिक और बौद्धिक गुणों का परिचय, उसकी सफलताओं और असफलताओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी अपेक्षित है। जीवनी लेखक प्रायः स्वयं मंच पर नहीं आता वरन वह अपने को सदैव नेपथ्य में रखकर ही लेखन करता है।
हिंदी में जीवनी साहित्य भारतेंदु के समय से ही लिखे जाने लगे थे। भारतेंदु काल में रचित जीवनियों में जीवनी साहित्य की अपेक्षित तटस्थता और कलात्मकता नहीं मिलती है। उन पर आख्यान का गहरा प्रभाव मिलता है। इसलिए उस युग की अधिकतर जीवनी ऐतिहासिक व्यक्तियों को केंद्र में रखकर लिखी गई। स्वयं भारतेंदु ने कालिदास, रामानुज, जयदेव, सूरदास, शंकराचार्य आदि की जीवनियाँ लिखीं। भारतेंदु द्वारा लिखी गई जीवनियाँ ‘बादशाह दर्पण’ और ‘चरितावली’ में संकलित हैं। कार्तिक प्रसाद खत्री ने अहिल्याबाई, छत्रपति शिवाजी और मीरा बाई के जीवन चरित लिखे। राधकृष्णदास ने श्री नागरीदास जी के जीवन चरित की रचना की। परिमाण की दृष्टि से देखा जाए तो भारतेंदु युग में अत्यधिक जीवनी साहित्य मिलता है, परंतु वास्तविक अर्थ में वे जीवनी न होकर आख्यान हैं।
द्विवेदी युग में शिवनंदन सहाय कृत हरिश्चंद्र का जीवन चरित, गोस्वामी तुलसीदास का जीवन चरित और चैतन्य महाप्रभु का जीवन चरित उल्लेखनीय कृतियाँ हैं। परंतु इन कृतियों में तटस्थता और निष्पक्षता का अभाव मिलता है जीवनी के लिए तथ्यों के जितने प्रमाण की आवश्यकता होती है उसका भी अभाव झलकता है। द्विवेदी युग में आर्य समाज प्रवर्तक दयानंद तथा अन्य महापुरुषों से संबंधित जीवनी साहित्य लिखा गया। अखिलानंद शर्मा ने दयानंद सरस्वती के जीवन के विविध पहलुओं को उभारने का प्रयत्न किया। लोकमान्य तिलक, मदनमोहन मालवीय आदि की जीवनी भी लिखी गई। गौरीशंकर ओझा ने कर्नल टॉड की जीवनी लिखी। ऐतिहासिक नारियों में नूरजहाँ, रानी दुर्गावती आदि की जीवनियाँ लिखी गईं। द्विवेदी युग में ऐतिहासिक पात्रों की जीवनी की ओर लेखकों का रुझान अधिक था। ऐतिहासिक पात्र को अपने कल्पना के अनुसार रच देना द्विवेदी युग के जीवनी साहित्य की सीमा है।
द्विवेदी युग के बाद के जीवनी लेखन में उद्बोधन का स्वर प्रमुख हो चला था। इस युग में विशेषकर उन्हीं चरित्रों की जीवनी लिखी गई जो राष्ट्रीय आंदोलन में प्रेरणा देने वाले थे। इसलिए तिलक, गांधी और नेहरू की जीवनी कई लेखकों ने लिखी। ईश्वरी प्रसाद शर्मा ने बाल गंगाधर तिलक पर लिखा। राम नरेश त्रिपाठी ने गांधी की जीवनी लिखी। गणेश शंकर विद्यार्थी ने जवाहर लाल नेहरू की जीवनी लिखी। द्विवेदी युग में आदर्शवाद की स्थापना मुख्य चिंता का विषय था। इसलिए जीवनी लेखन में भी उसी बिन्दु को आधार बनाया गया।
स्वातंत्र्योत्तर युग का जीवनी साहित्य अधिकतर राजनीतिक व्यक्तियों से ही संबद्ध है। लगभग सभी नेताओं पर जीवनी लेखन किया गया। उनकी सूची बहुत लंबी है। उन सभी साहित्य की रचना की चर्चा यहाँ अपेक्षित नहीं है। कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक व्यक्तियों की जीवनी लिखी गई जिनका हमारे साहित्य में विशिष्ट महत्व है। इस प्रकार की जीवनी में ‘प्रेमचंद घर में’ शिवरानी देवी की उल्लेखनीय कृति है। इसमे प्रेमचंद के जीवन के संघर्षों को ईमानदारी से प्रस्तुत किया गया है। ‘कलम का सिपाही’ अमृतराय द्वारा रचित महत्वपूर्ण कृति है। इस कृति को उपन्यास की तरह रोचक बनाकर लिखा गया है। लेखक बहुत हद तक तटस्थ होकर अपने नायक का मूल्यांकन करने में सफल हुआ है। इस कृति में प्रेमचंद के वैचारिक और संवेदनात्मक विकास को तत्कालीन परिवेश के बीच से रचने का प्रयत्न किया गया है। प्रेमचंद की साहित्यिक समृद्धि और व्यक्तिगत अभाव को वस्तुनिष्ठता से दर्शाने की कोशिश में रचनाकार सफल रहा है।
जीवनी रचना की दूसरी महत्वपूर्ण कृति डॉ. रामविलास शर्मा की कृत ‘निराला की साहित्य साधना’ है। इस कृति में निराला के स्वभाव, अनुभूति, साहित्य रचना, प्रखर व्यक्तित्व को एक साथ समेटने का प्रयत्न किया गया है। निराला के जीवन के संघर्षों, अभावों और दुःखों को आत्मीयता से लेखक ने रचा है।
