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रमखोदइया

ramkhodaiya

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    तौ खोट कलमा पढ़या बाटै,

    तौ खोट मूरत पुजैया बाटै,

    उहै ओनकै मंदिर उहै ओनकै महजिद

    देसवै परा रमखोदइया बाटै।

    अजोध्या बहिगा रकत कै पनारा,

    बना करबला आज कसमीर सारा,

    निकारा गवा भाय अपने घरे से

    सड़क पर परा हाय सिसकै बेचारा।

    रकत की नदी मा बही जात नइया,

    सूझै किनारा चेतै खेवइया,

    खुदा के खुदाई कि इस्सर माया

    जहाँ लौ लखा बा सगर रमखोदइया।

    दया और धरम रमखोदइया बहिगे,

    हया सरम रमखोदइया बहिगे,

    बनी बस भरम कै कथा कहानी

    कि सच्चा करम रमखोदइया बहिगे।

    ओहर बइठ पंडित ओहर बइठ मुल्ला,

    करें बेगुनाहन के खूने कुल्ला,

    बपौती बनी एनकै मंदिर मसजिद

    बतावै ये दुनिया के पानी बुल्ला।

    करैं ये इसारा तौ इंसान नाचै,

    कि मनई कि देही सैतान नाचै,

    चढ़ावै जौ एनके हुकुम पर चढ़ौती

    तौ एनके मनाए से भगवान नाचै।

    रहे दुख के साथी रहे सुख के संगी,

    खींचा तानी दंगा दंगी,

    उहै पैलगी उहै रमजोहारी

    उमुल्ला के सिन्नी मिसिर के सोहारी।

    नजर लागि गै तौ मियादीन झारैं,

    कचन्नू औघड़ सदुल्ला उतारैं,

    सगै गोत परिवार बोलैं टिपोसी

    मुला काम आवा थीं रान् परोसी।

    कि मरनी और करनी वियाहे बराते,

    सँभारा थीं इज्जत परोसी के नाते,

    कि फगुई गुड़ई दसहरा देवारी

    सलामत नेवतैं रमेसर तेवारी।

    नियामत एक्का असद कै मियाना,

    जनक के बियाहे रईसुल गाना,

    चलै बात तौ होइ चरचा अबै तक

    कि गाने से रमजान परचा अबै तक।

    कि भीड़े भताने नेवता हँकारी,

    रहै सब गउआँ इज्जत पियारी,

    कि काजे परोजे जथा जोग लागै

    लछिमी नरायन कहे भोग लागै।

    लियाकत दहिना भगत कै बवैंया,

    चलै हरसझा लाज राखै गोसइयाँ,

    विसम्भर कि आलू सौकत आधा

    कौनौ फजीहत कौनौ वियाधा।

    ठनै रार तौ बात पंचै मानै,

    कि हिन्दू तुरुक केउ पूँछे जानै,

    जहर रमखोदइया घोरै मजहब

    कि भाई भाई से तोरै मजहब।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 35)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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