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शतरंज का खेल

shatranj ka khel

अनुवाद : विष्णु खरे

टी. एस. एलियट

टी. एस. एलियट

शतरंज का खेल

टी. एस. एलियट

और अधिकटी. एस. एलियट

       

    कुर्सी जिस पर वह बैठी हुई थी, दमकते हुए सिंहासन-सी,
    संगमर्मर के फ़र्श पर दहकती थी, जहाँ दर्पण
    जिसके दंडों पर अँगूर-लताएँ खुदी हुई थीं
    जिनके बीच से एक सुनहरा कामदेव झाँकता था
    (दूसरे ने अपनी आँखें अपने पंखों के पीछे छुपा ली थीं)
    सात शाखाओं वाले शमादान की लौ को द्विगुणित करता था,
    साटिन के परदों से प्रचुर विपुलता में प्रकाशित
    टेबल की ओर जाने वाली उसके रत्नाभूषणों की दमक को
    टेबल पर प्रतिबिंबित करता था;
    हाथीदाँत तथा काँच की खुली शीशियों में
    उसकी उबटन-सी, चूर्ण अथवा द्रव
    विचित्र मिश्रित सुगंधियाँ छिपी हुई थीं, जो चेतना को आकुल,
    उद्भ्रांत  करतीं
    और डुबोती थीं
    खिड़की से ताज़गी पाती हुई हवा से स्फुरित होकर
    यह उभरकर लंबी मोमबत्तियों की ज्योतियों को मोटा कर रही थीं;
    छत को अपने धुएँ से आच्छादित कर
    उस पर बने हुए आकारों को हिलाती थीं
    हरे तथा नारंगी रंग में धधकते कांस्य तथा रंगीन पत्थर से जड़े
    समुद्र-काष्ठ से बने चित्र में
    मंद प्रकाश में एक उभरी हुई डॉल्फिन तैरती थी
    अँगीठी के ऊपर प्राचीन लकड़ी की किनारी पर,
    जैसे कोई खिड़की किसी वन-दृश्य की ओर खुलती हो,
    एक चित्र में क्रूर नरेश द्वारा फिलोमेल का परिवर्तन प्रदर्शित था—
    अत्यधिक बलपूर्वक विवश; तब भी बुलबुल ने
    अभेद्य वाणी द्वारा मरुभूमि को व्याप्त किया
    और वह रोती ही रही, और संसार अब भी पीछा करता है,
    दूषित कानों के लिए 'जग्-जग्'
    समय के अन्य सूखे हुए ठूँठ
    दीवारों पर लटकाए गए थे; घूरती झुकी हुई आकृतियाँ, झुकती हुईं
    बंद कमरे को चुप करती हुई
    सीढ़ी पर पदचाप खिसके
    अँगीठी के प्रकाश में, ब्रश के नीचे, आग्नेय बिंदुओं में बिखरे हुए केश
    शब्दों में धधके
    फिर कोपाकुल शांत हो जाएँगे।

    आज रात मेरा जी ख़राब है। हाँ, ख़राब। मेरे साथ रहो।
    मुझसे बोलो, तुम क्यूँ नहीं बोलतेकुर्सी जिस पर वह बैठी हुई थी, दमकते हुए सिंहासन-सी,
    संगमर्मर के फ़र्श पर दहकती थी, जहाँ दर्पण
    जिसके दंडों पर अँगूर-लताएँ खुदी हुई थीं
    जिनके बीच से एक सुनहरा कामदेव झाँकता था
    (दूसरे ने अपनी आँखें अपने पंखों के पीछे छुपा ली थीं)
    सात शाखाओं वाले शमादान की लौ को द्विगुणित करता था,
    साटिन के परदों से प्रचुर विपुलता में प्रकाशित
    टेबल की ओर जाने वाली उसके रत्नाभूषणों की दमक को
    टेबल पर प्रतिबिंबित करता था;
    हाथीदाँत तथा काँच की खुली शीशियों में
    उसकी उबटन-सी, चूर्ण अथवा द्रव
    विचित्र मिश्रित सुगंधियाँ छिपी हुई थीं, जो चेतना को आकुल,

    उद्भ्रांत  करतीं
    और डुबोती थीं
    खिड़की से ताज़गी पाती हुई हवा से स्फुरित होकर
    यह उभरकर लंबी मोमबत्तियों की ज्योतियों को मोटा कर रही थीं;
    छत को अपने धुएँ से आच्छादित कर
    उस पर बने हुए आकारों को हिलाती थीं
    हरे तथा नारंगी रंग में धधकते कांस्य तथा रंगीन पत्थर से जड़े
    समुद्र-काष्ठ से बने चित्र में
    मंद प्रकाश में एक उभरी हुई डॉल्फिन तैरती थी
    अँगीठी के ऊपर प्राचीन लकड़ी की किनारी पर,
    जैसे कोई खिड़की किसी वन-दृश्य की ओर खुलती हो,
    एक चित्र में क्रूर नरेश द्वारा फिलोमेल का परिवर्तन प्रदर्शित था—
    अत्यधिक बलपूर्वक विवश; तब भी बुलबुल ने
    अभेद्य वाणी द्वारा मरुभूमि को व्याप्त किया
    और वह रोती ही रही, और संसार अब भी पीछा करता है,
    दूषित कानों के लिए 'जग्-जग्'
    समय के अन्य सूखे हुए ठूँठ
    दीवारों पर लटकाए गए थे; घूरती झुकी हुई आकृतियाँ, झुकती हुईं
    बंद कमरे को चुप करती हुई
    सीढ़ी पर पदचाप खिसके
    अँगीठी के प्रकाश में, ब्रश के नीचे, आग्नेय बिंदुओं में बिखरे हुए केश
    शब्दों में धधके
    फिर कोपाकुल शांत हो जाएँगे।