विष्णु प्रभाकर की कृति ‘आवारा मसीहा’ में शरतचंद्र के जीवन का वर्णन किया गया है। शरतचंद्र के जीवन के एक-एक सूत्र को जोड़कर लेखक ने उनकी भावयात्रा को अंकित करने का जोखिम उठाया है। इसके बावजूद कृति में कहीं भी पैबंद नहीं दिखाई पड़ता है। पूरी रचना में विश्वसनीयता के प्रमाण मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त शांति जोशी द्वारा लिखित ‘सुमित्रानंदन पंत जीवनी और साहित्य’ तथा राजकमल की कृति ‘शिखर से सागर तक’ उल्लेखनीय कृतियाँ हैं। ‘शिखर से सागर तक’ में अज्ञेय की जीवनी को लिखा गया है। इस कृति में चरित नायक को युग संदर्भ और व्यक्तिगत पृष्ठभूमि के माध्यम से समझने की कोशिश की गई है।
आत्मकथा
जीवनी में रचनाकार और नायक अलग-अलग व्यक्ति होता है। आत्मकथा में रचनाकार और नायक की भूमिका एक ही व्यक्ति की होती है। आत्मकथा में स्वयं के अनुभव को वर्णित करना होता है। आत्मकथा में तटस्थ और निरपेक्ष रहने की बहुत बड़ी चुनौती होती है। आत्मकथा के लिए आवश्यक है कि लेखक एक ऐसी अलोचनात्मक दृष्टि का विकास करे जिससे वह आत्मप्रशंसा और आत्मवेदना के भाव से बच सके। आत्मकथा का उद्देश्य अपने जीवनानुभव से दूसरों को परिचय कराना होता है।
बनारसीदास की रचना ‘अर्धकथा’ को हिंदी की प्रथम आत्मकथा माना जाता है। यह रचना काल खंड की दृष्टि से मध्यकालीन साहित्य का अंग है, परन्तु रचना में आत्मकथात्मक तत्व होने के कारण उसे हिंदी की प्रथम आत्मकथा स्वीकार किया गया है।
अन्य गद्य विधाओं की भांति आत्मकथा को भी आधुनिक जीवन और साहित्य की उपज माना जाता है। भारतेंदु ने ‘कुछ आप बीती कुछ जग बीती’ नाम से अपनी आत्मकथा लिखी। इस आत्मकथा में उन्होंने अपने जीवन की रोचक घटनाओं को वर्णित किया है। इस युग के दूसरे महत्वपूर्ण आत्मकथा लेखक के रूप में राधाचरण गोस्वामी का नाम प्रमुख है। श्री राधाचरण गोस्वामी ने अपने निजी जीवन के प्रथम कुछ वर्षों की चर्चा अपनी पुस्तक ‘मेरा संक्षिप्त जीवन चरित्र’ में की है, किंतु पुस्तक के अत्यंत संक्षिप्त होने के कारण इन्हें आत्मकथा कहने की अपेक्षा आत्मकथात्मक प्रयास कहना अधिक उचित होगा। केवल ग्यारह पृष्ठों की इस पुस्तक से ही गोस्वामी जी के व्यक्तित्व की विशेषताओं का पता चलता है।
सरस्वती के कई अंकों में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आत्मकथा से संबंधित कई लेख प्रकाशित किए थे। इसके अतिरिक्त इस युग में हरिभाऊ उपाध्याय ने महात्मा गांधी की आत्मकथा का हिंदी में अनुवाद किया था। ‘साधना के पथ पर’ नाम से हरिभाऊ उपाध्याय की मौलिक आत्मकथात्मक कृति भी मिलती है। स्वतंत्रता से पूर्व जिन आत्मकथाओं ने हिंदी साहित्य में अपना उल्लेखनीय स्थान बनाया है, वे हैं-लज्जाराम मेहता शर्मा की आपबीती’, पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की ‘अपनी ख़बर’, बाबू गुलाबराय की ‘मेरी असफलताएँ’, श्री राहुल सांकृत्यायन की ‘मेरी जीवन यात्रा’ आदि। ‘आप बीती’ में लेखक ने बहुत सजगता के साथ अपने जीवन की कुछ सीमित एवं महत्वपूर्ण घटनाओं को प्रस्तुत किया है। ये सभी घटनाएँ कमबद्ध हैं। इन वृत्तांतों के द्वारा लेखक का व्यक्तित्व और तत्कालीन परिवेश जीवंत हो उठा है। ‘अपनी ख़बर’ में उग्र ने अपने आरंभिक इक्कीस वर्षों के जीवन को सच्चाई के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस कृति की भाषा अनूठी है। ‘मेरी असफलताएँ’ की भूमिका में बाबू गुलाबराय ने अपनी इस रचना को आत्मचरित कहा है। यद्यपि यह निबंध शैली में रची गई कृति है। राहुल सांकृत्यायन की मेरी जीवन यात्रा तीन खंडों में रचित है। अपने जीवन के घुमावदार रास्तों को उन्होंने बड़े स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत किया है।
यशपाल की आत्मकथा ‘सिंहावलोकन’ नाम से प्रकाशित हुई है। इसमें क्रांतिकारी जीवन की कहानी कही है। सत्यदेव परिव्राजक की आत्मकथा ‘स्वतंत्रता की लोज में’ में धनहीन और साधनहीन व्यक्ति की कहानी है। चतुरसेन शास्त्री की दो आत्मकथात्मक कृतियों ‘यादों की परछाइयों’ और ‘मेरी आत्मकहानी’ नाम से मिलती हैं। सेठ गोविन्ददास कृत ‘आत्मनिरीक्षण’ में राजनीतिक गतिविधियों और असहयोग आंदोलन का इतिहास दिया गया है। देवराज उपाध्याय की आत्मकथा ‘बचपन के दो दिन’ तथा ‘यौवन के द्वार पर’ प्रकाशित हुई है। इन कृतियों की रचना मनोवैज्ञानिक आधार पर की गई है।
‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’ तथा ‘दशद्वार से सोपान तक’ शीर्षक चार भागों में बच्चन की आत्मकथा प्रकाशित हो चुकी है। चार भाग उनके जीवन के चार पड़ाव को सांकेतित करते हैं। बच्चन अपनी आत्मकथा को किस्सागो की शैली में सुनाते हैं। जीवन की सच्ची घटना का वर्णन करके वे आत्मकथा को और अधिक रोचक बना देते हैं। निजी ज़िंदगी की तस्वीर को इतनी स्पष्टता के साथ रखने का साहस बहुत कम लेखकों ने दिलाया है। व्यक्तिगत जीवन और रचनात्मक उपलब्धि के द्वन्द्र को लेखक सूझ-बूझ के साथ प्रस्तुत करता है। आत्मानुभव और जीवन की घटना को ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करना बच्चन की आत्मकथा की विशेषता है।
वृंदावन लाल वर्मा की आत्मकथा ‘अपनी कहानी’ उनके जीवन संघर्षों और शिकारी जीवन की कहानी है। राजनीतिक और सामजिक व्यक्तियों की भी आत्मकथा प्रकाशित हुई, जिनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ‘आत्मकथा’ का है। इसमें राजेंद्र बाबू के त्यागमय जीवन की कहानी है। फिल्मी जीवन से संबंधित आत्मकथाओं में बलराज साहनी कृत ‘मेरी फिल्मी आत्मकथा’ का विशेष महत्व है।
यात्रा वृत्तांत
यायावर में अनुभव की विविधता होती है यह अनुभव मानवीय विवेक को निर्मित करने में सहायक होते हैं। यात्रा वृत्तांत में सैलानी के अनुभवों की व्याख्या नहीं होती है। सैलानी एक निश्चित दृष्टिकोण के साथ निश्चित दर्शनीय स्थान को देखने जाता है। उसके अनुभव भी शास्त्रीय कोटि के होते हैं। एक यात्री यात्रा में अपने पड़ाव और ठिकानों के उन समस्त बिंदुओं का स्पर्श करने की कोशिश करता है जो वहाँ की प्रकृति, संस्कृति, इतिहास, स्थापत्य, रीति-रिवाज और कलात्मक विशिष्टता के कारण उसे अनुभूत हुए हैं। यात्रा में उल्लास और ऊर्जा का भाव है। यात्री की दृष्टि में सूक्ष्मता, संवेदनशीलता तथा भावुकता की पहचान होती है।
हिंदी में यात्रा वृत्तांत आधुनिक गद्य विधा के रूप में स्वीकृत है। भारतेंदु ने अपने छोटे जीवन काल में देश के विविध क्षेत्रों की यात्रा की थी। उनकी जगन्नाथ यात्रा प्रसिद्ध है। यात्रा वृत्तांत के रूप में उन्होंने कुछ संस्मरण लिखे जिसमें ‘सरयू पार की यात्रा’, ‘लखनऊ की यात्रा’ तथा ‘हरिद्वार की यात्रा’ के नाम से लिखी गई टिप्पणियाँ महत्वपूर्ण हैं। भारतेंदु युग में कुछ विदेश यात्रा के वृत्तांत मिलते हैं। परंतु यह सैलानी के वृत्तांत से कुछ अधिक नहीं हैं। द्विवेदी युग में यात्रावृत्तांत पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे। श्रीधर पाठक की ‘देहरादून शिमला यात्रा’ का उल्लेख यात्रा वृत्तांत के रूप में किया जा सकता है। स्वामी सत्यदेव परिव्राजक इस युग के सर्वाधिक महत्वपूर्ण यात्रा वृत्तांतकार हैं। ‘अमरीका दिग्दर्शन’, ‘मेरी कैलाश यात्रा’ तथा ‘अमरीका भ्रमण’ उनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। ‘मेरी कैलाश यात्रा’ में हिमालय के प्राकृतिक सौंदर्य का मोहक वर्णन मिलता है। ‘यात्रा मित्र’ में लेखक ने यात्रा की कठिनाइयों का वर्णन करते हुए अपने यात्रा वर्णन को रोमांचक शैली में प्रस्तुत किया है।
घुमक्कड़ शास्त्र के लेखक राहुल सांकृत्यायन श्रेष्ठ यात्री रहे हैं। उनके यात्रा वृत्तांत में यात्रा में आने वाली कठिनाइयों के साथ उस स्थान की प्राकृतिक संपदा, उसका आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन तथा ऐतिहासिक अन्वेषण का तत्व उपस्थित होता है। ‘किन्नर देश में’, ‘कुमाऊँ’, ‘दार्जिलिंग परिचय’ तथा ‘यात्रा के पन्ने’ उनके ऐसे ही यात्रा ग्रंथ हैं। राहुल सांकृत्यायन की यह विशेषता है कि उनके यात्रा वृत्तांत में एक-एक सूक्ष्म ब्यौरे को रोचक शैली में दर्ज किया जाता है। देवेंद्र सत्यार्थी ने ‘चाँद सूरज के बीरन’ में लोक संस्कृति तथा लोक साहित्य को गीतात्मक रूप में प्रस्तुत किया है।
अज्ञेय के यात्रा वृत्तांत ‘अरे यायावर रहेगा याद’ और ‘एक बूँद सहसा उछली’ यात्रा साहित्य की महत्वपूर्ण रचना है। ‘अरे यायावर रहेगा याद’ में कवि की सूक्ष्मता, कहानीकार की रोचकता और यात्री के रोमांचक साहस को अज्ञेय ने बहुत ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। ‘एक बूँद सहसा उछली’ में यूरोप और अमरीका की यात्राओं का संस्मरण है। इसमें लेखक ने वहाँ की सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक तस्वीर को यात्रा के अनुभव की गहराई से रचने का प्रयास किया है।
