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महादेवी ते मिले हो?

mahadevi te mile ho

अमृतलाल नागर

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महादेवी ते मिले हो?

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और अधिकअमृतलाल नागर

    काव्य व्यक्तित्व के अतिरिक्त महादेवीजी के दर्शन भी पहले मुझे ‘चाँद’ ही के माध्यम से हुए थे। एक चित्र की स्मृति अब तक सजीव है, महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान और चंद्रावती लखनपाल का चित्र छपा था। यह त्रिपुटी उन दिनों बहुत प्रसिद्ध थी। चंद्रावती जी आज विस्मृति के गर्भ में विलीन हो चुकी है।

    हिंदी, बंगला, गुजराती और मराठी की कविताएँ अब भी बड़े चाव से पढ़ता हूँ। देवनागरी लिपि में प्रकाशित उर्दू काव्य पढ़ने का चस्का भी 'चाँद' ही की कृपा से लगा था और अब तक है। पहले हिंदी भाषा के अनेक नए पुराने कवियों की बहुत-सी कविताएँ मैंने याद भी की थी। महादेवी जी की 'मैं नीर भरी दुख की बदली', 'अश्रुमय कोमल, कहाँ तू गई परदेशिनी री' मैंने बहुत दिनों तक गुनगुनाई।

    यह सब होते हुए भी उनके साक्षात् दर्शन पाने का सौभाग्य मुझे सन् '42-'43 से पहले मिल सका। अगस्त-आंदोलन वे कुछ महीनों बाद बबई से घर गया था और वहाँ से निराला जी के दर्शन करने प्रयाग। उन दिनों वे गैरिकवस्त्रधारी थे।

    महादेवी ते मिले हो? उन्होंने पूछा। मेरे नकारने पर बोले चलो।

    इस प्रकार वर्षों की साघ पूरी हुई। स्मृतिपट पर अब सब कुछ अंकित नहीं रह गया। तीन बातें याद हैं। एक महादेवी जी की हँसी। ऐसा लगता था कि जैसे उनके साथ-साथ उनके भीतर वाली कोई शक्ति उनसे हँसने में होड़ ले रही हो। हम लोग आमतौर पर फुहारे की ऊपरी खिलखिलाहट को देखकर ही प्रसन्न होते है, उसके स्रोत का उल्लासमय वेग नहीं देखते। गीत में शब्द और राग दोनों ही की अपनी-अपनी महिमा भी है, भले ही गायक के मधुरकंठ रूपी व्यक्तित्व के प्रभाव से वे एक रूप होकर झलके और उस प्रभाव की महिमा अनन्य हो।

    दूसरी बात फ़िल्मों से संबंधित थी। आदरणीय भाई वाचस्पति जी पाठक उन्हें शायद कुछ ही दिन पहले यह बतला गए थे कि मैंने 'संगम' नामक एक तत्कालीन फ़िल्म में प्रसाद जी का एक गीत ('अरे वही देखा है तुमने मुझे प्यार करने वाले को') प्रयुक्त किया है। बहने लगी निराला जी और पंत जी के गीतों को भी फ़िल्मों में लेना चाहिए।

    तीसरी बात अगस्त सन् '42 वे' आंदोलन से संबंधित थी। अँग्रेज़ सरकार ने 'भारत छोड़ो' आंदोलन को बड़ी बेरहमी से कुचला था। महादेवी जी उन दिनों ग्राम-सेवा-व्रत-धारिणी थी। अपने अनुभव, दमनचक्र से भयभीत दीन-हीन किसानों की दशा का वर्णन करते-करते एकाएक चुप हो गईं फिर कहने लगी हमारा आंदोलन अब शायद अनेक वर्षों तक अपनी शक्ति पा सकेगा।

    इसके बाद प्रयाग जाने पर उनसे कई बार मिला। उसी दौर में कब से मैंने उन्हें जीजी कहना शुरू कर दिया यह अब याद नहीं जाता।

