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उमा भगत

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उमा भगत

और अधिकउमा भगत

    जो पूजनीय थे

    उनकी भी नीयत बदली

    और ये जुड़े हुए हाथ

    आशीष की आस में‌

    लज्जित

    धरे के धरे रह गए

    पता भी नहीं चला कब साँस लेने के लिए

    मुँह की ज़रूरत पड़ने

    मेले की जलेबी बेरस लगने लगी

    आधा जीवन

    आधा समय

    तो यही समझते-समझाते बीत गया

    कि केहुनी ग़लती से ही लगी होगी

    वो बस के धक्के से ही मुझ पर गिरा होगा

    ऐसा होगा

    वैसा होगा

    पर सोचा था

    कि देखा जाए

    कुछ ऐसा भी होगा

    और देखना भी होगा

    अब तो आशीर्वाद के लिए भी

    कोई सिर पर हाथ रखता है

    तो छातियाँ काँप जितनी हैं

    कान गर्म हो आते हैं

    दुपट्टा याद आता है

    ढक कर रखने की

    बच कर रहने की

    माँ की चेतावनी याद आती है

    मैं यहीं खड़ी हूँ

    पर कोई भी धरती चीर कर नहीं रहा

    मुझे अपने गोद में लेने

    हर ओर से धर्म से घिरी मैं

    यहीं खड़ी हूँ

    यहीं इसी पृथ्वी पर।

    स्रोत :
    • रचनाकार : उमा भगत
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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