मोहन राकेश का यात्रा वृत्तांत ‘आखिरी चट्टान’ में दक्षिण भारत की यात्राओं का वर्णन है। प्रभाकर द्विवेदी की ‘पार उतरि कहें जइहौं’ यात्रा वृत्तांत की एक सरस कृति है। इसमें स्थानीय बोली का पुट देते हुए बस्ती और गोंडा ज़िले के लोकजीवन को अंकित किया गया है। निर्मल वर्मा के ‘चीड़ों पर चाँदनी’ की चर्चा किए बिना यात्रा वृत्तांत को समाप्त करना अधूरा होगा। ‘चीड़ों पर चाँदनी’ में लेखक ने योरोप की यात्रा का वर्णन किया है। इसमें यात्रा के बहाने वहाँ के इतिहास, दर्शन और संस्कृति से लेखक का सीधा संवाद होता है। निर्मल वर्मा अपनी यात्रा में इतिहास परंपरा और संस्कृति आदि विषयों पर गहराई से अपने विचार व्यक्त करते हैं।
रिपोर्ताज
रिपोर्ताज विधा पत्रकारिता क्षेत्र की विधा है। रिपोर्ट की कलात्मक अभिव्यंजना रिपोर्ताज को साहित्यिक बनाती है। रिपोर्ताज का संबंध वर्तमान से होता है। रिपोर्ताज में यथार्थ की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति होती है।
रिपोर्ताज वर्णन में रचनाकार उत्सव, मेले, बाढ़, अकाल, युद्ध और महामारियों के दुखः सुख को जनता के निकट से देखता है। रचनाकार इन तथ्यों का तटस्थ वर्णन नहीं करके उसे मानवीय संवेदना के अनुकूल प्रस्तुत करता है। जनता के सुखःदुख रिपोर्ताज में आकर हृदयस्पर्शी हो जाते हैं। किसी घटना की प्रामाणिकता को सुरक्षित रखते हुए उसे संवेदनशील रूप में प्रस्तुत करना रिपोर्ताज लेखक का उद्देश्य होता है।
वर्तमान युग विज्ञान का युग है। इस वैज्ञानिक युग में कोई भी कम से कम समय में देश काल की परिस्थितियों, वातावरण आदि से परिचित होना चाहता है। यों तो जनता को समस्त राजनीतिक सांस्कृतिक, सामाजिक, शैक्षिक तथा आर्थिक जगत की ख़बरें समाचार पत्र की रिपोर्ट के माध्यम से सूचित हो जाती हैं। परन्तु उसमें आकर्षण न होने के कारण कोई उन्हें रुचि से नहीं पढ़ता है। ‘रिपोर्ताज’ इन सारी घटनाओं को कलात्मक उपकरणों से सुसज्जित करके इस रूप में प्रस्तुत करता है कि वे अत्यंत प्रभावपूर्ण रुचिकर एवं यथार्थता से परिपूर्ण दिखाई पड़ती हैं। इसी कारण पाठक उसे रुचिपूर्वक पढ़ता है। यह अपने लघु आकार के बावजूद भी समुचित शब्द चयन और मार्मिक प्रस्तुतीकरण के कारण अत्याधिक प्रभावपूर्ण और महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है।
हिंदी साहित्य में रिपोर्ताज लेखन की शुरुआत 1936 के आस-पास हुई थी 1938 में रूपाभ पत्रिका के लिए शिवदान सिंह चौहान का रिपोर्ताज ‘लक्ष्मीपुरा’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। ‘मौत के ख़िलाफ़ ज़िंदगी की लड़ाई’ नाम से चौहान जी का दूसरा रिपोर्ताज हंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। रिपोर्ताज विधा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान रांगेय राघव का है। ‘तूफानों के बीच’ (1946) उनका महत्वपूर्ण रिपोर्ताज संग्रह है। इस रिपोर्ताज में बंगाल के अकाल का मार्मिक चित्रण है। बंगाल का अकाल लेखक के लिए मात्र घटना नहीं है। लेखक उसमें भोक्ता और द्रष्टा भी है। अकाल का चेहरा और भी क्रूर हो जाता है जब अकाल प्राकृतिक विपदा न होकर साम्राज्यवादी शोषण का प्रतिफल बनकर उभरता है। उस अदम्य मानवीय साहस के प्रति लेखक अपनी आस्था को अभिव्यक्त करता है जो उसे विपत्ति से जूझने के लिए प्रेरित करते हैं।
रामनारायण उपाध्याय के रिपोर्ताज ‘गरीब और अमीर पुस्तकों में’ में लेख और जर्नल के तत्व मिले हुए हैं। इसे व्यंग्यात्मक शैली में लिखा गया है। उपेन्द्रनाथ अश्क के रिपोर्ताज ‘रेखाएँ और चित्र’ में संकलित है। ‘ऋण जल धन जल’ तथा ‘नेपाली क्रांति कथा’ फणीश्वरनाथ रेणु के प्रसिद्ध रिपोर्ताज हैं। ‘ऋण जल धन जल’ में बिहार के अकाल प्रभावित सूखाग्रस्त क्षेत्रों का विवरण है तथा ‘नेपाली क्रांति कथा’ में नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना के लिए हुए आंदोलनों का वर्णन है। धर्मवीर भारती के ‘युद्धयात्रा’ में पाकिस्तान के युद्ध का वर्णन है। ‘प्लाट का मोर्चा’ शमशेर बहादुर सिंह की उल्लेखनीय रिपोर्ताज कृति है।
डायरी