    जीजी फिर एम० एल० सी० हो गईं। उनके लखनऊ आने-जाने में बानक स्वाभाविक रूप से बनने लगे। जब आती, विधायक-निवास से उनका टेलीफ़ोन-संदेश मुझे मिलता, मैं दर्शन करने जाता।

    स्व० पंडित गोविंद वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश की राजगद्दी छोड़कर दिल्ली की गद्दी सम्हालने जा रहे थे। विधायक-निवास के 'कामन रूम' मे लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों की ओर से उनका विदाई समारोह मनाया गया था। कत्थक नटवरी नृत्य सम्राट थी शंभू महाराज ने अपने नृत्य-प्रदर्शन से सभी को मुग्ध किया। जीजी भी उस समारोह में थी। मुझ पर जीजी का रौब ग़ालिब देखकर समारोह में बाद महाराज उनके पास गए और कहने लगे देखिए, आप नागर जी को डाँटिए। ये मेरा काम नहीं करवा देते। जीजी ने महाराज की तसल्ली के लिए मुझे तुरंत ही डाँटा। यह बात अभी कुछ ही महीनों पहले लखनऊ रेडियो केंद्र के एक 'स्टॉफ़ आर्टिस्ट' संगीतकार ने प्रसंगवश सुना कर मेरी याद ताज़ा की थी। इसके बाद—

    सन्-संवत् ठीक-ठीक याद नहीं, शायद '54 या '55 की बात है, मगर यह याद है कि जून का अंतिम सप्ताह था। धर्मवीर भारती साहित्यकार संसद द्वारा ताकुला-नैनीताल में आयोजित ग्रीष्म शिविर के कार्यक्रमों में भाग लेकर सीधे लखनऊ, मेरे यहाँ आए थे। मैंने वहाँ वे हाल-हवाल पूछे। भारती बोले वह सब भी सुनाऊँगा पर पहले जीजी का एक आदेश सुन लीजिए। आपको पंद्ररह दिनों के अंदर भारतेंदु जी की जीवनी पर आवारित एक नाटक लिखना है। नाटक लिखकर तुरंत इलाहाबाद आजाइए। भारतेंदु जी की जंयती के दिन 'रंगवाणी' का उ‌द्घाटन समारोह होगा। समय कम है। नाटक का दिग्दर्शन भी आप ही को करना है।

    जुलाई मध्य तक नाटक लिखकर में इलाहाबाद पहुँच गया और टैगोर-टाउन में भारतभूषण अग्रवाल ने यहाँ डेरा डाल दिया। उन दिनों पंत जी भी टैगोर-टाउन ही में रहते थे। उनका तथा बालकृष्ण राव जी का घर भारत के घर के पास ही था। शाम को पंत जी के घर पर हम सब इकट्ठा हुए, जीजी भी वहीं गई। नाटक सुना गया, सबको पसंद भी आया। जीजी बोली नाटक अच्छा है पर इसे रंगमच पर भी अच्छा सिद्ध होना चाहिए। मामा (वरेरकर) बतलाते थे मराठी का रंगमच बहुत विकसित है। मैं उन्हें तो बुला ही रही हूँ पर और भी अन्य भाषाभाषी नाटककारी को बुलवाना चाहती हूँ।

