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दैहों दधि मधुर धरनि धर्यौ छोरि खैहै

daihon dadhi madhur dharani dharyau chhori khaihai

आलम

आलम

दैहों दधि मधुर धरनि धर्यौ छोरि खैहै

आलम

दैहों दधि मधुर धरनि धर्यौ छोरि खैहै,

धाम तें निकसि धौरी धैनु धाइ खोलि हैं।

धूरि लोटि ऐहैं लपटैहैं लटकत ऐहैं,

सुखद सुनै हैं बैनु बतियाँ अमोल हैं।

‘आलम’ सुकबि मेरे ललन चलन सीखें,

बलन की बाँह ब्रज गलिनि में डोलि हैं।

सुदिन सुदन दिन ता दिन गनौंगी माई,

जा दिन कन्हैया मोसों मैया कहि बोलि हैं॥

माँ यशोदा कहती है कि घर में रखे हुए मीठे दूध-दही को मेरा लाल रुचिपूर्वक जब खाएगा, घर से निकलकर सफ़ेद गायों से दौड़-दौड़ कर जब खेलेगा, दौड़कर वापस आता हुआ मुझसे लिपट जाएगा और मुझसे लटक जाएगा, अपनी सुखदाई अनमोल बातों को सुनाएगा। कवि आलम कहते हैं कि यशोदा कहने लगी कि मेरा लाल जब बलदाऊ की बाँह पकड़कर ब्रज की गलियों में चलना डोलना सीखेगा। मैं उस दिन को ही अपने जीवन का अच्छा दिन मानूँगी जिस दिन मेरा कन्हैया मुझे मैया कहकर पुकारेगा।

स्रोत :
  • पुस्तक : आलम ग्रंथावली (पृष्ठ 12)
  • संपादक : विद्यानिवास मिश्र
  • रचनाकार : आलम
  • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
  • संस्करण : 2015

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