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गन्ने के खेत में

ganne ke khet mein

सुब्रह्मण्य भारती

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सुब्रह्मण्य भारती

गन्ने के खेत में

सुब्रह्मण्य भारती

और अधिकसुब्रह्मण्य भारती

    गन्ने के खेत, हाँ, गन्ने के खेत में।

    थके हाथ-पैर इधर लुढ़क जाती है,

    पछताती हाय-हाय करती चिल्लाती है।

    हिंदू महिलाओं का ख़ून उबल जाता है—

    पीड़ा में आठ-आठ आँसू ढुलकाती है॥

    इनकी इस पीड़ा की दवा ही नहीं क्या?

    पिसती है रात-दिन कोल्हू के बैल-सी : गन्ने के खेत में।

    गन्ने के खेत, हाँ गन्ने के खेत में॥1॥

    होता ऐसा प्रभाव नारी के नाम का

    पिघल-पिघल जाता है अंतर शैतान का।

    पर यह भी होगा क्या नारी के कष्ट देख—

    द्रवित नहीं होगा अंतर्मन भगवान का?

    अश्रु बहाते वे क्या मिट्टी में समा जाँएगी

    दक्षिण सागर मध्य शेष समय खाएँगी।

    तड़प रही हैं बहनें अंधे बन, द्वीपों में : गन्ने के खेत में।

    गन्ने के खेत, हाँ, गन्ने के खेत में॥2॥

    कब वे इस धरती की सुधि लेने आएँगी?

    कब तक निज भारत के दर्शन को आएँगी?

    मातृभूमि का उनको ध्यान तक नहीं होगा,

    तुमने तो पवन! आर्तनाद भी सुना होगा?

    कहो एक बार जो कहा है तुमसे सबने,

    दुःखसागर में क्या उत्पीड़न सहतीं बहनें?

    फूट-फूट रोने की शक्ति भी नहीं है अब : गन्ने के खेत में।

    गन्ने के खेत, हाँ, गन्ने के खेत में॥3॥

    अन्यायी उत्पीड़न देते ही रहते हैं,

    बहनों को त्रास दे सतीत्व भंग करते हैं।

    बेचारी अबलाएँ तड़प-तड़प रहती हैं—

    शोषण की ज्वाला में घुट-घुटकर मरती हैं॥

    क्या ये शोषण, पीड़न, प्रोत्साहन पाएँगे?

    क्या अब ये आगे भी सहन किए जाएँगे?

    आओ तुम हे कराल! चंडी! दुर्गे! विशाल गन्ने के खेत में,

    गन्ने के खेत, हाँ, गन्ने के खेत में॥4॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : राष्ट्रीय कविताएँ एवं पांचाली शपथम् (पृष्ठ 77)
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक एन. सुंदरम् और विश्वनाथ सिंह 'विश्वासी'
    • प्रकाशन : ग्रंथ सदन प्रकाशन
    • संस्करण : 2007

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