    मैंने कहा, मैं अपनी भरसक कोई कसर रखूँगा, आगे भगवान् नटराज मालिक है।

    रात में घर आकर इलाहाबाद में रंग कलाकारों के संबंध में भारतभूषण से मिस्कोट की। वे उन दिनों आकाशवाणी में काम करते थे। इलाहाबाद से पहले लखनऊ केंद्र में थे। रेडियो का ड्रामा-प्रोड्‌यूसर होने से पहले भी अपने रेडियो नाटकों में रिहर्सल मैं स्वयं ही कराने जाता था। भारत मेरी रुचि और आवश्यकताओं को भलीभाँति समझते थे। पात्रों के चुनाव में उनकी सलाह आमतौर से बेचूक हुआ करती थी। सब पात्रों का चुनाव हो गया। अब बचे स्वयं भारतेंदु। वे समस्या बन गए। मैंने कहा बाह्य रूप से मेकअप में तो उसे भारतेंदु लगना ही चाहिए पर उनके अतः व्यक्तित्व का निरुपण भी उसे ख़ूबी से करना चाहिए। यह पहली शर्त है। तभी मेरी जीत होगी। मैं 'लगभग सच्चे' तक समझौता करने को राज़ी था पर इसके बाद नहीं। मैंने कहा, मन का कलाकार मिलने पर मैं नया नाटक लिख दूँगा और वह भी इस तरह से कि मंच पर भारतेंदु की अनुपस्थिति ही नाटक ने इंच-इंच में उनकी उपस्थिति का आभास करा दे। भारत बोले आप मेरी बात मानिए, विजय बोस को 'ट्राई' कर लीजिए। वह लगभग सच्चे वाली आपकी शर्त पूरी कर देंगे। यदि आपको रिहर्सल में संतोष हो तो फिर दूसरा नाटक लिख लीजिएगा।

    उस चिंता भरी रात के बाद का सवेरा भी याद रखने लायक बन गया। लगभग साढ़े आठ नौ बजे पंतजी पधारे। पहले तो वे नाटक और उसके लिए मेरी जालीदार पर्दे वाली तरकीब की प्रशंसा करते रहे फिर हँसकर कहा वधु बुरा मानिएगा, महादेवी जी को आपके भाँग के गोलों की बड़ी चिंता है। कहने लगी कि भाँग-वाँग पीके सो गए और नाटक भी तैयारी में कसर रह गई तो बड़ी बदनामी होगी। मैंने उनसे कह दिया है वधु कि आप वधु की तरफ़ से बिल्कुल चिंता करे। मैं उन्हें बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ। पर आपसे भी कहता हूँ वधु, आजकल ज़रा गोले-वोले कम चटाइएगा। और कुछ नहीं तो नही तबियत ही ख़राब हो जाए।

    मुझे बड़ी ज़ोर से हँसी आगई। पंतजी से, मर्यादाबद्ध रहते हुए भी मैं मुक्त रूप से हँसी-मज़ाक कर लेता हूँ, पर जीजी होने के बावजूद महादेवी जी से मेरा तब परिचित मात्र होने ही का नाता था। पंतजी की इस बात के पीछे मुझे जीजी का मनोचित्र उभरता दिखलाई दिया। स्वप्नवादिनी तो वे है ही साथ ही अपने सपनों को साकार करने के प्रति वे बढ़ी लगन हठीली भी हैं। प्रयाग महिला विद्यापीठ इसका प्रमाण है। मूल रूप में निराला जी को महल देने में लिए ही उन्होंने साहित्यकार संसद की योजना बना डाली और उसे साकार करके ही दम लिया। हिंदी रंगमच की पुनर्स्थापना या स्वप्न उन दिनों उनके मनोलोक पर छाया हुआ था। लखनऊ में भारती से होने वाली बातें उस समय मेरे मन में फिर गूँज उठी। मैंने उसी दिन जाकर जीजी को अपनी ओर से दानामुक्त कर दिया। वहाँ भी ख़ूब हँसी रही। ख़ैर, दो-तीन रोज़ के भीतर ही जीजी यह जान गई कि उनका रंगवाणी का सपना मेरा अपना सपना भी है।

