मेरे गाँव की औरतें

सुनीता

मेरे गाँव की औरतें

सुनीता

और अधिकसुनीता

    मेरे गाँव की औरतें

    जब आती थीं गवन कर

    पहला क़दम उठाना होता उन्हें झुक कर

    मानो वे रीढ़विहीन हों

    वे छोड़ आती हैं अपने गाँव की नहरें और सड़कें

    ससुराल में नहीं होती उनकी कोई सखी

    उन्हें पता नहीं होता रस्ता

    नैहर से ससुराल का

    हाँ सफ़र लंबा था... बताती हैं वे

    उन्हें याद है कि माँ ने किस तरह बताए थे :

    घर चलाने के तरीक़े

    भाभी ने भी कुछ अनुभव साझा किए थे :

    पति को रिझाने के

    ब्याही गईं मेरे गाँव की औरतें

    सवा महीने तक

    नारंगी सिंदूर से भरती हैं माँग

    हँसतीं

    ऊँचा बोलतीं

    ही नज़रें उठातीं

    मेरे गाँव की औरतें

    ब्याही जा रही हैं इस गाँव से

    उस गाँव तक

    वे फैल रही हैं बीज की तरह

    और फैल रहा है उनका धीमापन

    अब उनकी दुनिया में

    गाँव, नहर और सड़कें नहीं हैं

    ही है सूरज

    आजकल वे बहुत डर रही हैं

    अपने गाँव में

    अपनी बहू-बेटियों के साथ

    वही सब दुहराए जाने से

    मेरे गाँव की औरतें।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुनीता
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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