रघुराजसिंह की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 26
उर अनुपम उनको लसै, सुखमा को अति ठाट।
मनहु सुछवि हिय भरि भये, काम शृंगार कपाट॥
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यदुपति कटि की चारुता, को करि सकै बखान।
जासु सुछवि लखि सकुचि हरि, रहत दरीन दुरान॥
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यदुपति नैन समान हित, ह्वै बिरचै मैन।
मीन कंज खंजन मृगहु, समता तऊ लहै न॥
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हरिनासा को सुभगता, अटकि रही दृग माँह।
कामकीर के ठौर की, सुखमा छुवति न छाँह॥
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युगल जानु यदुराज की, जोहि सुकवि रसभीन।
कहत भार शृंगार के, सपुट द्वै रचि दीन॥
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