    मैं इस नाटक में नटराज उदयशंकर जी से सीखी हुई जालीदार पर्दे की, उस समय के हिसाब से नई, एक तरकीब का प्रयोग करना चाहता था। अपने बड़े बेटे चि० कुमुद से दो छोटे-छोटे नमूने में पर्दे रंगवाकर मैं साथ लाया था और पंतजी के घर पर जीजी, राव साहब (श्री बालकृष्ण राव) और उमाजी को उसका करिश्मा दिखला चुका था। जीजी को पर्दे की तैयारी के संंबंध में शंका थी, कहने लगी देखो। जैसा तुम चाहते हो वैसा बन जाए। इलाहाबाद तो बंबईं नहीं है।

    पेंटर की तलाश हो रही थी पर राय साहब का मन भर नहीं रहा था। एक दिन उमाजी कहने लगी महादेवी जी कह रही थी कि ट्रिक वाले पर्दे का मोह छोड़ ही दिया जाए तो अच्छा होगा। अगर ख़राब बना तो नाटक पर उसका दुष्प्रभाव भी निश्चित रूप पड़ेगा। लेकिन यहाँ मैं आसानी से समझौता करने को राज़ी हुआ। राव साहब की शरण गही कि यह तो नाक का सवाल है, हमारी भी और आपकी भी। इलाहाबाद भले ही बंबई हो पर रेगिस्तान भी नही है। राव साहब की लगन भी जाग उठी। दो-तीन दिनों तक पेंटर की खोज में वे इलाहाबाद का आकाश-पाताल एक करते रहे और अंत में बंबई के एक फ़िल्म स्टूडियो में नाम कर चुकने वाले एक रंगसाज़ को ही उन्होंने इलाहाबाद की गलियों से खोज निकाला।

    शौकिया रंगमच के कलाकारों को आमतौर से नाटक के 'टका' आयोजकों से यह शिकायत बनी ही रहती है कि रिहर्सल के दिनों में वे लोग कलाकारों के चाय-नाश्ते का प्रबंध उनके मनोनुकूल नहीं कराते। लेकिन यहाँ तो स्वयं महादेवी जी ही 'मालिक्-कंपनी' थी। नाश्ता कराने में लिए वे स्वयं आती थी। अपने-अपने दफ़्तरों से सीधे रिहर्सल-स्थल पर आने वाले कला के भूतों को ऐसा संतोष कभी और कहीं नहीं मिला था। पर मेरे लिए जीजी के कारण एक परेशानी भी पैदा हो गई। जलपान कराने के बाद वे रिहर्सल देखने के लिए बैठ जाती थी। उनके रौब के मारे मेरे कलाकार काठ हो जाते थे। यह तमाशा दो दिनों तक चला। मैं घबराया, पर यह घबराहट ऊपरी थी, मन को यह विश्वास था कि यदि जीजी से कहूँगा तो वे बुरा नही मानेंगी। और अपनी विपदा मैंने उनसे निवेदित भी कर दी। कहने लगी अच्छा भाई, कल से नहीं बैठूँगी। पर नाटक के दिन तो बड़े-बड़े साहित्यिक आएँगे। तुम्हारे कलाकार जब मुझी से इतना घबराते हैं तो उस दिन क्या होगा?

    मैंने कहा मुँह पर रंग पोतते ही अभिनेता शेर हो जाता है। उस दिन की च़िंता आप करें।

    दूसरे दिन हम लोगों को जलपान कराने के बाद जीजी तुरंत उठ खड़ी हुई। किसी ने कहा भी कि थोड़ी देर विराजें, परंतु आप मेरी ओर देखकर हँसते हुए बोली ना भाई, ये मुझे मना कर चुका है। कहता है कि कलाकार मेरी उपस्थिति के रौब से घबरा जाते हैं। 'रोब' शब्द उच्चरित करते करते उनकी हँसी का झरना झर पड़ा।

