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साधो निंदक मित्र हमारा

sadho nindak mitr hamara

चरनदास

चरनदास

साधो निंदक मित्र हमारा

चरनदास

साधो निंदक मित्र हमारा।

निंदक कूँ निकटे ही राखों होन देउँ नियारा॥

पाछे निंदा करि अघ धोवै सुनि मन मिटै बिकारा।

जैसे सोना तापि अगिन में निरमल करै सोनारा॥

घन अहरन कसि हीरा निबटै कीमत लच्छ हज़ारा।

ऐसे जाँचत दुष्ट संत कू करन जगत उँजियारा॥

जोग जज्ञ जस पाप कटन हित करै सकल संसारा।

बिन करनी मम कर्म कठिन सब मैटै निंदक प्यारा॥

सुखी रहो निंदक जग माहीं रोगी नहीं तन सारा।

हमरी निंदा करने वाला उतरै भव निधि पारा॥

निंदक के चरनों की अस्तुति भाखों बारंबारा।

चरनदास कहँ सुनियो साधो निंदक साधक भारा॥

स्रोत :
  • पुस्तक : हिंदी के जनपद संत (पृष्ठ 178)
  • रचनाकार : चरनदास
  • प्रकाशन : मोेतीलाल बनारसी, दिल्ली
  • संस्करण : 1963

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