डायरी वस्तुतः व्यक्ति की अपनी निजी सम्पत्ति है। किंतु डायरी हस्तलिखित रूप में प्रकाशन के उपरान्त सामान्य पाठक के लिए सुलभ हो जाती है, इस प्रकार उसकी वैयक्तिकता समाप्त हो जाती है। वह साहित्य संसार की सम्पत्ति हो जाती है। डायरी कितनी लोकप्रिय है यह डायरी लेखक की महानता और लोकप्रियता पर निर्भर होता है। वस्तुतः डायरी के पृष्ठों पर डायरी लेखक की आत्मा का प्रकाश होता है। यदि आप किसी के निकटतम होना चाहते हैं, उसके अंतरंग होना चाहते हैं, उसे उसके अंतर्तम से पहचानना चाहते हैं, तो उसकी डायरी के पन्नों को पढ़ें। निश्चित ही आप उसके व्यक्तित्व से भली भाँति परिचित हो जाएँगे। आज डायरी एक नई साहित्यिक विधा बन गई है। डायरी इसलिए डायरी नहीं होती कि उसमें ऊपर रेखा के पास तिथि का उल्लेख रहता है, वरन् डायरी गद्य लेखन की एक विशिष्ट कला है जो लेखक की तीखी प्रतिक्रिया और असामान्य किंतु विशिष्ट रुचि की प्रतीक होती है। उसमें लेखक के आंतरिक संसार का छायाचित्र मिलता है।
स्वतंत्र रूप से डायरी साहित्य की रचना हिंदी में बहुत अधिक नहीं हुई है। फिर भी कई कृतियाँ उल्लेखनीय हैं। घनश्यामदास बिड़ला की डायरी का प्रकाशन ‘डायरी के पन्ने’ नाम से हुआ है। इस विधा की अन्य उत्लेखनीय कृतियों में सुंदरलाल त्रिपाठी की दैनन्दिनी’ डॉ. धीरेंद्र वर्मा की ‘मेरी कालिज की डायरी सियारामशरण गुप्त की दैनिकी’ हैं। मुक्तिबोध की ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में विचारक के मंथन का तनाव प्रकट होता है। शमशेर की डायरी में उनके रोमांटिक मिजाज की अनुभूति मिलती है। मोहन राकेश की डायरी में उनके जीवन संघर्षों का वर्णन मिलता है।
हिंदी का प्रवासी साहित्य :
अवधारणा एवं प्रमुख साहित्यकार
‘प्रवास’ शब्द का एक विशिष्ट अर्थ है। ‘हिंदी शब्द सागर ‘शब्दकोश के अनुसार ‘प्रवास’ का अर्थ है, अपना घर या देश छोड़कर दूसरे देश में रहना, परदेश का निवास। ‘मानक हिंदी कोश के अनुसार प्रवास का अर्थ है- अपनी जन्मभूमि छोड़कर विदेश में जाकर किया जाने वाला वास/यात्रा/सफर। प्रवासी’ शब्द प्रवास का विशेषण है जो मानव प्रवास करने के पश्चात् अपनी मातृभूमि से दूर जाकर दूसरे देश में बस जाता है, उसे प्रवासी कहते हैं। यूँ तो हजारों वर्षों से भारतीयों के प्रवास के प्रमाण मिलते हैं लेकिन वर्तमान में ‘प्रवासी भारतीय’ से अभिप्राय उन भारतवंशियों से है जो परिवार सहित भारत को त्यागकर विदेशों में निवास कर रहे हैं। इन प्रवासी भारतीयों में अपनी संस्कृति, भाषा एवं जन्मभूमि के प्रति प्रगाढ़ प्रेम पाया जाता है। इसीलिए उनकी रचनाओं में भारतीयता का एक निथरा रूप दिखाई देता है। विदेश में प्रवास के कारण दूसरे देश की संस्कृति एवं समाज से उनका परिचय होता है और तब उन्हें अपनी भारतीय विशिष्टिताओं का विश्लेषण करने की एक तर्कपरक विश्लेषणात्मक दृष्टि प्राप्त होती है। प्रवासी भारतीय साहित्य इसी दृष्टि से उपजा हुआ साहित्य है।
विभिन्न देशों का प्रवासी भारतीय साहित्य
साहित्य लेखन के इतिहास, साहित्यिक कृतियों की मात्रा व अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से प्रवासी भारतीय साहित्य को दो प्रमुख भागों गिरमिटिया देशों एवं विकसित् देशों के आधार पर वर्गीकृत कर मूल्यांक्ति किया जा सकता है।
गिरमिटिया देशों का प्रवासी भारतीय साहित्य- मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद व टोबैगो, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को गिरमिटिया देश कहा जाता है, जो मूलतः ब्रिटेन के उपनिवेश थे। इन देशों में अँग्रेज़ों ने कृषि व अन्य आर्थिक गतिविधियों के संचालन हेतु सस्ते श्रमिकों को ले जाने के लिए ‘एग्रीमेण्ट’ व्यवस्था लागू की थी। ‘गिरमिट’ शब्द वस्तुतः ‘एग्रीमेण्ट’ शब्द का ही विकृत रूप है। इस शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार करते हुए डॉ. विवेकानंद शर्मा का कथन है- अँग्रेज़ इन्हें खेती तथा अन्य कार्य कराने के लिए ‘कुली’ के रूप में ले जाते थे। इसके लिए पाँच वर्षों का ‘एग्रीमेण्ट’ कराया जाता था, जिसे उच्चारण की सुविधा के लिए प्रवासी भारतीयों ने ‘गिरमिट’ में रूपान्तरित कर लिया इस प्रकार बाहर ले जाए जाने वाले इन प्रवासी भारतीयों में ‘गिरमिटिया’ कहा जाने लगा।
