सड़कें

और अधिकराजेंद्र धोड़पकर

    मैं आज उन सड़कों के बारे में

    लिखना चाहता हूँ जो मेरी कविताओं की पंक्तियों

    के बीच फैली हैं अंतहीन

    किसी विशाल पेड़ की अंतहीन जड़ों की तरह

    शहर के बदन में धँसी हुई सड़कें

    जिन पर हवा के झोंकों की तरह

    गुज़र जाते हैं लोग अपनी बातचीत छोड़ते हुए

    मैं आज उन दुर्घटनाओं के बारे में लिखना चाहता हूँ

    जो किसी वक़्त होती हैं सड़कों पर

    हवा में खिंच जाता है बिजली का झनझनाता तार

    हालाँकि वे नहीं रहती कुछ देर बाद

    किसी अख़बार की ख़बर की तरह

    या अस्पताल में हुई किसी मौत की तरह

    जो नहीं रहती कुछ देर बाद

    लेकिन देर रात गए सड़कों पर उभरते हैं ख़ून के धब्बे

    और लोगों की बातचीत के अंश

    निरुवक़्त सड़कों पर आवारा कुत्ते और बीड़ियाँ पीते शरीबी होते हैं

    हवा में उड़ते काग़ज़ों के नीचे, खुदरे शरीर के पोरों में

    सुरक्षित रखती हैं सड़कें

    सब घटनाओं को देर रात गए

    अपने डामर और गिट्टी के बने होंठ हर किसी के सामने

    नहीं खोलतीं चुप्पी सड़कें लेकिन हर बात

    उनके दिल के अंदर होती है चुपचाप

    मैं आज इस बूढ़े शराबी कवि के बारे में लिखना चाहता हूँ

    जो देर रात तक सड़कों से बतियाता रहता था

    मैं लिखना चाहता हूँ उसकी बेइंतिहा आवारागर्दी के बारे में

    जिसका घनिष्ठ संबंध है इन सड़कों से

    और उसकी कविताओं से।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दो बारिशों के बीच (पृष्ठ 40)
    • रचनाकार : राजेंद्र धोड़पकर
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 1996

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