    आज रात मेरा जी ख़राब है। हाँ, ख़राब। मेरे साथ रहो।
    मुझसे बोलो, तुम क्यूँ नहीं बोलते कभी। बोलो।
    तुम किस बारे में सोच रहे हो? क्या सोच रहे हो? क्या?
    तुम क्या सोचते हो मैं कभी नहीं जानती। सोचो।

    मैं सोचता हूँ कि हम चूहों के गलियारे में हैं
    जहाँ मुरदों ने अपनी हड्डियाँ खो दी थीं।

    'यह कैसा शोर है?'
    दरवाज़े के तले हवा।
    'वह कैसा शोर है अब?'
    कुछ नहीं फिर कुछ नहीं।

    क्या तुम कुछ नहीं जानते? तुम क्या कुछ नहीं देखते? क्या-क्या तुम्हें
    कुछ याद नहीं आता?
    मुझे याद
    वे मोती हैं जो उसकी आँखें थीं
    'तुम जीवित हो, या नहीं? क्या तुम्हारे दिमाग़ में कुछ नहीं है?'
    किंतु
    ओ...ओ...ओ...ओ...वह शेक्सपीरियन रैग—
    कितना सुंदर है
    कितना बुद्धिमय है
    'मैं अब क्या करूँगी? मैं क्या करूँगी?'
    मैं जैसी हूँ उसी तरह बाहर झपट निकलूँगी, और सड़क पर
    अपने केश नीचे रख इस तरह चलूँगीक्या कल हम क्या करेंगे?
    हम आख़िर क्या करेंगे?'
    दस बजे गरम पानी।
    और यदि बरसात होगी तो चार बजे बंद कार।
    और हम शतरंज का एक खेल खेलेंगे।
    पलकहीन आँखों पर ज़ोर देते हुए तथा दरवाज़े पर दस्तक का इंतज़ार करते हुए,
    जब लिल का पति फ़ौज से हटाया गया, मैने कहा—
    मैंने शब्दों को बनाकर नहीं कहा, मैंने उससे ख़ुद कहा,
    कृपया शीघ्रता करो समय हो गया
    अल्बर्ट अब वापस आ रहा है, अपने को थोड़ा चुस्त बना लो।
    वह जानना चाहेगा कि उसने जो पैसा तुम्हें दाँत लगवाने को दिया था
    तुमने उसका क्या किया। उसने दिया था, मैं थी वहाँ।
    उन सबको निकलवा डालो, लिल, और एक अच्छा सेट ले लो
    उसने कहा, क़सम से, मैं तुम्हें देख नहीं सकता।
    और मैं भी नहीं, मैने कहा, और बेचारे अल्बर्ट की तो सोचो,
    वह फ़ौज में चार साल रहा है, मौज करना चाहता है
    और यदि तुम उसे मौज नहीं करने देती, तो दूसरी हैं जो करने देंगी, 
    मैंने कहा।
    ओह हैं क्या, वह बोली। ऐसी ही कुछ बात है, मैं बोली।
    तो मैं जान लूँगी कि किसका शुक्रिया करूँ, वह बोली, और मेरी ओर घूरा
    कृपया शीघ्रता करो समय हो गया
    तुम वैसा न चाहो तो इसको निभा सकती हो, मैंने कहा।  
    तुम नहीं तो दूसरी तो देख-सँभल कर चलती है
    किंतु यदि अल्बर्ट खिसक जाए, तो सबब ढूँढ़ना नहीं पड़ेगा
    तुम्हें शर्म आनी चाहिए, मैं बोली, इस तरह पुरानी दिखने के लिए
    [और वह केवल इकतीस की है]
    वह मुँह बनाकर बोली, मेरा कोई बस नहीं है,
    यह उसे गिराने के लिए उन गोलियों की वजह से है, वह बोली
    [उसे पाँच पहले ही हैं और छोटे जॉर्ज के वक़्त मरते-मरते बची थी]

    केमिस्ट ने कहा था कि सब ठीक हो जाएगा, लेकिन मैं पहिले-सी नहीं रही।
    तुम हो ही पूरी बेवुक़ूफ़, मैं बोली।
    ख़ैर, अगर अल्बर्ट तुम्हें परेशान करे, तब क्या है, मैं बोली,
    अगर तुम बच्चे नहीं चाहतीं तो ब्याह क्यूँ करती हो?
    कृपया शीघ्रता करो समय हो गया
    अच्छा, उस इतवार अल्बर्ट घर पर था, उनके यहाँ ताज़ा गोश्त पका था,
    और उन्होंने मुझे डिनर के लिए कहा, उसका गरमागरम मज़ा लेने के लिए—
    कृपया शीघ्रता करो समय हो गया
    कृपया शीघ्रता करो समय हो गया
    गुनाइट बिल, गुनाइट लू, गुनाइट मे, गुनाइट।
    टा टा, गुनाइट, गुनाइट।
    गुडनाइट, महिलाओ, गुड नाइट, प्रिय महिलाओ, गुड नाइट, 
    गुड नाइट।


         
    स्रोत :
    • पुस्तक : मरु-प्रदेश और अन्य कविताएँ (पृष्ठ 46)
    • रचनाकार : टी. एस. एलियट
    • प्रकाशन : नोबेल साहित्य प्रकाशक, कटक-2
    • संस्करण : 1960
    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    ‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।

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