मॉरीशस - मॉरीशस को ‘लघु भारत’ के रूप में भी सम्बोधित किया जाता है क्योंकि वहाँ भारतीय सभ्यता, संस्कृति, जीवन मूल्य, रहन-सहन, खान-पान आज भी लगभग अपने मूल स्वरूप में विद्यमान है। मॉरीशस का प्रथम भारतीय लेखक पण्डित आत्मा राम विश्वनाथ को माना जाता है जो ‘हिन्दुस्तानी’ पत्र का संपादन करने सन् 1912 में वहाँ पहुँचे थे। मॉरीशस की आरंभिक हिंदी कहानियों में सूर्यप्रसाद मंगर भगत की कहानी ‘विनाश’, वली मोहम्मद की कहानी ‘अनबोलती चिड़िया, प्रो. बासुदेव विष्णु दयाल की कहानी ‘लुईज’, पं. तारकेश्वरनाथ चतुर्वेदी की कहानी ‘इन्दो’ तथा पं. जय प्रगास शर्मा की कहानी ‘तारा’ आदि सम्मिलित है। डॉ. वीरसेन जागासिंह ने अपने शोध के आधार पर ‘तारा’ को मॉरीशस की प्रथम भारतीय कहानी स्वीकार किया है। मॉरीशस की पहली हिंदी कविता ‘गणेशी’ उपनाम धारी कवि द्वारा लिखित कविता ‘होली’ को माना जाता है। उपन्यास लेखन का आरंभ कृष्णलाल बिहारी के सन् 1960 में प्रकाशित ‘पहला कदम’ नामक उपन्यास से माना जाता है। उपन्यास लेखन में अभिमन्यु अनत को विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त है, उन्हें ‘मॉरीशस का प्रेमचंद’ जैसी उपाधि से भी विभूषित किया गया है। इस संबंध में डॉ. कमल किशोर गोयनका का कथन उल्लेखनीय है- वे ही एकमात्र ऐसे हिंदी लेखक थे, जिन्होंने प्रवासी भारतीय के रूप में सर्वाधिक साहित्य लिखा था तथा जो भारत और मॉरीशस की आत्मा को जोड़ने वाले साहित्य-सेतु थे। भारत के पाठकों का संबंध अभिमन्यु के साहित्य से दो शरीर एक आत्मा’ वाला हो गया था, क्योंकि इतिहास की यातनाएँ और मुक्ति की आकांक्षा एवं संघर्ष लगभग एक-सा ही था। प्रेमचंद और अभिमन्यु में यही समानता है कि दोनों ही धरती के लेखक हैं तथा वे अपने देश की जन-पीड़ा और जनमुक्ति के लेखक हैं। इस कारण वे मॉरीशस के प्रेमचंद हैं।
इस देश के प्रसिद्ध साहित्यकारों में जय नारायण राय, ब्रजेन्द्र कुमार भगत ‘मधुकर’, मुनीश्वर लाल चिन्तामणि, लक्ष्मी नारायण चतुर्वेदी. ‘रसांपुज’, मोहन लाल ब्रजमोहन, रामदेव धुरन्धर, भानुमति नागदान, प्रहलाद रामशरण, विष्णुदत्त मधु, सूर्यमंगर भगत, जयश्री दोसिया, हरिनारायण सीता, दीपचंद बिहारी, अजमिल माताबदल, गिरिजानन रंगू, राजरानी गोबिन, हेमराज सुंदर, धनराज शम्भू, धर्मवीर घूरा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
फिजी
फिजी में बसे भारतीय अपने साथ विभिन्न धार्मिक व साहित्यिक ग्रन्थ लेकर आए थे, जिनका अध्ययन एवं मन्न उनके दैनिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गया इस कारण भारत के साथ उनका लगाव आज भी उसी रूप में विद्यमान है। फिजी के प्रवासी भारतीयों की इस विशिष्टता को रेखांक्ति करते हुए शरद कुमार लिखते हैं भगवान राम की यह प्रजा अपने साथ मुल्ला दाऊद की ‘चन्दायन’, जायसी की ‘पदमावत’ और तुलसी की ‘रामचरित मानस’ की भाषाई संस्कृति अपने साथ लेकर जा रही थी।
फिजी में हिंदी साहित्य का विकास मॉरीशस जैसा नहीं हो पाया, जिसका कारण स्थानीय परिवेश एवं प्रकाशन की सुविधाओं का अभाव आदि है। इसके बावजूद इस देश में हिंदी व हिंदी साहित्य निरंतर समृद्ध हो रहे हैं। फिजी के प्रथम भारतीय लेखक के रूप में तोताराम सनाढ्य को जाना जाता है, जिन्होंने अपने इक्कीस वर्षों के फिजी प्रवास के अपने अनुभवों को सन् 1914 में फिजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष, नाम पुस्तक में अंकित किया। जोगिन्दर सिंह कंवल फिजी के अत्यंत प्रसिद्ध साहित्यकार हैं, जिन्हें उनके साहित्यिक अवदान के लिए ‘फिजी के प्रेमचंद’ उपाधि से विभूषित किया गया है जबकि कमला प्रसाद मिश्र को इस देश का राष्ट्रकवि होने का गौरव प्राप्त है। इस देश के प्रवासी साहित्य को दशा और दिशा प्रदान करने में एक उल्लेखनीय नाम डॉ. विवेकानंद शर्मा का है। फिजी के अन्य महत्त्वपूर्ण भारतीय साहित्यकारों में पण्डित कमला प्रसाद, अमरजीत कंवल, सरस्वती देवी, बाबूराम ‘अरुण’ रामनारायण गोविन्द, काशीराम कुमुद, सलीम बख्श, ईश्वर प्रसाद चौधरी, पं. हरीश शर्मा, महावीर मिश्र, महेश चंद्र शर्मा, ए. ए. शमीम, चंद्रदेव सिंह, सुखराम, विजयेन्द्र सुधाकर, आर. एस. प्रसाद मुनि आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
सूरीनाम