    मैंने अभिनेताओ को ललकारा। हमारी टोली वे कलाकार सचमुच ही इलाहाबाद के नौरतन थे। जीजी की हँसी मेरे हाथ में चुनौती भी तलवार बनकर खेली। और फिर तो ऐसा रिहर्सल जमा है कि मज़ा गया। एक दृश्य देखकर जीजी मगन मन गई। उस दिन के बाद से जलपान लेकर आना भी छोड़ दिया। जलपान-व्यवस्था के लिए कभी उमा जी, कभी दो लड़कियाँ और गंगाप्रसाद जी पांडेय तथा कभी-कभी राव साहब तब उनकी आर से बराबर उपस्थित होते रहे। वे स्वयं 'ग्राड रिहर्सल' के दिन ही हाल में पधारी। हम शौक़िया रंगमच के गुनाह बेलज़्ज़त ठोकरें खाने वाले प्रेमी जना की क़ौम को ऐसा 'मालिक कंपनी हाज़ा' बड़े नसीबों, वही मुश्किल से मिलता है।

    ग्राड रिहर्सल के दिन वही हुआ जिसका कि जीजी को भय था, अर्थात पर्दा अपना पूरा जादू दिया सका। अनिवार्य गड़बड़िया का देखने में निमित्त ही से मैं अपने द्वारा प्रदर्शित नाटकों के ग्राड रिहर्सल भी भीतर नहीं बैठा करता था। मैं दर्शकों में सबके पीछे अपनी काग़ज़ पेंसिल संभाले बैठा था। नाटक पूरा होते ही अगली पंक्ति में मराठी के मूर्धन्य नाटककार स्व० मामा वरेरयर जी के साथ बैठी हुई जीजी के पास आया। उनका चेहरा उतरा हुआ। मैंने कहा 'चिंता करें, जो आज देखा है वह पल देखें इसीलिए आज ही देख लिया। मेरा तो यही अभीष्ट था पर आप लोगा जैसी कला-मर्मज्ञ महान विभूतियाँ भी भीड़ के साथ बेटिकट का तमाशा देखने घुस आई तो भला बतलाइए मैं क्या करूँ?'

    मेरी विदूषकता से वातावरण कुछ बदल गया। मामा से मेरा घनिष्ट परिचय था। उनकी उपस्थिति में प्रदक्षित कमज़ोरियाँ के कारण जीजी में मन पर एक प्रकार की झेप सी चढ़ी हुई थी। मैं उनके मन को पहचान गया। मैंने कहा कलाकारों की छोटी-मोटी चूकें बस आपको दिखाई देगी।

    'यह तो मैं भी समझती हूँ। अभिनेताओं से विशेष शिकायत आज नहीं है। सब ने अच्छा काम किया। कल शायद और भी अच्छा करेगे। पर तुम्हारा पर्दा अंतिम दृश्य में तो सचमुच बड़ा बुरा लगता है। दृश्य की करुणा को ही आघात पहुँचाता है। यह तो बहुत ही बुरा लगता है। एक प्रयोग किया, नहीं सफल हुआ, यह भाई लज्जा या दुःख की बात नहीं पर उसका प्रदर्शन करके नाटक का रंग बिगाड़ना तो ठीक नहीं है। इससे तुम लोग के कठिन परिश्रम के प्रति भी अन्याय होता है और दर्शकों के प्रति भी। तुम सादे नीले पर्दे का प्रयोग करो।

    जीजी का भय मेरे लिए निर्मूल था, उस दोष को दूर कर देना तनिक भी कठिन था। पर जीजी अब कुछ-कुछ हठ पकड़ गई थी। मैं चुप ही रहा, हाँ कहीं ना।

    दूसरे दिन नाट्य प्रदर्शन में बाद जीजी की संतोष भरी, गवभरी, आनंदमग्न श्रीमुख छवि जो उस समय देखी थी वह मेरे मन में इस समय भी वैसी ही सजीव होकर उभर रही है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : महादेवी-स्मरण ग्रंथ (पृष्ठ 62)
    • संपादक : सुमित्रानंदन पंत
    • रचनाकार : अमृतलाल नागर

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