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यहँ धरती के कन-कन

yahan dharti ke kan kan

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

यहँ धरती के कन-कन

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    सोने कै परबत चानी कै नदी सँवारै घाटी

    चढ़ा पवन के मूड़े चन्नन मह मह महकै माटी

    तुलसी सूर कबीरा बोलन भई पवित्तर टाटी

    तन कोपीन कमंडल हाथे दानिन कै परिपाटी।

    हाड़ माँस दइ देइ दान मा, ऐसे ऐसे दानी।

    यह धरती के कन-कन अपने आपै कहै कहानी।

    बइठे बरगद छाँव प्रेम से काग रमायन बाँचै,

    कस्तूरी कुंडल बाँधे सोने कै हिरन कुलाँचै,

    आदि काल से देवता एकर सुघर सरूप सवाचै,

    इहाँ प्रेम के बंधन बँधि के किसन कन्हैया नाचै।

    तीन लोक के मालिक रन मा आइ करइँ रथवानी।

    यह धरती के कन-कन...

    स्वाभिमान कै जोत जगावै इहाँ घास कै रोटी,

    आन-बान मरजादा खातिर कटै बीर कै बोटी,

    साँच होइ तौ आँच आवै झूठ होइ भुँइ लोटी,

    हियाँ तोप कै मोहड़ा फेरै लाठी अउर लँगोटी।

    भये अहिंसा की ताकत से दुसमन पानी-पानी।

    यह धरती कै कन-कन...

    दुसमन उगिलै आग, होइ चाहे फाँसी के फंदा,

    तन पर आरा चलै कि मन पर चलै जुलुम कै रंदा,

    सीस चढ़ावै पूजा पावै हँसि बलिदानी बंदा,

    घात करै तौ थू-थू पावै जस जाफर जयचंदा।

    जाइ परान परन ना जाई घर घर गूँजै बानी।

    यह धरती के कन-कन...

    दौलत लोटा करै चरन मा संतन के बलिहारी,

    चुटकी भै भभूत से भागै इहाँ आपदा सारी,

    देस बरे सिर काटि, पिया का भेंट करै सुकुवारी,

    दाँत सिंह के गिनैं बेटउनू देखि हँसै महतारी।

    धरम-करम दुइनौ एक साथे साधे बइठा ग्यानी।

    यह धरती के कन-कन अपने आप कहै कहानी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 31)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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