सूरीनाम भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों से सूरीनाम जाने वाले भारतीय अपने साथ अपनी भोजपुरी, अवधी आदि बोलिया भी ले गए थे। वे स्थानीय भाषा का प्रयोग करते समय इन बोलियों के विभिन्न शब्दों का का भी प्रयोग करने लगे। इस कारण भाषा का एक मिला-जुला स्वरूप सामने आया जिसे ‘सरनामी हिंदी’ अथवा ‘सरनामी’ नाम दिया गया है। सरनामी हिंदी भोजपुरी, अवधी, मगही, ब्रज, डच, अँग्रेज़ी, उर्दू आदि का मिश्रण है जो आज सूरीनाम में जन साधारण की भाषा है।
सूरीनाम में सरनामी हिंदी संचार का ही माध्यम नहीं है, बल्कि साहित्य सृजन का भी माध्यम है। इस प्रकार सूरीनाम में हिंदी व सरनामी हिंदी दोनों ही भाषाओं में साहित्य लेखन की एक समृद्ध परंपरा का निर्माण हुआ है।
सूरीनाम के प्रथम भारतीय कवि मुंशी रहमान खान को स्वीकार किया जाता है। सूरीनाम में हिंदी साहित्य का लगभग सभी विधाओं में निरंतर सृजन हो रहा है, जिसमें काव्य लेखन एक प्रमुख विधा के रूप में स्थापित है। सूरीनाम के महत्त्वपूर्ण लेखकों में प्रेमानंद भोंदू पण्डित सूर्यप्रसाद वीरे, रामदेव रघुवीर, जीतनाराइन, सुरजन परोही, आशा राजकुमार, संध्या भग्गू, अमर सिंह रमण, रामनारायण झाव, पं. हरिदेव सहतू, पं. रामाधार वैदिक संस्कराचार्य, सतनाराइन सिंह बलदेव, चंद्रमोहन रणजीत सिंह, राजमोहन, महादेव खुनखुन, अमित अयोध्या, तेज प्रसाद खोई, मार्तिन हरिदास लछमन, उषा गोपी, पण्डिता सुशीला बलदेव मल्हू, तेज प्रसाद खेदूर, सुशीला सुक्खू, देवानंद शिवराज, धीरज कंघई, रामदेव महाबीर चांदनी आदि के नाम आते हैं।
त्रिनिदाद व टोबैगो
त्रिनिदाद व टोबैगो इस देश में बसे भारतवंशियों ने हिंदी एवं भारतीय संस्कारों को संजोकर रखा है। इन्होंने अपनी रचनाओं में भारतभूमि की स्मृतियों को सहेजकर रखा है और इनके साहित्य में भारतीयता का एक विशिष्ट रूप दिखता है।
इस देश के प्रमुख साहित्यकार प्रो. हरिशंकर आदेश हैं, जिन्होंने साहित्य की लगभग हर विधा में साहित्य सृजन किया है। उनके महत्त्व को रेखांक्ति करते हुए डॉ. कमल किशोर गोयनका का कथन है, प्रो. आदेश की लगभग तीन सौ पुस्तकें छपी है- चार महाकाव्य (अनुराग, शकुन्तला, महारानी दमयन्ती व निर्वाण), अठारह खण्ड काव्य, मुक्तक की पचास पुस्तकें, ग्यारह कहानी संग्रह, दो उपन्यास, इकतीस नाटक, चार निबंध संग्रह, संगीत की तिरानबे पुस्तकें आदि। प्रो. हरिशंकर आदेश हिंदी के प्रवासी साहित्य में सर्वाधिक साहित्य की रचना करने वाले साहित्यकार हैं। महाकवि तो एक वही है और उनका साहित्यिक योगदान भी बहुत अधिक है। इस देश के अन्य प्रमुख साहित्यकारों में छोटकन लाल, कुमार सत्यकेतु, सुरेन्द्रनाथ जीवन महाराज, हीरामन फिलिप, हरी मानिक, लायड सिरजू, आर. एल. लखीराम, विष्णु बुधान, लखन साव, आइवन बिसेसर, जीतराम समूज, जॉन जोसेफ कांगली, तेज सिंह रामलखन, रिखी महाराज, आशा मोर, राधिका रघुवीर, कमला रामलखन, उषा प्रीतिमति बुडूसिह, इना बख्श, माला महाराज, फूलमति मानिक सिंह, जगजीत कौर वालिया, इन्द्रा रामलखन, डॉ. रामदत्त रामकिसुन, लीला गणेश, जेन्सी सम्पत, विष्णु बन्धान, कुआरी जोगी हुक्की आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
इन गिरमिटिया देशों के अतिरिक्त गुयाना व दक्षिण अफ्रीका में भी भारतवंशियों द्वारा निरंतर साहित्य सृजन किया जा रहा है।
विकसित् देशों का प्रवासी भारतीय साहित्य-
ब्रिटेन
ब्रिटेन में प्रवासी हिंदी साहित्य लेखन का आरंभ प्रेमचंद के समकालीन डॉ. धनीराम प्रेम की कहानियों से हो गया था। उनके द्वारा रचित् विभिन्न कहानियों को भारतीय पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया ब्रिटेन में प्रवासी भारतीयों द्वारा रचित् साहित्य ने नब्बे के दशक में अपनी पहचान बनानी शुरू की। ब्रिटेन में हिंदी साहित्य लेखन का आरंभ कविता लेखन से हुआ, जिसमें रमा भार्गव का 1985 में प्रकाशित काव्य संग्रह प्रवास की ‘प्रतिछाया’ नामक काव्य संग्रह उल्लेखनीय है। ब्रिटेन में कथा साहित्य का सृजन बीसवीं शती के अंत में आरंभ हुआ। इस संबंध में ब्रिटेन के प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी पुस्तक देशान्तर की भूमिका में लिखा है। 1999 तक ब्रिटेन के किसी भी हिंदी लेखक का अपना कहानी संकलन नहीं प्रकाशित हुआ था। ब्रिटेन का पहला संकलित कहानी संग्रह मिट्टी की सुगंध’ (संपादक-उषा राजे सक्सेना) का प्रकाशन 1999 में हुआ। इसके पश्चात् हिंदी साहित्य लेखन के लिये उपयुक्त साहित्यिक परिवेश निर्मित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप हिंदी साहित्य लेखकों की एक बड़ी संख्या उभरकर सामने आई, जिनमें सत्येन्द्र श्रीवास्तव, कृष्ण कुमार, निखिल कौशिक, नरेश भारतीय, प्राण शर्मा, निखिल कौशिक, भारतेंदु विमल, गौतम सचदेव, रमा भार्गव, उषाराजे सक्सेना तेजेन्द्र शर्मा, दिव्या माथुर, कीर्ति चौधरी, शैल अग्रवाल, जकिया जुबैरी, कादम्बरी मेहना, कृष्णा अनुराधा, नीना पॉल, पुष्पा भार्गव, तोषी अमृता, राधाकांत भारती, जय वर्मा, अचला शर्मा जयन्ती प्रसाद, विजय नायर, प्रतिमा डावर आदि के नाम महत्त्वपूर्ण हैं।
अमेरिका - अमेरिका में हिंदी साहित्य का आरंभ साठ के दशक से माना जाता है। इस संबंध में प्रवासी साहित्यकार सुषम बेदी का मत है- अमेरिका का हिंदी कथा साहित्य साठ के दशक में प्रकाश में आया, जब त्रिवेणी (उषा प्रियंवदा, सोमा वीरा, सुनीता जैन) ने विश्व में अमेरिका के कथा साहित्य से परिचित् कराया। साठ के दशक में त्रिवेणी की लेखनी में अमेरिकी जीवन की झलक साफ़ दिखाई देती है। इन्होंने भारतीय हिंदी साहित्य का परिचय एक ऐसे कथा-संसार से करवाया, जो इससे पहले हिंदी साहित्य में अनजाना था। अमेरिका में कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, यात्रा वृत्तांत व निबंध जैसी विभिन्न साहित्यिक विधाओं में साहित्य लेखन हुआ है। इस देश के प्रमुख साहित्यकारों में सुदर्शन प्रियदर्शिनी, शशि पाधा, इला प्रसाद, डॉ. सुधा ओम ढींगरा देवी नागरानी, अनिल प्रभा कुमार, सोमावीरा, पुष्पा सक्सेना, डॉ.अंजना संधीर, रेखा मैत्र, कल्पना सिंह चिटनिस, पूर्णिमा गुप्ता, लावण्या दीपक शाह, डॉ. अनीता कपूर, राजश्री, उषा देवी विजय कोल्हटर, डॉ. वेदप्रकाश, ‘बटुक’, रामेश्वर अशान्त, गुलाब खण्डेलवाल, सुषमा मल्होत्रा, डॉ. भूदेव शर्मा देवेन्द्रनाथ शुक्ल, हरि बी. बिन्दल, श्याम नारायण शुक्ल, अमरेन्द्र कुमार, नरेंद्र कुमार सिन्हा आदि के नाम उल्लेखनीय है।
कनाडा- कनाडा में हिंदी भाषा और प्रवासी हिंदी साहित्य एवं उसके प्रचार-प्रसार में लगी संस्थाओं के महत्त्व का वर्णन करते हुए डॉ. कमल किशोर गोयनका का कथन है- अमेरिका से जुड़े कनाडा में भी हिंदी भाषा और साहित्य प्रवासी भारतीयों को एकसूत्र में बांधता है और वहाँ भी हिंदी साहित्य की रचना एवं हिंदी तथा पंजाबी आदि भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार का अनुकूल वातावरण बन गया है।. वहाँ ‘हिंदी परिषद’, ‘क्यूबेक हिंदी संघ’, ‘विश्व हिन्दू परिषद’, हिंदी साहित्य परिषद’, ‘नागरी प्रचारिणी सभा’, ‘सद्भावना हिंदी साहित्यिक संस्था आदि कई संस्थाएँ हिन्दू धर्म, संस्कृति एवं हिंदी भाषा साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए वर्षों से कार्य कर रही हैं।
स्नेह कुमार कनाडा के प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार हैं, जिन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन कार्य किया है। वे सन् 2004 से ‘वसुधा’ पत्रिका का प्रकाशन कर रही है, जिसमें उन्होंने न केवल कनाडा अपितु विश्व में फैले हुए हिंदी रचनाकारों की रचनाओं को समय-समय पर प्रकाशित किया है। इसके अतिरिक्त शैलजा सक्सेना, डॉ. हंसादीप, नरेंद्र भागी, प्रो. सरन घई, ललित अहलूवालिया, भगवतशरण श्रीवास्तव, डॉ. रत्नाकर नराले, कृष्ण कुमार सैनी, समीर लाल, जसवीर कलरवी, भारतेंदु श्रीवास्तव, सन्दीप त्यागी, हरदेव सोढ़ी, सुमन कुमार घई, अमर सिंह जैन, दीप्ति अचला कुमार, मधु वाष्र्णेय, इन्द्राधीर वडेरा तथा भुवनेश्वरी पांडेय आदि कई साहित्यकार हित्यकार हैं हैं जो जो निरंतर अपने रचना कर्म से हिंदी भाषा एवं साहित्य की सेवा कर रहे हैं।
इन देशों के अतिरिक्त अफ़्रीका, यूरोप व एशिया के अन्य देशों के साथ खाड़ी देशों में भी हिंदी साहित्य का सृजन हो रहा है। जिनके संबंध में शोधपरक लेखन का अभाव है और जिनकी संख्या अभी अल्प ही है। इस कारण प्रस्तुत पाठ में उस पर विचार नहीं किया गया है।
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